शुक्रवार, 15 अप्रैल 2022

पाकिस्तान में अभी बहुत कुछ हो सकता है

अवधेश कुमार

पाकिस्तान में पीएमएलएन के नेता शाहबाज शरीफ 34 वें प्रधानमंत्री बन चुके हैं। उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद साफ हो गया था कि इमरान खान को प्रधानमंत्री पद से हटना पड़ेगा। स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रणाली का तकाजा था कि इमरान खान विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव का सामना करते। संसद में विपक्ष के आरोपों का जवाब देते तो संसदीय प्रणाली की अच्छी परंपरा शुरु होती। इसके विपरीत उन्होंने संसद की जगह टेलीविजन को जवाब देने का हथियार बनाया था। जिस ढंग से नेशनल असेंबली में विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव पारित हुआ वह लोकतंत्र की दृष्टि से हास्यास्पद था। सत्ता पक्ष का कोई एक व्यक्ति सदन में नहीं। नेशनल असेंबली के अध्यक्ष असद कैसर ने कह दिया कि इमरान खान से उनकी 30 साल की दोस्ती है ,इसलिए वे अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग नहीं कराएंगे। डिप्टी स्पीकर कासिम खान सूरी पहले ही अविश्वसनीय हो चुके थे। उच्चतम न्यायालय की टेढी नजर देखते हुए दोनों को इस्तीफा देना पड़ा। संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में अध्यक्ष सत्तारूढ़ पार्टी का होता है और उसके संबंध नेताओं से होते ही हैं। अध्यक्ष चुनने के बाद वह अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करता है न की पार्टी की वफादारी और दोस्ती निभाता है। किंतु पाकिस्तान का लोकतंत्र इसी तरह चलता है। आप देखिए डिप्टी स्पीकर कासिम खान सूरी ने विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव को खारिज कर दिया और कारण बताया कि यह विदेश की साजिश है। राष्ट्रपति ने इमरान खान की सलाह मानकर नेशनल असेंबली भंग कर दिया था। उच्चतम न्यायालय 48 घंटे के अंदर अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग कराने का आदेश न देता तो वहां चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो सकती थी। 

हालांकि पाकिस्तान के उच्चतम न्यायालय पर सेना, राजनीतिक सत्ता और मजहबी तत्वों का प्रभाव रहा है। इस बार या तो उस पर दबाव नहीं आया या फिर किसी अन्य कारण से उसने ऐसा फैसला किया। पाकिस्तान के लिए यह सामान्य स्थिति नहीं थी कि उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश की अवहेलना होती देख रात में ही सुनवाई के लिए न्यायालय खोल दिया था। राजनीतिक तनाव को देखते हुए केवल सुप्रीम कोर्ट ही नहीं इस्लामाबाद हाईकोर्ट भी खोला गया था ताकि कोई याचिका आए तो उसकी तत्क्षण सुनवाई की जा सके। अविश्वास प्रस्ताव पर ऐसे परिदृश्यों की कल्पना शायद ही किसी स्वस्थ लोकतंत्र में की जा सकती है। पूरे देश में टकराव जैसी स्थिति पैदा हो गई थी। लेकिन जिस तरह चारों और सुरक्षा व्यवस्था थी वह भी हैरत में डाल डाल रही थी। इस्लामाबाद के सभी रास्ते बंद कर दिए गए। हवाई अड्डों की भी सुरक्षा बढ़ा दी गई। अस्पतालों को हाई अलर्ट पर रख दिया गया। पुलिसकर्मियों की छुट्टियां रद्द कर दी गई। पुलिस अधिकारियों को इस्लामाबाद में ही रहने का आदेश दिया गया। जब इमरान सरकार का जाना निश्चित था तो ये सारी व्यवस्थायें कि किसने? सामान्यतः ऐसी स्थिति में उच्चाधिकारियों की भूमिका बढ़ जाती है। लेकिन इतना सब कुछ यूं ही नहीं हो सकता। आने वाले समय में इन सबका खुलासा होगा। ऐसा लगता है कि इमरान ने पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान में अपने विरोधियों की संख्या ज्यादा ही बढ़ा लिया था।

तत्काल विपक्ष की एकता से सरकार भले बन जाए लेकिन इसे पाकिस्तान के राजनीतिक संकट के टल जाने की उम्मीद नहीं की जा सकती। पीएमएल क्यू और एमक्यूएम जैसी पार्टियां सेना के प्रभाव में रही हैं। उन्होंने सेना के प्रभाव में ही 2018 में इमरान खान सरकार के गठबंधन में शामिल होना स्वीकार किया था। आगे भी वे किसी दिशा में जा सकते हैं। बिलावल भुट्टो जरदारी की पीपीपी और नवाज शरीफ की पीएमएलएन के बीच दोस्ती स्वाभाविक नहीं। इसलिए वह कितने दिन साथ रहेंगे कहना मुश्किल है। इमरान आए तो सत्ता में सेना और कट्टरपंथियों के समर्थन से लेकिन अपने को बाहर स्वतंत्र दिखाने की बेवकूफी में उन्होंने सेनाध्यक्ष को नाराज कर दिया। सेनाध्यक्ष कमर जावेद बाजवा के सेवा विस्तार के बारे में कह दिया कि अभी उस पर विचार नहीं किया। आई एस आई प्रमुख की नियुक्ति में भी उन्होंने सेना की अनुशंसा को स्वीकार करने में देर कर दी। देश की आर्थिक हालत खराब हो ही रही थी। अमेरिका ही नहीं एक समय के मित्र इस्लामी देशों सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की 

नाराजगी के कारण इमरान की स्थिति खराब हो रही थी। विपक्ष के नेताओं के विरुद्ध कानून एजेंसियों ने जैसी बेरहमी की उससे उनके बीच एकजुटता पैदा हो गई। ऐसा लगता है कि परिवर्तन कराने में सेना ने प्रत्यक्ष न सही परोक्ष भूमिका अवश्य निभाई है। इमरान खान के इस्तीफा के पहले कमर जावेद बाजवा ने उनसे मुलाकात की। उसके पहले पाकिस्तानी मीडिया के एक समूह में खबर चल गई कि इमरान बाजवा को बर्खास्त करने वाले हैं। इमरान ने इसका खंडन करते हुए कहा कि वे सेना के मामले में हस्तक्षेप नहीं करते। बाजवा की मुलाकात का अर्थ यही लगाया जा रहा है कि उन्होंने उन्हें इस्तीफा देने के लिए कहा होगा। इसमें आगे होगा क्या इसके बारे में निश्चित आकलन नहीं किया जा सकता। यह पाकिस्तान है जहां कब क्या हो जाए कहना कठिन है। अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा वहां की राजनीति में भी महसूस की जा सकती है।

शहबाज शरीफ पंजाब के मुख्यमंत्री रहे हैं और प्रशासन का उन्हें अनुभव है। किंतु उनकी सरकार भी पीपीपी और अन्य दलों के समर्थन पर टिकी होगी। इनके अंदर इमरान के विरुद्ध इतना गुस्सा है कि वे प्रतिशोध में विरोधी नेताओं के दमन की पाकिस्तानी परंपरा को आगे बढ़ा सकते हैं। आज पाकिस्तान का कोई पूर्व प्रधानमंत्री अपने देश में नहीं है। या तो वे विदेशों में निर्वासित जीवन जी रहे हैं या मार दिए गए। इमरान ने अंतिम समय में यही समझौता करने की कोशिश की कि उनके और मंत्रिमंडल के उनके साथियों के विरुद्ध मुकदमा न किया जाए। उन्होंने कहा भी कि उन्हें जेल में डाला जा सकता है। ऐसा हो सकता है। इमरान के शासनकाल में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ जेल में डाले गए।  एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश ने पिछले दिनों खुलासा किया कि उनके विरुद्ध बिल्कुल गलत फैसला दिया गया। परवेज मुशर्रफ लंबे समय से निर्वासित जीवन जी रहे हैं। आम धारणा यही है कि उनके विरुद्ध न भ्रष्टाचार का कोई आरोप साबित होने वाला है न अपराध का। उन पर मुख्यतः संविधान के गला घोंटने का आरोप है और वह भी आपातकाल लगाने के कारण। वे न्यायालय का सामना करना चाहते थे लेकिन परिस्थितियां ऐसी बना दी गई कि उनके पास देश छोड़कर जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। उनके कार्यकाल के प्रधानमंत्री सब बाहर है। नवाज शरीफ के शासनकाल में ही बेनजीर भुट्टो को लंदन में निर्वासित जीवन जीना पड़ा और उनके पति आसिफ अली जरदारी तथा अनेक अन्य नेता जेल में बंद रहे। यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी भी तब पीपीपी नेता के रूप में जेल में रहे। हालांकि इस समय वहां का न्यायालय जितना एक्टिव है उसमें पहली नजर में कोई उम्मीद कर सकता है कि अगर सरकार ने इमरान और उनके साथियों के विरुद्ध गलत तरिके से कानूनी कार्रवाई की तो न्यायपालिका से उन्हें न्याय मिल सकता है। किंतु न्यायपालिका की भूमिका ही वहां संदिग्ध रही है। विपक्ष ने भ्रष्टाचार का आरोप सरकार पर लगाया है तो और उसकी जांच के लिए कदम उठाए जाएंगे और संभव है मुकदमे दर्ज हो। अगर इमरान खान गिरफ्तार नहीं होते और संसद में विपक्ष के नेता के रूप में उपस्थित रहते हैं तो पाकिस्तान की राजनीति में नई शुरुआत हो सकती है क्योंकि किसी पूर्व प्रधानमंत्री ने वहां विपक्ष के नेता की भूमिका नहीं निभाई है। तो देखना होगा कि वहां की अगली तस्वीर कैसी बनती है। 

भारत के लिए घटनाओं पर नजर रखने और भविष्य की दृष्टि से चौकस रहने का ही एकमात्र विकल्प है। शाहबाज शरीफ ने प्रधानमंत्री बनने के पहले ही कह दिया कि कश्मीर मसला जब तक नहीं सुलझता तब तक भारत से बातचीत नहीं होगी। ऐसा लगता है जैसे भारत ने पाकिस्तान से बातचीत की दरख्वास्त की हो। इमरान खान ने अंतिम समय में भारत की विदेश नीति की काफी प्रशंसा की तो मरियम नवाज ने कहा कि उन्हें भारत में ही बस जाना चाहिए। जब नई सरकार आने के पहले ही भारत विरोधी अलाप शुरू हो गया है तो आगे क्या करेंगे। इमरान हो या शाहबाज या अन्य कोई भारत की अनुकूलता की दृष्टि से तत्काल मौलिक अंतर आने की संभावना नहीं दिखती । 

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल- 98110 27208



शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

मोदी विपक्ष के लिए अपराजेय और पार्टी के लिए अपरिहार्य हो गए हैं

अवधेश कुमार 

राकांपा प्रमुख शरद पवार का यह बयान वैसे तो सामान्य है कि वे मोदी या भाजपा विरोधी किसी गठबंधन का नेतृत्व नहीं करेंगे लेकिन गठबंधन बनता है तो मदद करेंगे।  अनेक विरोधी नेता सत्ता से भाजपा को हटाना चाहते हैं लेकिन नेतृत्व की दावेदारी से बचते हैं। क्यों ? उन्हें उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम नरेंद्र मोदी को लेकर जनता की सोच का धीरे-धीरे एहसास हो गया है। चुनाव चाहे केंद्र का हो ,राज्य का या स्थानीय निकाय का ,मोदी सबसे बड़े मुद्दे के रूप में सर्वत्र उपस्थित हैं। यह असाधारण स्थिति है जो देश में पिछले छह दशकों से ज्यादा समय से नहीं देखा गया। आखिर मोदी में ऐसा क्या है जिससे ऐसी स्थिति पैदा हुई? थोड़ी गहराई से देखें तो नजर आएगा की नरेंद्र मोदी जब केंद्रीय सत्ता की दावेदारी में सामने आए थे तब उनके पक्ष और विपक्ष दोनों में लहर की स्थिति थी। पिछले आठ वर्षों में विरोध की लहर कमजोर हुई और पक्ष की मजबूत। इसका मतलब विपक्ष कमजोर हुआ तथा विरोधियों के एक बड़े समूह की धारणा मोदी को लेकर बदल गई। कुछ वर्ष पहले आप जहां जाते मोदी समर्थकों के साथ विरोधी भी उसी आक्रामकता से सामने आ जाते थे। आज मोदी का विरोध होता है लेकिन उसमें आक्रामकता ही नहीं संख्या बल भी वैसी नजर नहीं आती। ज्यादातर विरोध औपचारिक होकर रह गए हैं। यह स्थिति केवल देश में नहीं विदेशों में भी है।

एक नेता ,जिसे देश और विदेश के विरोधियों ने महाखलनायक बना कर पेश किया वह धीरे-धीरे अपने कार्यों और भाषणों से इतनी बड़ी संख्या में लोगों का हृदय बदलने में कामयाब हुआ है तो इसे असाधारण परिवर्तन कहना ही मुनासिब होगा। भाजपा के लिए इसके पहले कोई नेता इस तरह अपरिहार्य नहीं माना गया। 

पिछले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में आप जहां भी जाते मोदी का नाम सबसे ज्यादा सुनने को मिलता। ऐसे मतदाताओं की संख्या भी काफी थी जो कह रहे थे कि इस चुनाव में हम भाजपा को वोट नहीं देंगे लेकिन 2024 में मोदी हैं इसलिए उनके समर्थन में वोट जाएगा ही । इसका अर्थ यही है कि विधानसभा चुनाव में अगर भाजपा का ग्राफ किसी राज्य में पहले से कमजोर हुआ है तो उससे 2024 के अंकगणित का आकलन करना नासमझी होगी। घोर विरोधी भी यह मानने को विवश है कि मोदी को हटा पाना टेढ़ी खीर है। विरोधियों की समस्या है कि वे हमेशा नरेंद्र मोदी का आकलन अपनी एकपक्षीय विचारधारा के चश्मे से करते हैं और यही विफल हो जाते हैं। आप देश के किसी भी आदिवासी मोहल्ले में चले जाइए और पूछिए कि किसे वोट दोगे तो बिना सोचे स्त्री-पुरुष सब बोलेंगे कि मोदी को। उन सबकी आवाज ऐसी मुखर होती है कि जिन्हें मोदी के आविर्भाव के बाद समाज के मनोविज्ञान में आए परिवर्तनों का आभास नहीं हो वे दंग रह जाएंगे। दूसरी ओर आप  बुद्धिजीवियों ,पेशेवरों ,वैज्ञानिकों, सैनिकों ,किसानों ,मजदूरों ,कारीगरों, टैक्सी चालकों,  रिक्शा चालकों आदि के बीच जाएं तो उनके मुंह से भी मोदी समर्थन की आवाज निकलती है। महाविद्यालय -विश्वविद्यालय ही नहीं, स्कूली छात्रों के बीच  जाइए तो वहां भी मोदी को लेकर रोमांच भाव दिखाई देता है। उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान यादव समूह मुख्यतः सपा के पक्ष में था। लेकिन उनमें भी ऐसे लोग मिलते थे जो कहते थे कि मैं तो मोदी का समर्थन करना चाहता हूं लेकिन प्रदेश का माहौल ऐसा है कि मेरा वोट माना ही नहीं जाएगा। एक सेना का नौजवान मुझे मिला जिसने कहा कि मैं तो मोदीवादी हूं, क्योंकि मुझे मालूम है कि सेना और रक्षा के लिए उन्होंने क्या किया है लेकिन हमको सपा समर्थक बना दिया गया है। यह उदाहरण बताने के लिए पर्याप्त है कि मोदी किस तरह उन लोगों के दिलों दिमाग पर राज कर रहे हैं जिनकी अपनी कोई निश्चित दलीय निष्ठा या विचारधारा नहीं है।

वास्तव में नरेंद्र मोदी ने अपना बहुआयामी प्रतिभाशाली व्यक्तित्व प्रमाणित किया है। ऐसा नहीं है कि उन्होंने हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की विचारधारा से समझौता किया जिससे विरोधी भी समर्थक बने। इसके उलट हिंदुत्व और राष्ट्रवाद पर पहले की भाजपा  सरकारों की नीतियों से ज्यादा स्पष्ट और मुखर होते हुए आम आदमी के कल्याण, विकास की सोच तथा विदेश व रक्षा नीति के बीच मोदी ने अपने कार्यों से संतुलन बनाया है। मोदी को हिंदुत्व का हीरो मानने वाले प्रसन्न और संतुष्ट हैं तो दूसरी ओर उन्हें देश की रक्षा व विकास से लेकर विदेशों में भारत की धाक जमाने की उम्मीद करने वाले भी। कृषि कानून विरोधी आंदोलन के दौरान भले सतह पर दिखाई नहीं दिया लेकिन देश में कहीं चले जाइए आंदोलनकारियों के विरोध में आम किसान भी गुस्से में बोलते मिलते थे और उनके मन में मोदी के प्रति अपार सहानुभूति का भाव झलकता था। जिन्हें विरोध करना है वो भले स्वीकार न करें, देश और विदेश का बहुमत इसे स्वीकार करता है। जरा सोचिए,  विपक्ष यदि महंगाई का मुद्दा उठाता है तो भारी संख्या में लोग कहते हैं कि हम महंगे तेल लेंगे लेकिन वोट मोदी को ही देंगे। ये सारे लोग न तो विक्षिप्त हैं न अज्ञानी और न ही उनकी जेबों पर महंगाई का दबाव नहीं पड़ता। उनका विश्वास है कि देश और हम मोदी के हाथों ज्यादा सुरक्षित हैं।

आलोचक कहते हैं कि मोदी भाषण अच्छा देते हैं और लोगों को सम्मोहित कर लेते हैं। थोथे शब्दों से कोई इतने लंबे समय तक जनता का ऐसा विश्वास हासिल नहीं कर सकता। जो देश गुजरात के मुख्यमंत्री रहते मोदी का बहिष्कार कर रहे थे वहां के नेता वैसी प्रशंसा कर रहे हैं जो हमारे यहां उनके समर्थक भी नहीं करते। दुनियाभर में फैले भारतवंशियों के अंदर मोदी का क्रेज अभूतपूर्व है। केवल भाषणों से ऐसा नहीं हो सकता। हालांकि सच यह है कि विरोधियों की तरह मोदी के समर्थकों में भी बहुतायत ऐसे ही लोग हैं जो संपूर्णता में उनका मूल्यांकन नहीं करते।  आखिर एक साथ समाज के निचले तबके से लेकर ऊपर तक ,अनपढ़ से बुद्धिजीवी, सामान्य कारीगर, रिक्शा चालक से लेकर वैज्ञानिक और नौकरशाह तथा विदेशों के भारतवंशी एवं दूसरे देशों के नागरिक, नेता ..सब मोदी के बारे में इतनी सकारात्मक धारणा क्यों रखते हैं इसका अगर गहराई से अध्ययन किया जाए तो उत्तर मिल जाएंगे। सोचिए इसके पहले किस प्रधानमंत्री ने मन की बात में ऐसे छोटे-छोटे मुद्दों और विषयों को उठाया जो हमारी आपकी जिंदगी से सीधे जुड़ीं हैं? परीक्षा पर चर्चा करते और छात्रों के प्रश्नों का विस्तार से उत्तर देते हुए कौन नेता देखा गया? उपग्रह प्रक्षेपण के समय अंतरिक्ष केंद्र में उपस्थित रहने का रिकॉर्ड पहले भी है लेकिन विफल हो जाने के बाद वहां जाकर वैज्ञानिकों को साहस व संबल देने का ऐसा कार्यक्रम पहले नहीं देखा गया। 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन देने की योजना से देश में विवेकशील वर्ग सहमत नहीं, पर अनाज होते हुए भी गरीबों को मुफ्त पहुंचा देने का कार्य पहले तो नहीं हुआ। किसने किसानों के खाते में राशि पहुंचाई? धारा 370 हटाने के कट्टर समर्थक भी कल्पना नहीं करते थे कि उनकी जिंदगी में वे इसे साकार होते देखेंगे। अयोध्या में मंदिर निर्माण हो ही जाएगा इसकी भी कल्पना नहीं थी। मोदी ने यह नहीं सोचा कि अयोध्या मंदिर निर्माण के फैसले के बाद तुरंत ट्रस्ट बनाकर निर्माण प्रक्रिया शुरू कराने, स्वयं भूमि पूजन में जाने तथा इसी तरह काशी विश्वनाथ का पुनर्निर्माण करने और वहां उद्घाटन में जाने का मुस्लिम देशों की सोच पर क्या प्रभाव होगा। वे यह सब करते हुए भी निकट के मुस्लिम देशों से अच्छा संबंध बनाए हुए हैं।  आप काशी विश्वनाथ धाम में चले जाइए आपको अंदर अनेक लोग कहते हुए मिल जाएंगे जियो मोदी ..मोदी जिंदाबाद। अयोध्या श्रीराम के दर्शन कर लौटते समय लोगों के ऐसे ही शब्द आपको सुनने को मिल जाएगा। उनको वोट न देने वाले अनेक मुस्लिम मिल जाएंगे जो कहेंगे कि मोदी के कारण उनका जीवन चल रहा है। ऐसा नहीं है कि मोदी को एक सुगठित और सशक्त भाजपा विरासत में मिला था। अंतर्कलह का शिकार एवं तेजी से लोकप्रियता खोती भाजपा विरासत में मिला था। इसमें दो राय नहीं कि संघ परिवार एक व्यापक संगठन है और चुनावी सफलता में उन सबकी शक्ति का योगदान है। यही ताकत पहले भी थी और भाजपा की लोकप्रियता लगभग खत्म हो रही थी। एक साथ पार्टी को संभालना, यानी संगठन कौशल, नेतृत्व के स्तर पर प्रदेश से देश सही लोगों की तलाश ,विचारधारा की पटरी पर पार्टी को लौटाना, उसे क्षमायाचना मुद्रा से बाहर ले जाना और सबके साथ सरकार में देश के अंदर और बाहर संतुलन बनाते हुए नेतृत्व करना असाधारण प्रतिभा का प्रमाण है। विपक्ष में इस तरह प्रतिभा का धनी कोई नेतृत्व सामने आए तभी लगेगा कि मोदी को वास्तविक चुनौती मिली है।

अवधेश कुमार,ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 110092, मोबाइल -98910 27208



सोमवार, 4 अप्रैल 2022

आम आदमी पार्टी, वैशाली ने चलाया सदस्यता अभियान

 

आज दिनांक 04 अप्रैल को महनार विधानसभा प्रभारी डॉ. विपिन कुमार के मार्गदर्शन एवं महनार छात्र संघ प्रखंड प्रभारी अभय कुमार साह की अध्यक्षता में लावापुर नारायण (महनार) में आम आदमी पार्टी के सदस्यता अभियान चलाया गया, जिसमें काफी लोगों ने पार्टी की विचारधारा से प्रभावित होकर पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। लोगों को पार्टी की टोपी पहनाकर पार्टी की सदस्यता दिलाई गई।

इस कार्यक्रम में बबी कुमार, पंकज कुमार पासवान, अंकित राज, विद्यम कुमार, ललन कुमार, अभिनाश कुमार, राहुल कुमार, रोहित कुमार, रंजीत कुमार, निखिल कुमार, राजा कुमार, ज्ञानतोष कुमार, विकाश कुमार, अशोक कुमार राय इत्यादि कार्यकर्ता मौजूद रहे।

रविवार, 3 अप्रैल 2022

थियेटर का आरंभ सभ्यता के आरंभ के साथ ही हो गया था: पद्मश्री डीपी सिन्हा

 - वरिष्ठ पत्रकार अमित कुमार को मिला बेस्ट क्रिटिक अवार्ड

- कृति जैन को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से किया गया सम्मानित

नई दिल्ली। थियेटर का आरंभ सभ्यता के आरंभ के साथ ही हो गया था। जब बच्चा आंख खोलता है उसी के साथ अभिनय करना शुरू कर देता है। इसलिए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि थियेटर का जन्म सभ्यता के जन्म के साथ ही हुआ है। यह बात साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता पद्मश्री दया प्रकाश सिन्हा  (डीपी सिन्हा) ने दिल्ली के मुक्तधार सभागार में आयोजित '14वे नटसम्राट थियेटर अवार्ड' वितरण समारोह में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े प्रतिष्ठित विभूतियों को सम्मानित करते वक्त कही। इस मौके पर हिंदी दैनिक 'राष्ट्रीय सहारा' के वरिष्ठ संवाददाता अमित कुमार को वर्ष 2022 के लिये बेस्ट क्रिटिक अवार्ड से नवाजा गया तो दूसरी ओर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) की पूर्व निदेशक कृति जैन आदि को सम्मानित किया गया। इस मौके पर जयवर्धन (जेपी सिंह) द्वारा रचित हिंदी राजनीतिक व्यंग्य नाटक 'खैरातीलाल का कुर्सी तंत्र' का विमोचन भी किया गया।
इस मौके पर कृति जैन ने नटसम्राट के निदेशक श्याम कुमार को पिछले 19 वर्षों से लगातार अपने बल बूते थियेटर करने के लिए बधाई दी तो दूसरी ओर वैसे लोगों को सम्मानित करने के लिए भी बधाई दी जो पर्दे के पीछे रहते हुए लगातार रंगमंच को समृद्ध कर रहे हैं। अमित कुमार ने कहा कि यह हर किसी को अपना काम लगन और ईमानदारी से करते रहना चाहिए एक न एक दिन उसका फल जरूर मिलता है। यह नही सोचना चाहिए कि कोई आपके काम का आंकलन नही कर रहा है। कही न कही कोई न कोई आपके काम का आंकलन करता है और उसका प्रतिफल इस तरह के पुरस्कार का मिलना है। वैक स्टेज संगीत के लिए पुरस्कार पाने वाले जमील खान ने कहा ने बताया कि उनकी पांच पीढियां 'नक्कारे' बजाने का काम करती आ रही है। पहले नौटंकी में बजाते थे तो वहां बंदिशें नही थी लेकिन थियेटर में आने के बाद पता चला कि यहां आपको एक सीमा में ही काम करना है और इसे मैने एक छात्र की तरह सीखता रहा। 
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल के प्रमुख और सहायक प्राध्यापक शान्तनु बोस को इस साल का सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का सम्मान मिला है। श्री बोस ने सम्मान ग्रहण करने के बाद इतने भावुक हो गए कि उनकी आंखों से आंसू इस लिये निकल गए कि वर्षो से रंगमंच करते आने के बाद भी आज तक बंगाली थियेटर से कोई पुरस्कार नही मिला। पुरस्कार के लायक हिंदी थियेटर वालों ने समझा और सम्मान दिया। इस मौके पर सर्वश्रेष्ठ लेखक का सम्मान अनीस आजमी को, सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए मनीष मनोजा, सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए दक्षा शर्मा को तथा डॉ. जीतराम भट्ट को थियेटर प्रमोटर के लिए सम्मानित किया गया। सम्मान स्वरूप प्रत्येक को शॉल, प्रतीक चिन्ह और बुके भेंट किया गया।

शनिवार, 2 अप्रैल 2022

आशीर्वचनम चाइल्ड केयर फाउंडेशन का निशुल्क शिक्षा केंद्र ज्वाला नगर शाहदरा में खोला गया


आज दिनांक 2 अप्रैल 2022 को नवरात्रि एवं नव वर्ष के शुभ अवसर पर आशीर्वचनम चाइल्ड केयर फाउंडेशन द्वारा निशुल्क शिक्षा केंद्र ज्वाला नगर शाहदरा में खोला गया जिसमें फ्री बेसिक कंप्यूटर, फ्री बेसिक इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स, फ्री स्किल डेवलपमेंट एवं फ्री ट्यूशन को पढ़ाया जाएगा। 
संस्था के संस्थापक अमन कुमार जी ने बताया कि वह भविष्य में भी ऐसे कई शिक्षा केंद्र बच्चों की शिक्षा के लिए फ्री शिक्षा केंद्र समर्पित करेंगे जिससे कि बच्चों को उचित शिक्षा मिल सके और एक सुदृढ़ समाज का निर्माण हो सके आज शिक्षा केंद्र का शुभारंभ आदरणीय पूनम अम्मा जी एवं जयप्रकाश शर्मा जी के कर कमलों द्वारा किया गया जिसमें कई बच्चे उपस्थित रहे और उनको संस्था द्वारा कॉपी पेन पेंसिल स्टेशनरी का सामान बाटा गया कार्यक्रम में मुख्य रूप से रितेश शर्मा, सचिन दूबे, उज्जवल बंसल, लोकेश गर्ग, तरुण गुप्ता, अंकित पाठक, संतोष कुमार, धर्मराज चौधरी अशफाक, शिवम, शोएब, अभिषेक, अरविंद आदि प्रमुख कार्यकर्ता गण उपस्थित थे
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