गुरुवार, 4 जुलाई 2024

संसद से लेकर उच्च न्यायालय तक हिंदू-मुसलमान की चर्चा


 बसंत कुमार

18वीं लोकसभा के पहले ही सत्र में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हिंदू सहिष्णु या हिंसक का विवाद थमा ही नहीं था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देश में धार्मिक सभाओं में बड़े पैमाने पर दलित व आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों का धर्मांतरण पर चिंता व्यक्त की और कहा कि इसे तुरंत रोका जाना चाहिए। अगर धर्मांतरण नहीं रुका तो देश की बहुसंख्यक आबादी एक दिन अल्पसंख्यक हो जायेगी। जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल एक धर्म परिवर्तन कराने वाले आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह बात सामने आई है कि धार्मिक समाग़मों के जरिये दलितों और गरीब लोगों को गुमराह करके ईसाई बनाया जा रहा है, कोर्ट ने कहा कि किसी धर्म के प्रचार शब्द का अर्थ बढ़ावा देना है लेकिन इसका अर्थ एक व्यक्ति को एक धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तित करना नहीं है। ऐसे आयोजन से संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन होता है। यह अनुच्छेद किसी को भी धर्म मानने, पूजा करने और किसी को भी अपने धर्म का प्रचार करने की इजाजत देता है। पर यह धर्म किसी को डरा धमकाकर या प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन की इजाजत नहीं देता, अब प्रश्न यह उठता है कि देश के किसी नागरिक को अपनी पसंद का धर्म चुनने की आजादी नहीं होनी चाहिये या जो व्यक्ति जिस धर्म को मानने वाले परिवार में जन्म ले लिया है उसे जीवन पर्यन्त वहीं धर्म अपनाना होगा जैसा कि भारत में जन्मा कोई व्यक्ति जीते जी अपनी जाति नहीं बदल सकता।

आज के आधुनिक युग में अगर देश के किसी गांव में किसी से पूंछ लिया जाए कि गांव में किस धर्म के मानने वाले कितने लोग रहते हैं तो अमूमन जवाब मिलता है कि इस गांव में इतने घर हिंदू के है, इतने घर मुसलमानो के है और इतने घर हरिजनों (दलितो) के है अर्थात कुछ धर्मांध अभी भी दलितों को हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं मानते और दलित मुसलमानों की हिंसक प्रवृत्ति के कारण अपने आपको उनसे जोड़ नहीं पाते जैसा बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक पाकिस्तान एंड पार्टिशन ऑफ इंडिया में लिखा है और उन्होंने मुहम्मद अली जिन्ना और जोगिंदर नाथ मण्डल के दलित मुस्लिम अलायंस का परिणाम भी देखा है। इसी कारण अधिकांश दलित व आदिवासी स्वयंभू हिंदू ठेकेदारों के रवैये से दुखी होकर ईसाई धर्म की ओर उन्मुख हो रहे है। कुछ सनातन के पोषक तो मेरिट की आड़ में संविधान द्वारा दलितों और आदिवासियों को संविधान द्वारा दी गई सुविधाओं का भी विरोध करते है। इसके बावजूद कुछ दलित आदिवासी यह जानते हुए कि उनके ईसाई धर्म अपनाने पर उनको मिलने वाली आरक्षण की सुविधाएं समाप्त हो जायेगी फिर भी वे ईसाई धर्म अपना रहे है। इस विषय पर हिंदू धर्म गुरुओं और नेताओ को इस बात पर विचार करना होगा कि क्या कारण है कि बड़े पैमाने पर दलित और आदिवासी ईसाई धर्म क्यों अपना रहे है। माननीय उच्च न्यायालय को धर्मांतरण पर अपना विचार देते समय इस तथ्य की ओर अपने विचार भी रखने चाहिए थे।

लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्ताव पर चर्चा में भाग लेते हुए राहुल गांधी ने कहा-सभी सभी धर्मो और हमारे सभी महापुरुषों ने अहिंसा और निडरता की बात की है। शिव जी कहते हैं डरो मत डराओ मत, वह अहिंसा की बात करते है। लेकिन जो लोग अपने आप को हिंदू कहते है वो लोग 24 घंटे नफरत की बात, हिंसा की बात करते है। राहुल गांधी के दिये भाषा को लेकर भाजपा बेहद आक्रामक रही और उनसे माफी मांगने की बात कर रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा आज हिंदुओ पर झूठा आरोप लगाने की साजिश हो रही है, और कहा जा है कि हिंदू हिंसक होते है और देश इसे शताब्दियों तक नहीं भूलेगा। ये यही लोग है जिन्होंने हिंदू आतंकवाद जैसे शब्द गढ़ने की कोशिश की, यह देश इसे माफ नहीं करेगा। सदन में यह दृश्य देखकर अब हिंदू समाज को सोचना पड़ेगा कि क्या यह अपमानजनक बयान कोई संयोग है या बड़े प्रयोग की तैयारी है।

उन्होंने स्वामी विवेकानंद को उद्धरित करते हुए कहा "मै उस धर्म से आता हूं जिसने दुनिया को सहिष्णुता और वैश्विक स्वीकृति सिखाई परंतु यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि उसी सहिष्णु और वैश्विक स्वीकृति वाले देश में प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष हिंदू धर्म को हिंसक कहने और सहिष्णु कहने पर आमने सामने खड़े है।

लगभग दो वर्ष पूर्व जब दिल्ली के शाहीनबाग में सीएए के विरोध में मुसलमानों ने करीब 6 माह तक सड़क जम किए रखा तब किसी राजनीतिक दल के नेता ने मुसलमानों को हिंसक कहने का साहस नहीं दिखाया। यह सही है कि कुछ अंध भक्त हिंदू राम के नाम पर हिंसा फैला रहे है और अपने ही धर्म के दलितों और आदिवासियों को मन्दिर में प्रवेश की अनुमति नहीं देते क्योंकि वे उन्हें हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं मानते, पर क्या धर्म के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने वालों के कारण हिंदू धर्म की सहिष्णुता और स्वीकारिता पर प्रश्न खड़ा कर सकते है, कैसा दुर्भाग्य है कि जिन लोगों को हमारे देश की आर्थिक प्रगति, किसानो की समस्या, युवाओं की बेरोजगारी कि समस्या को सुलझाने के उपायों पर चर्चा करनी चाहिए वे आपस में नकली और असली हिंदू की बहस पर लड़ रहे है। पर इस देश की जनता सब समझती है और आगे आने वाले चुनावों में किसी भी दल को अब जाति और धर्म के नाम पर वोट नहीं मिलने वाले है अब लोग हिंदू मुस्लिम नहीं बल्कि रोजी, रोटी और विकास के नाम पर मिलेगा।

संभवत:पूरे विश्व में भारत ही ऐसा देश है जहां संसद से लेकर उच्च न्यायपालिका में गरीब, बेरोजगारी, दशकों से न्यायालयों में करोड़ों लंबित मुकदमे और विकास पर विचार करने और उनके सुलझाने हेतु आवश्यक कदम उठाने के बजाय सत्ता पक्ष और विपक्ष धर्म विशेष के सहिंष्णु या आक्रमक होने के मुद्दे पर बहस करते है और उच्च न्यायालय भी दसको से लंबित मुकदमो को निपटाने और करोड़ों परिवारों को न्याय दिलाने के बजाय धर्मांतरण जैसे सामाजिक मुद्दों पर अपना फैसला देते है जबकि यह प्रकृति का नियम है कि कोई भी व्यक्ति अपनी पसंद का धर्म अपना सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि देश के सभी लोग पर्याप्त रूप से शिक्षित हो जिससे स्वेच्छा से अपने धर्म का चयन कर सके हां जिस दिन देश में व्यक्ति को अपनी इक्षा से अपने कर्म और जाति चुनने की आजादी मिल जायेगी तब देश में सही लोकतंत्र होगा।

बुधवार, 3 जुलाई 2024

नई लोकसभा में विपक्ष के तेवर के मायने स्पष्ट हैं

अवधेश कुमार

18वीं लोकसभा के अध्यक्ष के निर्वाचन के दौरान और उसके बाद का दृश्य निश्चित रूप से देश को एक हद तक राहत देने वाला था। आक्रामक मोर्चाबंदी के बाद विपक्ष ने संसद में मत विभाजन की मांग नहीं की। इस कारण ओम बिरला का दूसरी बार लोकसभा अध्यक्ष के रूप में निर्वाचन प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित हुआ। विपक्ष अपने पूर्व के तेवर के अनुरूप यदि के सुरेश और ओम बिरला के बीच मतदान पर अड़ता तो तस्वीर दूसरी होती। हालांकि संख्या बल के आधार पर सरकार की ओर से लाए गए उम्मीदवार ओम बिरला का निर्वाचन निश्चित था लेकिन विपक्ष भी अपनी ताकत दिखाना चाहता था। लगता है सरकार के रणनीतिकारों ने विपक्ष के साथ अंदर ही अंदर काफी बातचीत की, उन्हें मनाने का प्रयास किया और उसमें एक हद तक सफलता मिली। सरकार का तर्क यही था कि अध्यक्ष पद को राजनीति से दूर रखने के लिए ओम बिरला का निर्वाचन सर्वसम्मति से होना चाहिए। इसमें सरकारी पक्ष सफल नहीं हुआ लेकिन कम से कम मत विभाजन नहीं हुआ यह भी आज की स्थिति को देखते हुए बड़ी बात है। दूसरे, ओम बिरला के निर्वाचन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें बधाई देने गए तो विपक्ष के नेता के रूप में राहुल गांधी भी आए और प्रधानमंत्री ने स्वयं उन्हें अपने हाथ से आगे आने का इशारा किया। फिर परंपरा के अनुरूप सदन के नेता एवं विपक्ष के नेता तथा साथ में संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू उन्हें आसान तक ले गए। आसन पर बैठने के बाद प्रधानमंत्री ने पहले उनसे हाथ मिलाए और फिर राहुल गांधी की ओर मुड़कर उन्हें आगे किया, फिर प्रधानमंत्री एवं राहुल गांधी ने भी हाथ मिलाया । इससे संदेश यह निकलता है कि राजनीति में आपसी दुश्मनी की स्थिति होते हुए भी हमारे राजनेता महत्वपूर्ण अवसरों पर अपनी भूमिका का गरिमा में निर्वहन कर सकते हैं । हालांकि इससे यह मान लेना गलत होगा कि विपक्ष ने सरकार के साथ समन्वय बनाकर काम करने का मन बनाया है।

वास्तव में 18 वीं लोकसभा में शपथग्रहण के समय से  विपक्ष का तेवर बता रहा है कि वह सरकार को आसानी से काम करने देने की मन:स्थिति में नहीं है। लोक सभा एवं राज्यसभा के राष्ट्रपति अभिभाषण संबंधी सत्र में विपक्ष का तेवर स्पष्ट रूप से मुखर होकर सामने आया है। शुरुआत से ही ऐसी स्थिति थी। आईएनडीआईए के सारे सांसद गांधी जी की प्रतिमा के पुराने स्थल से हाथों में संविधान लहराते हुए जिस तरह नारा लगाते आगे बढ़े वह चिंतित करने वाला दृश्य था। कम से कम सांसदों के शपथ ग्रहण के अवसर को प्रदर्शनों से दूर रखा जा सकता था। सरकार ने अभी ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है जिसके लिए विपक्ष को इस तरह विरोध की एकजुटता प्रदर्शित करनी पड़े। विरोध के लिए आगे पूरा अवसर बना हुआ है। संसद में बजट आना है और भी कई विधेयक आने वाले हैं उन सब पर विपक्ष अपना तेवर दिखा सकता था, दिखाएगा भी। इसी तरह स्वयं विपक्ष का अपना एजेंडा है जो समय-समय पर संसदीय नियमों का लाभ उठाते हुए प्रस्तुत करने की कोशिश करेगा। सांसदों के शपथ ग्रहण यानी 18वीं लोकसभा की शुरुआत में विपक्ष ने अपनी रणनीति के तहत ही आक्रामक विरोधी चरित्र प्रदर्शित किया है। पहले भर्तृहरि मेहताब को प्रोटेम स्पीकर बनाए जाने का विरोध हुआ। कांग्रेस ने यह भी कह दिया कि उनकी पार्टी भर्तृहरि मेहताब को सहयोग नहीं करेगी। उससे भय पैदा हुआ लेकिन सभी कांग्रेसी सांसदों ने अंततः भारतीय भर्तृहरि मेहताब की अध्यक्षता में ही शपथ ग्रहण किया। इसके पूर्व कभी प्रोटेम स्पीकर को लेकर इस तरह विरोध हुआ हो इसके रिकॉर्ड अभी तक सामने नहीं आए हैं। कांग्रेस की मांग थी कि के सुरेश आठ बार के सांसद हैं इसलिए उन्हें प्रोटेम स्पीकर बनाना चाहिए। सरकार का कहना था कि के सुरेश एक बार सांसद नहीं रहे हैं जबकि भर्तृहरि मेहताब लगातार सात बार सांसद रहे हैं। यह विषय असहमति का है। संविधान में कहीं इसका उल्लेख नहीं है कि प्रोटेम स्पीकर किसे बनाया जाए।

उसके बाद से विपक्ष ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि वह लोकसभा चुनाव के दौरान उठाए गए मुद्दों और अपनाए तेवरों से पीछे हट रहा है। आप ओम बिरला के लोकसभा अध्यक्ष बनने के बाद दिए गए विपक्ष के नेताओं के भाषणों को देखिए तो काफी कुछ स्पष्ट हो जाएगा। उदाहरण के लिए राहुल गांधी ने कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि आपके नेतृत्व में संविधान की रक्षा होगी। आप विपक्ष को पूरी तरह बोलने का अवसर देंगे जिससे आमजन की आवाज संसद में आ सके। उन्होंने पूर्व लोकसभा में सांसदों के निलंबन पर भी कटाक्ष किया। ठीक इसी तरह समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भी लोकसभा अध्यक्ष पर कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि आप सत्ता पक्ष को तो मौका देते ही है लेकिन अब उम्मीद है कि विपक्ष को भी अवसर देंगे। फिर उन्होंने भी भविष्य में सांसदों के निलंबन न होने की उम्मीद जताई। इसी तरह तृणमूल कांग्रेस के सुदीप बंदोपाध्याय एवं अन्य नेताओं के भाषण अध्यक्ष को भी दलीय राजनीति में घसीटने और उनको कटघरे में खड़ा करने वाला ही था। अध्यक्ष के निर्वाचन के बाद सभी उन्हें धन्यवाद देते हैं, उनकी प्रशंसा करते हैं और उनकी अध्यक्षता में संसद के संचालन में सहयोग करने का वादा करते हुए शुभकामना भी देते हैं। विपक्ष के भाषण में ये विषय थे किंतु उनकी धारा बिल्कुल अलग थी।

इसके बाद राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के संयुक्त सत्र के अभिभाषण को लेकर भी विपक्ष ने सरकार के साथ सहयोग या सहकार वाली भूमिका का संदेश नहीं दिया। आम आदमी पार्टी द्वारा अभिभाषण का बहिष्कार तथा शिवसेना उद्धव ठाकरे द्वारा उसका समर्थन बताता है कि संसद को लेकर विपक्ष की राजनीति किस दिशा में जाने वाली है। शिवसेना- उद्धव ठाकरे के सांसद संजय राउत में कहा कि बहिष्कार बिल्कुल ठीक है‌। यह सरकार तानाशाही रवैया अपनाती है और उसमें राष्ट्रपति का भी योगदान है। राष्ट्रपति को दलीय राजनीति में घसीटना अन्य सभी घटनाक्रमों से ज्यादा चिंतित करने वाला है। राष्ट्रपति देश के अभिभावक के तौर पर स्वीकार किए जाते हैं। हमारे देश में राष्ट्रपति संवैधानिक प्रमुख हैं, पर ल उन्हें मंत्रिमंडल के निर्णय के अनुसार ही भूमिका निभानी पड़ती है। बावजूद विपक्ष राष्ट्रपति पर इस तरह के हमले से बचता रहा है। आपातकाल के दौरान फखरुद्दीन अली अहमद की भूमिका को छोड़ दें तो अभी तक संजय राउत की तरह राष्ट्रपति की आलोचना करने जैसा वक्तव्य सामने नहीं आया था। फखरुद्दीन अली अहमद के विरुद्ध भी विपक्ष को बोलने का मौका नहीं मिला था क्योंकि सभी जेल में डाल दिए गए थे। राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद कांग्रेस सहित सभी विपक्षी नेताओं की प्रतिक्रियाएं देखें तो सरकार पर पूरी तरह हमलावर है। वैसे राष्ट्रपति अभिभाषण के द्वारा सरकार ने भी स्पष्ट कर दिया कि वह अपनी पूर्व नीतियों पर ही आगे बढ़ाने वाली है। यानी विपक्ष का कोई दबाव उसे अपने रास्ते से पीछे हटने या मुड़ने के लिए विवश नहीं कर सकता। वह हमले का जवाब प्रति हमले से देगी। 

वस्तुत: विपक्ष का आकलन है कि संविधान खत्म करने, आरक्षण खत्म करने और अन्य प्रकार के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सरकार विरोधी तेवरों से उन्हें चुनाव में लाभ मिला है।  इसे आगे बनाए रखा गया तो वह सरकार को सत्ता से हटाने में सफल होंगे। विपक्ष की रणनीति बिल्कुल साफ है– देश में सरकार के हर समय अस्थिर होने का संदेश देना, इससे लगातार टकराव करते रहना, आरोप लगाते रहना तथा जब भी मौका आए सरकार को झकझोर कर गिराने का प्रयास करना। साफ है कि सरकार भी ईंट का जवाब पत्थर से देने का संदेश दे रही है। इसमें हमें संसद के सुचारू रूप से संचालन या भविष्य में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राष्ट्र व जनता के हितों को लेकर स्वाभाविक सहयोग और समन्वय की कल्पना नहीं करनी चाहिए।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092 , मोबाइल -9811027208

मंगलवार, 2 जुलाई 2024

बिग मैच में विराट खेलकर बनते कोहली

विवेक शुक्ला
विराट कोहली ने टी-20 वर्ल्ड कप के फाइनल में शानदार पारी खेलकर एक बार फिर से सिद्ध किया कि वे बिग मैच प्लेयर हैं। वे कभी भी फॉर्म में वापसी करने की कुव्वत रखते हैं। वे इसलिए ही महान नहीं हैं, क्योंकि उनके आंकड़ें बेहद शानदार हैं। वे पेले और डिएगो माराडोना के कद के महान खिलाड़ी इसलिए बनते हैं,क्योंकि वे सेमी फाइनल और फाइनल जैसे अहम मैचों में छा जाते हैं। देखिए मेहनत बहुत सारे खिलाड़ी करते हैं। पर अच्छा प्रदर्शन करने के बाद भी सब महान नहीं कहलाए जाते। वे ही महान खिलाड़ी माने जाते हैं, जो विपरीत हालातों और उन मैचों में शानदार खेल दिखाते हैं जब उनसे उनकी टीम और उनक चाहने वाले अपेक्षा करते हैं। विराट कोहली का भी जलवा बड़े कांटे के मैचों में देखते ही बनता है। पेले, और माराडोना के करियर को देख लें। आप इस नतीजे पर पहुंचेंगे कि ये खास मैचों में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते थे।  
विराट कोहली शनिवार को जब साउथ अफ्रीका के खिलाफ बैटिंग कर रहे थे, तब राजधानी के पश्चिम विहार की एलआईसी कॉलोनी में रहने वाले दुआ कर रहे थे कि उनका विराट बेहतरीन पारी खेले। इस कॉलोनी वालों ने  विराट कोहली को यहां सुबह-शाम खेलते हुए देखा है। इधर ही विराट कोहली का बचपन बीता। इधर अभी सामाजिकता बची हुई है। विराट कोहली  2011 की वर्ल्ड कप विजयी टीम इंडिया का सदस्य था। वर्ल्ड कप जीत कर वापस घर आया तो एलआईसी कॉलोनी के दोस्तों के साथ मस्ती करने लगा। उसके घर में ही यंग ब्रिगेड का जमावड़ा लगा रहता। विराट सुनाता और सुनते बाकी सब। अब उसके पास पैसा आ गया था। इसलिए खेल के बाद वो अपने दोस्तों को पश्चिम विहार की एच-9 की या फिर ज्वालाहेड़ी की मार्केट में लेकर जाने लगा। ये सब कभी-कभी राजौरी गार्डन भी जाने लगे। वहां पर जाकर खाई जाती आइसक्रीम। स्टारडम से कोसों दूर बसती थी उसकी दुनिया। वो यहां पर रहते हुए सुपर स्टाऱ बन गया था। पर वो एलआईसी कॉलोनी के किसी अंकल जी या आंटी जी के चरण स्पर्श करने से कभी पीछे नहीं हटा। शादी से पहले ही विराट कोहली ने अपनी मां के साथ गुरुग्राम में शिफ्ट कर लिया था। वहां पर बना लिया किले जैसा घर। पर उसका पश्चिम विहार से रिश्ता बना हुआ है। उसका बड़ा भाई विकास अब भी एलआईसी कॉलोनी में ही सपरिवार रहता है। उसे विराट ‘वीर जी’ कहता है। विराट कोहली कितनी ही बुलंदियों को छू ले पर एलआईसी कॉलोनी वालों के लिए वह अब भी चीकू ही है। वे उसे चीकू ही कहते हैं।

विराट कोहली सरीखे खिलाड़ी कमजोर प्रतिदंदियों के खिलाफ जल्दी आउट हो जाते हैं। लेकिन, जब चुनौती बड़ी होती है तब  ये रंग में आ जाते हैं। विराट कोहली टी-20 वर्ल्ड कप में फाइनल से पहले कुछ खास नहीं कर पा रहे थे। हां, वे फाइनल में छा गए।विराट कोहली विश्व नागरिक बन चुके हैं। उन्हें उन सब देशों में पसंद किया जाता हैं, जहां पर क्रिकेट खेली जाती है।
विराट कोहली का क्रिकेट के मैदान में जुझारू तरीके से खेलने के अलावा एक दूसरा भी चेहरा है। वे जब क्रिकेट नहीं खेल रहे होते हैं या कहें कि फुर्सत में होते हैं तो वे सपरिवार वृंदावन जाना पसंद करते हैं। विराट कोहली वृंदावन में श्री परमानंद जी का आशीर्वाद लेने जाते हैं। वे ऋषिकेश में दयानंद गिरि आश्रम में भी जाते हैं। दयानंद गिरि आश्रम में विराट और उनकी पत्नी अनुष्का कई बार यात्रा कर चुकी है। वे कुछ समय पहले उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर पहुंचे थे। उन्होंने सुबह चार बजे भस्म आरती की और भगवान का आशीर्वाद लिया। विराट कोहली ने आरती के बाद मंदिर के गर्भगृह में जाकर पंचामृत पूजन अभिषेक किया। विराट कोहली ने गले में रुद्राक्ष की माला भी धारण की।
विराट कोहली ने टी-20 क्रिकेट से सन्यास लेने की घोषणा कर दी है। उनकी इस घोषणा से उनके करोड़ों चाहने वाले उदास तो जरूर हुए होंगे। बस इतनी गनीमत है कि वे अभी एक दिवसीय क्रिकेट और टेस्ट मैच खेलते रहेंगे। विराट कोहली क्रिकेट और ब्रांड की दुनिया के बादशाह हैं। विराट कोहली स्मार्ट और हैंडसम हैं। उन्हें सुपर फिट रहने का जुनून है। उनसे एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनकी फिटनेस के बारे में पूछा। विराट कोहली का कहना था कि मुझे लगा कि अगर अपनी फिटनेस पर ध्यान नहीं दिया तो मेरा करियर खत्म हो जाएगा। वह बहुत नपा-तुला खाना खाते हैं। जिस व्यक्ति से प्रधानमंत्री फिटनेस के बारे में पूछे, उससे आप अंदाजा ला सकते हैं कि उसका कद क्या होगा। प्रधानमंत्री मोदी उनके विवाह में भी शामिल हुए थे।
अपनी तमाम उपलब्धियों के बावजूद विराट कोहली की विनम्रता अनुकरणीय है। वे बिशन सिंह बेदी के सार्वजनिक रूप से चरण स्पर्श करते थे। दिल्ली क्रिकेट के केन्द्र फिरोजशाह कोटला मैदान में होने वाले कार्यक्रमों में विराट कोहली कई बार बेदी  के चरण स्पर्श करते हुए देखे गए। उन्होंने यह मुकाम परिश्रम, साधना और पक्के इरादे से पाया था। विराट कोहली का संबंध दिल्ली के एक सामान्य बिजनेस करने वाले परिवार से है। विराट के पापा प्रेम कोहली और मां सरोज ने उन्हें अभावों के बावजूद हरसंभव आगे बढ़ने के अवसर दिए। आजकल शांत दिखने वाले विराट कोहली कुछ साल पहले तक काफी अलग थे। वे बात-बात पर आवेश में आ जाया करते थे।
आपको याद होगा कि पिछले साल मार्च के महीने में  भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में टेस्ट शुरू होने से पहले जब भारत का राष्ट्रगान हुआ तो प्रधानमंत्री मोदी, विराट कोहली और भारतीय टीम के कप्तान रोहित शर्मा साथ-साथ खड़े थे।
विराट कोहली से बड़े बड़े ब्रांड जुड़ने के लिए बेकरार रहते हैं। विराट कोहली ने अपना पहला एड कैम्पेन 2010 में किया था। फास्ट्रैक का ये कैम्पेन उन्होंने अभिनेत्री जिनिलिया डिसूजा के साथ किया था। वो डील थी सिर्फ 25 लाख की और आज कोहली 7 करोड़ रुपये रोज के हिसाब से लेते हैं किसी ब्रांड के विज्ञापन के लिए। विराट कोहली पैसे कमाने के लिए ही किसी भी उत्पाद को प्रमोट नहीं करते हैं। विराट कोहली शीतल पेय पदार्थ पेप्सी और गोरा बनाने वाली एक उत्पाद के प्रचार करने से मना कर दिया था। विराट कोहली मानते हैं कि ये उत्पाद जंक फूड और नस्लवाद को बढ़ावा देते हैं। आप चाहें तो ऊपर वाले का धन्यवाद कर सकते हैं कि आप विराट कोहली को मैदान में खेलते हुए देख रहे हैं

सोमवार, 1 जुलाई 2024

अब आईपीसी की धाराओं की जगह, भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) होगी लागू

@302 (हत्या) की जगह होगी_103

@307 (हत्या का प्रयास)_109

@323 (मारपीट) 115 

@354(छेड़छाड़) की जगह_74

@354ए (शारीरिक संपर्क और आगे बढ़ना)_76

@354बी (शारीरिक संस्पर्श और अश्लीलता_75

@354सी (ताक-झांक करना)_77

@354डी (पीछा करना)_78

@363 (नाबालिग का अण्डरण करस)_139

@376 (रेप करना)_64

@392 (लूट करना)_309

@420 (धोखाधड़ी)_318

@506 (जान से मारने की धमकी देना_351

@304ए (उपेक्षा द्वारा मृत्यु कारित करना_106

@304बी (दहेज हत्या)_80

@306 (आत्महत्या के लिए उकसाना_108

@509(आत्महत्या का प्रयास करना_79

@286(विस्फोटक पदार्थ के बारे में उपेक्षापूर्ण आचरण)_287

 @294( गाली देना या गलत इशारे करना)_296

@509 लज्जा भंग करना)_79

@324 जानबूझकर चोट पहुंचाना)_118(1)

@325 (गम्भीर चोट पहुंचाना)_118(2), 

@353 (लोकसेवक को डरा कर रोकना_121

@336 दूसरे के जीवन को खतरा पहुंचाना_125

@337 (मानव जीवन को खतरे वाली चोट पहुंचाना)_125(ए)

@338 (मानव जीवन को खतरे वाली चोट_125(बी)

@341 (किसी को जबरन रोकना_126

@284 विषैला पदार्थ के संबंध में अपेक्षा पूर्ण आचरण_286

@290 (अन्यथा अनुबंधित मामलों में लोक बाधा दंड)_292

@447 अपराधिक अतिवार_329(3)

@448 (गृह अतिचार के लिए दंड)_329(4)

@382 (चोरी के लिए मृत्यु क्षति_304

@493 दूसरा विवाह करना)_82

@495ए (पति या उसके रिश्तेदार द्वारा क्रूरता)_85

शुक्रवार, 28 जून 2024

नीट सहित अहम प्रतियोगिताओं में पेपर लीक मामले दुर्भाग्यपूर्ण

बसंत कुमार

अभी आम चुनावों से कुछ माह पूर्व उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित पुलिस भर्ती परीक्षा के पेपर लीक का मामला थमा ही नहीं था कि पूरे देश में मेडिकल की पढ़ाई के लिए प्रवेश के लिए आयोजित होने वाली परीक्षा नीट में भारी गड़बड़ी और पेपर लीक के मामले ने पूरे देश में मेडिकल में प्रवेश के इच्छुक छात्रों के मन में निराशा और अशांति फैला दी है। पेपर लीक की समस्या सिर्फ उत्तर प्रदेश या बिहार जैसे पिछडा समझे जाने वाले राज्यो तक ही सीमित ही नहीं है। पेपर लीक की समस्या एक महामारी की तरह एक संगठित रूप से संचालित मशीनरी की तरह काम कर रही है, जिसमे छात्र माफिया, कोचिंग सेंटर, प्रिंसिपल और अधिकारी तक शामिल है। जम्मू से लेकर उत्तर प्रदेश, कर्नाटक से लेकर गुजरात और अरुणाचल प्रदेश तक पिछले 5 वर्षों में पेपर लीक के 41 मामलों की आधिकारिक मामलों में पुष्टि हुई है। महामारी की तरह फैली हुई इस बीमारी को रोकने में शिक्षा बोर्ड, कर्मचारी चयन आयोग और अन्य भर्ती एजेंसियां पूरी तरह से असफल हुई है।

पता चला है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने अध्यादेश की जरिये इन मामलों को रोकने के लिए आजीवन कारावास् समेत एक करोड़ रुपए तक के फाइन का प्रावधान कर दिया है, अब देखना है कि इतनी सख्त सजा के प्रावधान के बावजूद परीक्षाओं के पेपर लीक के मामलों में कमी आयेगी या नहीं। अब यह समस्या एक सामाजिक समस्या बन गई है। चुनाव के समय हर राजनीतिक दल अपने अपने समर्थकों को मुफ्त की रेवड़ियां बांटने की घोषण करता है जिससे उन्हें वोट मिल सके। पर कोई भी दल युवाओं को इस तरह का आश्वासन देने की हिम्मत नहीं करता कि हम देश में युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं में निष्पक्ष पारदर्शितापूर्ण परीक्षा दे पाएंगे। इस मामले में संघ लोक सेवा आयोग को छोड़कर सारे भर्ती बोर्ड या भर्ती एजेंसियां असफल रहे हैं। वर्ष 2022 में राजस्थान में धोखाधड़ी विरोधी कानून भी पारित किया गया और इसमे सजा के तौर पर आजीवन कारावास के प्रावधान को शामिल किया गया। भारतीय संसद द्वारा फरवरी 2024 में इसी तरह का कानून पारित करने के बावजूद आज भी इस अपराध में सैकड़ों लोग गिरफ्तार किए गए है।

युवाओं के लिए पेपर लीक की घटनाएं पीड़ादायक और विनाशकारी है, यह जिंदगी में रुकावट, तनावपूर्ण परिवार और तार-तार हो जाने वाले को जन्म देती है और राज्य की निष्पक्ष रूप में भर्ती परीक्षा आयोजित करने में असमर्थता प्रदर्षित करती हैं और ये राज्य की सेवा में आयी अक्षमता भी दर्शाती है। जब केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान सांसद के रूप में शपथ लेने जा रहे थे तो पूरे विपक्ष में नीट-नीट के नारे लगाकर उन्हें हूट किया, जो उचित नहीं है। यह सच है कि सिविल सर्विस और आईआईटी के पश्चात् नीट देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा मानी जाती है और इसके पेपर लीक होना और कुछ सेलेक्टेड लोगों को ग्रेस मार्क देना बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।

इस समस्या के प्रति सभी दलों को पार्टी लाइन से हटकर संजीदगी से रोकने की आवश्यकता है क्योंकि एक दूसरे पर दोषारोपण से इस समस्या से छुटकारा नहीं मिलने वाला। विपक्षी गठबंधन इंडिया की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को यह समझना चाहिए कि पिछले पांच वर्षों में राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस के कार्यकाल में सबसे अधिक पेपर लीक हुए और उसी कांग्रेस के सांसद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को नीट-नीट करके हूट कर रहे थे, वहीं इंडिया गठबंधन के सहयोगी राष्ट्रीय जनता दल के तीन वरिष्ठ नेता लालू यादव, तेजस्वी यादव और राबड़ी देवी पर लैंड फॉर जाब स्कैम में चार्जशीट दाखिल हो चुकी है। ऐसी घटनाओं से व शिक्षित युवा जिनके पास न पैसा है न जुगाड़ है, निराश और हताश होकर आत्महत्या जैसे कदम उठाते हैं।

एक समय लोकसभा में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए पदोन्नति में आरक्षण के लिए बहस चल रही थी और इस बिल के विरोध में बोलते हुए समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने कहा कि यदि प्रमोशन में भी आरक्षण दिया गया तो हमे कुशल और दक्ष सचिव और कैबिनेट सचिव स्तर के अधिकारी नहीं मिलेंगे और मेरे विचार में श्री मुलायम सिंह यादव के विचारों पर बहस या चर्चा की जा सकती है और आरक्षण का विरोध करने वाले यह भी तर्क देते है कि यदि 30% अंक प्राप्त करने वाले डॉक्टर बनेंगे तो मरीजों का इलाज कैसे होगा। पर कोई माई का लाल इस बात पर प्रश्न खड़ा नहीं करता कि पैसे और रसूक के बल पर निकम्मे लोग पेपरलीक कराकर डॉक्टर, पुलिस कर्मी और रेल कर्मी बन जायेंगे तो मेरिट का रोना रोने वालों का क्या होगा और तब हमारे पुलिस और प्रशासन की दक्षता पर विपरीत असर नहीं पड़ेगा। यदि हमे पुलिस और प्रशासन को दक्ष बनाना है तो प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और सोल्वर गैंग को जड़ से उखाड़ देना होगा, इसके लिए सभी राजनीतिक दलों को अपने मतभेद भुलाकर इस समस्या का हल निकालना होगा। जहां आज हमने पूरे विश्व के समक्ष एक मजबूत आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित करने में सफलता पाई है पर वहीं हम सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में प्रवेश के लिए आयोजित परीक्षाओं में पूरी निष्पक्षता और पारदर्षिता स्थापित करने में पूरी तरह से असफल रहे है और यही हमारा दुर्भाग्य है।

देश में शिक्षित युवा सरकार द्वारा आउटसोर्सिंग के नाम पर संविदा के आधार पर भर्ती किए गए कर्मचारियों से काम चला रही प्रैक्टिस से हताश और निराश है और दूसरी ओर पेपर लीक और पेपर सोल्वर् गैंग के कारण वे बेहद निराशा जनक हाल में पहुँच गए हैं, आखिर विकास का ढोल पीटने वाली सरकार इन युवाओं के लिए कब सोचेगी।

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