गुरुवार, 7 अगस्त 2025

मालेगांव मामले में हिंदू आतंकवाद भगवा आतंकवाद की कहानी बनाई गई

अवधेश कुमार

एनआईए विशेष न्यायालय द्वारा मालेगांव द्वितीय विस्फोट पर दिए गए फैसले के बाद तत्काल टिप्पणी के लिए शब्द तलाशना कठिन है। विश्व में कोई देश नहीं होगा जहां स्थानीय पुलिस को आतंकवादी हमले के पीछे की साजिशें के सच की गंध होने के बावजूद राजनीति के लिए नई कहानी गढ़े जाएं ,निर्दोष लोगों को गिरफ्तार कर व्यापक दुष्प्रचार हो तथा उन्हें सजा दिलाने के लिए नकली गवाह,  फर्जी सबूत यहां तक कि जांच अधिकारी तक  पैदा कर दिया जाए। आतंकवादी हमला देश पर हमला माना जाता है और उनसे संघर्ष के लिए सभी राजनीतिक दलों अधिकारियों और आम लोगों को एकजुट होकर दोषियों के विरुद्ध टूट पड़ने की आवश्यकता होती है। न्यायालय ने सातों आरोपियों के विरुद्ध किसी तरह के सबूत न मिलने पर बरी कर दिया। जिन निर्दोष लोगों की जिंदगी नष्ट हो गई तथा संगठनों की छवि पर कालिख पोती गई उनके साथ न्याय कैसे हैगा। जमीयत उलेमा ए हिंद  इसके विरुद्ध उच्च न्यायालय जाएगा। हालांकि जिन लोगों ने पूरे मामले पर दृष्टि रखी थी उनके लिए यही फैसला अपेक्षित था। उन्हें पता था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ , भाजपा तथा कुछ हिंदू संगठनों को आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्त साबित करने के लिए हिंदू आतंकवाद, भगवा आतंकवाद जैसे शब्द कहे गए और निर्दोष लोग आरोपी बनाए गए। जरा सोचिए, 2008 से 2025 तक इन आरोपियों को किन-किन अवस्थाओं से गुजरना पड़ा होगा। साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को तो भाजपा ने 2019 में भगवा आतंकवाद ,हिंदू आतंकवाद , संघी आतंकवाद के विरुद्ध स्वयं को देश का सबसे बड़ा झंडाबरदार साबित करने वाले दिग्विजय सिंह के विरुद्ध लोकसभा चुनाव लड़ाकर संसद बना दिया था। अन्य ऐसे सौभाग्यशाली साबित नहीं हुए। लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित को 2008 से ही निलंबन में जीवन गुजारना पड़ा। इन सबको आरंभ में महाराष्ट्र आतंक निरोधी दस्ता या एटीएस और फिर एनआईएनए  ने जैसी यंत्रणाएं दी, नदी थर्ड डिग्री का इस्तेमाल किया उसकी उसके विवरण से ही कलेजा कहां पर जाता है।

न्यायालय ने कहा है कि इन लोगों पर लगे आरोपों की पुष्टि के सबूत नहीं है। 29 सितंबर, 2008 को मालेगांव के भिखू चौक पर हुए विस्फोट में जिस मोटरसाइकिल के प्रज्ञा ठाकुर के होने की बात की गई  उसके  नंबर नकली थे तो चेचिस और इंजन तक के नंबर गायब कर दिए गए थे। कर्नल प्रसाद पुरोहित ने विस्फोट के लिए कश्मीर से आरडीएक्स लाकर अपने घर में बम बनाया इसके कोई चिन्ह नहीं थे। हां, न्यायालय ने आदेश दिया है कि सुधाकर चतुर्वेदी के घर में विस्फोटक किसने रखा इसकी जांच की जाए।  भोपाल और एक अन्य बैठक में सबके शामिल होने और विस्फोट करने की योजना का इसमें जिक्र है किंतु वहां ऐसी बातचीत के भी प्रमाण नहीं है। अगर मेजर रमेश उपाध्याय या किसी ने हिंदू राष्ट्र बनाने की बात की तो इसके आधार पर वे आतंकवादी नहीं माने जा सकते। न्यायालय में एक समय मेजर रमेश उपाध्याय ने चीखकर कहा कि मैं फौजी हूं, आतंकवादी नहीं हो सकता। उनकी कोई सुनने वाला नहीं था। फॉरेंसिक जांच की सामग्री में जालसाजी हुई। उपयुक्त पंचनामा नहीं, कोई फिंगर प्रिंट नहीं। 323 गवाह आए जो केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद 34 गवाहों ने स्वीकार किया कि उनसे झूठी गवाही दिलवा कर दस्तखत करवाए गए। कल्पना करिए जिस राजनीतिक नेतृत्व और सुरक्षा अधिकारियों के जिम्मे देश की सुरक्षा का दायित्व हो षड्यंत्र कर आतंकवाद के मामले में लोगों को फसाने में सत्ता का दुरुपयोग करने लगें तो उन्हें क्या कहा जाएग?

तत्कालीन महाराष्ट्र एटीएस के प्रमुख हेमंत करकरे अब दिवंगत हो चुके हैं। जब साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने उनको राक्षस कहकर टॉर्चर कि आप बीती सुनाई तो नेताओं, पत्रकारों, एक्टिविस्टों आदि के प्रभावी वर्ग ने विरोध किया। स्वर्गीय करकरे की  दिग्विजय सिंह के साथ बातचीत का लंबा ऑडियो वायरल हो गया। तत्काल महाराष्ट्र पुलिस के एक अधिकारी महबूब मोहव्वर ने कहा है कि उन्हें संघ प्रमुख डॉ मोहन भागवत को पकड़ने के लिए कहा गया और इससे इनकार करने पर उनके साथ बुरा बर्ताव किया। उन्होंने तत्कालीन एटीएस प्रमुख परमवीर सिंह पर आरोप लगाया कि जब उन्हें पता चला कि मुझे पूरे षडयंत्र की जानकारी है तो आरोप लगाकर फंसाया और निलंबित करवा दिया। निलंबन में उनकी सेवा निवृत्ति हो गई और उन्हें केवल 10 हजार  पेंशन मिलता है। उनका बयान न्यायालय की रिकॉर्ड में अंकित है। हालांकि पहले के उनके कुछ आप जांच पर सच साबित नहीं हुए। ऐसे कई बयान हैं जिनसे पता चला है कि संघ,  उससे जुड़े संगठनों और भाजपा नेताओं तक के नाम लेने के लिएआरोपियों और गवाहों पर दबाव डाले गए। ऐसी धमकियां दी गई ताकि उनके सामने कोई चारा न बचे। पुलिस के अंदर जिनने भी  साथ नहीं दिया वे परेशान किए गए। सोचिए केंद्र में सरकार नहीं बदलती तो क्या होता?

ध्यान रखिए, मालेगांव ऐसा अकेला मामला नहीं था। इसमें भगवा या हिंदू आतंकवाद का आरोप लगने के साथ  इसके पूर्व के दो विस्फोटो और मालेगांव प्रथम को भी हिंदू संगठनों की साजिश मानकर जांच शुरू की गई। 19 फरवरी, 2007 को 4001 अप अटारी समझौता एक्सप्रेस में हरियाणा के पानीपत जिले के चांदनी बाग पुलिस थाना में आने वाले शिव गांव के नजदीक विस्फोट हुआ था जिसमें तत्काल 68 लोगों की मृत्यु हुई तथा डेढ़ सौ से ज्यादा घायल हुए। 18 मई, 2007 को हैदराबाद के मक्का मस्जिद में विस्फोट हुआ जिसमें तत्काल नौ लोगों की मृत्यु हुई और 58 घायल हो गए थे। इन दोनों में भी हिंदू आतंकवाद के नाम से गिरफ्तार आरोपियों को न्यायालय ससम्मान आरोपों से मुक्त कर चुका है।  समझौता एवं मक्का मस्जिद दोनों में इस्लामी आतंकवादियों का नाम आया, मक्का मामले में  आंध्र एटीएस ने दो को गिरफ्तार किया और डीजीपी ने बयान दिया कि लश्कर ए तैयबा के कहने पर सिमी ने विस्फोट कराए हैं। सार्वजनिक रूप से कुछ तथ्य भी पेश किये। समझौता मामले में भी अमेरिकी एफबीआई ने लश्कर ए तैयबा के हाथ होने की ऑन रिकॉर्ड बात कही। मालेगांव प्रथम में भी पांच आरोपी गिरफ्तार हुए। तत्कालीन कर्नाटक के एसएफएल  प्रमुख पी ए मोहन ने  कई इंटरव्यू दिए जिसमें कहा कि आरोपियों ने न केवल नारको, बल्कि लाई डिटेक्टर, पोलीग्राफी सभी टेस्ट में बताया था कि हमने कैसे विस्फोट किए। तब महाराष्ट्र एटीएस द्वारा न्यायालय में प्रस्तुत आरोप पत्र में सारी बातें हैं। हिंदू आतंकवाद कहानी गढ़ने के बाद उन सबको रिहा कर दिया गया। आखिर इन हमलों में मारे गए निर्दोष लोगों के अपराधियों को सजा न दिलाने का दोषी किस मानेंगे?

तब आधे दशक के आतंकवाद पर हुए विमर्श को याद करिए। पत्र पत्रिकाओं में आलेखों, रिपोर्टों, टीवी डिबेटों, एनजीओ, अन्य संगठनों की विचार गोष्ठियों यहां तक कि संसद के अंदर भी आतंकवाद पर हिंदू संगठनों को लांछित करने का लगातार अभियान चला। इसी अभियान की एक परिणति 26 नवंबर, 2008 के भयानक मुंबई विस्फोटों को भी हिंदुओं का षड्यंत्र साबित करने की शर्मनाक कोशिश हुई।  मुंबई हमला आरएसएस की साजिश नामक पुस्तक के मुंबई विमोचन में  दिग्विजय सिंह भी थे और उनके भाषण के वीडियो देख लीजिए। तत्कालीन महाराष्ट्र पुलिस प्रमुख राकेश मारिया ने अपने संस्मरण में लिखा है कि अगर अजमल कसाब जिंदा नहीं पकड़ा जाता तो जिस तरह सभी आतंकवादियों ने हाथों में कलावा बांध रखे थे उसे भी हिंदू आतंकवादियों का ही षड्यंत्र साबित कर दिया जाता। जिन पापियों ने षड्यंत्र रचा उन्होंने वास्तव में सीमा पर आतंक के षडयंत्र रचने वालों को भी साहस दे दिया कि हमला कर हिंदू संगठनों पर इसके आरोप मढ़वा सकते हैं। पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र संघ तक में हिंदू आतंकवाद विषय को उठाया। अगर यह साबित हो जाता तो भारत का आतंकवाद विरोधी संघर्ष वैश्विक स्तर पर विफल रहता। आज देश की क्या स्थिति होती इसकी कल्पना से भय पैदा होता है। जिस साहस के साथ भारत पश्चिमी देशों को आईना दिखाता है कि आतंकवाद पर दोहरा रवैया नहीं चलेगा पाकिस्तान को घेर पता है वह संभव ही नहीं रहता। भारत का सिर्फ शर्म से झुका रहता है। इसके साथ इसका लाभ भी में देश में आतंकवाद के विरुद्ध सुरक्षा एजेंसियों ने कैसी भूमिका अपनी होगी? सच कह तो केंद्र से लेकर अनेक राज्यों तक के आतंकवादी विरोधी ढांचे की विचारधारा बदल गई।

 इन तथ्यों को देखिए और निष्कर्ष निकालिए। इन चारों विस्फोटों के अपराधी आज तक बाहर हैं और पता नहीं वे क्या-क्या कर रहे होंगे। स्वाभाविक ही किसी भारतीय की पहली प्रतिक्रिया यही होगी कि जो इन षडयंत्रों के पीछे थे उन सबको कानून के तहत कठोर सजा दिलवाई जानी चाहिए। नेताओं से लेकर सुरक्षा व प्रशासनिक अधिकारियों तथा एक्टिविस्टों तक को न्याय के दायरे में खड़ा किया जाना आवश्यक है ताकि भविष्य में कोई देश की सुरक्षा के साथ ऐसा घृणित षड्यंत्र नहीं कर सके।

अवधेश कुमार, ई-30,  गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स , दिल्ली - 110092 , मोबाइल- 9811027208

शनिवार, 2 अगस्त 2025

बलविंदर सिंह ने एनसीपी (एसपी) की मुंडका विधानसभा की जिम्मेदारी गुरप्रीत सिंह को सौंपी


संवाददाता

नई दिल्ली। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचन्द्र पवार) दिल्ली प्रदेश में सिख समाज की भागीदारी को मजबूत करते हुए मुंडका विधानसभा क्षेत्र की जिम्मेदारी गुरप्रीत सिंह जी को सौंपी गई है।

यह जिम्मेदारी आज पार्टी के दिल्ली प्रदेश उपाध्यक्ष माननीय सरदार बलविंदर सिंह जी द्वारा सौंपी गई। इस अवसर पर दिल्ली प्रदेश संयोजक माननीय डी.सी. कपिल जी एवं प्रदेश महासचिव राजेश घाघट जी भी विशेष रूप से उपस्थित रहे।

इस अवसर पर सरदार बलविंदर सिंह जी ने कहा कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचन्द्र पवार) सिख समाज को राजनीतिक, सामाजिक और संगठनात्मक स्तर पर बराबर का प्रतिनिधित्व देने के लिए संकल्पित है। दिल्ली में सिख समाज जिन समस्याओं का सामना कर रहा है—चाहे वह शिक्षा, रोजगार हो या सामाजिक न्याय—पार्टी उन मुद्दों को प्राथमिकता के आधार पर उठाएगी और हर मंच पर सिख समाज की आवाज़ को मजबूती से रखेगी।"

वहीं दिल्ली प्रदेश संयोजक माननीय डी.सी. कपिल जी ने कहा कि "राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचन्द्र पवार) हमेशा से आम जनता, पिछड़े वर्गों, किसानों, मजदूरों, युवाओं और वंचित समुदायों की आवाज़ को आगे बढ़ाने का कार्य करती रही है। पार्टी की विचारधारा समावेशी और जनकल्याणकारी है, जो समाज के हर तबके को न्याय और सम्मान देने में विश्वास रखती है। हमारा लक्ष्य है कि इस विचारधारा को हर गली, मोहल्ले और गांव-शहर तक पहुंचाया जाए, ताकि देश की राजनीति में एक सकारात्मक बदलाव लाया जा सके।"

राजेश घाघट जी, दिल्ली प्रदेश महासचिव, ने कहा कि गुरप्रीत सिंह जैसे समर्पित कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी सौंपकर पार्टी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह मेहनतकश और जमीनी कार्यकर्ताओं को महत्व देती है।

गुरप्रीत सिंह पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता हैं और सामाजिक व सिख समुदाय के मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाते आए हैं। पार्टी को विश्वास है कि उनके नेतृत्व में मुंडका विधानसभा में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचन्द्र पवार) और अधिक मज़बूती से आगे बढ़ेगी।

इस नियुक्ति से दिल्ली प्रदेश में सिख समाज के बीच पार्टी का आधार और व्यापक होगा और सबको साथ लेकर चलने की नीति को मजबूती मिलेगी।

शुक्रवार, 25 जुलाई 2025

बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण हंगामा का सच

अवधेश कुमार

बिहार में विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण या इंटेंसिव रिवीजन का इलेक्टरल रोल जिस तरह विरोध और हंगामा का विषय बना है वह अनपेक्षित कतई नहीं है। कांग्रेस पार्टी और अनेक भाजपा विरोधी दल ,एक्टिविस्ट , पत्रकार एनजीओ आदि काफी समय से चुनाव आयोग विरोधी तीखा अभियान चला रहे हैं। राहुल गांधी तो पुनरीक्षण आरंभ होने के पहले से ही आरोप लगा रहे हैं कि हेर-फेर कर भाजपा को जीताने का काम चुनाव आयोग करेगा।  विरोधी बार-बार आयोग के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय जाते और निराश वापस आते हैं । उच्चतम न्यायालय ने इस बार भी पुनरीक्षण प्रक्रिया रोकने की उनकी अपील खारिज कर दिया। हालांकि आगे वह सुनवाई के लिए सहमत हुआ है। सुनवाई के एक दिन पहले आईएनडीआईए की ओर से राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के नेतृत्व में बिहार की राजधानी पटना में चुनाव आयोग के कार्यालय तक मार्च किया गया।

वैसे इन पंक्तियों के लिखे जाने तक चुनाव आयोग के आंकड़े के अनुसार लगभग 85 प्रतिशत पुनरीक्षण फॉर्म मतदाताओं ने जमा कर दिए । चुनाव आयोग का विज्ञापन कहता है कि गणना प्रपत्र भरने की अवधि 25 जून से 26 जुलाई है और मतदाता सूची का प्रारूप प्रकाशन 1 अगस्त , 2025 को होगा। दावे और आपत्तियों की अवधि 1 अगस्त से 1 सितंबर, 2025 है और अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन 30 सितंबर, 2025 को किया जाएगा। इसका अर्थ हुआ कि किसी का नाम छूट गया तो  दावा करने के लिए एक महीने का समय है। तो बिना देखे कि किसका नाम जुड़ा ,नहीं जुड़ा इस तरह के विरोध का औचित्य क्या है? आयोग पर पहला आरोप  है कि वह इतनी जल्दी बड़े प्रदेश के मतदाताओं की सूची कैसे बना लेगा? जब 2002 में मतदाता सूची का बिहार में पुनरीक्षण हुआ था तब 15 जुलाई से 14 अगस्त यानी वर्तमान के अनुसार ही 31 दिन का समय था। क्या 22- 23 वर्ष के बाद मतदाता सूची की गहनता से जांच परख नहीं होनी चाहिए? अगर चुनाव आयोग ने इसके लिए आवश्यक जनसंपर्क और आधार कार्य नहीं किया तो आलोचना होगी। मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा है कि पिछले 4 महीने में प्रत्येक विधानसभा, जिला में सर्व दलीय बैठक की गई और लगभग 5 हजार ऐसी बैठकों में 28 हजार लोगों ने भाग लिया।‌ आयोग ने लगभग 80 हजार बीएलओ या बूथ लेवल ऑफिसर नियुक्त किए हैं जो मतदाताओं के घर पहुंच रहे है। राजनीतिक दलों ने भी 1.54 लाख बूथ लेवल एजेंट बीएलए बनाए हैं।‌ भारी संख्या में स्वयंसेवक भी सक्रिय हैं। कुल 16 करोड़ इन्यूमरेशन फॉर्म प्रकाशित किए गए। एक फॉर्म रिसिप्ट के रुप में मतदाता के पास रहेगा और दूसरा बीएलओ रखेंगे।  ऑनलाइन पोर्टल पर भी फॉर्म जमा करने की व्यवस्था है । इसलिए यह नहीं कह सकते कि ड्राइव बिल्कुल अव्यावहारिक है।

पहचान सुनिश्चित करने पर चुनाव आयोग के जोर का सबसे  तीखा विरोध हो रहा है । जिन 11 दस्तावेजों की सूची आयोग ने रखी है उसे पढ़ने पर कठिनाई का आभास होता है। पहले कुछ तथ्य पर बात करें। 1 जनवरी, 2003 की सूची में मतदाताओं की संख्या 4 करोड़ 96 लाख थी। वर्तमान में यह संख्या 7 करोड़ 89 लाख है। तो लगभग 2 करोड़ 93 लाख मतदाताओं को ही पहचान सुनिश्चित करनी होगी। जिन मतदाताओं के नाम 2003 में है उसके अलावा जिनका नाम आया उनको ही जन्मतिथि, जन्म स्थान आदि साबित करने वाले दस्तावेज देने होंगे। उनमें भी माता-पिता का नाम 2003 मतदाता सूची में है तो माता-पिता की पहचान साबित करने के लिए दस्तावेज देने की आवश्यकता नहीं। केवल 2003 वाली मतदाता सूची के उस हिस्से की कॉपी बीएलओ को देनी होगी जिसमें उनके माता-पिता का नाम लिखा है। जिनके नाम 2003 में है उन्हें केवल उसकी फोटो कॉपी बीएलओ को फॉर्म जमा करते समय देनी है जिसमें उनका नाम है।

क्या 2003 की मतदाता सूची में नाम न होने वाले के पास अगर जन्मतिथि तथा जन्म स्थान साबित करने के प्रमाण नहीं हो तो नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं होगा? इसकी आशंका है। पर आयोग का कहना है कि दस्तावेजविहीन  व्यक्ति की भारतीय पहचान को सुनिश्चित करने का काम क्षेत्र के एसडीम करेंगे और उनके कागजात का पता लगाने के लिए वालंटियर नियुक्त किए गए हैं। किसी की पहचान साबित करने का बिल्कुल दस्तावेज नहीं मिलता या उसे गली - मोहल्ले में भी कोई पहचानता नहीं है तो ऐसे लोगों का नाम काट दिया जाएगा। आयोग ने कहा है कि यदि आवश्यक दस्तावेज तथा फोटो उपलब्ध नहीं है तो प्रपत्र भरकर बीएलओ को जमा कर दें। निर्वाचक निबंधन पदाधिकारी द्वारा स्थानीय जांच या अन्य दस्तावेज के साक्ष्य के आधार पर निर्णय लिया जा सकेगा।

सामान्य तौर पर विचार करें तो मतदान की दृष्टि से बहुत ज्यादा कागजातों की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। एक समय कोई पहचान पत्र लेकर जाने की आवश्यकता नहीं थी और मतदान केंद्र पर केवल राजनीतिक दलों के पोलिंग एजेंट  बताते थे कि ये अमुक व्यक्ति हैं या नहीं। यह अत्यंत सरल व्यवस्था थी। लोकतंत्र मतदाताओं, राजनीतिक दलों और अधिकारियों सबकी नैतिकता, ईमानदारी और व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता पर निर्भर करती है। बूथ लूट से लेकर  फर्जी मतदाताओं की घटनाओं ने धीरे-धीरे पहचान सुनिश्चित करने की प्रक्रिया को जटिल बना दिया है। यह किसी के हित में नहीं किंतु वर्तमान ढांचे में इसके विकल्प की कल्पना ज्यादा चिंताजनक दिखने लगती है। बिहार में चुनाव आयोग ने यह डरावनी जानकारी दी है की पुनरीक्षण में ऐसे विदेशी नागरिक मिले जो मतदाता बन चुके हैं। उनकी जानकारी गृह मंत्रालय को दी जा रही है और नागरिकता सुनिश्चित होने के बाद ही तय होगा कि वे मतदाता रहेंगे या नहीं। राजनीतिक दलों ने इस पर भी तूफान खड़ा कर दिया । क्या यह उचित है? निस्संदेह,आधार कार्ड या राशन कार्ड बनवाना आसान नहीं होता। इसलिए चिंता का विषय है कि यह हमारी नागरिकता का प्रमाण पत्र नहीं है।आधार को सबसे सुरक्षित माना गया। देश भर में फर्जी आधार कार्ड पकड़ में आ रहे हैं। अवैध अप्रवासियों घुसपैठियों तक के आधार कार्ड बने हुए हैं। बिहार के भारी मुसलमान जनसंख्या वाले चार सीमांचल जिलों में आधार कार्ड के आंकड़े हैरत में डालते हैं । बिहार में औसत आधार कार्ड आबादी के 94% है ।  किशनगंज में 68 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है और आधार सैचुरेशन 126 प्रतिशत है,  कटिहार (44%) में 123%, अररिया (43%) में 123%, और पूर्णिया (38%) में 121% आधार सैचुरेशन है। आबादी से अधिक आधार कार्ड कैसे बने हुए हैं? पिछले वर्ष अररिया में एक बंगलादेशी घुसपैठियों पकड़ा गया जिसके पास पश्चिम बंगाल के 24 परगना से बना आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र था। बांग्लादेशी घुसपैठियों की लड़ाई केवल असम और बंगाल में नहीं बिहार के इन सीमांचल जिलों में भी रही है।

स्थानीय पुराने लोग उनके बारे में कुछ जानते हैं लेकिन ज्यादातर की कई पीढ़ी हो चुकी है और उनके अलग बस्तियों में होने के कारण पहचान मुश्किल रहती है। क्या विरोधियों के दबाव में उन सबकी जांच नहीं होनी चाहिए? संविधान की धारा 326 चुनाव आयोग को भारतीय नागरिकों को मतदाता के रूप में अंकित करने का अधिकार देता है। हालांकि नागरिकता की पहचान चुनाव आयोग की जिम्मेवारी नहीं है। इसीलिए उसने गृह मंत्रालय को मामला स्थानांतरित किया है। विरोधी चाहे इसे एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर को परोक्ष रूप से लागू करना माने या कुछ और किंतु भारतीय नागरिकों तक ही मतदान की व्यवस्था और पूरी मतदान प्रणाली की शुचिता तथा भारतीय सुरक्षा व्यवस्था की दृष्टि से सतर्कता आवश्यक है। बावजूद मेरा मानना है कि पहचान सुनिश्चित करने के कागजात के संदर्भ में स्पष्ट राष्ट्रीय नीति हो जो विदेशियों घुसपैठियों को तो सामने ले परंतु किसी पात्र भारतीय के लिए तनाव और परेशानी का कारण न बने। आधार और राशन कार्ड पर उच्चतम न्यायालय ने चुनाव आयोग को विचार करने का सुझाव दिया है। इन्हें सुरक्षित बनाया जाना अति आवश्यक है। आधार के पीछे कल्पना यही थी कि इससे अनेक कार्डों की आवश्यकता खत्म हो जाएगी। दूसरे, स्थानीय लोग  किसी के भारतीय होने की पुष्टि करते हैं तो पंचायत, प्रखंड ,अनुमंडल सबको पहचान सुनिश्चित करने के लिए दस्तावेज उपलब्ध कराने का दायित्व लेना चाहिए। 

एक बार मतदाता सूची का प्रारूप आ जाने दीजिए और देखिए कि कितने लोग पात्र लोग इससे वंचित होते हैं। अगर संख्या बहुत ज्यादा होती है तो उसके लिए आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए। जहां एक भी पात्र नागरिक सूची में स्थान पाने से वंचित नहीं हो वही एक भी अपात्र उसमें शामिल नहीं हो यह भी आयोग, राजनीतिक दलों, प्रशासन और हम सबका दायित्व है।


गुरुवार, 17 जुलाई 2025

इस्लामीकरण के भयानक छांगुर तंत्र को कैसे देखें

अवधेश कुमार 

उत्तर प्रदेश के बलरामपुर में हिंदुओं को मुसलमान बनाने का जैसा तंत्र सामने है वह देश के प्रत्येक व्यक्ति के लिए चेतावनी है। यह स्वतंत्र भारत का अब तक का एक व्यक्ति केंद्रित हिंदुओं को मुसलमान बनाने का ऐसा सबसे बड़ा तंत्र सामने आया है जो कंपनी की तरह व्यवस्थित है, जिसकी अनेक परतें हैं , जिसमें हिंदुओं को फंसाने ,बरगलाने के लिए युवक - युवतियों की तैयार फौज सक्रिय है, उनकी संख्या बढ़ाई जा रही है और तंत्र के स्थायी देशव्यापी ठोस ढांचे के रूप में विस्तृत होने की प्रक्रिया भी जारी है। छांगुर उर्फ जिंदा पीर ऊर्फ जलालुद्दीन को जिन्होंने कपड़ों की फेरी लगाते, अंगूठी, नग, माला देते देखा होगा उन्होंने सपने में भी उसके वर्तमान रूप की कल्पना नहीं की होगी। ऐसा व्यक्ति, जिसका अपने समाज में भी महत्व नहीं हो, 500 करोड़ से ज्यादा का साम्राज्य खड़ा कर ले , विदेशों में भी उसका नेटवर्क हो जाए,  हिंदू लड़कियों - महिलाओं को मुसलमान बनाता रहे और उसके विरुद्ध शिकायत करने वाले की ही शामत आ जाए तो इसके विश्लेषण के लिए शब्द ढूंढने पड़ेंगे। देश - विदेश में मोटा-मोटी तीन दर्जन बैंक खाते, जिनमें लगातार धन आ और निकल रहे होंं किसी बड़ी कंपनी की गतिविधियों जैसी है। बलरामपुर का मधुपुर गांव उत्तर प्रदेश एटीएस यानी आतंक विरोधी दस्ता, पुलिस, प्रशासनिक अधिकारियों , आयकर विभाग, ईडी से लेकर मीडिया की गतिविधियों का केंद्र बना है। प्राथमिक सूचना थी कि वह लगभग 1500 हिंदुओं को इस्लाम मजहब में ला चुका है किंतु अब कई गुना ज्यादा संख्या सामने आ सकती है। इस घटना के अभी अनेक पहलू रहस्य में हैं। यह ऐसे काफी प्रश्न उठाता है जिन पर विचार करना आवश्यक है?

उसके बारे में नियमित हैरत में डालने वाली नई जानकारियां सामने आ रहीं हैं जो धरातल पर थीं। गांव में तीन बिघे में बना हुआ 70 कमरे का आलीशान मकान जिसमें सारी आधुनिक सुख - सुविधायें और निर्माण ऐसी कि लोगों को बंद कर कुछ भी कर दिया जाए तो बाहर पता न चले। आठ बुलडोजर को 40 कमरे वाले हिस्से को तोड़ने में तीन दिन लगे। उसकी कहानी पर सहसा विश्वास नहीं होता। उसकी ताबीज़ या नगों से कुछ लोगों को कठिनाइयों से थोड़ी बहुत मुक्ति मिली तो उन्होंने छांगुर को पीर मनाना शुरू किया और उसकी ख्याति बढ़ी। पत्नी को प्रधानी का चुनाव लड़वाया , वह दो बार जीती और क्षेत्र में उसका कद बढ़ा। इसके पीछे भी कितने लोगों का दिमाग था इसकी परतें खुलनी अभी बाकी है। नीतू और नवीन के मुसलमान बनने के दस्तावेज दुबई के हैं। यह कैसे संभव हुआ? वे अनेक बार विदेश गए। दोनों के 19 बार दुबई जाने के रिकॉर्ड हैं जिनमें केवल एक बार साथ गये! अजीब रहस्य है। ईसाई मिशनरियां दलितों व जनजातियों को लक्ष्य बनाकर धर्मांतरण करतीं हैं। उनके पास हर क्षेत्र का जनांकिकीय डाटा है। उसने वहां से डाटा हासिल किया और उत्तर प्रदेश के अलावा 550 से ज्यादा जिलों की पहचान की थी जहां हिंदू युवतियों- महिलाओं को मुस्लिम बनाने का योजनाबद्ध अभियान चलना था। कुछ हजार को उतारा भी था।  सोचिए, कितनी बारीकी से वह भारत के इस्लामीकरण पर काम कर रहा था और हिंदू या गैर मुस्लिम बहुसंख्य समाज में उसका बाल तक बांका नहीं हुआ। उसके अकेले के दिमाग की बात नहीं हो सकती। क्या यह आपको नए सिरे से ऐसे तत्वों के मुकाबले के लिए  भूमिका तैयार करने की चेतावनी नहीं है?

हिंदू जाति व्यवस्था का ताना देने वाले ध्यान रखें कि बड़ी संख्या में ब्राह्मण और राजपूतों की लड़कियों ने छांगुर तंत्र के प्रभाव- दबाव में इस्लाम कबूल किया है। नीतू वोरा और नवीन वोरा ही नसरीन और जमालुद्दीन कैसे बन गए? इनके मामले में जाति पहलू नहीं है। मुंबई में व्यापार करने वाले दोनों पति-पत्नी कठिनाई में संपर्क में आए। वह मुंबई जाने पर उन्हीं के यहां ठहरने लगा। इन दोनों ने तय कर लिया कि गांव में उसके साथ ही रहना है और इसलिए संपत्ति बेची। छांगुर की हिंदुओं के इस्लामीकरण की कल्पना को साकार करने के लिए जिंदगी लगा दी। घर के साथ शहर की जमीन, दूकानें भी नीतू के नाम है। इनके खातों में ही ज्यादा धन आए और निकले। कोई अपने विचार से मजहब बदले यह उसका अधिकार है। किंतु धन ,बाहुबल और हर तरीके से जाल में लाकर , विवश कर इस्लामीकरण का यह तंत्र अपराधियों माफियाओं का गिरोह जैसा था।आम लोगों का उसमें फंसकर विवश हो जाना आश्चर्य का विषय नहीं है। शायद छांगुर का भयानक तंत्र कायम रहता यदि चंगुल में फंसी कुछ लड़कियां, महिलायें बाहर नहीं आती। एक घटना में अनाम से संगठन विश्व हिंदू रक्षा परिषद ने जब लखनऊ में कुछ की हिंदू धर्म में वापसी का हवन किया और मीडिया में बातें आई तब देश के संज्ञान में आया कि छांगुर इन सबके पीछे है।

यह स्थिति डराने के साथ खीझ भी पैदा करती है कि एक व्यक्ति सरेआम हिन्दुओं को मुस्लिम बनाने की इस्लामी कॉर्पोरेट शैली में कंपनी खड़ी कर उत्तर प्रदेश से विदेश तक विस्तारित कर लेता है और पुलिस, प्रशासन, संगठनों, जनप्रतिनिधियों को इतने वर्षों तक पता नहीं चलता। उसने मुख्य मार्ग से अपने किले तक 500 मीटर सड़क बना लिया। 50 कमांडो तैयार किए जो खुलेआम चलते थे। ऐसा संभव नहीं कि लोग पुलिस, प्रशासन, जनप्रतिनिधियों तक शिकायत लेकर नहीं गये हों। पुलिस प्रशासन में हैसियत ऐसी कि छांगुर का सहयोगी भागकर  पुलिस में शिकायत किया, पर  उसके विरुद्ध ही धारा 307 के तहत मुकदमा दर्ज हो गया। एक स्थानीय मुस्लिम उसके बारे में पत्र लिखते रहे लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई। उसके खातों में विदेश से पैसे आते रहे,  उसके लोग असामान्य रूप से विदेश जाते- आते रहे और केंद्रीय एजेंसियों के कान खड़े नहीं हुए। तो इसके अर्थ क्या हैं?  प्रदेश के जितने पुलिस प्रशासन के लोगों का नाम आ रहा है वे सब हिंदू हैं। राजस्थान के उदयपुर के स्वर्गीय कन्हैयालाल की शिकायत भी पुलिस ने दर्ज नहीं की और गला काट कर उनकी हत्या हो गई। बिहार में 3 वर्ष पहले पीएफआई के 2047 तक भारत को गजवा ए हिंद बनाने के तंत्र मामले में भी फुलवारी शरीफ के मुस्लिम पुलिस अधिकारी के मोबाइल पर खतरनाक मैसेज आया, पर  उसकी शिकायत को फाइलों में बंद कर दिया गया। ऐसा अनेक मामलों में होता है। यह सच है कि केंद्र और अनेक प्रदेशों में भाजपा की सरकारें आने के बाद स्थिति बदली है और आज केंद्र तथा प्रदेश की भाजपा सरकार के कारण ही  कार्रवाई संभव हो सकी। दूसरी सरकारों में छांगुर और उसके मजहबी उन्मादी सहयोगी इस्लामीकरण का पूरा माफिया तंत्र कायम कर चुके होते। बावजूद स्वीकारना होगा कि अभी भी मजहबी मतांतरण, लव जेहाद, मजार, मदरसों के नाम जमीन कब्जा करने आदि अनेक मामलों की आरंभिक शिकायत पुलिस प्रशासन गंभीरता से नहीं लेती, प्रायः संगठनों, राजनीति का रवैया भी उत्साहजनक नहीं रहता तथा उनके विरुद्ध काम करने वालों के जीवन में ही संकट पैदा हो जाते हैं।

 ट्रेजेडी देखिए, अभी तक भाजपा विरोधी पार्टियों , नेताओं, एक्टिविस्टों मीडिया के पुरोधाओं में से किसी ने इस पर समान्य विरोधी प्रतिक्रिया भी व्यक्त नहीं की है। क्या निर्दोष, निरपराध हिंदू लड़कियों महिलाओं की इज्जत, गरिमा , उनके मानवाधिकार का महत्व नहीं? इसका उत्तर उनसे मांगा जाना चाहिए। ऐसे मामलों में एकमात्र भाजपा ही हिंदुओं के साथ खड़ी दिखती है। बावजूद उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार के अंदर ऐसा होना बताता है कि पूरे एप्रोच में आमूल बदलाव की आवश्यकता है। भारत में इस्लामिक कट्टरता का मुख्य आधार उत्तर प्रदेश है। पुलिस प्रशासन का भ्रष्टाचार, अनेक नेताओं की दिशाहीनता तथा कायरता ही इसके पीछे मूल कारण है। मदरसों के सर्वेक्षणों में भी भ्रष्टाचार ने कालिख पोत दिया। मदरसों गैर निबंधित होना सबसे छोटा पहलू था। मुख्य पहलू यह है कि छोटे-छोटे मदरसा चलाने वाले मौलवी भी इतनी विदेश यात्राएं क्यों और कैसे करते हैं, उनके पास सुख -सुविधा कहां से आई? कुछ वर्षों के उनके पासपोर्ट वीजा तथा नामी बेनामी संपत्तियों पर नजर डालने की आवश्यकता थी है।  भारत के हिंदुओं या सनातनियों को समझ में आना चाहिए कि चारों तरफ उनके विरुद्ध अलग-अलग तंत्र के रूप में घात लगाए हर अस्तर से शक्तिशाली शिकारियों का झुंड बैठा है। आप चौकन्ने रहकर उनके मुकाबले के लिए तैयार नहीं है तो फिर कोई सरकार या व्यवस्था आपको हिंदू या सनातनी के रूप में बचा नहीं सकती। 

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स ,दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208

गुरुवार, 10 जुलाई 2025

शताब्दी वर्ष में समाज परिवर्तन के लिए सक्रिय संघ

अवधेश कुमार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजधानी दिल्ली में 4 से 6 जुलाई तक आयोजित तीन दिवसीय अखिल भारतीय प्रांत प्रचारक बैठक वैसे तो राजनीतिक दलों एवं मीडिया के लिए किसी हलचल मचाने वाले समाचार का कारण नहीं बना, पर इसके महत्व से इनकार नहीं किया जा सकता। संघ ने संगठन की दृष्टि से पूरे देश को 11 क्षेत्र एवं 46 प्रांतों में बांटा है। बैठक में सरसंघचालक, सरकार्यवाह एवं सहकार्यवाह सहित केंद्रीय पदाधिकारियों, सभी प्रांत प्रचारक,  सह प्रांत प्रचारक, सभी क्षेत्र प्रचारक, सह क्षेत्र प्रचारक के साथ 32 संघ प्रेरित विविध संगठनों के अखिल भारतीय संगठन मंत्री शामिल हों तो इसका महत्व समझ में अपने आप आ जाता है। यानी संघ और इससे जुड़े संगठनों का संपूर्ण संघ प्रतिनिधि नेतृत्व की वहां उपस्थिति केवल मिलने जुलने के लिए तो नहीं हो सकती। संघ का गहराई से अध्ययन करने वाले या निकट से उसकी गतिविधियों पर निष्पक्ष दृष्टि रखने वाले जानते हैं कि बैठकों के सभी सत्रों के विषय एवं प्रारुप निर्धारित होते हैं। विरोधियों के तीखे तेवरों के विपरीत बैठक हमेशा शांत संतुलित व्यवस्थित माहौल में संपन्न होता है। इसमें सामान्य दलीय राजनीति पर विचार के लिए गुंजाइश नहीं होती है। जितनी जानकारी है भाजपा अध्यक्ष के चुनाव को लेकर बाहर की उत्कंठा के विपरीत यह चर्चा में भी नहीं आया। संघ के वर्ष में कुछ निश्चित आयोजन हैं जिनमें प्रांत प्रचारक बैठक भी शामिल है। मार्च में अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक तथा अप्रैल से जून तक प्रशिक्षण वर्गों के संपन्न होने के बाद यह बैठक आयोजित होती है। इसलिए इसमें देश भर के पूरे वृतांत तथा भविष्य के संगठन की योजनाओं पर फोकस रहता है।

वैसे भी संघ का मुख्य फोकस संगठन, समाज जागरण तथा समाज परिवर्तन है तो इसका फोकस वही रहेगा। जैसा हम जानते हैं इस वर्ष विजयादशमी यानी 2 अक्टूबर से संघ शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहा है। पिछले काफी समय से आगामी 2 अक्टूबर से लेकर 2 अक्टूबर 2026 तक इसके आयोजनों और कार्यक्रमों को लेकर गंभीर चर्चा हमारे सामने आते रहे हैं। स्वाभाविक ही इस समय की अधिकतर बैठकों का केंद्र बिंदु शताब्दी वर्ष ही होगा। जितनी जानकारी है संघ अन्य संगठनों या राजनीतिक दलों की तरह शताब्दी वर्ष पर  कोई एक बड़ा आयोजन करने की जगह इसका उपयोग संगठन विसृतार, हिंदुत्व केंद्रित विचार को अधिकतम लोगों तक पहुंचाने तथा समाज परिवर्तन की दृष्टि से कार्यक्रमों के आयोजनों के लिए कर रहा है। योजना अनुसार नागपुर में 2 अक्टूबर को वार्षिक विजयादशमी उत्सव में सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत की हर वर्ष की तरह उपस्थिति एवं संबोधन के साथ उसी दिन देशभर में शाखा/मंडल/बस्ती के स्तर पर उत्सव आयोजित होंगे।

विशेष अभियानों के तहत स्वयंसेवक घर-घर जाकर संपर्क करेंगे। गृह संपर्क अभियान के दौरान स्वयंसेवक संघ साहित्य देकर बातचीत करेंगे। सरसंघचालक मोहन भागवत का विशेष संवाद कार्यक्रम चाऱ शहरों दिल्ली, मुंबई, कोलकता, बैंगलुरु में आयोजित होगा, जिसमें आमंत्रित लोगों के समक्ष अपनी बात रखेंगे तथा संवाद भी होगा। संघ ने शताब्दी वर्ष में समाज परिवर्तन की दृष्टि से पांच परिवर्तन का विचार रखा है जिसमें सामाजिक समरसता,परिवार यानी कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण, स्व का बोध और नागरिक कर्तव्य शामिल है। 

दरअसल, मोहन भागवत ने 2021 में समाज परिवर्तन की दृष्टि से ये पांच विषय सामने रखे थे और संघ इस पर काम कर रहा है। इससे संबंधित अलग-अलग सामाजिक सद्भाव सम्मेलन युवाओं का परिवारों का तथा इसी दृष्टि से संवाद आदि के सतत् कार्यक्रम हैं। स्वाभाविक ही प्रांत प्रचारक बैठक में कहां-कहां कितने और कौन से कार्यक्रम हो सकते हैं तथा उनमें अपेक्षित संख्या की कितनी संभावना होगी, व्यवस्था कैसे हो रही है आदि विषय विंदूवार चर्चा में आए। बैठक से निकलकर सभी प्रांत और क्षेत्र प्रचारक कार्यक्रमों की पूर्व तैयारी की दृष्टि से बैठकें, एकत्रीकरण आरंभ कर देंगे।

इनकी गहराई से समीक्षा करें तो साफ हो जाएगा कि समाज और सत्ता में व्याप्त विद्रूपताओं की निंदा, आलोचना, विरोध से परे समाज की सहभागिता से सकारात्मक परिवर्तन का उद्देश्य ही इसके पीछे है। जाति भेद से परे हटकर सामाजिक समरसता के अंतर्गत समाज में सद्भाव बढ़े, परिवारों की पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली बने, हममें स्व-बोध यानी अपने राष्ट्र की महान विरासत, महान सभ्यता-संस्कृति-धर्म-अध्यात्म, फोटो में व्याप्त समाज संगठन उपलब्धियां आदि के प्रति गौरव व्याप्त हो, कुटुंब यानी परिवार के सभी सदस्यों-संबंधियों में आत्मीयता व संस्कारों की वृद्धि हो तथा लोग नागरिक के नाते अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो जाएं तो धीरे-धीरे संपूर्ण समाज और देश की स्थिति कितनी सकारात्मक, सहकारी और सशक्त होगी इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। पहले से इन विषयों पर चर्चाएं हो रही हैं, उनके साहित्य आदि प्रकाशित हैं, बैठकों में भी इन पर मंथन हो रहा है और प्रांत प्रचारक बैठक में संगठन के स्तर पर इसे आगे बढ़ाने की योजना तय हो गई है इसलिए कार्यक्रम भी संपन्न होंगे। विश्व में ऐसा कोई संगठन नहीं होगा जो जितना तय करें सब कुछ उसी के अनुरूप हो जाए और त्वरित लक्ष्यों की प्राप्ति भी। इसलिए यह नहीं कह सकते कि सब कुछ कल्पना के अनुरूप भी हो जाएगा और सारे लक्ष्य भी प्राप्त हो जाएंगे किंतु उस दिशा में कुछ हद तक सफलता मिलेगी यह निश्चित है। जितनी संख्या में व्यक्तियों के अंदर पांच परिवर्तन के लिए भाव जाएंगे वह अपने स्तर पर कुछ ना कुछ करेंगे और समाज के स्तर पर जगह-जगह इन सबके सुखद परिणाम आते रहेंगे। 

वास्तव में संघ शताब्दी वर्ष की योजना ऐसा नहीं है जिन पर एक वर्ष तक काम किया और फिर।। यह सतत आगे बढ़ते रहने के कार्यक्रम हैं। फिर जिन लोगों से सब ज्ञान के दौरान संपर्क होगा उनके आगे शाखों प्रशिक्षकों आदि की दृष्टि से भी उपयोग की योजनाएं हैं। यानी जो जुड़ें वह छूट नहीं इसकी कोशिश भी होगी। त्वरित परिवर्तन तात्कालिक आंदोलनों  से होती है किंतु स्थायी सतत् परिवर्तन और प्राप्तियों के लिए अनवरत ऐसे ही समाज के अंदर स्वत: अभियान संचालित होते रहना आवश्यक होता है। संघ की यही कार्य शैली दिखती है।

चूंकि स्थापना के कुछ समय बाद से ही संघ के नियमित हर वर्ष प्रशिक्षण वर्ग आयोजित होते हैं, इसलिए उसे स्वयंसेवक और कार्यकर्ता के रूप में युवा वर्ग उपलब्ध होते हैं।  इसी वर्ष आयोजित  कुल 100 प्रशिक्षण वर्गों में से 40 वर्ष से कम आयु वर्ग के स्वयंसेवकों के लिए आयोजित 75 में 17, 609 स्वयंसेवकों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया जबकि प्रकार 40 से 60 वर्ष की आयु के 25 वर्गों में 4270 शिक्षार्थियों ने भाग लिया। इन वर्गों में देश के 8812 स्थानों से स्वयंसेवकों की सहभागिता रही। आप चाहे संघ की कितनी कटु आलोचना करिए किंतु सोचिए, क्या भारत या दुनिया में कोई दूसरा संगठन इस स्तर पर नियमित प्रशिक्षण वर्ग चलाता है? स्वयंसेवकों में केवल शाखा के कार्यक्रम तक का ही प्रशिक्षण नहीं होता उनकी रुचि के अनुसार सेवा या अन्य क्षेत्रों में जो कार्य समाज की दृष्टि से वे कर सकते हैं उनसे जुड़े कुछ निश्चित क्षेत्रों में कार्य करने में सक्षम बनाने योग्य या उन्नयन का प्रशिक्षण मिलता है। 

बैठक है तो इस बीच देश और दुनिया की घटनाएं भी चर्चा में अवश्य आएंगी। अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील अंबेडकर ने पत्रकारों के प्रश्न के उत्तर में कहा कि भारत की सभी भाषाएं राष्ट्र भाषाएं हैं, और संघ का मानना है कि प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए। भाषा संबंधी संघ की सोच अनेक बार सार्वजनिक रूप से रखी जा चुकी है फिर भी विरोधी यही कहते हैं कि संघ केवल हिंदी की ही बात करता है। एक बार पुनः स्पष्ट करने के बाद शायद दुष्प्रचार करने वाले बाज आयें। 

पहलगाम हमले से लेकर ऑपरेशन सिंदूर के दौरान के स्थानीय अनुभवों तथा लोगों की प्रतिक्रियाओं की इससे ज्यादा अधिकृत जानकारी किसी संगठन को नहीं प्राप्त हो सकती। इस फीडबैक से भविष्य में ऐसी चुनौतियों से निपटने को लेकर समाज व संगठन के साथ सरकार के लिए भी कुछ दिशा मिलेगी। प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का विराट स्वरूप प्रदर्शित हुआ। उससे बने वातावरण को सनातन आध्यात्मिक मूल्यों के साथ हिंदू समाज की एकता के सुदृढ़ीकरण की दृष्टि से क्या हो रहा ,है क्या कर सकते हैं निश्चय ही ये महत्वपूर्ण विषय हैं हर बैठक में इसकी चर्चा हो रही है। डिजिटल माध्यम के नकारात्मक उपयोग से समाज के अंदर बढ़ रही समस्याओं का समाधान कैसे हो इस पर भी चर्चा होने की सूचना है। जैसा ऊपर बताया गया पूरी बैठक संगठन और कार्यक्रमों पर केंद्रित रही, संघ और विविध संगठनों के संगठन से संबंधित पदाधिकारी उपस्थित रहे, इसलिए इसका प्रतिफल धरातल पर दिखाई देगा।

http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/