डॉ. प्रदीप कुमार केशरी
भारत की सकल घरेलू
उत्पाद या जीडीपी वृद्धि की कहानी को अक्सर एक सीधी रेखा में ऊपर जाती हुई सफलता
के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन, यदि हम आंकड़ों की बाजीगरी से परे जाकर
देखें, तो यह कहानी जितनी उपलब्धियों की है, उतनी ही चूके हुए अवसरों, नीतिगत और
रणनीतिगत भूलों की भी है।
दुनिया की चौथी या पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का गौरव अपनी जगह है, लेकिन
प्रति व्यक्ति आय, आर्थिक सुरक्षा और रोजगार की स्थिति उस गौरव पर
प्रश्नचिह्न लगाती है। आइए, भारत की आर्थिक यात्रा का एक निर्मम और निष्पक्ष
विश्लेषण करें।
1. नियंत्रण का अतिरेक और समाजवादी आर्थिक विकास दर (1950–1980) - आजादी के बाद समाजवाद का जो मॉडल चुना गया, उसकी मंशा कुछ भी हो, लेकिन तरीका आत्मघाती साबित हुआ। सरकार ने यह मान लिया कि वह सुई से लेकर हवाई जहाज तक सब कुछ बना सकती है। सार्वजनिक क्षेत्र को 'मंदिर' कहा गया, लेकिन वे अक्षमता के स्मारक बन गए। 'लाइसेंस-परमिट राज' ने भारतीय उद्यमशीलता का गला घोंट दिया। टाटा-बिड़ला जैसे समूहों को भी उत्पादन बढ़ाने के लिए दिल्ली के बाबूओं के चक्कर काटने पड़ते थे। नतीजा यह हुआ कि तीन दशकों तक हम 3.5% की औसत जीडीपी वृद्धि के समाजवादी आर्थिक विकास की दर में कैद होकर रह गए। दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देश, जो तब हमारे साथ थे, इसी दौर में हमसे आगे निकल गए।
2. कर्ज की बैसाखियों पर दौड़ (1980–1991) - 1980 का दशक 'नकली विकास' का दशक था। सरकारों ने उदारीकरण का नाटक तो किया, लेकिन बिना बुनियादी सुधारों के। जीडीपी 5.5% तक पहुंची, लेकिन यह उत्पादकता बढ़ने से नहीं, बल्कि सरकारी खर्च और विदेशी कर्ज बढ़ने से हुआ। यह 'बिना अपनी चादर देखे पैर फैलाने' वाला दौर था जिसमें राजकोषीय अनुशासनहीनता चरम पर थी। इस अदूरदर्शिता की कीमत 1991 के घोर भुगतान संतुलन संकट के रूप में चुकानी पड़ी, जब देश को अपना सोना विदेश में गिरवी रखना पड़ा।
3. उदारीकरण: एक मजबूरी, न कि नीतिगत स्वेच्छा (1991–2002) - 1991 के सुधार किसी दूरदर्शी सोच का परिणाम नहीं, बल्कि आईएमएफ (IMF) की शर्तों और मजबूरी की उपज थे। परिणाम स्वरूप अर्थव्यवस्था के दरवाजे खुले, किन्तु विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) और कृषि क्षेत्र की उपेक्षा ने भारत को “आयात निर्भर” और "रोजगार-विहीन विकास" के रास्ते पर धकेल दिया, जिसका दंश हम आज भी झेल रहे हैं। संयोगवश आईटी (IT) सेक्टर का उदय हुआ और पढ़े लिखे मध्यम वर्ग का सपना आंशिक रूप से साकार होने लगा। भारत ने ‘औद्योगीकरण’ के चरण को लांघकर सीधे ‘सेवा क्षेत्र’ में छलांग लगा दी। चीन ने ‘फैक्ट्री’ लगाई और हमने सेवा क्षेत्र के ‘बैक ऑफिस’।
4. कृत्रिम उछाल और क्रोनी कैपिटलिज्म (2003–2008) - इसे भारत का 'स्वर्ण काल' कहा जाता है, जब विकास दर 9% को छू रही थी। लेकिन इसकी नींव कमजोर थी। वैश्विक तरलता (Global Liquidity) में वृद्धि के कारण पैसा बरस रहा था। इसी दौर में बैंकों ने बड़े पैमाने पर कॉरपोरेट्स को कर्ज बांटे। नियामकीय ढिलाई, उच्च स्तर के प्रशासन और बैंकों में भ्रष्टाचार ने 'क्रोनी कैपिटलिज्म' को बढ़ावा दिया। आज भी बैंकिंग सेक्टर जिस एनपीए (NPA) संकट से उबरने की कोशिश कर रहा है, उसके बीज इसी 'तेज विकास' के दौर में बोए गए थे।
5. नीतिगत पंगुता और खोया हुआ दशक (2009–2013) - वैश्विक मंदी के बाद भारत ने दिशा खो दी। भ्रष्टाचार और घोटालों के विरुद्ध आंदोलनों ने निर्णय क्षमता को लकवा मार दिया। मंदी से बचने के लिए दिया गया 'स्टिमुलस पैकेज' महंगाई बनकर लौटा। इस 'पॉलिसी पैरालिसिस' या नीतिगत पंगुता की वजह से बुनियादी ढांचे की परियोजनाएं ठप पड़ गईं और निवेशक भारत से मुंह मोड़ने लगे। बैंकों में एनपीए सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया। यह वह दौर था जब भारत अपनी क्षमता से बहुत नीचे प्रदर्शन कर रहा था और आम आदमी में निराशा छाई हुई थी।
स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत के आर्थिक विकास की कहानी (2014-2025) - 2014 में नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—धीमी पड़ चुकी अर्थव्यवस्था, बैंकों के बढ़ते एनपीए, कमजोर निवेश और नीति–विश्वास की कमी। शुरुआती वर्षों में ध्यान शासन सुधार और संस्थागत ढाँचे को मज़बूत करने पर रहा। जनधन–आधार–मोबाइल (जाम) त्रिमूर्ति के माध्यम से करोड़ों गरीब लोगों को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा गया। इससे न केवल वित्तीय समावेशन बढ़ा, बल्कि कल्याणकारी योजनाओं में पारदर्शिता आई। डिजिटल शासन का यही आधार आगे चलकर भारत की आर्थिक और रणनीतिक क्षमता का एक अहम स्तंभ बना।
इसी दौर में “स्वदेशी” और ‘मेक इन इंडिया’ को आर्थिक
नीति के केंद्र में रखा गया। इसका संदेश साफ़ था—भारत केवल आयात पर निर्भर
उपभोक्ता बाज़ार नहीं, बल्कि उत्पादन और तकनीक का केंद्र बने। हालाँकि शुरुआती
वर्षों में इसके ठोस नतीजे सीमित रहे, लेकिन हाल के वर्षों में रक्षा उत्पादन,
रेलवे, इलेक्ट्रॉनिक्स और कुछ इंजीनियरिंग क्षेत्रों में घरेलू निर्माण और निर्यात
को बढ़ावा मिला।
2016–17 में लागू “दिवाला और शोधन
अक्षमता संहिता” (आईबीसी) और वस्तुओं और सेवाओं पर अप्रत्यक्ष
कर, जीएसटी, ने अर्थव्यवस्था की संरचना
बदलने की कोशिश की। आईबीसी ने बैंकिंग प्रणाली की सफ़ाई की राह खोली, जबकि जीएसटी का
उद्देश्य अपरोक्ष कर प्रणाली में सुधार कर पूरे देश को एक साझा बाज़ार में बदलना
था। लेकिन इस संक्रमण काल में छोटे उद्योगों और व्यापारियों को भारी कठिनाइयों का
सामना करना पड़ा। यहीं यह सवाल भी उठा कि क्या भारत का स्वदेशी छोटे और लघु व्यापार
और उद्योग का क्षेत्र इतने बड़े सुधार के झटकों को सहने के लिए पर्याप्त रूप से
तैयार था। बाद के वर्षों में जीएसटी को सरल और कम करना और छोटे और लघु व्यापार और
उद्योग को कई तरह की छूट और राहत प्रदान करना सरकार की मजबूरी बन गई।
इसी बीच वैश्विक स्तर पर एक बड़ा बदलाव आया। 2018–19 के
आसपास और उसके बाद 2025 में आक्रामक रूप से अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने देश में आयात कम करने के लिए टैरिफ बढ़ाने और संरक्षणवादी
व्यापार नीति अपनाई। स्टील, एल्युमिनियम, कपड़ा, खाद्यान्न, फार्मास्युटिकल और अन्य उत्पादों पर लगाए
गए अत्यधिक टैरिफ ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था को अस्थिर कर दिया है। भारत से होने
वाले कुछ वस्तुओं के निर्यातों पर शुल्क बढ़े, कुछ व्यापारिक रियायतें भी समाप्त
हुईं हैं और यह स्पष्ट हो गया कि वैश्वीकरण का पुराना ढाँचा बदल रहा है।
ट्रंप टैरिफ ने भारत के सामने एक रणनीतिक प्रश्न खड़ा
किया—क्या केवल आयात-निर्यात–आधारित वैश्विक एकीकरण पर भरोसा
किया जाए, या घरेलू बाज़ार और स्वदेशी उत्पादन को मज़बूत किया जाए? इस पृष्ठभूमि
में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की बहस को नया तर्क मिला। भारत ने समझा कि वैश्विक
आपूर्ति शृंखलाएँ राजनीतिक फैसलों से भी प्रभावित हो सकती हैं, इसलिए घरेलू क्षमता
का निर्माण अनिवार्य है।
इस सोच को 2020 के कोविड–19 महामारी मजबूत कर ही चुका था।
2020-22 के मध्य वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ टूटीं, आयात बाधित
हुआ और प्रवासी मज़दूर संकट सामने आया। इसी दौर में ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ को
स्पष्ट नीति–रूप दिया गया। सरकार ने यह दोहराया कि आत्मनिर्भरता का अर्थ
आत्मकेंद्रित होना नहीं, बल्कि घरेलू ताकत के साथ वैश्विक प्रतिस्पर्धा में उतरना
है। छोटे लघु और मझोले व्यापार और उद्योगों
को ऋण गारंटी, स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा और रणनीतिक क्षेत्रों जैसे रक्षा,
इलेक्ट्रॉनिक्स, आदि में आयात–निर्भरता घटाने
पर ज़ोर दिया गया।
इस सोच का व्यावहारिक रूप उत्पादन–आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं में दिखा। इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन, फार्मा, सोलर मॉड्यूल और
रक्षा उत्पादन जैसे क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण बढ़ा। कुछ क्षेत्रों में भारत
आयातक से निर्यातक बनने की दिशा में बढ़ा। वैश्विक कंपनियों ने चीन–केंद्रित
आपूर्ति शृंखलाओं के विकल्प के रूप में भारत को देखना शुरू किया—यह भी ट्रंप टैरिफ
और वैश्विक व्यापार तनावों का अप्रत्यक्ष परिणाम था।
2022 के बाद भारत ने विकास रणनीति को पूंजीगत व्यय,
अवसंरचना और स्वदेशी उद्योगों से जोड़ा। सड़क, रेलवे और लॉजिस्टिक्स में बड़े
निवेश ने घरेलू उद्योगों को माँग दी। डिजिटल अर्थव्यवस्था और सेवा निर्यात ने भारत
को वैश्विक मंच पर मज़बूत किया, जबकि स्वदेशी स्टार्ट–अप और तकनीकी नवाचार ने
आत्मनिर्भरता की धारणा को ठोस आधार दिया।
आज, 2025 के आसपास, भारत 6.5–7 प्रतिशत की वृद्धि दर के साथ विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। लेकिन चुनौतियाँ स्पष्ट हैं—रोज़गार सृजन अपेक्षा से कम है, छोटे उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता अभी सीमित है और पर्यावरणीय दबाव बढ़ रहे हैं। साथ ही, वैश्विक व्यापार अभी भी अनिश्चित है; ट्रंप टैरिफ जैसी नीतियाँ याद दिलाती हैं कि अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था केवल बाज़ार नहीं, राजनीति से भी संचालित होती है।
निष्कर्ष - 2014 के बाद का दशक भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए केवल विकास दर का अध्याय नहीं रहा, बल्कि यह स्वदेशी सोच, आत्मनिर्भरता के प्रयास, वैश्विक झटकों और बदलते अंतरराष्ट्रीय व्यापार वातावरण के बीच संतुलन साधने के प्रयास की कहानी भी है। इस कालखंड में भारत ने जहाँ अपने भीतर की कमजोरियों को सुधारने की कोशिश की, वहीं बाहर से आने वाले दबावों—खासतौर पर अमेरिका की संरक्षणवादी नीतियों और ट्रंप टैरिफ जैसे फैसलों—का भी सामना कर रहा है।
आगे की राह में आत्मनिर्भर भारत की सफलता इसी पर निर्भर करेगी कि वह तेज़ विकास, स्वदेशी उत्पादन और वैश्विक एकीकरण—तीनों के बीच कैसे संतुलन साधता है। भारत की जीडीपी का आंकड़ा अब केवल एक संख्या नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। यदि यह वृद्धि रोजगार पैदा नहीं करती, असमानता कम नहीं करती और गरीब की थाली में भोजन नहीं लाती, तो यह केवल कागजी होगी। भारत को अब ‘सुधारों’ से आगे बढ़कर ‘समावेश’ की ओर देखना होगा, अन्यथा जनसांख्यिकीय लाभांश को ‘जनसांख्यिकीय आपदा’ बनने में देर नहीं लगेगी। जब रोज़गार, तकनीक और आर्थिक सुरक्षा आम नागरिक के जीवन में दिखने लगेगा तभी भारत सच्चे अर्थों में आर्थिक रूप से विकसित और आत्मविश्वास से भरा हुआ देश कहलाएगा।
(लेखक आर्टशास्त्री हैं और आई डी बी आई बैंक के
ट्रेनिंग सेंटर के प्राचार्य रहे है। सेवानिवृत्ति के बाद वह स्वतंत्र रूप से शोध और
लेखन का कार्य करते हैं)
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