गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

इंडिगो संकट का जिम्मेदार कौन?

बसंत कुमार

देश की सबसे बड़ी एयरलाइंस इंडिगो इस समय सबसे बड़े संकट से जूझ रही है, पिछले दिनों में इसकी 2000 से अधिक उड़ाने रद्द हो चुकी है, जिसके कारण देश पर में लाखों यात्री मुसीबत का सामना कर रहे हैं पहले हवाई जहाज की यात्रा इलीट क्लास के लोगो का यात्रा का माध्यम माना जाता है पर पिछले कुछ दिनों से ये यात्री एयर पोर्ट्स पर जिस तरह बेबस जमीन पर लेते हुए हैं और बड़ी बड़ी सुविधाओं वाले एयर पोर्ट्स रेलवे स्टेशन और बस अड्डों की तरह लगने लगे है, अब यह विचार करने का समय आ गया है कि ऐसा क्या हुआ कि चालकों की कमी के कारण इतना बड़ा संकट क्यों आया क्या इसके लिए सरकार और प्राइवेट संस्थानों की कम से कम स्टाफ रखने की प्रवृत्ति है।

इसके लिए सरकार द्वारा फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (FDTL) निर्देशों का जारी करना था, जिसका मुख्य मकसद जहाज चलाने वाले पायलटों को अत्यधिक ड्यूटी के समय से बचाना और उन्हें पर्याप्त आराम सुनिश्चित करना था, जो बहुत ही आवश्यक था, पर क्या इसके लिए पर्याप्त तैयारी की गई जिससे यात्रियों को ठंड के मौसम में दुर्दशा से बचाया जा सकता, पर ये भी कुछ वर्ष पूर्व आनन फानन में लाए गए नोट बंदी की तरह ही लागू किया गया जिसके कारण हजारों लोग बैंकों के सामने लंबी लाइन में मर गए। ऐसे निर्णयों के लिए पहले से योजनाएं बनाई जाती है और संबंधित लोगो को इस विषय में आवश्यक कदम उठा कर अनावश्यक संकट से निकलने का अवसर मिल जाता और इंडिगो ने भी इस अवश्यंभावी संकट से निपटने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाए।

इंडिगो एयरलाइन्स हादसा यह पहला हादसा नहीं है ऐसे हादसे पहले भी होते रहे है पर इनसे सीख नहीं ली गई, वर्ष 2017में रेनेयर (Ryanair) एयरलाइन्स के पास बहुत कम रिजर्व पायलट थे और रोस्टरिंग में गलती के कारण समस्या इतनी विकट हो गई कि उन्हें 6 माह के अंदर करीब 20 हजार उड़ाने रद्द करनी पड़ी, वर्ष 2022में सॉफ्टवेयर की ख़राब के कारण यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका में 10 दिनों के अंदर 16,700 उड़ाने रद्द हुई। उड़ाने रद्द होने के मामले में कुछ चीजें कोर्ट लगती हैं उनमें स्टाफ की कमी, स्टाफ से कष्ट से आधीन काम लेना और इमरजेंसी के दौरान तैयारी न होना है और ये सब इंडिगो संकट के मामले में भी लागू होती हैं पर एक बात जो इंडिगो एयरलाइन्स के मामले में लागू नहीं होती है। इंडिगो को इस समस्या की आशंका पहले से थी और कंपनी को एफ डी एल टी निर्देशों से निपटने के लिए लगभग 18 महीने का समय था पर इंडिगो के प्रशासन ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया। जबकि इंडिगो एयरलाइन्स के मालिकों को यह पता होना चाहिए था कि घरेलू एविएशन इंडस्ट्री में इंडिगो का कब्जा 65%है और इतने बड़े हिस्सेदारी वाली कम्पनी को अपने उत्तरदायित्व का एहसान नहीं था कि यदि उनके बेड़े में अगर कोई संकट आया तो यात्रियों को बुरा हाल होगा और उनको अपने गंतव्य स्थल पर जाने के लिए वैकल्पिक एयरलाइंस से 10गुना कीमत देना पड़ा।

यह सर्व विदित है कि जिन एयरलाइंस के पास अतिरिक्त क्रू होता है और उनका प्रशासन किसी भी इमरजेंसी की स्थिति से निपटने के लिए तैयार होता है तो कोई भी नियम बदलने से इस तरह से नहीं डगमगाती। लेकिन जब कोई कंपनी कम सुविधाओं के दम पर ज्यादा काम करने की कोशिश करती है तो हल्का सा झटका उनके लिए मुसीबत खड़ा कर देता है और ऐसा ही इंडिगो एयरलाइन्स के साथ हुआ। एक बात और है कि यूरोप और अमेरिका में एयरलाइंस की देरी या उड़ान रद्द होने के कारण यात्रियों को हुई असुविधा के कारण मुवावजा मिलता है पर भारत में ऐसे मुवावजे का कोई प्रावधान नहीं है। जबकि विदेशों में हुई रद्द हुई उड़ाने के मामले में यात्रियों को पैसे भी दिए गए और यात्रियों के खाने पीने और रुकने की व्यवस्था की गई।

भारत में पैसेंजर राइट चार्टर बहुत ही कमजोर है यह एक सख्त कानून के बजाय मात्र गाइड लाइन्स लगता है इसमें उड़ान रद्द होने या फिर लेट होने पर यात्रियों का पैसा रिफंड करने और उनके भोजने आदि का प्राविधान है, लेकिन यह एयरलाइंस की इच्छा पर निर्भर करता है जब कि कानून ऐसा हो जहां क़ानून की बाध्यता हो, पर एयरलाइंस में कम कंपनियां होने और प्रतिस्पर्धा कम होने से कंपनियों के खिलाफ कार्यवाई ने होने के कारण यात्रियों के पास कोई विकल्प नहीं बचता, इंडिगो एयरलाइन्स संकट में एनडीए के एक राष्ट्रीय नेता के सी त्यागी को अपनी बेटी को 41 हजार रूपए देकर गंतव्य स्थल भेजना पड़ा और वे रिफंड के लिए मीडियो के सामने कहते देखे गए अब विचारणीय प्रश्न है कि यदि राष्ट्रीय नेताओं का यह हाल है तो आम नागरिकों का क्या हाल होगा।

इंडिगो एयरलाइन्स संकट आज नहीं तो कल सुलझ जाएगा हो सकता है कि एयरलाइंस पैसेंजर्स को किराए भी रिटर्न कर दे मुआवजा भी दे दे लेकिन उड़ानों के रद्द होने के कारण कुछ छात्रों की परीक्षा छूट गई कुछ लोग अपने प्रियजनों के इलाज के लिए नहीं पहुंच पाए और कुछ तो अपने प्रिय जन की अंत्येष्टि में नहीं पहुंच पाए तो क्या इस तरह के नुकसान की भरपाई कैसे हो पायेगी, एयरलाइंस और सिविल एविएशन मंत्रालय को यह समझना चाहिए कि विमान द्वारा कम समय में यात्रियों को उनके गंतव्य स्थल पर पहुंचाना मात्र व्यापार या कॉन्ट्रैक्ट नहीं है उन्हें इसको उस मानवीय भावना के साथ सोचना चाहिए कि कुछ यात्री अपनी सुविधा के लिए जहाज की यात्रा करते हो पर अधिकांश मध्य वर्गीय लोग इमरजेंसी में ही अधिक पैसे देकर विमान से यात्रा करते हैं और अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च कर भी यदि वे अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच पाते तो उन्हें कितना कष्ट होगा इसलिए विमान कंपनियां इसे अपना व्यापार समझने के स्थान पर सेवा भाव से किया गया काम समझे तब इस तरह की लापरवाही नहीं होगी और पैसेंजर्स संकट में नहीं पड़ेंगे।

यह कैसी विडंबना है कि एक ओर देश में करोड़ों शिक्षित युवा बेरोजगारी की मार झेल रही है और हताशा और निराशा में आत्म हत्या के रहे है और दूसरी ओर सरकारी व प्राइवेट संस्थानों में पैसा बचने के लिए रोज रोज कर्मचारियों की संख्या में कमी की जा रही है अभी तो इंडिगो एयरलाइन्स में ही संकट आया है यदि ऐसा ही रहा तो भविष्य में सरकारी अस्पतालों, पुलिस दलों और सुरक्षा बलों में भी ऐसा संकट आयेगा तब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाएगी, इसलिए अब सरकार को तदर्थ, संविदा नियुक्तियों से काम चलाने की नीति त्याग कर रेगुलर भर्ती पर जोर देना चाहिए।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

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