सोमवार, 15 दिसंबर 2025

भारत की विकास गाथा: चमकते आंकड़ों और जमीनी हकीकत का द्वंद्व

डॉ. प्रदीप कुमार केशरी

भारत की सकल घरेलू उत्पाद या जीडीपी वृद्धि की कहानी को अक्सर एक सीधी रेखा में ऊपर जाती हुई सफलता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन, यदि हम आंकड़ों की बाजीगरी से परे जाकर देखें, तो यह कहानी जितनी उपलब्धियों की है, उतनी ही चूके हुए अवसरों, नीतिगत और रणनीतिगत भूलों की भी है। दुनिया की चौथी या पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का गौरव अपनी जगह है, लेकिन प्रति व्यक्ति आय, आर्थिक सुरक्षा और रोजगार की स्थिति उस गौरव पर प्रश्नचिह्न लगाती है। आइए, भारत की आर्थिक यात्रा का एक निर्मम और निष्पक्ष विश्लेषण करें।

1. नियंत्रण का अतिरेक और समाजवादी आर्थिक विकास दर (1950–1980) - आजादी के बाद समाजवाद का जो मॉडल चुना गया, उसकी मंशा कुछ भी हो, लेकिन तरीका आत्मघाती साबित हुआ। सरकार ने यह मान लिया कि वह सुई से लेकर हवाई जहाज तक सब कुछ बना सकती है। सार्वजनिक क्षेत्र  को 'मंदिर' कहा गया, लेकिन वे अक्षमता के स्मारक बन गए। 'लाइसेंस-परमिट राज' ने भारतीय उद्यमशीलता का गला घोंट दिया। टाटा-बिड़ला जैसे समूहों को भी उत्पादन बढ़ाने के लिए दिल्ली के बाबूओं के चक्कर काटने पड़ते थे। नतीजा यह हुआ कि तीन दशकों तक हम 3.5% की औसत जीडीपी वृद्धि के समाजवादी आर्थिक विकास की दर  में कैद होकर रह गए। दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देश, जो तब हमारे साथ थे, इसी दौर में हमसे आगे निकल गए।

2. कर्ज की बैसाखियों पर दौड़ (1980–1991) - 1980 का दशक 'नकली विकास' का दशक था। सरकारों ने उदारीकरण का नाटक तो किया, लेकिन बिना बुनियादी सुधारों के। जीडीपी 5.5% तक पहुंची, लेकिन यह उत्पादकता बढ़ने से नहीं, बल्कि सरकारी खर्च और विदेशी कर्ज बढ़ने से हुआ। यह 'बिना अपनी चादर देखे पैर फैलाने' वाला दौर था जिसमें राजकोषीय अनुशासनहीनता चरम पर थी। इस अदूरदर्शिता की कीमत 1991 के घोर भुगतान संतुलन संकट के रूप में चुकानी पड़ी, जब देश को अपना सोना विदेश में गिरवी रखना पड़ा

3. उदारीकरण: एक मजबूरी, न कि नीतिगत स्वेच्छा (1991–2002) - 1991 के सुधार किसी दूरदर्शी सोच का परिणाम नहीं, बल्कि आईएमएफ (IMF) की शर्तों और मजबूरी की उपज थे। परिणाम स्वरूप अर्थव्यवस्था के दरवाजे खुले, किन्तु विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) और कृषि क्षेत्र की उपेक्षा ने भारत को “आयात निर्भर” और "रोजगार-विहीन विकास"  के रास्ते पर धकेल दिया, जिसका दंश हम आज भी झेल रहे हैं। संयोगवश आईटी (IT) सेक्टर का उदय हुआ और पढ़े लिखे मध्यम वर्ग का सपना आंशिक रूप से साकार होने लगा। भारत ने  ‘औद्योगीकरण’ के चरण को लांघकर सीधे ‘सेवा क्षेत्र’ में छलांग लगा दी। चीन ने ‘फैक्ट्री’ लगाई और हमने सेवा क्षेत्र के ‘बैक ऑफिस’।

4. कृत्रिम उछाल और क्रोनी कैपिटलिज्म (2003–2008) - इसे भारत का 'स्वर्ण काल' कहा जाता है, जब विकास दर 9% को छू रही थी। लेकिन इसकी नींव कमजोर थी। वैश्विक तरलता (Global Liquidity) में वृद्धि के कारण पैसा बरस रहा था। इसी दौर में बैंकों ने बड़े पैमाने पर कॉरपोरेट्स को कर्ज बांटे। नियामकीय ढिलाई, उच्च स्तर के प्रशासन और बैंकों में भ्रष्टाचार ने 'क्रोनी कैपिटलिज्म' को बढ़ावा दिया। आज भी बैंकिंग सेक्टर जिस एनपीए (NPA) संकट से उबरने की कोशिश कर रहा है, उसके बीज इसी 'तेज विकास' के दौर में बोए गए थे।

5. नीतिगत पंगुता और खोया हुआ दशक (2009–2013) - वैश्विक मंदी के बाद भारत ने दिशा खो दी। भ्रष्टाचार और घोटालों के विरुद्ध आंदोलनों ने निर्णय क्षमता को लकवा मार दिया। मंदी से बचने के लिए दिया गया 'स्टिमुलस पैकेज' महंगाई बनकर लौटा। इस 'पॉलिसी पैरालिसिस' या नीतिगत पंगुता की वजह से  बुनियादी ढांचे की परियोजनाएं ठप पड़ गईं और निवेशक भारत से मुंह मोड़ने लगे। बैंकों में एनपीए सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया। यह वह दौर था जब भारत अपनी क्षमता से बहुत नीचे प्रदर्शन कर रहा था और आम आदमी में  निराशा छाई हुई थी।

स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत के आर्थिक विकास की कहानी (2014-2025) - 2014 में नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—धीमी पड़ चुकी अर्थव्यवस्था, बैंकों के बढ़ते  एनपीए, कमजोर निवेश और नीति–विश्वास की कमी। शुरुआती वर्षों में ध्यान शासन सुधार और संस्थागत ढाँचे को मज़बूत करने पर रहा। जनधन–आधार–मोबाइल (जाम) त्रिमूर्ति के माध्यम से करोड़ों गरीब लोगों को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा गया। इससे न केवल वित्तीय समावेशन बढ़ा, बल्कि कल्याणकारी योजनाओं में पारदर्शिता आई। डिजिटल शासन का यही आधार आगे चलकर भारत की आर्थिक और रणनीतिक क्षमता का एक अहम स्तंभ बना।

इसी दौर में “स्वदेशी” और ‘मेक इन इंडिया’ को आर्थिक नीति के केंद्र में रखा गया। इसका संदेश साफ़ था—भारत केवल आयात पर निर्भर उपभोक्ता बाज़ार नहीं, बल्कि उत्पादन और तकनीक का केंद्र बने। हालाँकि शुरुआती वर्षों में इसके ठोस नतीजे सीमित रहे, लेकिन हाल के वर्षों में रक्षा उत्पादन, रेलवे, इलेक्ट्रॉनिक्स और कुछ इंजीनियरिंग क्षेत्रों में घरेलू निर्माण और निर्यात को बढ़ावा मिला।

2016–17 में लागू दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता” (आईबीसी) और वस्तुओं और सेवाओं पर अप्रत्यक्ष कर, जीएसटी, ने अर्थव्यवस्था की संरचना बदलने की कोशिश की। आईबीसी ने बैंकिंग प्रणाली की सफ़ाई की राह खोली, जबकि जीएसटी का उद्देश्य अपरोक्ष कर प्रणाली में सुधार कर पूरे देश को एक साझा बाज़ार में बदलना था। लेकिन इस संक्रमण काल में छोटे उद्योगों और व्यापारियों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। यहीं यह सवाल भी उठा कि क्या भारत का स्वदेशी छोटे और लघु व्यापार और उद्योग का क्षेत्र इतने बड़े सुधार के झटकों को सहने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार था। बाद के वर्षों में जीएसटी को सरल और कम करना और छोटे और लघु व्यापार और उद्योग को कई तरह की छूट और राहत प्रदान करना सरकार की मजबूरी बन गई।

इसी बीच वैश्विक स्तर पर एक बड़ा बदलाव आया। 2018–19 के आसपास और उसके बाद 2025 में आक्रामक रूप से अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने देश में आयात कम करने के लिए टैरिफ बढ़ाने और संरक्षणवादी व्यापार नीति अपनाई। स्टील, एल्युमिनियम, कपड़ा, खाद्यान्न, फार्मास्युटिकल और अन्य उत्पादों पर लगाए गए अत्यधिक टैरिफ ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था को अस्थिर कर दिया है। भारत से होने वाले कुछ वस्तुओं के निर्यातों पर शुल्क बढ़े, कुछ व्यापारिक रियायतें भी समाप्त हुईं हैं और यह स्पष्ट हो गया कि वैश्वीकरण का पुराना ढाँचा बदल रहा है।

ट्रंप टैरिफ ने भारत के सामने एक रणनीतिक प्रश्न खड़ा किया—क्या केवल आयात-निर्यात–आधारित वैश्विक एकीकरण पर भरोसा किया जाए, या घरेलू बाज़ार और स्वदेशी उत्पादन को मज़बूत किया जाए? इस पृष्ठभूमि में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की बहस को नया तर्क मिला। भारत ने समझा कि वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ राजनीतिक फैसलों से भी प्रभावित हो सकती हैं, इसलिए घरेलू क्षमता का निर्माण अनिवार्य है।

इस सोच को 2020 के कोविड–19 महामारी मजबूत कर ही चुका था। 2020-22 के मध्य वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ टूटीं, आयात बाधित हुआ और प्रवासी मज़दूर संकट सामने आया। इसी दौर में ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ को स्पष्ट नीति–रूप दिया गया। सरकार ने यह दोहराया कि आत्मनिर्भरता का अर्थ आत्मकेंद्रित होना नहीं, बल्कि घरेलू ताकत के साथ वैश्विक प्रतिस्पर्धा में उतरना है।  छोटे लघु और मझोले व्यापार और उद्योगों को ऋण गारंटी, स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा और रणनीतिक क्षेत्रों जैसे रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स, आदि में आयात–निर्भरता घटाने पर ज़ोर दिया गया।

इस सोच का व्यावहारिक रूप उत्पादन–आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं में दिखा। इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन, फार्मा, सोलर मॉड्यूल और रक्षा उत्पादन जैसे क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण बढ़ा। कुछ क्षेत्रों में भारत आयातक से निर्यातक बनने की दिशा में बढ़ा। वैश्विक कंपनियों ने चीन–केंद्रित आपूर्ति शृंखलाओं के विकल्प के रूप में भारत को देखना शुरू किया—यह भी ट्रंप टैरिफ और वैश्विक व्यापार तनावों का अप्रत्यक्ष परिणाम था।

2022 के बाद भारत ने विकास रणनीति को पूंजीगत व्यय, अवसंरचना और स्वदेशी उद्योगों से जोड़ा। सड़क, रेलवे और लॉजिस्टिक्स में बड़े निवेश ने घरेलू उद्योगों को माँग दी। डिजिटल अर्थव्यवस्था और सेवा निर्यात ने भारत को वैश्विक मंच पर मज़बूत किया, जबकि स्वदेशी स्टार्ट–अप और तकनीकी नवाचार ने आत्मनिर्भरता की धारणा को ठोस आधार दिया।

आज, 2025 के आसपास, भारत 6.5–7 प्रतिशत की वृद्धि दर के साथ विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। लेकिन चुनौतियाँ स्पष्ट हैं—रोज़गार सृजन अपेक्षा से कम है, छोटे उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता अभी सीमित है और पर्यावरणीय दबाव बढ़ रहे हैं। साथ ही, वैश्विक व्यापार अभी भी अनिश्चित है; ट्रंप टैरिफ जैसी नीतियाँ याद दिलाती हैं कि अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था केवल बाज़ार नहीं, राजनीति से भी संचालित होती है।

निष्कर्ष - 2014 के बाद का दशक भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए केवल विकास दर का अध्याय नहीं रहा, बल्कि यह स्वदेशी सोच, आत्मनिर्भरता के प्रयास, वैश्विक झटकों और बदलते अंतरराष्ट्रीय व्यापार वातावरण के बीच संतुलन साधने के प्रयास की कहानी भी है। इस कालखंड में भारत ने जहाँ अपने भीतर की कमजोरियों को सुधारने की कोशिश की, वहीं बाहर से आने वाले दबावों—खासतौर पर अमेरिका की संरक्षणवादी नीतियों और ट्रंप टैरिफ जैसे फैसलों—का भी सामना कर रहा है।

आगे की राह में आत्मनिर्भर भारत की सफलता इसी पर निर्भर करेगी कि वह तेज़ विकास, स्वदेशी उत्पादन और वैश्विक एकीकरण—तीनों के बीच कैसे संतुलन साधता है। भारत की जीडीपी का आंकड़ा अब केवल एक संख्या नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। यदि यह वृद्धि रोजगार पैदा नहीं करती, असमानता कम नहीं करती और गरीब की थाली में भोजन नहीं लाती, तो यह केवल कागजी होगी। भारत को अब ‘सुधारों’ से आगे बढ़कर ‘समावेश’  की ओर देखना होगा, अन्यथा जनसांख्यिकीय लाभांश  को ‘जनसांख्यिकीय आपदा’ बनने में देर नहीं लगेगी। जब रोज़गार, तकनीक और आर्थिक सुरक्षा आम नागरिक के जीवन में दिखने लगेगा तभी भारत सच्चे अर्थों में आर्थिक रूप से विकसित और आत्मविश्वास से भरा हुआ देश कहलाएगा।

(लेखक आर्टशास्त्री हैं और आई डी बी आई बैंक के ट्रेनिंग सेंटर के प्राचार्य रहे है। सेवानिवृत्ति के बाद वह स्वतंत्र रूप से शोध और लेखन का कार्य करते हैं)


गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

बहुविवाह और इस्लाम

 अफ़ीफ़ अहसन

असम की विधानसभा ने एक ऐसा कानून पारित किया है जो कथित तौर पर वैवाहिक ज़िम्मेदारी को मज़बूत करने और महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए डिज़ाइन किया गया है। सरकार इसे भारत में बहुविवाह (एक से अधिक विवाह) के ख़िलाफ़ सबसे सख़्त क़ानूनी ढाँचों में से एक बता रही है।

असम बहुविवाह निषेध विधेयक, 2025 का मूल उद्देश्य पहली शादी को कानूनी तौर पर समाप्त किए बिना दूसरी शादी करने को सजा योग्य अपराध घोषित करना है। यह कानून विभिन्न उल्लंघनों के लिए कड़ी सज़ाएँ लागू करता है। यह बहुविवाह के अपराध को संज्ञेय (Cognisable) (बिना वारंट गिरफ्तारी की अनुमति) और गैर-जमानती (Non-bailable) (जहाँ ज़मानत हक़ के तौर पर सुनिश्चित नहीं है) के रूप में वर्गीकृत करता है।

इस कानून में जो व्यक्ति नई शादी करने के लिए अपनी पिछली शादी को छिपाते हैं, उन्हें 10 साल तक की कैद हो सकती है। इस कानून में पहली शादी को भंग किए बिना अवैध दूसरी शादी करने पर 7 साल तक की कैद की सज़ा है। और जो भी व्यक्ति बार-बार यह अपराध करता पाया गया, उसे कानून के तहत निर्धारित सज़ा से दुगुनी सज़ा मिलेगी। इस शादी को करने में मदद देने वाले धार्मिक पुजारियों या मौलवियों को जो ऐसी शादियाँ कराते हैं, 1.5 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। इसके साथ ही साथ जो व्यक्ति जानबूझकर ऐसी शादियों के बारे में अधिकारियों से जानकारी छिपाते या इसमें देरी करते हैं, उन्हें 2 साल तक की कैद और 1 लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है। इसके अलावा, यह कानून नागरिक अयोग्यताएँ भी लगाता है। इस कानून के तहत दोषी ठहराया जाने वाला व्यक्ति राज्य से वित्तीय सहायता प्राप्त सार्वजनिक रोज़गार के लिए पात्र नहीं होगा और उसे असम में कोई भी चुनाव लड़ने से रोक दिया जाएगा।

भारत में बहुविवाह की राष्ट्रीय दर लगभग 1.4 प्रतिशत है, जिसमें विभिन्न धार्मिक और अलग-अलग समुदायों में अंतर पाया जाता है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 के आँकड़ों के अनुसार, ईसाइयों में यह दर मुसलमानों से अधिक 2.1 प्रतिशत है, इसके बाद मुसलमानों में 1.9 प्रतिशत और हिंदुओं में 1.3 प्रतिशत है। यह दर अनुसूचित जनजातियों में सबसे अधिक है। कुल दर समय के साथ कम हो रही है, जो 2005-06 में 1.9 प्रतिशत थी और 2019-21 में कम होकर 1.4 प्रतिशत हो गई है।

हालाँकि इस कानून को यूनिफॉर्म सिविल कोड की ओर एक कदम माना जा रहा है, मगर यह कानून राज्य की पूरी आबादी पर समान रूप से लागू नहीं होता है। इस कानून में जनजातियों को इससे स्पष्ट रूप से छूट दी गई है। असम के अंदर विशिष्ट जनजातीय समूह। छठे शेड्यूल के तहत राज्य के अंदर संवैधानिक रूप से स्व-शासित क्षेत्र इन प्रावधानों से मुक्त हैं। भारत में बहुविवाह के आँकड़े बताते हैं कि आदिवासियों में यह सबसे ज़्यादा 2.4 प्रतिशत है।

असम और उत्तराखंड में की जाने वाली कानून के निर्माण को इन राज्यों के अंदर मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के अपवाद को खत्म करने की कोशिश के तौर पर दिखाने की कोशिश की जा रही है। मगर कांग्रेस के इसकी मुख़ालफ़त से हट जाने के बाद इस बात में कोई वज़न नहीं रह गया है और कांग्रेस के ऐसा करने को अपने महिला वोट बैंक को बचाने की एक कोशिश के तोर पर देखा जा रहा है।

इस बिल को शुरूआत में विपक्षी पार्टियों के विरोध का सामना करना पड़ा जिनमें कांग्रेस, एआईयूडीएफ, सीपीआई (एम) और राइजोर दल शामिल थे। इन पार्टियों ने शुरू में मांग की कि बिल को आगे की जाँच के लिए सेलेक्ट कमेटी के पास भेजा जाए और कई संशोधन पेश किए। मगर मुख्यमंत्री से आश्वासन मिलने के बाद कांग्रेस और राइजोर दल ने संशोधनों के अपने दावे वापस ले लिए। मगर एआईयूडीएफ और सीपीआई (एम) ने दावे वापस लेने से इनकार कर दिया और अपनी मौजूदा शक्ल में बिल का विरोध जारी रखा।

बहुविवाह को अवैध घोषित करने वाला अगला राज्य गुजरात हो सकता है। राज्य सरकार ने फरवरी में एक समान नागरिक संहिता (UCC) की ज़रूरत की समीक्षा करने और UCC का मसौदा तैयार करने के लिए एक समिति गठित की थी। समिति की अगुआई जस्टिस रंजना देसाई कर रही हैं, जिन्होंने उत्तराखंड में भी इसी तरह के एक पैनल की अगुआई की थी जिसने वहाँ UCC का मसौदा तैयार किया था। 2015 में, गुजरात हाई कोर्ट ने मुसलमानों में बहुविवाह के ख़ात्मे की बात की थी। एक आदेश में, जस्टिस जे बी पारदीवाला, जो इस वक़्त सुप्रीम कोर्ट के जज हैं, ने इस प्रथा को संविधान के ख़िलाफ़ और "पित्तंत्रात्‍मक तौर पर निरंकुश" बताया था।

देशभर में मुस्लिम अधिकार संगठन बहुविवाह को सज़ा योग्य अपराध बनाने की माँग कर रहे हैं। मुंबई मैं तीन सौ से अधिक नागरिकों, जिनमें महिलाओं के अधिकारों के कार्यकर्ता, फ़िल्मकार, नाटककार, सामाजिक सुधारक, कलाकार, शिक्षाविद् और अन्य शामिल हैं, ने मुस्लिम बहुविवाह (polygamy) पर क़ानूनी प्रतिबंध की माँग करने वाली एक याचिका का समर्थन किया है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन के एक अध्ययन का हवाला दिया, जिसमें यह पाया गया कि मुस्लिम बहुविवाह की शिकार 80 प्रतिशत से ज़्यादा महिलाएँ चाहती हैं कि मुस्लिम पुरुषों के लिए बहुविवाह को एक फ़ौजदारी अपराध घोषित किया जाए। हालाँकि भारतीय न्याय संहिता बहुविवाह को अपराध घोषित करती है, लेकिन भारतीय मुस्लिम पुरुषों को व्यक्तिगत कानूनों के तहत इससे छूट मिली हुई है।

इस्लाम और बहूपति (एक से ज़्यादा पति) को इस्लाम पूरी तरह से प्रतिबंधित करता है, जैसा कि हिमाचल प्रदेश की कुछ जनजातियों में प्रचलित है, लेकिन बहुविवाह (एक से ज़्यादा पत्नियाँ) को आम तौर पर इस्लाम से जोड़ा जाता है। इस्लाम धर्म को बदनाम करने की कोशिश में, कुछ तत्व यह प्रचार करने की कोशिश करते हैं कि इस्लाम पुरुषों के लिए कई पत्नियों को अनिवार्य बनाता है, जो एक स्पष्ट झूठ है। दूसरे ग़लती से दावा करते हैं कि मुस्लिम पुरुषों को कई महिलाओं से शादी करने के लिए प्रोत्साहित किया गया हैजो कि इस्लाम की सतही व्याख्या पर आधारित है।

हालाँकि इस्लाम पुरुषों को चार महिलाओं तक शादी करने की अनुमति देता है, जो कुछ शर्तों के अधीन है जैसे कि पत्नियों के बीच पूर्ण समानता सुनिश्चित करना, लेकिन यह उन्हें ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित नहीं करता। दरअसल, इस्लाम के मूलभूत ग्रंथों क़ुरान और सहीह हदीसका अध्ययन दर्शाता है कि इस्लाम वास्तव में पुरुषों को एक ही समय में एक से अधिक महिलाओं से शादी करने से हतोत्साहित करता है।

क़ुरान के अवतरण के समय मानव इतिहास के अधिकांश हिस्सों में प्रचलित सामाजिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ होता कि बहुविवाह को पूरी तरह से त्याग दिया जाता। इसलिए, इस्लाम ने बहुविवाह को अवैध घोषित नहीं किया, बल्कि इस पर चार की सीमा लगाई और यह कहते हुए कि "एक ही बेहतर है अगर तुम्हें लगे कि तुम इंसाफ़ न कर सकोगे" वक़्त गुज़रने के साथ-साथ इसको व्यवस्थित करने और इसकी हतोत्साहित करने की कोशिश की, जिससे मुसलमानों को नए सामाजिक ढाँचों के अनुरूप ढलने का लचीलापन प्रदान किया गया, जबकि वे शरीयत की सीमाओं में भी रहे। क़ुरान मजीद में अल्लाह का फ़रमान है:

और अगर तुम्हें ख़ौफ़ है कि तुम इन्साफ़ ना कर सकोगे यतीमों के बारे में, तो औरतों में से जो तुम्हें पसंद हों तो निकाह करो, दो, तीन और चार, पस अगर तुम्हें ख़ौफ़ हो कि तुम अदल ना करसकोगे तो सिर्फ एक,...'' सूरह अन-निसा (4:3)

बहुविवाह अब ज़्यादातर समाजों में सामान्य नहीं रहा। सामाजिक व्यवस्था और कल्याणकारी प्रणालियों में बदलाव की वजह से विधवा और तलाक़शुदा महिलाएँ अब ज़िंदा रहने के लिए दूसरे पुरुषों पर निर्भर रहने के लिए मजबूर नहीं हैं। लंबी दूरी का सफ़र पहले के मुकाबले बहुत शांतिपूर्ण और तेज़ है। प्राचीन काल में युद्ध पुरुषों के बीच लड़े जाते थे जिनमें काफ़ी संख्या में औरतें विधवा और बच्चे यतीम हो जाते थे, मगर आज युद्ध कायरता से लड़े जाते हैं जिनमें हवाई हमले और ड्रोन हमले शामिल होते हैं जो अंधाधुंध मर्दों, औरतों और बच्चों को एकसमान निशाना बनाते हैं।

आज ज़्यादातर मुस्लिम देशों में बहुविवाह बहुत दुर्लभ है। प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार, अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान और मिस्र में एक प्रतिशत से भी कम मुस्लिम पुरुष एक से ज़्यादा जीवनसाथी के साथ रहते हैंये सब ऐसे देश हैं जहाँ कम से कम मुसलमानों के लिए यह प्रथा कानूनी है। ये देश करोड़ों मुसलमानों का घर हैं, जिनकी संस्कृतियाँ और भाषाएँ विविध हैं। हक़ीक़त यह है कि ऐसे समाजों में बहुविवाह सामान्य के क़रीब भी नहीं है, यह शरीयत के संदर्भ में इसकी हतोत्साहन की नापसंदगी की तरफ़ इशारा करती है।

बहुविवाह और इस्लाम

 अफ़ीफ़ अहसन

असम की विधानसभा ने एक ऐसा कानून पारित किया है जो कथित तौर पर वैवाहिक ज़िम्मेदारी को मज़बूत करने और महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए डिज़ाइन किया गया है। सरकार इसे भारत में बहुविवाह (एक से अधिक विवाह) के ख़िलाफ़ सबसे सख़्त क़ानूनी ढाँचों में से एक बता रही है।

असम बहुविवाह निषेध विधेयक, 2025 का मूल उद्देश्य पहली शादी को कानूनी तौर पर समाप्त किए बिना दूसरी शादी करने को सजा योग्य अपराध घोषित करना है। यह कानून विभिन्न उल्लंघनों के लिए कड़ी सज़ाएँ लागू करता है। यह बहुविवाह के अपराध को संज्ञेय (Cognisable) (बिना वारंट गिरफ्तारी की अनुमति) और गैर-जमानती (Non-bailable) (जहाँ ज़मानत हक़ के तौर पर सुनिश्चित नहीं है) के रूप में वर्गीकृत करता है।

इस कानून में जो व्यक्ति नई शादी करने के लिए अपनी पिछली शादी को छिपाते हैं, उन्हें 10 साल तक की कैद हो सकती है। इस कानून में पहली शादी को भंग किए बिना अवैध दूसरी शादी करने पर 7 साल तक की कैद की सज़ा है। और जो भी व्यक्ति बार-बार यह अपराध करता पाया गया, उसे कानून के तहत निर्धारित सज़ा से दुगुनी सज़ा मिलेगी। इस शादी को करने में मदद देने वाले धार्मिक पुजारियों या मौलवियों को जो ऐसी शादियाँ कराते हैं, 1.5 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। इसके साथ ही साथ जो व्यक्ति जानबूझकर ऐसी शादियों के बारे में अधिकारियों से जानकारी छिपाते या इसमें देरी करते हैं, उन्हें 2 साल तक की कैद और 1 लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है। इसके अलावा, यह कानून नागरिक अयोग्यताएँ भी लगाता है। इस कानून के तहत दोषी ठहराया जाने वाला व्यक्ति राज्य से वित्तीय सहायता प्राप्त सार्वजनिक रोज़गार के लिए पात्र नहीं होगा और उसे असम में कोई भी चुनाव लड़ने से रोक दिया जाएगा।

भारत में बहुविवाह की राष्ट्रीय दर लगभग 1.4 प्रतिशत है, जिसमें विभिन्न धार्मिक और अलग-अलग समुदायों में अंतर पाया जाता है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 के आँकड़ों के अनुसार, ईसाइयों में यह दर मुसलमानों से अधिक 2.1 प्रतिशत है, इसके बाद मुसलमानों में 1.9 प्रतिशत और हिंदुओं में 1.3 प्रतिशत है। यह दर अनुसूचित जनजातियों में सबसे अधिक है। कुल दर समय के साथ कम हो रही है, जो 2005-06 में 1.9 प्रतिशत थी और 2019-21 में कम होकर 1.4 प्रतिशत हो गई है।

हालाँकि इस कानून को यूनिफॉर्म सिविल कोड की ओर एक कदम माना जा रहा है, मगर यह कानून राज्य की पूरी आबादी पर समान रूप से लागू नहीं होता है। इस कानून में जनजातियों को इससे स्पष्ट रूप से छूट दी गई है। असम के अंदर विशिष्ट जनजातीय समूह। छठे शेड्यूल के तहत राज्य के अंदर संवैधानिक रूप से स्व-शासित क्षेत्र इन प्रावधानों से मुक्त हैं। भारत में बहुविवाह के आँकड़े बताते हैं कि आदिवासियों में यह सबसे ज़्यादा 2.4 प्रतिशत है।

असम और उत्तराखंड में की जाने वाली कानून के निर्माण को इन राज्यों के अंदर मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के अपवाद को खत्म करने की कोशिश के तौर पर दिखाने की कोशिश की जा रही है। मगर कांग्रेस के इसकी मुख़ालफ़त से हट जाने के बाद इस बात में कोई वज़न नहीं रह गया है और कांग्रेस के ऐसा करने को अपने महिला वोट बैंक को बचाने की एक कोशिश के तोर पर देखा जा रहा है।

इस बिल को शुरूआत में विपक्षी पार्टियों के विरोध का सामना करना पड़ा जिनमें कांग्रेस, एआईयूडीएफ, सीपीआई (एम) और राइजोर दल शामिल थे। इन पार्टियों ने शुरू में मांग की कि बिल को आगे की जाँच के लिए सेलेक्ट कमेटी के पास भेजा जाए और कई संशोधन पेश किए। मगर मुख्यमंत्री से आश्वासन मिलने के बाद कांग्रेस और राइजोर दल ने संशोधनों के अपने दावे वापस ले लिए। मगर एआईयूडीएफ और सीपीआई (एम) ने दावे वापस लेने से इनकार कर दिया और अपनी मौजूदा शक्ल में बिल का विरोध जारी रखा।

बहुविवाह को अवैध घोषित करने वाला अगला राज्य गुजरात हो सकता है। राज्य सरकार ने फरवरी में एक समान नागरिक संहिता (UCC) की ज़रूरत की समीक्षा करने और UCC का मसौदा तैयार करने के लिए एक समिति गठित की थी। समिति की अगुआई जस्टिस रंजना देसाई कर रही हैं, जिन्होंने उत्तराखंड में भी इसी तरह के एक पैनल की अगुआई की थी जिसने वहाँ UCC का मसौदा तैयार किया था। 2015 में, गुजरात हाई कोर्ट ने मुसलमानों में बहुविवाह के ख़ात्मे की बात की थी। एक आदेश में, जस्टिस जे बी पारदीवाला, जो इस वक़्त सुप्रीम कोर्ट के जज हैं, ने इस प्रथा को संविधान के ख़िलाफ़ और "पित्तंत्रात्‍मक तौर पर निरंकुश" बताया था।

देशभर में मुस्लिम अधिकार संगठन बहुविवाह को सज़ा योग्य अपराध बनाने की माँग कर रहे हैं। मुंबई मैं तीन सौ से अधिक नागरिकों, जिनमें महिलाओं के अधिकारों के कार्यकर्ता, फ़िल्मकार, नाटककार, सामाजिक सुधारक, कलाकार, शिक्षाविद् और अन्य शामिल हैं, ने मुस्लिम बहुविवाह (polygamy) पर क़ानूनी प्रतिबंध की माँग करने वाली एक याचिका का समर्थन किया है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन के एक अध्ययन का हवाला दिया, जिसमें यह पाया गया कि मुस्लिम बहुविवाह की शिकार 80 प्रतिशत से ज़्यादा महिलाएँ चाहती हैं कि मुस्लिम पुरुषों के लिए बहुविवाह को एक फ़ौजदारी अपराध घोषित किया जाए। हालाँकि भारतीय न्याय संहिता बहुविवाह को अपराध घोषित करती है, लेकिन भारतीय मुस्लिम पुरुषों को व्यक्तिगत कानूनों के तहत इससे छूट मिली हुई है।

इस्लाम और बहूपति (एक से ज़्यादा पति) को इस्लाम पूरी तरह से प्रतिबंधित करता है, जैसा कि हिमाचल प्रदेश की कुछ जनजातियों में प्रचलित है, लेकिन बहुविवाह (एक से ज़्यादा पत्नियाँ) को आम तौर पर इस्लाम से जोड़ा जाता है। इस्लाम धर्म को बदनाम करने की कोशिश में, कुछ तत्व यह प्रचार करने की कोशिश करते हैं कि इस्लाम पुरुषों के लिए कई पत्नियों को अनिवार्य बनाता है, जो एक स्पष्ट झूठ है। दूसरे ग़लती से दावा करते हैं कि मुस्लिम पुरुषों को कई महिलाओं से शादी करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है जो कि इस्लाम की सतही व्याख्या पर आधारित है।

हालाँकि इस्लाम पुरुषों को चार महिलाओं तक शादी करने की अनुमति देता है, जो कुछ शर्तों के अधीन है जैसे कि पत्नियों के बीच पूर्ण समानता सुनिश्चित करना, लेकिन यह उन्हें ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित नहीं करता। दरअसल, इस्लाम के मूलभूत ग्रंथों क़ुरान और सहीह हदीस का अध्ययन दर्शाता है कि इस्लाम वास्तव में पुरुषों को एक ही समय में एक से अधिक महिलाओं से शादी करने से हतोत्साहित करता है।

क़ुरान के अवतरण के समय मानव इतिहास के अधिकांश हिस्सों में प्रचलित सामाजिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ होता कि बहुविवाह को पूरी तरह से त्याग दिया जाता। इसलिए, इस्लाम ने बहुविवाह को अवैध घोषित नहीं किया, बल्कि इस पर चार की सीमा लगाई और यह कहते हुए कि "एक ही बेहतर है अगर तुम्हें लगे कि तुम इंसाफ़ न कर सकोगे" वक़्त गुज़रने के साथ-साथ इसको व्यवस्थित करने और इसकी हतोत्साहित करने की कोशिश की, जिससे मुसलमानों को नए सामाजिक ढाँचों के अनुरूप ढलने का लचीलापन प्रदान किया गया, जबकि वे शरीयत की सीमाओं में भी रहे। क़ुरान मजीद में अल्लाह का फ़रमान है:

और अगर तुम्हें ख़ौफ़ है कि तुम इन्साफ़ ना कर सकोगे यतीमों के बारे में, तो औरतों में से जो तुम्हें पसंद हों तो निकाह करो, दो, तीन और चार, पर अगर तुम्हें ख़ौफ़ हो कि तुम अदल ना कर सकोगे तो सिर्फ एक,...'' सूरह अन-निसा (4:3)

बहुविवाह अब ज़्यादातर समाजों में सामान्य नहीं रहा। सामाजिक व्यवस्था और कल्याणकारी प्रणालियों में बदलाव की वजह से विधवा और तलाक़शुदा महिलाएँ अब ज़िंदा रहने के लिए दूसरे पुरुषों पर निर्भर रहने के लिए मजबूर नहीं हैं। लंबी दूरी का सफ़र पहले के मुकाबले बहुत शांतिपूर्ण और तेज़ है। प्राचीन काल में युद्ध पुरुषों के बीच लड़े जाते थे जिनमें काफ़ी संख्या में औरतें विधवा और बच्चे यतीम हो जाते थे, मगर आज युद्ध कायरता से लड़े जाते हैं जिनमें हवाई हमले और ड्रोन हमले शामिल होते हैं जो अंधाधुंध मर्दों, औरतों और बच्चों को एकसमान निशाना बनाते हैं।

आज ज़्यादातर मुस्लिम देशों में बहुविवाह बहुत दुर्लभ है। प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार, अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान और मिस्र में एक प्रतिशत से भी कम मुस्लिम पुरुष एक से ज़्यादा जीवनसाथी के साथ रहते हैं। ये सब ऐसे देश हैं जहाँ कम से कम मुसलमानों के लिए यह प्रथा कानूनी है। ये देश करोड़ों मुसलमानों का घर हैं, जिनकी संस्कृतियाँ और भाषाएँ विविध हैं। हक़ीक़त यह है कि ऐसे समाजों में बहुविवाह सामान्य के क़रीब भी नहीं है, यह शरीयत के संदर्भ में इसकी हतोत्साहन की नापसंदगी की तरफ़ इशारा करती है।

इंडिगो संकट का जिम्मेदार कौन?

बसंत कुमार

देश की सबसे बड़ी एयरलाइंस इंडिगो इस समय सबसे बड़े संकट से जूझ रही है, पिछले दिनों में इसकी 2000 से अधिक उड़ाने रद्द हो चुकी है, जिसके कारण देश पर में लाखों यात्री मुसीबत का सामना कर रहे हैं पहले हवाई जहाज की यात्रा इलीट क्लास के लोगो का यात्रा का माध्यम माना जाता है पर पिछले कुछ दिनों से ये यात्री एयर पोर्ट्स पर जिस तरह बेबस जमीन पर लेते हुए हैं और बड़ी बड़ी सुविधाओं वाले एयर पोर्ट्स रेलवे स्टेशन और बस अड्डों की तरह लगने लगे है, अब यह विचार करने का समय आ गया है कि ऐसा क्या हुआ कि चालकों की कमी के कारण इतना बड़ा संकट क्यों आया क्या इसके लिए सरकार और प्राइवेट संस्थानों की कम से कम स्टाफ रखने की प्रवृत्ति है।

इसके लिए सरकार द्वारा फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (FDTL) निर्देशों का जारी करना था, जिसका मुख्य मकसद जहाज चलाने वाले पायलटों को अत्यधिक ड्यूटी के समय से बचाना और उन्हें पर्याप्त आराम सुनिश्चित करना था, जो बहुत ही आवश्यक था, पर क्या इसके लिए पर्याप्त तैयारी की गई जिससे यात्रियों को ठंड के मौसम में दुर्दशा से बचाया जा सकता, पर ये भी कुछ वर्ष पूर्व आनन फानन में लाए गए नोट बंदी की तरह ही लागू किया गया जिसके कारण हजारों लोग बैंकों के सामने लंबी लाइन में मर गए। ऐसे निर्णयों के लिए पहले से योजनाएं बनाई जाती है और संबंधित लोगो को इस विषय में आवश्यक कदम उठा कर अनावश्यक संकट से निकलने का अवसर मिल जाता और इंडिगो ने भी इस अवश्यंभावी संकट से निपटने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाए।

इंडिगो एयरलाइन्स हादसा यह पहला हादसा नहीं है ऐसे हादसे पहले भी होते रहे है पर इनसे सीख नहीं ली गई, वर्ष 2017में रेनेयर (Ryanair) एयरलाइन्स के पास बहुत कम रिजर्व पायलट थे और रोस्टरिंग में गलती के कारण समस्या इतनी विकट हो गई कि उन्हें 6 माह के अंदर करीब 20 हजार उड़ाने रद्द करनी पड़ी, वर्ष 2022में सॉफ्टवेयर की ख़राब के कारण यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका में 10 दिनों के अंदर 16,700 उड़ाने रद्द हुई। उड़ाने रद्द होने के मामले में कुछ चीजें कोर्ट लगती हैं उनमें स्टाफ की कमी, स्टाफ से कष्ट से आधीन काम लेना और इमरजेंसी के दौरान तैयारी न होना है और ये सब इंडिगो संकट के मामले में भी लागू होती हैं पर एक बात जो इंडिगो एयरलाइन्स के मामले में लागू नहीं होती है। इंडिगो को इस समस्या की आशंका पहले से थी और कंपनी को एफ डी एल टी निर्देशों से निपटने के लिए लगभग 18 महीने का समय था पर इंडिगो के प्रशासन ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया। जबकि इंडिगो एयरलाइन्स के मालिकों को यह पता होना चाहिए था कि घरेलू एविएशन इंडस्ट्री में इंडिगो का कब्जा 65%है और इतने बड़े हिस्सेदारी वाली कम्पनी को अपने उत्तरदायित्व का एहसान नहीं था कि यदि उनके बेड़े में अगर कोई संकट आया तो यात्रियों को बुरा हाल होगा और उनको अपने गंतव्य स्थल पर जाने के लिए वैकल्पिक एयरलाइंस से 10गुना कीमत देना पड़ा।

यह सर्व विदित है कि जिन एयरलाइंस के पास अतिरिक्त क्रू होता है और उनका प्रशासन किसी भी इमरजेंसी की स्थिति से निपटने के लिए तैयार होता है तो कोई भी नियम बदलने से इस तरह से नहीं डगमगाती। लेकिन जब कोई कंपनी कम सुविधाओं के दम पर ज्यादा काम करने की कोशिश करती है तो हल्का सा झटका उनके लिए मुसीबत खड़ा कर देता है और ऐसा ही इंडिगो एयरलाइन्स के साथ हुआ। एक बात और है कि यूरोप और अमेरिका में एयरलाइंस की देरी या उड़ान रद्द होने के कारण यात्रियों को हुई असुविधा के कारण मुवावजा मिलता है पर भारत में ऐसे मुवावजे का कोई प्रावधान नहीं है। जबकि विदेशों में हुई रद्द हुई उड़ाने के मामले में यात्रियों को पैसे भी दिए गए और यात्रियों के खाने पीने और रुकने की व्यवस्था की गई।

भारत में पैसेंजर राइट चार्टर बहुत ही कमजोर है यह एक सख्त कानून के बजाय मात्र गाइड लाइन्स लगता है इसमें उड़ान रद्द होने या फिर लेट होने पर यात्रियों का पैसा रिफंड करने और उनके भोजने आदि का प्राविधान है, लेकिन यह एयरलाइंस की इच्छा पर निर्भर करता है जब कि कानून ऐसा हो जहां क़ानून की बाध्यता हो, पर एयरलाइंस में कम कंपनियां होने और प्रतिस्पर्धा कम होने से कंपनियों के खिलाफ कार्यवाई ने होने के कारण यात्रियों के पास कोई विकल्प नहीं बचता, इंडिगो एयरलाइन्स संकट में एनडीए के एक राष्ट्रीय नेता के सी त्यागी को अपनी बेटी को 41 हजार रूपए देकर गंतव्य स्थल भेजना पड़ा और वे रिफंड के लिए मीडियो के सामने कहते देखे गए अब विचारणीय प्रश्न है कि यदि राष्ट्रीय नेताओं का यह हाल है तो आम नागरिकों का क्या हाल होगा।

इंडिगो एयरलाइन्स संकट आज नहीं तो कल सुलझ जाएगा हो सकता है कि एयरलाइंस पैसेंजर्स को किराए भी रिटर्न कर दे मुआवजा भी दे दे लेकिन उड़ानों के रद्द होने के कारण कुछ छात्रों की परीक्षा छूट गई कुछ लोग अपने प्रियजनों के इलाज के लिए नहीं पहुंच पाए और कुछ तो अपने प्रिय जन की अंत्येष्टि में नहीं पहुंच पाए तो क्या इस तरह के नुकसान की भरपाई कैसे हो पायेगी, एयरलाइंस और सिविल एविएशन मंत्रालय को यह समझना चाहिए कि विमान द्वारा कम समय में यात्रियों को उनके गंतव्य स्थल पर पहुंचाना मात्र व्यापार या कॉन्ट्रैक्ट नहीं है उन्हें इसको उस मानवीय भावना के साथ सोचना चाहिए कि कुछ यात्री अपनी सुविधा के लिए जहाज की यात्रा करते हो पर अधिकांश मध्य वर्गीय लोग इमरजेंसी में ही अधिक पैसे देकर विमान से यात्रा करते हैं और अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च कर भी यदि वे अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच पाते तो उन्हें कितना कष्ट होगा इसलिए विमान कंपनियां इसे अपना व्यापार समझने के स्थान पर सेवा भाव से किया गया काम समझे तब इस तरह की लापरवाही नहीं होगी और पैसेंजर्स संकट में नहीं पड़ेंगे।

यह कैसी विडंबना है कि एक ओर देश में करोड़ों शिक्षित युवा बेरोजगारी की मार झेल रही है और हताशा और निराशा में आत्म हत्या के रहे है और दूसरी ओर सरकारी व प्राइवेट संस्थानों में पैसा बचने के लिए रोज रोज कर्मचारियों की संख्या में कमी की जा रही है अभी तो इंडिगो एयरलाइन्स में ही संकट आया है यदि ऐसा ही रहा तो भविष्य में सरकारी अस्पतालों, पुलिस दलों और सुरक्षा बलों में भी ऐसा संकट आयेगा तब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाएगी, इसलिए अब सरकार को तदर्थ, संविदा नियुक्तियों से काम चलाने की नीति त्याग कर रेगुलर भर्ती पर जोर देना चाहिए।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/