डॉ. प्रदीप कुमार
केशरी
जब 2017 में उत्तर प्रदेश में नई सरकार का गठन हुआ था, तब राज्य की पहचान
‘बीमारू’ राज्यों में होती थी। लेकिन आज, जब हम 2026-27 के बजट का विश्लेषण करते
हैं, तो
तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। 2029 तक 1 ट्रिलियन डॉलर (लगभग 80 लाख करोड़ रुपये)
की अर्थव्यवस्था बनने के अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए, पिछले छह वर्षों
में उत्तर प्रदेश की वित्तीय स्थिति में एक संरचनात्मक बदलाव (Structural
Shift) देखने
को मिला है।
2020 की महामारी से लेकर 2026-27 के ₹9.12 लाख करोड़ के ऐतिहासिक बजट तक,
राज्य का वित्तीय
रोडमैप अब केवल प्रशासन चलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रणनीतिक संपत्ति निर्माण (Strategic
Asset Creation) की ओर बढ़ गया है। प्रस्तुत है उत्तर प्रदेश की वित्तीय यात्रा
(2020-2027) का एक विस्तृत विश्लेषण।
1. बजट बनाम हकीकत: बड़े वादे और खर्च की
चुनौतियां - यूपी के वित्तीय इतिहास में एक लगातार चलने वाला ट्रेंड रहा
है—‘महत्वाकांक्षी बजट’ बनाम ‘रूढ़िवादी खर्च’। हालांकि बजट का आकार हर साल 12%
से अधिक की दर से
बढ़ा है, लेकिन
राज्य ऐतिहासिक रूप से आवंटित धन को वित्तीय वर्ष के भीतर पूरा खर्च करने में
संघर्ष करता रहा है। आंकड़ों की गहराई में जाने पर यह स्पष्ट होता है:
- 2020-21
(महामारी का वर्ष): कोविड-19 के झटके के कारण राज्य का राजस्व बुरी तरह
प्रभावित हुआ। इस वर्ष वास्तविक खर्च बजट अनुमान से 28.2% कम रहा। सरकार ने
पूंजीगत परियोजनाओं को रोककर सारा ध्यान स्वास्थ्य सेवाओं और मुफ्त राशन पर
केंद्रित किया।
- 2021-2024 (संरचनात्मक
कमी): महामारी के बाद के वर्षों में भी, ‘अंडर-स्पेंडिंग’
(Underspending) की समस्या बनी रही। सीएजी (CAG) की
रिपोर्ट बताती है कि 2021-22 और 2023-24 में भी सरकार ने बजट से लगभग 20% कम
खर्च किया। इसका मुख्य कारण एक्सप्रेस-वे और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर
प्रोजेक्ट्स के लिए भूमि अधिग्रहण में देरी और विभागों द्वारा समय पर फंड
रिलीज न कर पाना था। हर साल लगभग ₹1 लाख करोड़ का फंड बिना खर्च हुए
रह जाता था।
बदलाव के संकेत: हालांकि, 2024-25 के संशोधित अनुमान बताते हैं कि
स्थिति अब बदल रही है। ‘कोषवानी’ (Koshvani) पोर्टल और सख्त निगरानी के चलते खर्च और
बजट का अंतर घटकर लगभग 8% रह गया है। यह दर्शाता है कि प्रशासन अब पैसे की
‘रफ्तार’ (Velocity of Money) को समझ रहा है—यानी स्वीकृत पैसा समय पर खर्च हो रहा है।
2. कमाई का गणित: ‘डबल इंजन’ का वित्तीय लाभ - अक्सर सवाल उठता
है कि ₹9.12
लाख करोड़ के भारी-भरकम बजट को फंड करने के लिए पैसा कहां से आता है? यूपी का राजस्व
मॉडल केंद्रीय मदद और राज्य के अपने टैक्स कलेक्शन (Tax Buoyancy) के मजबूत मिश्रण
पर आधारित है।
राज्य का अपना टैक्स (SOTR): यह किसी भी राज्य की आर्थिक सेहत का सबसे
सटीक पैमाना है। 2022 के बाद से यूपी के अपने टैक्स कलेक्शन में दोहरे अंकों (Double-digit
growth) की
वृद्धि हुई है:
- जीएसटी
(GST): कर चोरी रोकने के लिए तकनीकी उपायों और ‘बिल लाओ इनाम पाओ’ जैसी
योजनाओं ने टैक्स बेस को बढ़ाया है।
- आबकारी
(शराब): नई आबकारी नीति के तहत प्रीमियम वेंड्स और माइक्रो-ब्रूअरीज को
बढ़ावा देने से राजस्व में सालाना ~15% की वृद्धि
हुई है।
- स्टैम्प
ड्यूटी: अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और आगामी कुंभ मेले की तैयारियों
ने राज्य में “आध्यात्मिक पर्यटन”
(Spiritual Tourism) की लहर पैदा की है। इसका सीधा असर रियल
एस्टेट पर पड़ा है, जिससे स्टैम्प ड्यूटी का कलेक्शन रिकॉर्ड
स्तर पर पहुंचा है।
केंद्रीय हिस्सेदारी: देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य होने
के नाते, वित्त
आयोग की सिफारिशों के तहत यूपी को केंद्रीय करों का सबसे बड़ा हिस्सा (~17.9%)
मिलता है। इसके
अलावा, ‘जल
जीवन मिशन’ और ‘पीएम आवास’ जैसी योजनाओं के लिए केंद्र से भारी अनुदान प्राप्त
होता है।
खास बात यह है कि यूपी उन चुनिंदा बड़े राज्यों में से है जो लगातार
‘राजस्व अधिशेष’ (Revenue Surplus) में रहता है। इसका मतलब है कि राज्य अपनी
कमाई से अपने दैनिक खर्च (वेतन, पेंशन) आसानी से निकाल लेता है और विकास कार्यों के लिए पैसा बचा
लेता है।
3. खर्च की रणनीति: वेतन का बोझ और विकास की रफ़्तार - खर्च के आंकड़ों
पर नजर डालें तो पता चलता है कि राज्य की कमाई का एक बड़ा हिस्सा ‘फिक्स्ड खर्चों’
(Committed Expenditure) में चला जाता है। राज्य की कुल राजस्व आय का लगभग 57% हिस्सा केवल
तीन चीजों में खर्च होता है:
- वेतन
(सरकारी कर्मचारी): लगभग ₹1.80 लाख
करोड़।
- पेंशन
(सरकारी कर्मचारी): लगभग ₹90,000 करोड़।
- ब्याज
भुगतान: लगभग ₹64,000 करोड़।
इन भारी-भरकम खर्चों के बावजूद, सरकार ने 2025-26 और 2026-27 में पूंजीगत व्यय (Capital
Expenditure) यानी एसेट बनाने के लिए ₹1.65 लाख करोड़ से अधिक का लक्ष्य रखा
है।
- इंफ्रास्ट्रक्चर: गंगा
एक्सप्रेस-वे (मेरठ से प्रयागराज) और जेवर एयरपोर्ट जैसे प्रोजेक्ट्स ने
पिछले कुछ वर्षों में बजट का बड़ा हिस्सा लिया है। 2026-27 के
लिए, सरकार ने इन एक्सप्रेस-वे के किनारे औद्योगिक गलियारे (Industrial
Corridors) विकसित करने पर जोर दिया है।
- ऊर्जा
क्षेत्र: बिजली विभाग (UPPCL) राज्य के
खजाने पर सबसे बड़ा बोझ बना हुआ है। ग्रिड को आधुनिक बनाने और घाटे को कम
करने के लिए पुनरुत्थान वितरण क्षेत्र योजना (RDSS) के
तहत ₹15,000 करोड़ से अधिक का निवेश किया जा रहा है।
4. जनकल्याण का बदलता चेहरा: ‘राशन’ से ‘एसेट’ और ‘मोबिलिटी’ तक
यूपी की राजनीति और अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा बदलाव कल्याणकारी
योजनाओं के स्वरूप में आया है। 2020-23 तक सरकार का पूरा जोर ‘संकट प्रबंधन’
(मुफ्त राशन) पर था। लेकिन 2026-27 का बजट अब ‘जीवन स्तर सुधारने’ (Lifestyle
Upgradation) पर केंद्रित है। यह मॉडल अब केवल पेट भरने तक सीमित नहीं है, बल्कि जनता के हाथ
में मकान, बिजली
और स्कूटी जैसे एसेट (Asset) दे रहा है।
(क) आवास (PMAY): 86 लाख घरों का
सफर - योगी सरकार की सफलता का एक बड़ा स्तंभ
प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) रही है। 2017 से 2025 के बीच यूपी ने 86 लाख से अधिक घर (ग्रामीण +
शहरी) बनाए हैं, जो देश में सर्वाधिक है।
- नया कदम: ग्रामीण क्षेत्रों में लक्ष्य लगभग पूरा करने के बाद, 2026-27 के बजट में सरकार का फोकस शहरी नवीनीकरण पर है। दशकों बाद, आगरा, लखनऊ और मेरठ विकास प्राधिकरणों को नई आवास योजनाएं शुरू करने का आदेश दिया गया है, जिसके लिए ₹12,000 करोड़ से अधिक का प्रावधान किया गया है। इससे न केवल लोगों को घर मिलेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर सीमेंट, ईंट और मजदूरी की मांग भी बढ़ेगी।
(ख) अन्नदाता किसान: कर्ज माफी से आगे की सोच - सरकार ने 2017 की
तरह ‘एकमुश्त कर्ज माफी’ (Blanket Loan Waiver) के आर्थिक रूप से बोझिल मॉडल को त्याग
दिया है। इसके बजाय अब ‘इनपुट सहायता’ पर जोर है:
- मुफ्त बिजली: अप्रैल 2023 से शुरू हुई निजी नलकूपों (ट्यूबवेल) के लिए 100% बिजली बिल माफी 2026-27 में भी जारी रहेगी। इससे लगभग 16 लाख किसानों को सीधा फायदा होगा और सिंचाई का खर्च बचेगा। इसका सालाना लगभग ₹2,400 करोड़ का भार राज्य सरकार उठाएगी।
- क्रेडिट: कर्ज माफी के बदले अब ‘ई-किसान क्रेडिट कार्ड’ पर जोर है, जिससे किसानों को साहूकारों के बजाय बैंक से “5 मिनट में लोन” मिल सके। सरकार ने ₹3 लाख करोड़ के संस्थागत ऋण वितरण का लक्ष्य रखा है।
(ग) युवा और महिलाएं: एस्पिरेशनल वोटर -2026-27 का बजट युवाओं और महिलाओं को
लुभाने के लिए एसेट-आधारित योजनाओं पर केंद्रित है:
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स्कूटी योजना: छात्राओं और कामकाजी महिलाओं की ‘लास्ट माइल मोबिलिटी’ की समस्या को
हल करने के लिए ₹400 करोड़ आवंटित किए गए हैं। यह योजना मेधावी छात्राओं को कॉलेज
जाने और काम करने में सक्षम बनाएगी।
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डिजिटल सशक्तिकरण: स्वामी विवेकानंद युवा सशक्तिकरण योजना (स्मार्टफोन/टैबलेट) के लिए ₹2,374 करोड़ आवंटित
किए गए हैं। इसका लक्ष्य 50 लाख डिवाइस बांटना है। ये टैबलेट केवल मुफ्त उपहार
नहीं हैं, बल्कि
इनमें ‘डिजीशक्ति’ (DigiShakti) पोर्टल का स्टडी मटीरियल पहले से लोड होता है, जो ग्रामीण युवाओं के लिए डिजिटल
क्लासरूम का काम करता है।
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सामूहिक विवाह: मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना का बजट बढ़ाकर ₹750 करोड़ कर दिया
गया है। अब प्रति जोड़ा अनुदान राशि बढ़ाकर ₹1.01 लाख कर दी गई है, जो गरीब परिवारों
के लिए बड़ी राहत है।
(घ) सामाजिक सुरक्षा का जाल - महंगाई से निपटने के लिए, सरकार ने पेंशन
योजनाओं को मजबूत किया है। वृद्धावस्था और किसान पेंशन के लिए ₹8,950 करोड़ का
भारी-भरकम बजट रखा गया है। इससे प्रदेश के 67.5 लाख से अधिक बुजुर्गों को हर महीने
₹1,000 की पेंशन बिना
किसी देरी के मिलती रहेगी। यह एक ऐसा सुरक्षा कवच है जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में
नकदी का प्रवाह बनाए रखता है।
4. वित्तीय अनुशासन: क्या यूपी चादर से बाहर पैर पसार रहा है? - विपक्ष अक्सर सरकार पर कर्ज लेकर घी पीने का आरोप लगाता है, लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं।
- राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit): राज्य ने अपने घाटे को एफआरबीएम (FRBM) एक्ट की सीमा के भीतर रखा है। 2023-24 में यह 3.2% था और 2026-27 के लिए 3.0% का लक्ष्य रखा गया है। यह अनुशासन निवेशकों को भरोसा दिलाता है।
- कर्ज का बोझ: जीडीपी के अनुपात में कर्ज (Debt-to-GSDP ratio) 2016-17 के खतरनाक ~36% से घटकर 2024-25 में ~28% पर आ गया है। इसका मतलब है कि यूपी की अर्थव्यवस्था उसके कर्ज लेने की रफ्तार से ज्यादा तेजी से बढ़ रही है।
- उधारी की रणनीति: सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यूपी मुख्य रूप से पूंजीगत व्यय (सड़क, मेट्रो, पावर प्लांट) के लिए कर्ज ले रहा है, न कि वेतन बांटने के लिए। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे “अच्छा कर्ज” (Good Debt) माना जाता है क्योंकि ये एसेट भविष्य में कमाई करके देंगे।
निष्कर्ष: 2027 और उसके आगे - 2020 से 2027 तक का यह विश्लेषण बताता है कि उत्तर प्रदेश ने अपनी बैलेंस शीट को संरचनात्मक रूप से ठीक कर लिया है। राज्य ने ‘बीमारू’ का टैग हटाकर एक निवेश-अनुकूल डेस्टिनेशन की छवि बनाई है। ₹9.12 लाख करोड़ का 2026-27 का बजट एक स्पष्ट संदेश है—यूपी अब विस्तार के दौर (Expansion Phase) में है। राजकोषीय अनुशासन के साथ लोकलुभावन एसेट क्रिएशन (स्कूटी, आवास, बिजली) को जोड़कर, सरकार विकास का एक नया चक्र बनाने का प्रयास कर रही है। हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती अब भी ‘कार्यान्वयन’ (Execution) की है। पैसा आवंटित करना आसान है, लेकिन उसे समय पर और सही जगह खर्च करना ही असली परीक्षा होगी। यदि योगी सरकार इस बजट को धरातल पर उतारने में सफल रही, तो 1 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य अब दूर की कौड़ी नहीं लगता।
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