शनिवार, 18 जून 2022

विरोध और हिंसा के पीछे कौन है

अवधेश कुमार

निस्संदेह, इससे भयावह परिदृश्य देश के लिए शायद ही कुछ होगा। जुम्मे की नमाज के बाद कई राज्यों में एक साथ जिस तरह उग्र हिंसक प्रदर्शन हुए उसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी। जो कुछ हुआ वह सबके सामने है। इसलिए उसे दोहराने की जरूरत नहीं। जब भी इस तरह का हिंसा होती है हर विवेकशील भारतीय सोचता है कि इस समय हमारा दायित्व सबसे पहले देश में शांति स्थापित करना है। निंदा, आलोचना और विरोध बाद में कर लेंगे पहले देश को बचाना जरूरी है । जाहिर है, ऐसे समय हमेशा शांति , सद्भावना तथा मेल मिलाप की बात को ही प्राथमिकता दी जाती है और यह सही है । किंतु अगर कुछ समूह, संगठन या लोग हर दृष्टि से सक्रिय हो कि यहां अशांति और उपद्रव पैदा करना है तो शांति और सद्भाव की भाषा सफल नहीं होती। यह प्रयास तभी सफल होग जब समूची स्थिति को ठीक से समझा जाए। लोकतांत्रिक देश में सबको किसी मुद्दे पर अपना विरोध प्रकट करने का अधिकार है। किंतु विरोध हमेशा क्यों ,कब और कैसे के साथ आबद्ध रहना चाहिए। जुम्मे की नमाज के बाद मस्जिदों से निकलकर किए गए विरोध प्रदर्शन ज्यादातर जगह डरावने थे। अनेक जगह जिस तरह की हिंसा हुई उनसे साफ हो गया कि विरोध नियोजित करने वाले के इरादे कुछ और थे और हैं। धीरे धीरे सच सामने आ भी रहा है। यह बात सामान्य लोगों के गले नहीं उतरती कि विरोध प्रदर्शन के लिए जुम्मे का दिन और नमाज के बाद का समय ही क्यों चुना गया होगा?

देश के अनेक हिस्सों में एक ही समय एक साथ एक ही तरह के प्रदर्शन स्वतः स्फूर्त नहीं हो सकते। निश्चित रूप से इसके पीछे योजना थी। कुछ समूह, संगठन और लोग निश्चित रूप से इसकी योजना बना रहे होंगे। इतने क्षेत्रों में ये बातें कैसे और क्यों पहुंची होंगी यह प्रश्न भी मायने रखा जाना चाहिए। टेलीविजन डिबेटों में बैठने वाले अनेक मुस्लिम चेहरे बता रहे हैं कि मुसलमान सब कुछ सहन कर लेगा लेकिन अपने नबी का अपमान नहीं सहेगा। इस तरह की सोच इसलिए दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि हिंदुओं के अंदर दूसरे मजहब के या उनके संस्थापकों- पैगंबरों के बारे में हमेशा सम्मान का भाव रहा है। अपमान की तो सोच भी नहीं सकते।  टेलीविजन डिबेट में भाजपा की एक प्रवक्ता द्वारा की गई टिप्पणी को इन सबका कारण बताया जा रहा है। किसी सभ्य समाज का तकाजा यही है कि अगर कोई टिप्पणी आपको गलत लगता है तो उसका जवाब तथ्यों और तर्कों से दिया जाए। अगर भारत के कानून का उसमें उल्लंघन है तो कानूनी एजेंसियों को कार्रवाई करने दी जाए। कानूनी एजेंसियां कार्रवाई नहीं करतीं तो आपके पास न्यायालय में जाने का रास्ता खुला हुआ है। न्यायालय भी अंततः कानूनी दायरे में ही कार्रवाई करेगा। यहां समस्या यह है कि एक ओर तो ये संविधान और कानून की बात करते हैं, न्यायालयों में विश्वास प्रकट करते हैं, लेकिन दूसरी ओर स्वयं देश को भयभीत करते हैं। आखिर इस तरह के विरोध प्रदर्शनों का लक्ष्य क्या हो सकता है? यही न कि आक्रामक उग्र प्रदर्शनों से सरकार, पुलिस, प्रशासन और गैर मुस्लिमों को डराया जाए? संदेश दिया जाए कि हमारे विरुद्ध किसी प्रकार की कार्रवाई हुई तो हम देश में उथल-पुथल मचा देंगे?

अगर लोकतंत्र का किंचित भी सम्मान इनके मन में होता तो इस तरह जुम्मे की नमाज के बाद आक्रामक और विरोध प्रदर्शन नहीं होते, आपत्तिजनक नारे नहीं लगाए जाते, हिंसा नहीं होती। लोकतांत्रिक व्यवस्था और कानून के शासन में किसी भी प्रकार के आरोप या अपराध के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की निर्धारित प्रक्रिया है। प्राथमिकी दर्ज हो गई है तो प्रक्रिया के हिसाब से कार्रवाई होगी। गिरफ्तारी का मूल मकसद यही है कि आरोपी बाहर रहा तो वह साक्ष्यों को नष्ट कर सकता है, छेड़छाड़ कर सकता है। इस मामले में सबूत छिपाने, नष्ट करने या छेड़छाड़ करने का प्रश्न ही नहीं है क्योंकि जो बोला गया और लाइव डिबेट का हिस्सा है और उसके वीडियो हर जगह उपलब्ध है। बावजूद पुलिस या न्यायालय को आवश्यक लगा तो गिरफ्तारी भी हो सकती है। कानूनी प्रक्रिया हिंसा के दबाव में तो नहीं बदल सकती।

ध्यान रखने बात है कि अगर मुसलमानों में इतना गुस्सा था तो डिबेट के दो-चार दिनों के अंदर विरोध विरोध प्रदर्शन होना चाहिए। घटना के 17 दिनों बाद प्रदर्शन का मतलब है कि कहीं पर निगाहें और कहीं पर निशाने वाली बात है। डिबेट के बाद दो जुम्मे के नमाज भी निकल गए। साफ है कि भाजपा प्रवक्ता के टीवी डिबेट के उस हिस्से को बहाना बनाया गया। असल मकसद कुछ और है। वास्तव में मुसलमानों के अनेक बड़े चेहरों का अस्तित्व भाजपा, संघ यहां तक कि हिंदुओं से भय बनाए रखने पर टिका है। वे ऐसे अनेक समूहों संगठनों व्यक्तियों से रिश्ता रखते हैं जो सामने नहीं दिखते। पिछले काफी समय से दुष्प्रचार किया जा रहा है कि मुसलमानों की सारी मस्जिदें छीन जाएगी, एक दिन उनके लिए अपने मजहब का पालन करना संभव नहीं रहेगा, नमाज नहीं पढ़ सकेंगे, रोजा नहीं रख सकेंगे आदि आदि। ज्ञानवापी मामला उभरने के बाद हमने देखा कि मजहबी राजनीतिक मुस्लिम नेताओं ने कैसी आग लगाने वाली भाषायें बोली है। असदुद्दीन ओवैसी ने सिर पर सफेद कपड़ा बांध लिया जो कफन का प्रतीक है। 

कानपुर के एक मौलाना ने कहा कि सिर पर कफन बांध कर निकलेंगे। देवबंद में जमीयत ए उलेमा ए हिंद के सम्मेलन में पारित प्रस्ताव व भाषण उत्तेजित करने वाले थे। दुष्प्रचार यह  किया गया है कि मोदी और योगी सरकार जानबूझकर ज्ञानवापी मामले को सामने लाई है जबकि पूरा मामला ही न्यायालयों के कारण आया है। यह भी दुष्प्रचार हो रहा है कि धीरे-धीरे सारे प्रमुख मस्जिदों पर ये दावा करेंगे कि यह पहले हिंदू मंदिर था। मुसलमानों के अंदर या भावना तीव्रता से पैदा करने की कोशिश हुई है कि अगर उठकर लड़ने मरने को तैयार नहीं हुए तो तुम और तुम्हारा मजहब दोनों का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। उत्तर प्रदेश में ये लोग भाजपा के पराजय की कामना कर रहे थे।  इसके उलट योगी आदित्यनाथ फिर मुख्यमंत्री बन गए। रमजान के महीने में एक भी नमाज सड़क पर नहीं हुआ। मुस्लिम नेता सड़कों पर नमाज को भी सरकार एवं प्रशासन पर दबाव के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं। मुसलमानों को बताया जाता था कि सड़क पर उतरने से तुम्हारी संख्या बहुत ज्यादा दिखती है और इसका असर नेताओं व प्रशासन पर होगा। सड़क से हटाने का मतलब तुमको कमजोर बना देना है। यह समय है कि उठो सड़कों पर उतरो और अपने अस्तित्व बचाने के लिए लड़ाई लड़ो अन्यथा भाजपा की सरकारें हमें कहीं का नहीं रहने देंगी। इससे आम मुसलमानों में भय और आशंका पैदा होना स्वभाविक है।

निश्चित रूप से इस तरह का भाव पैदा करने के साथ कोई संगठन ,समूह , व्यक्तियों का समूह इसकी तैयारी में सक्रिय था। एक ही समय में देश के 11 राज्यों में जुम्मे की नमाज के बाद मस्जिदों के बाहर प्रदर्शन बगैर बड़ी तैयारी के संभव ही नहीं थी। जगह जगह पत्थरबाजी और तोड़फोड़ एकाएक हुए प्रदर्शन में संभव नहीं। प्रयागराज में तो बम तक चले। पश्चिम बंगाल में कई दिनों तक हिंसा होती रही है। मुस्लिम समुदाय के अंदर से ही कुछ संगठन और व्यक्तियों के नाम सामने आ रहे हैं। पुलिस की कार्रवाई से भी काफी सच सामने आ रहा है। उत्तर प्रदेश में इनके विरुद्ध कानून की सख्ती से काफी लोग पकड़े गए हैं । आने वाले समय में इसका भी खुलासा होगा कि किन-  किन स्रोतों से इसके लिए धन आया किन्हें किस तरह मिला। या राज्यों के पुलिस प्रशासन की जिम्मेवारी है कृषक सामने लाए और दोषियों के विरुद्ध इस तरह की कार्रवाई हो कि आगे ऐसा अपराध करने की कोई सोचे तक नहीं। इन्हें समझना पड़ेगा कि भारत में मुसलमानों की संख्या 2 देशों के बाद सबसे ज्यादा है लेकिन हम इस्लामी मुल्क नहीं है कि ईशनिंदा जैसा कानून बना दें। हमारे यहां फार्म और पंथ के अंदर भी बाहर और विमर्श की परंपरा है। हिंदू धर्म के देवी देवताओं के विरुद्ध ना जाने कितनी अपमानजनक टिप्पणियां पुस्तकों में भरी है। पता चलने पर उनका विरोध भी होता है पर ऐसी नौबत कभी नहीं आई की भारी संख्या में लोग सड़कों पर उतर कर हिंसा और उत्पात कर दें। लेकिन प्रश्न है कि जो इस तरह के विवेक सम्मत बार किया उत्तर सुनने को ही तैयार नहीं उनके साथ क्या किया जाए?

अवधेश कुमार को,ई 30 ,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 1100 92, मोबाइल 98110 27208

शुक्रवार, 10 जून 2022

इन देशों का रवैया चिंतित करने वाला है

अवधेश कुमार

भाजपा नेताओं द्वारा इस्लाम से संबंधित टिप्पणी पर कई इस्लामिक देशों में हो रही प्रतिक्रियाएं किसी दृष्टि से सामान्य घटना नहीं है। कतर ,कुवैत और ईरान ने भारतीय राजदूतों को सम्मन कर लिखित नाराजगी जताई। यही नहीं सऊदी अरब, कुवैत और बहरीन के स्टोरों से भारतीय चीजें हटाए जाने की अपील सोशल मीडिया पर आने लगी और ऐसा होते देखा भी गया। ओमान के ग्रैंड मुफ्ती ने सभी मुस्लिम राष्ट्रों से इस मुद्दे पर एकजुट होने को कहा। पाकिस्तान और इस्लामिक देशों के संगठन ओआईसी ने इस पर बयान जारी कर दिया। पूरा विवाद एक टीवी बहस से संबंधित है जिसमें ज्ञानवापी में शिवलिंग की आकृति को फव्वारा बताने के विरुद्ध भाजपा की एक प्रवक्ता ने प्रश्नवाचक लहजे में कुछ टिप्पणी की थी। एक नेता ने उसको रीट्वीट कर दिया। यह इतना बड़ा विवाद बन जाएगा इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। 

टीवी डिबेट में आजकल तनाव बढ़ने पर ऐसी कई टिप्पणियां आती हैं जिनको मुद्दा बना दिया जाए तो हर दिन देश में तनाव और हिंसा हो सकता है तथा इसकी प्रतिध्वनि विदेशों में भी सुनाई पड़ेगी। ऐसे कम ही अवसर आए होंगे जब किसी देश में ऐसे मामले पर दूसरे देश के राजदूत को तलब किया होगा जिसमें द्विपक्षीय या फिर अंतरराष्ट्रीय मसले नहीं हो। किसी देश में टेलीविजन डिबेट या भाषण में की गई किसी नेता की टिप्पणी दूसरे देश के लिए मुद्दा कैसे हो सकता है? भाजपा ने अपने जिन नेताओं के विरुद्ध कार्रवाई की है उन्होंने इन देशों पर कोई टिप्पणी नहीं की थी। इसलिए यह विषय हमें कई पहलुओं पर गंभीरता से सोचने को बाध्य करता है।  देशों का रवैया देखिए, कतर की सरकार ने दोहा स्थित भारतीय राजदूत को बुलाकर मोहम्मद पैगंबर साहब के बारे में की गई कथित टिप्पणियों का मुद्दा उठाया। कतर के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि विदेश मंत्री सुल्तान विन साद अरमुरैखी ने नोटिस सौंपा। इसमें कहा गया कि भारत में सत्ताधारी पार्टी के नेता की तरफ से दिये गये इस तरह के बयान को पूरी तरह खारिज करती है। इस तरह की टिप्पणियों से पूरी दुनिया में धार्मिक नफरत बढेगा। यह टिप्पणी भारत समेत पूरी दुनिया में सभ्यता के विकास में जो योगदान इस्लाम ने दिया है उसे कमतर करती है । ध्यान रखिए इसमें साफ कहा गया है की कतर सरकार को उम्मीद है कि भारत सरकार इस बारे में सार्वजनिक तौर पर माफी मांगी।


जब इसमें सरकार सही है नहीं तो फिर माफी मांगने का सवाल कहां से पैदा होता है ? हालांकि कतर ने भाजपा द्वारा अपने नेताओं के खिलाफ कार्रवाई का स्वागत किया। भारत के प्रतिनिधि के रूप में राजदूतों ने यह स्पष्ट किया कि भारत विविधताओं का देश है। यहां सभी मजहबों के लिए सम्मान है और जिन लोगों ने ऐसा किया उनके खिलाफ कार्रवाई हो रही है। 

किसी भी मजहब या उनके पैगंबरों के सम्मान के विरुद्ध कोई टिप्पणी समाज में स्वीकार नहीं हो सकती । क्या डिबेट में कही गई किसी पंक्ति को वाकई इस श्रेणी का माना जा सकता है? अगर है भी तो क्या भारत के साथ पुराने संबंध रखने वाले इन देशों को पता नहीं कि यहां संविधान में सभी पंथों,मजहबों को अपनी परंपरा के अनुसार जीने, मान्य सीमाओं में प्रचार करने का पूरा अधिकार है? यहां हिंदू ,मुसलमान, सिख, ईसाई आदि के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं है? बावजूद अगर उन्होंने इस तरह का असाधारण कदम उठाया तो इसके कारण साफ हैं। सच यह है कि इन देशों के अंदर ही दूसरे पंथों- मजहबों को वैसी स्वतंत्रता नहीं जैसी भारत जैसे देश में है। गैर मुस्लिम भारतीयों को अपने धर्म के पालन में वहां अनेक कठिनाइयां आती है। लेकिन हमारी सरकार ने कभी वहां के राजदूतों को बुलाकर अपनी आपत्ति और नाराजगी नहीं जताई। दुनिया के ज्यादातर गैर मुस्लिम देशों ने ही शायद ही कभी ऐसा किया होगा। अगर देश किसी दूसरे देश में की गई टिप्पणियों को द्विपक्षीय संबंधों का मुद्दा बनाकर इस तरह उठाने लगे तो फिर दुनिया में अराजकता ही पैदा होगी। न यह किसी अंतरराष्ट्रीय कानून में आता है और न ही अंतरराष्ट्रीय राजनय में इसके बारे में मापदंड तय किए गए हैं। 

भारत बहरीन, कतर ,ईरान ,इराक ,लिबिया नहीं है जहां मजहबों पर खुली बहस नहीं हो सकती। उसमें कई बार संभव है कुछ ऐसी टिप्पणियां हो जाए जो बोलने वाले के लिए सामान्य हो लेकिन दूसरे लोग उसके अपने अनुसार मायने निकालें। जो भी हो यह देश के अंदर का विषय होना चाहिए था। जरा सोचिए, हिंदू धर्म और हमारे पूज्य देवी देवताओं के बारे में स्वयं भारत एवं दुनिया के अलग-अलग देशों में कई बार नकारात्मक टिप्पणियां की गई हैं। ऐसे अनेक रेखाचित्र और व्यंग्य कार्टून बनाए गए जो हमारी भावनाओं के विरुद्ध रहे हैं। मुझे याद नहीं कि कभी भारत सरकार ने इसके लिए उस देश से कभी इस तरह औपचारिक नाराजगी प्रकट की हो । इस आधार पर व्यवहार हो तो दुनियां के अनेक विश्वविद्यालयों में मान्य पुस्तकें हैं जहां हिंदू धर्म के बारे में दी गई जानकारियां सामान्य अपमान की सीमा को पार करती है। तो भारत सरकार को इन सारे देशों से नाराजगी प्रकट कर इन्हें पुस्तकों को हटाने तथा माफी मांगने के लिए कहना चाहिए। द्विपक्षीय संबंधों में कोई देश तभी राजनयिक स्तर पर नाराजगी प्रकट कर सकता है जब सीधे उसके विरुद्ध कोई टिप्पणी हो, कदम उठाया गया या वहां के नागरिकों के विरुद्ध अपराध हुआ है। अगर किसी देश का मजहब द्विपक्षीय संबंधों को निर्धारित करने लगे तो अंतरराष्ट्रीय राजनीति की पूरी तस्वीर भयानक होगी। हालांकि ऐसी स्थितियां  अलग-अलग रूप में कई बार विश्व में पैदा हुई है। उदाहरण के लिए फ्रांस के  शारलोट हेब्दो पत्रिका में मोहम्मद साहब पर कार्टून छापने के विरुद्ध आतंकवादियों ने हिंसा बाद में की, लेकिन कई देशों ने औपचारिक रूप से फ्रांस से नाराजगी प्रकट की। दुनिया में ईसाई देशों की संख्या सबसे ज्यादा है। अगर ईसा मसीह या बाद क् उनके दूसरे संतों पर कोई टिप्पणी हो जाए और सारे देश उस देश के राजदूत को बुलाकर नाराजगी प्रकट करने लगे तो क्या होगा? स्वयं मुस्लिम देशों के अंदर कई बार ऐसे बयान आते हैं।


जाहिर है , यह प्रसंग भारत के साथ पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। ठीक है कि हमारे भारतीय भारी संख्या में खाड़ी देशों में हैं। उनके साथ हमारे बहुपक्षीय संबंध हैं। किंतु संबंधों के पालन का दायित्व दोनों ओर से होता है। जरा सोचिए ,इन देशों का रवैया कैसा है? उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू कतर में थे और उनकी यात्रा पर इसका असर पड़ सकता था। ईरान की तेल बिक्री पर प्रतिबंध खत्म करने के लिए भारत कोशिश कर रहा है पर उसने इसकी तनिक प्रवाह नहीं की। कुवैत तो भारत के करीबी देशों में माना जाता है। ये सब बातें एक प्रवक्ता के प्रश्नवाचक एक टिप्पणी  के सामने कमजोर पड़ गई। तात्कालिक रूप से भारत ने जो भी किया उस पर अभी टिप्पणी की आवश्यकता नहीं लेकिन दूरगामी दृष्टि से इन देशों के व्यवहार के को पूरी सच्चाई के साथ स्वीकार कर द्विपक्षीय -अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मामले में नए सिरे से नीति रणनीति बनाने की आवश्यकता उत्पन्न हुई है। भारत ऐसा देश है, जहां किसी आधार पर विदेशों में सवाल उठा नहीं कि एक वर्ग हथियार बनाकर अपनी ही सरकार पर टूट पड़ता है। ये वे लोग हैं जो स्वयं को सेकुलरवाद का पुरोधा बताते हैं। क्या जिन देशों ने भारतीय राजदूत को बुलाकर नाराजगी प्रकट की उन सारे का व्यवहार सेक्यूलरवाद की सीमा में आता है? अगर नहीं आता है तो इनको इससे परेशानी क्यों नहीं हुई? भारत में कोई टिप्पणी हुई है तो यह आंतरिक मामला है। देश की नीति के रूप में हम कभी भी किसी देश के मजहबी ही नहीं,  आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करते । भारत के साथ संबंध कायम रखने की कामना करने वाले देशों को भी इसका ध्यान रखना चाहिए। इन देशों ने नहीं रखा है। साफ है इनके लिए मजहब की अपनी सोच सर्वोपरि है। सारे संबंधों की कसौटी इस्लाम मजहब है। उस पर उनके नजरिए से अगर आपके देश में सब कुछ सामान्य है तभी आपके संबंधों का महत्व है अन्यथा नहीं। इस कटु सच्चाई को दुनिया के सभी गैर इस्लामी देश स्वीकार करें तभी यह समझ में आएगा कि भविष्य की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में इस पहलू का निर्धारण कैसे हो।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092,  मोबाइल -98110 27208



रविवार, 5 जून 2022

बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम न होगा?


तनवीर जाफ़री

अपनी पीठ थपथपाने में महारत रखने वाली सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के नेताओं द्वारा आये दिन किसी न किसी मंच के माध्यम से भारतवासियों को यह जताने की कोशिश की जाती है कि 2014 के बाद से ही भारत ने अपनी विकास यात्रा तय करनी शुरू की है। कुछ चाटुकार क़िस्म के सत्ता समर्थक तो यहाँ तक कह चुके कि देश को सही मायने में स्वतंत्रता ही 2014 के बाद मिली है। ऐसा कहने वाले बेशर्म लोग यह भी नहीं सोचते कि उनके इस प्रकार के सत्ता की ख़ुशामद करने वाले बयानों से स्वतंत्रता संग्राम के लाखों शहीदों का कितना अपमान होता है। परन्तु  'विकास पथ पर ' कथित तौर पर आगे बढ़ने वाले  उस वर्तमान भारत में जहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को आये दिन ज़लील करने की कोशिश की जाती हो और उनके हत्यारे गोडसे को राष्ट्रभक्त बताया जाता हो, देश के उस पहले आतंकवादी  गुणगान किया जाता हो व उसकी प्रतिमायें स्थापित की जाती हों,जहाँ  प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा बनाये गये कई सरकारी संस्थानों को उन्हीं को गालियां दे देकर बेचा जा रहा हो वहाँ कुछ भी प्रचारित करना संभव है। जिन नेताओं को उनके दलों  के लोग यशस्वी और पूजनीय कहते हुये नहीं थकते उन्हीं नेताओं की विदेशों में कितनी फ़ज़ीहत होती यह 'भक्तों ' व 'चाटुकारों' को दिखाई नहीं देता। इन 'सावन के अंधों' को केवल यही नज़र आता है कि यशस्वी 'डांकापति ' की लोकप्रियता के चलते पूरी दुनिया में भारत का डंका बज रहा है। इन्हें न तो यह दिखाई दे रहा है कि कितनी विदेशी कम्पनियाँ भारत से बिदा हो चुकी हैं और हो रही हैं। इन्हें डॉलर की तुलना में रूपये की क़ीमत अभूतपूर्व तरीक़े से गिरने से कोई वास्ता नहीं, इनकी नज़रों में बढ़ती बेरोज़गारी और आसमान छूती मंहगाई कोई मायने नहीं रखती।

अनेक बार यह भी देखा गया है कि तमाम प्रतिष्ठित विदेशी समाचार पत्र व पत्रिकायें अपने सम्पादकीय आलेख में इसी सरकार की कठोर शब्दों में आलोचना करती दिखाई दी हैं। विश्व प्रसिद्ध टाइम मैगज़ीन तो हमारे 'यशस्वी ' प्रधानमंत्री को 'डिवाइडर इन चीफ़' की उपाधि देते हुये कवर स्टोरी के साथ पूरा आलेख प्रकाशित कर चुकी है। विदेश यात्राओं  के दौरान कई बार इनके विरुद्ध छोटे बड़े अनेक प्रदर्शन होते रहे हैं। परन्तु हमारे देश का 'घुटना टेक '  मीडिया ख़ासकर टी वी चैनल्स मीडिया छवि निर्माण अभियान में मस्त होकर केवल 'यशस्वियों का यशगान ' करने  में लगे रहते हैं। कबीर दास को आदर्श महापुरुष व महान आलोचक मानने वाले हमारे देश का मीडिया सत्ता की निंदा करना तो दूर आलोचनाओं से भी डरता और कतराता है। वह कबीर दास के इस आदर्श दोहे को भूल जाता है जिसमें उन्होंने फ़रमाया था कि - निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय। अर्थात: जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने अधिक से अधिक पास ही रखना चाहिए क्योंकि वह बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बताकर हमारे स्वभाव को साफ़ कर देता है। परन्तु आज की सत्ता निंदा करना तो दूर अपनी सही आलोचना भी पसंद नहीं करती। उसे केवल अपना 'यशगान ' करने वाले लोग व मीडिया चाहिये।

परन्तु विदेशों में रहने वाले अनेक भारतीय व उनके समाजसेवी संगठन समय समय पर समाज विभाजक एजेंडा चलाने वाले ऐसे नेताओं का मुखर होकर विरोध करते रहते हैं। अभी पिछले दिनों भाजपा के युवा सांसद तथा भारतीय जनता युवा मोर्चा प्रमुख तेजस्वी सूर्या 31 मई से 3 जून तक ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में आयोजित होने वाले ऑस्ट्रेलिया-इंडिया यूथ डॉयलॉग के वार्षिक सम्मेलन में भाग लेने ऑस्ट्रेलिया पहुंचे। बताया जाता है कि 'ऑस्ट्रेलिया-इंडिया यूथ डॉयलॉग' भारत व आस्ट्रेलिया के युवाओं के मध्य संवाद बढ़ाने में सहायता करने वाला एक संगठन है जोकि हर दूसरे वर्ष भारत और ऑस्ट्रेलिया में एक सम्मेलन आयोजित करता है। इस सम्मेलन में दोनों देशों के शीर्ष प्रतिभावान पंद्रह पंद्रह चुनिंदा युवाओं को आमंत्रित किया जाता है जो दोनों देशों के युवाओं से परस्पर अपने विचारों को साझा करते हैं। भारत की तरफ़ से पंद्रह लोगों की सूची में युवा सांसद व भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्य़क्ष तेजस्वी सूर्या का नाम प्रमुख है। तेजस्वी सूर्या को विगत 30 मई को सिडनी की स्विनबर्न यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नोलॉजी के कैंपस में एजुकेशन सेंटर ऑफ़ ऑस्ट्रेलिया (ईसीए) नमक संगठन के बैनर तले आयोजित एक  कार्यक्रम में छात्रों को संबोधित करना था। परन्तु अनेक संगठन द्वारा सूर्या के विरुद्ध विरोध प्रदर्शनों के नोटिस के बाद आयोजकों ने इस कार्यक्रम को रद्द कर दिया। विरोध करने वालों का कहना है कि "एक फ़ासीवादी सांसद का सरकारी एजेंसियों के ख़र्च और नाम पर ऑस्ट्रेलिया में बुलावा अस्वीकार्य है।” विरोध कर्ताओं का कहना है कि तेजस्वी सूर्या, स्वयं को आरएसएस स्वयंसेवक के तौर पर पेश करते हैं। और चूंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक कट्टरपंथी हिंदू संगठन है, जो यूरोपीय फ़ासीवादी तौर तरीक़ों से लोगों को एक-दूसरे का दुश्मन बना रहा है। उसके दर्शन को मंच देना समझदारी नहीं होगी।”

ग़ौरतलब है कि यह वही तेजस्वी सूर्या हैं जिन्होंने अपने एक अतिविवादित ट्वीट में कहा था कि "95 प्रतिशत अरब महिलाओं को अपने पिछले कुछ सौ सालों में यौन संतुष्टि नहीं मिली है। हर मां ने बच्चों को सिर्फ़ सेक्स करके पैदा किया है, प्यार करके नहीं।” उसी समय सूर्या के इस ट्वीट का अरब व मध्य एशियाई अनेक देशों में ज़बरदस्त विरोध हुआ था। यहाँ तक कि यूएई में भारत के तत्कालीन राजदूत पवन कपूर को उस समय सूर्या का बचाव करते हुये सोशल मीडिया पर सफ़ाई तक देनी पड़ी थी। ऑस्ट्रेलिया में उनका विरोध करने वाले आज तेजस्वी सूर्याके उन्हीं विवादित बयानों को याद कर स्पष्ट तौर पर यह कह रहे हैं कि "तेजस्वी सूर्या की धर्मांधता, महिलाओं के प्रति उनकी नफ़रत और बर्बरता के दस्तावेज़ मौजूद हैं। लिहाज़ा ऐसे व्यक्ति का ऑस्ट्रेलिया के युवाओं से संवाद न केवल बेमानी बल्कि हानिकारक भी है। विदेशों की धरती पर भारतीय नेताओं का इसतरह का विरोध निश्चित रूप से भारतवर्ष की छवि को भी धूमिल करता है। परन्तु अफ़सोस की बात है कि सांप्रदायिक व पूर्वाग्रही राजनीति से संस्कारित लोगों को इस बात की कोई चिंता नहीं होती। इन्हें भारत में मिल रहे ''यशगान ' से ही संतुष्टि मिलती है। चाहे वह नकारात्मक ही क्यों न हो। बक़ौल  'शेफ़्ता' -'हम तालिब-ए- शोहरत हैं हमें नंग से क्या काम = बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम न होगा।

तनवीर जाफ़री

शनिवार, 4 जून 2022

मूसेवाला की हत्या से सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न

अवधेश कुमार 

पंजाब में शुभदायक सिंह सिद्धू मूसेवाला की दिनदहाड़े हत्या सन्न करने वाली घटना है। पंजाब के मानसा में उनके पैतृक गांव मूसा के पास हत्यारों ने केवल दो मिनट में शरीर में इतनी गोलियां मारी की पोस्टमार्टम में ही 24 गोलियां निकली। हत्यारे भी वहां दो ही मिनट रुके । दो गाड़ियों ने मूसे वाला की कार को ओवरटेक किया। इससे पहले उन्होंने मूसेवाला की गाड़ी के पिछले टायर पर गोली मारी जिससे संतुलन बिगड़ गया। मूसेवाला ने कार को संभालने की कोशिश की लेकिन उनमें से 7 लोग उतरे और ताबड़तोड़ फायरिंग करने लगे । हमलावरों ने ऐसा डर का माहौल बनाया कि लोग घरों में घुसने को विवश हो गए। विडंबना देखिए कि गांव के लोगों ने मुसेवाला को घायल स्थिति में अस्पताल ले जाने का भी साहस नहीं दिखाया। एक अनजान व्यक्ति ने मोटरसाइकिल से मूसेवाला को अस्पताल पहुंचाया। आखिर क्यों? इसकी चर्चा इसलिए आवश्यक है ताकि समझा जाए कि पंजाब के अंदर अपराधियों और गैंगस्टरों ने कैसी स्थिति पैदा कर दी है। गांव में जाने-माने शख्स की शाम 5:30 बजे के आसपास हत्या होती है, हत्यारों के डर से लोग घरों में दुबके रहते हैं और उनके चले जाने के बाद भी लंबे समय तक घर से निकलने का साहस नहीं करते।

अभी तक की जानकारी यही है कि तिहाड़ जेल में बंद कुख्यात अपराधी लॉरेंस ने कनाडा में बैठे गोल्डी बराड़ के साथ मिलकर मूसावाला की हत्या को अंजाम दिया। लॉरेंस गैंग ने हत्या की जिम्मेदारी ली है। लॉरेंस गैंग और गोल्डी बरार ने कहा है कि हमने मोहाली में विक्की मिट्ठू खेरा की हत्या का बदला लिया है । इसके अनुसार मूसेवाला भी उसके विरोधी गैंग से जुड़ा था। इस पर अंतिम मत देना कठिन है। ज्ञानी दविंदर बंबीहा समूह ने कहा कि मूसे वाला उनसे जुड़ा नहीं था लेकिन उनके साथ नाम जोड़ा जा रहा है तो वे इसका बदला लेंगे। जाहिर है, इससे पंजाब में नए गैंगवार की भी संभावना बढ़ी है । 


आम आदमी पार्टी कह रही है कि उनके पास बुलेटप्रूफ कार और दो गैंगमैन थे लेकिन वह न उस कार से गए न गैंगमैन को साथ लेकर। वह नहीं बता रही कि बुलेटप्रूफ कार सरकार ने नहीं दिया था, उनका अपना था। दो दिन पहले उनकी सुरक्षा हटा दी गई थी। आम आदमी पार्टी की समस्या है कि वह स्वयं को क्रांतिकारी और परिवर्तनकारी साबित करने के लिए ऐसे छोटे-  छोटे कदम उठाकर प्रचार करती है जिनमें किसी तरह के परिश्रम की आवश्यकता नहीं हो। उसने पंजाब में 424 लोगों की सुरक्षा हटाने या घटाने का प्रचार किया और सूची जारी कर दी। सरकारी सुरक्षा की समीक्षा और समय-समय पर सुरक्षा में कमी या बढ़ोतरी स्वाभाविक प्रक्रिया होती है। किंतु आप की भगवंत मान सरकार अपने एजेंडे के अनुसार काम कर रही है। चुनाव में उसने वीआईपी संस्कृति और नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था को मुद्दा बनाया था और धराधर सुरक्षा घटाकर या हटाकर उसने वाहवाही लूटने के लिए इसका प्रचार कर दिया। विडंबना यह है कि उनके स्वयं के नेताओं की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की सुरक्षा में पंजाब के कमांडो भारी संख्या में है। यहां तक कि राज्य सभा सांसद बने राघव चड्ढा के पास भी पंजाब की सुरक्षा है। आम आदमी पार्टी का यह वक्तव्य सामान्य लग सकता है कि हत्या पर राजनीति न हो किंतु यह तो पूछा जाएगा कि अपने नेताओं की सुरक्षा में बढ़ोतरी या जिनको सुरक्षा खतरा नहीं है उन्हें सुरक्षा देना तथा दूसरों की सुरक्षा में कटौती या वापस लेना राजनीति की किस नैतिकता के तहत आता है? अगर आप की दिल्ली सरकार के लोगों या उनके सांसदों की सुरक्षा को खतरा होगा तो दिल्ली पुलिस  है। गृह मंत्रालय समीक्षा करके सुरक्षा प्रदान कर सकती है। इसकी जगह पंजाब की सुरक्षा लेना आपत्तिजनक है।

कोई नहीं कहेगा कि आप या भगवंत मान सरकार ने इरादतन ऐसी स्थिति पैदा की जिसमें मूसेवाला की हत्या हो जाए। कोई सरकार अपने शासनकाल में हत्याएं नहीं होने देना चाहेगा। पर तिहाड़ जेल से जो  मोबाइल नंबर सामने आया है। क्या उसका आज पता चला है? नहीं । इसका पता दिल्ली पुलिस को पहले ही चला । वास्तव में मूसावाला की हत्या के षड्यंत्र का पता दिल्ली में कुछ समय पहले गिरफ्तार हुए शाहरूख से मिला।  शाहरुख ने दिल्ली में बताया था कि गोल्डीबरार और लॉरेंस कोई बड़ी साजिश रच रहे हैं। शाहरुख ने स्वयं मूसेवाला की हत्या के लिए रेकी भी की थी। ध्यान रखिए कि हत्याकांड में इस्तेमाल बोलेरो वही है जिसका इस्तेमाल शाहरुख ने साथियों के साथ मूसेवाला की रेकी के लिए किया था। दिल्ली पुलिस को जब इतनी जानकारी थी तो उसने पंजाब से यह जानकारी साझा नहीं किया होगा ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है। जरा सोचिए , शाहरुख बता रहा है कि उसकी गोल्डी बरार से सिग्नल ऐप पर बात होती थी। लॉरेंस के भी सिग्नल ऐप पर बात होने का शक पुलिस जता रही है। शाहरुख का फोन दिल्ली पुलिस के पास है । जाहिर है , उसे जितनी जानकारियां मिली अवश्य ही पंजाब पुलिस को साझा किया होगा क्योंकि इस तरह हत्या की साजिश की जानकारी कोई पुलिस अपने पास बंद करके नहीं रखती । दिल्ली पुलिस ने उससे सूचनाएं साझा नहीं की तो पंजाब पुलिस इसकी जानकारी दे।  पंजाब पुलिस को यह भी बताना चाहिए कि उसकी सुरक्षा समीक्षा में मूसावाला के जीवन पर खतरे की आशंका आई थी या नहीं? नहीं आई तो यह खुफिया विफलता है। दिल्ली पुलिस की जानकारी के बाद तो मूसेवाला की सुरक्षा बढ़ाई जानी चाहिए थी। जब गिरफ्तार अपराधी कह रहा है कि उसने स्वयं रेकी की और तिहार में बंद गैंगस्टर के अलावा कनाडा के गैंगस्टर से उसकी बातचीत होती थी तो फिर उसने जिन लोगों के नाम लिए उम्र में जिनका अपराधिक रिकॉर्ड है या संदिग्ध है सबकी गिरफ्तारी की कोशिश होनी चाहिए। नहीं हुई तो जाहिर है इसे या तो गंभीरता से नहीं लिया गया या फिर ऐसा करने के अन्य कारण थे । वे क्या कारण हो सकते हैं?


पंजाब सुरक्षा की दृष्टि से हमेशा संवेदनशील प्रदेश रहा है। सीमा पार से अलगाववाद आतंकवाद को बढ़ावा देने की हर संभव कोशिशें हो रही हैं। पिछले एक वर्ष में काफी संख्या में हथियार और संदिग्ध आतंकवादी पकड़े गए हैं। पुलिस के पास सारी खुफिया सूचनाएं मौजूद हैं। जिस प्रदेश में भारी मात्रा में ड्रग और हथियार आ रहे हैं वहां अपराधी भी भारी संख्या में पैदा हुए होंगे। पंजाब में कई कारणों से अपराधी समूहों के बीच हिंसक टकराव की खबरें भी सामने आती रही है। ऐसे प्रदेश की सरकार को सुरक्षा के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील होना चाहिए। क्या आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेता दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान उतने ही गंभीर और संवेदनशील हैं जितना होना चाहिए? मूसेवाला की पृष्ठभूमि क्या थी यह बहस का विषय हो सकता है, पर किसी भी तरह की व्यक्ति को सरेआम गोली मारना सरकार द्वारा कानून के राज के दावे की धज्जियां उड़ाता है। गाहे-बगाहे कहा जा रहा है कि मूसेवाला कोई नेता नहीं थे बल्कि वे तो हाल में ही कांग्रेस में शामिल हुए थे। पिछले वर्ष 3 दिसंबर 2021 को वे पार्टी में शामिल हुए थे। मानसा से उन्होंने 20 फरवरी के विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार के रूप में अपनी चुनावी पारी की शुरुआत की थी। उन पर गन कल्चर यानी बंदूक संस्कृति को अपने गाने के माध्यम से बढ़ावा देने का आरोप था। वे संजू में अपने गीत से हिंसा और बंदूक संस्कृति को बढ़ावा देने के मुकदमे का भी सामना कर बात कर रहे थे। 2020 में पंजाब पुलिस की शूटिंग रेंज में गोली चलाते मूसे वाला का वीडियो वायरल हुआ था । वायरल वीडियो में सिद्दू मूसेवाला बंदूक दिखा रहे थे । वे एके-47 राइफल के साथ ट्रेनिंग लेते भी दिख रहे थे । निस्संदेह उनका यह पक्ष विवादास्पद था । बावजूद अपनी अनूठी रैंप शैली के साथ गायन व अभिनय में जगह बनाने वाले मूसेवाला लीजेंड ,डेविल, जस्ट सुनो ,जट दा मुकाबला, हथियार जैसे हिट गाने के कारण लोकप्रिय भी थे। दो फिल्म में उन्होंने अभिनय भी किया था। हमारे आपके लिए उनके विचारों से सहमत होना शायद संभव ना हो लेकिन इस तरह की हत्या अंदर से हिला देने वाली है। एक जाने पहचाने चेहरे की सुरक्षा के प्रति राज्य को हर दृष्टि से संवेदनशील होना चाहिए। मूसे वाला की हत्या बता रही है कि पंजाब की भगवंत मान सरकार को आंतरिक सुरक्षा को लेकर ज्यादा गंभीर होने की आवश्यकता है। वास्तव में किसी भी पंजाब सरकार के लिए मादक पदार्थ,   अपराधियों की बढ़ती संख्या तथा उनके बीच आपसी मुठभेड़ से लेकर सीमा पार के खतरों को लेकर राजनीति से परे जागरूक एवं दृढ़ संकल्पित होने की आवश्यकता है। उम्मीद करनी चाहिए कि इस दुखद घटना के बाद आम आदमी पार्टी, मुख्यमंत्री भगवंत मान सरकार आत्ममंथन कर सुरक्षा के प्रति शत-प्रतिशत गंभीर और जिम्मेदार बनने की कोशिश करेगी। 

अवधेश कुमार,ई- 30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -98110 27208

शुक्रवार, 27 मई 2022

धैर्य रखें न्यायालय साक्ष्यों के आधार पर ही फैसला देंगे

अवधेश कुमार

ज्ञानवापी मस्जिद विवाद हो या कृष्ण जन्मभूमि ईदगाह मस्जिद या कुतुबमीनार सूर्य स्तंभ- विष्णु स्तंभ इन पर आम सहमति बनाना कठिन है। बातचीत और आम सहमति से ऐसे धार्मिक स्थलों के विवाद सुलझ जाएं इससे बेहतर कुछ हो नहीं सकता, किंतु परिस्थितियां ऐसी नहीं हैं जिनमें इसकी कल्पना भी की जाए। अयोध्या मामले में कोशिशें हुईं लेकिन अंततः न्यायालय के फैसले से ही समाधान हो सका। वस्तुतः लंबे समय मामला लटकाए जाने के कारण लोगों का आक्रोश बढ़ा और वो न्यायालय से लेकर अन्य स्तरों पर इसके लिए आवाज उठाने लगे। अब चूंकि उच्चतम न्यायालय ने ज्ञानवापी मामले में हस्तक्षेप किया है, इसलिए मानकर चलना चाहिए कि आने वाले समय में इसका कानूनी निपटारा हो जाएगा। उच्चतम न्यायालय के आदेश को भी सही परिप्रेक्ष्य में समझे जाने की आवश्यकता है। उच्चतम न्यायालय ने मुख्यतः तीन आदेश दिए हैं। पहला, मामले को वाराणसी के सिविल न्यायाधीश, सीनियर डिवीजन से जिला न्यायाधीश को स्थानांतरित किया है। न्यायमूर्ति धनंजय चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति टी एस नरसिम्हा कि पीठ ने कहा कि बेहतर होगा कि एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी इसे देखें क्योंकि मामला जटिल और संवेदनशील है। इसका यह अर्थ नहीं है कि न्यायालय ने दीवानी न्यायाधीश पर कोई टिप्पणी की है। कहा है कि वे दीवानी न्यायाधीश पर कोई आरोप नहीं लगा रहे हैं न उनकी क्षमता पर प्रश्न उठा रहे हैं। हमारे देश में हर कोई फैसले का अपने अनुसार अर्थ लगाने लगता है।  वास्तव में इससे मुकदमे की स्थिति में कोई अंतर नहीं आया है।इससे मां श्रृंगार गौरी की प्रतिदिन पूजा अर्चना की मांग करने वालों या फिर ज्ञानवापी को पूर्व काशी विश्वनाथ मंदिर मानने वालों को किसी तरह  धक्का नहीं लगा है। मस्जिद के पक्ष में आवाज उठाने वाले कह रहे थे कि पूजा स्थल विशेष प्रावधान कानून, 1991 के अनुसार 15 अगस्त, 1947 तक किसी भी स्थान की जो स्थिति थी उसमें अयोध्या को छोड़कर बदलाव नहीं हो सकता। इस आधार पर वे दीवानी न्यायालय में सुनवाई और सर्वे आदेश को भी गलत और कानून विरोधी बता रहे थे। उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि पूजा स्थल कानून, 1991 किसी धार्मिक स्थल के धार्मिक स्वरूप का पता लगाने पर रोक नहीं लगाता। मस्जिद कमेटी के वकील ने सिविल न्यायाधीश द्वारा सर्वे के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करने तथा 16 मई को शिवलिंग के दावे वाले स्थान को सील करने के आदेश को इस कानून का उल्लंघन बताया। इस पर न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर धार्मिक स्थल की हाइब्रिड स्थिति हो यानी दो धर्मों के लोगों का दावा है और उनके अवशेष मिल रहे हों तो उसका पता लगाने में यह कानून आड़े नहीं आता है।

इनकी कोई जो भी व्याख्या करे, तत्काल यह ज्ञानवापी को मंदिर मानने वालों के अनुकूल है। विरोधी अपने पक्ष में सबसे बड़ा आधार इसे ही बता रहे थे।  ध्यान रखिए कि श्री कृष्ण जन्मस्थान से शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने के लिए दायर हुई याचिका को स्वीकार करते हुए मथुरा के जिला न्यायाधीश ने भी टिप्पणी में लिखा है कि वादी ने शाही मस्जिद ईदगाह कमेटी और श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ के बीच 1968 में हुए समझौते को रद्द करने की मांग की है जबकि उपासना स्थल कानून 1991 में बना है ,इसलिए समझौता रद्द करने की मांग पर यह लागू नहीं होता है। हमें अपनी ओर से इस कानून की व्याख्या करने की बजाय न्यायालय के ही अंतिम मत की प्रतीक्षा करनी चाहिए जहां इस पर याचिका लंबित है। यहां इतना ही समझ लेना पर्याप्त है कि ज्ञानवापी मस्जिद या मंदिर में से क्या होगा, श्री कृष्ण जन्मस्थान ईदगाह मस्जिद को माना जाएगा या नहीं या फिर कुतुबमीनार सूर्य स्तंभ या विष्णु स्तंभ माना जाये या नहीं आदि सुनिश्चित करने में पूजा स्थल कानून, 1991 बाधा नहीं है। तो इसे यहीं छोड़ कर आगे बढें। ध्यान रखिए ,सर्वे के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी खारिज कर दिया था।

उच्चतम न्यायालय का दूसरा आदेश नमाज को बाधित नहीं करने तथा वजू की उचित व्यवस्था से संबंधित है। सिविल जज ने उस स्थान को सील करने का आदेश दिया था और 17 मई को उच्चतम न्यायालय ने उसे जारी रखा था। नमाज के लिए सुरक्षा सुनिश्चित करने का आदेश देते हुए भी उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि शिवलिंग के दावे वाली जगह की सुरक्षा सुनिश्चित हो। पीठ ने जिला  प्रशासन से कहा है कि अगर मस्जिद में वजू का उचित इंतजाम न हो तो वह पक्षकारों से विचार-विमर्श करके वजू का उचित इंतजाम कराए। यानी वजू का इंतजाम भी दोनों पक्षों की सहमति से करना है। सील होने के बाद वाले शुक्रवार को वहां नमाज हुआ ,जिसमें भारी संख्या में लोग उपस्थित थे और किसी ने नहीं कहा कि वजू की व्यवस्था नहीं है। इसलिए यह अध्याय तत्काल बंद हो जाना चाहिए। हालांकि उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद मस्जिद पक्ष द्वारा सिविल प्रोसीजर कोड के तहत दायर अर्जी पर प्राथमिकता के आधार पर जिला न्यायाधीश सुनवाई करेगा। यह उसका तीसरा आदेश है ।  अंजुमन इंतजामियां मस्जिद ने पूजा स्थल कानून,  1991 का हवाला देते हुए मुकदमा खारिज करने की मांग की है। यद्यपि उच्चतम न्यायालय ने इस कानून के संदर्भ में तात्कालिक व्याख्या दी है, बावजूद उसने जिला न्यायाधीश को सुनवाई रोकने का आदेश नहीं दिया । यहां भी ध्यान रखने की आवश्यकता है कि जिला न्यायाधीश का फैसला आने के बाद 8 हफ्ते तक उच्चतम न्यायालय का अंतरिम आदेश लागू रहेगा। यानी जो भी फैसला होगा उससे वहां की वर्तमान स्थिति में अंतर नहीं आएगा। शिवलिंग के दावे का स्थान सुरक्षित रहेगा, वजू के लिए दूसरी व्यवस्था रहेगी। किंतु जब उच्चतम न्यायालय ही इसको सुनवाई या धार्मिक स्वरूप के निर्धारण के रास्ते की बाधा नहीं मान रहा तो जिला न्यायाधीश अलग फैसला कैसे दे सकते हैं?

सर्वे में वजूखाने के अंदर मिली आकृति शिवलिंग की तरह दिखता है। विरोधी पक्ष का दावा है कि वह फव्वारा है। इसका निश्चय भी विशेषज्ञों द्वारा होगा और बगैर न्यायालय के आदेश के इसकी जांच नहीं हो सकती। जहां तक पुरातत्व विभाग द्वारा सर्वेक्षण का मामला है तो ज्ञानवापी में निचले न्यायालय ने इसका आदेश दिया था जिस पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रोक लगा दी थी। चूंकि उस पर अभी बहस चल रही है ,इसलिए उच्च न्यायालय ने रोक की अवधि 21 जुलाई तक बढ़ाई है। यानी वह पूरी होने के बाद फैसला होगा कि वहां पुरातत्व विभाग से सर्वेक्षण कराया जाए या नहीं। अगर उस स्थान के धार्मिक स्वरूप का निर्धारण होना है तो पुरातत्व विभाग का सर्वेक्षण चाहिए। यह मामला 1991 में दायर हुआ था। वाराणसी की जिला अदालत में अपील की गई थी कि वाराणसी में जहां ज्ञानवापी मस्जिद है वहां प्राचीन मंदिर बहाल करने की अनुमति दी जाए।

यह विचार उचित नहीं लगता कि उच्चतम न्यायालय के आने के बाद उच्च न्यायालय सुनवाई नहीं करेगा। उच्चतम न्यायालय का आदेश दूसरी याचिका पर है जिसका इससे लेना -देना नहीं है। दूसरी ओर कमिश्नर की सर्वे रिपोर्ट आ गई है जिसके बारे में अभी तक जितनी जानकारी है उसके अनुसार  सारे प्रमाण मंदिर होने के बताए गए हैं। सर्वे रिपोर्ट लीक करने के आरोप के बाद यद्यपि पहले एडवोकेट सर्वे कमिश्नर अजय मिश्रा हटा दिए गए फिर भी उन्होंने अपनी रिपोर्ट दे दी है । दोनों में काफी समानता है।

तो सभी मामलों का दारोमदार न्यायालयों के फैसलों पर टिका है। जब उच्चतम न्यायालय स्वयं धार्मिक स्वरूप के निर्धारण जैसा शब्द इस्तेमाल कर रहा है तो कम से कम ज्ञानवापी मामले का श्रृंगार गौरी पूजन से आगे अंतिम निर्धारण तक जाना निश्चित हो गया। मां श्रृंगार गौरी की नियमित पूजा अर्चना के साथ संपूर्ण ज्ञानवापी की मुक्ति के लिए संघर्ष करने वालों को न्यायालयों के आदेशों की मनमानी व्याख्या से विचलित होने की जगह धैर्य रखना चाहिए क्योंकि अब पूरा मामला वहां पहुंच गया है जहां नीचे से शीर्ष तक के न्यायालयों द्वारा फैसला आना निश्चित है। और न्यायालय साक्ष्यों के आधार पर ही फैसला देगा जैसा अयोध्या मामले में हुआ।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 110092, मोबाइल -98110 27208



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