सोमवार, 28 अप्रैल 2025

शास्त्री पार्क थाने की पुलिस ने लूटे गए मोबाइल फ़ोन कुछ ही घंटों में किया बरामद, तीन गिरफ्तार


असलम अल्वी

उत्तर पूर्वी दिल्ली। उत्तर पूर्वी दिल्ली के शास्त्री पार्क थाने की पुलिस ने त्वरित कार्यवाही करते हुए लूट के एक आरोपी को पीछा कर दबोचा और उसकी निशानदेही पर उसके  दो अन्य साथियों की गिरफ्तारी के साथ ही लूटा गया मोबाइल फ़ोन भी कुछ ही घंटों में बरामद कर लिया |

दिनांक 28.04.2025 को शाम करीब  06:00 PM  में  इंस्पेक्टर मंजीत तोमर, थानाध्यक्ष शास्त्री पार्क के नेतृत्व में एक टीम जिसमे एसआई रॉकी, हैड कांस्टेबल सुभाष, शिवराज , रोहित व कांस्टेबल ज्ञान शामिल थे शास्त्री पार्क इलाके में गश्त करते हुए मछली मार्किट पहुंचे तो एक व्यक्ति को बदहवास हालत में देखा, पूछने पर उसने बताया  की तीन लड़के मार पीट करने के बाद मेरा मोबाइल फ़ोन लूट कर ले गए हैं। टीम के सदस्यों ने त्वरित कार्यवाही करते हुए व्यक्ति के बताये  हुए रस्ते पर आगे बढे तो एक कुछ दूर एक लड़का जाता हुआ दिखा, जिसको पीछा करके  टीम ने काबू किया तब तक पीड़ित व्यक्ति भी उनके पास पहुंच गया और शिनाख्त करते हुए बताया की इसी लड़के ने अपने 2 साथियों के साथ मिलकर लूट की है। पकडे गए लड़के की पहचान मोहम्मद इरशाद पुत्र मोहम्मद रफ़ीक निवासी बुलंद मस्जिद  शास्त्री  पार्क उम्र 22 वर्ष के तौर पर की गई। 

तदनुसार, पीड़ित सुनील कनोजिया निवासी ट्रोनिका सिटी उम्र 35 वर्ष के बयान पर थाना शास्त्री पार्क में भारतीय न्याय संहिता की धारा 309(4)/317(2)/3(5) के तहत प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू की जाती है |

जांच के दौरान यह टीम श्री हरेश्वर वी. स्वामी, आईपीएस, डीसीपी/उत्तर-पूर्वी जिले के मार्गदर्शन में विभिन्न स्रोतों से साक्ष्य एकत्र करके आरोपी इरशाद की निशानदेही पर उसके दोनों साथियों उज्जवल पुत्र हितनारायण निवासी गली नंबर 4, शास्त्री पार्क उम्र 22 वर्ष व सोनू पुत्र मोहम्मद हारून निवासी बुलंद मस्जिद  शास्त्री  पार्क उम्र 22 वर्ष को भी गिरफ्तार कर लेती है। आगे की जांच में आरोपियों ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए अन्य मामलों में भी अपनी संलिप्तता के बारे में बताया। टीम ने आरोपी सोनू के पास से लूटा हुआ मोबाइल फ़ोन बरामद किया। गहन जांच के दौरान पकड़े गए आरोपी इरशाद व सोनू पहले भी हत्या के प्रयास के मामले में शामिल पाए गए। मामले में आगे की जांच जारी है।




रविवार, 27 अप्रैल 2025

थाना वेलकम की टीम ने आटो यात्री के साथ लूट का मामला सुलझाया, तीन आरोपियों काे किया गिरफ़्तार, शिकायतकर्ता का लूटा हुआ बैग व मोबाइल फोन बरामद

  • लोगों को ठगने में काम आने वाली असली नोटों जैसी दिखने वाली रद्दी कागज की 02 गड्डियां व वारदात में इस्तेमाल ऑटो DL-1RAB-4282 भी बरामद
  • तीनों आरोपी पहले भी अपराधिक मामलों में शामिल पाए गए

असलम अल्वी

उत्तर पूर्वी दिल्ली। दिनांक 27.04.2025 को थाना वेलकम में एक यात्री से लूट की सूचना प्राप्त हुई जिसमे शिकायतकर्ता शिवम पुत्र मंगलू सिंह निवासी बुलंदशहर, उम्र 17 वर्ष ने बतलाया की शाम करीब 03:45 पर वह  कश्मीरी गेट बस अड्डे से आनंद विहार बस अड्डे जाने की लिए ऑटो में बैठा था, उस ऑटो में ड्राईवर व 02 सवारी पहले से ही बैठी थी। जैसे ही ऑटो वेलकम मेट्रो स्टेशन पार करके झील पार्क पहुंचा तो उतरने के बहाने से ऑटो में पहले से यात्री सीट पर बैठे दोनों व्यक्तियों ने ऑटो को रुकवा लिया और उतरते वक्त उसका बैग जिसमें उसका मोबाइल फ़ोन, कागजात , कपड़े व 2000 रु. थे उसके हाथ से छीन कर भाग गए।

तद्नुसार, शिवम की शिकायत पर थाना वेलकम में भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 304(2)/3 (5) के तहत मुकद्दमा दर्ज कर जांच शुरू की जाती है|

जांच के दौरान इंस्पेक्टर रुपेश कुमार खत्री, थानाध्यक्ष- वेलकम के नेतृत्व में एक टीम जिसमे इंस्पेक्टर ज्ञानेंद्र सिंह, एसआई योगेश कुमार, एएसआई रामबीर, संजय तेवतिया, हैड कांस्टेबल हरेंद्र, ललित, अरुण, कुलदीप और कांस्टेबल विनोद और हरवीर धामा शामिल थे का गठन किया गया। टीम ने एसीपी/भजनपुरा की देखरेख व श्री हरेश्वर वी. स्वामी, आईपीएस, डीसीपी/उत्तर-पूर्वी जिला के मार्गदर्शन में कार्य करते हुए विभिन्न स्रोतों से मामले में जानकारी इकठ्ठा कर वारदात में शामिल निम्न 03 व्यक्तियों को गिरफ्तार कर उनके कब्जे से पीड़ित शिवम का लूटा हुआ बैग, कपडे, कागजात व मोबाइल फ़ोन बरामद कर लिया। इसके अलावा लुटेरों के कब्जे से असली नोटों जैसी दिखने वाली रद्दी कागज की 02 गड्डियां व वारदात में इस्तेमाल ऑटो भी बरामद किया गया। पकडे गए व्यक्तियों की पहचान निम्न के तौर पर की गई :

  1. सलीम पुत्र रहीस निवासी ई-1281, जेजे कॉलोनी, बवाना, दिल्ली उम्र- 48 वर्ष 
  2. रुस्तम पुत्र कय्यूम निवासी ई-1176, जेजे कॉलोनी, बवाना, दिल्ली उम्र- 23 वर्ष 
  3. आकाश पुत्र वीरेंद्र निवासी ई-1512, जेजे कॉलोनी, बवाना, दिल्ली उम्र- 42 वर्ष 

मामले में आगे की गहन पूछताछ में तीनों व्यक्तियों ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बतलाया वो ज्यादातर बस अड्डे व भीड़भाड़ वाले स्थानों  के पास अपना ऑटो लेकर खड़े हो जाते हैं और यात्रिओं  को उनके गंतव्य स्थान पर पहुँचाने के लिए ऑटो में बैठा लेते हैं तथा रास्ते मे झांसा देकर असली नोटों जैसी दिखने वाली रद्दी कागज की  गड्डियां देकर यात्रियों से उनका सामान ले लेते हैं। यदि कोई व्यक्ति उनके झांसे में नहीं आता तो वे जबरदस्ती उसका सामान छीनकर उसे किसी सुनसान स्थान पर उतारकर भाग जाते हैं। इस मामले में भी उन्होंने पीड़ित शिवम को पहले उसके सामान, मोबाइल फोन व पैसों के बदले कागज के नोटो की गड्डियां देने की बात की मगर जब वो नहीं माना तो उन्होंने ऑटो से उतरने का बहना बनाकर पहले उसे ऑटो से नीचे उतार दिया तथा उसका बैग जिसमें शिवम के कपड़ व मोबाइल फोन थे लूटकर भाग गए। तत्पश्चात, वर्तमान मामले की धाराओं को 309(6)/3(5) बीएनएस के रूप में परिवर्तित किया गया। पकडे गए तीनों आरोपी पहले भी लूट व अन्य मामलों में शामिल पाए गए हैं। मामले में आगे जांच जारी है।



शनिवार, 26 अप्रैल 2025

पहलगाम के प्रतिशोध हेतु अपनाना होगा इजरायल माडल

भविष्य की आहट

डा. रवीन्द्र अरजरिया

आतंकवाद का दावानल समूची मानव जाति को निगलने के लिए आतुर हो रहा है। पहलगाम में धर्म पूछकर मुस्लिम आतंकियों ने हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया। हथियारों के सौदागरों के व्दारा मुहैया कराये जा रहे आधुनिक शस्त्र, पाकिस्तान में चलाये जा रहे आतंक प्रशिक्षण शिविरों और इस्लाम के नाम पर बनाये जा रहे संगठनों में मुसलमानों को बरगलाकर फिदाइनी बनने का सिलसिला निरंतर तेज होता जा रहा है। गैर मुसलमानों के खिलाफ जेहाद चलाने का फैशन चल निकला है। पहलगाम की घटना से पूरे देश में आक्रोश है। चारों ओर बदले की आवाजें गूंज रहीं हैं। ऐसे में राष्ट्रद्रोहियों का एक गिरोह अपने सीमापर बैठे आकाओं के इशारों पर आतंकियों के सरपरस्तों, संदेहास्पद सहयोगियों और कलुषित मानसिकता वाले लोगों को बचाने के लिए सोशल मीडिया के सहारे नागरिकों को बरगलाने में जुटा है। इस गिरोह के सदस्यों की फौज कश्मीर पहुंच गई है जहां से निरंतर मुसलमानों की सहृदयता, उनका भाईचारा और राष्ट्रभक्ति की भावना का प्रायोजित प्रचार कर रही है। 

सीमापार के आतंकी अड्डों, उनके आकाओं के ठिकानों और कट्टरपंथियों के मुख्यालयों सहित अन्य संदिग्ध स्थानों को नस्तनाबूद करने के साथ-साथ देश के मीर कासिमों की नस्लों को भी समाप्त करना होगा अन्यथा राष्ट्रद्रोहियों को संरक्षण देने वाली जमात पुनः मुसलमानों को बरगलाकर फिदायिनी बनाने से बाज नहीं आयेंगे। समूची दुनिया में इस्लाम के नाम पर आतंक का डंका बजाने वाले संगठनों को अनेक राष्ट्र से आर्थिक सहायता, अग्नेय शस्त्र और संरक्षण सहित प्रशिक्षण मिल रहा है। 

अब वक्त आ गया है जब धर्म के नाम पर कत्लेआम करने वाले आतंकी संगठनों से निपटने के लिए अपनाना होगा इजरायल माडल। गाजा में हमास के खिलाफ छेडी गई जंग एक उदाहरण बन गई है जहां पर इजरायली नागरिकों का अपहरण करके दबाव की राजनीति करने वालों के ठिकानों को ही नस्तनाबूत नहीं किया जा रहा है बल्कि उनके मददगारों तक को धूल में मिलाया जा रहा है। आश्चर्य है कि गाजा के आम नागरिकों के सामने उनके मासूम बच्चों, पत्नियों और परिवारजनों की लाशें बिछ रहीं है, दाने-दाने को तरस रहे हैं, आशियाने खण्डहर में तब्दील हो रहे हैं परन्तु वे हमास के विरुध्द एक भी शब्द जुबान पर नहीं ला रहे हैं। 

इस्लाम के नाम पर अंध विश्वास, जन्नत में 72 हूरों का सपना और काफिरों की मौत से मिलने वाले शबाब की कल्पना के तले जीती जागती जिंदगियों को तबाह करने में जुटे कट्टरपंथियों का एक बडा तबका आईएसआईएस, अबू सय्यफ ग्रुप, अलकायदा, अल शबाब, अंसार अल्लाह, बोको हरम, हमास,हयात तहरीर अल शाम, हिजबुल्लाह, हुर्रास अल दीन, इस्लामिक स्टेट, आईएस, जैस ए मोहम्मद, हूती, हरकत अल मुकाबामा अल इस्लामिया, आईएसएल, अब्दुल्ला अज्जाम ब्रिगेड्स, अबू निदाल, अल अक्सा शहीद ब्रिगेड, अल अश्तर ब्रिगेड, अल गमआ अल इस्लामिया, अंसार अल इस्लाम, अन्सार दीन, अंसारल्लाह, हक्कानी नेटवर्क, हरकत अल सबिरीन, इंडियन मुजाहिद्दीन, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर, जैश अल मुहाजिरिन वाल अंसार, लश्कर ए तैयबा,   फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद जैसे हजारों संगठनों को पाल पोसकर निरंतर बडा कर रहा है। 

गाजा में हमास ने जिस तरह से भूमिगत सुरंगों का जाल फैला रखा है। अस्पतालों, स्कूलों, मस्जिदों, मदरसों, यतीमखानों के नीचे अड्डे बना रखे हैं। मानवीयता से जुडी संस्थाओं के भवनों में दफ्तर खोल रखे हैं। यह सब चिन्ता का विषय है जिसे इजरायल व्दारा बहादुरी के साथ बरबाद किया जा रहा है। ऐसी ही कार्यवाही की आवश्यकता देश में भी है। पहलगाम का बदला लेने के लिए सीमापार पाकिस्तान में बनाये गये लांचिंग पैड, ट्रेनिंग कैम्प्स और फंडिंग सेन्टर्स को नस्तनाबूद करने के साथ-साथ आतंकियों के आकाओं, मददगारों और सरपरस्तों को भी तबाह करना होगा। वर्तमान में समूची दुनिया भारत के साथ खडी है। ऐसे में प्रधानमंत्री पद पर नरेन्द्र मोदी जैसा विश्व प्रसिद्ध व्यक्तित्व का होना सोने में सुगन्ध का काम कर रहा है। समूचा देश उस क्षण का बेसब्री से इंतजार कर रहा है जब पहलगाम में हुए धर्म के नाम पर कत्लेआम का बदला लेने की पहल शुरू होगी। स्वाधीनता के बाद का पल एक बार फिर लौट आया है जब वर्चस्व की जंग मुंह खोले खडी थी। धर्म के नाम पर देश का विभाजन करने वालों की पीढियां आज फिर से मानवता का ढोंग रच रहीं हैं। देश के बाहर और देश के अंदर बैठे राष्ट्रघाती लोगों को चिन्हित करना होगा। 

देश के विभिन्न दलों, विभिन्न पदों और विभिन्न मजहबों के स्वयंभू ठेकेदारों में भी एक बडा तबका है जो राष्ट्रद्रोही ताकतों को अपने प्रभाव से निरंतर सहायता पहुंचा रहा है। ऐसे लोगों को सीमापार से निरंतर आर्थिक सहयोग मिल रहा है। धनलोलुपों की यह फौज अब चांदी के टुकडों पर अपनी मां का भी सौदा करने को आमादा हैं। ऐसे में पहलगाम की धरती पर यदि लम्बी चली आतंकी वारदात का वहां मौजूद दुकानदारों, घोडावानों, खोमचेवालों, होटलवालों, टैक्सीवालों सहित उपस्थित स्थानीय नागरिकों ने वीडियो नहीं बनाया, फोटो नहीं खींचे, लोगों की पहचान नहीं बताई तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। गाजा में क्या वहां का आम मुसलमान कभी हमास के सदस्य की पहचान बताता है? हिजबुल्लाह के बारे में ईरान का आम नागरिक बताता है क्या? केवल कश्मीर में ही आतंकियों के हजारों की संख्या में मददगार मौजूद हैं। 

वहां के सरकारी तबके से लेकर सार्वजनिक प्रतिष्ठानों तक में कट्टरपंथियों की जमात ने घुस पैठ बना ली है। देश के राजनैतिक हलकों में वोटबैंक की खातिर भितरघातियों की संख्या में निरंतर इजाफा हो रहा है। सरकार को देश के बाहर और अंदर दौनों जगहों पर एक साथ मोर्चा खोलना पडेगा तभी सफलता का प्रतिशत बढ सकेगा अन्यथा देश में मौजूद मीर कासिमों की फौज फिर से कार्यवाही का सबूत, सेना के शौर्य की प्रमाण पत्र और मनगढन्त आरोपों पर सफाई मांगने से बाज नहीं आयेगी। देश के कोने-कोने में बैठे टुकडे-टुकडे गैंग के मैम्बर्स और स्वयंभू बुद्धिजीवियों के खोल में बैठी बामपंथियों की टुकडियां सफलता पर भी असफलता की कालिख पोतने हेतु बेशर्मी के साथ पुनः सामने आयेंगी। इस बार बस इतनी ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।

Dr. Ravindra Arjariya, Accredited Journalist, for cont. - dr.ravindra.arjariya@gmail.com, ravindra.arjariya@gmail.com, ravindra.arjariya@yahoo.com, +91 9425146253, +91 7017361649

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2025

पहलगाम हमले से सन्न देश

अवधेश कुमार

निस्संदेह , पहलगाम के बायसरन घाटी हमले पर पूरा देश क्षुब्ध हैं। चुन-चुनकर 26 निहत्थे हिन्दू पर्यटकों की हत्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के अंदर जम्मू कश्मीर के स्पष्ट दिख रहे परिवर्तित हालात की दृष्टि से असामान्य और सन्न करने वाली घटना है। सन 2000 के बाद पहलगाम क्षेत्र का यह सबसे बड़ा हमला है जिसमें 30 लोग मारे गए थे। पहलगाम जम्मू कश्मीर का प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है और वहां से लगभग 10 किलोमीटर दूर बायसरन घाटी में पर्यटक पिकनिक मनाने आनंद लेने जाते हैं। हरियाली और पूरा वातावरण गर्मी में जम्मू कश्मीर जाने वाले पर्यटकों को खींचता है। कहने वाले इसे स्विट्जरलैंड का प्रतिरूप भी बताते हैं। लोग घुड़सवारियों से लेकर अलग-अलग किस्म का आनंद लेते हैं।  ट्रैकिंग का एक कैंप साइड है जो तोलिया झील तक पर्यटकों को ले जाता है। पहलगाम से टट्टुओं के जरिए इस क्षेत्र तक पहुंचा जा सकता है और रास्ते में पहलगाम शहर और लीडर घाटी का मनोरम दृश्य है। वायसरन नमक घास का मैदान चारों ओर घने देवदार के जंगलों और पर्वतों से घिरा है। चूंकि जम्मू कश्मीर की स्थिति पिछले 5-6 वर्षों में काफी हद तक सामान्य हो गई है इसलिए भारी संख्या में लोग अपने परिवार के साथ निर्भय होकर चारों ओर घूमते हैं। स्थानीय लोगों की दुकानें और अन्य कारोबार चल निकले हैं। यह घटना भी एक सामान्य चाय नाश्ते की दुकान पर हुई। इस तरह की दुकानें कश्मीर घाटी से नदारत हो गए थे। आतंकवादियों के लिए ऐसी जगह अंधाधुंध गोलीबारी कठिन नहीं है। घटना का विवरण और इसकी पृष्ठभूमि हमें कई बातों पर विचार करने के लिए बाध्य करता है। आखिर यह कौन सी सोच है जिसमें आतंकवादियों ने मजहब प्रमाणित करके लोगों को मारा?

प्रधानमंत्री मोदी ने घटना को इतनी गंभीरता से लिया कि सऊदी अरब की यात्रा बीच में रोक वापस लौटे, विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के साथ बैठक की तथा गृहमंत्री अमित शाह सीधे कश्मीर पहुंचे। इसके साथ गृह मंत्री शाह का घटनास्थल तक जाना आतंकवाद के विरुद्ध ही नहीं जम्मू कश्मीर को हर दृष्टि से सामान्य, शांत और समृद्ध बनाने की सरकार की प्रतिबद्धता को प्रमाणित करता है। ऐसी भूमिका से लोगों को सुरक्षा का आश्वासन मिलता है तथा आतंकवादियों एवं उनको प्रायोजित करने वाली शक्तियों को सख्त संदेश। चूंकि यह घटना अमरनाथ यात्री निवास नुनवान बेस कैंप से महज 15 किमी. दूर हुआ और 3 जुलाई से अमरनाथ यात्रा शुरू हो रही है तो यह मानने में भी समस्या नहीं है कि पर्यटकों के साथ तीर्थयात्रियों के अंदर भय पैदा करने के लिए हमला हुआ। इसके साथ अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की यात्रा तथा प्रधानमंत्री की सऊदी अरब जैसे प्रमुख मुस्लिम देश के दौरे से भी इसका संबंध जोड़ा जा सकता है।

आतंकवादी संगठन 'द रेजिस्टेंस फ्रंट' (टीआरएफ) ने हमले की जिम्मेदारी ली है। इसके बारे में जानकारी यही है कि जब पाकिस्तान पर आतंकवादी संगठनों को प्रतिबंधित करने और नियंत्रित करने का दबाव बढ़ा तो लश्कर ए तैयबा और अन्य संगठनों ने टीआरएफ नाम कर लिया। इसका प्रमुख शेख सज्जाद गुल पाकिस्तान में है। प्रधानमंत्री सऊदी अरब से लौटते समय पाकिस्तानी वायु मार्ग का इस्तेमाल नहीं करते तथा साढ़े पांच घंटे लगाकर भारत आते हैं तो इसके निहितार्थ भी स्पष्ट हैं। सरकार को पाकिस्तान की भूमिका की सटीक सूचना नहीं होती तो ऐसा नहीं होता। जो जानकारी है उसके अनुसार आतंकवादी पाकिस्तान से निर्देश ले रहे थे। आंतरिक संकटों से ग्रस्त पाकिस्तान और छवि सुधारने के लिए संघर्षरत सेना-आईएसआई के पास एकमात्र रास्ता जम्मू कश्मीर ही बचता है। जिस तरह सेना का उपहास उड़ाया जा रहा है, लोग सेना के विरुद्ध सड़कों पर उतरे हैं, उसके भ्रष्टाचार और विफलता के विवरण मीडिया, सोशल मीडिया में सामने आए हैं उनसे सेना की चिंताएं बढ़ीं हुईं हैं। सेना प्रमुख जनरल आसिफ मुनीर का घृणाजनक और मुस्लिमों को भड़काने वाला भाषण इसी कड़ी का अंग था। 

वस्तुत: जनरल मुनीर ने नए सिरे से इस्लामी जेहाद की बात की। उन्होंने कहा कि हिंदू और मुसलमान साथ नहीं रह सकते क्योंकि हम दो अलग कौम हैं। हमने पाकिस्तान के निर्माण के लिए लंबा संघर्ष किया है इसे मत भूलना। हालांकि सच यह है कि मुस्लिम लीग को पाकिस्तान निर्माण के लिए कोई आंदोलन नहीं करना पड़ा। उन्होंने जम्मू कश्मीर की चर्चा की। यह संकेत था कि सेना ने जम्मू कश्मीर में हिंसा करने की कुछ दीर्घकालीन तैयारियां की है। पाकिस्तान की आम जनता के विद्रोह से बचने के लिए यही एकमात्र रास्ता उनके पास बचा था। देश में जब भी आतंकवाद के संदर्भ में पाकिस्तान का नाम लिया जाता है कुछ लोग इसके विरुद्ध खड़े होते हैं और कहते हैं कि आर्थिक दृष्टि से विपन्न देश भारत के विरुद्ध हिंसा कैसे कर देगा। भूल जाते हैं कि हिंसा करने के लिए शक्तिशाली होना आवश्यक नहीं है। जम्मू कश्मीर में इस्लाम के नाम पर भड़काना और पहले से व्याप्त आतंकवादियों के इंफ्रास्ट्रक्चर को केवल सक्रिय करना है। जनरल मुनीर ने यही किया है। सोशल मीडिया पर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में कुछ दिनों पहले रिकॉर्ड किया गया एक वीडियो भी शेयर हो रहा है, जिसमें एक आतंकवादी जनसभा में खुलेआम भारत को लहूलुहान करने की धमकी दे रहा है। 

इनकी सोच और रणनीति देखिये। घायल पुणे की आसाबरी जगदाले बता रहीं हैं कि आतंकवादी आए तो उनका परिवार डर से टेंट के अंदर छिपा था। उन्होंने उनके 54 वर्षीय पिता संतोष जगदाले से कहा कि वे बाहर आकर कलमा पढ़ें और जब वे ऐसा नहीं कर पाए, तो उन्हें तीन बार गोली मारी। उनके चाचा को भी गोली मारी। एक महिला बता रही है कि मैं और मेरे पति भेल खा रहे थे तभी आतंकी आये और बोले कि ये मुस्लिम नहीं लग रहे, इन्हें मार दो और मेरे पति को गोली मार दी। वे मुस्लिम हैं या हिंदू यह जानने के लिए लोगों को नंगा किया गया। जम्मू कश्मीर में आतंकवाद एवं अलगाववाद के पीछे सोच इसे इस्लामी राज्य में बदलना रहा है। इस्लाम के नाम पर ही आतंकवादी वहां अपनी जान देकर हमले करते रहे हैं। जनरल आसिफ मुनीर ने केवल इसे सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त कर दिया। सेना प्रमुख के बयान का अर्थ है कि लंबे समय से इस पर काम किया जा रहा था। आतंकवादियों की योजना यही है कि वह कश्मीर के स्थानीय मुस्लिम निवासियों को संदेश दें कि हम मुसलमान होकर आपके हैं और गैर मुसलमान हमारे साझा दुश्मन हैं।

 हालांकि आतंकवादी संगठन, अलगाववादी तथा पाकिस्तान भूल रहा है कि भारत, जम्मू कश्मीर और वैश्विक अंतर्राष्ट्रीय स्थितियां भी बदली हुई है। जम्मू कश्मीर के स्थानीय लोगों को अनुच्छेद 370 हटाने के बाद बदली स्थिति का लाभ मिला है। वे खुलकर हवा में सांस लेने लगे हैं, बच्चे पढ़ने लगे हैं, खेलकूद व सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग ले रहे हैं और सबसे बढ़कर विकास उनके घर तक पहुंच रहा है। पहले की तरह वहां आतंकवादियों से मुठभेड़ में सुरक्षा बलों के विरुद्ध प्रदर्शन, पत्थरबाजी और नारा नहीं लगता। यह तो नहीं कह सकते कि आतंकवादियों का स्थानीय समर्थन बिल्कुल खत्म हो गया है क्योंकि ऐसा होने के बाद उनका वहां रहना मुश्किल हो जाता। सारे अनुभव, लोगों की प्रतिक्रियायें एवं खुफिया जानकारियां बतातीं हैं कि स्थिति पहले की तरह तो नहीं है। पुराने मंदिर एवं अन्य गैर मुस्लिम धर्मस्थल धीरे-धीरे खुले हैं। कभी पाकिस्तान को अमेरिका या कुछ यूरोपीय देशों की अंतरराष्ट्रीय नीति के कारण शह मिल जाता था किंतु अब वह अकेला है। अफगानिस्तान तक उसके विरुद्ध खड़ा है तथा अंदर बलूचिस्तान , सिंध,  वजीरिस्तान आदि में विद्रोह का झंडा बुलंद है। ज्यादातर प्रमुख मुस्लिम देश भी पाकिस्तान का साथ देने को तैयार नहीं। भारत की स्थिति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पिछले 10 वर्षों में काफी बदली है और दो बार सीमा पार कार्रवाई करके प्रदर्शित भी किया गया है कि हम प्रायोजित आतंकवाद का मुंह तोड़ जवाब देने वाले देश बन चुके हैं। अमेरिका, रूस और यूरोपीय देश ही नहीं कई मुस्लिम देशों ने इस घटना में भारत के साथ होने का बयान दिया है। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी अगर दोषियों को बख्शे नहीं जाने की बात कर रहे हैं और अमित शाह मोर्चा संभाले हैं तो आतंकवादियों और उनके प्रायोजकों के लिए अब तक का सबसे बुरा समय होगा। देश के अंदर भी मोदी सरकार को बार-बार इस्लाम विरोधी और मुसलमान विरोधी बताने वाले समझें कि वे क्या कर रहे हैं। आतंकवादियों ने पुरुषों को मारकर महिलाओं को छोड़ते हुए कहा कि जाओ मोदी को बता दो क्योंकि वह हमारे मजहब का दुश्मन है।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स,  दिल्ली -110092, मोबाइल -981027208


गुरुवार, 24 अप्रैल 2025

क्या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा देश के राष्ट्रपति को आदेश देना उचित है?

बसंत कुमार

अभी हाल ही में अपने एक निर्णय में इस अध्यादेशों को मंजूरी देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति को समय-सीमा के अंदर करने और संविधान के अनुच्छेद 142 के इस्तेमाल करने पर विवाद गहरा गया है। भारत के एक सांसद निशिकांत दुबे ने अपने बयान से इस विवाद को और अधीक गहरा दिया है उन्होंने कहा कि यदि कानून बनाना सर्वोच्च न्यायालय का काम है तो संसद को बंद कर दिया जाना चाहिए। दर असल देश के उपराष्ट्रपति जो जाने माने वकीलों भी रहे हैं श्री जगदीप धनखड़ ने सर्वोच्च न्यायालय के अधिकारों पर सवाल उठाए, जिसके बाद भाजपा के दो सांसदों निशिकांत दुबे और दिनेश शर्मा की तीखे प्रतिक्रिया आई। इसके बाद इन बयाने पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के प्रेसिडेंट कपिल सिब्बल, पूर्व प्रेसिडेंट दुष्यन्त दवे और पूर्व जस्टिस जे चेलमेश्वर की प्रतिक्रिया से इस मामले में तल्खी और बढ़ गई है आखिर इस विवाद की शुरुआत कैसे हुई।

सर्वोच्च अधिकारी ने 8 अप्रैल 2025 को एक ऐहितासिक फैसले से राज्यपाल के राज्यविधान मण्डल द्वारा पारित विधायकों पर कार्यवाही करने के लिए समय-सीमा निर्धारित कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति के लिए भी उन विधेयकों पर समय-सीमा निर्धारित कर दी जिन्हें राजयपाल ने राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए निर्धारित किया हो। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ संशोधन पर सुनवाई के दौरान सरकार से सीधे सवाल किए। इसके बाद ही सुप्रीम कोर्ट को लेकर अप राष्ट्रपति और अन्य नेताओं ने भी विवादित टिप्पणी की जिससे इस मामले में विवाद काफी गहरा हो गया। राज्यसभा इंटर्नस को संबोधित करते हुए उप राष्ट्रपति ने न्याय पालिका द्वारा राष्ट्रपति के निर्णय लेने के लिए समय-सीमा तय किए जाने पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा की सुप्रीम कोर्ट लोकतांत्रिक ताकतों पर परमाणु मिसाइल नहीं दाग सकता। उनका कहना था कि संविधान के तहत के कोर्ट के पास एक मात्र अधिकार है कि अनुच्छेद 145(3) के तहत संविधान की व्याख्या करने का। सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है और संसद के प्रति जवाबदेह होती हैं और सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति के कोई आदेश नहीं दे सकता।

हमारे देश में संसदीय लोकतंत्र है और यह राजनीतिक विचारक मोंटस्क्यू के शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत पर काम करता है और संसदीय लोकतंत्र में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका तीनों का अपना अपना रोल होता है। तीनों एक दूसरे के कार्य क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करते, हां न्यायपालिका कार्यपालिका के कार्यों की समीक्षा कर सकती है। अगर कोई कानून संविधान के दायरे में नहीं है और किसी के मौलिक अधिकारों का हनन करना है तो न्यायपालिका उसे निरस्त कर देता है। केशवानंद भारतीय केस में सुप्रीम कोर्ट की 13 जजों की बेंच ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया था कि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है लेकिन वह संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर से छेड़छाड़ नहीं कर सकते।

प्रश्न यह है कि सर्वोच्च न्यायालय संसद द्वारा बनाए गए नियमों की समीक्षा तो कर सकता तो है पर क्या वह देश के संवैधानिक हेड यानि राष्ट्रपति को अपनी शक्ति के उपयोगी के लिए समय-सीमा का निर्देश दे सकता है। राष्ट्रपति को अपनी शक्तियों की गाइडलाइंस संविधान के अंदर ही निहित है उसे किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा निर्देश नहीं दिया जा सकता। संसद द्वारा पारित विधेयक जब राष्ट्रपति की मंजूरी ले लेता है तो वह कानून बन जाता है परंतु यह भी प्राविधान है कि यदि राष्ट्रपति चाहे तो संसद द्वारा पारित विधेयक को संसद को पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है पर यदि यह बिल संसद में पुनर्विचार के पश्चात फिर राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेज दिया जाता है तो तो महामहिम को इस बिल पर हस्ताक्षर ही करने होते हैं। कहने का मतलब यह है कि राष्ट्रपति देश का संवैधानिक प्रमुख होता है और उसके द्वारा उपयोग की जाने वाली शक्तियों के उपयोग भी संविधान के अंदर ही होता है और अन्य संस्था द्वारा निर्देश दिए जाएंगे तो देश में संसदीय लोकतंत्र का ढांचा ही बिगड़ जाएगा।

जहां तक सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति के लिए संसद द्वारा पारित विधेयक को अपनी मंजूरी देने की समय-सीमा का निर्देश देने का प्रश्न है तो सर्वोच्च न्यायालय को अपने आधीन न्यायालयों का केसों का निपटाने का निर्देश दे। देश की अदालतों में करोड़ों केस दशकों से लम्बित पड़े हैं और यदि कोई व्यक्ति ट्रायल कोर्ट द्वारा किसी आपराधिक मामले में दोषी करार दिया जाता है तो उसकी अपील का निस्तारण हाई कोर्ट द्वारा बीस साल तक नहीं हो पाया और अपील कर्ता कनविक्ट का ठप्पा लगाए इस दुनिया से बिदा हो जाता है देश के अधिकांश अपील आम अपील कर्ता के लिए बेमानी होती है क्योंकि वह महंगे वकील की फीस दे नहीं सकता जो मेंशन करके उसको अपील लगवा सके। यदि संसद कानून बनाकर इन अपीलों का निस्तारण करने की समय-सीमा तय कर दे तो क्या न्याय पालिका इसे अपने अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं मानेगी। जब संसद ने न्यायपालिका में जज की नियुक्ति में पारदर्शिता लाने के लिए एन जे ए सी बनाने के लिए कानून बनाया तो सुप्रीम कोर्ट ने इसे अपने अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप माना और इसे स्टे कर दिया, इसलिए देश में संसदीय लोक तंत्र सुचारू रूप से चले यह सुनिश्चित करने के लिए कार्यपालिका विधायिका और न्यायपालिका को अपने अपने अधिकार क्षेत्र में रहकर चलना होगा।

कुछ वर्ष पूर्व एक हाईकोर्ट के जज जस्टिस कर्णन ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिख कर बीस जजों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने की बात की इसे सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका की अवमानना माना और उन्हें 6 माह को जेल कर दी। वहीं एक हाईकोर्ट के जज जस्टिस वर्मा के घर से करोड़ों रुपए का काला धन मिला पर इस मामले में एक एफआईआर तक भी हुई और जस्टिस वर्मा को सिर्फ ट्रांसफर कर दिया गया। देश की न्यायपालिका पर लोग अटूट आस्था रखते है और यह बरकरार रहनी चाहिए।

यह सही है कि कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं संसद (विधायिका) तीनों ही अपने अपने क्षेत्रों में सुप्रीम है पर भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति को आदेश देकर सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अधिकार क्षेत्रों को लांघने का काम किया है। सर्वोच्च न्यायालय को इस बात का आत्मावलोकन करना होगा कि देश के विभिन्न न्यायलयों में करोड़ों केस कई दशकों से पेंडिंग पड़े हैं और न्याय की आस लगाए लोगों कि पीढ़ियां गुजर जाती है इस कारण हमारे लोक तंत्र के सभी स्तंभों को अपनी अपनी सीमा में रहकर अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करना होगा।

(लेखक एक पहल एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव और भारत सरकार के पूर्व उपसचिव है।)

http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/