बुधवार, 10 अप्रैल 2024

एटलस साइकिल्स ने अपना परिचालन फिर से शुरू किया

संवाददाता

हरियाणा। भारत की प्रसिद्ध साइ‌किल निर्माता कपनी एटलस साइकिल्स (हरियाणा) लिमिटेड में अस्थाई बदी के बाद अपना व्यवसायिक सचालन फिर से शुरू कर दिया है। कपनी जल्द ही पासी लेडीज और किडस साइकिल के कुछ नए मॉडल बाजार में दुबारा लॉन्च करने जा रही है।

इस बाबत एटलस ने 5 अप्रैल 2024 को आगरा, मुजफ्फरनगर और अलीगढ़ के कुछ प्रमुख साइकिल डीलरों को अपने साहिबाबाद प्लाट में आमत्रित किया और उन्हें कपनी की आगामी योजनाओं से अवगत कराया।

सभी डीलर कपनी की पुनरूद्वार योजना को जानकर बेहद उत्साहित थे और उन्होंने मौजूदा साइकिल बाजार के बारे में अपने विचार साझा किये। बैठक के दौरान डीलरों ने कपनी को अपने बहुमूल्य सुझाय दिये।

कंपनी के निदेशक श्री आई डी बुध ने कपनी के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ डीलरा से इस कठिन वक्त पर कपनी के लिए सहयोग मागा और उन्हे निकट भविष्य में भारतीय साइकिल बाजार में एटलस को एक प्रमुख साइकिल ब्रांड के रूप में फिर से स्थापित करने के लिए कपनी द्वारा उठाए गए कदमो के बारे में जानकारी दी।



रीता बहुगुणा, किरण खेर सहित कई के टिकट कटे, भाजपा ने जारी की कैंडिडेट्स की नई लिस्ट

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव के पहले भारतीय जनता पार्टी ने अपने उम्मीदवारों की 10वीं लिस्ट सूची जारी कर दी है। इसमें यूपी सरकार में मंत्री रहीं रीता बहुगुणा जोशी का नाम नहीं है। उन्हें इस बार टिकट नहीं मिला है। चंडीगढ़ से किरण खेर को भी इस बार टिकट नहीं दिया गया है। उनकी जगह संजय टंडन को टिकट मिला है। वहीं इलाहाबाद से रीता बहुगुणा जोशी की जगह नीरज त्रिपाठी को उम्मीदवार बनाया है। इसके अलावा आसनसोल से शत्रुघ्न सिन्हा के खिलाफ बीजेपी ने एसएस अहलुवालिया को उतारा गया है।

 



 

 

 

 

 

मंगलवार, 9 अप्रैल 2024

शास्त्री पार्क क्षेत्र में स्थित मस्जिदों में ईद-उल-फितर की नमाज का समय

नई दिल्ली। देशभर में इस साल ईद-उल-फितर 11 अप्रैल, 2024 (सिर्फ केरल को छोड़कर, जहां 10 अप्रैल) को ईद की नमाज अदा की जाएगी। ईद पर सुबह के समय मुस्लिम समुदाय के लोग पाक-साफ होकर नए कपड़े पहनते हैं और ईद की नमाज पढ़ने मस्जिद जाते हैं। इसके बाद एक-दूसरे से गले मिलकर ईद की मुबारकबाद देते हैं। ईद का त्योहार भाईचारे का प्रतीक माना जाता है। इस दिन मुस्लिम लोग नमाज के जरिए अल्लाह का शुक्रिया अदा करते हैं।

इसी को देखते हुए शास्त्री पार्क क्षेत्र में स्थित मस्जिदों में ईद-उल-फितर की नमाज का समय कुछ इस प्रकार है: बुलंद जामा मस्जिद में सुबह 8:15 बजे, रशीदिया मस्जिद (इस मस्जिद में दो बार नमाज होगी) में सुबह 7:00 व 8:00 बजे, कादरी मस्जिद में सुबह 8:45 बजे, मदनी मस्जिद में सुबह 7:30 बजे, बिलाल मस्जिद में सुबह 7:30 बजे, गौसिया मस्जिद (मजार, बुलंद मस्जिद स्कूल के पास) में सुबह 8:00 बजे, वाहिद जामा मस्जिद में सुबह 7:30 बजे, कोट मार्किट मस्जिद में  सुबह 7:00 बजे, मक्का मस्जिद (शास्त्री पार्क थाने के पीछे खेत में) में सुबह 7:15 बजे, चांद मस्जिद (इस मस्जिद में दो बार नमाज होगी) में सुबह 6:45 व 7:45 बजे, रजा मस्जिद में सुबह 8:30 बजे, साबिर मस्जिद में (शास्त्री पार्क मेट्रो दरगाह) सुबह 7:15 बजे, फैजाने मदीना मस्जिद (शास्त्री पार्क गैस एजेंसी के पास) में सुबह 7:00 बजे, मुस्तफा मस्जिद (रेलवे के किनारे) में सुबह 7:45 बजे और मस्जिद कैलाश नगर  में सुबह 8:00 बजे अदा की जाएगी।

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

आम चुनाव: सरकार किसी की बने पर लोकतंत्र और संविधान सुरक्षित रहना चाहिए

बसंत कुमार

आज कल प्रात: जब भी न्यूज पेपर का पन्ना खोलते हैं तो मुख पृष्ठ पर यही पढ़ने को मिलता है कि फलां दल के इतने लोगों ने अपनी पार्टी से त्याग पत्र देकर फलां पार्टी का दामन थाम लिया है। दो दिन तक यह था कि पूर्व बाक्सर बिजेंद्र सिंह कांग्रेस के टिकट पर भाजपा के किसी दिग्गज नेता को चुनौती देने वाले हैं पर वो रातोंरात पाला बदल कर भाजपा में आ गए और अपना लोकसभा टिकट पक्का करने में सफल हो गए। इन जैसे नेताओं के कारण भाजपा में दरिया बिछाने वाले कार्यकर्ताओं को दरिया बिछाते-बिछाते दशकों निकल जाते हैं और जब टिकट का नंबर आता है तो नवीन जिंदल और बिजेंद्र सिंह जैसे आयातित लोगों के आ जाने से उनके सपने ताश के पत्तों जैसे बिखर जाते हैं। अभी कुछ दिन पूर्व कांग्रेस के दिग्गज नेता संजय निरुपम जिन्हें भाजपा के विरुद्ध अतिवादी टिप्पणियों के लिए जाना जाता रहा है और भाजपा नेत्री स्मृति ईरानी के खिलाफ अमर्यादित टिप्पणियों के लिए चर्चा में आये थे। वह कांग्रेस से नाता तोड़कर महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने वाले हैं। वैसे देश के 70 वर्ष के लोकतांत्रिक इतिहास में वर्ष 2024 का चुनाव नेताओं द्वारा पार्टी बदलने और निष्ठाये बदलने के इतिहास के रूप में जाना जायेगा। यह चुनाव देश मौजूद 'दल-बदल निरोधक कानून' का परिहास उड़ाने के लिए जाना जाएगा।

इस समय पार्टियों द्वारा चुनाव लड़ाने के लिए प्रत्याशियों की घोषणा हो रही है और विभिन्न पार्टियों के मौजूदा सांसदों के टिकट काटे जा रहे हैं पर जिन लोगों का टिकट कटा है वे यह विचार किए बिना कि उन्होंने अपनी पार्टी में रहकर वर्षों सत्ता का सुख भोगा है पाला बदलकर दूसरी पार्टियों में टिकट की जुगाड़ में लग रहे हैं और राजनीतिक दल भी अपनी पार्टी से जुड़े हुए समर्पित कार्यकर्ताओं को अवसर देने के बजाय इन भगोड़े नेताओं को उपकृत कर रही है।

जो नेता वर्षों तक कांग्रेस व अन्य विपक्षी पार्टियों में रहकर अपने आप को सेकुलरिज्म के योद्धा के रूप में पेश करते रहे हैं और अटल-अडवाणी के नेतृत्व वाली पार्टी भाजपा को सांप्रदायिक कह कर इसे छूने से परहेज करते थे आज नरेंद्र मोदीजी के करिश्माई नेतृत्व के आगे रचनात्मक विपक्ष कि भूमिका निभाने के स्थान पर सत्ता की मलाई खाने के लोभ में नतमस्तक होकर भाजपा की ओर भाग रहे हैं। भाजपा भी देश को भ्रष्टाचार का पर्याय माने-जाने वाली कांग्रेस से मुक्त भारत बनाने के स्थान पर कांग्रेस युक्त भाजपा बनाने जा रही है जो राष्ट्रवादी विचारधारा वाली पार्टी के हित में नहीं है क्योंकि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के भ्रष्ट संस्कृति में पले हुए लोग इस पार्टी में आकर भाजपा को भी ऐसा नहीं कर देंगे इसकी कोई गारंटी नहीं है।

ऐसी परिस्थिति में माननीय अटलजी की 13 महीने की सरकार के बहुमत के दौरान एक मत से गिरने की घटना याद आती है कि अटल जी को यह अहसास हो गया था कि हमारी सरकार गिर सकती है तो अटलजी के एक सहयोगी मंत्री शरद यादव ने कुछ सांसदों को दलबदल करा कर सरकार बचा ली जाए तो अटलजी ने यह कहकर मनाकर दिया कि मुझे यदि इस प्रकार से बने रहना है तो ऐसी सत्ता को मैं चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करूंगा। यद्यपि अटलजी इससे पूर्व नरसिंहा राव सरकार को बचाने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को रिश्वत देकर अपने पक्ष में वोट दिलाकर सरकार बचाने का तमाशा देख चुके थे पर उन्होंने अपने पूरे राजनीतिक जीवन में आया राम-गया राम की राजनीति का कभी भी साथ नहीं दिया।

इस संबंध में भाजपा के वरिष्ठतम नेताओं में माने जाने वाले हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार के साथ हुई वार्ता का उल्लेख करना चाहता हूं। उन्होंने बताया कि वे प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और वहा विधानसभा चुनाव हो गए थे और परिणाम आने पर भाजपा के पास सरकार बनाने के अपेक्षित सीटों से दो-तीन सीटें कम आई और दो-एक विधायकों की खरीद-फरोख्त से सरकार बनाई जा सकती थी पर इस मामले में अपनी अनिक्षा शांता कुमार जी ने अटलजी को बताई तो अटलजी ने अपने वक्तव्य में यह कहा कि हमें हिमाचल प्रदेश में विपक्ष में बैठेने का जनादेश मिला है और संगठन में बैठे उन नेताओं का मुहं बन्द कर दिया जो खरीद के माध्यम से प्रदेश में सरकार बनाना चाहते थे। यदि हम विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी को अपने देश में सुरक्षित देखना चाहते हैं तो आम चुनाव के समय पार्टियां बदलने की भागमभाग को रोकना होगा।

यह सही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के अपने दस वर्षों के कार्यकाल में आर्थिक विकास के क्षेत्र में, इंफ्रास्ट्रक्चर विकास और सड़क निर्माण के क्षेत्र मे, उद्यमिता विकास के क्षेत्र में देश ने अभूतपूर्व सफलता अर्जित की है और ऐसी आशा है कि देश के मतदाता अपने अधूरे कार्यों को पूरा करने के लिए एक अवसर और दे जिससे देश विश्व के सामने विकसित अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित कर सके। इसका अर्थ यह नहीं कि विपक्षी पार्टियों के लोग सरकार की कमियों की आलोचना करें और सरकार को और एक्टिव मोड में लाए न कि अपनी पार्टी को छोड़कर सत्ता के लोभ में सत्ता पार्टी में मिल जाए। उनके ऐसा करने से देश में लोकतंत्र की पराजय होगी जो देश के लिए खतरनाक है, ऐसी स्थिति में हमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के उस वक्तव्य का ध्यान देना चाहिए जो उन्होंने अपनी 13 दिनों की सरकार के अविश्वास प्रस्ताव के दौरान कही थी "सरकारे आएंगी और जाएंगी, पार्टियां बनेंगी और बिगड़ेंगी पर देश का लोकतंत्र बचना चाहिए। अटलजी की यह बात आज के परिप्रेक्ष में और भी सार्थक हो रही हैं जहां लोग संसद में पहुंचने के लोभ में अपने दलों को 24 घंटे में छोड़कर पाला बदल रहे है जहां रहकर उन्होंने वर्षो तक सत्ता की सुख भोगा है। अब तो अपने दलों की नीतियां व रीतियां सब कुछ कुर्सी पाने की चाह में भूल गए हैं, जो लोग कांग्रेस में रहते हुए अटल-अडवाणी की राष्ट्रवादी विचार धारा को सांप्रदायिक कहकर उनकी आलोचना करते थे वे लोग अब राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की विचारधारा के झंडा बरदार बने हुए हैं।

गुरुवार, 4 अप्रैल 2024

विपक्ष बनाम सत्तारूढ़ घटक की रैली

अवधेश कुमार

31 मार्च को राजधानी दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्षी गठबंधन आईएनडीआईए की तथा चुनाव की घोषणा के बाद उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राजग की पहली रैली मेरठ में हुई। हालांकि इस बार मेरठ रैली से ज्यादा प्रचार रामलीला मैदान की थी, क्योंकि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी तथा कांग्रेस पर आयकर विभाग द्वारा 3567 करोड़ की देनदारी का नोटिस मिलने के बाद यह पहली रैली थी। निश्चित रूप से चुनावी माहौल के कारण दोनों का महत्व था और संपूर्ण देश का ध्यान दोनों की ओर था। भाजपा और राजग की दृष्टि से देखें तो यह चुनाव की सामान्य रैली मानी जाएगी। जयंत चौधरी के राष्ट्रीय लोक दल का भाजपा के साथ गठबंधन है और वो इस रैली में मौजूद रहेंगे इसे लेकर किसी को संदेह नहीं था। इसलिए रैली का आकर्षण तो था किंतु कौतूहल जैसा कुछ नहीं था। इसके समानांतर आईएनडीआईए की रैली को लेकर कौतूहल भी था तथा इसके नेताओं के लिए अभी तक का सबसे बड़ा अवसर भी माना जाएगा। कारण, विपक्ष जनता के बीच स्वयं को पीड़ित और दमित बताकर चुनाव में जा रहा है तथा उसका मूल स्वर यही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व वाले सरकार विपक्षी नेताओं और पार्टियों को खत्म करने के लिए सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है जो देश में लोकतंत्र को खतरा है। इसलिए इसका नाम ही लोकतंत्र बचाओ रैली दिया गया। स्वाभाविक ही राजधानी दिल्ली से  देश की जनता को अपनी बात प्रभावशाली ढंग से पहुंचाने तथा उनका समर्थन हासिल करने की संभावना पैदा करने का अभी तक का सबसे बड़ा अवसर था। अगर वह अपने कार्यकर्ताओं घनघोर समर्थकों के अलावा कुछ समूह को और प्रभावित कर पाते तो चुनाव में ताकत बढ़ाने की संभावना पैदा हो सकती थी। प्रश्न है कि क्या इस दृष्टि से आईएनडीआईए की रामलीला मैदान रैली वाकई सफल मानी जा सकती है?

राजधानी दिल्ली में आम आदमी पार्टी का अभी तक ठोस जनाधार बना हुआ है। 70 में से 62 विधायक उसके हैं। इस कारण यहां अच्छी खासी संख्या अपेक्षित ही थी। इसके साथ पंजाब में भी उनकी सरकार है और हरियाणा ,राजस्थान से कांग्रेस के लोगों की उपस्थिति भी संभावित थी। अखिलेश यादव इसमें शामिल थे इसलिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश से सपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों का भी आना निश्चित था। यह तो नहीं कहा जा सकता कि संख्या दृष्टि से रैली कमजोर थी। संख्या ठीक-ठाक थी।  किंतु इतनी तैयारी के बाद राजधानी दिल्ली में जिस तरह का जैन सैलाब दिखना चाहिए था वैसा नहीं दिखा यह सच है। अरविंद केजरीवाल के गिरफ्तार होने के बाद से इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल रहा है की इतनी विधायकों और पार्षदों वाली पार्टी का प्रचंड विरोध दर्शन राजधानी में क्यों नहीं हो रहा? 

आईएनडीआईए में शामिल दलों की जो स्थिति है उसमें इसके ज्यादातर नेताओं या पार्टियों का प्रतिनिधित्व होना था और हुआ। ममता बनर्जी उपस्थित होती तो संदेश ज्यादा बेहतर जाता। नेताओं के भाषणों को देखें तो उनमें नए तत्व या पहलू तलाशना मुश्किल है। तथ्यों , तर्कों और प्रखरता के आलोक में भाषण ऐसे नहीं थे जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को लेकर लोगों के अंदर गुस्सा और विद्रोह की भावना पैदा हो। राहुल गांधी अगर 400 पर का नाम लेते हुए मैच फिक्सिंग की बात कर रहे थे तो तेजस्वी यादव ने कहा कि पहले से ही ईवीएम सेट होगा तभी 400 का नारा दिया जा रहा है। यानी ये नेता अपने समर्थकों को भी यही बता रहे थे कि चुनाव आयोग से लेकर ईवीएम तक में इस प्रकार की व्यवस्था कर दी गई है कि परिणाम उनके ही पक्ष में आएगा। इसके द्वारा आईएनडीआईए के नेतागण क्या संदेश दे‌ रहे थे? यह प्रकारांतर से चुनाव परिणाम के पूर्व ही अपनी पराजय को स्वीकार करने जैसा था। इसके अलावा ज्यादातर नेताओं का भाषण  लोकतंत्र खत्म हो गया है, ईडी,सीबीआई जैसी संस्थाओं के माध्यम से विपक्ष के नेताओं पर कार्रवाई की जा रही है, उनको जेलों में डाला जा रहा है, मीडिया को दबाव में ला दिया गया है आदि पर ही टिका हुआ था।

 विडंबना देखिए कि लोकतंत्र के नाम पर आयोजित रैली का सबसे बड़ा फोकस अरविंद केजरीवाल की पत्नी सुनीता केजरीवाल की उपस्थिति हो गई। जैसे ही समाचार आया कि पंजाब के मुख्यमंत्री भगवान सिंह मान सुनीता केजरीवाल को लेकर रामलीला मैदान पहुंच रहे हैं पूरी मीडिया का ध्यान वही केंद्रित हो गया। सुनीता केजरीवाल ने अपने भाषण में बताया कि अरविंद केजरीवाल जी ने आपके लिए छह गारंटियां दी हैं। ये गारंटिया वही हैं जो पहले से जनता को क्या मुफ्त दिया जा सकता है अरविंद केजरीवाल की ओर से अनेक बार बोला जा चुका है। महत्वपूर्ण बात यह थी कि सुनीता ने वहीं कह दिया कि हमने यह बोलने के पहले आईएनडीआईए के नेताओं से इस पर चर्चा नहीं की है, लेकिन उम्मीद है कि सभी इसका समर्थन करेंगे। यानी यहां भी अरविंद केजरीवाल ने आईएनडीआईए में स्वयं को सबसे अलग दृष्टिकोण और विचारों वाला नेता अपनी पत्नी के माध्यम से साबित करने की कोशिश की। वास्तव में विपक्ष की रैली से कोई एक रूप, एक स्वर का संदेश नहीं निकल पाया। नेता एकत्रित जरूर हुये, उनका गुस्सा भी प्रकट हुआ और किसी तरह नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता से हटाने की भावना भी  लेकिन इसके अलावा कुछ नहीं। लोगों ने देखा है कि राष्ट्रीय स्तर पर आईएनडीआईए नमक गठबंधन नहीं है। केवल कुछ राज्यों में पार्टियों के बीच गठजोड़ है और कुछ  में ये आपस में लड़ रहे हैं। जैसे पश्चिम बंगाल और केरल में इनके घटक एक दूसरे के सामने हैं। अन्य जगह भी कई प्रकार के अंतर्संघर्ष‌ व‌‌ द्वंद्व हैं। इस रैली का कोई एक ऐसा नेता नहीं था जिनका सभी एक स्वर में नाम ले और लगे कि उनके नेतृत्व में रैली से एकजुटता का स्वर निकला है। यहां तक कि रैली में सुनीता केजरीवाल शामिल होंगी इसकी जानकारी भी दूसरी पार्टी के ज्यादातर नेताओं को पहले से नहीं थी। ऐसा होता तो मंच से इसकी घोषणा की जाती। शायद आम आदमी पार्टी या फिर कई अन्य पार्टियों और नेताओं को यह उम्मीद रही होगी कि हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन तथा सुनीता को मंच पर लाकर लोगों की सहानुभूति बटोरी जा सकती है। किंतु इसका दूसरा संदेश यह भी निकल रहा था कि आखिर इन नेताओं के जेल में जाने के बाद पार्टी के दूसरे पुरुष या महिला नेता इनकी आवाज बनकर क्यों नहीं आ रहे? क्या पार्टी में भी परिवार की ही आवाज इन नेताओं का प्रतिनिधित्व करेगी? यह ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर आईएनडीआईए के लिए देना आसान नहीं रहेगा। आम आदमी पार्टी की ओर से भगवंत मान ने भी अपनी बातें रखी, पर वे वहां अरविंद केजरीवाल के प्रतिनिधि या पार्टी के भावी नेता के रूप में नहीं दिख रहे थे।

दूसरी ओर मेरठ का विश्लेषण करें तो वहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राजग के सभी घटक दलों के बीच विचार, वक्तव्य और व्यवहारों में एकरूपता स्पष्ट दिखाई दे रही थी। किसी का कोई अलग स्वर नहीं था। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई को सही ठहराते हुए यही कहा कि यह जारी रहेगी और इसके नाम पर जो दल इकट्ठा हो रहे हैं उनके दबाव में सरकार नहीं आएगी। उन्होंने कहा कि मैं कहता हूं कि भ्रष्टाचार खत्म करेंगे और वह कहते हैं कि हम सरकार को हटाएंगे।  दूसरे,  उन्होंने लोगों को बताया कि हम अगले 5 वर्षों के लिए सरकार का एजेंडा तैयार कर रहे हैं और परिणामों के बाद नई सरकार गठन होते ही 100 दिनों के कार्ययोजना पहले से तैयार कर ली गई है। इस तरह का आत्मविश्वास प्रकट करके जनता को बताया गया कि हम केवल देश के लिए ही सोचते हैं और जिनके स्वार्थ पर आघात पहुंचा है, जिनके भ्रष्टाचार सामने लाकर कार्रवाई हुईं हैं, वही सब हमारी या हमारी सरकार का विरोध कर रहे हैं। इसके साथ-साथ योगी आदित्यनाथ ने मोदी की गारंटी और हिंदुत्व संबंधी विचारों और कार्यों को सामने रखकर कार्यकर्ताओं तथा समर्थकों के मनोभावों को अभिव्यक्ति दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ ने जब ये बातें रखीं तो तालियों और नारों से दिखाई दे रहा था कि समूह किस तरह नेताओं के साथ जुड़ा हुआ है। इसी तरह जयंत चौधरी ने जब यह कहा कि दूसरी सरकार होती तो चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न सम्मान नहीं मिलता इसके बाद जनसमूह ने तालियों की गड़गड़ाहट से इसे समर्थनदिया। इस तरह दोनों रैलियों के तुलना करके आप स्वयं उद्देश्यों की दृष्टि से उनकी सफलता और प्रभावों का आकलन कर सकते हैं।

पता- अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्पलेक्स, दिल्ली- 110092, मोबाइल -9811027208

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