शुक्रवार, 3 मई 2024

सैम पित्रोदा के विरासत टैक्स सुझाव पर घमासान क्यों?

बसंज कुमार

पिछले सप्ताह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व आर्थिक मामलों के जानकर सैम पित्रोदा ने अमेरिका में लिए जाने वाले विरासत टैक्स को भारत में भी लिए जाने के लिए बहस का सुझाव दिया। इस पर पूरे राजनीतिक हलको में उनके इस सुझाव की तीखी आलोचना शुरू हो गई और उनकी अपनी पार्टी ने इसे उनका निजी विचार कहकर पल्ला झाड़ लिया। परंतु विपक्ष या सत्ता पक्ष के आर्थिक मामलों के जानकर ने यह कहने का साहस नहीं किया कि भारत एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति है और यहां इंफ्रेस्ट्रॅक्चर के विकास के लिए राजस्व की अवश्यकता है और राजस्व कलेक्शन के लिए यह एक बेहतर सुझाव हो सकता है। मेरी विरोधी राजनीतिक दलों से संबंध होने के बावजूद कई बार शिष्टाचार भेट हुई हैं और आर्थिक मामलों में उनके जानकर होने से इनकार नहीं किया जा सकता है। उनके इस सुझाव से चल रहे लोकसभा चुनाव के बीच एक नया विवाद पैदा हो गया।

इस विवाद को रोका जाए उससे पहले यह जानने का प्रयास करते हैं कि विरासत टैक्स क्या होता है और अमेरिका में इसे क्यों लगाया जाता है जिससे प्रभावित होकर पित्रोदा ने इसे भारत में भी लगाने की बहस छेड़ दी।  इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कई बार बड़े औद्योगिक घरानों या राजघरानों में अपनी असली औलाद न होने के कारण उन दूर के रिश्तेदारों को बगैर किसी मेहनत और सेवा के अरबों की प्रोपर्टी विरासत के तौर पर मिल जाती है। अमेरिका में विरासत कर ऐसा कर है जो किसी मृत व्यक्ति द्वारा संपत्ति पर लगाया जाता है। इसके अंतर्गत मृत व्यक्ति की संपत्ति का कुछ प्रतिशत उसके वंशज को मिलता है और कुछ हिस्सा राज्य के पास टैक्स के रूप में चला जाता है। यह कर केंद्रीय कर न होकर अमेरिका के 6 राज्यो में लगाया जाता है। इस टैक्स का निर्धारण इस बात पर निर्भर करता है कि मृत व्यक्ति कहां रहता था और उसका संपत्ति के उत्तराधिकारियों के साथ क्या रिश्ता था। अमेरिका के जिन 6 राज्यो में यह टैक्स लगाया जाता हैं उनमें आयोवा, केंटकी, मैरीलैंड, नेब्रास्का, न्यू जर्सी और पेंसिलवेनिया है और हर राज्य में विरासत टैक्स की दरें अलग-अलग हैं। कुछ राज्यों में मृतक की पत्नी, पति, बच्चों, माता-पिता, दादा-दादी, पोती-पोतियों को विरासत टैक्स से छूट दी गई है। यहां तक की चैरिटी पर भी इस टैक्स से छूट का प्रावधान है, कहीं पर कुल संपत्ति और नकद मूल्य का विरासत टैक्स 1% से भी कम होता है और कहीं-कहीं यह 20% से अधिक हो सकता है।

इस विवाद से कुछ दिन पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने यह कह दिया था की यदि हम सत्ता में आते है तो पूरे देश में आर्थिक सर्वे कराए जाएंगे और उसके बाद संपत्ति का पुनर्वितरण कराया जाएगा। राहुल गांधी के यह विचार भारत में अमीर और गरीब के बीच बढ़ती हुई खाई को पाटने के लिए एक क्रांतिकारी कदम हो सकता था। हां इसको लागू करना असंभव नहीं पर बहुत मुश्किल जरूर है। राहुल गाँधी के इस बयान पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर भाजपा के अन्य बड़े नेताओं ने हमला बोला दिया। इस पर तमाम अलोचनाओं के बाद भी राहुल गांधी अपनी बात पर अड़े रहे और आगे कह दिया कि आप ये न समझें कि हमारे सत्ता में आने के बाद न सिर्फ जाति सर्वे होगा हम इसमें आर्थिक सर्वे भी शामिल करेंगे अर्थात देश में संपत्ति का पुनर्वितरण करेंगे। इसी बात को लेकर जब पत्रकारों ने सैम पित्रोदा से बात की तो उन्होंने अमेरिका का उदाहरण देते हुए यह नई बात कह दी। जहां तक भारत में विरासत टैक्स का प्रश्न है तो यह देश में पंडित जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल में 1953 में लागू हुआ लेकिन इसे 32 साल बाद 1985 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में समाप्त कर दिया गया। गौरतलब है कि उस समय देश के वित्त मंत्री राजा मांडा विश्वनाथ प्रताप सिंह थे जो बाद में देश के 8वें प्रधानमंत्री बने। उन्होंने देश में ऐतिहासिक मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कीं जिससे अति पिछड़ी जातियों को 27% आरक्षण लागू हुआ और सत्ता में पिछड़े वर्ग की भागीदारी सुनिश्चित हुई जिसके आधार पर कई दल जाति पर आधारित जनगणना की बात कर रहे हैं।

प्रश्न यह उठता है कि उस समय भारत कि आर्थिक स्थिति बहुत संतोषजनक नहीं थी उसके कुछ वर्षों बाद ही भारत को अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए दीर्घकालीन ऋण के लिए आईएमएफ के पास जाना पड़ा और आईएमएफ की शर्तों के आगे अपनी आर्थिक नीतियां बदलनी पड़ीं। ऐसे में सरकार को विरासत टैक्स वापस लेने की क्या अवश्यकता थी जब की इससे अच्छे खासे राजस्व की प्राप्ति हो रही थी। आश्चर्य इस बात का है कि कांग्रेस ने भी पित्रोदा के इस सुझाव का समर्थन करने के बजाय पित्रोदा का निजी बयान कहकर किनारा कर लिया जबकि कांग्रेस यह भूल गई कि 70 के दशक में उनकी सबसे कद्दावर नेता इंदिरा गांधी ने राजाओं को दिये जाने वाले प्रिवीपर्स बंद कर दिये थे और इसे पूरा समर्थन मिला था और सरकार के इस कदम को सरकार के राजस्व की स्थिति को सुधारने वाला कदम माना गया था।

सैम पित्रोदा के बयान पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमला करते हुए दावा किया कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मौत के बाद उनकी संपत्ति सरकार के पास जाने से बचाने के लिए राजीव गांधी ने 1985 में भारत में विरासत टैक्स समाप्त कर दिया। इससे फायदा उठाने के पश्चात कांग्रेस इसे फिर से जनता के ऊपर थोपना चाहती है। अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो विरासत टैक्स के जरिये लोगों के पूर्वजों की ओर से छोड़ी गई आधी संपत्ति छीन लेगी। हो सकता है कि प्रधानमंत्री जी का यह भाषण चुनावी हो पर जो विरासत टैक्स सन् 1985 तक भारत में लागू रहा हो वह एकाएक जनता की सम्पत्ति की लूट का हिस्सा कैसे बन गया। सैम पित्रोदा के बयान को लेकर बसपा सुप्रीमो मायावती का बयान और भी हास्यास्पद् लगता है। उन्होंने कहा निजी सम्पत्ति पर विरासत टैक्स की सोच और उसकी पैरवी कांग्रेस की गरीबी हटाओ की चर्चित विफलता पर से लोगों का ध्यान भटकाना है।  उन्होंने कहा कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओ द्वारा भारत में धन व सम्पत्ति वितरण की आड़ में अमेरिका की तरह निजी सम्पत्ति पर विरासत टैक्स की सोच और उसकी पैरवी करना गरीबो की भलाई कम और गरीबी हटाओ की विफलता से ध्यान हटाने का चुनावी हथकंडा है। वास्तव में मायावती जी का यह विरोध उनके द्वारा अर्जित की गई अरबों की सम्पत्ति सरकार के पास जाने की चिंता के कारण है।

यह सच है कि इंफ्रास्ट्रॅक्चर के विकास हेतु सरकार के राजस्व को बढ़ाने के लिए जीएसटी समेत अनेक टैक्स लगाए गए। यहां तक कि सीनियर सिटीजन्स को रेल यात्रा के समय दी जाने वाली रियायतें वापस ले ली गयी है और मल्टीहॉप्टिलिटी अस्पतालों में दी जाने वाली डिस्काउंट भी समाप्त कर दिया गया है, फिर सैम पित्रोदा द्वारा सुझाए गए विरासत टैक्स पर इतना शोर-शराबा क्यों? पर हम सभी जानते हैं कि सैम पित्रोदा आर्थिक मामलों के जानकार होने के साथ-साथ यह भी समझते हैं कि वर्ष 2024 के चुनावों में कांग्रेस सत्ता में नहीं आने वाली है, इसलिए उनके इन सुझावों को चुनावी स्टंट कि संज्ञा न देकर, भारत सरकार के राजस्व बढ़ाने के उपाय के रूप में देखा जाना चाहिए। चाहे यह सुझाव किसी विपक्षी पार्टी के नेता द्वारा लाया गया हो, वैसे विगत वर्षों में सपा, बसपा और कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता भाजपा में शामिल हुए हैं और भाजपा सरकार और संगठन में महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व का निर्वाह कर रहे हैं और नीतिगत निर्णय ले रहे हैं तो फिर सैम पित्रोदा के सुझाव पर इतना शोर शराबा क्यों?

बुधवार, 1 मई 2024

संपत्ति सर्वे वितरण और विरासत कर के बवंडर का सच

अवधेश कुमार

कांग्रेस के रणनीतिकारों का जो भी मानना हो लेकिन उसके विचार एवं व्यवहार इन दिनों लगातार आम व्यक्ति को हैरत में डालते हैं। अनेक गंभीर लोग बातचीत में प्रश्न करते हैं कि आखिर कांग्रेस को हो क्या गया है? संपत्तियों के सर्वे और वितरण संबंधी विवाद कांग्रेस की स्वयं की देन है। इसे लेकर मचे बवंडर के बीच विदेश में कांग्रेस पार्टी की इकाई ओवरसीज कांग्रेस ऑफ इंडिया के प्रमुख सैम पित्रोदा ने उत्तराधिकार कर का बयान देकर इसे लोकसभा चुनाव के एक बड़े मुद्दे के रूप में स्थापित कर दिया है। स्वाभाविक है कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित समूची भाजपा कांग्रेस पर यह आरोप लगा रही है कि वह लोगों के घरों में घुसकर संपत्तियों का सर्वे करेगी तथा समान वितरण के नाम पर अपने चाहत के अनुरूप समुदाय विशेषकर मुसलमानों के बीच बांट देगी उस समय यह बयान बवंडर को और बढ़ने वाला ही साबित होना था। सैम पित्रोदा के बयान को व्यक्तिगत कह कर खारिज करना आसान नहीं है। आखिर वह कांग्रेस पार्टी के पदाधिकारी हैं और सोनिया गांधी परिवार के निकटतम लोगों में माने जाते हैं। राहुल गांधी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समानांतर विदेशों में प्रोजेक्ट करने , जगह-जगह उनका भाषण और पत्रकार वार्ताएं करने की पूरी कमान उनके हाथों होती है। वह कह रहे हैं कि जब हम सामान वितरण की बात करते हैं तो हमें अमेरिका जैसे इन्हेरिटेंस टैक्स यानी उत्तराधिकार कर पर भी विचार करना चाहिए। उनके अनुसार यहां कई राज्यों में पिता की मृत्यु के बाद संपत्ति की विरासत संभालने वाले को 55% तक कर दे कर उसके हिस्से शेष 45% आता है। इससे स्वाभाविक ही यह शंका गहरी हुई कि कांग्रेस सत्ता में आने पर वाकई विरासत कर भी लगा सकती है।

अगर राहुल गांधी ने अपने भाषणों और वक्तव्यों में लगातार जाति जनगणना के साथ वित्तीय एवं आर्थिक सर्वे की बात नहीं करते तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या भाजपा को इसे इतना बड़ा मुद्दा बनाने का अवसर नहीं मिलता। उनके भाषण और वक्तव्य सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं जिनमें वह कह रहे हैं कि हम सत्ता में आने पर जाति जनगणना करेंगे और उसके बाद क्रांतिकारी कदम उठाएंगे, संपत्ति के समान वितरण के लिए वित्तीय सर्वेक्षण करा कर देखेंगे कि किसके पास किस वर्ग के पास कितनी संपत्ति है। इसके बाद जितना जिसका हक होगा उतना उसको दिया जाएगा। कांग्रेस का घोषणा पत्र यानी न्याय पत्र जारी होने के पूर्व और बाद में भी वह इस पर बोलते रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि आप से मिलना चाहता हूं ताकि मैं आपको अपना घोषणा पत्र समझा सकूं। खड़गे सहित कांग्रेस पार्टी के अंदर कोई यह कहने को तैयार नहीं है कि हम वित्तीय और आर्थिक सर्वे नहीं करेंगे तथा समान वितरण की भी बात हमारे एजेंडे में नहीं है। इसकी बजाय कांग्रेस के नेता प्रवक्ता लगातार भारत में उद्योगपतियों, अरबपतियों को निशाना बनाते हुए इनमें से कुछ के हाथों धन सिमट जाने के वक्तव्य दे रहे हैं। 

अगर सर्वेक्षण होगा तो फिर सर्वेक्षणकर्मी लोगों के घर में जाएंगे। घर वाले चाहें न चाहें उनकी एक-एक चीज देखी जाएगी। इसके अलावा अगर सर्वेक्षण का कोई तरीका कांग्रेस के पास है तो उसे बताना चाहिए। मंगलसूत्र जैसे शब्द व्यंग्यात्मक शैली में होते हैं। इनका इतना ही अर्थ है कि महिलाओं के आभूषण तक भी सर्वे में जाने जाएंगे।  संपत्ति के विवरण के वैधानिक प्रावधानों में आभूषणों आदि की पूरी सूची और उसके मूल्य बताने ही पड़ते हैं। चूंकि राहुल गांधी अपनी घोषणा पर कायम हैं और कांग्रेस इससे पीछे नहीं हट रही तो सैम पित्रोदा के उत्तराधिकार कर से देश में भय पैदा हो गया है। कुछ लोगों ने तो यह भी  तलाश लिया कि पहले भी भारत ने विरासत कर था और स्वयं पित्रोदा कोई नई बात का नहीं कह रहे हैं। प्रक्रांतर से यह स्वयं पित्रोदा के विचार का समर्थन करना ही है । निश्चित रूप से था और यह अंग्रेजों का बनाया हुआ कानून था जो व्यवहार में नहीं उतर पाया तथा सरकारी विभागों में इतनी मुकदमे हुए जिनके खर्च उससे प्राप्त से ज्यादा हो गया। हालांकि प्रधानमंत्री का आरोप है कि र राजीव गांधी के प्रधानमंत्रीत्व काल में उसे इसलिए हटाया गया, क्योंकि उन्हें बिना कर दिए अपनी मां की संपत्ति का उत्तराधिकार लेना था। सच है कि पारिवारिक संपत्ति में से संजय गांधी के परिवार को शायद ही कुछ प्राप्त हुआ हो। यह ऐसा मुद्दा रहा है जिसे आरंभिक दिनों में मेनका गांधी ने उठाया था।

 बहरहाल, भले अर्थव्यवस्था, समाज और देश के बारे में समझ रखने वाले इसे उचित न मानें लेकिन कांग्रेस के अंदर भाव यही है कि राहुल गांधी की इन घोषणाओं का देश के आम लोगों पर बड़ा प्रभाव है और उन्हें लगता है कि कांग्रेस सत्ता में आई तो देश के धनी और संपन्न लोगों की संपत्तियां लेकर हमारे बीच बांटा जाएगा। वह मानते हैं कि इससे उनका वोट काफी बढ़ेगा और सत्ता में भी आ सकते हैं।

 पिछले कुछ वर्षों से कांग्रेस की नीति और व्यवहार में पुरानी शैली के वामपंथियों की तरह संपत्तिवानों, उद्योगपतियों आदि के विरुद्ध घृणा और गुस्सा साफ परिलक्षित होता रहा है। उनको निशाना बनाया जाता है। पांच न्याय और 25 गारंटी में कांग्रेस ने ऐसी-ऐसी बातें की है जिनको धरातल पर उतारना भारतीय अर्थव्यवस्था के बूते की बात नहीं है।। लेकिन इस समय कांग्रेस के थिंक टैंक या सोनिया गांधी परिवार को सुझाव देने वाले मानते हैं कि कांग्रेस को पुराने वामपंथियों की तरह क्रांतिकारी तेवर धारण करना चाहिए तभी वह अपना खोया हुआ जनाधार वापस ला सकती है तथा भाजपा को हरा सकती है। सैम पित्रोदा ने जो कहा है वह इसी सोच का विस्तार है। हमारी आपकी दृष्टि में अमेरिका एक पूंजीवादी देश है लेकिन क्रांति हुए बिना वहां वामपंथियों की ताकत हमेशा सशक्त रही है। वहां ये सत्ता, प्रशासन, न्यायपालिका , मीडिया से लेकर पूरे थिंक टैंक पर हाबी हैं। वहां के बड़े-बड़े पूंजीपति जिनमें जार्ज सोरोस जैसे लोग शामिल है, भी अपने प्रकट लक्ष्यों और घोषणाओं में आधुनिक वामपंथी ही है। उनकी दृष्टि की लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में उनकी ही सोच की अर्थव्यवस्था, समाज के बीच संपत्ति का विभाजन, अल्पसंख्यकों के विशेषाधिकार आदि के लक्ष्य से भारत जैसे विकासशील देश में बदलाव के लिए अपने थिंक टैंक विकसित करते हैं और ऐसे लोगों को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं। उनका लक्ष्य ऐसे देश को सशक्त करना तो नहीं हो सकता । विदेशों में उनके भाषण होते हैं। इसलिए यह मानने का कोई कारण नहीं है कि राहुल गांधी, कांग्रेस के दूसरे नेता या सैम पित्रोदा के साथ उनके संवाद नहीं होंगे। इस अतिवादी वाम सोच में ही अल्पसंख्यकों के लिए वैसे विशेष प्रावधानों की घोषणाएं हैं जिन्हें देखकर भाजपा के लिए यह आरोप लगाना आसान हो गया है कि संपत्ति के सर्वे के पीछे राहुल गांधी और कांग्रेस का इरादा अल्पसंख्यकों के नाम पर मुसलमानों के बीच ही उसे वितरीत करना है। इस पर बहस हो सकती है तथा पहली दृष्टि में कहा जा सकता है कि भाजपा जानबूझकर कांग्रेस को मुस्लिमपरस्त साबित करने के लिए ऐसा कर रही है। किंतु कांग्रेस ने अभी तक इस बात का खंडन नहीं किया है कि उसकी मंशा मुसलमानों को विशेष तौर पर धन के वितरण में या आरक्षण आदि में शामिल करना नहीं है। यूपीए सरकार के दौरान आप देखेंगे कि केंद्र से राज्यों की कांग्रेस सरकारों ने मुसलमानों के लिए अनेक प्रावधान किये, अनेक संपत्तियां अलग-अलग इस्लामी संस्थाओं को दी गई और उनके लिए सरकार के नियम कानून तक बदले गए। बाद में दूसरी सरकारों ने उनमें से कई संपत्तियां वापस ली और इनमें न्यायालय का भी साथ मिला। भारतीय सभ्यता संस्कृति की परंपरागत व्यवस्था में संपत्तियों के अधिक संग्रह का आदेश नहीं था। परिश्रम से अर्जित करने पर रोक नहीं था लेकिन उसके स्वामित्व की सीमाएं रहीं हैं तथा अर्जित संपत्तियों को भी सहकारी जीवन की तरह मिल बांटकर खाने की व्यवस्था रही है। वर्तमान युग में अपनी क्षमता, प्रतिभा की बदौलत उत्तरोत्तर आर्थिक प्रगति पर किसी भी बंधन की स्वीकार्यता नहीं है। इससे समाज के विकसित होने की मानसिकता कमजोर होती है तथा यह पूरे देश की प्रगति को उल्टी दिशा में मोड़ना है। इसलिए संपत्ति पर कैप लगाना या उसके एक बड़े हिस्से का राष्ट्रीयकरण कर लोगों में बांटना या एक सीमा से ज्यादा संपत्ति पर जरूर से ज्यादा कर लगाकर उसकी आय को बांट देने की सोच का कभी समर्थन नहीं किया जा सकता। इससे भयावह अराजकता और उथल-पुथल की स्थिति पैदा होगी जिसे संभालना कठिन होगा। चूंकि कि चुनाव के बीच यह मुद्दा आ गया है इसलिए देश के लोगों को तय करना है कि वह इसके साथ है या विरोध में।

पता - अवधेश कुमार, ई30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली 110092 , मोबाइल 9811027208

मंगलवार, 30 अप्रैल 2024

दिल्ली हिंदी साहित्य सम्मेलन व लम्हे जिंदगी के संस्था ने मिलकर 'काव्य गोष्ठी का आयोजन किया

संवाददाता

नई दिल्ली। दिल्ली हिंदी साहित्य सम्मेलन एवं लम्हे जिंदगी के संस्था के संयुक्त तत्वावधान में 'काव्य गोष्ठी का आयोजन लम्हे जिंदगी के अध्यक्ष श्री विनय कुमार की अध्यक्षता में किया गया। कार्यकम में मुख्य अतिथि के रूप में श्रीमती आरती अरोड़ा, उपाध्यक्ष, संस्कार भारती एवं सुप्रसिद्ध समाज सेवी उपस्थित थीं। विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. सैयद नज़म इकबाल, कार्यकम निर्माता, दिल्ली दूरदर्शन उपस्थित थे। सान्निध्य सम्मेलन की अध्यक्ष, श्रीमती इंदिरा मोहन का प्राप्त हुआ। संयोजन श्रीमती सरोजिनी चौधरी, सुपरिचित कवयित्री एवं डॉ. पूजा भारद्वाज, संस्थापिका 'लम्हे जिंदगी ने किया। काव्य गोष्ठी का संचालन श्रीमती पूजा श्रीवास्तव ने किया।
मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए श्रीमती आरती अरोड़ा ने दिल्ली हिंदी साहित्य सम्मेलन एवं लम्हे जिंदगी दोनों संस्थाओं को बधाई देते हुए आभार प्रकट किया। उन्होंने बताया कि मुझे हमारे परिवार की तीसरी पीढ़ी के रूप में दिल्ली हिंदी साहित्य सम्मेलन से जुड़कर अच्छा लग रहा है। विश्वास है भविष्य में भी इसी प्रकार के साहित्यिक आयोजन संस्था द्वारा किए जाते रहेंगे। मेरी हार्दिक शुभकामनाएं हैं।
सान्निध्य वक्तव्य देते हुए श्रीमती इंदिरा मोहन ने कहा कि दि.हि.सा. सम्मेलन और लम्हे जिंदगी संयुक्त रूप से नई चेतना, नवीन विषय वस्तु और शिल्प के साथ आपके समक्ष है। सम्मेलन पिछले 80 वर्षों से निरंतर साहित्य की सेवा कर रहा है, जिसकी नींव पं. मदनमोहन मालवीय के मार्गदर्शन में राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन ने रखी थी और जिसे पल्लवित पं. गोपाल प्रसाद व्यास एवं श्री महेष चन्द्र शर्मा ने किया। उन्होंने कहा कि अच्छा है, महिलाएं अच्छा सोच रही है और लिख रही है। इसके लिए मैं उन्हें बधाई और शुभकामनाएं देती हूँ।
अध्यक्ष के रूप अपना उ‌द्बोधन देते हुए श्री विनय कुमार ने कहा कि इस काव्य गोष्ठी में आपकी उपस्थिति ही कार्यक्रम की श्रेष्ठता है। उन्होंने अपनी बात अपनी कविता के माध्यम से श्रोताओं तक पहुँचाने का प्रयास किया।
इस अवसर पर आमंत्रित कवि/कवयित्रियों ने अपने काव्य पाठ से सभी का मनमोह लिया।
डॉ. सैयद नज़म इकबाल : तेरी जुस्तजू की तालाश में, मेरी उम्र सारी गुजर गई,
श्री दिनेश तिवारी: मैं कहाँ-कहाँ संभालता, यह कदम कदम पर फिसल गई।। अगर देने की इच्छा है तो कुछ कम नहीं होता, और जीवन में किसकी के भी हमेशा गम नहीं होता।
श्री अवधेष तिवारी: कोशिश अगर करते रहे. तो हर मुष्किल का हल निकलेगा, बंजर है अगर भूमि, तो कल यहीं से जल निकलेगा। सारे रिश्तों की लाज रखते हैं।
श्री कृष्ण गोपाल अरोड़ा : नम्र अपना मिजाज रखते हैं।
श्रीमती बबली सिन्हा: बातों बातों में न ऐसी बातें कीजिए, दिल न टूटे किसी का ख्याल कीजिए।
श्री राजवीर 'राज' :
श्रीमती कामना मिश्र: ठंडी पीपल की छांव छोड आया हूँ, बूढी अम्बा को गांव छोड़ आया हूँ। तुम तो कहते थे कि हालात बदल जाएं, वक्त के साथ ख्यालात बदल जाएं। बाधाओं से लड़कर जीना अच्छा लगता है। जग हित में शिव को विष पीना अच्छा लगता है।
श्री ओंकार त्रिपाठी: जहां हो झूठ की सत्ता, वहां सच कौन बोलेगा। सच्ची सीधी बात किया कर, पीछे से न बार किया कर।
श्री सुरेन्द्र शर्मा: जिसको सुन बहने लगे, सुखद आंख से नीर, सत्य भाव कविता वही, जो हरती मल पीर।
आचार्य अनमोल: साथ ही श्री भूपेन्द्र राघव, श्री राजेष रघुवर, श्रीमती चंचल वशिष्ठ, डॉ. साक्षात भसीन, सुश्री संप्प्रीति, सुश्री पुनीता, सुश्री सुमन मोहिनी, सुश्री रष्भि चौबे आदि ने भी काव्य पाठ किया।

सोमवार, 29 अप्रैल 2024

श्री अरविन्द महाविद्यालय (सांध्य), दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित 'साईकेडेलिया-24' कार्यक्रम का आयोजन

संवाददाता

नई दिल्ली। श्री अरविन्द महाविद्यालय (सांध्य), दिल्ली विश्वविद्यालय के अनुप्रयुक्त मनोविज्ञान विभाग द्वारा दिनांक 24 अप्रैल एवं 25 अप्रैल को महाविद्यालय के सेमिनार हॉल में विभाग के द्विदिवसीय वार्षिक समारोह 'साईकडेलिया-24' का आयोजन किया गया, जिसका मुख्य थीम द आर्ट ऑफ सेल्युम डिस्कवरी' था. इस समारोह के उद्घाटन सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के प्रो० रोशन लाल, मुख्य अतिथि एवं किनोट स्पीकर तथा महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो० अरुण चौधरी, विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित किये गये कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत आमंत्रित अतिधियों एवं विभाग के शिक्षकों द्वारा दीप-प्रज्वलन करके की गई, तत्पश्चात विभाग के टीआईसी प्रो० महेश कुमार दरोलिया, कार्यक्रम के संयोजक डॉ० चन्द्र प्रकाश कपूर सीनिअर फैकल्टी प्रो० मोनिका रीखी, प्रो० प्रग्वेंदु ने मुख्य अतिथि एवं कॉलेज के प्राचार्य का स्वागत पुष्प गुच्छ, एवं शॉल भेंट करके किया इसके उपरांत विभाग के छात्र-छात्राओं द्वारा सरस्वती वंदना एवं नृत्य की सुंदर रोमांचक प्रस्तुति की गई।
अनुप्रयुक्त मनोविज्ञान विभाग की वरिष्ठ फैकल्टी प्रो० मोनिका रीखी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि 'साईकेडेलिया हमारे छात्रों द्वारा प्रति वर्ष आयोजित किया जाने वाला विभिन्न तरह के इवेंट्स का संगम है जो हम शिक्षकों के कौशल, शिक्षण-शैली एवं शिक्षा, समाज एवं देश के प्रति हमारे योगदान के प्रतिबिंब हैं। महाविद्यालय के प्राचार्य एवं कार्यक्रम के विशिष्ट अतिधि प्रो० अरुण चौधरी ने समारोह के मुख्य विषय 'द आर्ट ऑफ़ सेल्फ डिस्कवरी पर अपने वक्तव्य में कहा कि सेल्फ डिस्कवरी एक जीवन भर स्वयं को बेहतर बनाने के लिए व्यक्ति के अन्तः मन में चलने वाली प्रक्रिया है।
 मुख्य अतिथि प्रो० रोशन लाल ने छात्रों एवं आमंत्रित अतिथियों के समक्ष सेल्फ डिस्कवरी की प्रक्रिया एवं सोपान को विस्तार से रखा. अनुप्रयुक्त मनोविज्ञान विभाग के आमंत्रित पुरा-छात्र एवं ओ पी जिंदल ग्लोबल विश्वविद्यालय के काउन्सलिंग विभाग के आरोग्य कुमार नाथ, एवं फ्रीलान्स काउंसलर सान्या शर्मा ने सकारात्मक ऊर्जा से सेल्फ को डिस्कवर करने पर जोर दिया।
दिवितीय दिवस के कार्यक्रमों में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो० सुरेन्द्र कुमार सिया एवं डॉ० दिनेश छाबड़ा ने पैनल डिस्कशन एवं अपने व्याख्यानों से सभी प्रतिभागियों का ज्ञान वर्धन किया, एवं उनके प्रश्नों एवं उत्सुकता का सकारात्मक ढंग से समाधान किया. विभाग के छात्र- छात्राओं द्वारा कई अन्य इनोवेटिव प्रतियोगिताओं जैसे साई सेलेब्स, साई प्रयोर्स, टोटल बैग पेंटिंग, एस्केप रूम प्रतियोगिता आयोजित की गई, जिसमे अन्य कई कॉलेज के छात्रों ने भी प्रतिभाग किया. कार्यक्रम को सफलता पूर्वक आयोजित करने में संयोजक डॉ० चन्द्र प्रकाश कपूर, सह संयोजिका डॉ० सजनी के साइकोलॉजिकल सोसाइटी की प्रेसिडेंट साध्वी शर्मा एवं सोसाइटी के अन्य सदस्यों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सभी प्रतियोगिताओं में प्रतिभाग करने वाले एवं विनर्स को महाविद्यालय के प्राचार्य एवं समापन सत्र के मुख्य अतिथि प्रो० सुरेन्द्र कुमार सिया ने सर्टिफिकेट्स वितरित किये। अंत में संयोजक डॉ० चन्द्र प्रकाश कपूर ने सभी को कार्यक्रमों को सफल बनाने एवं प्रतिभाग करने के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया. इस अवसर पर महाविद्यालय के प्रो० गिरीश जोशी, डॉ विवेक चौधरी विभाग के डॉ गरिमा अग्रवाल, डॉ सुरुचि सिंह, डॉ इन्द्राणी रेगोन, डॉ पावनी, अनुपम पाण्डेय एवं भारी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थिति रहेा

गुरुवार, 25 अप्रैल 2024

कम मतदान होने का सच वही नहीं जो बताया जा रहा है

अवधेश कुमार

लोकसभा चुनाव के पहले चरण  के 102 स्थानों का लोकसभा चुनाव संपन्न होने के कई तरह के आकलन सामने आ रहे हैं । इस दौर में नौ राज्यों तमिलनाडु ,उत्तराखंड, अरुणाचल, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम ,नगालैंड, सिक्किम तथा तीन केंद्र शासित प्रदेशों अंडमान, लक्षद्वीप और पुडुचेरी का मतदान संपन्न हो चुका है। हिंदी भाषी राज्यों के दृष्टि से देखे तो ऐसे 35 स्थान का चुनाव संपन्न हुआ है जिनमें बिहार के चार ,मध्य प्रदेश के 6 ,राजस्थान के 12, उत्तर प्रदेश के आठ और उत्तराखंड के पांच स्थान शामिल हैं। दक्षिण के राज्य तमिलनाडु के सभी 39 स्थानों पर मतदान संपन्न हो चुका है। माना जा रहा था कि देश के एक बड़े क्षेत्र में मतदान के बाद इसकी प्रवृत्तियों का आकलन करना थोड़ा आसान हो जाएगा। लेकिन मतदान के बाद आम टिप्पणी यही है कि प्रवृत्तियों का आकलन कठिन हुआ है। बहरहाल , इसकी सबसे बड़ी विशेषता रही कि पश्चिम बंगाल को छोड़कर कहीं भी किसी तरह की हिंसा की घटना नहीं हुई। यह बताता है कि देश का चुनाव तंत्र बिल्कुल सहज ,सामान्य और सुव्यवस्थित अवस्था में काम कर रहा है। इसका अर्थ यह भी है कि हम कम अवधि और कम चरणों में भी लोकसभा चुनाव को समाप्त कर सकते हैं।

सबसे ज्यादा चर्चा मतदान प्रतिशत कम होने को लेकर है और कई तरह के आकलन किया जा रहे हैं। हालांकि तथ्य नहीं है कि सभी क्षेत्रों में मतदान का प्रतिशत ज्यादा गिरा है। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में ज्यादा  मतदान हुए तो बिहार और उत्तराखंड में अत्यंत कम। इन दो राज्यों में भी अलग-अलग क्षेत्र को देखें तो कहीं ज्यादा तो कहीं कम मतदान हुआ है। एक बार राज्य , मतदान प्रतिशत को देखें। उत्तर प्रदेश में 2019 के 63.88 के मुकाबले 60.25% ,उत्तराखंड में 61.88 प्रतिशत के मुकाबले 55.89%, मध्य प्रदेश में 67.08%, छत्तीसगढ़ में 65.80 की जगह 67.56 प्रतिशत, राजस्थान में 63.71 की जगह 57.26 प्रतिशत, बिहार में 53.47% की जगह 48.88%, पश्चिम बंगाल में 83.7 9% की जगह 80.55%, महाराष्ट्र में 63.0 4% की जगह 61.87% तमिलनाडु के सभी 39 क्षेत्र में 69.46 प्रतिशत, असम में 78.23% की जगह ,75.95%, अरुणाचल में 67% की जगह 72.74%, मणिपुर में 78.20% की जगह 72.117%, मेघालय में 67.15% की जगह 74.5 0%, मिजोरम में 63.02% की जगह 56. 6 0%, नागालैंड में 83.12 प्रतिशत की जगह 56.91%, त्रिपुरा में 83.12% की जगह 81. 6 2% सिक्किम में 78.119% की जगह 80.003%, पुडुचेरी में 81. 19% की जगह 78.8 0%, अंडमान निकोबार में 64.85% की जगह 63.99%, लक्षद्वीप में 84.96% की जगह 83.88%, जम्मू कश्मीर में 57.35 प्रतिशत की जगह68 प्रतिशत मतदान हुआ।  तो एक- दो स्थान को छोड़कर ज्यादातर जगहों में मतदान गिरा है। उत्तर प्रदेश में 2019 के मुकाबले लगभग 5.30 प्रतिशत कम मतदान हुआ। सबसे अधिक 83.88 प्रतिशत मतदान लक्षद्वीप सीट पर तो बंगाल के जलपाईगुड़ी में 82.15% मतदान हुआ।  हिंसा के शिकार मणिपुर में  मतदान कम नहीं माना जा सकता है। कुल मिलाकर इन क्षेत्रों में 2019 में औसत मतदान 69.43 % से ज्यादा हुआ था। चुनाव आयोग के अंतिम आंकड़ों के अनुसार  यह करीब 68.29 प्रतिशत है।‌ यानी करीब 1.14% कम मतदान हुआ है। तो राष्ट्रीय स्तर पर मतदान में ज्यादा गिरावट नहीं है । 2019 लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा मतदान हुआ था। तो यह माना जा सकता है कि लोकसभा चुनाव में इससे ज्यादा मतदान की संभावना शायद अभी नहीं है।

नागालैंड में इसलिए मतदान प्रतिशत ज्यादा गिरा क्योंकि छह जिलों में ईस्टर्न नगालैंड पीपुल्स फ्रंट (ईएनपीओ) ने अलग राज्य की मांग को लेकर मतदान का बहिष्कार किया था। इन छह जिलों के 20 विधानसभा क्षेत्रों में चार लाख से अधिक मतदाता हैं। जब इतनी संख्या में मतदाता मत डालेंगे नहीं तो उसे गिरना ही है। इसे मतदान की प्रवृत्ति नहीं मान सकते।  करीब डेढ़ दशक पहले मतदान घटने का अर्थ सत्तारूढ़ घटक की विजय तथा बढ़ने का अर्थ पराजय के रूप में लिया जाता था और प्रायः ऐसा देखा भी गया। किंतु 2010 के बाद प्रवृत्ति बदली है। मतदान बढ़ने के बावजूद सरकारें वापस आई हैं और घटने के बावजूद गई है। इसलिए इसके आधार पर कोई एक निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। दूसरे, हर जगह मतदान प्रतिशत ज्यादा गिर भी नहीं है। तीसरे, बंगाल में साफ दिखाई दे रहा है कि दोनों पक्षों के मतदाताओं में एक दूसरे को हराने और जीताने की प्प्रतिस्पर्धा है।। संदेशखाली से लेकर अन्य मामलों के कारण वहां हिंदुओं के बड़े समूह के अंदर ममता बनर्जी को लेकर आक्रोश है। 

सबसे ज्यादा चर्चा उत्तर प्रदेश की है तो जरा क्षेत्र के हिसाब से देखें कि कहां कितना मतदान हुआ। सहारनपुर में पिछली बार 70.87% हुआ था जबकि इस बार 68.99% , पीलीभीत में 67.41 की जगह 63.70, मुरादाबाद में 65.46 की जगह 62.05, कैराना में 67.45 की जगह 61.5 , नगीना में 63.66 की जगह असर दशमलव 54, मुजफ्फरनगर में 80.42 की जगह 58.5, बिजनौर में 66.022 की जगह 58.21 और रामपुर में 63.01की जगह 55.75% मतदान हुआ। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस इलाके में मतदान प्रतिशत घटना सामान्य स्थिति का परिचायक नहीं है। इस क्षेत्र को जातीय और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का विशेषण प्राप्त है। तो यह आकलन करना कठिन है कि जहां मतदान प्रतिशत गिरा वहां किनके मतदाता नहीं आए। पिछले चुनाव में भाजपा के लिए यह चुनौतीपूर्ण क्षेत्र था तथा बसपा सपा ने उसे गंभीर चुनौती दी थी। भाजपा को केवल तीन स्थान मिले थे जबकि बसपा को तीन और सपा को दो। अगर भाजपा विरोधी उसे हराना चाहते थे तो उन्हें भारी संख्या में निकलना चाहिए। कहा भी जा रहा है कि सपा के कोर मतदाता यानी मुसलमान और यादवों का बड़ा समूह आक्रामक होकर मतदान कर रहा था।। विरोधी भारी संख्या में निकलेंगे तो समर्थक भी इसका ध्यान रखेंगे। हालांकि उम्मीदवारों के चयन , दूसरे दलों से आये लोगों को महत्व मिलने तथा कहीं -कहीं,गठबंधन को लेकर भाजपा समर्थकों और कार्यकर्ताओं में थोड़ा असंतोष है तथा एक जाति विशेष ने भी विरोधात्मक रूप अख्तियार किया था। बावजूद यह कहना कठिन होगा कि भाजपा समर्थक मतदाता ही ज्यादा संख्या में नहीं निकले। अभी तक की प्रवृत्ति इसका संकेत नहीं देती। समर्थक कार्यकर्ता थोड़ा असंतुष्ट हों तो इसका असर होता है किंतु विरोधी तेजी से हराने के लिए निकले और इसके बावजूद वो प्रतिक्रिया न दें इस पर विश्वास करना कठिन होता है।

अभी तक के चुनाव अभियान में जनता के उदासीनता दिखी है। हालांकि विपक्ष के प्रचार के विपरीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को लेकर आम जनता के अंदर कहीं व्यापक आक्रोश या भारी विरोधी रुझान बिल्कुल नहीं दिखा है। कल्याण कार्यक्रमों के लाभार्थी तथा विकास नीति की प्रशंसा करने वाले हर जगह दिखाई देते हैं । श्री रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा प्रतिष्ठा से लेकर समान नागरिक संहिता एवं नागरिकता संशोधन कानून आदि पर विपक्ष के रवैये ने भाजपा के समर्थकों और मतदाताओं में प्रतिक्रिया भी पैदा की है। आम प्रतिक्रिया यही है नरेंद्र मोदी को ही होना चाहिए । लोग अगर वोट डालते समय यह विचार करेंगे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही बनाना है तो वो किसका समर्थन करेंगे ? कार्यकर्ताओं नेताओं और समर्थकों के एक समूह के  थोड़ा असंतोष का कुछ असर हो सकता है। हालांकि जिनके अंदर असंतोष है उनमें भी यह भाव है कि अगर यह सरकार हार गई तो कहा जाएगा कि हिंदुत्व विचारधारा की हार हो गई है। जिस जाति के विद्रोह की चर्चा हो रही है वहां भी लोगों के अंदर भाजपा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर सहानुभूति का भाव दिखता है। इसलिए यह मानने में भी कठिनाई है कि इन्होंने बिल्कुल एक मस्त आक्रामक होकर भाजपा के विरोध में मतदान किया होगा। ऐसा होने का अर्थ मतदान बढ़ना होना चाहिए। मतदान कम होने को भाजपा विरोधी रचन का संकेत मानना उचित नहीं होगा।

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