गुरुवार, 10 जुलाई 2025

शताब्दी वर्ष में समाज परिवर्तन के लिए सक्रिय संघ

अवधेश कुमार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजधानी दिल्ली में 4 से 6 जुलाई तक आयोजित तीन दिवसीय अखिल भारतीय प्रांत प्रचारक बैठक वैसे तो राजनीतिक दलों एवं मीडिया के लिए किसी हलचल मचाने वाले समाचार का कारण नहीं बना, पर इसके महत्व से इनकार नहीं किया जा सकता। संघ ने संगठन की दृष्टि से पूरे देश को 11 क्षेत्र एवं 46 प्रांतों में बांटा है। बैठक में सरसंघचालक, सरकार्यवाह एवं सहकार्यवाह सहित केंद्रीय पदाधिकारियों, सभी प्रांत प्रचारक,  सह प्रांत प्रचारक, सभी क्षेत्र प्रचारक, सह क्षेत्र प्रचारक के साथ 32 संघ प्रेरित विविध संगठनों के अखिल भारतीय संगठन मंत्री शामिल हों तो इसका महत्व समझ में अपने आप आ जाता है। यानी संघ और इससे जुड़े संगठनों का संपूर्ण संघ प्रतिनिधि नेतृत्व की वहां उपस्थिति केवल मिलने जुलने के लिए तो नहीं हो सकती। संघ का गहराई से अध्ययन करने वाले या निकट से उसकी गतिविधियों पर निष्पक्ष दृष्टि रखने वाले जानते हैं कि बैठकों के सभी सत्रों के विषय एवं प्रारुप निर्धारित होते हैं। विरोधियों के तीखे तेवरों के विपरीत बैठक हमेशा शांत संतुलित व्यवस्थित माहौल में संपन्न होता है। इसमें सामान्य दलीय राजनीति पर विचार के लिए गुंजाइश नहीं होती है। जितनी जानकारी है भाजपा अध्यक्ष के चुनाव को लेकर बाहर की उत्कंठा के विपरीत यह चर्चा में भी नहीं आया। संघ के वर्ष में कुछ निश्चित आयोजन हैं जिनमें प्रांत प्रचारक बैठक भी शामिल है। मार्च में अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक तथा अप्रैल से जून तक प्रशिक्षण वर्गों के संपन्न होने के बाद यह बैठक आयोजित होती है। इसलिए इसमें देश भर के पूरे वृतांत तथा भविष्य के संगठन की योजनाओं पर फोकस रहता है।

वैसे भी संघ का मुख्य फोकस संगठन, समाज जागरण तथा समाज परिवर्तन है तो इसका फोकस वही रहेगा। जैसा हम जानते हैं इस वर्ष विजयादशमी यानी 2 अक्टूबर से संघ शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहा है। पिछले काफी समय से आगामी 2 अक्टूबर से लेकर 2 अक्टूबर 2026 तक इसके आयोजनों और कार्यक्रमों को लेकर गंभीर चर्चा हमारे सामने आते रहे हैं। स्वाभाविक ही इस समय की अधिकतर बैठकों का केंद्र बिंदु शताब्दी वर्ष ही होगा। जितनी जानकारी है संघ अन्य संगठनों या राजनीतिक दलों की तरह शताब्दी वर्ष पर  कोई एक बड़ा आयोजन करने की जगह इसका उपयोग संगठन विसृतार, हिंदुत्व केंद्रित विचार को अधिकतम लोगों तक पहुंचाने तथा समाज परिवर्तन की दृष्टि से कार्यक्रमों के आयोजनों के लिए कर रहा है। योजना अनुसार नागपुर में 2 अक्टूबर को वार्षिक विजयादशमी उत्सव में सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत की हर वर्ष की तरह उपस्थिति एवं संबोधन के साथ उसी दिन देशभर में शाखा/मंडल/बस्ती के स्तर पर उत्सव आयोजित होंगे।

विशेष अभियानों के तहत स्वयंसेवक घर-घर जाकर संपर्क करेंगे। गृह संपर्क अभियान के दौरान स्वयंसेवक संघ साहित्य देकर बातचीत करेंगे। सरसंघचालक मोहन भागवत का विशेष संवाद कार्यक्रम चाऱ शहरों दिल्ली, मुंबई, कोलकता, बैंगलुरु में आयोजित होगा, जिसमें आमंत्रित लोगों के समक्ष अपनी बात रखेंगे तथा संवाद भी होगा। संघ ने शताब्दी वर्ष में समाज परिवर्तन की दृष्टि से पांच परिवर्तन का विचार रखा है जिसमें सामाजिक समरसता,परिवार यानी कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण, स्व का बोध और नागरिक कर्तव्य शामिल है। 

दरअसल, मोहन भागवत ने 2021 में समाज परिवर्तन की दृष्टि से ये पांच विषय सामने रखे थे और संघ इस पर काम कर रहा है। इससे संबंधित अलग-अलग सामाजिक सद्भाव सम्मेलन युवाओं का परिवारों का तथा इसी दृष्टि से संवाद आदि के सतत् कार्यक्रम हैं। स्वाभाविक ही प्रांत प्रचारक बैठक में कहां-कहां कितने और कौन से कार्यक्रम हो सकते हैं तथा उनमें अपेक्षित संख्या की कितनी संभावना होगी, व्यवस्था कैसे हो रही है आदि विषय विंदूवार चर्चा में आए। बैठक से निकलकर सभी प्रांत और क्षेत्र प्रचारक कार्यक्रमों की पूर्व तैयारी की दृष्टि से बैठकें, एकत्रीकरण आरंभ कर देंगे।

इनकी गहराई से समीक्षा करें तो साफ हो जाएगा कि समाज और सत्ता में व्याप्त विद्रूपताओं की निंदा, आलोचना, विरोध से परे समाज की सहभागिता से सकारात्मक परिवर्तन का उद्देश्य ही इसके पीछे है। जाति भेद से परे हटकर सामाजिक समरसता के अंतर्गत समाज में सद्भाव बढ़े, परिवारों की पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली बने, हममें स्व-बोध यानी अपने राष्ट्र की महान विरासत, महान सभ्यता-संस्कृति-धर्म-अध्यात्म, फोटो में व्याप्त समाज संगठन उपलब्धियां आदि के प्रति गौरव व्याप्त हो, कुटुंब यानी परिवार के सभी सदस्यों-संबंधियों में आत्मीयता व संस्कारों की वृद्धि हो तथा लोग नागरिक के नाते अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो जाएं तो धीरे-धीरे संपूर्ण समाज और देश की स्थिति कितनी सकारात्मक, सहकारी और सशक्त होगी इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। पहले से इन विषयों पर चर्चाएं हो रही हैं, उनके साहित्य आदि प्रकाशित हैं, बैठकों में भी इन पर मंथन हो रहा है और प्रांत प्रचारक बैठक में संगठन के स्तर पर इसे आगे बढ़ाने की योजना तय हो गई है इसलिए कार्यक्रम भी संपन्न होंगे। विश्व में ऐसा कोई संगठन नहीं होगा जो जितना तय करें सब कुछ उसी के अनुरूप हो जाए और त्वरित लक्ष्यों की प्राप्ति भी। इसलिए यह नहीं कह सकते कि सब कुछ कल्पना के अनुरूप भी हो जाएगा और सारे लक्ष्य भी प्राप्त हो जाएंगे किंतु उस दिशा में कुछ हद तक सफलता मिलेगी यह निश्चित है। जितनी संख्या में व्यक्तियों के अंदर पांच परिवर्तन के लिए भाव जाएंगे वह अपने स्तर पर कुछ ना कुछ करेंगे और समाज के स्तर पर जगह-जगह इन सबके सुखद परिणाम आते रहेंगे। 

वास्तव में संघ शताब्दी वर्ष की योजना ऐसा नहीं है जिन पर एक वर्ष तक काम किया और फिर।। यह सतत आगे बढ़ते रहने के कार्यक्रम हैं। फिर जिन लोगों से सब ज्ञान के दौरान संपर्क होगा उनके आगे शाखों प्रशिक्षकों आदि की दृष्टि से भी उपयोग की योजनाएं हैं। यानी जो जुड़ें वह छूट नहीं इसकी कोशिश भी होगी। त्वरित परिवर्तन तात्कालिक आंदोलनों  से होती है किंतु स्थायी सतत् परिवर्तन और प्राप्तियों के लिए अनवरत ऐसे ही समाज के अंदर स्वत: अभियान संचालित होते रहना आवश्यक होता है। संघ की यही कार्य शैली दिखती है।

चूंकि स्थापना के कुछ समय बाद से ही संघ के नियमित हर वर्ष प्रशिक्षण वर्ग आयोजित होते हैं, इसलिए उसे स्वयंसेवक और कार्यकर्ता के रूप में युवा वर्ग उपलब्ध होते हैं।  इसी वर्ष आयोजित  कुल 100 प्रशिक्षण वर्गों में से 40 वर्ष से कम आयु वर्ग के स्वयंसेवकों के लिए आयोजित 75 में 17, 609 स्वयंसेवकों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया जबकि प्रकार 40 से 60 वर्ष की आयु के 25 वर्गों में 4270 शिक्षार्थियों ने भाग लिया। इन वर्गों में देश के 8812 स्थानों से स्वयंसेवकों की सहभागिता रही। आप चाहे संघ की कितनी कटु आलोचना करिए किंतु सोचिए, क्या भारत या दुनिया में कोई दूसरा संगठन इस स्तर पर नियमित प्रशिक्षण वर्ग चलाता है? स्वयंसेवकों में केवल शाखा के कार्यक्रम तक का ही प्रशिक्षण नहीं होता उनकी रुचि के अनुसार सेवा या अन्य क्षेत्रों में जो कार्य समाज की दृष्टि से वे कर सकते हैं उनसे जुड़े कुछ निश्चित क्षेत्रों में कार्य करने में सक्षम बनाने योग्य या उन्नयन का प्रशिक्षण मिलता है। 

बैठक है तो इस बीच देश और दुनिया की घटनाएं भी चर्चा में अवश्य आएंगी। अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील अंबेडकर ने पत्रकारों के प्रश्न के उत्तर में कहा कि भारत की सभी भाषाएं राष्ट्र भाषाएं हैं, और संघ का मानना है कि प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए। भाषा संबंधी संघ की सोच अनेक बार सार्वजनिक रूप से रखी जा चुकी है फिर भी विरोधी यही कहते हैं कि संघ केवल हिंदी की ही बात करता है। एक बार पुनः स्पष्ट करने के बाद शायद दुष्प्रचार करने वाले बाज आयें। 

पहलगाम हमले से लेकर ऑपरेशन सिंदूर के दौरान के स्थानीय अनुभवों तथा लोगों की प्रतिक्रियाओं की इससे ज्यादा अधिकृत जानकारी किसी संगठन को नहीं प्राप्त हो सकती। इस फीडबैक से भविष्य में ऐसी चुनौतियों से निपटने को लेकर समाज व संगठन के साथ सरकार के लिए भी कुछ दिशा मिलेगी। प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का विराट स्वरूप प्रदर्शित हुआ। उससे बने वातावरण को सनातन आध्यात्मिक मूल्यों के साथ हिंदू समाज की एकता के सुदृढ़ीकरण की दृष्टि से क्या हो रहा ,है क्या कर सकते हैं निश्चय ही ये महत्वपूर्ण विषय हैं हर बैठक में इसकी चर्चा हो रही है। डिजिटल माध्यम के नकारात्मक उपयोग से समाज के अंदर बढ़ रही समस्याओं का समाधान कैसे हो इस पर भी चर्चा होने की सूचना है। जैसा ऊपर बताया गया पूरी बैठक संगठन और कार्यक्रमों पर केंद्रित रही, संघ और विविध संगठनों के संगठन से संबंधित पदाधिकारी उपस्थित रहे, इसलिए इसका प्रतिफल धरातल पर दिखाई देगा।

बुधवार, 2 जुलाई 2025

इटावा की घटना भयभीत करने वाली

अवधेश कुमार 

उत्तर प्रदेश के इटावा का कथावाचक कांड सामाजिक और राष्ट्रीय एकता की कामना करने वाले हर व्यक्ति को डराने वाली है। जिस तरह पूरा प्रकरण यादव बनाम ब्राह्मण और उससे आगे बढ़कर पिछड़े ,दलित बनाम अगड़े में बदला जा रहा है वह बताता है कि हमारी राजनीतिक, सामाजिक चेतना सीमा से अधिक विकृत अवस्था में पहुंची हुई है। किसी भी ऐसे कांड पर नेताओं और प्रबुद्ध वर्ग की भूमिका सच्चाई तक जाकर दोनों पक्षों के बीच तथ्यों और भावनाओं के आधार पर मेलजोल कराना तथा मामले को शांत करना होना चाहिए। उत्तर प्रदेश में सक्रिय प्रबुद्ध वर्गों के एक समूह ने आग में घी तो डाला और समाजवादी पार्टी ने अपनी भूमिका से इसमें पेट्रोल डालकर राज्यव्यापी ताप फैलाने की राजनीति की है। यह दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई है कि हमारे समाज में आज भी ऊंचा -  नीच के आधार पर एक बड़े वर्ग की जातीय सोच और व्यवहार निर्धारित होती है। यह केवल कुछ सवर्ण कहे जाने वाले जातियों में ही नहीं है। स्वयं को पिछड़ा और दलित मानने वाले जातियों के अंदर भी एक दूसरे को लेकर यही व्यवहार और सोच है। नेताओं,  समाज विरोधियों तथा अज्ञानी समाजकर्मियों ने इसे और हवा दी।

ऐसी किसी घटना में हमारा समाज पुलिस प्रशासन और नेताओं की दृष्टि से ही विचार करने लगता है। इसलिए कौन गलत कौन सही के आधार पर हम अपना निष्कर्ष निकालते हैं। इस घटना में भी यही हो रहा है। अभी तक की जानकारी के अनुसार कथावाचक मुकुटमणि सिंह यादव और उनके सहयोगी आचार्य संत सिंह यादव इटावा के एक गांव दांदरपुर में श्रीमद्भागवत की कथा कह रहे थे। ब्राह्मण बहुल गांव में उनके व्यास पीठ को सभी प्रणाम करते थे। कथा वाचक के प्रति सम्मान और श्रद्धा व्यक्त की जाती है वही स्थिति थी। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया? दूसरी तरफ की प्राथमिकी के अनुसार गांव के जयप्रकाश तिवारी और उनकी पत्नी रेणु तिवारी ने दोनों को खाने पर बुलाया। इनके अनुसार उन्होंने कहा कि पत्नी अपने हाथों से खाना खिलाएगी। रेणु तिवारी का कहना है कि एक ने मेरा अंगुली पकड़ लिया। उसके बाद इनका विरोध शुरू हुआ। बाहर से कथा वाचन करने गए लोगों की गांव में क्या स्थिति हुई होगी इसकी कल्पना की जा सकती है। उसमें यदि उनको महिला का पैर छूकर क्षमा मांगनी पड़ी हो तो  आश्चार्य नहीं। कहा गया है कि उस दौरान उनके पास से दो आधार कार्ड गिरे जिसमें अलग-अलग नाम थे। गलत नाम से आधार कार्ड धोखाधड़ी का मामला बनता है। किंतु यह कानूनी विषय है। मूल बात यह है कि गांव के लोगों ने इन्हें झूठा या चरित्रहीन मानकर दुर्व्यवहार किया या फिर यादव होने के कारण? मुकुटमणि यादव के अनुसार वह 15 वर्षों से कथा कह रहे हैं और गुरु से उन्होंने इसकी शिक्षा ली है। संत यादव संस्कृत पढ़ाते थे और उनका विद्यालय बंद होने के बाद उनके साथ जुड़ गए। दोनों संस्कृत का श्लोक वांचते हैं।

ध्यान रखिए,  इस समय भी देश कई नामी कथा वाचकों में उन जातियों के लोग हैं जिन्हें पिछड़ी या दलित जाति कहा जाता है। यहां किसी के नाम का उल्लेख करना उचित नहीं। भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय और सम्मान प्राप्त योग गुरु ही अगड़ी जाति के नहीं है। तो यह स्थिति आज भी है। इसलिए यह निष्कर्ष निकाल लेना कि तथाकथित ऊंची जाति के लोग पिछड़े याद दलित की भक्ति या कथा वाचन को स्वीकार नहीं करते पूरी तरह सही नहीं हो सकता। हां, गर्व से कहो हिंदू हैं, सनातनी हैं का अभियान चलाने वालों के लिए भी यह स्थिति चिंता का विषय होना चाहिए कि जाति को केंद्र बनाकर पूरे मामले को इस सीमा तक पहुंचा दिया गया। वैसे हिंदू अपनी पहचान दिखाएं इसका तात्पर्य क्या हो सकता है ? प्राथमिक और सर्वसाधारण भाव यही है कि शिखा रखें , ललाट पर चंदन करें आदि आदि । फिर इसके आगे हिंदू या सनातन धर्म के अनुसार जीवन शैली और आचरण की बात आती है।‌ इस दृष्टि से भी देखें तो किसी परिस्थिति में कथा वाचकों का शिखा काटना केवल कानूनी अपराध नहीं धार्मिक दृष्टि से भी महाअपराध और महापाप है। वर्तमान राजव्यवस्था में सजा देने का कार्य न्यायालय का है और इसके लिए छानबीन और कार्रवाई पुलिस का दायित्व है। समाज में किसी से गलती हो जाने के बाद आज भी थाने जाने की आम मानसिकता नहीं है। विशेषकर अगर महिलाओं के साथ छेड़छाड़ जैसे विषय हों तो परिवार और समाज भी पुलिस, कचहरी से आज भी बचता है। बाल मुंडन करना, शिखा उतार देना, थूक फेंक कर चटवाना जैसे दंड ही समाज की ओर से आता था। दंड देने वालों में  परिवार के लोग भी शामिल होते थे। वहां भी  कुछ लोगों ने पुलिस बुलाने या थाने ले जाने का सुझाव दिया होगा। यह स्वीकार नहीं हुआ तथा दोनों को अपने अनुसार सजा देकर मुक्त कर दिया गया। वर्तमान व्यवस्था में यह कानून हाथ में लेना है तो न्यायालय इसके लिए दंड दे सकता है। बावजूद स्वीकारने में समस्या नहीं है कि यह भारतीय समाज के परंपरागत व्यवहार का ही प्रकटीकरण है।

इससे बाहर निकाल कर व्यापक दृष्टि से विचार करें तो इसका मूल जाति व्यवस्था के संबंध में धारणा ही है। भारत में जाट के बारे में अंग्रेजों और बाद में उनकी सोच की तहत हमारे अपने समाज शास्त्रियों आदि ने काफी झूठ और विकृत धारणाएं पैदा की  और स्वतंत्र भारत में राजनीति ने वोट के लिए विभाजन को और तीखा तथा गहरा किया। वर्ण व्यवस्था के आगे जाति काम के आधार पर बनते गए और इसमें कोई ऊंचा - नीच या छोटा बड़ा नहीं था। सभी के कार्य या उत्तरदायित्व बंटे थे और यही हमारे भारत के स्वावलंबी होने और विश्व में आर्थिक - सामाजिक -आध्यात्मिक दृष्टि से शीर्ष राष्ट्र होने का एक मुख्य कारण था। कालांतर में काम को छोटा बड़ा , उसके आधार पर जाति को छोटा - बड़ा,  छुआछूत  भेदभाव जिन परिस्थितियों में उत्पन्न हुए वे दुर्भाग्यपूर्ण थे। वह सनातनी व्यवस्था नहीं रही है। इन में भी बहुत सारे झूठ जोड़े गए। उदाहरण के लिए आज पिछड़े और दलित कहलन वाली जातियों के भी राज थे। यादव, गुर्जर, प्रतिहार , जाट सबके राजवंशों के विवरण है और अनेक मुस्लिम आक्रमण के बावजूद कुछ अंग्रेज कल तक भी काम रहे। स्वतंत्रता के बाद जिन 539 रियासतों का विलय हुआ उनमें तब भी पिछड़ी माने जाने वाली जातियों के राजा थे। हमारे यहां अनेक ऐसे पूजा के विधान है जिनमें उन जातियों और उनके औजारों की पूजा के विधान हैं जिन्हें पिछड़े और दलित माना गया है। कुछ पूजा का विशेषाधिकार भी इन्हें ही दिया गया था। बाबा साहब अंबेदकर ने अपनी पुस्तक हु वाज शुद्राज के छठे अध्याय में बताया है कि वैदिक या महाभारत काल के शुद्र या दास आज के दलित नहीं थे। उनके अनुसार उस समय उन्हें अनेक अधिकार प्राप्त थे।

दुर्भाग्य से भारत की जाति व्यवस्था को न समझने वाले अंग्रेजों द्वारा अगड़े, पिछले, दलित, आदिवासी के बोए गए विष के वृक्ष को विस्तृत करते रहे तथा अकादमी, राजनीति और सत्ता में इनकी इतनी हैसियत कायम रही कि सच सामने लाकर भेद खत्म किए जाने का आधार तीरोहित हो गया। आखिर जहां 18 पुराणों और महाभारत के रचयिता शुद्र मां के पुत्र व्यास पूजनीय हों , वाल्मीकि के रामायण सबके लिए श्रद्धा तथा स्वयं ऋषि के रूप में उनकी मान्यता हो वहां इस तरह जाति-व्यवस्था में छूत - अछूत,  ऊंच-  नीच कैसे पैदा हुआ यह गहराई से विचार करने का विषय है।

जैसा पहले कहा गया आज भी कथा वाचकों में गैर ब्राह्मणों-क्षत्रियों की बड़ी संख्या है। किसी साधु -  संन्यासी या कथा शवाचक के साथ जाति के आधार पर हर जगह व्यवहार होता हो यह आम स्थिति नहीं है। इटावा वैसे भी अखिलेश यादव परिवार का घर है और वहां उनकी जाति के लोग संपन्न और प्रभावी हैं। जिस परिवार में कथा वाचक और उनके सहयोगी भोजन कर रहे थे वो दंपति  हरिद्वार में प्राइवेट नौकरी करते हैं और कथा के कारण ही गांव आए थे। पुलिस जांच कर रही है और सच्चाई सामने आएगी। इस समय जो कुछ बताया जा रहा है केवल उतना ही और वही सच होगा ऐसा मत मान लीजिए। बावजूद यह स्थिति भयभीत करने वाली है। ऐसी घटना और इसके राजनीतिक - सामाजिक दुरुपयोग और जातीय युद्ध पैदा करने की कोशिश है जो निस्संदेह भयभीत करने वाली है।  इसलिए सभी जातियों के प्रबुद्ध लोगों का दायित्व है कि सामने आकर इसका सकारात्मक, संतुलित सामना करें ताकि तत्काल किसी तरह का सामाजिक तनाव आगे न बढ़े व भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।

शुक्रवार, 27 जून 2025

तीसरी बार निर्विरोध डे्सू मजदूर संघ के अध्यक्ष चुने गए किशन यादव

संवाददाता

नई दिल्ली। भारतीय मजदूर संघ से सम्बद्ध डेसू मजदूर संघ जिसका पंजीकरण संख्या 1336 है। इसके चुनाव 26 जून, 2025 को डे्सू मजदूर संघ के रविदास मंदिर, आरके पुरम, दिल्ली  के कार्यालय में हुए। इस चुनाव से पहले पुरानी कार्यकारिणी को भंग करके नई कार्यकारिणी का गठन किया गया और नए पदाधिकारी को जिम्मेदारी दी गई। इसमें किशन यादव को पुन: निर्विरोध तीसरी बार अध्यक्ष चुना गया। किशन यादव के अलावा विनोद कुमार वरिष्ठ कार्यकारी अध्यक्ष, अजीत कुमार उपाध्यक्ष, बीवाईपीएल के सरवन कुमार यादव उपाध्यक्ष, बीआरपीएल के हरीश कुमार वासने उपाध्यक्ष, डीटीएल सुभाष चंद्र महामंत्री, इम्तियाज अहमद सचिव, दीपचंद संगठन मंत्री, रामकुमार ऑफिस सचिव, दिलराज लीगल सचिव, सुभाष पाल कोषाध्यक्ष चुना गया।

इस चुनाव के बाद बैठक में कुछ प्रस्ताव पास किये गए जैसे 1. दिल्ली की पाँचो कंपनियों में काम करने वाले सभी डे्सू मजदूर संघ यूनियन की सदस्यता ग्रहण कर सकता है जिसमें एएमसी के कर्मचारी, आऊटसोर्स के कर्मचारी, एचआरएमएस के कर्मचारी, एसएलए के कर्मचारी, डाइवर कर्मचारी, सफाई कर्मचारी, जीपीए कर्मचारी। 2. पांचों बिजली कंपनियों में काम करने वाले ठेका कर्मचारियों को पक्का किया जाए, इसकी पूरी कोशिश की जाएगी। 3. करूण मूलक आधार पर आश्रितों के बच्चों को नौकरी पर रखा जाए। 4. जिस कर्मचारी को मिनियम वेज नहीं मिल रहा है उस कर्मचारी को मिनियम वेज दिलाना है आदि।

इस मौके पर बीएसईएस यमुना पावर लिमिटेड कंपनी के लिए भी जनरल बॉडी के पदाधिकारी रूप में अशोक कुमार अध्यक्ष, दिनेश कुमार उपाध्यक्ष, ऋषिपाल महामंत्री, सेन्तुल त्यागी संगठन मंत्री, अब्दुल रज़्ज़ाक़ नॉर्थ ईस्ट दिल्ली सचिव, नसरुद्दीन सेंट्रल दिल्ली सचिव, निरंजन धरोहर कोषाध्यक्ष, विनोद कुमार सह कोषाध्यक्ष चुना गया।

बीआरपीएल यमुना पावर लिमिटेड कंपनी के लिए जनरल बॉडी बृजेश उपाध्यक्ष, ओमपाल उपाध्यक्ष, प्रदीप कुमार महामंत्री, चंद्र केतु मिश्रा संगठन मंत्री, रमेश कुमार सचिव, इकबाल खान कोषध्यक्ष, बुद्धपाल ऑफिस सचिव बनाया गया और दीपेंद्र तिवारी के लिए पद छोड़ दिया गया है।

इस मौके पर किशन यादव ने सभी को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि हमारा संगठन मजदूरों की आवाज को उठाता रहेगा और सभी चुने गए पदाधिकारियों से भी मैं यही आशा करता हूं कि वह अपना काम ईमानदारी से करेंगे।
















बुधवार, 25 जून 2025

प्रधानमंत्री द्वारा ट्रंप से दो टूक बात के बाद झूठा नैरेटिव ध्वस्त हुआ

अवधेश कुमार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जी 7 के लिए कनाडा, उसके पहले साइप्रस और फिर क्रोएशिया तक की यात्रा अनेक अनेक अर्थों में विदेश नीति, समर-नीति से लेकर रक्षा, आंतरिक सुरक्षा तथा नैरेटिव के संदर्भ में जबरदस्त उपलब्धियों एवं परिणामों वाली मानी जाएगी। भारत के अंदर और बाहर विरोधियों को भी इस तरह सफलता को प्रतिध्वनित करने वाली यात्रा की कल्पना नहीं रही होगी। शायद इन शब्दों में किसी को अतिवाद दिखे किंतु क्या आपने कल्पना की थी कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ बातचीत में सीधे ऑपरेशन सिंदूर और भारत पाकिस्तान सैनिक टकराव रुकने संबंधी अमेरिकी दावे का ऐसा खंडन किया जाएगा? ऐसा नहीं है कि डोनाल्ड ट्रंप आगे भारत पाकिस्तान के संदर्भ में श्रेय लेने के लिए मध्यस्थता करने का दावा नहीं करेंगे। उन्होंने किया भी है। किंतु विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने दोनों नेताओं के बीच टेलीफोन पर 35 मिनट की हुई बातचीत का जो ब्यौरा दिया उसका ट्रंप प्रशासन द्वारा खंडन न किया जाना ही बताता है कि वक्तव्य पूरी तरह सच है। दो नेताओं की बातचीत में सामने वाले को कहा जाए कि आपने जो दावा किया वैसी बातचीत हमारे आपके बीच कभी हुई नहीं तो उस पर क्या गुजरेगी? 

विदेश सचिव विक्रम मिश्री की इन पंक्तियों को देखिए–, “ प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को स्पष्ट रूप से कहा है कि ऑपरेशन सिंदूर के संबंध में कभी भी और किसी भी स्तर पर भारत-अमेरिका ट्रेड डील या अमेरिका की ओर से भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता जैसे विषयों पर बात नहीं हुई थी। सैन्य कार्रवाई रोकने की बात सीधे भारत और पाकिस्तान के बीच हुई। दोनों सेनाओं की बात मौजूदा चैनल्स के माध्यम से हुई थी। पाकिस्तान के ही आग्रह पर ये बातचीत हुई थी।” ट्रंप ने क्या उत्तर दिया यह सामने नहीं है। जरा सोचिए, अगर ट्रंप जी 7 बैठक बीच में छोड़ अमेरिका नहीं लौटे होते और आमने-सामने बातचीत होती तो कैसा दृश्य होता? कहीं ऐसा तो नहीं कि भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तेवर का आभास ट्रंप को हो और उन्होंने वहां से तत्काल निकल जाने में नहीं उचित समझा। 

निश्चित रूप से देश में कांग्रेस सहित सारी पार्टियों और झूठे नैरेटिव से नकारात्मक इकोसिस्टम खड़ा करने वाले समूहों को धक्का पहुंचा होगा। भारत-पाकिस्तान के सैनिक टकराव रुकने के संबंध में ट्रंप के लगातार वक्तव्यों को आधार बनाकर संकुचित राजनीति के लिए जिस तरह का उपहास प्रधानमंत्री, भारतीय विदेश नीति व रक्षा नीति का उड़ाया जा रहा था उन सब पर तुषारापात हुआ है। सामान्य शिष्टाचार है कि ट्रंप अंकल का एक फोन आते ही मोदी ने युद्ध रोकने का आदेश दे दिया का नैरेटिव चलाने वाले कम से कम अफसोस प्रकट करें।  किसी ने नहीं सोचा कि जब भारत की वर्षों पुरानी नीति कश्मीर को द्विपक्षीय मामला मानने तथा तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप न करने देने की है तो सरकार इससे परे नहीं जा सकती। वैसे भी नरेंद्र मोदी सरकार ने तो पाकिस्तान की सीमा में घुसकर आतंकवादी हमलों का प्रतिकार किया और नीतिगत बयान यही है कि केवल पाक अधिकृत कश्मीर को सुलझाना ही बचा हुआ है। प्रधानमंत्री ने अपने भाषणों में ही पाकिस्तान से किसी स्तर की बातचीत या तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को सीधे-सीधे नकारा। विदेश सचिव के वक्तव्य से यह धारणा भी खंडित हुआ कि इस बीच मोदी और ट्रंप के बीच कोई बातचीत हुई। वे कह रहे हैं कि उसके बाद दोनों नेताओं की पहली बातचीत थी। पूरे घटनाक्रम की स्थिति में यह तथ्य काफी महत्वपूर्ण है। यानी  9 मई को केवल अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के साथ बातचीत हुई जिन्होंने पाकिस्तान द्वारा भारत पर बड़े हमले की जानकारी दी थी और जवाब में प्रधानमंत्री ने कहा था कि भारत उससे बड़ा जवाब देगा और दिया गया।  यानी युद्धविराम की उसमें भी कोई बात नहीं। 

साफ है कि ऑपरेशन सिंदूर पर विरोधियों द्वारा बनाया नैरेटिव शर्मनाक तौर पर झूठा था।  ट्रंप को भी सीधे प्रधानमंत्री से यह सुनने के बाद कि भारत अब आतंकवाद को प्रॉक्सी वार नहीं, युद्ध के रूप में ही देखता है और “ऑपरेशन सिंदूर” अभी भी जारी है, हमारी नीति और तैयारी का स्पष्ट आभास हो गया होगा। यानी आप क्या सोचते और चाहते हैं वह नहीं हमारी सुरक्षा हमारे लिए महत्वपूर्ण है और यही नीति का मुख्य आधार है।

सामान्य तौर पर यह व्यवहार भी हैरत भरा है कि एक ओर ट्रंप पाकिस्तान के फिल्ड मार्शल जनरल असीम मुनीर को रात्रि भोज दे रहे हैं और प्रधानमंत्री मोदी से अमेरिका आने का आग्रह कर रहे हैं। यह अमेरिका की कैसी रणनीति है? मोदी सरकार ने ट्रंप प्रशासन के साथ सही रणनीति अपनाया और दूसरी प्रतिबद्धताओं की बात कह मोदी ने ट्रंप के निमंत्रण को ठुकरा दिया। यह भी ट्रंप और उनके प्रशासन के लिए सामान्य धक्का नहीं था। कनाडा से अमेरिका जाकर कुछ घंटे बातचीत करते हुए क्रोशिया जा सकते थे। इसका आभास भी ट्रंप और उनके प्रशासन को होगा कि प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसा कर भारत की नाराजगी प्रकट कर दिया है।  मोदी को ट्रंप का आज्ञाकारी और न जाने क्या-क्या शब्द देने वाले कभी यह भी नहीं सोचते कि वह किसी व्यक्ति का नहीं 140 करोड़ भारतीयों के नेता और इस नाते भारत को छोटा दिखा रहे हैं। विचार इस पर होना चाहिए कि ट्रंप के व्यवहार में बदलाव आया क्यों? सब कुछ जानते हुए डोनाल्ड ट्रंप और उनका प्रशासन पाकिस्तान के साथ सम्मानजनक और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार कैसे करने लगा?

तत्काल ऐसा लगता है कि अमेरिका ने ईरान के अयातुल्लाह खामेनेई की सत्ता समाप्त करने की रणनीति काफी पहले बना ली। पाकिस्तान किसी स्तर पर ईरान की ठोस मदद न कर सके इसकी तैयारी के तहत उसे पुचकारा गया । मुद्रा कोष से कर्ज दिलाने में मदद की, फिर भारत के साथ समानता का व्यवहार करते हुए उसे भी महान देश बताया और अब पहलगाम आतंकवादी हमले के मुख्य खलनायक तथा सरेआम मुसलमान को विशेष संस्कृति बताने वाले जनरल को इतना महत्व। इसके पहले किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने अन्य जनरलों को ऐसा महत्व नहीं दिया।  पाकिस्तान ईरान की सीमा लगभग 900 किलोमीटर मिलती है। ईरान के रक्षा मंत्री का वह बयान उपलब्ध है कि आवश्यकता पड़ने पर पाकिस्तान अपना न्यूक्लियर हथियार मदद में देगा। इस्लाम के नाम पर ऐसी भयानक स्थिति पैदा न हो इसका ध्यान रखते हुए ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान से संपर्क बढ़ाया होगा। संभव है इसी से आत्मविश्वास बढ़ा और पाकिस्तान भारत के विरुद्ध भौंहें टेढ़ी किया हो। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री को इसका खंडन करना पड़ा।

इसे भारतीय विदेश नीति की विफलता करार देना भी अनुचित है। भारत की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो हैसियत है वह  बनी हुई है। ऐसा नहीं होता तो जी7 के देश ही मांग नहीं करते कि सम्मेलन में भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति होनी ही चाहिए। प्रधानमंत्री ने वहां आतंकवाद पर खड़ी-खरी सुनते हुए कहा भी आतंकवाद पर हमारा रवैया नहीं बदला तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा। एक ओर तो हम अपने अनुसार किसी पर प्रतिबंध  हैं और दूसरे आतंकवाद के मुख्य केंद्र को समर्थन करते हैं। अमेरिका , यूरोप पाकिस्तान की भूमिका के बारे में पूरी जानकारी रखते हैं। किंतु  उनकी सोच है कि पाकिस्तान अलग-थलग होकर पूरी तरह चीन के पाले में चला जाएगा और एक उग्रवादी अराजकतावादी देश बन जाएगा।  ये नहीं चाहते कि पाकिस्तान को अलग-थलग कर उसे पूरी तरह चीन के पाले में जाने और उग्रवादी अराजकतावादी देश बनने की ओर धकेल दें।  एक समय पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय जेहादी आतंकवाद का मुख्य केंद्र था। आज वह उसी रूप में उनके लिए खतरा नहीं है जैसा भारत के लिए है। अमेरिका की उसके पड़ोसी अफगानिस्तान और ईरान से उपस्थिति भी खत्म है।

भारत को इसका ध्यान रखते हुए ही नीतियां बनानी है और बना भी रहा है। आतंकवादी हमले होंगे तो सब साथ होने का बयान देंगे, लेकिन पाकिस्तान पर हमले में साथ नहीं मिलेगा। तो सबक यही है कि विरोधी मोदी विरोध के नाम पर भारत को छोटा दिखाने के लिए इस तरह झूठ नैरेटिव से बचें।


गुरुवार, 19 जून 2025

यह युद्ध किधर जा रहा है

अवधेश कुमार

इजरायल ईरान युद्ध संपूर्ण विश्व को प्रभावित करने वाला है और भारत इसके परिणामों से किसी दृष्टि से अप्रभावित नहीं रह सकता। यह केवल तेल जैसे आर्थिक क्षेत्र में ही नहीं अन्य क्षेत्रों में भी इसके परिणाम दिखाई देंगे। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान और इराक युद्ध से इस समय भीषण युद्ध खाड़ी के अंदर चल रहा है। ईरान इराक युद्ध के परिणाम देखा जाए तो कुछ नहीं आए किंतु इजरायल ईरान युद्ध के परिणाम केवल अरब या खाड़ी क्षेत्र में ही नहीं पूरे विश्व में बड़े वैचारिक, रणनीतिक , राजनीतिक बदलाव के कारण बन सकेंगे। इस समय युद्ध से परस्पर विरोधी रिपोर्ट हमारे सामने है। युद्ध के दौरान दोनों पक्ष और उनके समर्थक अलग-अलग तरीके से अपने पक्ष की सूचनायें प्रसारित करते हैं और यही हो रहा है। विश्व के एक बड़े वर्ग में सामान्य धारणा है कि इजरायल इतने लंबे समय तक अरब में अपनी सैनिक क्षमता, संकल्प और लड़ने की अंतिम सीमा तक की भावना के साथ टिका हुआ है तथा अनेक बार अरब देशों को झुकाया है, समझौते करने को भी विवश किया है तो ईरान की भी यही दशा होगी। दूसरी ओर पूरे मुस्लिम जगत का एक बहुत बड़ा वर्ग  मान रहा है कि अयातुल्लाह खामेनेई के नेतृत्व में इस्लामी क्रांति के पीछे जो दृश्य अदृश्य शक्तियां हैं वो ईरान को कभी पराजित नहीं होने देंगी। ईरान के हमले से तेल अबीब सहित कई जगह कुछ विध्वंस देखे गए। सर्वाधिक सुरक्षित हाइफा बंदरगाह के भी क्षति पहुंचाने के समाचार आए। यह भी सूचना हमारे बीच है कि इजरायल के मिसाइल को कई जगह ईरान ने रोकने में सफलता पाई तथा उसके मिसाइलों ने इजरायल की मिसाइल रक्षा प्रणाली तक को भी कई बार भेदा है। तो फिर इस युद्ध का सच क्या है और इसके परिणाम क्या हो सकते हैं?

भूगोल आबादी और संसाधन की दृष्टि से देखें तो ईरान का क्षेत्रफल इजरायल से 10 गुना ज्यादा तथा आबादी इससे भी ज्यादा है। दोनों के सुरक्षा बलों की संख्या में भी कोई तुलना नहीं है। कहां 90 लाख का देश और कहां 10 करोड़ की आबादी। उस आबादी में भी एक बड़े वर्ग के अंदर इस्लामी क्रांति के तहत जिहाद और मजहब के विजय की भावना भरी हुई। दूसरी ओर 1979 के बाद चाहे अयातुल्लाह खोमैनी हों या अयातुल्लाह खामेनेई या फिर वहां के निर्वाचित राष्ट्रपति, सबने धरती से इजरायल के नामोनिशान मिटाने की बार-बार घोषणा की और ईरान राष्ट्र का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य भी बना दिया। इसके बावजूद आज तक कुछ नहीं कर सके। उल्टे जितने युद्ध अरब में हुए इजरायल सबमें व्यावहारिक रूप से विजेता बनकर उभरा और कैंप डेविड से लेकर अभी तक सारे समझौतों में इजरायल के सामने बहुत कुछ खोने की नौबत नहीं आई। दूसरे,  वर्तमान युद्ध में ईरान का सक्रिय साथ देने वाला एक भी देश इस समय नहीं है। जिस चीन, रुस, उत्तर कोरिया या कुछ इस्लामी देशों से उसे उम्मीद थी किसी ने भी इजरायल के विरुद्ध संघर्ष करने की तो छोड़िए, आक्रामक बयान तक नहीं दिया है। एकमात्र पाकिस्तान ने ही मुखर होकर ईरान का समर्थन किया । पाकिस्तान की हैसियत स्वयं इस्लामी जगत में ही इतनी बड़ी नहीं कि वह अपने साथ किसी देश को युद्ध के लिए खड़ा कर सके। ईरान के लिए यह हतप्रभ करने वाली स्थिति है कि संकट की इस घड़ी में कोई देश उसके साथ सक्रिय रूप से आगे नहीं आया। शांति की बात करने वाले कुछ देश जरूर हैं।

कुछ अन्य कारक भी ईरान के विरुद्ध और इजरायल के पक्ष में जाते हैं। इजरायल ने अभी तक ईरान के तीनों सेना  प्रमुखों, अनेक शीर्ष सैन्य अधिकारियों और सबसे एलिट माने जाने वाले इस्लामी क्रांति के बाद उत्पन्न ईरान रिवॉल्यूशनरी गार्ड के प्रमुख को एक ही हमले में समाप्त कर दिया। उसके साथ अनेक शीर्ष परमाणु नाभिकीय वैज्ञानिक भी मौत के घाट उतार दिए गए। उसके इंटेलिजेंस चीफ यानी खुफिया प्रमुख भी मारे जा चुके हैं । स्वयं अयातुल्लाह खामेनेई और उनके बेटे मोजताबा दोनों के बारे में इतनी जानकारी है कि वे कहीं छिपे हुए हैं।  ध्यान रखिए , ईरान ने इन पंक्तियों के लिखे जाने तक इजरायल के किसी बड़े सैन्य अधिकारी व नाभिकीय वैज्ञानिक आदि को मारने में सफलता नहीं पाई है। ईरान के मिसाइल इजरायल पर अंधाधुंध हमले कर रहे हैं और उसे ज्यादातर नागरिक स्थल ही ध्वस्त हुए हैं।‌ इस्लामी क्रांति के बाद आयतुल्लाह खोमैनी और खामेनेई ने ईरान को इस्लाम का नेता बनाने के लिए फिलिस्तीन मुद्दे को सबसे आगे किया। उन्होंने जिस तरह के भाषण दिए उससे विश्व भर के मुसलमानों के एक बड़े वर्ग के अंदर फिलिस्तीन की जज्बाती मजहबी समर्थन का भाव भी पैदा हुआ। सीधे संघर्ष की जगह ईरान ने लेबनान में हिजबुल्ला, यमन में हुती विद्रोही पैदा किया तो सुन्नियों के समर्थन के लिए इस्लामिक ब्रदरहुड के भाग के रूप में फिलिस्तीन में हमास। इन्हीं के माध्यम से वह इजरायल को लगातार घाव देता रहा है।

इजरायल ने ईरान पर निर्णायक हमले के पूर्व जो कुछ किया वह हमारे सामने है। उसने हिज्बुल्ला को नेस्तनाबूत किया और उसके प्रमुख नसीरूल्लाह सहित सारे शीर्ष कमांडरों को समाप्त कर दिया। लेबनान को इस स्थिति में नहीं छोड़ा कि वह ईरान के साथ खड़ा हो सके। हमास को भी विनाश के कगार पर पहुंचा दिया और उसके प्रमुख इस्माइल हानियां तक को पिछले साल  खत्म कर दिया। हूती को अमेरिका के साथ कमजोर किया। हालांकि इस समय हुती लाल सागर में गतिविधियां दिखा रहे हैं लेकिन उन पर भी जबरदस्त मार पड़ रही है। इसके साथ इजरायल धीरे-धीरे ईरान के प्रमुख शीर्ष सैन्य रणनीतिकारों और नाभिकीय वैज्ञानिकों तक को मौत के घाट उतारता रहा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल की पश्चिम एशिया यात्रा के दौरान सीरिया के सत्ता पर काबिज पूर्व आतंकवादी अहमद अल शराब उर्फ अबू मोहम्मद अल जुलानी से हाथ मिलाया तो उसके पीछे भी रणनीति थी कि वह इब्राहिम अकॉर्ड यानी समझौता पर हस्ताक्षर करे जिसमें इसराइल को मान्यता देने की बात है। वे जिन देशों में गए वहां उन्होंने ईरान के विरुद्ध इजरायल के पक्ष में वातावरण बनाया। इसका परिणाम देखिए कि हमास के समर्थक कुछ पत्रकारों को अरब देशों के अंदर ही गिरफ्तार कर सजा दी गई या उन्हें मार डाला गया। इनमें सऊदी अरब भी शामिल है जो कट्टर सुन्नी देश है। आज स्थिति यह है कि मोहम्मद पैगंबर साहब के वंशजों के शासन के अधीन वाला देश जॉर्डन इजरायल के विमान को जाने की अनुमति दे रहा है लेकिन ईरानी मिसाइल को इंटरसेप्ट कर रहा है। दूसरी ओर अमेरिका पूरी तरह इजराइल के साथ खड़ा है और अगर ईरान का पलड़ा कहीं से मजबूत दिखा तो वह कभी भी हस्तक्षेप करेगा। डोनाल्ड ट्रंप ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बात की तो उसके पीछे भी निश्चित रूप से उन्हें इस युद्ध से दूर रहने के लिए तैयार करना रहा होगा। भारत की दृष्टि से देखें तो ईरान से हमारे संबंध अच्छे माने जाते हैं। पश्चिम एशिया से तेल आपूर्ति से लेकर अन्य रणनीतिक मामलों में ईरान के समुद्री मार्गों की हमें आवश्यकता है । दूसरी ओर ईरान से संबंधों की सीमाएं रही है। पिछले वर्ष अयातुल्लाह खामेनेई ने भारतीय मुसलमान की फिलिस्तीन से तुलना करते हुए पोस्ट लिखा था। कश्मीर मामले पर उसका बयान भारत विरुद्ध रहा है। पाकिस्तान में उसका लक्ष्य केवल सुन्नी मुसलमानों के शासन को मजबूत नहीं होने देना है अन्यथा उसकी नीति कहीं भी भारत के पक्ष में नहीं है। बलूचिस्तान के एक भाग पर उसका कब्जा है तथा वह भी पाकिस्तान की तरह ही बलूचियों का दमन कर रहा है। ईरान का पूरा इतिहास देखें तो कभी भी कठिन परिस्थिति में वह भारत के समर्थन में खड़ा नहीं हुआ।

इसलिए जो लोग भी ईरान को लेकर छाती पीट रहे हैं उन्हें भारत के साथ संबंधों में इजरायल और ईरान के व्यवहार की निष्पक्षता और ईमानदारी से तुलना करनी चाहिए। कोई नहीं कहता कि आयतुल्लाह खामेनेई का ईरान अचानक घुटने टेक देगा। उसके पास मिसाइल, ड्रोन, लड़ाकू विमानों से लेकर बड़े शस्त्रागार हैं । किंतु वह इजरायल या उसके साथ देने वाले अमेरिका के मुख्य सामरिक स्थलों को ध्वस्त कर उन्हें हमला न करने की स्थिति में लाने की क्षमता नहीं दिखा पाया है। तो इस युद्ध के परिणाम ईरान के पक्ष में नहीं जा सकते। इसमें अगर अयातुल्लाह खामेनेई का पतन होता है तो यह 1979 के इस्लाम के नाम तथाकथित क्रांति द्वारा सत्ता कब्जाने तथा उसके बाद पैदा हुए संपूर्ण अरब में कट्टरपंथ के दौर के बाद का एक नया चरण आरंभ होगा। इसका प्रभाव विश्व एवं भारत पर निश्चित रूप से पड़ेगा।


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