सोमवार, 23 अक्टूबर 2023

बाल्मीकि के राम: विविध आयाम

डा. मीना शर्मा

जिसमें मन रमे, वो राम
जन जन में बसे, वो राम
तन मन में बसे वो राम
मेरे मन में बसे हैं राम
मेरे जीवन में बसे हैं राम
मृत्यु बाद भी लें जो नाम
ऐसे आराध्य देव हैं राम।
गिलहरी से लेकर वानर तक, निर्धन की झोपड़ी से लेकर सोने की लंका तक, कण-कण तक एक ही नाम है, जय श्रीराम जय श्री राम! जीवन के साथ भी और जीवन के बाद भी । जीवनकाल में राम का नाम सत्य है तो मृत्यु की बेला में भी राम नाम सत्य है, नहीं अन्य कोई नाम, नहीं अन्य कोई देवता का नाम, सिर्फ राम नाम सत्य है।
जीवन और मृत्यृ दोनों ही आयामों में राम और राम नाम का विस्तार है। राम से ही जीवन में निस्तार है। मृत्यु की बेला के आखिरी क्षणों में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अकारण नहीं 'हे राम' का नाम लिया था। राम का नाम लेकर ही शरीर त्याग कर जीवन से मुक्ति पाई थी।
क्रौंच पक्षी वध का आत्र्त पुकार सुनकर जो वेदना प्रस्फुटित हुई थी, उसने करुणा के सागर श्रीराम के नाम के उच्चारण ने, करूणा पुकार ने बाल्मीकि से महर्षि बाल्मीकि का जन्म एक आदिकवि को जन्म दिया। रामायणकार को जन्म दिया। स्वयं बाल्मीकि के जीवन को एक नया आयाम एक नया मुकाम दिया। बाल्मीकि से महर्षि बाल्मीकि का यह रूपान्तरण अद्भुत और अविश्वसनीय है।
राम के बाल्मीकि और बाल्मीकि के राम का आयाम ससीम से असीम तक, जन्म से मरण तक, लोक से परलोक तक, मनुष्य लोक से मानवेत्तर लोक तक स्त्री से पुरुष तक, अवर्ण से सवर्ण तक, विचार से आचरण तक, भारत से लेकर पूरे विश्व तक अनंत विस्तार में फैला हुआ है। अपने-अपने राम नहीं, सबके राम हैं। बाल्मीकि के राम की प्रकृति समावेशी है, जिसमें सभी के लिए स्थान एवं स्पेस है।
राम सबके हैं और सब राम का ही है। बाल्मीकि के राम, शबरी के राम हैं, केवट के राम हैं, अहिल्या के राम हैं, गिलहरी के राम हैं, मधुकर के राम हैं, वानर के राम हैं, दीन के राम हैं, हीन के राम हैं, हर होम में राम हैं, रोम-रोम में राम हैं, आरत के राम हैं, भारत के राम हैं। भारत के चरित्र को मर्यादा पुरुषोत्त भगवान श्रीराम से अलग करके देखा ही नहीं जा सकता है। भारतीय जीवन का चरित्र भगवान श्रीराम के चरित्र से होकर गुजरता है। भारत के राष्ट्रवाद और क्छ। में श्रीराम के जीवन की मर्यादा, आदर्श एवं आचरण शामिल है। राम रसायन भी हैं। राम सेतू भी हैं। सेतू की तरह राम भी सभी को जोड़ते हैं। भारत को राम से छोड़कर नहीं, जोड़कर ही देखा और समझा जा सकता है। जहां गांव की सुबह ही राम-राम जी से शुरू होती है। जहां भोर की पहर राम नाम का पहर होता है। जहां गिनती एक से नहीं, राम से शुरू होती है। ग्रामीण भारत में किसान तौल की गिनती एक से नहीं, राम से शुरु करता है, फिर दो फिर तीन क्रमशः बोलता जाता है। तौलता जाता है।
राम पूरी भारतीयता के प्रतीक हैं। मर्यादित आचरण का आदर्श भारतीय आदर्श मॉडल है । मनसा, वाचा और कर्मणा तीनों स्तरों पर जो संरचित होता है। जो आचरण के स्तर पर घटित होता है। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मर्यादा का पालन करना सबसे बड़ी चुनौती है, चाहे अत्ता/राजगद्दी को ठोकर मारकर 14 वर्ष का कठिन वनवास को धारण करने की चुनौती ही क्यों न हो। राम अपने पिता के वचन को अस्वीकार भी कर सकते थे, पिता के खिलाफ विद्रोह कर सकते थे, किन्तु उन्होंने ऐसे कुछ भी नहीं किया। वो भी उस कुर्सी के लिए जिसके लिए महाभारत का युद्ध तक, विश्व युद्ध तक हो जाता है। मुगल शासन में पिता-पुत्र का सत्ता संग्राम सबने देखा है। सत्ता, वैभव, ऐश्वर्य का त्याग की संस्कृति को दुनिया ने यदि श्रीराम के आदर्शों से प्रभावित होकर अपने जीवन में उतार लिया होता, तो कदाचित युद्ध की संस्कृति ही संसार में नहीं होती। कोई देश किसी दूसरे देश को गुलाम बनाता। औपनिवेशिक शासन की संस्कृति, दास प्रथा आदि का दुनिया में अस्तित्व ही नहीं होता। यदि सभी प्राणियों में जीव दयावान के आधार पर एक मानवता का पाठ पढ़ लिया होता, प्रेम का पाठ पढ़ लिया होता जो प्रेम राम ने सामाजिक रूप से पिछड़ी जाति के आदिवासी शबरी के जूठे बेर खाकर प्रोमाप्लावित होकर दिखाया था। माननीय करूणा और सामाजिक समरसता का बड़ा ही मार्मिक प्रसंग है राम शबरी कथा | भारतीय जीवन में इसे यदि मानवीय मूल्य के रूप में धारण किया जाता तो देश जातिवाद का दंश का खत्मा हो जाता। जब भगवान स्वयं जातीय भेद-भाव नहीं करते थे, तो भक्त भला कैसे कर सकता है? राम के आचरण में कहीं भी वर्णगत कट्टरता और जातिगत संकीर्णता का भाव नहीं है। प्रेम और करुणा मानवीय एकता की माला को एक धागे में पिरोने का काम करता है।
प्रेम की यही सृष्टि व्यापिनी भावना का विस्तार राम के 14 वर्षों के वनवास काल में भी परिलक्षित होता है। जब सीताहरण के पश्चात् राम जंगल में / वन में पशुपक्षी सभी से आत्मीय रूप से हृदयस्थ एकता स्थापित करते हुए पूछते हैं:-
हे खग हे मधुकर श्रेणी
तुम देखी सीता मृगनयनी।
आत्म का विस्तार ही भाव का विस्तार, व्यक्तित्व का विस्तार करती है। इसके अभाव में समस्त ज्ञान धरे के धरे रह जाते हैं। बड़ा बड़ा ज्ञानी भी रावण बन सकता है, अहंकार ग्रस्त हो सकता है और सत्ता के मद में, ऐश्वर्य के नशे में किसी स्त्री का भी हरण कर पशुता मर्यादाओं को तार-तार कर सकता है और मर्यादाविहीन समाज बर्बरता और के स्तर पर भी गिर सकता है और जिसका अंत रावण वध के रूप में रावण और तामसिक प्रवृत्ति के खात्मे के लिए युद्ध के रूप में होता है। राम-रावण युद्ध दो व्यक्तियों की लड़ाई न होकर दो अलग रूचि, दो अलग-अलग दृष्टि, विषम संस्कृति, मानसिकता की प्रतीकात्मक लड़ाई है।
समाज में मर्यादा स्थापित करने के लिए और मर्यादाओं के स्खलन पर मर्यादा पुरुषोत्तम राम को भी शस्त्र धारण करना पड़ता है जो अधर्म पर धर्म की जीत है बुराई पर अच्छाई की जीत है। अर्थात् आचरण की मर्यादा ही धर्म है, अच्छाई है। शक्ति को शील से जोड़कर ही समाज में सौन्दर्य स्थापित किया जा सकता है। शक्ति निर्बल की रक्षा और दुर्जनों को दंड देने के लिए होती है। जो समाज की मर्यादा को भंग करते हैं।
रामायण में केवट का प्रसंग भी सामाजिक समरसता की मर्यादा को स्थापित करने के संदेश का मानवीय दृष्टान्त है। मानवीय करूणा और प्रेम की भावना से परिचालित होकर राम सामाजिक रूप से पिछड़े पाद प्रक्षालन करते हैं, उसे गले से लगाते हैं। आत्मप्रसार श्रेष्ठ मानवीय भावभूमि पर इस मिलन में जातिगत कहरता एवं वर्णगत संकीर्णता का समस्त मानवीय दीवारों को गिरा देता है। रामायण का यह करूणा मानवीय प्रसंग समावेशी मर्यादित समरसता का एक आदर्श भारतीय सामाजिक माडल है। भक्ति में ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं होता है, बड़ा छोटा का कोई अंतर नहीं होता है। जिसके अपने सामाजिक निहितार्थ है । समस्त मानवीयता और भारतीयता के प्रतीक श्रीराम के नाम को, जीवन को, आदर्श के मर्यादा को न अपनाना एक बहुत बड़ा पाखंड है। वैसे मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम का नाम लेने से कोई कैसे साम्प्रदायिक हो सकता है। और नाम न लेने से धर्मनिरपेक्ष कैसे हो सकता है? यह विवेक की कसौटी से प्रतिकूल कार्य होगा। और यही कोई छटा सेक्यूलरिज्म के नाम पर बड़े-बड़े प्रगतिशील लेखकों और इतिहासकारों ने किया है। जिनके मरने पर भी उनके परिवार वाले वहीं श्रीराम का नाम लेकर अंतिम संस्कार के समय 'राम नाम सत्य है' के स्वर ध्वनियों के साथ मोक्ष द्वार तक ले जाते हैं।
राम को सिर्फ जाति या धर्म (हिन्दू) से जोड़कर देखना भी संकीर्णता का परिचायक है, जो संकीर्णता राम के जीवन और रामायण में कहीं नहीं दिखाई पड़ती है। यह अत्यन्त विरोधाभासी और पूर्वाग्रह से प्रेरित है। बाल्मीकि के राम दलित विरोधी कैसे हो सकते हैं? बाल्मीकि को मानना और राम को न मानना स्वयं महर्षि बाल्मीकि का अपमान है और उनके संपूर्ण सृजनकार्य, ज्ञान का तिरस्कार एवं अनादर होगा। बाल्मीकि के राम सभी के राम हैं बाल्मीकि से लेकर शबरी के राम, केवट के राम, जन-जन के राम हैं, कण-कण के राम हैं। राम-राम में राम हैं, हर होम के राम हैं।
तथापि धर्म और जाति का चश्मा लगाकर देखने वाले कुछ राह भटके लोग श्रीराम को जाति विशेष और धर्म विशेष से जोड़कर सीमित एवं संकुचित दृष्टिकोण से देखकर मर्यादा पुरुषोत्तम के प्रति अमर्यादा का प्रदर्शन राजनीतिक निहितार्थों के कारण करते हैं। अभी राममंदिर निर्माण के दौरान कुछ ऐसे ही विद्वान श्रीराम को सवर्णों के भगवान के रूप में स्थापित करते नजर आए। राम को रामायण से एवं रामायण को राम से अलग और रामायण को बाल्मीकि से अलग नहीं किया जा सकता है। यह भगवान श्रीराम और महर्षि बाल्मीकि दोनों का ही अपमान अनादर है। उनके अस्तित्व और उपलब्धि के आगे प्रश्न चिन्ह लगाना एवं मर्यादा का अतिक्रमण कर पाप की श्रेणी तक ले जाने वाला कुकृत्य है। ऐसे परम ज्ञानी बाल्मीकि का अपमान कर स्वयं को किस मुंह से बुद्धिजीवी एवं सेक्युलर कहते हैं, यदि मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम का नाम लेने में शर्म आती है। जबकि रामायण में रमा भी उदाहरण सामाजिक न्याय और दलित पिछड़ों के विरोधी के रूप में दूर-दूर तक नहीं दिखाई पड़ता है। इसके विपरीत सामाजिक समरसता, मानवीय करूणा, विशुद्ध प्रेम से एक आदर्श एक सामाजिक मानवीय माइल का आदर्श दिखलाई पड़ता है।आदि सामाजिक रूप से पिछड़ी जातियों का मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम से अलग करे नहीं देखा जा सकता है। जब राम स्वयं अलग नहीं हुए तो ये छ सेक्यूलर बुद्धिजीवी राजनीतिक पूर्वाग्रहों के कारण कैसे अलग कर सकेत हैं?
राम के प्रेम को शबरी और केवट से अलग किया जा सकता है और न बाल्मीकि को रामायण से एवं राम को बाल्मीकि से और बाल्मीकि को समाज से अलग किया जा सकता है। ये सभी एक ही प्रेम के धागे से एक माला के रूप में एक साथ गूंथे हुए हैं। धागा तोड़ते ही माला के साथ-साथ मर्यादाएं बिखड़ जाएंगी। ये नव्य छुआछूत होगा जो भक्त और भगवान के बीच जाति एवं धर्म की ऊंची दीवार खड़ी करने की साजिश पर आधारित होगी, जहां राजनीतिक पूर्वाग्रह मानवीय सरोकार को अपदस्त करने की ओछी राजनीति करते हुए दिखाई पड़ती है।
बाल्मीकि के रमा के मानवीय प्रेम एवं करूणा के रास्ते में न तो कोई छुआछूत है और ना ही जातिवाद है, फिर भी जातिवाद से स्पाम करना हास्यास्पद है। बौद्धिकता और बाल्मीकि दोनों का उपहास है। बाल्मीकि के रामायण में न ही आभिजात्य और सामान्य लोक के बीच का ही कोई अंतर या दीवार है, बल्कि उस दीवार को गिराकर ईश्वर को सामान्य लोक के बीच प्रतिष्ठित लौकिक प्रेम और मानवीय करुणा के साथ चित्रित किया गया है । बाल्मीकि के राम और शबरी के राम शबरी के जूठे बेर भी प्रेम भाव से खाते हैं और शबरी भी प्रेम भावना से ओत-प्रोत होकर बेच चखती है कि कहीं राम का कोई खट्टा बेर न मिल जाए और स्वाद न खराब हो जाए। बेर के आस्वाद से बड़ी बात प्रेमासवादन की है। यदि राम और शबरी के परस्पर इस प्रेम भावना को ठीक पढ़ लिया जाय, आत्मसात कर लिया जाय तो भारत में करुणा, प्रेम, मानवीयता, सामाजिक मर्यादा, मानवीय नैतिकता के प्रेम की धाप ऐसी प्रवाहित हो जाय जिसमें भारत से तमाम छुआछूतसामाजिक भेदभाव, संकीर्णता आदि सब कुछ बह कर निकल जायेगी बचेगा तो सिर्फ विशुद्ध मानवीय प्रेम और करुणा जो सभी को जोड़ती है, तोड़ती नहीं। राम ने तो इसे शबरी की आंखों में, केवट की आंखों में पढ़ लिया था, अब आवश्यकता है कि तथाकथित हृदय बुद्धिजीवियों और सेक्युलर जमात को पढ़ने की। जिन्होंने श्रीराम के प्रेम का पढ़ा ही नहीं, यदि ऐसा वे करते तो राम को लोक से और लोक को राम से जोड़ते, तोड़ते नहीं और धर्म जोड़ता है, तोड़ता नहीं। यही धर्म का मूल स्थिति है मूल आदर्श है। और धर्म की इस मूल भावना की मर्यादा बनी रहे, अक्षुण्ण रहे।
डा. मीना शर्मा

गुरुवार, 19 अक्टूबर 2023

शास्त्रीय नृत्य सांस्कृतिक धरोहर: डॉ. संदीप कुमार शर्मा

पुस्तक समीक्षा

इस बार डायमंड बुक्स आपके समक्ष लेकर आया है डॉ. संदीप शर्मा की पुस्तक "शास्त्रीय नृत्य सांस्कृतिक धरोहर "। अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हमारे देश में नृत्य कला का शुभारंभ दक्षिण भारत से हुआ है। जबकि सभ्यता का विकास हिमालय से हुआ। देवभूमि हिमालय को माना जाता है। दक्षिण भारत में महर्षि अगस्त्य के आगमन के उपरांत ही वहां आर्य सभ्यता का विकास हुआ। सभ्य समाज का गठन हुआ। शिक्षा का विस्तार हुआ। जोवन शैली बदली। विचार बदले और बदल गई दक्षिण भारत की दुनिया ।। दक्षिण भारत में तमिलनाडु ने भरतनाट्यम और केरल राज्य ने कथकली एवं मोहिनीअट्टम शास्त्रीय नृत्य को विकसित किया। इसके अतिरिक्त आंध्र प्रदेश में कुचिपुड़ी नृत्य, ओडिशा में ओडिसी नृत्य, मणिपुर में मणिपुरी नृत्य, असम में सत्रिया यो सतिया नृत्य एवं सत्रिया नृत्य और उत्तर प्रदेश में कत्थक नृत्य विभिन्न काल खंडों में विकसित हुआ। यही कारण है कि आज हमें दो प्रकार के नृत्य देखने को मिलते हैं- लोकनृत्य और शास्त्रीय नृत्य दोनों ही नृत्य विधाओं में गीत, संगीत और वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता है। नृतः केवल नृत्य है। जिस में शारीरिक मुद्राओं का फलात्मिक प्रदर्शन है किन्तु उन में किसी भाव का होना आवश्यक नहीं यहाँ आज कल का ऐरोबिक नृत्य है। नृत्य में भाव दर्शन की प्रधानता है। जिस में नृत्य का प्रदर्शन करने वाले मुख, पद, हस्त मुद्राओं का प्रयोग कर भिन्न-भिन्न भाव-भंगिमाओं का प्रदर्शन करता है। नाट्य में वार्तालाप तथा संवाद को भी शामिल किया जाता है। सृष्टि के कल्याण और व्यवस्थित संचालन के लिए परमपिता परमेश्वर द्वारा सृष्टि के प्रारंभ से ही दिए गए ज्ञान के भंडार को वेद कहा जाता है।

नृत्य धरोहर को भी माना जाना चाहिए। निश्चित रूप से शास्त्रीय नृत्य कालांतर में विकसित हुआ लेकिन उससे पहले। लोकनृत्य परिपक्व अवस्था में मिलता है। मैंने पहले लिखा है कि धरोहर केवल पुरातात्विक इमारतों, प्राचीन साहित्य और अन्य कलाकृतियां ही नहीं होतीं अपितु कुछ धरोहर सदैव गतिशील होती हैं। इसके अन्य उदाहरण भी है किन्तु हम विषय विस्तार में न जाते हुए केवल नृत्य कला की बात करेंगे।

आशा करते हैं कि पाठकों को यह पुस्तक शास्त्रीय नृत्य के दृष्टिकोण से बौद्धिक समृद्धि देगी।

अनुभव और भावनाएँ प्रो. पुष्पिता दुकान -

डायमंड बुक्स इस बार सुप्रसिद्ध प्रवासी लेखिका पुष्पिता अवस्थी की पुस्तक 'अनुभव और अनुभूतियाँ आपके समक्ष लाया है। 'अनुभव और अनुभूतियों' के इस विशेष संचयन में विश्व के सर्वोच्च शांति गुम्बद, अहिंसा, आध्यात्मिकता और वैज्ञानिकता के अंतरसम्बन्धों को लेकर वैचारिक आलेख है तो दूसरी और पुस्तक के ऑतम आलेखों में क्रम से श्रीराम और सीता के वैश्विक महत्त्व को उकरते हुए अंतर्दृष्टि सम्पन्न विशिष्ट आलेख है। इसके साथ ही पाठकों की पुस्तक में विन्यस्त मेरी दृष्टि की सिद्धि का अभिप्राय तब और अधिक सिद्ध हो सकेगा जब वे अन्तिका से प्रकाशित छिन्नमूल उपन्यास (2016) और किताब पर से प्रकाशित 2015 "भारतवंशी भाषा एवम् संस्कृति" अनुसन्धान मूलक पुस्तकें पढ़ेंगे। अहिंसा, श्रीराम और गीता पर केन्द्रित आलेखों को मैंने विश्व के भारतवंशियों की इन शक्तियों के प्रति प्रेम के कारण ही इस पुस्तक में संजोया है। जिससे वे सम्मान और तृप्ति की अनुभूति कर सके श्रीराम और गीता संस्कृति की शक्ति की वजह से हो वे भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों को बचाने में समर्थ हुए हैं। वस्तुतः भारतीयता के मूल सांस्कृतिक बीज मन्त्रों से ही विश्व के भारवंशियों ने अपने चित्त और चेतना में मनुष्यता का जादुई पर्यावरण रथा रखा है जिसको शक्ति को मैं 23 वर्षों से अपनी रूह में अनुभव कर रही हूँ। जिसके परिणाम रचित आलेख हैं। आशा करते हैं यह पुस्तक पाठकों के मन को भाएंगी।

जातीय जनगणना की राजनीति कितनी कारगर

बसंत कुमार

आज देश मे चुनाव नजदीक आते ही जातीय जनगणना की चर्चा बहुत जोरों पर चल रही है हर राजनीतिक दल अपनी सहुलियत् के हिसाब से जातीय जनगणना के पक्ष विपक्ष मे तर्क दे रहा है आइये इस विषय मे संविधान निर्माता डा आंबेडकर के क्या विचार थे। डा आंबेडकर ने 26 अक्टूबर 1947 को इस विषय में इस प्रकार अपनी राय व्यक्त की, "भारत की जनगणना कई दशकों से जनसांख्यिकी में एक आपरेशन बन कर रह गई है। यह एक राजनीतिक मामला बन गया है ऐसा प्रतीत होता है कि प्रत्येक समुदाय अधिक से अधिक राजनीतिक शक्ति अपने हाथ मे लेने के लिए किसी अन्य समुदाय की कीमत पर कृतिम रूप से अपनी संख्या अधिक होने का प्रयास कर रहा है। ऐसा लगता है अन्य समुदायों की अधिक लालच की संतुष्टि के लिए अनुसूचित जातियों को एक आम शिकार बनाया गया है जो अपने प्रचार को गणनाकारों के माध्यम से जनगणना के संचालन और परिणामों को नियंत्रित करने मे सक्षम है।" इस समय चारो ओर से मांग उठ रही है कि इस बार की जनगणना जाति बार पर आधारित हो! देश मे जातीय ज नगड़ना1931 मे हुई थी। उसके बाद सरकारो ने जातीय जनगणना को नजर अंदाज किया और विभिन्न समुदायों की सटीक जनसंख्या जाने बिना विभिन्न समुदायों के कल्याण के लिए नीतियां बनाती जा रही है जो गलत है।

पहली जाति जनगणना 1871 में ब्रिटिश शासन के दौरान की गई थी जिसके परिणाम 1972 मे घोषित हुए और इस कब्जे वाले या नियंत्रित सभी क्षेत्रों को शामिल किया गया था, उस समय से 1931 तक ब्रिटिश सरकार द्वारा जाति जनगणना नियमित तौर पर की जाती रही और हर कोई जनता था कि समाज में विभिन्न जातियों का प्रतिशत क्या है। सन् 1941 मे जनगणना तो हुई पर दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो जाने के कारण जनगणना के आकड़े जारी नही हो पाए।

देश आजाद होने के पश्चात स्वतंत्र भारत की पहली जनगणना 1951 मे होनी थी लेकिन नेताओ ने तर्क दिया कि भारत अब स्वतंत्र हो गया है और आधुनिक दुनिया और लोकतंत्र की ओर बढ़ रहा है इसलिए जाति जनगणना की कोई अवश्यकता नही है और जनगणना अधिनियम 1948 लागू हुआ और स्वतंत्रता के बाद की जनगणनाएं इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार लागू की गयी और कहा गया की भारत मे अब जातिया अप्रासंगिक हो जायेगी और विभाजन पैदा करने वाली जनगड़ना 1951 मे नही की जायेगी बस एससी/एसटी जनगणना जारी रहेगी क्योंकि उनको आरक्षण देने के प्रावधान थे। देश की राजनीति की यह सबसे बड़ी भूल थी क्योकि देश मे आज भी आदमी की पहचान जाति से होती है और हर भारतीय के गुण या प्रतिभा का मूल्यांकन इस बात पर निर्भर करता है की वह किस जाति मे पैदा हुआ है।

देश में ओबीसी जातियों का कोई आंकड़ा उपलब्ध न होने के कारण और उनके प्रतिनिधित्व की मांग दिन ब दिन बढ़ने के कारण 1979 मे सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग की पहचान करने के लिए मण्डल आयोग की स्थापना की गई। मण्डल आयोग ने ओबीसी की जनसंख्या का प्रतिशत जानने के लिए 1931 के आंकड़ो और कुछ नमूना सर्वेक्षणों का प्रयोग किया और मण्डल आयोग ने सिफारिश की कि ओबीसी के बेहतर विकाश के लिए जाति जनगणना जल्द से जल्द करायी जाए इसके पीछे यह तर्क था कि संशधनो पर सबसे अधिक सवर्णो का कब्जा है और जाति के असली आंकड़े सार्वजनिक नहीं किये जाते, वर्ष 1991 मे मण्डल आयोग की सिफारिशे लागू की गयी और निर्णय लिया गया कि, 2001 की जनगणना के साथ जातीय जनगणना कराई जाए, क्योंकि जाति जनगणना से यह पता लग जायेगा कि कौन-सा जाति समूह किसका हिस्सा खा रहा है जैसा कि डाॅ. आंबेडकर ने कहा था कि पिछड़ी व वंचित जातिया भ्रामक जनसंख्या का शिकार हो रही है इसलिए देश मे निष्पक्ष जातीय जनगणना कराई जानी चाहिए। उन्होंने संविधान सभा मे कहा था की 26 जनवरी 1950 को हम अंतर्विरोध से भरे एक जीवन में प्रवेश करने जा रहे है राजनीति मे हमारे पास समानता होगी जबकि सामाजिक और आर्थिक जीवन असमानता से भरा होगा राज नीति मे हम एक मनुष्य एक वोट के सिद्धांत पर चल रहे है पर अपने सामाजिक और राजनीतिक सोच के चलते जीवन मे एक मनुष्य- एक मूल्य के सिद्धांत का अनुसरण नहीं कर पाएंगे। आजाद भारत मे सरकार ने काका कालेलकर कमेटी और मण्डल आयोग का गठन किया पर इसकी रिपोर्ट आने के बाद कांग्रेस दशकों तक इस पर बैठी रही और इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया पर, 1990 में वीपी सिंह ने इसे लागू कर ओबीसी के 27% आरक्षण का मार्ग प्रसस्थ किया, यह बाबा साहब का ही करिश्मा था कि कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दल 'जितनी जितनी है आबादी उतनी उसकी हिस्सेदारी' का नारा लगाकर जातिगत जनगणना का समर्थन कर रहे है।
कुछ विश्लेषकों का तर्क है कि जातिगत
जनगणना से जातिवाद को बढ़ावा मिलेगा दूसरी ओर डाॅ. आंबेडकर का कहना था कि जाति अव्यवस्थित है और इससे हिंदू समाज हतोत्साहित होता है और उन्होंने पिछड़ों और वंचितो को जनसंख्या के अनुरूप हिस्सा मिले सदैव इसका समर्थन किया। जब समाज में व्यक्ति अपनी जाति से जाना जाता है तो देश मे किस जाति की कितनी आबादी है यह जानने में हर्ज ही क्या है या तो हम एक जाति विहीन समाज की स्थापना करे या पारदर्शी तरीके से जाति पर आधारित जनगणना होने दे क्योकि ढुलमुल तरीका अपनाने से सामाजिक ताना बाना  नष्ट हो जायेगा।
आज लोकसभा या विधानसभा चुनावों में टिकट देते समय हर राजनीतिक दल टिकट मांगने वालों से उसकी जाति और अपने निर्वाचन क्षेत्र मे प्रत्येक जाति की जनसंख्या पूछती है और हर टिकट मांगने वाला अपने पक्ष के हिसाब से फर्जी आंकड़े पेश करता है जबकि सबको पता है देश में 1931 के बाद कोई जाति की
जनगणना हुई ही नहीं, ऐसे मे बेहतर है कि जाति की जनगणना करा कर इस फर्जी वाड़े से बचा जाए, जब हर पार्टी चुनाव जीतने के लिए जाति जाति खेल रही है तो जाति की जनगड़ना का विरोध का ढोंग क्याें। देश एवं सरकार को फैसला करना होगा कि एक जाति विहीन समाज की स्थापना की जाये या फिर जाति की जनगणना करा कर जिसकी जितनी हो आवादी उसकी उतनी हिस्सेदारी के आधार पर संसाधनों का वितरण करे, वैसे डा अम्बेडकर जाति प्रथा को हिंदू धर्म का सबसे बड़ा अभिशाप माना था और उसे दूर करने के लिए जीवन पर्यंत प्रयास करते रहे!
(लेखक राष्ट्रवादी विचारधारा के लेखक है और भारत सरकार के पूर्व उप सचिव हैं।)

बुधवार, 18 अक्टूबर 2023

हमास की पराजय से ही विश्व होगा सुरक्षित

अवधेश कुमार

हाल के वर्षों में इस तरह का युद्ध नहीं देखा गया और न ऐसी बर्बरता सामने आई। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक 500 के आसपास बच्चे और 300 के लगभग महिलाएं हमास इजरायल युद्ध में मारे जा चुके हैं। हमास ने बर्बरता की सीमा को किस तरह पार किया इसके कई उदाहरण सामने आ गए हैं। एक इजरायली यहूदी गर्भवती महिला का पेट काट कर पहले उसके बच्चे को निकाला गया फिर उसे मारा गया तथा बाद में उस औरत को भी। सभ्य सैनिकों का समूह इस तरह की बर्बरता नहीं कर सकता। संपूर्ण विश्व आहत है। इजरायल और गाजा पट्टी की सीमा पर आयोजित संगीत महोत्सव में जुटे लोगों पर आतंकवादियों ने हमला किया, इस्लामी नारे लगाए ,महिलाओं को नग्न कर सड़कों पर घुमाया, दुष्कर्म किया, छोटे-छोटे बच्चों के सिर में गोलियां मारी गई, उसके बाद उनके प्रति किसी की भी सहानुभूति नहीं हो सकती। छोटी-छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार, उनकी हत्या और मृत्यु के बाद भी बलात्कार के वीडियो आए हैं। एक कमरे में 15 लड़कियों को बंद कर उसे उड़ा दिया गया। बर्बरता की ऐसी अनेक कहानियां अभी तक इस युद्ध ने हमारे सामने लाईं हैं जिनकी कल्पना से ही दिल दहल जाता है। आगे युद्ध समाप्त होने के बाद या उसके बीच भी ऐसी अनेक घटनाएं सामने आएंगी जो हमको आपको अंदर से पूरी तरह हिला कर रख देगा। आश्चर्य की बात है कि कुछ देशों द्वारा और यहां तक कि भारत के अंदर भी हमास के प्रति सार्वजनिक सहानुभूति तथा इजराइल का विरोध किया जा रहा है। 

वास्तव में कुछ देशों और समूहों की ओर से इसे संपूर्ण इस्लाम की लड़ाई बनाने की कोशिश हो रही है। आखिर सीरिया और लेबनान की ओर से भी हमास के समर्थन में इजरायल पर हमले किए गए। ईरान भी हमास का समर्थन करता है तथा जो सूचना है ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी स्वयं अरब देशों के नेताओं से बातचीत कर रहे हैं। हालांकि दो प्रमुख देश संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब हमास के साथ नहीं है। हमास ने इसके विरुद्ध भी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उसने कहा है कि जो मुस्लिम देश इजरायल के साथ संबंध बढ़ा रहे हैं उनके लिए भी हमारा हमला एक संदेश है। इजरायल ने अपने पूर्व चरित्र के अनुभव हमास और उसके समर्थकों के विरुद्ध शत- प्रतिशत दृढ़ संकल्प प्रदर्शित किया है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहु ने कहा कि अब सारे हमास के आतंकवादी मृतक हैं। जिस तरह इस्लामिक स्टेट आईएस को कुचल दिया गया उसी तरह से हम इसको भी कुचल देंगे। जिस तरह का सघन हमला गाजा पट्टी पर हुआ है , वहां की पूरी आपूर्ति श्रृंखला काट दी गई है वैसे ही रहा तो इजरायल की सफलता निश्चित है। हालांकि दुनिया भर से छाती पीटने वाले गाजा पट्टी की घेरेबंदी के विरुद्ध आवाज उठा रहे हैं पर इजरायल ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक बंधक रिहा नहीं किए जाते न बिजली का एक स्विच ऑन किया जाएगा, न पानी का नल खोला जाएगा, न ही ईंधन का एक ट्रक गाजा में दाखिल होगा। उम्मीद करनी चाहिए कि इजरायल अपने संकल्प पर अडिग रहेगा। हमास के आतंकवादी मारे जाएं या आत्मसमर्पण करें यही दो विकल्प उनके सामने होना चाहिए।


हमास ने 7 अक्टूबर को जिस तरह 5000 से ज्यादा रॉकेट इजरायल पर दागे उसकी कल्पना किसी को नहीं थी। इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद तथा उसकी सुरक्षा व्यवस्था खासकर सीमाओं पर आयरन डोम एअर डिफेंस सिस्टम का विश्व लोहा मानता था। इतने बड़े हमले की पूर्व सूचना न मिलना निश्चित रूप से इजरायल के लिए शर्मसार होने का विषय है। इजरायली सेना के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल हर्जी हलेवी ने इसे स्वीकार किया और कहा कि इजरायली डिफेंस फोर्स यानी आईडीएफ देश और इसके नागरिकों की रक्षा के लिए जिम्मेवार है और शनिवार सुबह गाजा के आसपास के क्षेत्र में हम इस पर खरे नहीं उतरे। हम इससे सीखेंगे, जांच करेंगे लेकिन अभी युद्ध का समय है। वास्तव में संपूर्ण इजरायल एक साथ खड़ा हो गया है। युद्ध के साथ वहां नेशनल यूनिटी सरकार गठित हो गई जिसमें सत्तारूढ़ और विपक्ष सभी शामिल हैं। इजरायल में बेंजामिन नेतान्याहू के विरोधियों की बड़ी संख्या है और इस कारण हम वहां लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता देख रहे हैं।  लेकिन हमास को खत्म करने को लेकर संपूर्ण एकता कायम हो चुकी है। अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन का वहां पहुंचकर समर्थन दोहराना बताता है कि इजरायल को अमेरिका सहित अनेक पश्चिमी देशों का हर तरह का समर्थन, सहयोग और मदद हासिल है। ब्लिंकन ने कहा कि हम जानते हैं कि आपके पास अपनी रक्षा की पूरी क्षमता है लेकिन हमारे रहने तक आपको इसकी आवश्यकता नहीं पड़ेगी। उसके बाद अमेरिकी रक्षा मंत्री वहां पहुंचे और राष्ट्रपति जो बिडेन भी जाने वाले हैं।

  हमारा विश्व इस समय कई दृष्टियों से खतरनाक स्थिति में है। हमास जैसे आतंकवादी संगठनों के पक्ष में अगर देश व समूह खड़े हैं तो कल्पना किया जा सकता है कि एक बड़े वर्ग की सोच कैसी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमले के बाद इसे आतंकवादी घटना करार देते हुए इजरायल का समर्थन व्यक्त किया जो हमारे देश के अंदर ही बहुत लोगों के गले नहीं उतरा जबकि हम स्वयं आतंकवाद का दंश लंबे समय से झेल रहे हैं। विरोधी यह भूल गए कि हमास फिलीस्तीन मुक्ति संगठन का भी विरोध करता है तथा राष्ट्रपति अब्बासी तक को अवैध करार दे चुका है। भारत की फिलिस्तीन मामले पर न नीति बदली है न बदलेगी। भारत की ओर से स्पष्ट कर दिया गया है कि हम हमेशा से बातचीत के माध्यम से सुरक्षित और वैध सीमाओं के भीतर एक संप्रभु, स्वतंत्र और व्यावहारिक फिलिस्तीन राज्य की स्थापना का समर्थन करते हैं। नरेंद्र मोदी भारत के पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने इजरायल और फिलिस्तीन दोनों की यात्रा की। इसलिए किसी को गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि युद्ध में इजरायल के समर्थन देने का अर्थ फिलिस्तीन राज्य का विरोध है। आतंकवादी संगठन मजहबी सोच और हिंसा के बल पर राज्य पर कब्जा करें, दूसरे राज्य को मजहबी आधार पर भयभीत कर उसे नष्ट करने की कसमें खायें तो उसका समर्थन नहीं किया जा सकता। हमास के प्रवक्ता ने बार-बार कहा है कि उसका लक्ष्य यहूदियों और यहूदी राज्य का नाश है। हमास ने तो एक बार धरती से यहूदियों और ईसाइयों दोनों के खत्म करने तक की बात कर दी। 

 1967 के युद्ध के समय भी इजरायली एजेंसियों को अरब देशों के चारों ओर से किए हमले की जानकारी नहीं मिल सकी थी।  उसने सामना किया और सफलता पाई। कुछ अरब देशों के अंदर इसकी टीस आज तक बनी हुई है। आश्चर्य की बात है कि इस क्षेत्र में इजरायल के सारे मित्र देशों की खुफियां एजेंसियां भी सक्रिय रहती हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन ने कहा है कि हिटलर के समय यहूदियों के नरसंहार के बाद यह उस तरह की दूसरी घटना है। यह सच भी है , क्योंकि इतनी संख्या में यहूदी उसके बाद कभी इस तरह नहीं मारे गए। किंतु इस मामले में जो बिडेन की नीति प्रश्नों के घेरे में है। ऐसा लगता है कि लेबनान, सीरिया, फिलिस्तीन,  कतर और ईरान में इस हमले की योजना बनी और वहीं से इन्हें समर्थन भी मिला। अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी ने आरोप लगाया है कि हमास ने इस हमले में उस छह अरब डॉलर की राशि का उपयोग किया है जिसे जो बिडेन प्रशासन द्वारा ईरान पर प्रतिबंधों में ढील दिए जाने के कारण जारी किया गया। अमेरिका की नीति समझ में नहीं आई जब उसने ईरान पर प्रतिबंधों में तब ढील दी जब वह यूक्रेन युद्ध में रूस को ड्रोन दे रहा है। हमास के ज्यादातर नेता कतर में रह रहे हैं जो उस क्षेत्र में अमेरिका का दोस्त है। कतार में अमेरिका का पश्चिम एशिया का सबसे बड़ा सैन्य अड्डा है। तो अमेरिकी नीति पर निश्चित रूप से प्रश्न उठेगा किंतु उनके सामने इजरायल को बचाने के अलावा कोई चारा नहीं है। इस घटना ने साफ कर दिया है कि आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध से पीछे लौटकर अमेरिका ने संपूर्ण विश्व को खतरे में डाल दिया। इससे विश्व भर के आतंकवादी संगठनों का हौसला बढ़ा और हमास के हमले पर जगह-जगह उत्सव मनाते देखे जा रहे हैं। युद्ध में इजरायल की विजय संपूर्ण विश्व की सुरक्षा और शांति के लिए अपरिहार्य है। इससे इस्लामी कट्टरपंथ और आतंकवाद कमजोर होगा।  केवल भारत, इजरायल और पश्चिमी देशों के लिए ही नहीं, कई अरब देशों के लिए भी जरूरी है। मिस्र, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश हैं जहां इजरायल के सफल न होने पर इस्लामी कट्टरपंथी बड़े खतरे बन जाएंगे। इसलिए भारत ने बिना लाग लपेट समर्थन व्यक्त कर विश्व शांति और सुरक्षा की दृष्टि से सही फैसला किया।

शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2023

आज की कलुसित राजनीतिक दौर में प. दीनदयाल उपाध्याय के मानव दर्शन के सार्थकता

 

बसंत कुमार

आज के राजनीतिक वातावरण में देश और विदेश में हर जगह जाति और धर्म की राजनीति ने पूरे विश्व को अशांत कर रखा है। पूरा विश्व देख रहा है इजरायल, कनाडा में धर्म के नाम पर मार-काट हो रही है। वहीं भारत में देवरिया समेत अन्य जगहों पर जातीय झगड़ों में लोग मारे जा रहे हैं। ऐसे में जनसंघ के संस्थापक सदस्य और जनसंघ के अध्यक्ष पं. दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद की प्रासंगिकता बढ़ जाती है, जिसका केंद्र बिंदु मानव कल्याण है।

90 के दशक में सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् विश्व राजनीति में साम्यवादी समूह का लगभग अंत हो गया और पूरा विश्व आर्थिक उदारवाद और वैश्विकरण की ओर चल पड़ा। वैश्वीकरण और आर्थिक उदारवाद के इस युग में विश्व आर्थिक विकास एवं पूंजी निर्माण को साध्य मानते हुए विकास की धारणा के इर्द-गिर्द घूम रहा है और हम स्वदेशी विचार धारा से भटकते हुए नजर आ रहे है। हम स्वावलंबन के त्याग और आत्म पूर्ति में लगे हुए है जबकि बहुत पहले आरएसएस के पूर्व सरसंघचालक पूज्य गुरु गोलवलकर ने स्वावलंबन और आत्म पूर्ति के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा था "हमें स्वयं के संसाधनों पर निर्भर रहना चाहिए। अगर किसी वस्तु की कमी है तो हमें अपने निर्यात से कमाई हुई मुद्रा से आयात करें। कहने का तात्पर्य यह है कि हमें अपने संसाधनों पर निर्भर रहना चाहिए और आत्म पूर्ति के सिद्धांत पर देश में पर्याप्त उत्पादन हो, हमें किसी प्रकार की कमी न हो। आज हम पाते हैं कि भारत आत्म निर्भरता से हटकर आयात पर निर्भर हो गया है, किसान आत्महत्या कर रहे हैं। कृषि भूमि रसायन और विदेशी बीजों के प्रयोग से बंजर तथा कम उत्पादक हो गई है"। पूज्य गुरुजी ने 1970 में स्वदेशी के अंतर्गत दो अवधारणाओं-आत्म निर्भरता व विकेंद्रीकरण को भारतीय परिस्थिति के लिए उपयुक्त माना। उनके अनुसार देश की आर्थिक नीति हमारे राष्ट्र को प्राचीन व सनातन व अध्यात्मिक मूल्यों के साथ संगत होनी चाहिए। गुरु जी के उस समय के विचार आज भी प्रासंगिक है।

प्राचीन भारत में अर्थव्यवस्था पूर्णतः ग्रामीण उद्योगों और कृषि पर आधारित थी पर देश में गुलामवंश की स्थापना के के पश्चत् विभिन्न सल्तनत के शासन काल में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का क्षरण होने लगा। बाद में मुगल काल, ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश इंडिया काल में ग्रामीण अर्थव्यवस्था जिसका मुख्य आधार स्वावलंबन थी, पूरी तरह समाप्त हो गई।

1947 में देश की आजादी के समय पूरा विश्व दो महाशक्तियों के बीच चल रहे शीत युद्ध के कारण आर्थिक व राजनीतिक रूप में साम्यवादी व पूंजीवादी समूहों में बंटा हुआ था, देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू के व्यक्तित्व पर पश्चात्य सभ्यता का गहरा प्रभाव था, इस कारण महात्मा गांधी की स्वदेशी और सत्ता के विकेंद्रीकरण की अवधारणा के स्थान पर पश्चिमी अवधारणा से प्रभावित आर्थिक नीतियों को लागू किया गया जिसकी मुख्य विशेषता सत्ता का केंद्रीकरण तथा तंत्र को मजबूत करना था। ऐसे समय में जब हम स्वामी विवेकानंद, लोकमान्य तिलक, ज्योतिबा फुले, महात्मा गांधी, सरदार पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी के दिशा निर्देशित मार्ग से भटक रहे थे तब भारतीय राजनीति में पं. दीनदयाल उपाध्याय का उदय हुआ, जिन्होंने विश्व को ऐसा दर्शन दिया जिसका लक्ष्य मानव का कल्याण था उनका यह दर्शन एकात्म मानववाद के नाम से जाना गया। यह दर्शन जिसका केंद्र बिंदु समाज के अंतिम छोर पर खड़ा व्यक्ति था, जिसको अंत्योदय के रूप में दीनदयाल जी ने प्रस्तुत किया। उन्होंने देश की सनातन संस्कृति को युगानुकूल प्रस्तुत करते हुए देश को एक प्रगतिशील व सदैव प्रासंगिक रहने वाली विचारधारा प्रस्तुत की। उन्होंने पश्चिमी आयातित सिद्धांतों से परे इस सिद्धांत का प्रतिपादन कर आधुनिक राजनीति, अर्थव्यवस्था तथा समाज रचना का ऐसा चतुरंगी धरातल प्रस्तुत किया जो राष्ट्र के विकास एवं मानव कल्याण को सुनिश्चित कर पाए। पंडित जी अपने व्यक्तिगत जीवन में मानव कल्याण को अपना साध्य मानते थे, एक बार पंडित जी झांसी से इलाहाबाद गाड़ी से यात्रा कर रहे थे। जूता पालिश करने वाले एक बच्चे ने सामने बैठी एक सवारी से जूता पालिश करवाने का आग्रह किया, उस सज्जन ने उससे पूछा, "क्या तुम्हारे पास जूता चमकने के लिए कपड़ा है" बच्चे ने कहा नहीं तो सज्जन ने पालिश करवाने से मना कर दिया। यह बात पंडित जी सुन रहे थे। उन्होंने बच्चे को बुलाकर अपने अंगोछे से टुकड़ा फाड़कर बच्चे को देते हुए कहा लो साहब का जूता चमका दो। लोगो ने जब उनसे फटे हुए अंगोछे के विषय में जानना चाहा तो उन्होंने सहजता से कहा "अंगौछा थोड़ा छोटा होने से मेरा काम नहीं रुक रहा पर उस छोटे टुकड़े ने उस बच्चे के उस दिन खाने का इंतजाम कर दिया"

यह घटना पं. दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद के मूल भावना को दर्शाती है। यदि समाज के संपन्न लोग अपनी अवश्यकताओं में थोड़ी-सी कटौती कर लें तो कोई भूखा नहीं रहेगा। पंडित जी ने अपने एकात्मवाद में व्यक्ति के जीवन में पूर्णता के साथ-साथ संकलित विचार किया है और सभी की भूख मिटाने की चेष्टा की है किंतु यह ध्यान रखा है कि एक की भूख मिटाने के प्रयत्न में दूसरे की भूख मिटाने का मार्ग न बंद हो जाए। उन्होंने व्यक्ति और समाज को समग्रता में देखा है इसलिए व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए केवल भौतिक अर्थात आर्थिक अवाश्यकताओं की पूर्ति ही नहीं अपितु उसका आत्मिक और बौद्धिक विकास भी आवश्यक है। बिना इसके व्यक्तित्व का संपूर्ण स्वरूप प्रकट नहीं हो सकता। इसी प्रकार से समाज में भी संपूर्णता के आधार पर विचार करना पड़ेगा।

समाज की भूख मिटाने के साथ-साथ उसकी सांस्कृतिक, आत्मिक और बौद्धिक क्षमता का भी निवारण करना पड़ेगा। समाज रूपी शरीर को हर दृष्टि से स्वस्थ रखना पड़ेगा तभी समाज में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान किया जा सकता हैं। इसलिए उन्होंने एकात्म मानववाद का दर्शन प्रस्तुत करने से पूर्व सिद्धांत और नीति के अंतर्गत अंत्योदय के लिए समाज में अर्थायाम की बात कही अर्थात वितरण प्रणाली ऐसी हो जो पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति को लाभांवित कर सके। तभी समाज रूपी शरीर के व्यक्तित्व का भौतिक आत्मिक और भौतिक विकास हो सकेगा। अतएव व्यक्ति और समाज दोनों के बारे में समग्रता से विचार करेंगे तभी समाज का चतुर्मुख विकास सम्भव है यही एकात्म मानववाद की मूल अवधारणा है। पंडित जी ने अपनी इस परिकल्पना को जनसंघ के ग्वलियर अधिवेशन में 10 अगस्त 1964 को प्रस्तुत किया और इससे प्रेरणा लेकर वर्ष 1965 में सिद्धांत और नीति नामक दस्तावेज के अंतर्गत पार्टी का मुख्य लक्ष्य रखा गया। इसके अनुसार हमारी संपूर्ण व्यवस्था का केंद्र मानव होना चाहिए और आज भी यही हमारा मुख्य ध्येय बना हुआ है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव हैं।)

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