शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

आम चुनाव: सरकार किसी की बने पर लोकतंत्र और संविधान सुरक्षित रहना चाहिए

बसंत कुमार

आज कल प्रात: जब भी न्यूज पेपर का पन्ना खोलते हैं तो मुख पृष्ठ पर यही पढ़ने को मिलता है कि फलां दल के इतने लोगों ने अपनी पार्टी से त्याग पत्र देकर फलां पार्टी का दामन थाम लिया है। दो दिन तक यह था कि पूर्व बाक्सर बिजेंद्र सिंह कांग्रेस के टिकट पर भाजपा के किसी दिग्गज नेता को चुनौती देने वाले हैं पर वो रातोंरात पाला बदल कर भाजपा में आ गए और अपना लोकसभा टिकट पक्का करने में सफल हो गए। इन जैसे नेताओं के कारण भाजपा में दरिया बिछाने वाले कार्यकर्ताओं को दरिया बिछाते-बिछाते दशकों निकल जाते हैं और जब टिकट का नंबर आता है तो नवीन जिंदल और बिजेंद्र सिंह जैसे आयातित लोगों के आ जाने से उनके सपने ताश के पत्तों जैसे बिखर जाते हैं। अभी कुछ दिन पूर्व कांग्रेस के दिग्गज नेता संजय निरुपम जिन्हें भाजपा के विरुद्ध अतिवादी टिप्पणियों के लिए जाना जाता रहा है और भाजपा नेत्री स्मृति ईरानी के खिलाफ अमर्यादित टिप्पणियों के लिए चर्चा में आये थे। वह कांग्रेस से नाता तोड़कर महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने वाले हैं। वैसे देश के 70 वर्ष के लोकतांत्रिक इतिहास में वर्ष 2024 का चुनाव नेताओं द्वारा पार्टी बदलने और निष्ठाये बदलने के इतिहास के रूप में जाना जायेगा। यह चुनाव देश मौजूद 'दल-बदल निरोधक कानून' का परिहास उड़ाने के लिए जाना जाएगा।

इस समय पार्टियों द्वारा चुनाव लड़ाने के लिए प्रत्याशियों की घोषणा हो रही है और विभिन्न पार्टियों के मौजूदा सांसदों के टिकट काटे जा रहे हैं पर जिन लोगों का टिकट कटा है वे यह विचार किए बिना कि उन्होंने अपनी पार्टी में रहकर वर्षों सत्ता का सुख भोगा है पाला बदलकर दूसरी पार्टियों में टिकट की जुगाड़ में लग रहे हैं और राजनीतिक दल भी अपनी पार्टी से जुड़े हुए समर्पित कार्यकर्ताओं को अवसर देने के बजाय इन भगोड़े नेताओं को उपकृत कर रही है।

जो नेता वर्षों तक कांग्रेस व अन्य विपक्षी पार्टियों में रहकर अपने आप को सेकुलरिज्म के योद्धा के रूप में पेश करते रहे हैं और अटल-अडवाणी के नेतृत्व वाली पार्टी भाजपा को सांप्रदायिक कह कर इसे छूने से परहेज करते थे आज नरेंद्र मोदीजी के करिश्माई नेतृत्व के आगे रचनात्मक विपक्ष कि भूमिका निभाने के स्थान पर सत्ता की मलाई खाने के लोभ में नतमस्तक होकर भाजपा की ओर भाग रहे हैं। भाजपा भी देश को भ्रष्टाचार का पर्याय माने-जाने वाली कांग्रेस से मुक्त भारत बनाने के स्थान पर कांग्रेस युक्त भाजपा बनाने जा रही है जो राष्ट्रवादी विचारधारा वाली पार्टी के हित में नहीं है क्योंकि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के भ्रष्ट संस्कृति में पले हुए लोग इस पार्टी में आकर भाजपा को भी ऐसा नहीं कर देंगे इसकी कोई गारंटी नहीं है।

ऐसी परिस्थिति में माननीय अटलजी की 13 महीने की सरकार के बहुमत के दौरान एक मत से गिरने की घटना याद आती है कि अटल जी को यह अहसास हो गया था कि हमारी सरकार गिर सकती है तो अटलजी के एक सहयोगी मंत्री शरद यादव ने कुछ सांसदों को दलबदल करा कर सरकार बचा ली जाए तो अटलजी ने यह कहकर मनाकर दिया कि मुझे यदि इस प्रकार से बने रहना है तो ऐसी सत्ता को मैं चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करूंगा। यद्यपि अटलजी इससे पूर्व नरसिंहा राव सरकार को बचाने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को रिश्वत देकर अपने पक्ष में वोट दिलाकर सरकार बचाने का तमाशा देख चुके थे पर उन्होंने अपने पूरे राजनीतिक जीवन में आया राम-गया राम की राजनीति का कभी भी साथ नहीं दिया।

इस संबंध में भाजपा के वरिष्ठतम नेताओं में माने जाने वाले हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार के साथ हुई वार्ता का उल्लेख करना चाहता हूं। उन्होंने बताया कि वे प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और वहा विधानसभा चुनाव हो गए थे और परिणाम आने पर भाजपा के पास सरकार बनाने के अपेक्षित सीटों से दो-तीन सीटें कम आई और दो-एक विधायकों की खरीद-फरोख्त से सरकार बनाई जा सकती थी पर इस मामले में अपनी अनिक्षा शांता कुमार जी ने अटलजी को बताई तो अटलजी ने अपने वक्तव्य में यह कहा कि हमें हिमाचल प्रदेश में विपक्ष में बैठेने का जनादेश मिला है और संगठन में बैठे उन नेताओं का मुहं बन्द कर दिया जो खरीद के माध्यम से प्रदेश में सरकार बनाना चाहते थे। यदि हम विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी को अपने देश में सुरक्षित देखना चाहते हैं तो आम चुनाव के समय पार्टियां बदलने की भागमभाग को रोकना होगा।

यह सही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के अपने दस वर्षों के कार्यकाल में आर्थिक विकास के क्षेत्र में, इंफ्रास्ट्रक्चर विकास और सड़क निर्माण के क्षेत्र मे, उद्यमिता विकास के क्षेत्र में देश ने अभूतपूर्व सफलता अर्जित की है और ऐसी आशा है कि देश के मतदाता अपने अधूरे कार्यों को पूरा करने के लिए एक अवसर और दे जिससे देश विश्व के सामने विकसित अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित कर सके। इसका अर्थ यह नहीं कि विपक्षी पार्टियों के लोग सरकार की कमियों की आलोचना करें और सरकार को और एक्टिव मोड में लाए न कि अपनी पार्टी को छोड़कर सत्ता के लोभ में सत्ता पार्टी में मिल जाए। उनके ऐसा करने से देश में लोकतंत्र की पराजय होगी जो देश के लिए खतरनाक है, ऐसी स्थिति में हमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के उस वक्तव्य का ध्यान देना चाहिए जो उन्होंने अपनी 13 दिनों की सरकार के अविश्वास प्रस्ताव के दौरान कही थी "सरकारे आएंगी और जाएंगी, पार्टियां बनेंगी और बिगड़ेंगी पर देश का लोकतंत्र बचना चाहिए। अटलजी की यह बात आज के परिप्रेक्ष में और भी सार्थक हो रही हैं जहां लोग संसद में पहुंचने के लोभ में अपने दलों को 24 घंटे में छोड़कर पाला बदल रहे है जहां रहकर उन्होंने वर्षो तक सत्ता की सुख भोगा है। अब तो अपने दलों की नीतियां व रीतियां सब कुछ कुर्सी पाने की चाह में भूल गए हैं, जो लोग कांग्रेस में रहते हुए अटल-अडवाणी की राष्ट्रवादी विचार धारा को सांप्रदायिक कहकर उनकी आलोचना करते थे वे लोग अब राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की विचारधारा के झंडा बरदार बने हुए हैं।

गुरुवार, 4 अप्रैल 2024

विपक्ष बनाम सत्तारूढ़ घटक की रैली

अवधेश कुमार

31 मार्च को राजधानी दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्षी गठबंधन आईएनडीआईए की तथा चुनाव की घोषणा के बाद उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राजग की पहली रैली मेरठ में हुई। हालांकि इस बार मेरठ रैली से ज्यादा प्रचार रामलीला मैदान की थी, क्योंकि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी तथा कांग्रेस पर आयकर विभाग द्वारा 3567 करोड़ की देनदारी का नोटिस मिलने के बाद यह पहली रैली थी। निश्चित रूप से चुनावी माहौल के कारण दोनों का महत्व था और संपूर्ण देश का ध्यान दोनों की ओर था। भाजपा और राजग की दृष्टि से देखें तो यह चुनाव की सामान्य रैली मानी जाएगी। जयंत चौधरी के राष्ट्रीय लोक दल का भाजपा के साथ गठबंधन है और वो इस रैली में मौजूद रहेंगे इसे लेकर किसी को संदेह नहीं था। इसलिए रैली का आकर्षण तो था किंतु कौतूहल जैसा कुछ नहीं था। इसके समानांतर आईएनडीआईए की रैली को लेकर कौतूहल भी था तथा इसके नेताओं के लिए अभी तक का सबसे बड़ा अवसर भी माना जाएगा। कारण, विपक्ष जनता के बीच स्वयं को पीड़ित और दमित बताकर चुनाव में जा रहा है तथा उसका मूल स्वर यही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व वाले सरकार विपक्षी नेताओं और पार्टियों को खत्म करने के लिए सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है जो देश में लोकतंत्र को खतरा है। इसलिए इसका नाम ही लोकतंत्र बचाओ रैली दिया गया। स्वाभाविक ही राजधानी दिल्ली से  देश की जनता को अपनी बात प्रभावशाली ढंग से पहुंचाने तथा उनका समर्थन हासिल करने की संभावना पैदा करने का अभी तक का सबसे बड़ा अवसर था। अगर वह अपने कार्यकर्ताओं घनघोर समर्थकों के अलावा कुछ समूह को और प्रभावित कर पाते तो चुनाव में ताकत बढ़ाने की संभावना पैदा हो सकती थी। प्रश्न है कि क्या इस दृष्टि से आईएनडीआईए की रामलीला मैदान रैली वाकई सफल मानी जा सकती है?

राजधानी दिल्ली में आम आदमी पार्टी का अभी तक ठोस जनाधार बना हुआ है। 70 में से 62 विधायक उसके हैं। इस कारण यहां अच्छी खासी संख्या अपेक्षित ही थी। इसके साथ पंजाब में भी उनकी सरकार है और हरियाणा ,राजस्थान से कांग्रेस के लोगों की उपस्थिति भी संभावित थी। अखिलेश यादव इसमें शामिल थे इसलिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश से सपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों का भी आना निश्चित था। यह तो नहीं कहा जा सकता कि संख्या दृष्टि से रैली कमजोर थी। संख्या ठीक-ठाक थी।  किंतु इतनी तैयारी के बाद राजधानी दिल्ली में जिस तरह का जैन सैलाब दिखना चाहिए था वैसा नहीं दिखा यह सच है। अरविंद केजरीवाल के गिरफ्तार होने के बाद से इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल रहा है की इतनी विधायकों और पार्षदों वाली पार्टी का प्रचंड विरोध दर्शन राजधानी में क्यों नहीं हो रहा? 

आईएनडीआईए में शामिल दलों की जो स्थिति है उसमें इसके ज्यादातर नेताओं या पार्टियों का प्रतिनिधित्व होना था और हुआ। ममता बनर्जी उपस्थित होती तो संदेश ज्यादा बेहतर जाता। नेताओं के भाषणों को देखें तो उनमें नए तत्व या पहलू तलाशना मुश्किल है। तथ्यों , तर्कों और प्रखरता के आलोक में भाषण ऐसे नहीं थे जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को लेकर लोगों के अंदर गुस्सा और विद्रोह की भावना पैदा हो। राहुल गांधी अगर 400 पर का नाम लेते हुए मैच फिक्सिंग की बात कर रहे थे तो तेजस्वी यादव ने कहा कि पहले से ही ईवीएम सेट होगा तभी 400 का नारा दिया जा रहा है। यानी ये नेता अपने समर्थकों को भी यही बता रहे थे कि चुनाव आयोग से लेकर ईवीएम तक में इस प्रकार की व्यवस्था कर दी गई है कि परिणाम उनके ही पक्ष में आएगा। इसके द्वारा आईएनडीआईए के नेतागण क्या संदेश दे‌ रहे थे? यह प्रकारांतर से चुनाव परिणाम के पूर्व ही अपनी पराजय को स्वीकार करने जैसा था। इसके अलावा ज्यादातर नेताओं का भाषण  लोकतंत्र खत्म हो गया है, ईडी,सीबीआई जैसी संस्थाओं के माध्यम से विपक्ष के नेताओं पर कार्रवाई की जा रही है, उनको जेलों में डाला जा रहा है, मीडिया को दबाव में ला दिया गया है आदि पर ही टिका हुआ था।

 विडंबना देखिए कि लोकतंत्र के नाम पर आयोजित रैली का सबसे बड़ा फोकस अरविंद केजरीवाल की पत्नी सुनीता केजरीवाल की उपस्थिति हो गई। जैसे ही समाचार आया कि पंजाब के मुख्यमंत्री भगवान सिंह मान सुनीता केजरीवाल को लेकर रामलीला मैदान पहुंच रहे हैं पूरी मीडिया का ध्यान वही केंद्रित हो गया। सुनीता केजरीवाल ने अपने भाषण में बताया कि अरविंद केजरीवाल जी ने आपके लिए छह गारंटियां दी हैं। ये गारंटिया वही हैं जो पहले से जनता को क्या मुफ्त दिया जा सकता है अरविंद केजरीवाल की ओर से अनेक बार बोला जा चुका है। महत्वपूर्ण बात यह थी कि सुनीता ने वहीं कह दिया कि हमने यह बोलने के पहले आईएनडीआईए के नेताओं से इस पर चर्चा नहीं की है, लेकिन उम्मीद है कि सभी इसका समर्थन करेंगे। यानी यहां भी अरविंद केजरीवाल ने आईएनडीआईए में स्वयं को सबसे अलग दृष्टिकोण और विचारों वाला नेता अपनी पत्नी के माध्यम से साबित करने की कोशिश की। वास्तव में विपक्ष की रैली से कोई एक रूप, एक स्वर का संदेश नहीं निकल पाया। नेता एकत्रित जरूर हुये, उनका गुस्सा भी प्रकट हुआ और किसी तरह नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता से हटाने की भावना भी  लेकिन इसके अलावा कुछ नहीं। लोगों ने देखा है कि राष्ट्रीय स्तर पर आईएनडीआईए नमक गठबंधन नहीं है। केवल कुछ राज्यों में पार्टियों के बीच गठजोड़ है और कुछ  में ये आपस में लड़ रहे हैं। जैसे पश्चिम बंगाल और केरल में इनके घटक एक दूसरे के सामने हैं। अन्य जगह भी कई प्रकार के अंतर्संघर्ष‌ व‌‌ द्वंद्व हैं। इस रैली का कोई एक ऐसा नेता नहीं था जिनका सभी एक स्वर में नाम ले और लगे कि उनके नेतृत्व में रैली से एकजुटता का स्वर निकला है। यहां तक कि रैली में सुनीता केजरीवाल शामिल होंगी इसकी जानकारी भी दूसरी पार्टी के ज्यादातर नेताओं को पहले से नहीं थी। ऐसा होता तो मंच से इसकी घोषणा की जाती। शायद आम आदमी पार्टी या फिर कई अन्य पार्टियों और नेताओं को यह उम्मीद रही होगी कि हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन तथा सुनीता को मंच पर लाकर लोगों की सहानुभूति बटोरी जा सकती है। किंतु इसका दूसरा संदेश यह भी निकल रहा था कि आखिर इन नेताओं के जेल में जाने के बाद पार्टी के दूसरे पुरुष या महिला नेता इनकी आवाज बनकर क्यों नहीं आ रहे? क्या पार्टी में भी परिवार की ही आवाज इन नेताओं का प्रतिनिधित्व करेगी? यह ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर आईएनडीआईए के लिए देना आसान नहीं रहेगा। आम आदमी पार्टी की ओर से भगवंत मान ने भी अपनी बातें रखी, पर वे वहां अरविंद केजरीवाल के प्रतिनिधि या पार्टी के भावी नेता के रूप में नहीं दिख रहे थे।

दूसरी ओर मेरठ का विश्लेषण करें तो वहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राजग के सभी घटक दलों के बीच विचार, वक्तव्य और व्यवहारों में एकरूपता स्पष्ट दिखाई दे रही थी। किसी का कोई अलग स्वर नहीं था। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई को सही ठहराते हुए यही कहा कि यह जारी रहेगी और इसके नाम पर जो दल इकट्ठा हो रहे हैं उनके दबाव में सरकार नहीं आएगी। उन्होंने कहा कि मैं कहता हूं कि भ्रष्टाचार खत्म करेंगे और वह कहते हैं कि हम सरकार को हटाएंगे।  दूसरे,  उन्होंने लोगों को बताया कि हम अगले 5 वर्षों के लिए सरकार का एजेंडा तैयार कर रहे हैं और परिणामों के बाद नई सरकार गठन होते ही 100 दिनों के कार्ययोजना पहले से तैयार कर ली गई है। इस तरह का आत्मविश्वास प्रकट करके जनता को बताया गया कि हम केवल देश के लिए ही सोचते हैं और जिनके स्वार्थ पर आघात पहुंचा है, जिनके भ्रष्टाचार सामने लाकर कार्रवाई हुईं हैं, वही सब हमारी या हमारी सरकार का विरोध कर रहे हैं। इसके साथ-साथ योगी आदित्यनाथ ने मोदी की गारंटी और हिंदुत्व संबंधी विचारों और कार्यों को सामने रखकर कार्यकर्ताओं तथा समर्थकों के मनोभावों को अभिव्यक्ति दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ ने जब ये बातें रखीं तो तालियों और नारों से दिखाई दे रहा था कि समूह किस तरह नेताओं के साथ जुड़ा हुआ है। इसी तरह जयंत चौधरी ने जब यह कहा कि दूसरी सरकार होती तो चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न सम्मान नहीं मिलता इसके बाद जनसमूह ने तालियों की गड़गड़ाहट से इसे समर्थनदिया। इस तरह दोनों रैलियों के तुलना करके आप स्वयं उद्देश्यों की दृष्टि से उनकी सफलता और प्रभावों का आकलन कर सकते हैं।

पता- अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्पलेक्स, दिल्ली- 110092, मोबाइल -9811027208

मंगलवार, 2 अप्रैल 2024

आलमी उर्दू फाउंडेशन ने किया 'महफिले ज़िक्रे अली' एवं दावत-ए-इफ़्तार का आयोजन

नई दिल्ली। आलमी उर्दू फाउंडेशन द्वारा, 'महफिले ज़िक्रे अली' एवं दावत-ए-इफ़्तार का आयोजन, मीडिया पैलेस, हैदाराबाद में वरिष्ठ पत्रकार व प्रधान संपादक, आलमी मीडिया ग्रुप; कबीर सिद्दीकी समेत अन्य भाषा विद्वानों का भाषण एवं मुशायरा, नई दिल्ली के अतिरिक्त देश के लगभग सभी राज्यों में आयोजित किया गया। 
मुशायरों का आयोजन करने वाले स्वर्गीय मोहतरम अली सिद्दीकी के सुपुत्र; श्री कबीर सिद्दीकी अध्यक्ष: आलमी उर्दू फाउंडेशन व अबूतराब एजूकेशनल ट्रस्ट द्वारा, 'मौलाए कायनात सैयदना हज़रत अली मुर्तजा के शहीदी दिवस' के पावन अवसर पर, मीडिया पैलेस ऑडीटोरीयम, जामिआ निज़ामीया कम्पलैक्स, गनफाओंडरी, हैदराबाद में महफिल ज़िक्र अली एवं दावते इफ्तार का श्रद्धापूर्वक आयोजन  किया। इसमें मौलाना सैयद निसार हुसैन हैदर आगा ने अपने भाषण में हज़रत अली की महानता, परित्याग एवं गुणें की चर्चा करते हुए आस्थापूर्वक 'मौलाए कायनात हज़रत अली' के जीवन के विभिन्न पहलूओं पर प्रकाश डाला। इस सभा में प्रसिद्ध पत्रकार डाक्टर फाज़िल हुसैन परवेज़, संपादक साप्ताहिक ‘गवाह’, वरिष्ठ शायर श्री सलाहुद्दीन नय्यर, श्री ज़िया काॅदरी अजमेरी, मुद्रक एवं प्रकाशक; राष्ट्रीय सहारा ग्रुप, ने हज़रत अली की महानता, मानवता एवं दिव्य मूल्यों पर चर्चा की। वक्ताओं ने स्वर्गीय श्री अली सिद्दीकी द्वारा आयोजित किए गए,  आलमी मुशायरों को याद करते हुए उनके सुपुत्र श्री कबीर सिद्दीकी की सेवाओं की चर्चा करत  हुए सलाह दी  कि वे इस संगठन द्वारा श्री अली सिद्दीकी की याद में साहित्यिक सभाएं आयोजित करते रहें। इसके लिए शहर के विद्वान सहायतार्थ हैं। 
श्री कबीर सिद्दीकी ने 'मौलाए कायनात' के गुणों पर प्रकाश डालते हुए कहा, "लतीफुद्दीन लतीफ और अहमद सिद्दीकी मुकेश ने जिस प्रकार से प्रचार में सहयोग किया इसके लिए मैं उनका आभारी हूँ। नाअत व मनकबत की महफिल में मुशायरे के निगरां श्री सलाहुद्दीन नय्यर के अतिरिक्त शहर के चुनिंदा शायरों एवं विद्वानों मुमताज दानिश, क़ाज़ी फारूक आरफी, डाक्टर तय्यब पाशाह कादरी, अली जव्वाद शहपर, प्रोफेसर मसऊद अहमद, लतीफुद्दीन लतीफ, तशकील अनवर रज़्जाकी, शकील अब्बास और रोशन अली रोशन ने अपनी रचनाओं पर प्रशंसा प्राप्त की। 
संचालन का कर्तव्य प्रख्यात शायर, लतीफुद्दीन लतीफ ने बहुत सुंन्दरता से निभाया।इफ्तार, नमाज़ व डिनर का भी आयोजन श किया गया। विशेष रूप से बिजली की कुमकुमों से जगमाता हुआ हाल भी छोटा पड़ गया था! श्री कबीर सिद्दीकी ने कुशलतापूर्वक सभा स्थल को सजाया था। उत्कृष्ट भाषणों ने महफिल की प्रतिष्ठा को बढ़ाया। मीडिया पैलेस के प्रमुख, डाक्टर फाजिल हुसैन परवेज़ की निगरानी में, अबदुर्रशीद जुनैद के अतिरिक्त रज़ा खान व अन्य ने सभा के सफल आयोजन में भरपूर सहाता दी। कबीर सिद्दीकी की माता जी, की देखरेख में महिलाओं के लिए अलग प्रबंधन किया गया था। परिवार की सभी महिलाओं ने परंपराओं को बरकरार रखते हुए उपस्थ्ति महिलाओं का स्वागत करते हुए इफ्तार, नमाज़ व डिनर का भव्य आयोजन किया।

सुप्रीम कोर्ट ने AAP नेता संजय सिंह को दी जमानत, आम आदमी पार्टी को बड़ी राहत

सुप्रीम कोर्ट में ईडी ने भी जमानत का विरोध नहीं किया

संवाददाता

नई दिल्ली। दिल्ली शराब घोटाले मामले में संजय सिंह को सुप्रीम कोर्ट से 6 महीने के बाद अब जमानत मिल गई है। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट जमानत की शर्तें तय करेगा. इस जमानत को मिसाल नहीं माना जाएगा। ईडी ने भी जमानत का विरोध नहीं किया और कहा कि उन्हें जमानत दी जा सकती है। अब संजय सिंह राजनीतिक गतिविधियां कर सकेंगे। पिछली सुनवाई में संजय सिंह के लिए पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था कि प्रवर्तन निदेशालय के मुख्य गवाह दिनेश अरोड़ा ने पहले अपने 9 बयानों में संजय सिंह का नाम नहीं लिया था। संजय सिंह को डेढ़ साल बाद गिरफ्तार किया गया। 

सिंघवी ने कोर्ट में कहा था कि अप्रूवर की गवाही तब तक विश्वसनीय नहीं होती, जब तक उसकी पुष्टि न हो जाए। 19 जुलाई 2023 को अप्रूवर बने दिनेश अरोड़ा के बयान में पहली बार संजय सिंह का नाम आया। यहां तक कि 164 के बयान में भी नाम नहीं लिया था. संजय सिंह ने ईडी के खिलाफ (मानहानि) शिकायत की, और फिर ईडी ने बिना किसी समन के उन्‍हें गिरफ्तार कर लिया।

हाई कोर्ट ने सात फरवरी को सिंह की जमानत याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन निचली अदालत को सुनवाई शुरू होने पर इसमें तेजी लाने का निर्देश दिया था। सिंह दिल्ली से राज्यसभा के लिए फिर से चुने गए हैं। प्रवर्तन निदेशालय ने संजय सिंह को मामले में 4 अक्टूबर, 2023 को गिरफ्तार किया था। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी दिल्‍ली शराब नीति से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में तिहाड़ जेल में पहुंच गए हैं।

मनीष सिसोदिया और के. कविता पहले से ही इस मामले में जेल में कैद हैं। केजरीवाल को 21 मार्च को प्रवर्तन निदेशालय ने गिरफ्तार किया था और वह 10 दिनों तक उसकी हिरासत में रहे। प्रवर्तन निदेशालय की हिरासत खत्म होने के बाद उन्हें विशेष न्यायाधीश कावेरी बावेजा की अदालत में पेश किया गया। ईडी ने उनकी 15 दिन की न्यायिक हिरासत का अनुरोध करते हुए कहा कि उन्होंने 'बिल्कुल भी सहयोग नहीं किया। अदालत ने ईडी की याचिका मंजूर कर ली थी।

सोमवार, 1 अप्रैल 2024

प्रधानमंत्री की देवालय से पहले शौचालय की पहल के प्रेरणास्रोत डॉ. बिंदेश्वर पाठक

बसंत कुमार

पूरा समाज पद्म विभूषण डॉ. बिंदेश्वर पाठक की जयंती 2 अप्रैल को मना रहा है। लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं पर शायद बहुत कम लोगों को पता हो कि उन्होंने अपने 5 दशक के अधिक समय के अथक प्रयास से समाज को स्कैवेंजर फ्री बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और देश में सिर पर मैला ढोने वाले लाखों लोगो को इस अमानवीय प्रथा से मुक्ति दिलाई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देवालय से पहले शौचालय की पहल के प्रेरणास्रोत बने। देश के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हे महात्मा गांधी, बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर और लाल बहादुर शास्त्री के गुणों से परिपूर्ण व्यक्तित्व थ्री इन वन की संज्ञा दी थी। सामाजिक समता का जूनुन उनमें कितना अधिक था कि अपनी मृत्यु से एक घंटा पूर्व 15 अगस्त 2023 को अपने सुलभ प्रांगण में झंडारोहण भगवती नाम की उस महिला से कराया जो वर्ष 2003 तक सिर पर मैला ढोती थी, उसी कार्यक्रम में उनकी तबियत खराब हुई और एक घंटे के अंदर ही वह सब को छोड़कर चले गए। मैं सौभाग्यशाली हूं कि मुझे उस महापुरुष के जीवन के अंतिम कार्यक्रम में उनके साथ विशिष्ठ अतिथि के रूप में मंच साझा करने का अवसर मिला। 

डॉ. पाठक को आधुनिक भारत में जहां प्रधानमंत्री जी के स्वच्छ भारत अभियान का प्रेरणास्रोत कहा जाता है वहीं उन्हें गांधी और आंबेडकर के विचारों का संवाहक माना जाता है। उन्होंने 1969 में युवा के रूप में बिहार में गांधी शताब्दी समिति के लिए काम करते समय अछूतों की बहाली के लिए काम करने का निर्णय लिया क्योंकि गांधी जी सदैव स्वच्छता की वकालत किया करते थे और हरिजनों विशेषकर मैला ढोने वाले के अधिकारों और उन्हें समाज में सम्मान दिलाने के हिमायती थे और ऐसे समाधान के लिए प्रयत्नशील थे जो घरों में सूखे शौचालयों का स्थान ले सकें।

डॉ. पाठक गांधी जी के उद्देश्य से प्रेरित थे और उनके स्वयं के अनुभवों से अपने मिशन की ओर अग्रसर होने का फैसला किया। वे एक तकनीक लेकर आये जो सूखे शौचालयों का विकल्प बन सकती थी जिसे टू पिट फोर सिस्टम कहा जाता है। उन्हें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास था कि यह तकनीक अंततः भारत में अछूतों के समुदाय के द्वारा बाल्टी शौचालय की समस्या को समाप्त कर देगी। उनके विचार में यह मात्र समाधान नहीं था अपितु रूढ़िबधिता व अमानवीय शोषण में कैद समाज को आजाद कराना था जिससे सिर पर मैला ढोने वाले समाज की गरिमा को ऊपर उठाया जा सके। 

उन्होंने सिर पर मैला ढोने वालों को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने का संकल्प लिया और अपने इस उद्देश्य के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने दो गड्ढो वाले पोर फ्लश शौचालय की स्थायी तकनीक का अविष्कार किया जिसने बाल्टी शौचालयों की जगह ली जो समाज को स्कैवेंजर बना सकी और 1970 में सुलभ इंटरनेशनल की स्थापना की। 

डॉ. बिंदेश्वर पाठक जहां महात्मा गांधी से प्रेरित होकर स्वच्छता और समाज को स्कैवेंजर मुक्त बनाने तक ही सीमित नहीं है बल्कि बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर के मिशन के अनुरूप समाज में अछूतों की स्थिति सुधारने और उनके मानवधिकारों के लिए भी कृतसंकल्प रहे। वे भेदभावपूर्ण उन सामाजिक संरचनाओं को बदलने के लिए दृढ़ संकल्प थे जो मैला ढोने वालों को मंदिरों में प्रवेश को रोकते थे। वर्ष 1988 में प्रसिद्धनाथ द्वारा मन्दिर में अछूतों के साथ उनके संस्कार और अनुष्ठान हेतु मन्दिर पहुंचे जहां ब्राह्मणों द्वारा उन्हें रोक दिया गया पर डॉ. पाठक ने टकराव का रास्ता अपनाने के बजाय गांधी के सुझाए अनुनय विनय का रास्ता अख्तियार किया और पुजारियों को अपने अछूत साथियों के साथ मन्दिर में प्रवेश के लिए राजी कर लिया। इस सफलता पर देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने टिप्पणी की कि जब तक ये चीजे हासिल नहीं की जाती है तब तक भारत को विकास की राह पर नहीं कहा जा सकता है। वर्ष 1991 मे टू पोर फ्लश शौचालय विकसित करके पर्यावरण प्रदूषण रोकने के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया गया और मोदी सरकार ने इस वर्ष उनके अनोखे योगदान के लिए मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित किया। उन्होंने मैला ढोने वालो को समर्थन व प्रेरणा दी जिससे उन्हें सामाजिक गतिशीलता के पथ पर ले जाया जा सके और उन्होंने राजस्थान के टोंक शहर में पूर्व में मैला ढोने वालो का पुनर्वास किया।

उन्होंने सुलभ के माध्यम से उनके लिए ब्यूटिशियन, खाद्य प्रसंस्करण, सिलाई, कढ़ाई के क्षेत्र में प्रशिक्षण दिलवाया और उनके व्यक्तित्व के विकास के लिए पाठ्यक्रम प्रारंभ किये, इन कारकों ने उन्हे बड़े पैमाने पर उनके आर्थिक सशक्तिकरण में योगदान किया। उन्हें आत्मनिर्भर बनाया और उन्हे सम्मान के साथ जीने में सहायता प्रदान की। इसके अलावा डॉ. पाठक ने नई दिल्ली में सुलभ काम्पलेक्स में पूर्व में मैला ढोने वालों के आश्रितों के लिए 12वीं कक्षा तक स्कूल और एक व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया। उनका यह कार्य डॉ. भीमराव आंबेडकर के वंचितों के सशक्तिकरण मिशन के अनुरूप है। उनकी संस्था सुलभ को अंतर्राष्ट्रीय गौरव उस समय प्राप्त हुआ जब संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक व सामाजिक परिषद द्वारा सुलभ इंटरनेशनल को विशेष सलाहकार का दर्जा प्रदान किया गया। 

डॉ. पाठक जहां गांधी जी के अस्पश्यृता उन्मूलन से प्रभावित थे वहीं दूसरी ओर डॉ. आंबेडकर के आर्थिक विकास के मंत्र से दलितों और वंचितों को राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल करने को उत्सुक थे। उन्होंने अस्पश्यृता जैसी कुरीति में बदलाव लाकर इसे विकास का माध्यम बना दिया। उन्होंने सुलभ शौचालय के अपशिष्ट से बिना दुर्गंध वाली बायोगैस का निर्माण किया, इस तकनीक का उपयोग करके भारत समेत अनेक विकासशील देश ऊर्जा के साथ साथ कंपोष्ट खाद के रूप में प्रयोग कर रहे हैं। इसी कारण उन्हे आजाद भारत के गांधी के सामाजिक सुधार और डॉ. आंबेडकर के आर्थिक सुधार और महिला सशक्तिकरण के ध्वज वाहक की संज्ञा दी जाती हैं।

वर्ष 2012 में सर्वाेच्च न्यायालय ने वृंदावन में रह रही विधवाओं की दयनीय स्थिति पर बड़ी तल्ख टिप्पणी की थी और इनके पुनर्जीवन का उत्तरदायित्व सुलभ इंटरनेशनल को दिया था। अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करते हुए डॉ. पाठक ने अनूठी पहल की और इन्हें गुजारे के लिए 2000 रुपए प्रतिमाह पेंशन की शुरुआत की और सदियों पुरानी रुढिवादी परंपरा से हटकर अनूठे अंदाज में होली मनाने के लिए प्रेरित किया और होली के पावन अवसर पर इन विधवाओ को राधा की सहचरी बन कर श्याम से होली खेलने के लिए प्रेरित किया।

वास्तव में डॉ. पाठक ऐसे योद्धा थे जो मैला ढोने वाली महिलाओं के उत्थान से लेकर वृन्दावन की विधवाओं के कल्याण की जिम्मेदारी सहर्ष स्वीकार करते थे। वे गाँधी जी और डॉ. आंबेडकर के विचारों के सच्चे ध्वज वाहक थे और उनकी सोच से प्रेरणा लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अपनी आधुनिक सोच से स्वच्छ भारत मिशन को मूर्त रूप दिया।

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