मंगलवार, 29 सितंबर 2026

जब खेल कमेंट्री होती थी सुनने लायक

विवेक शुक्ला

कमेंट्री कभी खेल का दूसरा मैदान होती थी। आंखें बंद करके भी स्ट्रोक दिख जाता था, गोल सुनाई देता था, विकेट गिरने की आवाज कमरे तक पहुंच जाती थी। आज स्क्रीन बड़ी है, कैमरे हर कोण से देखते हैं, रेडियो, दूरदर्शन और निजी चैनल एक साथ बोलते हैं। एशियन गेम्स चल रहे हैं। भारत-वेस्टइंडीज क्रिकेट सीरीज भी चल रही है। आवाज साथ-साथ है। पर सुनने का आनंद कम रह गया है। भाषा ढीली पड़ गई है। ज्ञान अधूरा दिखता है। वाक्य टूटते हैं। आंकड़े गलत निकलते हैं। उत्साह नारेबाजी बन जाता है। दर्शक देखता भी है, सुनता भी है, फिर भी संतोष नहीं मिलता।

एक दौर और था। लोग रेडियो से दूर नहीं होते थे। टीवी से भी नहीं उठते थे। सुशील दोषी कमेंट्री करते थे। रवि चतुर्वेदी कमेंट्री करते थे। बी.पी. ओझा भी कमेंट्री करते थे। आवाज शांत होती थी। वाक्य पूरे होते थे। खेल की समझ साफ होती थी। घर में बैठा श्रोता मैदान को आंखों से देख लेता था। क्योंकि शब्द पूरे होते थे।

सुशील दोषी की आवाज पहचान बन गई थी। क्रिकेट में उनकी शैली घर-घर पहुंची। रवि चतुर्वेदी दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे। पढ़ाई और खेल दोनों उनके पास थे। बी.पी. ओझा भारत सरकार में आला अधिकारी थे। वे केवल माइक के पीछे नहीं बैठे थे। वे मैदान भी जानते थे। राज्य स्तर के फुटबॉल खिलाड़ी रहे। दिल्ली हॉकी लीग खेली। रेफरी भी रहे। इसलिए उनकी कमेंट्री में केवल शब्द नहीं होते थे। अनुभव होता था।

ओझा तीन खेलों के माहिर थे - ओझा ने कमेंट्री 1978 में शुरू की। उसके बाद कई बड़े आयोजन उनके हिस्से आए। डीसीएम और डूरंड कप के फाइनल। रोवर्स कप। संतोष ट्रॉफी। आईएफए शील्ड। 1984 का एशिया कप फुटबॉल। 1986 का हॉकी विश्व कप। 1988 के सियोल ओलंपिक। 1982 के दिल्ली एशियाई खेल। 1987 का रिलायंस विश्व कप। मुंबई में भारत-इंग्लैंड सेमीफाइनल। अनेक टेस्ट और वनडे। ईडन गार्डंस में भारत-दक्षिण अफ्रीका का ऐतिहासिक वनडे। नेहरू गोल्ड कप। इंदिरा गांधी गोल्ड कप। 1986 का फुटबॉल विश्व कप दूरदर्शन स्टूडियो से।

सूची लंबी है। बड़ी बात यह है कि एक ही व्यक्ति हॉकी, फुटबॉल और क्रिकेट तीनों में माहिर था। आज एक खेल में भी पकड़ अधूरी रहती है। तीन खेलों में पकड़ तब दुर्लभ थी। ओझा के पास वह पकड़ थी क्योंकि वे मैदान से आए थे। खिलाड़ी रहे। रेफरी रहे। फिर कमेंटेटर बने। यह क्रम उनकी आवाज में सुनाई देता था।

टीवी का नया दबाव - जसदेव सिंह भी स्तरीय थे। ओलंपिक और बड़े आयोजनों में उनकी आवाज घर-घर पहुंची। गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस की कमेंट्री भी उनके नाम रही। टीवी आने के बाद उन पर सवाल उठे। कैमरा सब दिखा देता था। अब वर्णन कम, अर्थ अधिक चाहिए था। कुछ मानते थे कि वे पुरानी शैली में अटके रहे। कुछ मानते थे कि माध्यम ने अपेक्षाएं बदल दीं। विवाद रहा। पर वह पीढ़ी बिना तैयारी के माइक पर नहीं बैठती थी। दोषी, चतुर्वेदी, ओझा और जसदेव सिंह सभी तैयारी करके आते थे।

आज भाषा टूट गई है - आज की शिकायत इससे आगे है। हिंदी में अंग्रेजी के अधूरे शब्द घुस आए हैं। क्रिकेट में हर गेंद पर एक ही उत्साह दोहराया जाता है। हॉकी में मैदान की समझ कम दिखती है। फुटबॉल में नियम अधूरे बताए जाते हैं। एशियन गेम्स जैसे बड़े मंच पर भी यही हाल है। कई खेल एक साथ चलते हैं। नाम नए लगते हैं। नियम नए लगते हैं। तब कमेंटेटर का काम बढ़ जाता है। पर कई बार वे खेल की बारीकी से ज्यादा खुद को सामने रखते हैं। दर्शक थक जाता है। कान ऊब जाते हैं।

पुरानी कमेंट्री में संयम था। चुप्पी भी भाषा का हिस्सा होती थी। स्ट्रोक लगे तो शब्द कम होते थे। विकेट गिरा तो वाक्य साफ होता था। गोल हुआ तो आवाज उठती थी। अर्थ नहीं खोता था। ओझा, चतुर्वेदी और दोषी के यहां खेल पहले आता था। व्यक्ति बाद में।

भाई-भतीजावाद ने स्तर गिराया - ऐसी आवाजें क्यों कम हो गईं? एक जवाब बार-बार आता है। रेडियो और टीवी कमेंट्री में भाई-भतीजावाद जम गया। जो मैदान जानते थे, उन्हें जगह नहीं मिली। जो गलियारे जानते थे, वे माइक तक पहुंच गए। योग्यता पीछे रह गई। पहचान आगे आ गई। नए चेहरे आए। नई तैयारी नहीं आई। खेल का पाठ अधूरा रहा। भाषा का अभ्यास अधूरा रहा।

कमेंट्री हल्की कला नहीं है। आंख से देखना होता है। दिमाग से जोड़ना होता है। फिर सरल वाक्य में कहना होता है। चतुर्वेदी अध्यापक थे, इसलिए भाषा साफ थी। ओझा अधिकारी भी थे, खिलाड़ी भी थे, इसलिए विवरण ठोस था। दोषी लंबे समय तक क्रिकेट के पास रहे, इसलिए आवाज में प्रवाह था। तीनों खेल एक आवाज में समा जाते थे। यह संयोग नहीं था। यह मेहनत थी।

मात्रा बढ़ी, स्तर नहीं बढ़ा - आज निजी चैनल ज्यादा हैं। घंटे ज्यादा हैं। मैच ज्यादा हैं। संतोष कम है। मात्रा बढ़ी है। स्तर नहीं बढ़ा। एशियन गेम्स में दर्शक को गाइड चाहिए। नियम समझाने वाला चाहिए। इतिहास याद दिलाने वाला चाहिए। केवल शोर नहीं चाहिए। क्रिकेट में भी गेंद की लाइन काफी नहीं। मैच का प्रवाह, पिच और रणनीति बतानी चाहिए। बिना तैयारी के यह संभव नहीं।

पुरानी पीढ़ी पूर्ण नहीं थी। जसदेव सिंह पर टीवी युग में सवाल उठे। समय बदलता है। शैली बदलती है। पर मूल बात नहीं बदलनी चाहिए।खेल की समझ, भाषा की साफगोई, दर्शक का सम्मान।

ओझा की असली विशेषता - ओझा की विशेषता यही सम्मान था। मैदान का, खिलाड़ी का, श्रोता का। उनकी कमेंट्री में दिखावा कम था। तथ्य ज्यादा थे। फाइनल देखे। विश्व कप देखे। ओलंपिक देखे। एशियाई खेल देखे। फिर भी आवाज में संयम रहा। जोर से बोलना आसान है। साफ बोलना कठिन है।

अगर भाई-भतीजावाद न होता तो और ओझा सामने आते। मैदान के रेफरी आते। राज्य स्तर के खिलाड़ी आते। अध्यापक आते। जिनकी जिंदगी खेल के पास रही हो, केवल कैमरे के पास नहीं। कमेंट्री तब फिर सुनने लायक बनती।

कसौटी वही रहनी चाहिए - आज जरूरत केवल नए चेहरों की नहीं है। जरूरत पुरानी कसौटी की है। खेल जानो। भाषा संभालो। दर्शक को साथ रखो। एशियन गेम्स और क्रिकेट सीरीज इसी कसौटी पर चल रहे हैं। माइक खुला है। कान संतुष्ट नहीं हैं। यही अफसोस है। और यही याद भी है। जब दोषी, चतुर्वेदी और ओझा बोलते थे तो लोग रेडियो और टीवी के पास बैठे रहते थे। वह समय पूरी तरह नहीं लौटेगा। पर उसका स्तर लौट सकता है अगर योग्यता को रिश्ते से ऊपर रखा जाए।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

भारत का सबसे कम जाना-पहचाना स्कूल: जहाँ गांधी जी पढ़ाते थे

विवेक शुक्ला

दुनिया गांधी जी को शांति का दूत, आज़ादी की लड़ाई का नेता और समाज सुधारक के रूप में जानती है। बहुत कम लोग यह जानते हैं कि एक समय वे सचमुच के मास्टर भी बने थे। राजधानी के कनॉट प्लेस के पास मंदिर मार्ग पर वाल्मीकि मंदिर में रहते हुए उन्होंने वाल्मीकि कॉलोनी के बच्चों और उनके माँ-बाप को हिंदी और अंग्रेज़ी पढ़ाई। शायद यही पहला और आखिरी मौका था जब गांधी जी सही मायने में शिक्षक बने।

बापू के कमरे में कदम रखिए तो दीवारों पर पुरानी सेपिया तस्वीरें दिखती हैं-लॉर्ड और लेडी माउंटबेटन, आचार्य कृपलानी, सीमांत गांधी, सी. राजगोपालाचारी, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद और पंडित नेहरू के साथ। इन सबके बीच एक धुंधली पेंटिंग इस कमरे की कहानी कहती है। उसमें कई बच्चे बापू से बात कर रहे हैं, चेहरे जीवंत हैं। चित्रकार का नाम नहीं मिला, पर तस्वीर उस जगह का मूड आज भी पकड़ लेती है।

कमरे में कालीन बिछा है। बीच में लकड़ी की वह मेज़ है जिस पर गांधी जी लिखा करते थे। दाईं ओर वह चारपाई है जिस पर वे सोते थे। पास ही छोटी-सी चरखा रखा है। मंदिर के पुजारी और रखवाले कृष्ण विद्यार्थी कहते हैं कि सब कुछ उसी जगह है जहाँ बापू ने छोड़ा था।

डॉ. ओम प्रकाश, दलित कार्यकर्ता, जिनके पिता और भाई गांधी जी के छात्र रहे, कहते हैं, “गांधी जी ने यह जगह इसलिए चुनी कि वे तथाकथित अछूतों के साथ रह सकें। उन दिनों मंदिर के बगल वाली वाल्मीकि कॉलोनी में बहुत सारे परिवार झुग्गियों में रहते थे। लोग गोल मार्केट, इरविन रोड यानी आज के बाबा खड़क सिंह मार्ग और कनॉट प्लेस में सफाई का काम करते थे। बापू को हमारी बिरादरी से गहरा लगाव था।”

आज भी कई वाल्मीकि परिवार यहीं रहते हैं, अब पक्के फ्लैटों में। झुग्गियाँ कब की उठ चुकी हैं। सन् 1946 में गांधी जी ने कॉलोनी के बुजुर्गों से पूछा कि क्या वे दो-चार महीने उनके साथ रह सकते हैं। लोगों ने हाँ कर दी। वे ठीक 214 दिन रहे-एक अप्रैल 1946 से दस जून 1947 तक।

सुबह और शाम की कक्षाएँ वे कभी नहीं छोड़ते थे। इतने नियमित थे कि आज़ादी के आंदोलन के बड़े नेताओं की मुलाकात भी अक्सर कक्षा खत्म होने तक टाल देते। कक्षा प्रार्थना से पहले शुरू होती। पढ़ाई और प्रार्थना के समय मेहमान नहीं मिलते थे। जीवनीकार लुई फिशर अपनी किताब द लाइफ ऑफ महात्मा गांधी में लिखते हैं, “मैं अपने होटल इंपीरियल से वाल्मीकि मंदिर पहुँचा था उनसे बात करने। पर वे प्रार्थना के बाद ही मिले।” फिशर 1946 में किताब के नोट्स जुटाने दिल्ली में एक महीने से ज्यादा रुके थे।

कृष्ण विद्यार्थी बताते हैं, “बापू जब कॉलोनी आए तो परिवारों से मिलने लगे। उन्हें सदमा लगा कि सब अनपढ़ हैं। किसी ने स्कूल का मुँह तक नहीं देखा था। फिर उन्होंने कहा कि बच्चों को भेज दो, मैं पढ़ाऊँगा। बुजुर्गों ने माना।” विद्यार्थी के पिता और चाचा भी उन कक्षाओं में बैठे। गांधी जी चाहते थे कि लोग सादी हिंदी और अंग्रेज़ी पढ़-लिख लें।

मास्टर बड़े सख्त थे। बिना नहाए कक्षा में आने वाले को डाँट पड़ती। सिर्फ वाल्मीकि कॉलोनी के बच्चे नहीं आते थे। हरकोर्ट बटलर स्कूल, रायसीना बंगाली स्कूल और दिल्ली तमिल एजुकेशन एसोसिएशन यानी डीटीईए स्कूल के बच्चे भी आते। कक्षा सबके लिए खुली थी। कहा जाता है कि बापू हर छात्र का नाम जानते थे।

वे छात्र अब नहीं रहे अपनी कहानी खुद कहने को, पर उनके बच्चे हैं। विद्यार्थी कहते हैं, “जब सुरक्षा के चलते बापू को यहाँ से बिड़ला हाउस ले जाया गया, बड़ा झटका लगा। हमारे बुजुर्ग टूट गए। अफसोस, मारे गए वहीं जहाँ सुरक्षा कड़ी थी।”

डॉ. ओम प्रकाश बाद में इंडियन लॉ इंस्टीट्यूट में पढ़ाते रहे। वे कहते हैं, “मैंने बापू की पाठशाला की कहानियाँ बाबूजी से सुनी। पिता जी उनकी कक्षा में बैठे थे। उस समय हमारा घर भी मंदिर के पास ही था। गांधी जी की वजह से घर के कई लोग थोड़े पढ़े-लिखे हो गए। सबसे अच्छी बात यह थी कि बाप-बेटा और माँ-बेटी एक साथ कक्षा में आते थे।”

जब मंदिर में पढ़ाई चली तो गोल मार्केट, पहाड़गंज, इरविन रोड और आसपास के बच्चे भी जुड़ गए। शुरू में करीब तीस बच्चे थे। फिर सुबह पचहत्तर और शाम पचहत्तर हो गए। भीड़ बढ़ी तो कक्षा खुले में लगने लगी।

इसी दिल्ली से गांधी जी का नाता पुराना था। पहली बार वे बारह से चौदह अप्रैल 1915 को आए। कश्मीरी गेट स्थित सेंट स्टीफंस कॉलेज के प्रिंसिपल एस. के. रुद्र के घर रुके थे। फादर जॉर्ज सोलोमन कहते हैं कि रुद्र साहब गांधी जी के मित्र दीनबंधु सी. एफ. एंड्रयूज की वजह से बने, जो सेंट स्टीफंस कॉलेज में शिक्षक थे। उस पहली यात्रा की एक तस्वीर आज भी कॉलेज के प्रिंसिपल ऑफिस में लगी है।

वाल्मीकि मंदिर वाली वह पाठशाला इतिहास की किताबों में बहुत नहीं चलती। नेता आते थे, बातें होती थीं, पर सुबह-शाम बापू तख्ती के पास बैठे रहते। बच्चे नहा-धोकर आते, बड़े भी बैठ जाते। कोई फीस नहीं। सिर्फ यह कि पढ़ना चाहिए।

आज कमरे में वही मेज़ है, वही छोटा चरखा, वही चारपाई। बाहर कॉलोनी बदल चुकी है। झुग्गी गई, फ्लैट आए। पर पुरानी बातें बची हैं। मास्टर जी आते थे, नाम लेकर पुकारते थे। दिल्ली ने गांधी जी को नेता के रूप में देखा। मंदिर मार्ग वाली इस छोटी पाठशाला में दिल्ली ने उन्हें मास्टर जी के रूप में भी देखा। यही बात इस कमरे को याद रखने लायक बनाती है।

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