शनिवार, 20 जुलाई 2019

ऐसे वीडियो से भयभीत होेने की आवश्यकता नहीं

 

अवधेश कुमार

आतंकवादी संगठन अलकायदा प्रमुख अयमान अल जवाहिरी अचानक सामने आया है। अपने 14 मिनट के वीडियो में वह कश्मीर में आतंकवाद को हवा देने की कोशिश कर रहा है। वह कहता है कि कश्मीर को हमें नहीं भूलना चाहिए। मुजाहिद्दीन सेना एवं सरकार पर लगातार हमला करते रहे जिससे भारत की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो, क्योंकि कश्मीर अंतर्राष्ट्रीय जेहाद का अंग है। इस बात का विश्लेषण किया जा रहा है कि आखिर अल जवाहिरी एकाएक कश्मीर को लेकर सामने क्यों आया है? उसके वीडियो के साथ स्क्रीन पर आतकवादी जाकिर मूसा की तस्वीर अवश्य दिख रही है लेकिन उसने उसका एक बार भी नाम नहीं लिया। ध्यान रखने की बात है कि जाकिर मूसा को सुरक्षा बलों ने 23 मई को मौत के घाट उतार दिया था। जाकिर पहले हिज्बुल मुजाहिद्दीन का कमांडर था लेकिन उससे उसका मतभेद होता गया और उसने अंसार-गजवात-उल-हिंद की स्थापना की। इस संगठन को अल कायदा से जुड़ा माना गया और यह सच भी था। वस्तुतः जाकिर मूसा ने खुलकर यह ऐलान किया कि जम्मू कश्मीर में हमारी लड़ाई आजादी या पाकिस्तान में मिलने के लिए नहीं है। यह अंतर्राष्ट्रीय खिलाफत की लड़ाई है। हम इस्लामिक राज्य की स्थापना के लिए जेहाद कर रहे हैं। उसने हुर्रियत नेताओं को धमकी देते हुए कहा कि जो भी इससे परे बात करेगा उसे लाल चौक पर लटका देंगे। इसके पहले किसी आतंकवादी ने हुर्रियत नेताओं के बारे में ऐसी बात नहीं कही थी। सीमा पार स्थित आतंकवादी संगठनों ने इसका विरोध किया लेकिन जाकिर मूसा अपने मत पर अड़ा रहा। इससे पहला निष्कर्ष यह निकलता है कि अल कायदा ने इस क्षति के बाद जम्मू कश्मीर में फिर से अपने संगठन को खड़ा करने की पहल की है।

सामान्यतः यह निष्कर्ष गलत नहीं कहा जा सकता है। किंतु विचार करने वाली बात यह भी है कि आखिर जाकिर मूसा के मारे जाने के एक महीना 17 दिनों बाद अल कायदा के प्रमुख को इसकी याद क्यों आई? जाकिर मूसा के अंत के तुरत बाद अल कायदा कोई बयान जारी कर सकता था। इसका मतलब हुआ कि इनके बीच त्वरित सूचना तंत्र कमजोर हो चुका है जो संगठन के जर्जर होने का सबूत है। जाकिर मूसा के मारे जाने के काफी पहले 22 दिसंबर 2018 को सेना ने घोषणा की थी कि जाकिर मूसा गैंगा का सफाया किया जा चुका है। उस दिन कश्मीर घाटी में छः आतंकवादी मारे गए थे। ये सब जाकिर मूसा गिरोह के सदस्य थे एवं स्थानीय थे। इसके बाद जाकिर मूसा बचा हुआ था। यहां यह भी जानना जरुरी है कि जाकिर मूसा बुरहान वानी के बाद किंवदंती अवश्य बन गया था, प्रदर्शनों से लेकर आतंकवादियांे के जनाजे तक मंे उसने नारे लगते थे, पर वह कश्मीर में ज्यादा कुछ कर नहीं पाया। कुछ बड़े आतंकवादी उसके साथ आए अवश्य, पर पाकिस्तान तथा वहां सक्रिय आतंकवादी आकाओं के खिलाफ बोलने के कारण वह अलग-थलग था। यह बताना इसलिए जरुरी है, क्योंकि जवाहिरी के वीडियो देखकर कोई यह न माने कि अल कायदा की किसी तरह व्यापक उपस्थिति कश्मीर मंेे है। कुछ विश्लेषक यह मान रहे हैं कि पाकिस्तान इस समय इतने दबाव में है कि वह सीेधे कश्मीर में हस्तक्षेप नहीं कर सकता, इसलिए उसने हिंसा की आग भड़काने के लिए जवाहिरी को सामने लाया है। जवाहिरी इस समय कहां है इसके बारे में भी अलग-अलग मत हैं। संभव है ओसामा बिन लादेन की तरह वह भी पाकिस्तान में ही कहीं हो। अफगानिस्तान से तालिबानों के शासन के अंत के बाद से वह कहीं दिखा नहीं है। अमेरिका ने 11 सितंबर 2001 के हमले के लिए 21 सर्वाधिक वांछित आतंकवादियों की सूची में ओसामा के बाद उसे दूसरे स्थान पर रखा था। जवाहिरी ने अपने वीडियो पाकिस्तान पर भी तीखा हमला किया है। जवाहिरी ने कहा है किपाकिस्तानी सेना और सरकार केवल मुजाहिद्दीनों का विशेष राजनीतिक इस्तेमाल करने में रुचि रखती है। बाद में उन्हें उनके हाल पर छोड़ देती है या फिर उन पर अत्याचार करती है। उसने पाकिस्तानी सेना और सरकार को अमेरिका का चापलूस कहा है। जवाहिरी ने कहा कि जब अफगानिस्तान से रूसियों को निकालने के बाद अरब मुजाहिदीन कश्मीर की तरफ बढ़ने वाले थे तो पाकिस्तान ने उन्हें रोक दिया।

ऐसा लगता नहीं है कि पाकिस्तान इस समय जवाहिरी को सामने लाने की भूमिका अदा करेगा। आतंकवाद को लेकर भारत की कूटनीति के कारण वह भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव में है। बालाकोट कार्रवाई के बाद भारत की रणनीति तो उसके सामने है ही, एफएटीएफ द्वारा आतंकवाद के वित्तपोषण को रोकने के लिए पर्याप्त कदम न उठाए जाने के कारण उस पर काली सूची में डाले जाने का खतरा मंडरा रहा है। इसी महीने इमरान खान अमेरिका जाने वाले हैं। इसलिए पाकिस्तान इस समय जवाहिरी को सामने लाने की मूर्खता नहीं करेगा। हां, पाकिस्तान में एक वर्ग ऐसा है जो इनका समर्थक है एवं वे हरसंभव मदद कर रहे हांेंगे। किंतु इमरान सरकार ऐसी मूर्खता नहीं कर सकता। वैसे जाकिर मूसा ने भी ठीक दो साल पहले पाकिस्तान के बारे में ऐसा ही बयान दिया था। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव एवं अपनी आंतरिक स्थिति के कारण पाकिस्तान खुलकर पहले की तरह इनकी मदद करने की स्थिति में नहीं है। पिछले आठ जुलाई को पाकिस्तानी मीडिया में एक व्यक्ति के पकड़े जाने की खबर आई जो खैरात के नाम पर लोगों से धन इकट्ठा कर अल कायदा को भेजता था। पाकिस्तान के आतंकवाद रोधी विभाग (सीटीडी) ने आतंकवाद रोधी अधिनियम के तहत आतंकवाद को वित्तपोषण के आरोप में ह्यूमन कन्सर्न इंटरनेशनल नामक गैर-सरकारी संगठन के स्थानीय प्रमुख अली नवाज को गिरफ्तार किया। उसे आतंकवादी रोधी न्यायालय में पेश किया गया जिसने उसे सीटीडी की हिरासत में भेज दिया। हो सकता है इस तरह की और भी कार्रवाई हुई हो। पाकिस्तान के सामने इस समय दुनिया को ऐसी कार्रवाइयों का प्रमाण देने की मजबूरी है। पाकिस्तान हाफिज सईद तथा मसूद अजहर के खिलाफ कार्रवाई करने को मजबूर हुुआ है। जो खबर आ रही है उसके अनुसार ये सब अपना ढांचा अफगानिस्तान की ओर ले जाने की कोशिश कर रहे

वैसे आईएसआईएस के उभरने के बाद अल कायदा पूरी दुनिया में कमजोर हो गया। अल बगदादी पहले अल कायदा का ही सदस्य था। उसने अलग संगठन बनाया और उसका आकर्षण इतना हुआ कि अल कायदा की रीढ़ टूट गई। अल कायदा से प्रभावित संगठन उत्तरी अफ्रिका में जरुर सक्रिय हैं, लेकिन एक संगठन के रुप में वह इस समय अत्यंत कमजोर हालत में है। चूंकि आईएस अपने मुख्य केन्द्रों इराक एवं सीरिया में पराजित हो चुका है तथा उसके बचे-खुचे आतंकवादी बिखरे हुए हैं, इसलिए संभव है जवाहिरी ने उनको अपनी ओर खींचने तथा कश्मीर को जेहाद के मुख्य केन्द्र में लाने की रणनीति अपनाई हो। हमें हर ऐसी धमकी को गंभीरता से अवश्य लेना चाहिए, क्योंकि एक ओर कुरान और दूसरी ओर हथियार रखकर जेहाद के उसके आह्वान से कुछ युवाओं के भ्र्रमित होने का खतरा है। तो इस पर नजर रखनी है। किंतु इससे ज्यादा हमें चिंतित होने की आवश्यकता नहीं। अल कायदा के विचारों का समर्थन आधार तो होगा, लेकिन जवाहिरी के आह्वान पर युवा आतंकवादी बनकर लड़ने के लिए कूद पड़ेंगे इसकी संभावना न के बराबर है। वैसे भी गृह राज्यमंत्री ने संसद में जो बयान दिया उसके अनुसार स्थानीय आतंकवादियों की भर्ती में काफी कमी आई है। आईएस ने तीन वर्ष पहले ही खलीफा के साम्राज्य का एक नक्शा जारी किया था जिसमें जम्मू कश्मीर के साथ भारत के पश्चिमी भाग को शामिल किया गया था। उसने दक्षिण एशिया के लिए कमांडर की भी भर्ती की थी। बावजूद समय-समय पर प्रदर्शनांें में आईएस के झडा लहराने का उसका प्रभाव सुरक्षा बलों ने कश्मीर मंे होने नहीं दिया। इस समय ऑपरेशन ऑल आउट से कश्मीर में आतंकवादियों को मूलभूत आधार उपलब्ध करने वाले तत्वों को निष्प्रभावी करने की जिस तरह की कार्रवाई चल रही है उसमें अल कायदा का विस्तार कठिन है। जब तक पाकिस्तान खुलकर धन प्रदान न करें, आतंकवादियों के भर्ती, प्रशिक्षण और घुसपैठ कराने का सक्रिय ढांचा उपलब्ध न कराए किसी आतंकवादी संगठन के लिए कश्मीर में सशक्त संघर्ष संभव नहीं। पाकिस्तान चाहेगा जरुर कि कश्मीर ंमें आतंकवादियों की संख्या बढ़े, लेकिन इमरान सरकार के लिए पहले की तरह खुलकर ऐसा करना अभी संभव नहीं। वैसे भी कश्मीर का वातावरण बदल रहा है। सेना में भर्ती के लिए बारामुला में जितनी संख्या में नवजवान बाहर आए वह बदलते कश्मीर का एक छोटा प्रमाण जो है ही। गृहमंत्री अमित शाह ने अपनी यात्रा के दैरान पंचों एवं सरपंचों के प्रतिनिधियों से मुलाकात की तथा विकास कार्यों में उनकी सीधी भागीदारी का संकल्प बताया। अब केन्द्र से सीधे उनको विकास राशि जा रही है। सरकार उन लोगों तक पहुंच रही है जिन्हें सत्ता ने अभी तक हाशिए पर रखा था। तो एक साथ सुरक्षा ऑपरेशन,अलगाववादियों, भारत विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई तथा जनता तक सीधे पहुंचने की नीतियों के माहौल में नए सिरे से आतंकवादी संगठन प्रभावी नहीं हो सकते।

अवधेश कुमार, ईः30,गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

 

 

शुक्रवार, 19 जुलाई 2019

लीप्स एंड बाउंड फाउंडेशन ने समाजसेवियों को दूसरे सोशल फाइटर अवार्ड से सम्मानित किया


 
संवाददाता 
नई दिल्ली। भारत की प्रसिद्ध संस्था लीप्स एंड बाउंड फाउंडेशन ने अपने 2 वर्ष पूरे होने पर 19 जुलाई 2019 को दिल्ली के राजेंद्र भवन आईटीओ पर समाजसेवियों को दूसरे सोशल फाइटर अवार्ड से सम्मानित किया। इस कार्यक्रम में भारत एवं दिल्ली के कई समाजसेवी सम्मानित किए गए। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री प्रशांत रोहतगी (बब्बू खलीफा)(मुख्य संरक्षक दिल्ली रनिंग एसोसिएशन), प्रतीक पाठक (सचिव बाल आरोग्य), मोहित भीम पहलवान (संरक्षक कुश्ती जगत), मोहित नागपाल (मिस्टर यूनिवर्स), तृप्ति मिश्रा (उपाध्यक्ष), ज्योति पवार (महासचिव), निखिल कुमार (सचिव) ने इस कार्यक्रम को संबोधित किया।

मंगलवार, 16 जुलाई 2019

शुक्रवार, 12 जुलाई 2019

राहुल मानते ही नहीं कि पार्टी के संकट के कारण चुनाव हारे

 

इसमें कांग्रेस के उबरने की संभावना खत्म है

अवधेश कुमार

अगर संसद का सत्र नहीं होता तथा राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद छोड़ने का अपना साढे तीन पन्नों का पत्र ट्वीटर के माध्यम से सार्वजनिक नहीं किया होता तथा उसके बाद कर्नाटक से लेकर गोवा तक पार्टी संकट में नहीं आती तो काग्रेस घुप अंधेरे कमरे के सन्नाटे में छिपी नजर आती। लोकसभा के अलावा पार्टी की कोई गतिविधि थी तो यही कि जो भी कार्यकर्ता या नेता राहुल गांधी तक पहुंच पाते वे उन्हें अध्यक्ष पद पर बने रहने के लिए मनाने की कोशिश कर रहे थे। राहुल गांधी ने युवा कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ताओं से मुलाकात में जब कहा कि मुझे दुख इस बात का है कि मेरे इस्तीफा देने के बावजूद किसी नेता को अपनी जिम्मेवारी का अहसास नहीं हुआ तो उसके बाद हार की जिम्मेवारी लेने और इस्तीफा देने का सिलसिला आरंभ हुआ। जिस पार्टी के नेतृत्व मंडली की यह दशा हो उसके इतनी बड़ी पराजय के आघात से उबरकर फिर मुख्य धारा में आने तक पहुंचने की कल्पना कोई नहीं कर सकता।

हर संकट में सुअवसर अंतर्निहित होता है। प्रश्न है कि क्या कांग्रेस में संकट को अवसर में बदल देेने की क्षमता बची हुई है? अगर संकट के बहुआयामी कारणों को समझ कर उसे दूर करने के लिए संकल्प के साथ सही योजना से लगातार प्रयास किया जाए तो संभव है कांग्रेस धीरे-धीरे संकटों से मुक्त हो। किंतु उसका तरीका यह नहीं हो सकता कि राहुल गांधी एक लंबा-चौड़ा पत्र लिखकर कहें कि मैं अध्यक्ष नहीं हूं और इस्तीफा इसलिए दे रहा हूं क्योंकि हमारी पार्टी के भविष्य के लिए जवाबदेही महत्वपूर्ण है।  2019 की हार के लिए बहुत से लोगों को जिम्मेदार ठहराने की जरूरत है। ऐसे में यह बिल्कुल भी न्यायोचित नहीं है कि मैं दूसरों को जिम्मेदार ठहराता रहूं, और पार्टी अध्यक्ष के तौर पर अपनी जवाबदेही को नजरअंदाज करता रहूं। प्रथमदृष्ट्या सुनने में यह अच्छा लगता है कि आज भी कांग्रेस के सर्वमान्य नेता ने पराजय की जिम्मेवारी लेकर इस्तीफा दिया और उस पर अड़ा रहा। किंतु सच यही है कि 25 मई को जब कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई उसमें राहुल गांधी ने हार के लिए वहां उपस्थित नेताओं और मुख्यमंत्रियों को ज्मिमेवार ठहराया। प्रियंका बाड्रा ने कहा कि कांग्रेस की हत्या करने वाले इसी कमरे में मौजूद हैं। जो भी बड़े नेता अकेले या समूह में राहुल गांधी से मिलने आए उन सबके प्रति कठोर शब्दों में उन्होंने नाराजगी प्रकट की।

  इस समय कांग्रेस के सामने अध्यक्ष चुनने की चुनौती आ गई है। कांग्रेस एक परिवार पर नेतृत्व के लिए निर्भर रहने के कारण जिस अवस्था में आ गई है उसमें राहुल का इस्तीफा और उसके पीछे की सोच उसके संकट को बढ़ाने वाला है। ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में अध्यक्ष का चयन अत्यंत कठिन है। कई नामों पर चर्चा हो रही है। कांग्रेस का अध्यक्ष कौन होगा या होना चाहिए इसके जवाब के लिए हमें यह देखना होगा कि इस समय अध्यक्ष के रुप में कैसा व्यक्तित्व चाहिए? सबसे पहले तो वह ऐसा व्यक्ति हो जो समझ सके कि उसके सामने 2014 में अस्तित्व का जो संकट पैदा हुआ वह 2019 में ज्यादा गहरा हुआ है। दो, वह इतना दूरदर्शी हो कि संकट को सही परिप्रेक्ष्य में समझे। तीन, राजनीति की बदलती हुई धारा को देख पाए। चार, जनता या मतदाताओं का भारत को लेकर जो सामूहिक आकांक्षायें हैं, वो जिस प्रकार की राजनीति और नेता की कल्पना करता है उनको ठीक प्रकार से समझ सके। पांच, साथ ही उसके अंदर यह क्षमता हो कि उसके अनुरुप पार्टी के विचार एवं संगठन को बदल सके। यानी पार्टी का वैचारिक अधिष्ठान ऐसा बनाए जिससे लगे कि वो लोगों की सोच को अभिव्यक्त कर रहा है और संगठन को इस तरह ढाले जिससे वह वर्तमान राजनीति में प्रासंगिक हो सके। इसके लिए उसमें सोच के साथ भाषण देने यानी अपनी बात को प्रभावी ढंग से रखने की क्षमता भी होनी चाहिए। राजनीति में वक्तृत्व कला का बहुत महत्व है। आपके सामने नरेन्द्र मोदी एवं अमित शाह जैसे वक्ता हैं जिनका मुकाबला करना है। संगठन को ढालने का मतलब है ऐसे योग्य एवं सक्षम लोगों की टीम बनाना जो प्राणपण से कांग्रेस का वैचारिक एवं सांगठनिक रुप से पुनर्निर्माण कर सकें। इतना हो सके तो धीरे-धीरे कांग्रेस राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावी भूमिका में आ सकती है। 

समस्या यह है कि पिछले साढ़े तीन दशक में नेहरु इंदिरा परिवार के प्रत्यक्ष या परोक्ष वर्चस्व के कारण कांग्रेस के पास सीमित व्यक्तियों में से ही चुनने का विकल्प रहा गया है। राज्यों से सक्षम और स्वाभिमानी नेता इन वर्षों में या तो पार्टी छोड़कर जा चुके हैं या फिर कुछ को हाशिये में डालकर राजनीति से बाहर हो जाने के लिए मजबूर कर दिया गया।  कांग्रेस की आकाशगंगा में आपको एक भी ऐसा चमकता सितारा नहीं दिखेगा जो उपरोक्त कसौटियों पर खरा उतरता है। अगर किसी को अध्यक्ष बना भी दिया जाए तो उसे काम करने की आजादी चाहिए। क्या आज की परिस्थिति में इतनी आजादी किसी अध्यक्ष और उसकी टीम को मिलने की संभावना है? क्या वह राहुल गांधी, प्रियंका बाड्रा या सोनिया गांधी को कोई निर्देश देने का साहस दिखा सकता है? क्या इनमें से कोई यदि बयान जारी करना चाहे, जो अध्यक्ष को मंजूर न हो तो उसे रोका जा सकता है? अगर नहीं तो वह अध्यक्ष करेगा क्या? राहुल गांधी के पत्र को देखिए तो वे कहते हैं कि मेरे सहयोगियों को मेरा सुझाव है कि अगले अध्यक्ष का चुनाव जल्द हो। मैंने इसकी इजाजत दे दी है और पूरा समर्थन करने के लिए मैं प्रतिबद्ध हूं। जब आपने पद छोड़ दिया तो इजाजत किस बात की?

कांग्रेस का संकट नीति यानी विचारधारा, नेतृत्व, रणनीति और संगठन चारों का है। राहुल गांधी ने अपने पत्र में ही विचारधारा को सीमित कर दिया है। उनका कहना है कि कोई भी चुनाव स्वतंत्र प्रेस, स्वतंत्र न्यायपालिका और पारदर्शी चुनाव आयोग के बगैर निष्पक्ष नहीं हो सकता है। और यदि किसी एक पार्टी का वित्तीय संसाधानों पर पूरी तरह वर्चस्व हो तो भी चुनाव निष्पक्ष नहीं हो सकता है। हमने 2019 में किसी एक पार्टी के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ा। बल्कि हमने विपक्ष के खिलाफ काम कर रहे हर संस्थान और सरकार की पूरी मशीनरी के खिलाफ चुनाव लड़ा है। हमारे संस्थानों की निष्पक्षता अब बाकी नहीं है। देश के संस्थानों पर कब्जा करने का आरएसएस का सपना अब पूरा हो चुका है। इसे स्वीकार कर लिया जाए तो फिर कांग्रेस को जनता ने नकारा ही नहीं। इन संस्थओं के कारण वे हार गए। वायनाड में उन्होंने कहा था कि नरेन्द्र मोदी ने झूठ बोलकर तथा भ्रम फैलाकर जनता का वोट ले लिया है। इस तरह नए अध्यक्ष के लिए विचार, संघर्ष और संगठन का लक्ष्य भी राहुल गांधी ने सीमित कर दिया है। इसमें संकट अवसर में कैसे बदलेगा? उनसे पार्टी में कौन पूछ सकता है कि 2014 में हम क्यों 44 सीटों तक सिमट गए?

 सच कहें तो पार्टी मंे इतनी अंतःशक्ति बची ही नहीं थी कि वह भाजपा के विस्तारित होते जनाधार को चुनौती देेने की अवस्था में आ सके। कांग्रेस के सामने भाजपा के अकेले 31 प्रतिशत मत को नीचे लाना तथा अपने 19 प्रतिशत मत को 28-30 प्रतिशत तक ले आने की असाधारण चुनौती थी। वह भी उस स्थिति में जब मोदी सरकार समाज के निचले तबके के लिए आवास, शौचालय, बिजली, पानी, रसोई गैस का सिलेंडर, मुद्रा योजना से कर्ज तथा कौशल विकास को बड़े अभियान का रुप दे चुकी हो। आज दोनों पार्टियों के बीच 18 प्रतिशत मतों यानी कम से कम दोगुने का फासला है। क्या कांग्रेस यह कल्पना कर सकती थी कि अमेठी से राहुल गांधी पराजित हो जाएंगे? अगर केरल का वातावरण सबरीमाला आंदोलन के कारण वामपथियों के खिलाफ नहीं होता तथा तमिलनाडु में द्रमुक की कृपा नहीं होती तो कांग्रेस 2014 से भी नीचे आ जाती तथा राहुल लोकसभा से बाहर होते। 52 में से 23 सीटें इन्हीं दोनों राज्यों की हैं। कांग्रेस का आघात केवल 2019 तक सीमित नहीं है। आप थोड़ी गहराई से अंकणित का विश्लेषण करेंगे तो निष्कर्ष यही आएगा कि अंधेरे के सन्नाटे से निकल पाने की संभावना न के बराबर है। जिन राज्यों मंे सीधा मुकाबला है वहां या तो कांग्रेस को भाजपा से आधा से कम वोट मिले या 24-25 प्रतिशत तक का अंतर हैं। जहां गठबंधन में चुनाव लड़ा गया वहां भी 20 से 25 प्रतिशत तक का अतर है। ऐसी पराजय ईमानदार आत्ममंथन मांगती है जिसका रास्ता राहुल ने स्वयं बंद कर दिया है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

मंगलवार, 9 जुलाई 2019

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