भारत ने 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने और दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभरने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। विकसित भारत का यह vision निरंतर आर्थिक विकास, राजनीतिक स्थिरता, सामाजिक सद्भाव, बड़े पैमाने पर रोजगार और देश की युवा आबादी के प्रभावी उपयोग की मांग करता है। साथ ही, राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों की बढ़ती संख्या विपक्षी दलों, छात्रों और युवाओं के कुछ वर्गों को सड़कों पर ला रही है। इससे एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है: यदि राजनीतिक टकराव संसद से बाहर निकलकर लगातार सड़कों पर बढ़ता रहा, तो क्या भारत विकास की गति बनाए रख पाएगा?
शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों में कुछ भी अलोकतांत्रिक नहीं है। वास्तव में, असहमति का अधिकार लोकतंत्र की प्रमुख शक्तियों में से एक है। नागरिकों को सरकारी फैसलों पर सवाल उठाने, जवाबदेही की मांग करने और अपने जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दों को उठाने का पूरा अधिकार है। लेकिन जब हर राजनीतिक मतभेद लंबे टकराव में बदलने लगे, तो यह चिंता का विषय बन जाता है। मतदाता सूचियों, बेरोजगारी और अन्य मुद्दों पर हालिया प्रदर्शनों ने दिखाया है कि किस तरह कोई विशेष शिकायत तेजी से बड़े राजनीतिक आंदोलन का रूप ले सकती है।
छात्रों और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर सीजेपी का हालिया बड़ा प्रदर्शन इसका एक उदाहरण था। युवा पीढ़ी को प्रभावित करने वाली शिकायतों को लेकर शुरू हुआ यह प्रदर्शन उस समय बड़े टकराव में बदल गया, जब प्रदर्शनकारी संसद की ओर बढ़ने लगे। इसके बाद हुई पुलिस कार्रवाई ने राजनीतिक बहस को और तीखा कर दिया। मूल मुद्दे तक सीमित रहने के बजाय यह पूरा घटनाक्रम सरकार और विपक्षी दलों के बीच व्यापक टकराव में बदल गया। ऐसे घटनाक्रम दर्शाते हैं कि आज के भारत में युवाओं से जुड़े मुद्दों में कितनी बड़ी राजनीतिक क्षमता है।
स्थिति ने तब एक और राजनीतिक रूप ले लिया, जब युवा प्रदर्शनकारियों के समर्थन और पुलिस कार्रवाई के विरोध में कांग्रेस नेताओं ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन किया। वरिष्ठ विपक्षी नेताओं की भागीदारी ने इस मुद्दे को युवा प्रदर्शन से आगे बढ़ाकर सीधे राजनीतिक टकराव में बदल दिया। विपक्षी दलों को प्रदर्शन करने का पूरा लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन ऐसी घटनाएं यह भी रेखांकित करती हैं कि राजनीतिक नेतृत्व को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वास्तविक शिकायतें सरकार और विपक्ष के बीच स्थायी टकराव का कारण न बन जाएं।
ताजा उदाहरण 6 अक्टूबर को सामने आया, जब राहुल गांधी ने अन्य विपक्षी नेताओं और सांसदों के साथ मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण के मुद्दे को सीधे सड़कों पर उठाया। संसद से निर्वाचन आयोग की ओर मार्च करने के बाद प्रदर्शनकारी नेता आकाशवाणी भवन पहुंचे और उनका मार्च रोके जाने के बाद वहीं धरने पर बैठ गए। इस घटना ने एक बार फिर एसआईआर विवाद को राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया और दिखाया कि इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिष्ठान कितना गहराई से विभाजित है।
एसआईआर विवाद निस्संदेह संवेदनशील है, क्योंकि मतदाता सूचियां मतदान के मौलिक अधिकार से सीधे जुड़ी हैं। विपक्षी दलों ने वास्तविक मतदाताओं के नाम छूट जाने की आशंका जताई है, जबकि निर्वाचन आयोग का कहना है कि पुनरीक्षण का उद्देश्य सटीक और विश्वसनीय मतदाता सूचियां सुनिश्चित करना है। ऐसे विवाद का समाधान पारदर्शिता, सत्यापन और संस्थागत संवाद के माध्यम से होना चाहिए। प्रत्येक वास्तविक मतदाता को यह भरोसा होना चाहिए कि उसका नाम मतदाता सूची में बना रहेगा और किसी भी गलती को सुधारने के लिए आसान व्यवस्था उपलब्ध होगी।
चुनावी राजनीति से परे बेरोजगारी कहीं बड़ी और लंबे समय से चली आ रही चुनौती है। यदि शिक्षा पूरी करने के बाद लाखों युवाओं को उपयुक्त रोजगार नहीं मिलता, तो भारत का जनसांख्यिकीय लाभ बोझ में बदल सकता है। वर्षों तक सरकारी भर्ती के अवसर की प्रतीक्षा करने वाला या उपयुक्त निजी क्षेत्र की नौकरी तलाशने वाला स्नातक आर्थिक विकास का आकलन स्वाभाविक रूप से अपने अनुभव के आधार पर करेगा, न कि केवल जीडीपी के आंकड़ों से। इसलिए देश को केवल आर्थिक विस्तार नहीं, बल्कि ऐसा रोजगार-केंद्रित विकास मॉडल चाहिए, जो बढ़ते कार्यबल के लिए पर्याप्त अवसर पैदा कर सके।
राजनीतिक विभाजन के दोनों पक्षों की भी जिम्मेदारी है। सरकार को वास्तविक शिकायतों को सुनना, विवादास्पद फैसलों को अधिक प्रभावी ढंग से समझाना और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि संस्थागत व्यवस्थाएं तेजी से प्रतिक्रिया दें। विपक्ष को विरोध करने और सरकार को जवाबदेह ठहराने का अधिकार है, लेकिन उसे व्यावहारिक विकल्प भी प्रस्तुत करने चाहिए और संसद तथा अन्य लोकतांत्रिक संस्थाओं का प्रभावी उपयोग करना चाहिए। लोकतंत्र तब मजबूत होता है, जब विरोध प्रदर्शन संवाद और समाधान का मार्ग खोलते हैं, न कि टकराव के अंतहीन चक्र में बदल जाते हैं।
2047 के विकसित भारत की यात्रा अंततः इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत आर्थिक महत्वाकांक्षा को राजनीतिक परिपक्वता और सामाजिक सद्भाव के साथ किस तरह जोड़ता है। दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना एक बड़ी उपलब्धि होगी, लेकिन वास्तव में विकसित भारत को गुणवत्तापूर्ण रोजगार, बेहतर शिक्षा, आधुनिक बुनियादी ढांचा, तकनीकी अवसर और बेहतर जीवन स्तर भी सुनिश्चित करना होगा। भारत के युवाओं की ऊर्जा को आदर्श रूप से कक्षाओं, प्रयोगशालाओं, कारखानों, खेतों, व्यवसायों और स्टार्टअप्स में लगाया जाना चाहिए, न कि निराशा के कारण उन्हें लगातार सड़कों पर रहने के लिए मजबूर होना पड़े। विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा बने रहेंगे, लेकिन बड़ी राष्ट्रीय चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि असहमति संवाद में बदले, संवाद समाधान पैदा करे और समाधान भारत को विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ाते रहें।

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