गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

संसद में परिचर्चा का गिरता स्तर चिन्ता का विषय

बसंत कुमार

इस समय संसद का बजट सत्र चल रहा है और लोकसभा में राष्ट्रपति के अभी भाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा चल रही है परंतु यह चर्चा सरकार के आर्थिक नीतियों और और आर्थिक क्षेत्र में प्रदर्शन और भविष्य में बनाए जाने वाली योजनाओं पर विचार करने के बजाय कुछ ऐसे मुद्दों पर बस चल रही है कि अब क्या अब हमें यह कहने में संकोच होता है कि भारत दुनिया की सबसे बड़ी संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था वाला देश है। यह वहीं भारतीय संसद है है जहां जहां 1950 के दशक में एक नई सांसद अटल बिहारी वाजपेई द्वारा प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की आलोचना पर प्रधानमंत्री जी विचलित नहीं हुए बल्कि उस युवा सांसद के पास जाकर उसके भाषण की तारीफ की और यह कह दिया कि तुम एक दिन इस देश के प्रधानमंत्री बनोगे और वही युवा सांसद अटल बिहारी वाजपेई जब देश का विदेश मंत्री बना तो उसने देखा कि उनके कार्यालय जो साउथ ब्लॉक में स्थित था से नेहरू जी की फोटो गायब थी जिस पर उन्होंने आपत्ति और पंडित नेहरू की फोटो वहां पर फिर लगा दी गई। यह वही भारत है जब 1991 में नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने तो उन्हें संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का रक्षा भारत का पक्ष रखने के लिए अपनी पार्टी से कोई नहीं मिला तो उन्होंने नेता विपक्ष अटल बिहारी वाजपेई को जिनेवा में भारत का पक्ष रखने के लिए भेजा। पर आज लोकसभा और राज्यसभा में बहस का स्तर इतना गिर गया है की समझ में नहीं आ रहा कि हमारी संसदीय प्रणाली कहां जा रही है।

लोकसभा में नेता प्रत्यक्ष राहुल गांधी ने दिनांक 4 फरवरी को संसद में जाते हुए पूर्व आर्मी चीफ जनरल एम एम नरवणे की पुस्तक "फोर स्टार्स ऑफ डेस्टीनी"पर बोलने के मांग कर रहे थे। लोकसभा में कांग्रेस सांसद एक बैनर लेकर पहुंचे थे जिसमें लिखा था जो उचित समझे वो करो इसमें एक तरफ प्रधानमंत्रीएवं रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की तस्वीर और दूसरी तरफ पूर्व आर्मी चीफ जनरल नरवडे की तस्वीर छपी थी। गौर तलब है कि इस पुस्तक में लिखी बातों को लेकर कांग्रेस सहित विपक्ष सोमवार से सदन में विरोध कर रहा था और इन बातों को ध्यान रखते हुए लोग साथ सदस्य नियम और भीम का हवाला देखकर नेता विपक्ष कोइस विषय पर बोलने से रोक रहे थे। जनरल नरवडे की पुस्तक दिखाते हुए राहुल गांधी ने उसके एक अंश का हवाला दिया और कहा कि जब चीन के टैंक भारत की सीमा की तरफ बढ़ रहे थे उस वक्त नरेंद्र मोदी ने अपने उत्तरदायित्व का पालन नहीं किया क्योंकि यह किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है तो लोकसभा अध्यक्ष ने यह पूछ लिया यह किताब कहां से आई है, कहने का अप्राध्याय है कि जो किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है उसको लेकर विपक्षद्वारा सदन में हंगामा खड़ा करना उचित नहीं है। विशेष कर जब यह देश की रक्षा से जुड़ा हुआ मामला हो।

उसी दिन लोकसभा में धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान उसे समय हंगामा हो गया जब भाजपा के सांसद निशिकांत दुबे अपने साथ कई किताबें लेकर सदन में आए और उन्हें कोर्ट करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी पर अभद्रटिपानिया की। निशिकांत दुबे ने प्रधानमंत्री नेहरू के निजी सचिव रहे एम सी मथाई कीऑटोबायोग्राफी का हवाला देते हुए बताया कि किताब में लिखा गया है की पंडित नेहरू एक अय्याश आदमी थे और और पुस्तक में एम सी मथाई ने यह लिखा है कि मेरे और इंदिरा गांधी के निजी संबंध थे इस तरह की अभद्र बातें देश के उन प्रधानमंत्री के लिए गए के बारे में कही गई जिन्होंने भारत के विकास में पूर्ण योगदान दिया और भी इस दुनिया में नहीं है वैसे भी हिंदू संस्कृति का कि यह परंपरा रही है की जो व्यक्ति इस दुनिया में नहीं है उसके बारे में कभी भी गलत नहीं बोला जाता लेकिन यहां तो सर दुबे ने सारी हदें पार कर दी। कांग्रेस की महासचिव श्रीमती प्रियंका गांधी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि जब सरकार सदन को बाधित करना चाहती है तो नीचे काम दुबे को इस तरह के अनारकल बातें खाने के लिए खड़ा कर देती है।

दिल्ली में वर्ष 1911 मैं मैं संसद भवन का निर्माण हुआ और तब से वर्ष 2023 तक इस सदन में नेताओं द्वारा सुचारू रूप से सहभागिता पूर्ण गरिमा में कार्रवाई हुई और नेताओं की शालीनता और एक दूसरे के प्रति सम्मान पुरानी संसद की गवाह के रूप में याद किए जाएंगे। पर जब से संसद की कार्रवाई पुराने संसद भवन से नई संसद भवन में आ गई है तब से यह पुरानी मर्यादाएं सपने की तरह विलुप्त हो गई है। पिछली लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी के सांसद रमेश बिधूड़ी ने बहुजन समाज पार्टी की संसद दानिश अली के लिए जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया उसे सारा देश स्तब्ध रह गया। उन्होंने दानिश और मुसलमान के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया उन्हें यहां पर लिखा भी नहीं जा सकता। इस घटनाक्रम से यह चीज याद दिला दी की हम चाहे कितना भी आलीशान संसद भवन बना ले पर यहां पर संसद की परिचर्चा का स्तर पुरानी वाली संसद में हुए स्तर से बहुत नीचे आ गया है। दुनिया की सबसे बड़े लोकतंत्र में राजनीतिक विमर्श का स्टार लगातार गिरता जा रहा है। अप शब्द, नस्लवादी टिप्पणियां और निजी आक्षेप अब आम बात हो गई है। पहले पुरानी ससद वाकई में सभ्य वार्तालाप का मंच हुआ करती थी। उसे समय जिन बातों को अब बदनुमा अपवाद समझा जाता था आजकल संसद में बहस के दौरान वह आम बात हो गई है।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में राजनीतिक विमर्श का स्तर लगातार गिरता जा रहा है जिस प्रकार नए कपड़े पहनने से किसी व्यक्ति के आचरण को नहीं बदला जा सकता, उसी तरह से नया संसद भवन इस प्रकार के असभ्य लोगों का अड्डा बनता जा रहा है। रमेश बिधूड़ी इस तरहकी भाषा इस्तेमाल करने वाले इकलौते इकलौती व्यक्ति नहीं है। जब राहुल गांधी संसद में जातिगत जनगणना पर बोल रहे थे तो पूर्व मंत्री अनुराग ठाकुर बार-बार राहुल गांधी की जाति पूछ रहे थे शायद अनुराग ठाकुर का इशारा गांधी परिवार की नेहरू से गांधी सर नेम लगाने पर सवाल खड़ा कर रहे थे।

शायद वह भूल गए थे कि उनके पिता हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में धूमल सरनेम का इस्तेमाल करते थे वहीं अनुराग ठाकुर ने अपना सरनेम ठाकुर लिख दिया जहां तक पता है कि उनके भाई जो बीसीसीआई में एक अधिकारी हैं वह कोई तीसरा ही सरनेम इस्तेमाल कर रहे हैं। जबकि पुरानी संसद में या उससे पहले कभी किसी की जाति के बारे में सार्वजनिक तौर पर कभी नहीं पूछा जाता क्योंकि जाति एक व्यक्तिगत मामला है और वह व्यक्तिगत ही रहनी चाहिए। गौरतलब है कि बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बाल काटने वाले नाई का सरनेम ठाकुर बुलाया जाता है इसलिए किसी के सरनेम पर कभी भी कोई आपत्ति नहीं की जानी चाहिए और संसद में तो बिल्कुल नहीं। यह वही अनुराग ठाकुर हैं जिन्होंने दिल्ली में एक सभा में अल्पसंख्यक लोगों के लिए यह नारा दिया था कि देश के इन गद्दारों को गोली मारो........को। पर दुख इस बात पर होता है कि उनके इस सांप्रदायिक नारे पर उनके खिलाफ पार्टी नेतृत्व द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई। अगर अनुराग ठाकुर के खिलाफ उस समय उचित कार्रवाई की गई होती तो फिर संसद में रमेश बिधूड़ी वाला विवाद कभी भी नहीं होता।

वर्ष 1984 में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या के बाद राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने और इंदिरा गांधी की हत्या का सहानुभूति के रूप में लाभ उठाने के लिए कुछ माह के अंदर लोकसभा चुनाव की घोषणा कर दी और परिणाम यह किया हुआ कि उन्हें दो तिहाई सीटों से अधिक लगभग 410 सीटें लोकसभा प्राप्त में हुई। उनके मंत्रिमंडल में बिहार के सवर्ण नेता प्रोफेसर के.के. तिवारी भी शामिल हुए। श्री तिवारी ने संसद में उस समय के वरिष्ठ और मशहूर दलित नेता रामधन को किसी बात पर चमार का बेटा कह दिया। यद्यपि इस बात पर रामधन ने कुछ नहीं कहा पर पूरे सदन में इस बात को लेकर श्री के.के. तिवारी का इतना तगड़ा विरोध हुआ थी कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी को मजबूर होकर उन्हें मंत्रिमंडल से हटना पड़ा। उसके बाद श्री के.के. तिवारी फिर कभी ना तो मंत्री बन पाए और ना ही सांसद बन पाए। कहने का अभिप्राय यह है कि जब सदन में पहले इस तरह की घटनाएं होती थी तो ऐसे लोगों पर कार्रवाई की जाती थी पर अब पार्टी नेतृत्व ऐसे उद्दंड नेताओं पर कार्यवाही तो दूर उन्हें कुछ कहती ही नहीं। इस तरह की घटनाएं कभी-कभी पुराने संसद भवन में भी होती थी पर नए संसद भवन और पुराने संसद भवन का अंतर यह रह गया है कि पुराने संसद भवन में इस तरह की घटनाओं पर लोगों के विरुद्ध कार्रवाई होती थी और सांसद सदन में कुछ बोलते हुए बहुत सोच समझकर शब्दों का इस्तेमाल करते थे, पर नए संसद भवन में ऐसे सांसदों की जुबान पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया है क्योंकि अब उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं होती।

कैसी विडम्बना है कि दुनिया की सबसे बड़ी संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश भारत की संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर सरकार की उपलब्धियां और असफलताओं पर विचार करने के बजाय कुछ लेखको की पुस्तकों के आधार पर देश के वर्तमान प्रधानमंत्री और देश के दो सफलतम पूर्व प्रधानमंत्रियों ऊपर अनर्गल आरोप लगाए जा रहे हैं और उनका चरित्र हनन किया जा रहा है। इसमें पक्ष विपक्ष दोनों के ही नेता शामिल है यह हमारे देश के लोकतंत्र के लिए बहुत ही अपमानजनक है इसमें बजट सेशन के अवसर पर बजट पर कोई भी नेता नहीं बोल रहा है बस एक दूसरे के शीर्ष नेताओं पर कीचड़ उछाला जा रहे हैंऔर उनका चरित्र हनन किया जा रहा है, इन नेताओं को पंडित जवाहरलाल नेहरू और अटल बिहारी वाजपेई जैसे नेताओं से सबक लेने की आवश्यकता है जो एक दूसरे की आलोचना भी करते थे लेकिन एक दूसरे का उतना ही सम्मान करते थे।

सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि बृहस्पतिवार को प्रधानमंत्री लोकसभा में धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलने के लिए सिर्फ इसलिए नहीं आए कि विपक्ष उनके साथ कुछ ऐसा कर सकता था जो लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ है शायद यह हमारे लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार मौका पहला अवसर रहा है कि राष्ट्रपति अभी भाषण के धन्यवाद प्रस्ताव को बिना प्रधानमंत्री की उद्बोधन के पारित कर दिया गया हो।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

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