गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

घूसखोर पंडत फिल्म पर विवाद क्यों?

बसंत कुमार

प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता मनोज बाजपेई की फिल्म घुसखोर पंडित के शीर्षक पर विवाद हो रहा है यद्यपि उच्च न्यायालय में फिल्म निर्माताओं ने यह आश्वासन दे दिया है का शीर्षक बदल दिया जायेगा, इससे यह विवाद तो रूप गया है पर इसके पीछे कुछ प्रश्न छोड़ दिया गया है कि पंडत शब्द क्या किसी वर्ण विशेष की जागीर है और क्या इस फिल्म के माध्यम से उस वर्ण विशेष की प्रतिष्ठा पर आघात पहुंचा रहा है और फिल्म उद्योग द्वारा बन रही फिल्मों में किसी जाति पर और क्षेत्र के लोगो की विशेष छवि को पेश किया जाता रहा है पर आज तक इस पर विरोध नहीं हुआ तो क्या हजारों वर्ष प्राचीन वर्ण व्यवस्था इतनी इतनी हल्की सोच की हो गई है कि उससे मिलते जुलते नाम पर ही कोई फिल्म बनाने पर विवाद खड़ा हो गया और मामला सोशल मीडिया से लेकर कोर्ट तक पहुंच गया।

सत्तर के दशक की फिल्मों में जब से फिल्मों में भ्रष्टाचार आदि विषयों पर फिल्में बनने लगी है या ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर फिल्में बनने लगी तब से फिल्म केटाइटल पर विरोध होने लगा है। एक दशक पहले फिल्म पद्मावत के मूल शीर्षकों पर विवाद खड़ा हुआ और करणी सेना ने फिल्म के रिलीज पर ही अपनी आपत्ति खड़ी कर दी थी। जबकि रानी पद्मावती का यह चरित्र चित्रण प्रसिद्ध कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अपने काव्य में कई सदियों पहले लिखा पर उस समय उस पर कोई आपत्ति नहीं उठाई पर अब हम इतने असहनशीन हो गए हैं कि किसी फिल्म के टाइटल मात्र से भड़क जाते है बगैर यही जाने की इसमें फिल्म में उस चरित्र की प्रशंसा है या आलोचना। मैने स्वयं फिल्म पद्मावत देखी और पाया कि रानी पद्मावती का जो व्यक्तित्व फिल्म में दर्शाया गया है उस पर न सिर्फ क्षत्रिय समाज नहीं बल्कि पूरे हिंदू समाज को गर्व होना चाहिए एक पतिव्रता जो सुंदर होने के साथ साथ अपने पति और राज्य की जनता के भले के लिए सोचता रहती है और ऐसे उच्च व्यक्तित्व वाली महारानी के बारे में हमारा पीढ़ियां जाने, बाकी इस ऐतिहासिक सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि अलाउद्दीन खिलजी ने हिंदुस्तान में शासन किया और वह बहुत ही क्रूर था बाकी सुंदर स्त्रियों के लिएआकर्षण मानव की कमजोरी रही है और न जाने कितने युद्ध इसीलिय हुए पर हमारे इतिहास में महिला के व्यक्तित्व को लेकर जो अवधारणा रही है वो कभी नहीं बदली और न बदलेगी।

यदि हम अपने समाज में प्राचीन कहानियों को पढ़े तो हर कहानी इसी बात से शुरू होती थी कि गांव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था और एक धनी साहूकार रहता था जहां ब्राह्मण को लोगो से प्राप्त दान और दक्षिणा से ही गुजारा करता हुआ दिखाया जाता था वही साहूकार बनिया को सूदखोर लोगों की जमीन हड़पने वाला दिखाया जाता था तो क्या इन कहानियों ने सामाजिक सद्भाव को कभी बिगाड़ा, मुंशी प्रेम चंद की कहानी सबसेर गेहूं में गांव के जमींदार का जो चित्रण दिखाया गया है उस पर किसी जमीदार साहू कार ने कभी कोई अपत्ति नहीं की, लेकिन यह कहानी आज के युग में लिखूं गई होता तो मुंशी प्रेम चंद के पुतले जला दिए गए होते या फिर वे किसी कोर्ट में अपने बचाव में वकील के साथ खड़े हुए होते दिखाई देते। उनकी एक और कहानी में किसान की गाय खूंटे से बंधे बंधे मर जाती है और गो हत्या के दोष से किसान का ब्राह्मणों द्वारा जो शोषण दिखाया गया क्या उस पर कभी ब्राह्मण समाज ने क्या कभी आपत्ति की?शायद कभी नहीं बल्कि सभी उसको पढ़कर आनंद उठाते।

जहां तक हिंदी फिल्मों की बात है तो फिल्मों में किसी एक जाति विशेष और क्षेत्र विशेष के लोगों को एक विशेष रूप में दसको से दिखाया जाता रहा है लेकिन कभी इस पर कभीभी भी कोई आपत्ति नहीं हुई। फिल्मों में घर के नौकर क्या रसोईया पूर्वी उत्तर प्रदेश या बिहार के लोगों को दिखाया जाता रहा है और इन्हें महाराज कहके बुलाया जाता है, अब यह नहीं समझ में आता कि महाराज कोई जाति है या एक उपनाम बताया गया है इसी प्रकार पुजारी को किसकी जाति ब्राह्मण होती है उसको पाखंडी ढोंगी सदैव लालची दिखाया जाता रहा है। इस प्रकार बनिया को बेईमान सूद खोर अत्याचारी दिखाया जाता रहा है बात यहीं तक नहीं रुकती क्षत्रिय को ठाकुर जमीदार के रूप में दिखाई जाता है जो जनता पर अत्याचार करता रहता है और जनता उनके रहमों करम पर जीती है जैसे राजेंद्र कुमार और प्राणद्वारा अभिनीत फिल्म गवार में जो जमीदार राजपूत की छवि दिखाई गई है और कभी भी गले से नहीं उतरती पर किसी भी वर्ग ने इस पर आपत्ति नहीं उठाई भारतीय फ़िल्म उद्योग की पहली फिल्म अछूत कन्या में अंतर्जातीय विवाह जैसी चीज दिखाइए और यह दर्शाया गया की एक दलित कन्या को समाज में किस तरह से ट्रीट किया जाता है पर इस पर किसी ने कभी कोई आपत्ति नहीं दिखाई, वही फिल्मों में पादरी को नेक और मुसलमान को आतंकी दिखाया जाता है और दलित को पूरी फिल्में हाथ जोड़ता हुआ और कोड़े खाते हुए दिखाया जाता है पर आज तक इस समाज में कभी आपत्ति नहीं हुई पर ऐसा क्या है कि अब लोग इन छोटी-छोटी बातों पर लोग सोशल मीडिया से लेकर कोर्ट के चक्कर लगा रहे हैं। और हमारे न्यायालय अपने बेशकीमती समय को लाखों की संख्या में पेंडिंग मामलों को निपटाने के बजाय इन फालतू बातों पर ध्यान देते है।

वैसे यह बात सर्वविदित है कि पंडित शब्द किसी जाति विशेष के लिए नहीं इस्तेमाल नहीं किया जाता क्योंकि हिंदू वर्ण व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण एक वर्ण है ना कि जाति है और उसी तरह से पंडित सम्मान पूर्वक विद्वानों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाला शब्द है इसको किसी भी रूप में ब्राह्मण का समानार्थी या पर्यायवाची नहीं माना जा सकता जैसेप्रसिद्ध बांसुरी वादक पंडित हरि प्रसाद चौरसिया आशीर्वाद जी को लीजिए इसीलिए उनको पंडित इसलिए कहा गया है कि अपने क्षेत्र की महान विभूति है जबकि उनकी जाति ब्राह्मण नहीं है इसी प्रकारअनेक विभूतिया है जिनको हम पंडित कहते हैं लेकिन वह जाति से ब्राह्मण नहीं है। पंडित आनंद नारायण मुल्लाह एक ऐसी विभूति थे जिनके नाम के आगे पंडित और पीछे मुल्लाह दोनों सब लगे हैं। इसी प्रकार पंडित राम प्रसाद बिस्मिल ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे जिसके नाम के आगे पंडित और पीछे बिस्मिल दोनों लगा हुआ था। पता नहीं कितने ऐसे लोग हैं जो नाम के आगे पंडित तो लगते हैं पर उनकी जाति ब्राह्मण नहीं है फिर इस फिल्म में पंडित को ब्राह्मण का पर्यायवाची क्यों मान लिया गया और उसके रिलीज होने पर आपत्ति क्यों लगाई। पता लगा है कि इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फिल्म निर्माताओं जाता हूं भारत सरकार और फिल्म सेंसर बोर्ड को नोटिस जारी किया है कि इस टाइटल के साथ फिल्म कैसे पास की गई जबकि वास्तविकता यह है कि पंडित शब्द किसी भी रूप में ब्राह्मण का पर्यायवाची नहीं है।

नाम के आगे पंडित शब्द का इस्तेमाल करने पर प्रसिद्ध राष्ट्रवादी विचारक व विद्वान डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी ने एक आपत्ति उठाई थी की डॉ. आंबेडकर जो जिनके पास 32 डिग्रियां थी कई भाषाओं का ज्ञान था वह कानून की अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री और संविधान निर्माता के रूप में विभिन्न विषय पर पकड़ थी पर उनके आगे पंडित शब्द का इस्तेमाल करने के बजाय उन्होंने उन्हें बाबा साहब बना दिया गया और जवाहर लाल नेहरू नेहरू जो किसी भी दृष्टिकोण से विद्वान नहीं थे उनके नाम के आगे पंडित लगा दिया गया। इसी तरह देश को स्कैवेंजर फ्री बनाने वाले पद्म विभूषण से सम्मानित डॉक्टर बिंदेश्वर पाठक ने भी कहा था कि हम डॉक्टर अंबेडकर को बाबा साहब आंबेडकर के बजाय पंडित आंबेडकर क्यों नहीं कह सकते और संभावित इन लोगो की यह बात मान ली गई होती तो आज हिंदू समाज में सवर्णों और दलितों के बीच जो शीत युद्ध चल रहा है वह नहीं हुआ होता और संभवत बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने धर्मांतरण नहीं किया होता इसलिए हमें यह मानना पड़ेगा की पंडित शब्द शब्द किसी जारी के लिए नहीं बल्कि विद्वता का सूचक है और यह विद्वानों के साथ ही लगाए जाना चाहिए।

कैसी विडम्बना है कि दुनियां की सबसे प्राचीन संस्कृतियों में से एक जिसने अपने देश में आने वाले विभिन्न संस्कृतियों को मानने वाले लोगों को अपने में समाहित कर लिया है और इस संस्कृति में प्राचीन काल से विभिन्न जातियों को लेकर अनेक कहावतें कही जाती रही हैं और कभी भी किसी जाति के लोगों ने बुरा नहीं माना, पर आज हमारी सोच इतनी संकीर्ण हो गई है कि एक फिल्म के टाइटिल पर ही इतना बड़ा बखेड़ा खड़ा कर दिया गया है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

लोकसभा अध्यक्ष कह रहे हैं प्रधानमंत्री को घेरने वाले थे

 

राहुल गांधी में बदलाव की संभावना नहीं

अवधेश कुमार 

शीर्ष स्तर की राजनीति में इस स्तर का टकराव ,जिसमें बीच कोई रास्ता नहीं, हर दृष्टि से चिंताजनक है। लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री नहीं बोल पायें यह सामान्य स्थिति नहीं थी। इसमें भी जिन कारणों से वे नहीं बोल पाये वह डर पैदा करने वाला है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला आसन से कह रहे थे कि उन्होंने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया कि सदन में न आयें क्योंकि कुछ भी अप्रत्याशित हो सकता है। इसके पहले लोकसभा या राज्यसभा में यह स्थिति कभी देखी नहीं गई। शायद इसकी कल्पना भी नहीं रही होगी। विपक्ष द्वारा प्रधानमंत्री के भाषण में बाधा डालना, बहिर्गमन करना, यहां तक कि बेल में आकर हंगामा करना , संसद की कार्यवाही बाधित करना आदि दृश्य हम सबने देखा है। कांग्रेस के 7-  8 महिला सांसदों का प्रधानमंत्री की सीट तक पहुंच कर घेरा जैसी स्थिति बनाना बिल्कुल असामान्य स्थिति थी। हम केवल कल्पना कर सकते हैं कि प्रधानमंत्री के आने पर वहां क्या दृश्य उत्पन्न होता! कांग्रेस ने घोषणा किया था कि अगर विपक्ष के नेता राहुल गांधी नहीं बोल पायें तो प्रधानमंत्री को भी नहीं बोलते देंगे। तो क्या महिला सांसद उनके आसन तक जबरन रोकने गये थे? संसद के नेता को रोका जाएगा तो स्वाभाविक है पार्टी और गठबंधन के सांसद वहांप्रतिरोध करने आएंगे। उसमें संसद का दृश्य क्या होता इसकी कल्पना से भय पैदा होता है! प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में अवश्य भाषण दिया लेकिन लोकसभा में कांग्रेस अपने रवैये पर कायम है।

संसद में अनेक अवसर आए हैं। बोफोर्स भ्रष्टाचार के आरोप में 24 जून, 1989 को लोकसभा में विपक्ष के 110 में से 106 सांसदों ने त्यागपत्र दे दिया था। लंबे समय तक इसके विरुद्ध संसद के दोनों सदनों में विरोध हुआ। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के इस्तीफे की मांग को लेकर देश भर में अभियान चल रहे थे किंतु हमारे माननीय सांसद इतने विवेकशील थे कि कभी सदन में सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया। महिला आरक्षण विधेयक के तीखे विरोध में विधेयक की कॉपी छीनकर अवश्य फाड़ी गई लेकिन इससे आगे लोकसभा अध्यक्ष या आसन को अपमानित करने या चिढ़ाने की स्थिति कभी नहीं थी।  यूपीए सरकार के कार्यकाल में कॉमनवेल्थ,  2जी  सभी मामलों पर हंगामा हुआ, कार्यवाही बाधित हुई , लेकिन सांसद प्रधानमंत्री की सीट को उनके आने के पहले से घेर लें या महिला सांसदों का इसके लिए उपयोग किया जाए यह अवस्था कभी नहीं आई। जब 2014 में संसद के दोनों सदनों में आंध्रप्रदेश के विभाजन और तेलंगाना राज्य के निर्माण का विधेयक पारित करना था तो भी समस्या आई थी। 14 फरवरी को लोकसभा में विधेयक पारित होने के दिन गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे के बोलते समय ऐसी स्थिति पैदा हुई कि लोकसभा टीवी का प्रसारण रोकना पड़ा। हाथापाई और गाली गलौज की नौबत तक स्थिति पहुंची थी। 20 फरवरी 2014 को राज्यसभा में विधेयक पारित करने के लिए सारे दरवाजे बंद कर मार्शल को बुलाना पड़ा था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बोलते समय विधायक छीनो विधायक फाड़ो  जोर-जोर से चिल्ला रहे थे और  तृणमूल सांसद सुखेन्दु राय ने प्रधानमंत्री के बोलते समय कागजात फाड़ दिए। उसके बाद फिर सभापति को कठोर निर्णय लेना पड़ा। संसद के अंदर कई सांसद हेलमेट पहन कर आने लगे थे। कई सांसद ने आरोप लगाया कि उनके साथी गाली दे रहे हैं और धमका रहे। एक सांसद ने मिर्च का स्प्रे भी छोड़ा लेकिन सदन के बाहर। किसी स्थिति में प्रधानमंत्री की सीट को पहले से घेर लिया जाए ऐसी घटना नहीं हुई।

  देखा जाए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद 2016-17 से स्थिति ज्यादा बिगड़ी है। लोकसभा और राज्यसभा दोनों में अध्यक्ष और सभापति के आसन की ओर कागज फेंकना, आगे टेबल पर खड़ा होकर मिमिक्री करना आदि संसदीय परंपरा के विपरीत व्यवहार सतत रूप में  देखा गया है।  वर्तमान लोकसभा में पहले दिन से विपक्ष के नेता राहुल गांधी का तय होता है कि यही बोलना है, सदन में क्या विषय  है इससे उनका मतलब नहीं रहता। राष्ट्रपति अभिभाषण पर कई विषयों में सरकार की आलोचना हो सकती है, घेरा जा सकता है । लेकिन उनका विषय पूर्व थल सेना अध्यक्ष मनोज नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक थी जिसके बारे में अध्यक्ष ने एक नियमन दे दिया। पिछले कुछ वर्षों में संसद सत्र के आरंभ होने के पूर्व विदेश से कोई रिपोर्ट आ जाती है और हंगामा हो जाता है। पीगैसस, हिंडेनबर्ग रिपोर्ट से लेकर गुजरात दंगे पर बीबीसी डॉक्युमेंट्री आदि की एक लंबी कड़ी है। अंततः इसके परिणाम शून्य आते हैं। ज्यादातर मामले उच्चतम न्यायालय में गए और विपक्ष को कोई लाभ नहीं हुआ। इस बार विदेश में बैठे एक व्यक्ति की एक पत्रिका में प्रकाशित आलेख को राहुल गांधी ने आधार बनाया। हालांकि उसे लेख में ऐसा नहीं है कि जिससे लगे कि नरेंद्र मोदी सरकार ने 2020 में गलवान घटना के बाद चीन के विरुद्ध कार्रवाई में सेना के हाथ बांध दिए थे। इसलिए कुछ लोगों की टिप्पणी है कि उन्हें बोलने दिया जाता तो कोई अंतर नहीं आता। यह विषय विस्तार से चर्चा की है जो यहां संभव नहीं। इतना ध्यान रखना चाहिए कि चीन के साथ 1962 के बाद केवल 1967 में सीमा पर गोली चली उसके बाद कभी नहीं। गलवान संघर्ष में भी गोली नहीं चली थी। पूरा  गुत्थम-गुत्था लाठी, डंडे , पत्थर, रड , कंटीले ताड़ आदि से हुआ था। 

मुख्य बात यह है कि संसद में हमारा आचरण कैसा हो?  संसद के बाहर भी हम धरना-प्रदर्शन देते,मार्च करते हैं तो पुलिस प्रशासन की निश्चित जगह तक अनुभूति होती है। वहां तक जाने के बाद हम रुक जाते हैं या निर्धारित धरना स्थल पर धरना देते हैं। उसका उल्लंघन करते हैं तो पुलिस हमें हिरासत में लेती है या  गिरफ्तार करती है। यानी सड़क पर विरोध के भी नियम हैं। संसद को सड़क के आंदोलन से भी बुरी अवस्था में पहुंचा दिया जाए जहां अध्यक्ष के नियमन का कोई मूल्य न रहे इससे ज्यादा भयावह स्थिति कुछ नहीं हो सकती। यह भी नहीं कह सकते कि सब कुछ अनायास हो रहा है। राहुल गांधी इस समय लोकसभा में देश के सबसे बड़े नेता हैं। सबसे ज्यादा सांसद उनके हैं। तीन राज्यों में उनकी अपनी सरकार है तथा तमिलनाडु की सत्ता में उनकी भागीदारी है। इस तरह राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के बाद किसी भी पार्टी से उनकी हैसियत बड़ी है। ऐसा नेता बगैर सोचे - समझे और रणनीति के इस तरह का व्यवहार नहीं कर सकता। 

पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा सत्ता में आई तो संविधान समाप्त कर देगी, आरक्षण हटा देगी जैसे दुष्प्रचार का कुछ हद तक राजनीतिक लाभ कांग्रेस एवं विपक्ष को मिला। क्या यह रणनीति है कि कुछ दूसरे मुद्दे उठाकर उसको और आगे ले जाया जाए? नेपाल और बांग्लादेश में जेन जी के नाम से हिंसक और उग्र आंदोलन से उथल-पुथल का दृश्य हमारे सामने है। राहुल गांधी देश के संविधान व लोकतंत्र को बचाने के लिए जेन जी से हम आपके साथ हैं की घोषणा से कि पहले ही अपील कर चुके हैं। संसद के दोनों सदनों के आसनों को भी वे और उनकी पार्टी पक्षपाती करार दे रही है। कभी बोलते समय मेरा माइक बंद कर दिया जाता है , मुझे बोलते नहीं दिया जाता है जैसी अकल्पनीय स्थिति उनके सामान्य वक्तव्य हो चुके हैं। उच्चतम न्यायालय के कुछ फैसलों और टिप्पणियों के विरुद्ध सार्वजनिक वक्तव्य भी हम देख रहे हैं। चुनाव आयोग को भाजपा का एजेंट बताया ही जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की मुख्य यूएसपी रक्षा और सुरक्षा है। तो क्या इसी मुद्दे पर उसे कमजोर और झूठा साबित करने की रणनीति है? ये सारी संभावनाएं इसलिए सशक्त लगतीं हैं क्योंकि बयानों और व्यवहारों का पैटर्न इसके अनुरूप दिखाई देता है। इस लोकसभा की शुरुआत के दिन से राष्ट्रपति अभिभाषण से संबंधित मुद्दों पर उन्होंने कभी नहीं बोला। उनका अपना विषय होता है और अध्यक्ष के रोकने पर उनकी प्रतिक्रिया ऐसी होती है कि हमें बोलते नहीं दिया जाता।

स्पष्ट है कि इसमें बदलाव की तत्काल संभावना नहीं। इस प्रश्न का किसी के पास उत्तर नहीं किया कहां जाकर समाप्त होगा। इसका हल ढूंढना ही होगा। राजनीति इस अवस्था में कतई नहीं जानी चाहिए जहां वापस लौटने की स्थिति न रहे।

बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

वित्तीय संकट से समृद्धि तक: यूपी की अर्थव्यवस्था का कायाकल्प और 1 ट्रिलियन डॉलर का रोडमैप (2020-2027)

डॉ. प्रदीप कुमार केशरी

जब 2017 में उत्तर प्रदेश में नई सरकार का गठन हुआ था, तब राज्य की पहचान ‘बीमारू’ राज्यों में होती थी। लेकिन आज, जब हम 2026-27 के बजट का विश्लेषण करते हैं, तो तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। 2029 तक 1 ट्रिलियन डॉलर (लगभग 80 लाख करोड़ रुपये) की अर्थव्यवस्था बनने के अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए, पिछले छह वर्षों में उत्तर प्रदेश की वित्तीय स्थिति में एक संरचनात्मक बदलाव (Structural Shift) देखने को मिला है।

2020 की महामारी से लेकर 2026-27 के 9.12 लाख करोड़ के ऐतिहासिक बजट तक, राज्य का वित्तीय रोडमैप अब केवल प्रशासन चलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रणनीतिक संपत्ति निर्माण (Strategic Asset Creation) की ओर बढ़ गया है। प्रस्तुत है उत्तर प्रदेश की वित्तीय यात्रा (2020-2027) का एक विस्तृत विश्लेषण।

1.   बजट बनाम हकीकत: बड़े वादे और खर्च की चुनौतियां - यूपी के वित्तीय इतिहास में एक लगातार चलने वाला ट्रेंड रहा है—‘महत्वाकांक्षी बजट’ बनाम ‘रूढ़िवादी खर्च’। हालांकि बजट का आकार हर साल 12% से अधिक की दर से बढ़ा है, लेकिन राज्य ऐतिहासिक रूप से आवंटित धन को वित्तीय वर्ष के भीतर पूरा खर्च करने में संघर्ष करता रहा है। आंकड़ों की गहराई में जाने पर यह स्पष्ट होता है:

  • 2020-21 (महामारी का वर्ष): कोविड-19 के झटके के कारण राज्य का राजस्व बुरी तरह प्रभावित हुआ। इस वर्ष वास्तविक खर्च बजट अनुमान से 28.2% कम रहा। सरकार ने पूंजीगत परियोजनाओं को रोककर सारा ध्यान स्वास्थ्य सेवाओं और मुफ्त राशन पर केंद्रित किया।
  • 2021-2024 (संरचनात्मक कमी): महामारी के बाद के वर्षों में भी, ‘अंडर-स्पेंडिंग’ (Underspending) की समस्या बनी रही। सीएजी (CAG) की रिपोर्ट बताती है कि 2021-22 और 2023-24 में भी सरकार ने बजट से लगभग 20% कम खर्च किया। इसका मुख्य कारण एक्सप्रेस-वे और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए भूमि अधिग्रहण में देरी और विभागों द्वारा समय पर फंड रिलीज न कर पाना था। हर साल लगभग 1 लाख करोड़ का फंड बिना खर्च हुए रह जाता था।

बदलाव के संकेत: हालांकि, 2024-25 के संशोधित अनुमान बताते हैं कि स्थिति अब बदल रही है। ‘कोषवानी’ (Koshvani) पोर्टल और सख्त निगरानी के चलते खर्च और बजट का अंतर घटकर लगभग 8% रह गया है। यह दर्शाता है कि प्रशासन अब पैसे की ‘रफ्तार’ (Velocity of Money) को समझ रहा है—यानी स्वीकृत पैसा समय पर खर्च हो रहा है।

2.  कमाई का गणित: ‘डबल इंजन’ का वित्तीय लाभ - अक्सर सवाल उठता है कि 9.12 लाख करोड़ के भारी-भरकम बजट को फंड करने के लिए पैसा कहां से आता है? यूपी का राजस्व मॉडल केंद्रीय मदद और राज्य के अपने टैक्स कलेक्शन (Tax Buoyancy) के मजबूत मिश्रण पर आधारित है।

राज्य का अपना टैक्स (SOTR): यह किसी भी राज्य की आर्थिक सेहत का सबसे सटीक पैमाना है। 2022 के बाद से यूपी के अपने टैक्स कलेक्शन में दोहरे अंकों (Double-digit growth) की वृद्धि हुई है:

  • जीएसटी (GST): कर चोरी रोकने के लिए तकनीकी उपायों और ‘बिल लाओ इनाम पाओ’ जैसी योजनाओं ने टैक्स बेस को बढ़ाया है।
  • आबकारी (शराब): नई आबकारी नीति के तहत प्रीमियम वेंड्स और माइक्रो-ब्रूअरीज को बढ़ावा देने से राजस्व में सालाना ~15% की वृद्धि हुई है।
  • स्टैम्प ड्यूटी: अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और आगामी कुंभ मेले की तैयारियों ने राज्य में आध्यात्मिक पर्यटन (Spiritual Tourism) की लहर पैदा की है। इसका सीधा असर रियल एस्टेट पर पड़ा है, जिससे स्टैम्प ड्यूटी का कलेक्शन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा है।

केंद्रीय हिस्सेदारी: देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य होने के नाते, वित्त आयोग की सिफारिशों के तहत यूपी को केंद्रीय करों का सबसे बड़ा हिस्सा (~17.9%) मिलता है। इसके अलावा, ‘जल जीवन मिशन’ और ‘पीएम आवास’ जैसी योजनाओं के लिए केंद्र से भारी अनुदान प्राप्त होता है।

खास बात यह है कि यूपी उन चुनिंदा बड़े राज्यों में से है जो लगातार ‘राजस्व अधिशेष’ (Revenue Surplus) में रहता है। इसका मतलब है कि राज्य अपनी कमाई से अपने दैनिक खर्च (वेतन, पेंशन) आसानी से निकाल लेता है और विकास कार्यों के लिए पैसा बचा लेता है।

3.  खर्च की रणनीति: वेतन का बोझ और विकास की रफ़्तार - खर्च के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि राज्य की कमाई का एक बड़ा हिस्सा ‘फिक्स्ड खर्चों’ (Committed Expenditure) में चला जाता है। राज्य की कुल राजस्व आय का लगभग 57% हिस्सा केवल तीन चीजों में खर्च होता है:

  • वेतन (सरकारी कर्मचारी): लगभग 1.80 लाख करोड़।
  • पेंशन (सरकारी कर्मचारी): लगभग ₹90,000 करोड़।
  • ब्याज भुगतान: लगभग ₹64,000 करोड़।

इन भारी-भरकम खर्चों के बावजूद, सरकार ने 2025-26 और 2026-27 में पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) यानी एसेट बनाने के लिए 1.65 लाख करोड़ से अधिक का लक्ष्य रखा है।

  • इंफ्रास्ट्रक्चर: गंगा एक्सप्रेस-वे (मेरठ से प्रयागराज) और जेवर एयरपोर्ट जैसे प्रोजेक्ट्स ने पिछले कुछ वर्षों में बजट का बड़ा हिस्सा लिया है। 2026-27 के लिए, सरकार ने इन एक्सप्रेस-वे के किनारे औद्योगिक गलियारे (Industrial Corridors) विकसित करने पर जोर दिया है।
  • ऊर्जा क्षेत्र: बिजली विभाग (UPPCL) राज्य के खजाने पर सबसे बड़ा बोझ बना हुआ है। ग्रिड को आधुनिक बनाने और घाटे को कम करने के लिए पुनरुत्थान वितरण क्षेत्र योजना (RDSS) के तहत 15,000 करोड़ से अधिक का निवेश किया जा रहा है।

4. जनकल्याण का बदलता चेहरा: ‘राशन’ से ‘एसेट’ और ‘मोबिलिटी’ तक

यूपी की राजनीति और अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा बदलाव कल्याणकारी योजनाओं के स्वरूप में आया है। 2020-23 तक सरकार का पूरा जोर ‘संकट प्रबंधन’ (मुफ्त राशन) पर था। लेकिन 2026-27 का बजट अब ‘जीवन स्तर सुधारने’ (Lifestyle Upgradation) पर केंद्रित है। यह मॉडल अब केवल पेट भरने तक सीमित नहीं है, बल्कि जनता के हाथ में मकान, बिजली और स्कूटी जैसे एसेट (Asset) दे रहा है।

(क) आवास (PMAY): 86 लाख घरों का सफर - योगी सरकार की सफलता का एक बड़ा स्तंभ प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) रही है। 2017 से 2025 के बीच यूपी ने 86 लाख से अधिक घर (ग्रामीण + शहरी) बनाए हैं, जो देश में सर्वाधिक है।

  • नया कदम: ग्रामीण क्षेत्रों में लक्ष्य लगभग पूरा करने के बाद, 2026-27 के बजट में सरकार का फोकस शहरी नवीनीकरण पर है। दशकों बाद, आगरा, लखनऊ और मेरठ विकास प्राधिकरणों को नई आवास योजनाएं शुरू करने का आदेश दिया गया है, जिसके लिए 12,000 करोड़ से अधिक का प्रावधान किया गया है। इससे न केवल लोगों को घर मिलेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर सीमेंट, ईंट और मजदूरी की मांग भी बढ़ेगी।

(ख) अन्नदाता किसान: कर्ज माफी से आगे की सोच - सरकार ने 2017 की तरह ‘एकमुश्त कर्ज माफी’ (Blanket Loan Waiver) के आर्थिक रूप से बोझिल मॉडल को त्याग दिया है। इसके बजाय अब ‘इनपुट सहायता’ पर जोर है:

  • मुफ्त बिजली: अप्रैल 2023 से शुरू हुई निजी नलकूपों (ट्यूबवेल) के लिए 100% बिजली बिल माफी 2026-27 में भी जारी रहेगी। इससे लगभग 16 लाख किसानों को सीधा फायदा होगा और सिंचाई का खर्च बचेगा। इसका सालाना लगभग 2,400 करोड़ का भार राज्य सरकार उठाएगी।
  • क्रेडिट: कर्ज माफी के बदले अब ‘ई-किसान क्रेडिट कार्ड’ पर जोर है, जिससे किसानों को साहूकारों के बजाय बैंक से 5 मिनट में लोन मिल सके। सरकार ने 3 लाख करोड़ के संस्थागत ऋण वितरण का लक्ष्य रखा है।

(ग) युवा और महिलाएं: एस्पिरेशनल वोटर -2026-27 का बजट युवाओं और महिलाओं को लुभाने के लिए एसेट-आधारित योजनाओं पर केंद्रित है:

·         स्कूटी योजना: छात्राओं और कामकाजी महिलाओं की ‘लास्ट माइल मोबिलिटी’ की समस्या को हल करने के लिए 400 करोड़ आवंटित किए गए हैं। यह योजना मेधावी छात्राओं को कॉलेज जाने और काम करने में सक्षम बनाएगी।

·         डिजिटल सशक्तिकरण: स्वामी विवेकानंद युवा सशक्तिकरण योजना (स्मार्टफोन/टैबलेट) के लिए 2,374 करोड़ आवंटित किए गए हैं। इसका लक्ष्य 50 लाख डिवाइस बांटना है। ये टैबलेट केवल मुफ्त उपहार नहीं हैं, बल्कि इनमें ‘डिजीशक्ति’ (DigiShakti) पोर्टल का स्टडी मटीरियल पहले से लोड होता है, जो ग्रामीण युवाओं के लिए डिजिटल क्लासरूम का काम करता है।

·         सामूहिक विवाह: मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना का बजट बढ़ाकर 750 करोड़ कर दिया गया है। अब प्रति जोड़ा अनुदान राशि बढ़ाकर 1.01 लाख कर दी गई है, जो गरीब परिवारों के लिए बड़ी राहत है।

(घ) सामाजिक सुरक्षा का जाल - महंगाई से निपटने के लिए, सरकार ने पेंशन योजनाओं को मजबूत किया है। वृद्धावस्था और किसान पेंशन के लिए 8,950 करोड़ का भारी-भरकम बजट रखा गया है। इससे प्रदेश के 67.5 लाख से अधिक बुजुर्गों को हर महीने 1,000 की पेंशन बिना किसी देरी के मिलती रहेगी। यह एक ऐसा सुरक्षा कवच है जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी का प्रवाह बनाए रखता है।

4.  वित्तीय अनुशासन: क्या यूपी चादर से बाहर पैर पसार रहा है? - विपक्ष अक्सर सरकार पर कर्ज लेकर घी पीने का आरोप लगाता है, लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं।

  • राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit): राज्य ने अपने घाटे को एफआरबीएम (FRBM) एक्ट की सीमा के भीतर रखा है। 2023-24 में यह 3.2% था और 2026-27 के लिए 3.0% का लक्ष्य रखा गया है। यह अनुशासन निवेशकों को भरोसा दिलाता है।
  • कर्ज का बोझ: जीडीपी के अनुपात में कर्ज (Debt-to-GSDP ratio) 2016-17 के खतरनाक ~36% से घटकर 2024-25 में ~28% पर आ गया है। इसका मतलब है कि यूपी की अर्थव्यवस्था उसके कर्ज लेने की रफ्तार से ज्यादा तेजी से बढ़ रही है।
  • उधारी की रणनीति: सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यूपी मुख्य रूप से पूंजीगत व्यय (सड़क, मेट्रो, पावर प्लांट) के लिए कर्ज ले रहा है, न कि वेतन बांटने के लिए। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे अच्छा कर्ज (Good Debt) माना जाता है क्योंकि ये एसेट भविष्य में कमाई करके देंगे।

निष्कर्ष: 2027 और उसके आगे - 2020 से 2027 तक का यह विश्लेषण बताता है कि उत्तर प्रदेश ने अपनी बैलेंस शीट को संरचनात्मक रूप से ठीक कर लिया है। राज्य ने ‘बीमारू’ का टैग हटाकर एक निवेश-अनुकूल डेस्टिनेशन की छवि बनाई है। 9.12 लाख करोड़ का 2026-27 का बजट एक स्पष्ट संदेश है—यूपी अब विस्तार के दौर (Expansion Phase) में है। राजकोषीय अनुशासन के साथ लोकलुभावन एसेट क्रिएशन (स्कूटी, आवास, बिजली) को जोड़कर, सरकार विकास का एक नया चक्र बनाने का प्रयास कर रही है। हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती अब भी ‘कार्यान्वयन’ (Execution) की है। पैसा आवंटित करना आसान है, लेकिन उसे समय पर और सही जगह खर्च करना ही असली परीक्षा होगी। यदि योगी सरकार इस बजट को धरातल पर उतारने में सफल रही, तो 1 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य अब दूर की कौड़ी नहीं लगता।

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

संसद में परिचर्चा का गिरता स्तर चिन्ता का विषय

बसंत कुमार

इस समय संसद का बजट सत्र चल रहा है और लोकसभा में राष्ट्रपति के अभी भाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा चल रही है परंतु यह चर्चा सरकार के आर्थिक नीतियों और और आर्थिक क्षेत्र में प्रदर्शन और भविष्य में बनाए जाने वाली योजनाओं पर विचार करने के बजाय कुछ ऐसे मुद्दों पर बस चल रही है कि अब क्या अब हमें यह कहने में संकोच होता है कि भारत दुनिया की सबसे बड़ी संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था वाला देश है। यह वहीं भारतीय संसद है है जहां जहां 1950 के दशक में एक नई सांसद अटल बिहारी वाजपेई द्वारा प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की आलोचना पर प्रधानमंत्री जी विचलित नहीं हुए बल्कि उस युवा सांसद के पास जाकर उसके भाषण की तारीफ की और यह कह दिया कि तुम एक दिन इस देश के प्रधानमंत्री बनोगे और वही युवा सांसद अटल बिहारी वाजपेई जब देश का विदेश मंत्री बना तो उसने देखा कि उनके कार्यालय जो साउथ ब्लॉक में स्थित था से नेहरू जी की फोटो गायब थी जिस पर उन्होंने आपत्ति और पंडित नेहरू की फोटो वहां पर फिर लगा दी गई। यह वही भारत है जब 1991 में नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने तो उन्हें संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का रक्षा भारत का पक्ष रखने के लिए अपनी पार्टी से कोई नहीं मिला तो उन्होंने नेता विपक्ष अटल बिहारी वाजपेई को जिनेवा में भारत का पक्ष रखने के लिए भेजा। पर आज लोकसभा और राज्यसभा में बहस का स्तर इतना गिर गया है की समझ में नहीं आ रहा कि हमारी संसदीय प्रणाली कहां जा रही है।

लोकसभा में नेता प्रत्यक्ष राहुल गांधी ने दिनांक 4 फरवरी को संसद में जाते हुए पूर्व आर्मी चीफ जनरल एम एम नरवणे की पुस्तक "फोर स्टार्स ऑफ डेस्टीनी"पर बोलने के मांग कर रहे थे। लोकसभा में कांग्रेस सांसद एक बैनर लेकर पहुंचे थे जिसमें लिखा था जो उचित समझे वो करो इसमें एक तरफ प्रधानमंत्रीएवं रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की तस्वीर और दूसरी तरफ पूर्व आर्मी चीफ जनरल नरवडे की तस्वीर छपी थी। गौर तलब है कि इस पुस्तक में लिखी बातों को लेकर कांग्रेस सहित विपक्ष सोमवार से सदन में विरोध कर रहा था और इन बातों को ध्यान रखते हुए लोग साथ सदस्य नियम और भीम का हवाला देखकर नेता विपक्ष कोइस विषय पर बोलने से रोक रहे थे। जनरल नरवडे की पुस्तक दिखाते हुए राहुल गांधी ने उसके एक अंश का हवाला दिया और कहा कि जब चीन के टैंक भारत की सीमा की तरफ बढ़ रहे थे उस वक्त नरेंद्र मोदी ने अपने उत्तरदायित्व का पालन नहीं किया क्योंकि यह किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है तो लोकसभा अध्यक्ष ने यह पूछ लिया यह किताब कहां से आई है, कहने का अप्राध्याय है कि जो किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है उसको लेकर विपक्षद्वारा सदन में हंगामा खड़ा करना उचित नहीं है। विशेष कर जब यह देश की रक्षा से जुड़ा हुआ मामला हो।

उसी दिन लोकसभा में धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान उसे समय हंगामा हो गया जब भाजपा के सांसद निशिकांत दुबे अपने साथ कई किताबें लेकर सदन में आए और उन्हें कोर्ट करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी पर अभद्रटिपानिया की। निशिकांत दुबे ने प्रधानमंत्री नेहरू के निजी सचिव रहे एम सी मथाई कीऑटोबायोग्राफी का हवाला देते हुए बताया कि किताब में लिखा गया है की पंडित नेहरू एक अय्याश आदमी थे और और पुस्तक में एम सी मथाई ने यह लिखा है कि मेरे और इंदिरा गांधी के निजी संबंध थे इस तरह की अभद्र बातें देश के उन प्रधानमंत्री के लिए गए के बारे में कही गई जिन्होंने भारत के विकास में पूर्ण योगदान दिया और भी इस दुनिया में नहीं है वैसे भी हिंदू संस्कृति का कि यह परंपरा रही है की जो व्यक्ति इस दुनिया में नहीं है उसके बारे में कभी भी गलत नहीं बोला जाता लेकिन यहां तो सर दुबे ने सारी हदें पार कर दी। कांग्रेस की महासचिव श्रीमती प्रियंका गांधी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि जब सरकार सदन को बाधित करना चाहती है तो नीचे काम दुबे को इस तरह के अनारकल बातें खाने के लिए खड़ा कर देती है।

दिल्ली में वर्ष 1911 मैं मैं संसद भवन का निर्माण हुआ और तब से वर्ष 2023 तक इस सदन में नेताओं द्वारा सुचारू रूप से सहभागिता पूर्ण गरिमा में कार्रवाई हुई और नेताओं की शालीनता और एक दूसरे के प्रति सम्मान पुरानी संसद की गवाह के रूप में याद किए जाएंगे। पर जब से संसद की कार्रवाई पुराने संसद भवन से नई संसद भवन में आ गई है तब से यह पुरानी मर्यादाएं सपने की तरह विलुप्त हो गई है। पिछली लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी के सांसद रमेश बिधूड़ी ने बहुजन समाज पार्टी की संसद दानिश अली के लिए जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया उसे सारा देश स्तब्ध रह गया। उन्होंने दानिश और मुसलमान के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया उन्हें यहां पर लिखा भी नहीं जा सकता। इस घटनाक्रम से यह चीज याद दिला दी की हम चाहे कितना भी आलीशान संसद भवन बना ले पर यहां पर संसद की परिचर्चा का स्तर पुरानी वाली संसद में हुए स्तर से बहुत नीचे आ गया है। दुनिया की सबसे बड़े लोकतंत्र में राजनीतिक विमर्श का स्टार लगातार गिरता जा रहा है। अप शब्द, नस्लवादी टिप्पणियां और निजी आक्षेप अब आम बात हो गई है। पहले पुरानी ससद वाकई में सभ्य वार्तालाप का मंच हुआ करती थी। उसे समय जिन बातों को अब बदनुमा अपवाद समझा जाता था आजकल संसद में बहस के दौरान वह आम बात हो गई है।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में राजनीतिक विमर्श का स्तर लगातार गिरता जा रहा है जिस प्रकार नए कपड़े पहनने से किसी व्यक्ति के आचरण को नहीं बदला जा सकता, उसी तरह से नया संसद भवन इस प्रकार के असभ्य लोगों का अड्डा बनता जा रहा है। रमेश बिधूड़ी इस तरहकी भाषा इस्तेमाल करने वाले इकलौते इकलौती व्यक्ति नहीं है। जब राहुल गांधी संसद में जातिगत जनगणना पर बोल रहे थे तो पूर्व मंत्री अनुराग ठाकुर बार-बार राहुल गांधी की जाति पूछ रहे थे शायद अनुराग ठाकुर का इशारा गांधी परिवार की नेहरू से गांधी सर नेम लगाने पर सवाल खड़ा कर रहे थे।

शायद वह भूल गए थे कि उनके पिता हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में धूमल सरनेम का इस्तेमाल करते थे वहीं अनुराग ठाकुर ने अपना सरनेम ठाकुर लिख दिया जहां तक पता है कि उनके भाई जो बीसीसीआई में एक अधिकारी हैं वह कोई तीसरा ही सरनेम इस्तेमाल कर रहे हैं। जबकि पुरानी संसद में या उससे पहले कभी किसी की जाति के बारे में सार्वजनिक तौर पर कभी नहीं पूछा जाता क्योंकि जाति एक व्यक्तिगत मामला है और वह व्यक्तिगत ही रहनी चाहिए। गौरतलब है कि बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बाल काटने वाले नाई का सरनेम ठाकुर बुलाया जाता है इसलिए किसी के सरनेम पर कभी भी कोई आपत्ति नहीं की जानी चाहिए और संसद में तो बिल्कुल नहीं। यह वही अनुराग ठाकुर हैं जिन्होंने दिल्ली में एक सभा में अल्पसंख्यक लोगों के लिए यह नारा दिया था कि देश के इन गद्दारों को गोली मारो........को। पर दुख इस बात पर होता है कि उनके इस सांप्रदायिक नारे पर उनके खिलाफ पार्टी नेतृत्व द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई। अगर अनुराग ठाकुर के खिलाफ उस समय उचित कार्रवाई की गई होती तो फिर संसद में रमेश बिधूड़ी वाला विवाद कभी भी नहीं होता।

वर्ष 1984 में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या के बाद राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने और इंदिरा गांधी की हत्या का सहानुभूति के रूप में लाभ उठाने के लिए कुछ माह के अंदर लोकसभा चुनाव की घोषणा कर दी और परिणाम यह किया हुआ कि उन्हें दो तिहाई सीटों से अधिक लगभग 410 सीटें लोकसभा प्राप्त में हुई। उनके मंत्रिमंडल में बिहार के सवर्ण नेता प्रोफेसर के.के. तिवारी भी शामिल हुए। श्री तिवारी ने संसद में उस समय के वरिष्ठ और मशहूर दलित नेता रामधन को किसी बात पर चमार का बेटा कह दिया। यद्यपि इस बात पर रामधन ने कुछ नहीं कहा पर पूरे सदन में इस बात को लेकर श्री के.के. तिवारी का इतना तगड़ा विरोध हुआ थी कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी को मजबूर होकर उन्हें मंत्रिमंडल से हटना पड़ा। उसके बाद श्री के.के. तिवारी फिर कभी ना तो मंत्री बन पाए और ना ही सांसद बन पाए। कहने का अभिप्राय यह है कि जब सदन में पहले इस तरह की घटनाएं होती थी तो ऐसे लोगों पर कार्रवाई की जाती थी पर अब पार्टी नेतृत्व ऐसे उद्दंड नेताओं पर कार्यवाही तो दूर उन्हें कुछ कहती ही नहीं। इस तरह की घटनाएं कभी-कभी पुराने संसद भवन में भी होती थी पर नए संसद भवन और पुराने संसद भवन का अंतर यह रह गया है कि पुराने संसद भवन में इस तरह की घटनाओं पर लोगों के विरुद्ध कार्रवाई होती थी और सांसद सदन में कुछ बोलते हुए बहुत सोच समझकर शब्दों का इस्तेमाल करते थे, पर नए संसद भवन में ऐसे सांसदों की जुबान पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया है क्योंकि अब उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं होती।

कैसी विडम्बना है कि दुनिया की सबसे बड़ी संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश भारत की संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर सरकार की उपलब्धियां और असफलताओं पर विचार करने के बजाय कुछ लेखको की पुस्तकों के आधार पर देश के वर्तमान प्रधानमंत्री और देश के दो सफलतम पूर्व प्रधानमंत्रियों ऊपर अनर्गल आरोप लगाए जा रहे हैं और उनका चरित्र हनन किया जा रहा है। इसमें पक्ष विपक्ष दोनों के ही नेता शामिल है यह हमारे देश के लोकतंत्र के लिए बहुत ही अपमानजनक है इसमें बजट सेशन के अवसर पर बजट पर कोई भी नेता नहीं बोल रहा है बस एक दूसरे के शीर्ष नेताओं पर कीचड़ उछाला जा रहे हैंऔर उनका चरित्र हनन किया जा रहा है, इन नेताओं को पंडित जवाहरलाल नेहरू और अटल बिहारी वाजपेई जैसे नेताओं से सबक लेने की आवश्यकता है जो एक दूसरे की आलोचना भी करते थे लेकिन एक दूसरे का उतना ही सम्मान करते थे।

सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि बृहस्पतिवार को प्रधानमंत्री लोकसभा में धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलने के लिए सिर्फ इसलिए नहीं आए कि विपक्ष उनके साथ कुछ ऐसा कर सकता था जो लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ है शायद यह हमारे लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार मौका पहला अवसर रहा है कि राष्ट्रपति अभी भाषण के धन्यवाद प्रस्ताव को बिना प्रधानमंत्री की उद्बोधन के पारित कर दिया गया हो।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

चुनौतियों का जवाब देने वाला बजट

अवधेश कुमार

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक महिला के रूप में और लगातार नौ बजट पेश करके रिकॉर्ड बनाया है। हमारे आपके  लिए महत्वपूर्ण यह है कि उनके द्वारा प्रस्तुत बजट भारत के सभी समूहों की आकांक्षाओं, आंतरिक और बाह्य चुनौतियों व आवश्यकताओं , राजनीतिक मांग एवं नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा देश के घोषित आर्थिक विकास लक्ष्यों की कसौटी पर खरा है या नहीं? पिछले कुछ समय से उत्पन्न वैश्विक उथल-पुथल में भारत को अपनी विकास गति बनाए रखने के साथ नए वैश्विक साझेदारी ,निर्यात बाजार आदि विकसित करने तथा घरेलू उत्पादकों को नीतियों और प्रोत्साहन से समर्थन देने तथा सबके साथ समाज के निचले तबके से लेकर हर समूह की चाहत के बीच सामंजस्य बिठाने की चुनौती है। आर्थिक सर्वेक्षण में साफ कहा गया था कि वैश्विक उथल-पुथल जल्दी समाप्त नहीं होने वाला इसलिए भारत को मैराथन एवं स्प्रिंट दोनों दौड़ लगाने की आवश्यकता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आज 53.47 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का बजट पेश कर यह संदेश दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार इन चुनौतियों और संकटों को अवसर में बदलने की दृष्टि से काम कर रही है। कोई  लोक लुभावन घोषणा नहीं पूरा फोकस इस बात पर कि इस उथल-पुथल और अनिश्चितताओं के दौर में देश की अर्थव्यवस्था सुरक्षित, मजबूत और स्थिर होने के साथ विस्तारित भी हो, विश्व व्यापार के अनुरूप पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण उत्पादन हो, किशोर और युवा वर्ग को भारत राष्ट्र के लक्ष्य और रोजगार दिलाने के अनुरुप शिक्षा,  रोजगार के अवसर के साथ समाज के सभी समूह के लोगों का जीवन सुरक्षित हो सहज हो तथा आवश्यक सेवाएं सहायक उपलब्ध हों …।

वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में तीन कर्त्तव्य के नाम पर लक्ष्य और बजट की सैद्धांतिक आधारभूमि स्पष्ट कर दिया। पहला, उत्‍पादकता और प्रतिस्‍पर्धा बढ़ाने  तथा वैश्विक उथल-पुथल के परिदृश्‍य में लचीलापन लाकर आर्थिक विकास को तेज करना और उसकी गति बनाए रखना। दूसरा, भारत की समृद्धि के पथ में सशक्‍त साझेदार बनाने के लिए लोगों की आकांक्षाएं पूरी करना और उनकी क्षमता बढ़ाना। तथा तीसरा,  सरकार की सबका साथ, सबका विकास के दृष्टिकोण के अनुकूलयह सुनिश्चित करना कि सार्थक भागीदारी के लिए प्रत्‍येक परिवार, समुदाय और क्षेत्र की संसाधनों, सुविधाओं और अवसरों तक पहुंच उपलब्‍ध हो। प्रधानमंत्री ने स्वयं अपने भाषणों में व्यापक सुधारो का संकेत दिया था। वित्त मंत्री ने कहा कि हम 12 साल से आर्थिक विकास की दिशा में काम कर रहे हैं और आर्थिक सुधार की गाड़ी सही रास्ते पर है, 350 से अधिक सुधार किए हैं और अपने कर्तव्यों को पूरा करने के लिए इसकी गति बनाए रखनी पड़ेगी। उन्होंने आर्थिक विकास में तेजी लाने के लिए सात क्षेत्रों में पहल शुरू करने का प्रस्ताव रखा- रणनीतिक और अग्रणी क्षेत्रों में विनिर्माण को तेज करना। दो, विरासत के औद्योगिक क्षेत्रों का कायाकल्प करना। तीन, चैंपियन एमएसएमई का निर्माण करना। चार, आधारभूत संरचना को सशक्त प्रोत्साहन प्रदान करना। पांच, दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और स्थायित्व सुनिश्चित करना। सात, शहरों में आर्थिक क्षेत्र विकसित करना…।  आप देखेंगे कि अपनी सैद्धांतिक आधारों और इन प्रक्रियाओं की दृष्टि से बजट में व्यवहारिक साहसिक और विजनरी घोषणायें हैं।

तमाम उथल-पुथल के बीच नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा अपने राजकोषीय अनुशासन को बनाए रखना महत्वपूर्ण है। घोषित लक्ष्यों के अनुरुप राजकोषीय घाटा 4.4% तक सीमित रखना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है और इसीलिए इस वर्ष के लिए 4.3% का लक्ष्य घोषित किया गया है। कर राजस्व में थोड़ी कमी है लेकिन ऐसी नहीं जिससे योजनाओं की दृष्टि से आवंटन में समस्याएं आयें। पूंजीगत खर्च जो मुख्ता आधारभूत संरचना पर खर्च होता है के लिए 12 लाख 20 करोड़ का आवंटन सरकार की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करता है। यह कुल बजट का लगभग 23% है। यूपीए सरकार में कभी भी पूंजीगत ब्याज 7 – 8% से ज्यादा नहीं गया। यहीं पर सरकार की विचारधारा नीति और दुर्गा में सोच स्पष्ट होता है कि आपका सबसे ज्यादा फोकस किस बात पर है। यानी भारत को हर क्षेत्र में कृषि से लेकर कुटीर उद्योग, ग्रामीण उद्योग, कपड़ा, हस्तकरघा, वाहन, यातायात, सूचना तकनीक…. सभी क्षेत्र की आधारसंरचना इतनी सशक्त और विकास के अनुकूल बना दिया जाए कि आने वाले वर्षों तक इन पर आर्थिक गतिविधियां खिलखिलाती मुस्कुराती तेज गति से बढ़ती रहे।

कुछ और पहलुओं पर नजर दौड़ायें । विनिर्माण, सेवा और कृषि हमारी अर्थव्यवस्था और विकास के मूलाधार हैं। कुशल और दक्ष युवा वर्ग तैयार करना भारत का बड़ा लक्ष्य है,क्योंकि जब हम यूरोपीय संघ और अन्य देशों से मोबिलिटी समझौता करते हैं तो काम करने वालों के क्षेत्र का भौगोलिक विस्तार हो जाता है। बजट में शिक्षा से रोजगार और उद्यमिता के नाम से एक स्थायी उच्चाधिकार समिति का गठन होगा जो सेवा क्षेत्र को विकसित भारत का मुख्य चालाक बनने के लिए आवश्यक उपायों की अनुशंसा करेगा।  2047 तक भारत का सेवा क्षेत्र में वैश्विक हिस्सा 10 प्रतिशत तक ले जाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निश्चित है। यह स्थायी समिति वृद्धि, रोजगार और निर्यात की संभावनाओं को अधिकतम करने वाले क्षेत्रों को प्राथमिकता देगी। आप सोचिए दुनिया भर का जो सेवा क्षेत्र है उसमें हमारा योगदान कम से कम एक दही हो इसकी दृष्टि से ही नहीं भारत दूसरे छात्रों में भी भारत और विश्व की आवश्यकताओं के अनुकूल कुशल कार्यबल तैयार करने का एक स्थायी ढांचा तैयार किया जा रहा है ।उभरती तकनीकों, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, का नौकरियों और स्किल पर प्रभाव आंकेगी और आवश्यक नीतिगत उपाय सुझाएगी। स्वास्थ्य पेशेवर बनाने वाले संस्थानों को अपग्रेड किया जाएगा जिसमें रेडियोलॉजी, एनेस्थीशिया जैसे क्षेत्रों पर फोकस होगा।  अगले पांच वर्ष में एक लाख एएचपी जोड़े जाएंगे तो 1.5 लाख केयर गिवर्स को प्रशिक्षित किया जाएगा।

इंडियन इंस्‍टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव टेक्‍नोलॉजी, मुम्‍बई को 15 हजार माध्‍यमिक विद्यालयों और पांच सौ महाविद्यालयों में ए.वी.जी.सी. कंटेंट क्रिएटर लैब (सी.सी.एल.) स्‍थापित करने में सहायता प्रदान किया जाएगा। आधुनिक समय में औरेंज इकोनामी दृष्टि से स्टोरी टेलिंग को क्रिएटिव आर्ट से मिलाने व गेमिंग, एनीमेशन आदि क्षेत्र का स्किल विकसित किया जाएगा। वैश्विक बायोफॉर्मा निर्माण केन्द्र के रूप में भारत को विकसित करने के लिए कुल 10,000 करोड़ रुपये से बायोफॉर्मा शक्ति की शुरुआत हो रही है जो बायोलॉजिक और बायोसिमिलरों के घरेलू उत्पादन के लिए अगले पांच वर्षों में इको-सिस्टम का निर्माण करेगी। इसकी रणनीति में तीन नए राष्ट्रीय औषधि शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (एनआईपीईआर) और सात वर्तमान संस्थानों के उन्नयन के साथ बायोफॉर्मा पर केन्द्रित नेटवर्क बनाया जाएगा। यह 1000 मान्यता प्राप्त भारत क्लिनिक जांच स्थलों के एक नेटवर्क का निर्माण करेगा। सेमीकंडक्टर और एआई क्षेत्र में देर से आने के बावजूद अग्रणी देश बनने की दृष्टि से महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं। रेयर अर्थ मिनिरल्स अन्य दुर्लभ खनिज संसाधन की संपूर्ण दुनिया में मांग है और चीन 94% बाजार पर हिस्सा रखता है।‌हमें भी जब चाहता है तभी देता है । घरेलू कैपिटल-गुड्स क्षमताएं बनाने और एक स्वतंत्र आपूर्ति श्रृंखला खड़ा करने का लक्ष्य बनाया गया है। इसके लिए ओडिशा, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल जैसे खनिज-समृद्ध राज्यों में दुर्लभ पृथ्वी संसाधनों की खोज, खुदाई और संसाधन की श्रृंखला बनेगी।

विश्व को भारत के मुख्य निर्यात में कपड़े , वस्त्र,  चमड़े आदि के उत्पाद , आभूषण , इलेक्ट्रॉनिक सामान आदि शामिल होते हैं। विश्व में प्रतिस्पर्धा के अनुरूप टिकाऊ वस्त्र और परिधानों को बढ़ावा देने के लिए उद्योग जगत और शैक्षणिक संस्थानों के सहयोग से वस्त्र कौशल इको-सिस्टम के आधुनिकीकरण और उन्नयन के लिए समर्थ 2.0 कार्यक्रम की शुरुआत हो गई है। इसमें श्रम प्रभावी वस्त्र क्षेत्र के लिए, पांच उपभागों के साथ एकीकृत कार्यक्रम का प्रस्ताव महत्वपूर्ण है। रेशम, ऊन और जूट जैसे प्राकृतिक फाइबर, मानव निर्मित फाइबर और नए युग के फाइबरों में आत्मनिर्भरता के लिए राष्ट्रीय फाइबर योजना है तो मशीनरी, प्रौद्योगिकी उन्नयन ,परीक्षण एवं प्रमाणन केन्द्रों के लिए पूंजीगत सहायता के साथ पारम्परिक क्लस्टरों के आधुनिकीकरण के लिए वस्त्र विस्तार एवं रोजगार योजना। बुनकरों एवं कारीगरों की सहायता सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय हथकरघा एवं हस्तशिल्प कार्यक्रम भी शुरू हो गया है। महात्मा गांधी ग्राम स्वराज पहल के जरिए खादी, हैंडलूम और हैंडीक्राफ्ट पर केंद्रित करते हुए एक जिला-एक उत्पादन और ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले युवाओं को बढ़ावा मिलेगा।  सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्योगों का हमारे विकास व निर्यात में आज भी सर्वाधिक योगदान है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को 10 हजार करोड़ की विकास निधि का प्रस्ताव है जिससे ताकि भविष्य के चैम्पियनों का निर्माण किया जा सके और निर्धारित विशेषताओं के आधार पर उद्योगों को प्रोत्साहन दिया जा सके। दर्शन मध्यम स्तर के उद्योग सुविधा खोने के दृष्टि से आगे नहीं बढ़ते और इसीलिए यह व्यवस्था की गई है ताकि वह आगे बढ़ें और उनको सुविधायें मिलती रहे।

कृषि के लिए चार आयामों में किसानों की आय बढ़ाना मुख्य है। पहली बार बहुभाषीय एआई टूल 'भारत विस्तार' बनाने का जबरदस्त योजना सामने आई है। इसके अलावा मत्‍स्‍य पालन, पांच सौ जलाशयों और अमृत सरोवरों के विकास, पशुपालन,  उच्‍च मूल्‍य वाली कृषि को प्रोत्‍साहन दिया जाएगा। तटवर्ती इलाकों में नारियल, चंदन, कोको, काजू जैसे उच्‍च मूल्‍य वाली फसलों को प्रोत्साहन देने के लिए हर स्तर की सहायता प्रदान की जाएगी। 2030 तक भारतीय काजू और कोको को प्रीमियम वैश्विक ब्रांड के रूप में बदलने के के लिए समर्पित कार्यक्रम आया है। नारियल उत्‍पादन में प्रतिस्‍पर्धा बढ़ाने के लिए नारियल संवर्धन योजना  बनी है। इससे तमिलनाडु, केरल, आंध्र , तेलंगाना के किसानों के लाभ होगा ।पूर्वोत्‍तर में अगर के पेड़ों और पर्वतीय क्षेत्रो में बादाम, अखरोट और खुमानी जैसे गिरीदार फलों को प्रोत्‍साहन देने की भी समग्र योजना है। पशुपालन कृषि और डेयरी का मुख्य अंग है । इसके लिए घोषित कार्यक्रमों में  20 हजार से अधिक पशु डॉक्‍टरों की उपलब्‍धता योजना है। नि‍जी क्षेत्र में पशु रोग विशेषज्ञ और पैरा पशु शल्‍य महाविद्यालय, पशु अस्‍पताल, नैदानिक प्रयोगशालाओं और प्रजनन सुविधाओं के लिए ऋण संबद्ध पूंजी सब्सिडी सहायता योजना शुरू की गई है।

थल, जल और नभ यातायात में भारत वैसे ही दुनिया के अनेक देशों को पीछे छोड़ चुका है। एक बड़ा फोकस इस समय जल यातायात है। पर्यावरण रूप से टिकाऊ आवाजाही को बढ़ावा देने के लिए  पूर्वी भारत में डानकूनी से पश्चिमी भारत के सूरत को जोड़ने के लिए नए समर्पित माल गलियारे, पांच वर्षों में 20 नए राष्ट्रीय जलमार्गों (एनडब्ल्यू) का संचालन ,  जलमार्गों और तटीय पोत परिहवन की हिस्‍सेदारी 6 प्रतिशत से बढाकर वर्ष 2047 तक 12 प्रतिशत करने के लिए तटीय कार्गोनन, सात उच्च-गति रेल कॉरीडोर विकसित करना,  सी-प्‍लेन के स्‍वदेशी निर्माण के लिए प्रोत्‍साहन के लिए योजना आदि । इनके साकार होने के बाद कल्पना करिए कि भारत विश्व स्तरीय यातायात में कहां खड़ा होगा और यह हमारे आम जीवन से लेकर आंतरिक और विदेशी आर्थिक क्रियाकलापों के लिए कितनी बड़ी आधारभूमि होगी।

तो कुल मिलाकर 2047 के विकसित भारत का लक्ष्य पाने और फिर उसके आगे सतत छलांग लगाते रहने की दृष्टि से वर्तमान एवं दूरगामी भविष्य के संभावित आवश्यकता है और चुनौतियों  की दृष्टि से बजट समग्र दृष्टिकोण और योजना प्रस्तुत करती है।

अवधेश कुमार, ई-30,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली-110092, मोबाइल -9811027208

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