शुक्रवार, 10 जनवरी 2020

जेएनयू की भयावहता

 

अवधेश कुमार

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय या जेएनयू का दृश्य किसी भी विवेकशील व्यक्ति को अंदर से हिला देने वाला है। विश्वविद्यालय परिसर में भारी संख्या में नकाबपोश लाठी-डंडों, हॉकी स्टिक आदि लेकर छात्रों, शिक्षकों पर हमला कर दें, छात्रावासों में तोड़फोड़ करें, कुछ घंटों तक उनकी हिंसा जारी रहे और फिर आराम से भाग जाएं यह सब सामान्य कल्पना से परे है। जिस तरह के वीडियो दिख रहे हैं उनसे लगता ही नहीं है कि यह जेएनयू के स्तर का कोई विख्यात विश्वविद्यालय है। अब पुलिस सक्रिय है, प्राथमिकी भी दर्ज हो गई है। उम्मीद करनी चाहिए कि छानबीन निष्पक्ष होगी और दोषी पकड़े जाएंगे। हां, हम केवल उम्मीद ही कर सकते कर सकते हैं क्योंकि जिस तरह की राजनीति इस हिंसा को लेकर हो रही है उसमें पुलिस पर भी दबाव बढ़ता है। एक स्वर में हिंसा की निंदा हो तो पुलिस निर्भीक और निष्पक्ष होकर जांच करती है लेकिन अगर एक समूह दूसरे पर हिंसा का आरोप मढ़े और दूसरा पहले पर तथा राजनीतिक दल भी कूद जाएं तो फिर दोषियों और अपराधियों का पकड़ा जाना कठिन हो जाता है। जेएनयू में विचारधारा को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद एवं वामपंथी संगठनों के बीच संघर्ष नया नहीं है। इस संघर्ष का अंत भी नहीं हो सकता। लेकिन वैचारिक संघर्ष विचारधारा तक ही सीमित होनी चाहिए थी। इसमें हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं। जैसे ही आप हिंसा करते हैं वैसे ही आप गुंडे और अपराधी हो जाते हैं। हिंसा करने वाले किसी भी विचारधारा के हो वे अपराधी ही माने जाएंगे। अगर तस्वीर यह बन जाए कि एक तरफ की हिंसा सही और दूसरे तरफ की गलत तो आप वैचारिक टकराव को हिंसक टकराव में बदलने से नहीं रोक सकते।

 जेएनयू में जो कुछ हुआ उनके बारे में कोई भी जिम्मेवार व्यक्ति बगैर जांच के निश्चित मत नहीं दे सकता। कारण, ऐसी हिंसा से किसी भी विचारधारा के संगठन को लाभ नहीं मिल सकता। इसलिए अच्छा हो कि छात्र संगठनों, शिक्षक समूहों और राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप से परे हटकर हम पुलिस की जांच रिपोर्ट की प्रतीक्षा करें। वास्तव में जेएनयू में जो कुछ भी हो रहा है वह कई पहलुओं पर हमें गंभीरता से विचार करने को मजबूर करता है। पिछले अक्टूबर में फीस वृद्धि को लेकर दोनों पक्षों के छात्र संगठनों ने आंदोलन किया था। वामपंथी संगठन और कांग्रेस से जुड़ा एनएसयूआई आंदोलन पर कायम रहा लेकिन विद्यार्थी परिषद यह आरोप लगाते हुए पीछे हट गया कि हमारी लड़ाई केवल फीस वृद्धि के खिलाफ है इसका राजनीतिकरण किए जाने से हम सहमत नहीं है। यह आंदोलन पिछले तीन महीनों से चल रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने फीस में कटौती भी की और अब इतना ज्यादा नहीं है कि आंदोलन को सही ठहराया जा सके। उसमें आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए भी प्रावधान किया गया। बावजूद अगर अहिंसक तरीके से कोई विरोध प्रदर्शन हो रहा है तो हम उसे रोकने के लिए बल प्रयोग की अनुशंसा नहीं कर सकते। लेकिन अगर आंदोलनरत समूह  कक्षाओं का बहिष्कार करें, परीक्षाओं का बहिष्कार करें और इसके लिए बलपूर्वक दूसरे छात्रों को भी मजबूर करें तो यह कानून को हाथ में लेना है। वामपंथी छात्र समूह सेमेस्टर परीक्षाओं के लिए रजिस्ट्रेशन को रोक रहे थे। प्रशासन ने रजिस्ट्रेशन के लिए ऑनलाइन व्यवस्था की तो इन्होंने सर्वर केंद्र पर कब्जा कर उसका तार काट दिया। जो छात्र रजिस्ट्रेशन करने जा रहे थे उनको जबरन भगाया जाता था। उनके साथ मारपीट भी हुई। विद्यार्थी परिषद के लोगों का कहना है कि जो छात्र रजिस्ट्रेशन कराना चाहते थे हम उनका समर्थन करते हैं और उनके साथ गए थे। जो नया वीडिया आया है उसमें जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष कुछ छात्रों का नेतृत्व कर रहीं हैं जिनके हाथों में डंडे हैं। वे पत्थर चलाते भी दिख रहे हैं। यानी जो दृश्य हमने पहले देखा वह पूरे प्रकरण का एक भाग है। वास्तव में इसे मिलाकर ही पूरे प्रकरण को देखा जाना चाहिए।

हालांकि तब भी हम पूरी जांच के बगैर अंतिम निष्कर्ष नहीं देना चाहते। यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि अगर कोई छात्र संगठन या कई संगठनों का समूह कक्षाओं को रोक रहा है, बलपूर्वक छात्रों को रजिस्ट्रेशन कराने से रोकता है, छात्रोः शिक्षकों को सरेआम डराता-धमकाता है, नेट के सर्वर सेंटर पर कब्जा कर लेता है तो उनके खिलाफ कानूनी तौर पर कार्रवाई करने में समस्या क्या है या थी? विश्वविद्यालय प्रशासन इतना दब्बू और कमजोर बार-बार क्यों नजर आता है कि कोई भी छात्र संगठन कानून हाथों में लेकर मनमानी करें और उसके खिलाफ कुछ न किया जाए? इससे पता चलता है कि जेएनयू के अंदर कितनी विकट और जटिल चुनौतियां पैदा हो गई हैं। यह स्थिति एक-दो दिनों में नहीं हुई है। वर्षों से वहां विचारधारा का टकराव चलता रहा है। जब एक पक्ष यानी विद्यार्थी परिषद काफी कमजोर था तकरार भी कम होते थे। वामपंथी समूह का वर्चस्व जेएनयू में लंबे समय से रहा है। एक समय ऐसा था जब कांग्रेस से जुड़े छात्र संगठन एनएसयूआई के साथ भी उनका टकराव होता था। भाजपा के शक्तिशाली होने के बाद एनएसयूआई वामपंथी छात्र संगठनों के सहयोगी की भूमिका में आ गई है। वैचारिक विभाजन छात्रों तक सीमित नहीं है। शिक्षकों, प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों सभी के बीच  वैचारिक विभाजन है। जेएनयू में जो यह ज्यादा दिखता है, क्योंकि वामपंथी उसे क्रांतिकारी विचारों के रक्षित केन्द्र मानते रहे हैं और दूसरे विचार का प्रसार उनको एकाधिकार तोड़ना लगता है। क्रांतिकारी एवं पंरगतिशील विचारधारा के नाम पर असामाजिक-उपद्रवी एवं मजहबी कट्टरपंथी तत्वों का वहां प्रवेश हो चुका है। हमने फरवरी 2016 में वहां भारत विरोधी नारे के दृश्य देखे थे। उसके बाद जेएनयू में क्या हुआ यह सबके सामने है। उससे यह साफ हो गया कि जेएनयू किस-किस तरह के अवांक्षित तत्वों का आश्रयस्थल एवं गतिविध्यों का केन्द्र बन चुका है। मकबूल बट्ट से लेकर अफजल गुरु तक की बरसी मनाना जेएनयू के अंदर घनीभूत हो चुके वैचारिक विकृति के ही प्रमाण थे। इन सबका अब वहां प्रखर और प्रभावी विरोध हो रहा हो। वर्तमान हमले और प्रतिहमले को देखने के बाद यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि असामाजिक और उपद्रवी तत्व प्रभावी हो चुके हैं।

 जितनी बड़ी संख्या में छात्रों को रजिस्ट्रेशन कराने से रोका गया, उनके साथ हिंसा हुई उससे नाराजगी है। अब यह साफ हो गया है कि दिन के आरंभ में रजिस्ट्रेशन का समर्थन करने के कारण विद्यार्थी परिषद के छात्रों पर हमले हुए जिनमें कई बुरी तरह घायल हुए। संभव है उन्होंने बाहर अपने संपर्क के लोगों को वहां की कठिनाइयां बताई हो और फिर जवाब में हमला हुआ हो।  दुर्भाग्य यह है कि भाजपा विरोधी पार्टियां जिस तरह से पूरे कांड को संघ परिवार द्वारा प्रायोजित बताकर आग में पेट्रौल डाल रहीं है उससे टकराव बढ़ेगा। इससे बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है कि अस्पतालों में घायल से मिलने में भी नेतागण यह देख रहे थे कि वे किस संगठन से जुड़े हुए हैं। विद्यार्थी परिषद के घायल कार्यकर्ता उनके लिए अछूत थे। विचार करने की जरुरत है कि कोई सत्तारूढ़ पार्टी हिंसा कराकर कौन सा लक्ष्य प्राप्त करेगी? दिल्ली की कानून व्यवस्था केंद्र सरकार के जिम्मे है तो वह जानबूझकर अशांति क्यों पैदा करना चाहेगी?  नौबत यहां तक आ गई है तो उसके लिए किसे दोषी ठहराया जाए इस पर विचार करना पड़ेगा ताकि इससे निपटा जा सके। अगर वामपंथी विचारधारा के छात्र समूह जेएनयू पर अपने वर्चस्व को अधिकार समझते हैं तो यह उनकी समस्या है। वामपंथी दल यदि यह मानते हैं कि वे संघ और भाजपा विरोध के नाम पर अपने छात्र समूहों के साथ खड़ा होकर हाशिए से फिर राजनीति की मुख्यधारा में आ सकते हैं तो इससे बड़ी नासमझी कुछ नहीं हो सकती। इससे हालात और खराब होंगे। तो फिर?

इस पर विचार करना जरूरी है कि इस तरह के टकराव को रोकने के लिए क्या किया जाए? यह केवल कानून और व्यवस्था का प्रश्न नहीं है। पुलिस की भूमिका कानून तोड़े जाने के बाद आरंभ होती है। कानून तोड़े जाने की पृष्ठभूमि को रोकने में मुख्य भूमिका विश्वविद्यालय प्रशासन, शिक्षकों, छात्रों और सामाजिक समूहों की ही हो सकती है। राजनीतिक दलों की भूमिका की हम अनुशंसा इसलिए नहीं कर सकते क्योंकि भाजपा के विरोध में मौका ढूंढने वाले राजनीतिक दल कभी नहीं चाहेंगे कि टकराव खत्म हो और सरकार को घेरने का अवसर उनके हाथ से निकल जाए। विचारधारा के स्तर पर असहमति और मतभेद खत्म नहीं हो सकता लेकिन यह दुश्मनी और शारीरिक हिंसा में न बदले इसका उपाय करना होगा। जो हिंसा कर रहे हैं उनके खिलाफ कार्रवाई हो। साथ ही ऐसे लोग, जो किसी राजनीतिक विचारधारा से नहीं जुड़े, आगे आएं, जेएनयू विश्वविद्यालय प्रशासन, छात्र संगठन, शिक्षक संगठन सभी से बातचीत करें, उनके बीच संवाद कराने की कोशिश हो। सबको समझाया जाए कि विचारधारा के संघर्ष का मतलब यह नहीं कि हम एक दूसरे के दुश्मन हो जाएं। संवाद की यह प्रक्रिया सतत् चले। जब भी टकराव की नौबत आए उनके बीच मध्यस्थता हो सके इसकी औपचारिक संस्थानिक व्यवस्था हो। जिनका ब्रेनवाश किया जा चुका है कि आरएसस-भाजपा हमारी दुश्मन है और उसको खत्म करना हमारा लक्ष्य वे शायद ही बदले। लेकिन कोशिश करने में क्या समस्या है।

अवधेश कुमार, ईः30 , गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः 9811027208

 

मंगलवार, 7 जनवरी 2020

रविवार, 5 जनवरी 2020

पाकिस्तान स्थित ननकाना साहब गुरुद्वारे हमले के विरोध में नेशनल अकाली दल का प्रदर्शन

 संवाददाता

  • पाकिस्तान सरकार उन बदमाशों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए जो इस पवित्र गुरद्वारे में बेअदबी में शामिल हैं - परमजीत सिंह पम्मा
  •  नेशनल अकाली दल ने इमरान खान का पुतला फूंक किया रोष प्रकट
नई दिल्ली। ननकाना साहब में हुए पथराव हुआ हमले के विरोध में सिखों का रोष लगातार बढ़ता जा रहे इसी को देखते हुए नेशनल अकाली दल  के कार्यकर्ताओं ने दल के अध्यक्ष परमजीत सिंह पम्मा की अगुवाई में जंतर मंतर पर पाकिस्तान के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया व पाकिस्तान के खिलाफ नारेबाजी गुरद्वारे में तोड़फोड़ की जैसे ही दल के कार्यकर्ता परमजीत सिंह पम्मा की अध्यक्षता में पाकिस्तान दूतावास की ओर बड़े पुलिस ने उन्हें बल का प्रयोग करके रोक लिया 0वहीं पर कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए  दल के अध्यक्ष परमजीत सिंह पम्मा ने कड़ी निंदा की और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की मांग की। 
परमजीत सिंह पम्मा ने कहा कि पाकिस्तान में श्री गुरु नानक देव जी के जन्मस्थान पवित्र ननकाना साहिब में जिस प्रकार हिंसा हुई है उसे सिख समाज कभी बर्दाश्त नहीं करेगा
पम्मा ने कहा लगातार पाकिस्तान में अल्पसंख्यक के ऊपर हमले बढ़ रहे हैं कभी वहां पर अल्पसंख्यक की बच्चियों को उठाकर जबरदस्ती निकाह कर लिया जाता है कभी उनके धार्मिक स्थलों पर हमला किया जाता है और पाकिस्तान सरकार सब कुछ मुखदर्शक बनकर देख रही है ऐसा लगता है यह सब पाकिस्तान सरकार की शह पर हो रहा है।
पम्मा ने कहा पाकिस्तान सरकार उन बदमाशों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए जो इस पवित्र गुरद्वारे में बेअदबी में शामिल हैं और जिन्होंने अल्पसंख्यक सिखों पर हमला किया है और वहां पर रह रहे सिख व अन्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के कड़े कदम उठाए जाएं।
इस अवसर पर बिंदिया मल्होत्रा, दलजीत सिंह चग्गर रश्मीत कौर बिंद्रा, जसविंदर सिंह सभरवाल, परविंदर सिंह सभरवाल, इंदरजीत सिंह अष्ट, बलविंदर सिंह सरना जसवीर सिंह सरना, मनजीत सिंह सहित अनेक लोग उपस्थित थे।

शनिवार, 4 जनवरी 2020

जनशक्ति पार्टी राष्ट्रीय के उम्मीदवार विक्रम पिव्हाल ने निकाली बाइक रैली

संवाददाता

पूर्वी दिल्ली। चुनाव अपने पूरे शबाब पर है और हर नेता अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए अपनी पूरी जान लगा रहे हैं। ऐसे ही त्रिलोकपुरी से जनशक्ति पार्टी राष्ट्रीय के उम्मीदवार विक्रम पिव्हाल ने अपनी पूरी विधानसभा में बाइक रैली निकाली। उन्होंने ने बताया कि यह बाइक रैली में आए लोगों की भीड़ बता रही है कि जनता का सपोर्ट मेरे साथ है। मैं अपनी जनता से वादा करता हूं कि मैंं नेता बनकर नहीं बेटा बनकर कार्य करूंगा।

यह बाइक रैली त्रिलोकपुरी दो ब्लॉक से शुरू हुई होकर पूरे त्रिलोकपुरी घूमते हुए अपने कार्यालय 23 ब्लॉक पर खत्म हुई। इस बाइक रैली में त्रिलोकपुरी विधानसभा के प्रत्याशी विक्रम पिव्हाल और उनके सैकड़ों कार्यकर्ता बाइक पर उनके समर्थन में लोगों से वोट मांग रहे थे।

 











शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

भविष्य उज्जवल समर्पित सेनानी निर्माण करे भाजपा

 

अवधेश कुमार

भाजपा के कार्यकर्ताओं और समर्थकों के साथ विरोधियों के अंदर भी यह भाव गहरा हो रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह दबाव में आ गए हैं। प्रधानमंत्री द्वारा रामलीला मैदान से एनआरसी पर लंबा स्पष्टीकरण देना तथा शाह द्वारा एक साक्षात्कार में कहना कि अभी एनआरसी पर काम नहीं हो रहा है तो उस पर चर्चा करने की क्या जरुरत है इसका प्रमाण माना जा रहा है। प्रधानमंत्री का वक्तव्य झारखंड चुनाव परिणाम के पूर्व का है तो गृहमंत्री का चुनाव परिणाम बाद का। नागरिकता संशोधन कानून का विपक्षी पार्टियों के विरोध से तो सरकार पर शायद ही कोई असर होता लेकिन हिंसा और उपद्रव ने लगता है  असर डाला। यह साफ हो गया है कि हिंसा कुछ सुनियोजित थी, कुछ झूठ और गलतफहमी पैदा करके उकसाने के कारण तो कुछ प्रायोजित। सरकार इससे निपटते हुए विपक्षी पार्टियों का राजनीतिक रुप से सामना कर रही थी झारखंड पराजय ने उसे निस्संदेह आघात पहुंचा दिया है। हालांकि केन्द्रीय नेतृृत्व को इसका अहसास था कि झारखंड की सत्ता जा रही है। इसीलिए जितना संभव था केन्द्र की ओर से क्षति कम करने की कोशिश हुई। जो भी हो झारखंड चुनाव परिणाम को नरेन्द्र मोदी सरकार के उन कार्यों से जोड़कर देखना बिल्कुल गलत है जो उसकी विचारधारा से जुड़े हैं। ऐसे अतिवादी विश्लेषण का यथार्थ से कोई लेना-देना नहीं है कि भाजपा के कदमों से उसके खिलाफ जनाक्रोश पैदा हो चुका है और उसका भविष्य में केन्द्र की सत्ता से भी जाना तय है।

 निस्संदेह, भाजपा के लिए चिंता की बात है कि लोकसभा चुनाव के बाद तीन राज्यों के चुनावों में किसी तरह एक राज्य हरियाणा में वह गठबंधन की सरकार बना सकी। हालांकि महाराष्ट्र में पहले से उसे कम सीटें अवश्य मिलीं, लेकिन शिवसेना गठबंधन के साथ उसे बहुमत प्राप्त हुआ था। हरियाणा में भी वह 40 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी तथा उसके विद्रोही छः निर्दलीय जीते जो बाद में साथ आ गए। झारखंड में भी उसे अकेले सबसे ज्यादा करीब 34 प्रतिशत वोट मिले हैं। उसकी सदस्य संख्या 34 लाख 77 हजार है जबकि उसे 50 लाख के आसपास वोट मिले हैं। इसलिए जिसे भाजपा के अवसान का गीत लिखने से संतोष मिल रहा हो वे लिखें। धरातली सच वह नहीं है। हां, भाजपा के लिए गंभीर आत्मचिंतन तथा सांगठनिक सुधारात्मक कदमों की आवश्यकता निश्चित रुप से पैदा हुई है। आत्मचिंतन भी उस मायने में नहीं जैसे विरोध बता रहे हैं। आत्मचिंतन इस मायने में कि यदि आप इतिहास का नया अध्याय लिखने के दृढ़ इरादे से आगे निकल चुके हैं तो फिर यह मत मानिए कि आसानी से ऐसा हो जाएगा। आपको अनेक झंझावात, तूफान, बाधाओं के साथ ऐसे-ऐसे आघात लग सकते हैं जो कि निराशा की चरम तक ले जाएं। अपने निर्णय पर अडिग रहते हुए इन सबसे जूझते हुए आगे बढ़ने की कोशिश करते रहनी होगी।

कोई यह कह दे कि भाजपा के खिलाफ जनमत इसलिए हो रहा है कि उसने एक साथ तीन तलाक के विरुद्ध कानून बना दिया, फिर आतंकवाद विरोधी कानून को पहले से ज्यादा सख्त किया, सबसे बढ़कर उसने कश्मीर से अनुच्छेद 370 का खात्मा कर उसका पूरा भूगोल और विधान बदल दिया और अब नागरिकता कानून तथा फिर भविष्य में एनआरसी की ओर जाने की घोषणा तो उस पर केवल हंसा जा सकता है। कुछ लोग तो यह भी कह रहे हैं कि अयोध्या मामले की तेजी से सुनवाई कर जिस तरह उच्चतम न्यायालय ने फैसला मंदिर के पक्ष मंे दे दिया उसमें भी नेपथ्य में सरकार की भूमिका थी और इससे अंदर ही अंदर एक समुदाय के अंदर आशंकायें पैदा हुईं। इनसे पूछा जाना चाहिए कि भाजपा का मायने क्या है? ये सारे कदम तो भाजपा की मूल विचारधारा से जुड़े हैं। इनको हटा दें तो फिर भाजपा नामक पार्टी की आवश्यकता ही नहीं है। भाजपा और इसका पूर्वज जनसंघ बना ही इन्हीं कार्यों के लिए था। सच यह है कि नरेन्द्र मोदी सरकार 1 में 2017 के उत्तरार्ध से कार्यकर्ता और नेता तक निराश होने लगे थे। जम्मू कश्मीर में जब उसने पीडीपी सरकार से अपने को अलग कर एक से एक कठोर कदम उठाना आरंभ किया तो फिर कार्यकर्ताओं-नेताओं में सरकार और पार्टी को लेकर उत्साह पैदा हुआ जो बालाकोट और फिर उपग्रहरोधी मिसाइल परीक्षण से सशक्त हुआ। अमित शाह के सरकार में आने के बाद से आम कार्यकर्ता, नेता और समर्थक की यही प्रतिक्रिया थी कि अब लग रहा है कि यह भाजपा की सरकार है। जिस तरह तीन तलाक विरोधी विधेयक पारित हुआ तथा 370 पर अमित शाह ने जैसे संसद का सामना कर पारित कराया उसने पूरे संघ परिवार को उनका एवं सरकार का कायल बना दिया।

मोदी और शाह को समझना होगा कि आप इस तरह के ऐतिहासिक विधान बनाते और कदम उठाते जाएंगे और आपका बहुआयामी विरोध नहीं होगा, विरोधी पार्टियों से लेकर वैचारिक रुप से नफरत पालने वाले लेफ्ट लिबरल एक्टिविस्ट, एनजीओ, विधिवेत्ता, जन समूह, संगठन, बुद्धिजीवी, पत्रकार, कट्रपंथी सांप्रदायिक मुस्लिम नेता सब एकदम आसानी से आपको काम करने देंगे यह संभव नहीं। बहुत सारे नामधन्यों का तो अस्तित्व ही खत्म होने के कगार पर आ गया है। उसमें बहुतों के लिए करो या मरो की स्थिति है। तो अलग-अलग तरीकों से नागरिकता कानून और एनआरसी को हथियार लेकर ये कूद पड़े हैं जिससे मोदी और शाह की जोड़ी को रोका जा सके। देश-विदेश मंे बदनाम करने से लेकर हर तरह से रोकने की कोशिश हो रही है। ऐसी स्थिति में दबाव में आने की जगह इसका मुकाबला करने की आवश्यकता है और देश भर में समर्थक सड़कों पर भारी संख्या में उतरकर जवाब दे रहे हैं। सच यह है कि जिस तरह का की हिंसा, विरोध और बयानवाजी सरकार के खिलाफ हो रही है उससे उसका समर्थन ज्यादा बढ़ रहा है। विधानसभा चुनावों में पराजय के कारण अलग थे। या आगे भी भाजपा विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाती तो उसे इससे जोड़कर देखा ही नहीं जा सकता।

किंतु भाजपा नेतृत्व के लिए गंभीर चिंता की बात है उनकी अपनी पार्टी संरचना। झारखंड सहित तीन विधानसभा चुनावों मंे जिस तरह टिकट न मिलने, या अपनी चाहत के उम्मीदवार की जगह दूसरे को टिकट मिल जाने के खिलाफ व्यापक पैमाने पर भाजपा नेता चुनाव में उतर गए या पार्टी उम्मीदवारों को पराजित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया वह खतरनाक संकेत है। तीनों राज्यों में भाजपा के कमजोर प्रदर्शन का सबसे बड़ा कारण यही था। किसी युद्ध में सेनापति आगे बढ़ जाए और सेना का एक हिस्सा पीछे आपस में ही लड़ते रह जाए तो फिर विजय नहीं मिल सकती। ऐसी ही स्थिति भाजपा की हो गई है। सेनापति यानी मोदी और शाह तो इतिहास निर्माण और विचारधारा पर काम करते हुए अंतिम लक्ष्य तक जाने के लिए दौड़ लगा चुके हैं लेकिन पार्टी के अंदर एक बड़े वर्ग को लगता है कि उसके लिए यह सब मायने तभी रखता है जब उसे पद मिले, चुनाव में टिकट मिले या वह जिसे चाहता है उसे पद और टिकट मिलेे। ऐसी सेना से आप इतिहास के नए अध्याय लिखने वाले युद्ध में विजय नहीं पा सकते। भाजपा पार्टी के रुप वाजपेयी जी के शासनकाल में क्षरित, दिग्भ्रमित और कमजोर हो चुकी थी। नरेन्द्र मोदी के आने से पूरे संगठन परिवार में उत्साह अवश्य पैदा हुआ और चुनावों में विजय मिलती गई पर पार्टी की सांगठनिक और वैचारिक पुनर्रचना का काम नहीं हो सका है। ऐसे समर्पित कार्यकर्ता और नेता फिर से तैयार करने की जरुरत है जिसके लिए राष्ट्र वाकई प्रथम हो, दल और सरकार का लक्ष्य प्राथमिकता में हो और निजी महत्वाकांक्षा गौण। पार्टी में इसकी क्षमता बनी हुई है। इसे हर हाल में करना होगा। किसी सूरत में जहां तक आगे बढ़ गए हैं उससे पीछे हटना आत्मघाती होगा। आज का सच यही है कि इस समय की राजनीति में राष्ट्रीय स्तर पर न कोई नेता नरेन्द्र मोदी और अमित शाह का मुकाबले है न कोई पार्टी ही भाजपा को बड़ी चुनौती देने की स्थिति में। इसलिए भविष्य भाजपा का ही है। 

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208

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