बुधवार, 1 नवंबर 2023

एर्नाकुलम विस्फोट एक चेतावनी है

अवधेश कुमार 

किसी आतंकवादी घटना की गंभीरता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होता कि उसमें कितने लोगों की मौत हुई। केरल में एर्नाकुलम जिले के कलामसेरी के कन्वेंशन सेंटर यानी सम्मेलन केंद्र में हुआ विस्फोट हर दृष्टि से डराने और चिंतित करने वाली घटना है। निस्संदेह , तीन व्यक्तियों की मृत्यु तथा 51 लोगों का घायल होना सुरक्षा एजेंसियों के लिए थोड़ी राहत का विषय है। हालांकि एक व्यक्ति की भी मृत्यु या घायल होना हमारे लिए चिंता का विषय होना चाहिए। यहोवाज विटनेसेस या यहोवा विटनेस समुदाय के तीन दिनों के कार्यक्रम में 2000 के आसपास लोग उपस्थित थे। तीन विस्फोट का मतलब इसकी पहले से पूरी तैयारी की गई थी। यह भी साफ हो गया है कि विस्फोट ईईडी से ही हुआ। अभी यह कहना मुश्किल है कि कोच्चि निवासी डोमिनिक मार्टिन नामक व्यक्ति द्वारा घटना की जिम्मेवारी लेने का सच क्या है। क्या वह अकेले इस विस्फोट में शामिल था या उसके साथ अन्य लोग थे? जो कुछ वह कह रहा है उतना ही सच है या इसके पीछे कोई व्यापक षड्यंत्र है? राष्ट्रीय जांच एजेंसी या एनआईए और केरल का आतंकवाद निरोधी दस्ता की छानबीन के बाद इसका पूरा सच सामने आएगा। किंतु केरल सरकार द्वारा बिना सोचे समझे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आरोपित करने से ज्यादा गैर जिम्मेदार कुछ नहीं हो सकता। तो केरल के रुख और यहोवाज विटनेसेस के साथ इस समय देश का जैसा वातावरण है और विशेष कर केरल में जैसा तनावपूर्ण माहौल बनाया गया है उनकी गहराई से विवेचना आवश्यक है।

यहोवाज विटनेसेस ईसाई धर्म से  निकला हुआ एक समूह है। इसका मुख्यालय अमेरिका के न्यूयौर्क  के वारविक में है और माना जाता है कि इस समय विश्व भर में इसके पचासी लाख सदस्य हैं। इसे इंटरनेशनल बाइबल स्टूडेंट्स एसोसिएशन की इकाई माना जाता है जिसकी स्थापना चार्ल्स टेज रसेल ने वर्ष 1872 में पीट्हवर्ग में की थी। यह मुख्य धारा के ईसाई समुदाय  कैथोलिक प्रोटेस्टेंट आदि से अलग विचार रखता है। इसके अनुसार होली ट्रिनिटी यानी पवित्र त्रयी गॉड, द फादर; गॉड , द सन;-- यीशू :  गाड था होली स्पिरिट में ये विश्वास नहीं करते। ये यहोवा को  गॉड ऑफ द बाइबल और सभी चीजों के निर्माता के रूप में करते हैं।

यहोवाज विटनेस के लोग यीशु मसीह को ईश्वर न मानकर उनका पुत्र मानते हैं तथा स्वयं को वास्तविक क्रिश्चियन कहते हैं। यह क्रिसमस और ईस्टर जैसी छुट्टियां भी नहीं मानते। इनके सामाजिक नियम और रीति- रिवाज काफी सख्त हैं जिसमें तलाक लेने और रक्त लेने तक का निषेध है। स्वाभाविक अन्य ईसाई मतावलंबियों के साथ इनका तनाव होता है। जो ईसा मसीह को ईश्वर मानते हैं वो ईश्वर न मानने वालों का विरोध करेंगे। ये लोगों के बीच अपना विचार प्रसार कर उन्हें अपने साथ शामिल करने की कोशिश करते हैं और इससे भी तनाव पैदा होता है। ध्यान रखिए, केरल में लगभग तीन दशक पहले इस समूह के तीन बच्चों पर उनके स्कूल में राष्ट्रगान का अपमान करने पर अनुशासन तो कार्रवाई की थी और यह मामला उच्चतम न्यायालय तक गया था।  यह समुदाय अपने विस्तार के लिए ऐसी बातें बोलता है जिससे निस्संदेह भारत विरोध या यहां की सभ्यता संस्कृति सामाजिक व्यवहार आदि की निंदा और उनके अंत करने तक की बातें होती हैं। केरल में चर्च की कुछ गतिविधियां भी समाज को असहज करने वाली रही हैं और उनका विरोध होता रहा है। 

मार्टिन ने घटना के बाद छह मिनट का एक वीडियो जारी किया जिसमें कह रहा है कि उसने इसलिए किया क्योंकि संगठन की शिक्षाएं  देशद्रोही है। इसकी विचारधारा खतरनाक है और इसलिए इसे राज्य में समाप्त करना होगा। उसका कहना है कि उसने कई बार संगठन को अपनी शिक्षा या विचार को सही करने को कहा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उसके अनुसार चूंकि मेरे पास कोई अन्य विकल्प नहीं था, इसलिए मैंने यह निर्णय लिया। यहोवाज विटनेस ने उसे अपना पंजीकृत सदस्य मानने से इन्कार किया है। जिस तरह डोमिनिक मार्टिन बयान दे रहा है उससे नहीं लगता कि समूह से उसका संबंध नहीं रहा होगा। निश्चित रूप से इस घटना के बाद डोमिनिक मार्टिन के साथ समूह की ,गतिविधियों, विचारों , संसाधनों आदि की व्यापक छानबीन होगी। किंतु पिछले कुछ समय से केरल में भारत विरोधी हिंसक मजहबी कट्टरपंथ की चिंताजनक गतिविधियां सामने आईं हैं। इजरायल और हमास युद्ध के बाद वैसे तो देश का वातावरण ही काफी संतप्त और तनावपूर्ण बनाया जा चुका है लेकिन केरल में लगभग प्रतिदिन कहीं न कहीं कोई छोटी बड़ी रैली या धरना प्रदर्शन हो रहे हैं। इस विस्फोट के एक ही दिन पूर्व केरल की एक रैली को हमास के पूर्व प्रमुख खालिद मशाल ने संबोधित किया था जिसमें उसने कहा था कि बुलडोजर, हिंदुत्व और यहूदीवाद को उखाड़ फेंकना है। तात्कालिक विस्फोट से सीधे इसका संबंध हो या नहीं हो किंतु स्थिति कितनी खतरनाक है कि विदेश में बैठे हिंसक संगठन का पूर्व प्रमुख वर्चुअल भारत की रैली को संबोधित करते हुए हिंसक विद्रोह के लिए उत्तेजित करता है और लोग तालियां बजाते हैं। भाजपा को छोड़कर किसी राजनीतिक पार्टी ने इसका विरोध नहीं किया।

केरल सरकार को इसका संज्ञान लेकर कार्रवाई करनी चाहिए थी। ऐसा न करने से केवल उन तत्वों का ही नहीं हिंसा की मानसिकता पालने वाले सभी का हौसला बढ़ता है। 20 फोटो के बाद केरल सरकार के प्रवक्ता का बयान है कि पूरा केरल फिलिस्तीन के नाम पर एकजुट है और अगर यह विस्फोट उसे तोड़ने के लिए है तो इसे स्वीकार नहीं किया जाएगा। सरकार की यह मानसिकता डरावनी है। केरल में फिलिस्तीन के नाम पर हो रही रैलियों और प्रदर्शनों में सत्तारूढ़ वाम मोर्चा के साथ कांग्रेस नेतृत्व वाले विपक्षी मोर्चा के नेता भी शामिल हो रहे हैं। हमास के पूर्व प्रमुख खालिद मशाल के रैली में शामिल होने के बाद भ्रम दूर हो जाना चाहिए। इसके बाद यय कहना ज्यादा आसान हो गया है कि इजरायल विरोध‌ के नाम पर हमास का समर्थन किया जा रहा है। पार्टियां, संगठन अपने बयानों और गतिविधियों से पूरे देश का माहौल तनावपूर्ण बना रहे हैं। पूर्णिया में सांप्रदायिक तनाव पैदा हुआ तो महाराष्ट्र में मुंबई से लेकर कई स्थानों पर प्रदर्शनों में उत्तेजक नारे और भाषण हो रहे हैं। इसके परे भी राजनीतिक मतभेद को पार्टियां इस तरह प्रकट करती हैं मानो देश के अंदर युद्ध की स्थिति हो। ऐसे तनावपूर्ण वातावरण में कोई असंतुलित व्यक्ति और समूह हिंसा की सीमा तक जा सकता है। कई राज्य केंद्र के सुरक्षा अलर्ट या खुफिया इनपुट को भी राजनीतिक आधार पर विश्लेषित करते हैं। यहां तक कि उनकी अपनी सुरक्षा एजेंसियों की सूचनाओं को भी बार कई बार उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता जितनी ली जानी चाहिए। जैसी जानकारी है केंद्र की ओर से हमास इजरायल युद्ध के बाद सभी राज्यों को उनकी सुरक्षा संवेदनशीलता के अनुसार सुरक्षा अलर्ट दिया गया था। केरल संवेदनशील राज्यों में शीर्ष पर है , इसलिए उसे कई अन्य राज्यों के साथ विशेष रूप से आगाह किए जाने की सूचना थी। एक साथ 2000 लोग 3 दिनों के लिए इकट्ठे हों, उस संगठन का ईसाइयों के बीच ही विरोध हो, प्रदेश का वातावरण लगातार रैलियों ,विरोध प्रदर्शनों से तनावपूर्ण बना हो, पहले से वहां मजहबी कट्टरपंथ आतंकवाद के स्लीपर सेल पकड़े गए हों वहां विशेष सुरक्षा व्यवस्था न किया जाना बहुत कुछ कहता है। केरल में इसाई मतों के बीच आपसी विरोध और तनाव के समाचार वहां के स्थानीय अखबार में आते रहते हैं। यही नहीं यहोवाज के लोग येरूसलम भी काफी जाते रहते हैं। तो इस दृष्टिकोण से भी थोड़ी ज्यादा सुरक्षा की आवश्यकता थी। जान बिन सही स्पष्ट होगा कि इसके पीछे किस तरह का षड्यंत्र है। दूसरे संगठन भी ध्यान बांटने के लिए ऐसे तत्वों का उपयोग करते हैं।

क्या विस्फोटों के बाद इसे फिलिस्तीन एकजुटता को तोड़ने की कोशिश में के रूप में देखने के सरकार के बयान को जिम्मेवार माना जा सकता है? अभी भी केरल सरकार संघ को आरोपित कर और स्वीकार राजनीति कर रही है। सुरक्षा के मामले पर इस तरह का व्यवहार हमें कहीं का नहीं छोड़ेगा। अनेक शक्तियों और देश भारत में हिंसा और सांप्रदायिक तनाव पैदा कर इसे तोड़ने का षड्यंत्र करते रहते हैं। इसके प्रमाण भी मिले हैं। हमने अनेक आतंकवादी हमले झेले हैं। फिलिस्तीन हमास युद्ध के बाद की संवेदनशीलता को देखते हुए पार्टियों, नेताओं और संगठनों को अत्यंत ही सोच समझकर संयमित बयान देने की आवश्यकता थी। सुरक्षा अलर्ट को भी पूरी गंभीरता से लिया जाना चाहिए। एर्नाकुलम विस्फोट हम सबके लिए एक सबक बनकर आया है। आप सरकार का विरोध करिए लेकिन ऐसे मामले पर कुछ भी बोलते समय ध्यान रखिए कि इसके दुष्परिणाम हमारे देश के लिए घातक हो सकते हैं। सबके पास सारे मुद्दों की पूरी जानकारी नहीं होती। कौन इससे क्या निष्कर्ष निकाल कर कहां क्या कर देगा इसकी कल्पना नहीं की जा सकती।



सोमवार, 30 अक्टूबर 2023

नेताजी : एक स्वाधीन आत्मा

डॉ. मीना शर्मा
भारतीय स्वाधीनता संग्राम के महानायक, आधुनिक भारत के निर्माताओं में अग्रगण्य, भारत माता का मस्तक ऊँचा करने वाले भारत माता के लिए अपना तन-मन-धन, अपना संपूर्ण जीवन, अपनी प्राणात्मा का उत्सर्ग करने वाले मां भारती की सेवा में, अर्चना में अपना शीश फूल चढ़ा देने वाले स्वाधीनता के सबसे बड़े पुजारी और स्वाधीनता के सबसे बड़े सिपाही एवं निर्भय आत्मबलिदानी महापुरुष का नाम 'सुभाष चन्द्र बोस' है।
सुभाषचन्द्र बोस सिर्फ एक व्यक्ति का नाम नहीं है, बल्कि एक संस्था का नाम है, एक विचार का नाम है। निरर्थक चिंतन या विकास में समय लगाना वे समय की बर्बादी मानते थे। स्वाधीनता के विचार और स्वाधीनता के व्यवहार का नाम है। विचार की सार्थकता उनके कदमों में होती है। जहाँ स्वाधीनता के विचार और उसका मूर्तरूप व्यवहार एक दूसरे से रचे-बसे हुए हैं, घुले-मिले हुए हैं। समरूप हैं। समरस हैं। जहाँ अपना सर्वस्व, अपनी एक एक सांस आखिरी सांस लहू का एक- एक कतरा आखिरी कतरा भी भारत माता की अनन्य भक्ति में स्वतंत्रता की देवी के श्रीचरणों में आत्मत्याग और आत्म समर्पण कर दिया जाता है। शीश रूपी फूल को स्वाधीनता के अनुष्ठान में मां भारती के कदमों में भेंट चढ़ा दिया जाता है। कुछ भी अपने पास निःशेष नहीं होता है।
श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने 'नेताजी' के सर्वोच्च आत्मबलिदान, आत्मोत्सर्ग की भावना को इन शब्दों में रेखांकित करते हुए कहा था कि- 'He was one of India's greatest and he fearlessly sacrificed everything for the cause of his country's freedom. His life and career will serve as a source of insipiration to generations of Indians Irrespective of caste, creed or community'.
राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी की 'पुष्प की अभिलाषा' सबने पढ़ी होगी किन्तु क्या किसी ने स्वयं अपने शीश को ही पुष्प समझा, पुष्प मानकर स्वाधीनता देवी को भेंट चढ़ाने की अभिलाषा क्या किसी ने रखी है और उसे ही साकार करने, उसे ही जीने में अपना संपूर्ण जीवन न्यौछावर कर दे, खुद को ही अर्पित कर दे, अपना जीवन खपा दे, प्राणों की आहुति, आत्मबलिदान कर दे, नेताजी न केवल आजादी के यज्ञ में प्रस्तुत हैं, बल्कि राष्ट्र के नवयुवकों, आजाद हिन्द सेना, देश के सिपाहियों के रग-रग में, कण कण में जोश का संचार करते हुए सर्वोच्च बलिदान का आह्वान करते हुए शीश पुष्प गुच्छों की अभिलाषा को इन शब्दों में व्यक्त करते हैं-
'स्वतंत्रता बलिदान चाहती है। उसके लिए सबकुछ देना है। आपने आजादी के लिए बहुत त्याग किया है, किन्तु अभी प्राणों की आहुति देना शेष है। आजादी को आज अपने शीष फूल चढ़ा देने वाले पुजारियों की आवश्यकता है। हमें ऐसे नवयुवकों की आवश्यकता है जो अपने हाथों से अपना सिर काटकर स्वाधीनता की देवी को भेंट चढ़ा सके। आप मुझे अपना खून दें, मैं आपको आजादी दूंगा।'
आजाद हिन्द सेना और उसका प्रतिज्ञापत्र राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन की पाठशाला थी। जहां प्रत्येक सिपाही देश के लिए मर-मिटने का जज्बा लेकर प्राणों की आहुति के लिए हर क्षण तत्पर एवं स्वयं को प्रस्तुत करते हुए यह शपथ लेता था कि- 'मैं स्वयं आजाद हिन्द सेना में भर्ती होता हूं। भारत की स्वतंत्रता के लिए तन-मन-धन न्यौछावर कर देने की दृढ़ प्रतिज्ञा करता हूँ। भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाने को भी तैयार हूँ। मैं स्वयं को छोड़कर अपने देश की सेवा करूंगा। देशवासियों से चाहे वह किसी जाति, संप्रदाय व प्रांत से हों, किसी प्रकार का भेदभाव नहीं रखूंगा और सभी भारतीयों को अपना भाई समझंगा।'
सुभाषचन्द्र बोस के लिए स्वाधीनता का कार्य पुण्य का कार्य और पराधीन रहना पाप समान था। अपने जीवन के अंतिम सांस तक वे इसी स्वाधीनता यज्ञ के पुजारी थे। इस निर्मल यज्ञ में स्वाधीनता के साथ किसी भी प्रकार के समझौते के लिए कोई स्थान नहीं था। यही वजह थी कि कांग्रेस के समझौतावादी नीतियों और सत्ता प्राप्ति के लिए औपनिवेशिक शासन के साथ गांधी जी और नेहरू जी का समझौता रास नहीं आया। जिस अंग्रेजी साम्राज्यवाद ने देश के सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक ढांचे को नष्ट, तहस नहस कर दिया था। वे गुलामी को मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप समझते थे और ब्रिटिश सरकार के अन्याय, उत्पीड़न के साथ समझौता करना सबसे बड़ा अपमान मानते थे। अपने स्वाधीनता के ऊंचे आदर्श एवं सिद्धांत के साथ सुभाषचन्द्र बोस फिर वो कैसे सोच सकते थे, और न ही औपनिवेशिक शासन के साथ कांग्रेस की समझौतावादी नीतियों को ही वे बर्दाश्त कर सकते थे। वसूलों पे आंच आना उन्हें कतई पसंद नहीं था।
सुभाषचन्द्र बोस के लिए देश सबसे ऊपर था, दल या व्यक्ति नहीं। दल या सत्ता के लिए समझौता करना नैतिकता, आदर्श, सिद्धांत के लिए नैतिकता के दलदल के समान था। अतएव वे गांधीजी का सम्मान करते हुए भी जहां उनके सिद्धांत एवं आदर्श गांधी के साथ टकराते थे वहां वे ससम्मान निर्भय एवं अडिग स्वर में बापू से कहते- "मैं आपका अन्धाअनुकरण नहीं करता 'वे उसी रास्ते पर चलना पसंद करते थे, जो देश की स्वाधीनता के लिए सर्वोत्तम हो। आंतरिक प्रेरणा से जिस व्यक्ति ने जन्मभूमि की सेवा का आजीवन व्रत रखने का संकल्प लिया हो, सिविल सर्विस में चतुर्थ स्थान प्राप्त किया हो उसके बावजूद भी उस अंग्रेजी व्यवस्था के सरकारी नौकरी को लात मार दिया हो, क्योंकि उसके शपथ ग्रहण में ब्रिटेन की महारानी के प्रति निष्ठा की शपथ और अंग्रेजी सरकार की सेवा का पाठ पढ़ाया जाता था। सुभाष अंग्रेजों की सेवा और देश की सेवा दोनों भला एक साथ कैसे कर सकते थे? दोनों में से किसी एक को चुनना था। सुभाष ने देश की सेवा को चुना। यहां भी उनका मान और देश का अभिमान एक दूसरे में घुले-मिले थे। ब्रिटिश सरकार की बुनियाद को मजबूत करने की जगह उससे पृथक हो जाना ही वे श्रेष्ठ समझते थे।
जिस आई.सी.एस. यानी सिविल सर्विस को युवा पद - लालसा के कारण मोह और सपने पालता है, उसी नौकरी को बिना किसी शिकन के यूं लात मार दिया सुभाष ने, क्योंकि उनका देश के प्रति मोह और सपने कहीं अधिक बड़े थे। जिसे वे नि:स्पृह भाव से त्यागकर आत्मत्याग के आदर्श को लेकर ही अपने जीवन को देशहित में आरंभ करना चाहते थे। तभी नौकरी छोड़ते ही तुरन्त राष्ट्र सेवा के कार्य में लग गए। आत्मत्याग के आह्वान को वे साहस के साथ, धैर्य के साथ स्वीकार करते हुए समझौते के स्थान पर सिद्धांत को, अंग्रेजी सेवा के स्थान पर देश सेवा दल के स्थान पर देश को चुना ओर गांधीजी और कांग्रेस की ढुलमुल समझौतवादी नीतियों के कारण विवश होकर देश छोड़ विदेश से ही आजाद हिंद फोर्स बनाकर भारत की स्वतंत्रता संग्राम का संघर्ष का रास्ता चुना । सुविधा और ऐशोआराम की जगह वैरागी एवं कष्ट का जीवन चुना। भारतीय जेलों में रहकर सड़कर मरने से अच्छा देश की आजादी के लिए प्राण न्यौछावर कर एक शहीद जवान का जोखिम भरा बलिदान वाला रास्ता चुना।
आहार, निद्रा, सन्तानोत्पत्ति तक सीमित लोक लीक चलन नीति उनके लिए किसी जीवित राष्ट्र का मरण के समान था। ऐसा राष्ट्र मरणोन्मुख होता है। भारतीय इतिहास और मध्य युग में व्याप्त अंधकारपूर्ण युग या मुगलराज का कारण भी किसी राष्ट्र का इस लोक लीक चलन नीति से ग्रसित होना होता है। परन्तु नवजागरण की झलक का प्रकाश पाकर अंधकार मिटने लता है और नवजागरण की चेतना जीवन का उद्देश्य और जीवन धर्म को पुनः प्रकट करने लगती है। केवल जिंदा रहने के लिए जिन्दा रहना सुभाष को वरेण्य नहीं था। देश, जीवन और भारतीय सभ्यता के उद्देश्य के लिए वे बंगाल और भारत के नवयुवकों के जीवन को एक उद्देश्य एक मिशन के साथ जोड़कर युवाओं और राष्ट्र की नवीन शिराओं में नवीन रक्त का संचार, जागरण की नई चेतना का उन्मेष करते हैं। नई ऊर्जा, नई दिशा, नया जोश नया आत्मविश्वास भरते हैं।
व्यक्ति हो या फिर राष्ट्र दोनों के लिए ही आत्मविश्वास (Self believe ) जरूरी होता है, खड़ा होने के लिए सपनों को साकार करने के लिए। अस्तित्व की सार्थकता का विश्वास किसी व्यक्ति या राष्ट्र को जिंदा रखती है। और अस्तित्व की सार्थकता को रास्ता भूमिका के निर्वहन से होकर गुरजता है। बिना भूमिका के व्यक्ति या राष्ट्र को पुनः जीवित कर देता है। वह सपना देखने के लिए साहस करता है और फिर साहस के लिए सपने देखता है। If you dare to Dream than Dream to dare.'
महीनों महीनों जेल में रहकर आजादी की लड़ाई में तमाम यातनाएं, क्रूरताएं, मार, चोट, दर्द आदि को सहते हुए भी इसी आत्मविश्वास इसी अन्तःप्रेरणा ने सुभाषचन्द्र बोस को टूटने नहीं दिया। बल्कि और भी अधिक, पहले से भी अधिक शक्तिशाली हो उठते हैं। अक्सर यातनाएं सहते समय उनका मन उत्तर देता था 'भारत का एक मिशन है, एक गौरवपूर्ण भविष्य, भारत के उस भविष्य के उत्तराधिकारी हम हैं। नये भारत के, मुक्ति के इतिहास की रचना हम ही कर सकते हैं और हम ही करेंगे।'
भारत के आत्मप्रतिष्ठा का मार्ग इस खोये हुए आत्मविश्वास को पुनः प्राप्त कर अटल आस्था के साथ देश की युवाशक्ति को मृत्युजयी बनाते हुए भारतमाता के लिए अपना जीवन उत्सर्ग करने प्रबल उत्कंठा में बदलकर सुभाष युवाओं की चेतना में क्रांतिकारी परिवर्तन कर देते हैं। वो अब आदर्श के कठोराघातों से यथार्थ के निष्ठुर सत्य को भी धूल में मिला सकता था।
जीवन उत्सर्ग की प्रेरणा, अदम्य साहस, भारत की श्रेष्ठता पुनः प्रतिपादित करने की प्रबल भावना एंव कामना ने सुभाष चन्द्र बोस को 'नेताजी' सुभाषचन्द्र बोस बनाता है। 'नेता' का अर्थ राजनीतिज्ञ या चुनाव लड़ने वाला छुटभैये नेता न होकर वे इस शब्द में एक नवीन अर्थ, नया अर्थ गौरव भरते हैं। 'नेता' का अर्थ 'नेतृत्व' देने वाला व्यक्ति, Leader 32 A Person who can lead the Nation, the Society is called a Leader.'
देश, समाज और युवाओं को एक नई दिशा देने वाला व्यक्ति ही वास्तविक अर्थों में Leader या नेता कहलाता है। इतिहास के उस दौर में युवाओं का उनसे बेहतर दिशा और नेतृत्व प्रदान करने वाला व्यक्ति और कौन हो सकता है? आजाद हिन्द फौज की स्थापना एवं नवयुवकों की फौज खड़ी करना, जो आत्मबलिदान की भावना से लबालब थे, लैश थे, इसी का जीवन्त ऐतिहासिक प्रमाण एवं उदाहरण है। इस युवा शक्ति को सुभाष जीने को, जीवन को राष्ट्र को एक उद्देश्य से संपृक्त करते हैं, जो पतनशीलता के अंधकार को दूर करने का बीड़ा उठाते हुए तमाम कष्ट सहता है, यातनाएं भोगता है, इस विश्वास के मनोबल पर कि 'जब इस जीवन में कोई श्रेष्ठ कर्म नहीं कर सकते तो जीवित रहना व्यर्थ है।'
देश के लिए जीना धर्म है। धर्म और देश के लिए जीवित रहना ही यथार्थ जीवन है। 'भारत और भारतवासियों एवं भारतमाता की दुर्दशा, गुलामी, अन्याय, घोषणा, उत्पीड़न को देखकर परतंत्र भारत माता के साथ-साथ भारतमाता की संतान की आत्मा भी हो उठती है। वह नेताजी सुभाष चन्द्र के नेतृत्व में स्वार्थरहित होकर भारतमाता के लिए अपना जीवन बलिदान, उत्सर्ग की भावना से भरकर युवाशक्ति हुंकार भरता है। आत्मप्रतिष्ठा का मार्ग का वरण कर मातृभूमि पर शीश फूल चढ़ाने निकल पड़ता है। फिर क्या था 'वन्दे मातरम' राष्ट्रीय अभियान और राष्ट्रीय अभियान बनकर पूरे बंगाल और देश में गूंजने लगती है। विपत्तिकाल में मां के आह्वान के अतिरिक्त कोई और दूसरा नाम होता है क्या? 'भारत माता' के चरणों में आत्मोत्सर्ग आत्मत्याग की भावना से भरकर राष्ट्र सेवा के मार्ग में युवाओं का पथ प्रदर्शक बनकर सुभाष पूरी निष्ठा के साथ परतंत्र भारत मात्रा को युक्त कराने के राष्ट्रीय कार्यों में खुद को लाखों युवाओं के साथ झोंक देते हैं। जिदंगी दांव पे लगा देते हैं। प्राण न्यौछावर कर अदम्य उत्साह के साथ करते हैं।
सुभाष और भारत माता के नेतृत्व को पूरे बंगाल, देश और युवा हृदय से स्वीकार करने लगता है। भारत माता के प्रति हृदय में अटूट श्रद्धा रखकर मातृभूमि की सेवा के अधिकार का, कर्त्तव्य का उत्साह के साथ पालन करता है। क्योंकि मां के अतिरिक्त अन्य कोई चीज पूज्य नहीं, और विपत्ति में मां के अतिरिक्त अन्य कोई नाम नहीं होता है। अन्य नाम है क्या? क्योंकि इतिहास गवाह है कि विपत्ति काल में सदा हमने मां का आह्वान किया है।

शनिवार, 28 अक्टूबर 2023

फूल वालों की सैर 29 अक्टूबर से 4 नवंबर 2023 तक

 नई दिल्ली। मुगल काल से चला आ रहा साप्रदायिक सौहार्द व राष्ट्रीय एकता का संदेश वाहक मेला फूल वालों की सैर इस साल 29 अक्टूबर 2023 को रंगारंग उत्सव का रूप लेगा। इस दिन सुबह 10:30 बजे सर्वोदय को एड सीनियर सेकेंडरी विद्यालय कुतुब महरौली में की चित्रकला प्रतियोगिता होगी। मेने की समारोह की विस्तृत जानकारी देते हुए मेले की आयोजन समिति अजुमन सर ए गुल फरोसा की महासचिव श्रीमती उषा कुमार ने बताया कि इस वर्ष यह मेला 29 अक्टूबर 2023 से प्रारंभ होगा। 30 अक्टूबर 2023 को फूलों का पखा दिल्ली के उपराज्यपाल श्रीमान विनय कुमार सक्सेना जी को उनके निवास स्थान पर पेश किया जाएगा और साथ ही शहनाई वादन भी होगा फिर इसके बाद फूलों के पंखे दिल्ली के डिवीजनल कमिश्रर को पेश किए जाएंगे और फिर दिल्ली के मुख्यमंत्री यो अरविंद केजरीवाल जी व मुख्य सचिव को पंखे पेश किए जाएंगे और इसके बाद दिल्ली के पुलिस कमिश्रर श्री संजय अरोड़ा जी को पंखा पेश किया जाएगा।

दिनांक 31 अक्टूबर 2023 को दोपहर 3:00 बजे सद्भावना वाला फूलों के शहनाई ढोलताशा के साथ इंडिया गेट पर निकल जाएगी. जिनमें सभी समुदायों के लोग वह सदस्य शामिल होंगे और इसके बाद सद्भावना यात्रा फूलों के पचे शहनाई और ढोल ताशा के साथ चांदनी चौक के गौरीशंकर मंदिर में से टाउन हॉल होते हुए पुन गौरी शंकर मंदिर पर समाप्त होगी। इस वर्ष साहित्य कला परिषद द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किए जाएंगे।

दिनाक 1 नवंबर 2023 को दोपहर से कुश्ती कवडी आदि खेलों का आयोजन महरौली के डीटीए आम बाग पर होगा जिसमें विधायक श्री सोमनाथ भारती जी और नरेश यादव जी मुख्य अतिथि होंगे।

दिनांक 2 नवंबर 2023 की शाम 4:00 बजे महरौनी स्थित महान सूफी संत ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काफी की दरगाह पर दोनों समुदाय के लोग परंपरा के मुताबिक मिलजुल कर फूलों की चादर चढाएंगे। दिल्ली बालों के इस दल का नेतृत्व माननीय उपराज्यपाल श्री विनय कुमार सक्सेना साहब करेंगे। नागरिक और उपराज्यपाल के हाथों चादरपोशी के बाद अगले दिन 3 नवंबर 2023 को शाम 6:00 बजे दोनों समुदाय के लोग व माननीय उपराज्यपाल श्री विनय कुमार सक्सेना साहब मिलजुल कर पांडव कालीन श्री योगमाया मंदिर महरौली में फूलों का पखा और छत्र चढ़ाएंगे।

फूल वालों की सैर का समापन दिनांक 4 नवंबर 2023 को महरौली के ऐतिहासिक जहाज महल के प्रांगण में होगा। इसमें हमारे देश की विविधता और राष्ट्रीय एकता और अखंडता का भव्य और समृद्ध स्वरूप दर्शाने वाले समारोह होगे। उल्लेखनीय है कि विभिन्न राज्यों से आने वाले सांस्कृतिक दल इस समारोह में अपने लोक कथा लोक कलाओं की अलक पेश करते हैं और दरगाह व मंदिर के लिए सजा ध्वज पथा लाते हैं। यह पंखा उसके राज्य के अनुभवी शिल्पकार और दस्तकार तैयार करते हैं। इसके बाद साहित्य कला परिषद द्वारा कल्चर प्रोग्राम व पूरी रात भर कव्वाली का दिलकश मुकाबला होगा।

फूल बालों की सैर के लिए भारत सरकार द्वारा आयोजन समिति बंजुमन सैर ए गुप्त फरोसा को राष्ट्रीय सांप्रदायिक सद्भावना पुरस्कार से भी नवाजा है। समिति को यह पुरस्कार भारत की पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी द्वारा 12 अगस्त 2009 को प्रदान किया गया था। समिति की महासचिव श्रीमती उषा कुमार ने बताया कि सन 1812 से 1842 तक हर साल लगने वाले इस मेले को अंग्रेजा ने भारत छोड़ो आंदोलन के विरोध में तथा अपने विभाजन कार्य नीति के तहत फूट डालो राज करो के अंतर्गत बंद कर दिया। था। इसे दोबारा 1961 में दिल्ली वासियों की अपील पर भारत सरकार ने दोबारा से शुरू कराया था।

शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2023

कुछ भ्रांतियों को तोड़ गए स्पिन के सरदार ‘बिशन सिंह बेदी’

 

बसंत कुमार

इस समय देश में पांच राज्यों के विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं और वोटरों को आकर्षित करने के उद्देश्य से हर राजनीतिक दल चुनावी रेवड़ियां बांटने के चुनावी वायदों की झड़ी लगा रहा है। ऐसे चुनावी वातावरण में छत्तीसगढ़ की एक चुनावी सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा कर दी कि देश के 81 करोड़ गरीबों को दी जाने वाली मुफ्त अनाज वितरण योजना पांच वर्ष तक जारी रहेगी। प्रधानमंत्री के इस भाषण के बाद केंद्र सरकार के कई वरिष्ठ मंत्रियों ने ट्वीट करके वाहवाही लूटने की कोशिश की, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने इसे चुनावी रेवड़ी मानकार इसकी शिकायत चुनाव आयोग से करने का फैसला किया। इसके बाद आर्थिक जानकारों के बीच यह बहस छिड़ गई कि विश्व की पांचवीं आर्थिक महाशक्ति का दावा करने वाले देश में 81 करोड़ से अधिक जनसंख्या बीपीएल कार्ड धारक हैं और मुफ्त अन्न वितरण योजना का लाभ उठाने के हकदार हैं अर्थात जिस देश की आबादी 141 करोड़ हो और उसमें से 81 करोड़ (58%) लोग अपना पेट भरने के लिए मुफ्त अन्न वितरण योजना पर निर्भर करते हो तो उस देश को विश्व की पांचवीं आर्थिक महाशक्ति कैसे माना जा सकता है।

ताजा आंकड़ों के अनुसार ऐसे लाभार्थियों की संख्या बढ़कर 81.35 करोड़ हो गई है और नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट की शुरुआत वर्ष 2013 में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने की थी। इस योजना के तहत बीपीएल कार्ड धारकों को एक रुपए किलो गेहूँ और तीन रुपए किलो चावल देने की बात की गई थी। इसके तहत प्रति व्यक्ति को हर माह 5 किलो अनाज मिलता था फिर नरेंद्र मोदीजी की सरकार अंत्योदय योजना लेकर आई जिसमें 35 किलो अनाज की सीमा निर्धारित की गई, फ्री राशन योजना इस वर्ष दिसंबर में समाप्त होने वाली थी जिसे अब प्रधानमंत्री ने इसे पांच वर्ष के लिए बढ़ा दिया है। पौने दो लाख करोड़ की राहत से यह योजना शुरू की गई थी, निश्चित तौर पर यह योजना कोरोना काल में गरीब परिवारों को मुसीबत की घड़ी में बहुत कामयाब रही परंतु इस योजना के चलते अधिकांश लोगों के घर बैठने की प्रवृत्ति के कारण मजदूरों की कमी से छोटे और मझोले उद्यमों को बहुत झटका लगा है तब इस योजना की उपयोगिता पर प्रश्न खड़ा करना जायज लगता है।

प्रश्न यह है कि देश के मध्यम वर्ग के बूते पर करोड़ों लोगो को फ्री राशन मिलेगा। भोजन की गारंटी देना किसी भी जन कल्याणकारी सरकार की अहम् जिम्मेदारी है पर उसके लिए मध्यम वर्ग की जेब काटना कोई भी समझदारी नहीं है। फ्री राशन और हर चीजों पर सब्सिडी देने से करोड़ों की आबादी नकारा बन जाती है पर हमारे देश में सरकारों द्वारा वोट पाने के लिए फ्री राशन और फ्री भोजन की योजनाएं चलाई जा रही हैं जबकि होना यह चाहिए कि सबको शिक्षा और स्वास्थ के साथ-साथ रोजगार की गारंटी दी जानी चाहिए। इस बारे में मुगलकाल में उप्र की राजधानी लखनऊ स्थित इमाम बाड़ा के निर्माण की कहानी से प्रेरणा ली जानी चाहिए, इसका निर्माण 1784 में अवध के नवाब आसिफउद्दौला ने अकाल के दौरान इसलिए कराया था कि लोगों को रोजगार मिल सके, दिन में इसका निर्माण होता और रात में इसे गिरा दिया जाता, कहते हैं कि इस इमाम बाड़ा का निर्माण और अकाल, 11 साल तक चला, इमाम बाड़े के निर्माण में करीब 20000 श्रमिक शामिल थे और इसके निर्माण में उस जमाने में 8 से 10 लाख रुपए की लागत आई पर नवाब ने अकाल के समय काम दिया पर खैरात नहीं दी।

अब राजनीतिक दलों के लिए यह नुस्खा बन गया है कि मुफ्त राशन, सस्ते भोजन की घोषणाएं करो और जब किसी को मुफ्त भोजन मिलेगा तो वह काम क्यों करेगा। देश में पहले विकसित देशों की कंपनिया आकर कारखाने लगाती थीं इससे मजदूरों को बेहतर रोजगार मिलता था और उनके जीवन का स्तर ऊपर उठता था क्योंकि विकसित देशों में आबादी कम होने के कारण मजदूर बहुत महंगे मिलते थे इसलिए ये कंपनियां भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश की तरफ रुख करती थीं परंतु अब भारत में मुफ्त राशन मिलने से यहां के मजदूर कामचोरी करने लगे हैं। अब उनके लिए काम हो या न हो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उन्हें अब मुफ्त का राशन मिल ही रहा है। अब तो शहरों के छोटे कारखाने के लिए मजदूर मिलना बहुत मुश्किल हो गया है क्योंकि जो लोग कोरोना काल में शहरों को छोड़कर गांवों में पलायन कर गए थे वे फिर वापस नहीं आये।

दुर्भाग्य यह है कि मुफ्त राशन और फ्री बिजली बांटने का काम हर राजनीतिक दल कर रहा है, इस समय मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान जैसे राज्यों में विधानसभा चुनावों के दौरान सभी पार्टियों में परस्पर होड़ मची हुई है कि कि मुफ्त बिजली, मुफ्त भोजन बांटने की घोषणा में कौन किससे आगे दिख रहा है। दिल्ली में तो मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उत्तर भारतीय वोटरों को मुफ्त राशन, मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, महिलाओं के लिए मुफ्त डीटीसी बस कि ऐसी आदत डाली कि उसके बुते पर वे दो बार से लगातार एकक्षत्र राज कर रहे हैं। उनकी देखा-देखी कांग्रेस और भाजपा सहित सभी राजनीतिक दल यह सीखने की कोशिश कर रहे हैं कि मुफ्तखोरी की लालच से वोटरों को पटाया जाए। अब वोटरों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि इस सरकार के कई मंत्री भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में हैं क्योंकि जनता को फ्री की रेवड़ी खाने की आदत पड़ गई है। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि लोग गांव के कोटेदार के यहां अपनी चौपहियां गाड़ी से बीपीएल कार्ड पर मुफ्त राशन लेने जाते हैं। ये तथ्य हमारी व्यवस्था में भारी पैमाने पर हो रहे भ्रष्टाचार की ओर इशारा करते हैं और इसी कारण देशभर में गरीबों के लिए प्रारंभ की गई योजनाओं का लाभ लाखों की गाड़ियों में घूमने वाले और करोड़ों के घरों में रहने वाले लोग उठाते हैं। फिर भी गरीबों को दी जाने वाली मुफ्त राशन वितरण कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों की संख्या 81 करोड़ से अधिक हो जाना सचमुच चिंता की बात है आखिर देश में मुफ्त रेवड़ी बांटने की प्रथा कब खत्म होगी।

(लेखक भारत सरकार में उप सचिव पद पर रह चुके हैं।)

गुरुवार, 26 अक्टूबर 2023

समलैंगिकों पर न्यायालय के फैसले के निहितार्थ

अवधेश कुमार

समलैंगिकों को विवाह की कानूनी अनुमति देने संबंधी याचिका का उच्चतम न्यायालय द्वारा अस्वीकृत करना संपूर्ण समाज के लिए राहत लेकर आया है। यह लाखों वर्षों की सभ्यता संस्कृति वाले देश की प्रमाणित जीवन शैली एवं चिंतन की रक्षा करने वाली है। यह पहली दृष्टि में उस पूरी लौबी के लिए धक्का है जिसने लगातार एक गैर मुद्दे को मुद्दा बनाकर समलैंगिकों के पक्ष में माहौल बनाया तथा न्यायालय से भी अनुकूल फैसले पाए। उच्चतम न्यायालय ने सन 2018 में समलैंगिकता को अपराध मानने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को खत्म कर दिया था। इससे उस लौबी के अंदर यह भावना पैदा हुई कि लंबी लड़ाई के बाद हम ऐसे स्थान पर पहुंच गए हैं जहां से अब समलैंगिकों के विवाह को मान्यता देने के लिए भी पूरी ताकत से न केवल माहौल बनाना चाहिए बल्कि न्यायालय से भी आदेश पारित करने की कोशिश करनी चाहिए। भारत में लंबे समय से मीडिया, सोशल मीडिया से लेकर गोष्ठियों, सेमिनारों में इसके पक्ष में माहौल बनाने की का अभियान चलता रहा। अलग-अलग तरीके के ऐसे-ऐसे तथ्य और तर्क दिए गए जिनसे लगता था कि वाकई समलैंगिकता विज्ञान एवं प्रकृति की कसौटी पर सही है तथा इनके जोड़ों को शादी करके व साथ रहने की मान्यता न देना ही मानवता विरोधी व्यवहार है।  जिन लोगों ने उच्चतम न्यायालय में इस मामले पर जारी बहस तथा न्यायमूर्तियों की टिप्पणियां सुनी है , पढीं है उन्हें पता है कि इसके पीछे कितनी बड़ी लौबी लगी हुई थी। नामी वकील इस मामले को ऐसे लड़ रहे थे मानो इससे बड़ा कोई मुद्दा देश के सामने हो ही नहीं। जरा सोचिए, लाखों - करोड़ों में फीस लेने वाले इन वकीलों का भुगतान काम कहां से कर रहा था? 

इसके विपरीत देश की बहुमत आबादी ने अलग-अलग तरीकों से अपना मत प्रकट किया और ऐसा लग रहा था की आम भारतीय उच्चतम न्यायालय में इस मामले की सुनवाई को ही उचित नहीं मानता है। तो तत्काल इससे राहत मिल गई है। किंतु कोई यह न मान ले कि समलैंगिकता को विपरीत लिंगी यानी स्त्री पुरुष संबंधों के समानांतर खड़ा करने वाली लौबी शांत हो जाएगी। याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि भले अभी अनुमति नहीं मिली लेकिन उन्हें संतोष है कि उनके तर्कों तथ्यों को स्वीकार किया गया है। वास्तव में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ में यह तीन और दो का आदेश है। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति हिमा कोहली, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, न्यायमूर्ति रविंद्र भट और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा की संविधान पीठ ने इस मामले की सुनवाई की थी। यहां दोनों न्यायाधीशों की अंतिम फैसले से पूरी सहमति नहीं है। अभी इस मामले को पुनर्विचार याचिका के रूप में ले जाया जा सकता है और उच्चतम न्यायालय ने बड़ी पीठ गठित कर दी तो फिर एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी। अगर पूरे आदेश को देखें तो साफ हो जाएगा कि न्यायालय ने समलैंगिकता के विरुद्ध कोई टिप्पणी नहीं की है। केवल यह कहा है  कि समलैंगिक शादियों को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती है क्योंकि यह विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है और न्यायालय इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता।‌ न्यायालय सिर्फ कानून की व्याख्या कर उसे लागू करा सकता है। मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट या विशेष विवाह अधिनियम के प्रावधानों में बदलाव की जरूरत है या नहीं, यह तय करना संसद का काम है। सभी 21 याचिकाकर्ताओं ने संबंधित विवाह को विशेष विवाह अधिनियम के तहत निबंधित करने की अपील की थी।  न्यायालय का फैसला मुख्यत: दो आधारों पर टिका है। एक, शादी विवाह मौलिक अधिकार के तहत आता है या नहीं तथा, दो,  न्यायालय इसमें बदलाव कर सकता है या नहीं? पीठ का कहना है कि विवाह मौलिक अधिकार नहीं है तथा न्यायालय कानून में परिवर्तन नहीं कर सकता है क्योंकि कानून बनाना यह संसद का विशेषाधिकार है। 

सच यह है कि न्यायालय द्वारा पूछे जाने पर केंद्र सरकार ने जो उत्तर दिया उसमें ऐसे सारे तर्क दिए गए थे जिनसे समलैंगिक विवाहों को कानूनी मान्यता देने का कानूनी, संवैधानिक, सांस्कृतिक, सामाजिक हर स्तर पर विरोध होता था।  केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि सरकार बाध्य नहीं है कि हर निजी रिश्ते को मान्यता दे। याचिकाकर्ता चाहते हैं कि नए मकसद के साथ नई श्रेणी बना दी जाए। इसकी कभी कल्पना नहीं की गई थी। अगर ऐसा किया गया तो भारी संख्या में कानून में बदलाव लाने पड़ेंगे जो संभव नहीं होगा।

बावजूद न्यायमूर्ति रवींद्र भट्ट ने जो लिखा उसकी कुछ पंक्तियां देखिए,  सरकार को इस मसले पर कानून बनाना चाहिए, ताकि समलैंगिकों को समाजिक और कानूनी मान्यता मिल सके।‌ न्यायालय समलैंगिक जोड़ों के लिए कोई कानूनी ढांचा नहीं बना सकती है और यह विधायिका का काम है, क्योंकि इसमें कई पहलुओं पर विचार किया जाना है। सभी समलैंगिक व्यक्तियों को अपना साथी चुनने का अधिकार है, लेकिन राज्य को ऐसे समूह को मिलने वाले अधिकारों को मान्यता देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।  

न्यायालय ने केंद्र सरकार को एक ऐसी समिति बनाने का भी निर्देश दिया जो राशन कार्ड में समलैंगिक जोड़ों को परिवार के रूप में शामिल करने, समलैंगिक जोड़ों को संयुक्त बैंक खाते के लिए नामांकन करने में सक्षम बनाने और उन्हें पेंशन, ग्रेच्युटी आदि से मिलने वाले अधिकार का अध्ययन करेगी। समलैंगिकों को बच्चा गोद लेने का अधिकार दिया और केंद्र और राज्य सरकारों को समलैंगिकों के लिए उचित कदम उठाने का आदेश भी दिया। कहा  कि सरकार, समलैंगिक समुदाय के खिलाफ भेदभाव रोकने के लिए सकारात्मक कदम उठाए।‌ यही नहीं केंद्र और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि समलैंगिकों के लिए सेफ हाउस और डॉक्टर की व्यवस्था करे। साथ ही एक फ़ोन नंबर भी हो, जिसपर वो अपनी शिकायत कर सकें। यह भी सुनिश्चित करें कि उनके साथ किसी तरह का सामाजिक भेदभाव न हो, पुलिस उन्हे परेशान न करे और जबरदस्ती घर न भेजे, अगर वो घर नहीं जाना चाहते हैं तो।तो उनकी सामाजिक स्वीकृति तथा जन कल्याणकारी कार्यक्रम में समान हिस्सेदारी का आधार तो न्यायालय ने दे ही दिया है।  इस पूरे मामले में विवाह संस्था से लेकर समलैंगिकता, विपरीत लिंग आदि पर खूब बहस हुई। न्यायालय ने यह स्वीकार किया है कि विवाह की संस्था बदल गई है जो इस संस्था की विशेषता है, सती और विधवा पुनर्विवाह से लेकर अंतरधार्मिक विवाह में बदलाव हुए हैं और ऐसे कई बदलाव संसद से आए हैं।‌ इसलिए यह कोई स्थिर या अपरिवर्तनीय संस्था नहीं है।‌ न्यायालय ने यह तर्क दिया कि हम विशेष विवाह अधिनियम को सिर्फ इसलिए असंवैधानिक नहीं ठहरा सकते क्योंकि यह समलैंगिक विवाह को मान्यता नहीं देता है। 

इस तरह पूरे फैसले को देखें तो न्यायालय ने भले समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता नहीं दी लेकिन उसे अप्राकृतिक, अवैज्ञानिक या कुछ लोगों तक सीमित नहीं माना है। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने समलैंगिक संबंधों को शहरी और अभिजात्य वर्ग तक सीमित बताने के तर्कों पर कहा कि यह विचित्रता यानी क्विर्नेस शहरी या अभिजात्य वर्ग की चीज नहीं है। उनके अनुसार भारत में यह प्राचीन काल से जाना जाता है और प्राकृतिक है। विवाह की अवधारणा कोई सार्वभौमिक अवधारणा नहीं है और न ही यह स्थिर है। अगर संविधान के अनुच्छेद 245 और 246 को सातवीं अनुसूची की तीसरी सूची की पांचवी प्रविष्टि के साथ पढ़ा जाए तो क्वियर यानी एलजीबीटी की शादी को मान्यता और उस पर कानून बनाने का अधिकार संसद और राज्य विधानसभाओं के पास है। उन्होंने यह भी लिखा है कि संविधान के भाग तीन यानी मौलिक अधिकार में क्विअर लोगों सहित सभी को एक साथ रहने का संरक्षण मिला हुआ है। राज्य का दायित्व है कि वह संघ यानी साथ संबंध रखने वाले, बनाने वाले उन सभी की तरह क्विर को भी वही लाभ दे। ऐसा नहीं होने से समलैंगिक जोड़ों पर असमान प्रभाव पड़ेगा जो कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था में शादी नहीं कर सकते। इन पंक्तियों को देखने के बाद निश्चित रूप से समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता नहीं मिलने पर प्रसन्न होने वाले पूरी तरह राहत की सांस नहीं ले सकते। मुख्य न्यायाधीश की इन पंक्तियों से अन्य न्यायाधीशों ने भी सहमति जताई है। जिसकी मूल पंक्ति यही है कि अगर स्पेशल मैरिज एक्ट को खत्म कर दिया जाता है तो यह देश को आजादी से पहले के समय में ले जाएगा। अगर न्यायालय दूसरी अप्रोच अपनाता है और इसमें नई बातें जोड़ता है तो वह विधानपालिका का काम करेगा। इस तरह जो नहीं चाहते कि समलैंगिक विवाह को मान्यता दिया जाए उन्हें संगठित होकर सामाजिक, धार्मिक एवं न्यायिक स्तरों पर ज्यादा सक्रिय होना होगा। इसकी लॉबी काफी मजबूत और प्रभावी है। अवधेश कुमार, ई-30 ,गणेश नगर , पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली-110092,  मोबाइल - 9811027208

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