शुक्रवार, 12 जुलाई 2019

राहुल मानते ही नहीं कि पार्टी के संकट के कारण चुनाव हारे

 

इसमें कांग्रेस के उबरने की संभावना खत्म है

अवधेश कुमार

अगर संसद का सत्र नहीं होता तथा राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद छोड़ने का अपना साढे तीन पन्नों का पत्र ट्वीटर के माध्यम से सार्वजनिक नहीं किया होता तथा उसके बाद कर्नाटक से लेकर गोवा तक पार्टी संकट में नहीं आती तो काग्रेस घुप अंधेरे कमरे के सन्नाटे में छिपी नजर आती। लोकसभा के अलावा पार्टी की कोई गतिविधि थी तो यही कि जो भी कार्यकर्ता या नेता राहुल गांधी तक पहुंच पाते वे उन्हें अध्यक्ष पद पर बने रहने के लिए मनाने की कोशिश कर रहे थे। राहुल गांधी ने युवा कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ताओं से मुलाकात में जब कहा कि मुझे दुख इस बात का है कि मेरे इस्तीफा देने के बावजूद किसी नेता को अपनी जिम्मेवारी का अहसास नहीं हुआ तो उसके बाद हार की जिम्मेवारी लेने और इस्तीफा देने का सिलसिला आरंभ हुआ। जिस पार्टी के नेतृत्व मंडली की यह दशा हो उसके इतनी बड़ी पराजय के आघात से उबरकर फिर मुख्य धारा में आने तक पहुंचने की कल्पना कोई नहीं कर सकता।

हर संकट में सुअवसर अंतर्निहित होता है। प्रश्न है कि क्या कांग्रेस में संकट को अवसर में बदल देेने की क्षमता बची हुई है? अगर संकट के बहुआयामी कारणों को समझ कर उसे दूर करने के लिए संकल्प के साथ सही योजना से लगातार प्रयास किया जाए तो संभव है कांग्रेस धीरे-धीरे संकटों से मुक्त हो। किंतु उसका तरीका यह नहीं हो सकता कि राहुल गांधी एक लंबा-चौड़ा पत्र लिखकर कहें कि मैं अध्यक्ष नहीं हूं और इस्तीफा इसलिए दे रहा हूं क्योंकि हमारी पार्टी के भविष्य के लिए जवाबदेही महत्वपूर्ण है।  2019 की हार के लिए बहुत से लोगों को जिम्मेदार ठहराने की जरूरत है। ऐसे में यह बिल्कुल भी न्यायोचित नहीं है कि मैं दूसरों को जिम्मेदार ठहराता रहूं, और पार्टी अध्यक्ष के तौर पर अपनी जवाबदेही को नजरअंदाज करता रहूं। प्रथमदृष्ट्या सुनने में यह अच्छा लगता है कि आज भी कांग्रेस के सर्वमान्य नेता ने पराजय की जिम्मेवारी लेकर इस्तीफा दिया और उस पर अड़ा रहा। किंतु सच यही है कि 25 मई को जब कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई उसमें राहुल गांधी ने हार के लिए वहां उपस्थित नेताओं और मुख्यमंत्रियों को ज्मिमेवार ठहराया। प्रियंका बाड्रा ने कहा कि कांग्रेस की हत्या करने वाले इसी कमरे में मौजूद हैं। जो भी बड़े नेता अकेले या समूह में राहुल गांधी से मिलने आए उन सबके प्रति कठोर शब्दों में उन्होंने नाराजगी प्रकट की।

  इस समय कांग्रेस के सामने अध्यक्ष चुनने की चुनौती आ गई है। कांग्रेस एक परिवार पर नेतृत्व के लिए निर्भर रहने के कारण जिस अवस्था में आ गई है उसमें राहुल का इस्तीफा और उसके पीछे की सोच उसके संकट को बढ़ाने वाला है। ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में अध्यक्ष का चयन अत्यंत कठिन है। कई नामों पर चर्चा हो रही है। कांग्रेस का अध्यक्ष कौन होगा या होना चाहिए इसके जवाब के लिए हमें यह देखना होगा कि इस समय अध्यक्ष के रुप में कैसा व्यक्तित्व चाहिए? सबसे पहले तो वह ऐसा व्यक्ति हो जो समझ सके कि उसके सामने 2014 में अस्तित्व का जो संकट पैदा हुआ वह 2019 में ज्यादा गहरा हुआ है। दो, वह इतना दूरदर्शी हो कि संकट को सही परिप्रेक्ष्य में समझे। तीन, राजनीति की बदलती हुई धारा को देख पाए। चार, जनता या मतदाताओं का भारत को लेकर जो सामूहिक आकांक्षायें हैं, वो जिस प्रकार की राजनीति और नेता की कल्पना करता है उनको ठीक प्रकार से समझ सके। पांच, साथ ही उसके अंदर यह क्षमता हो कि उसके अनुरुप पार्टी के विचार एवं संगठन को बदल सके। यानी पार्टी का वैचारिक अधिष्ठान ऐसा बनाए जिससे लगे कि वो लोगों की सोच को अभिव्यक्त कर रहा है और संगठन को इस तरह ढाले जिससे वह वर्तमान राजनीति में प्रासंगिक हो सके। इसके लिए उसमें सोच के साथ भाषण देने यानी अपनी बात को प्रभावी ढंग से रखने की क्षमता भी होनी चाहिए। राजनीति में वक्तृत्व कला का बहुत महत्व है। आपके सामने नरेन्द्र मोदी एवं अमित शाह जैसे वक्ता हैं जिनका मुकाबला करना है। संगठन को ढालने का मतलब है ऐसे योग्य एवं सक्षम लोगों की टीम बनाना जो प्राणपण से कांग्रेस का वैचारिक एवं सांगठनिक रुप से पुनर्निर्माण कर सकें। इतना हो सके तो धीरे-धीरे कांग्रेस राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावी भूमिका में आ सकती है। 

समस्या यह है कि पिछले साढ़े तीन दशक में नेहरु इंदिरा परिवार के प्रत्यक्ष या परोक्ष वर्चस्व के कारण कांग्रेस के पास सीमित व्यक्तियों में से ही चुनने का विकल्प रहा गया है। राज्यों से सक्षम और स्वाभिमानी नेता इन वर्षों में या तो पार्टी छोड़कर जा चुके हैं या फिर कुछ को हाशिये में डालकर राजनीति से बाहर हो जाने के लिए मजबूर कर दिया गया।  कांग्रेस की आकाशगंगा में आपको एक भी ऐसा चमकता सितारा नहीं दिखेगा जो उपरोक्त कसौटियों पर खरा उतरता है। अगर किसी को अध्यक्ष बना भी दिया जाए तो उसे काम करने की आजादी चाहिए। क्या आज की परिस्थिति में इतनी आजादी किसी अध्यक्ष और उसकी टीम को मिलने की संभावना है? क्या वह राहुल गांधी, प्रियंका बाड्रा या सोनिया गांधी को कोई निर्देश देने का साहस दिखा सकता है? क्या इनमें से कोई यदि बयान जारी करना चाहे, जो अध्यक्ष को मंजूर न हो तो उसे रोका जा सकता है? अगर नहीं तो वह अध्यक्ष करेगा क्या? राहुल गांधी के पत्र को देखिए तो वे कहते हैं कि मेरे सहयोगियों को मेरा सुझाव है कि अगले अध्यक्ष का चुनाव जल्द हो। मैंने इसकी इजाजत दे दी है और पूरा समर्थन करने के लिए मैं प्रतिबद्ध हूं। जब आपने पद छोड़ दिया तो इजाजत किस बात की?

कांग्रेस का संकट नीति यानी विचारधारा, नेतृत्व, रणनीति और संगठन चारों का है। राहुल गांधी ने अपने पत्र में ही विचारधारा को सीमित कर दिया है। उनका कहना है कि कोई भी चुनाव स्वतंत्र प्रेस, स्वतंत्र न्यायपालिका और पारदर्शी चुनाव आयोग के बगैर निष्पक्ष नहीं हो सकता है। और यदि किसी एक पार्टी का वित्तीय संसाधानों पर पूरी तरह वर्चस्व हो तो भी चुनाव निष्पक्ष नहीं हो सकता है। हमने 2019 में किसी एक पार्टी के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ा। बल्कि हमने विपक्ष के खिलाफ काम कर रहे हर संस्थान और सरकार की पूरी मशीनरी के खिलाफ चुनाव लड़ा है। हमारे संस्थानों की निष्पक्षता अब बाकी नहीं है। देश के संस्थानों पर कब्जा करने का आरएसएस का सपना अब पूरा हो चुका है। इसे स्वीकार कर लिया जाए तो फिर कांग्रेस को जनता ने नकारा ही नहीं। इन संस्थओं के कारण वे हार गए। वायनाड में उन्होंने कहा था कि नरेन्द्र मोदी ने झूठ बोलकर तथा भ्रम फैलाकर जनता का वोट ले लिया है। इस तरह नए अध्यक्ष के लिए विचार, संघर्ष और संगठन का लक्ष्य भी राहुल गांधी ने सीमित कर दिया है। इसमें संकट अवसर में कैसे बदलेगा? उनसे पार्टी में कौन पूछ सकता है कि 2014 में हम क्यों 44 सीटों तक सिमट गए?

 सच कहें तो पार्टी मंे इतनी अंतःशक्ति बची ही नहीं थी कि वह भाजपा के विस्तारित होते जनाधार को चुनौती देेने की अवस्था में आ सके। कांग्रेस के सामने भाजपा के अकेले 31 प्रतिशत मत को नीचे लाना तथा अपने 19 प्रतिशत मत को 28-30 प्रतिशत तक ले आने की असाधारण चुनौती थी। वह भी उस स्थिति में जब मोदी सरकार समाज के निचले तबके के लिए आवास, शौचालय, बिजली, पानी, रसोई गैस का सिलेंडर, मुद्रा योजना से कर्ज तथा कौशल विकास को बड़े अभियान का रुप दे चुकी हो। आज दोनों पार्टियों के बीच 18 प्रतिशत मतों यानी कम से कम दोगुने का फासला है। क्या कांग्रेस यह कल्पना कर सकती थी कि अमेठी से राहुल गांधी पराजित हो जाएंगे? अगर केरल का वातावरण सबरीमाला आंदोलन के कारण वामपथियों के खिलाफ नहीं होता तथा तमिलनाडु में द्रमुक की कृपा नहीं होती तो कांग्रेस 2014 से भी नीचे आ जाती तथा राहुल लोकसभा से बाहर होते। 52 में से 23 सीटें इन्हीं दोनों राज्यों की हैं। कांग्रेस का आघात केवल 2019 तक सीमित नहीं है। आप थोड़ी गहराई से अंकणित का विश्लेषण करेंगे तो निष्कर्ष यही आएगा कि अंधेरे के सन्नाटे से निकल पाने की संभावना न के बराबर है। जिन राज्यों मंे सीधा मुकाबला है वहां या तो कांग्रेस को भाजपा से आधा से कम वोट मिले या 24-25 प्रतिशत तक का अंतर हैं। जहां गठबंधन में चुनाव लड़ा गया वहां भी 20 से 25 प्रतिशत तक का अतर है। ऐसी पराजय ईमानदार आत्ममंथन मांगती है जिसका रास्ता राहुल ने स्वयं बंद कर दिया है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

मंगलवार, 9 जुलाई 2019

शनिवार, 6 जुलाई 2019

भारत की आकांक्षाओं को पूरा करने का विश्वास दिलाने वाला बजट

 

अवधेश कुमार

संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण से बजट की दिशा, चरित्र और नीतियों का  आभास मिल गया था। आर्थिक सर्वेक्षण नरेन्द्र मोदी सरकार के द्वितीय कार्यकाल का रोडमैप ही था। इसमें प्रधानमंत्री के अगले पांच वर्षों में भारत को 5000 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य के साथ चुनाव पूर्व भाजपा के संकल्प पत्र में घोषित सामाजिक-आर्थिक विकास की वर्तमान स्थितियों एवं उसकी कार्ययोजनाआंें का भी संकेत था। वित्त मंत्री ने उन सबको समाहित करते हुए आम आदमी की आवश्यकताओं को पूरा करने वाले कदमों के साथ आर्थिक चुनौतियों का सामना करने वाला भारत की सामूहिक आकांक्षओं को पूरी तरह अभिव्यक्त करते हुए एक संतुलित बजट पेश किया है। अंतरिम बजट में भारत को समृद्धतम देश बनाने के लिए दस आयाम घोषित किया गया था। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने इसकी चर्चा करते हुए कहा भी यह एक निरंतरता का बजट है। 10 आयामों की चर्चा करते हुए सीतारमण ने फिजिकल-सोशल इन्फ्रास्ट्रक्चर से लेकर डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर तक और मेक इन इंडिया से लेकर ब्लू इकॉनमी तक की चर्चा की। वस्तुतः अंतरिम बजट को और सशक्त किया गया है। उन्होंने अपने बजट भाषण की शुरुआत 5000 अरब डॉलर का लक्ष्य पाने के साथ की। यह सच है कि जब नरेन्द्र मोदी सरकार सत्ता में आई थी तो भारत की अर्थव्यवस्था 1.85 खबर अमेरिकी डॉलर की थी। इस वर्ष वह 2.7 खरब डॉलर तक पहुुंची। कुछ ही समय में यह 3 खरब डॉलर की हो जाएगी। इसके आधार पर 5 खरब डॉलर तक लक्ष्य पाने की उममीद अव्यावहारिक नहीं है।

बजट इस बड़े लक्ष्य पर केन्द्रित अवश्य है लेकिन इसको पाने के लिए समाज के निचले तबके के कल्याण से लेकर उच्चतर तबके की जिम्मेदारियां तय की गईं हैं। इसे सबका बजट और संतुलित बजट कहा जा सकता है। इसमें अर्थव्यवस्था के समक्ष सारी चुनौतियों का हल करने की कोशिश है, आधारभूत संरचना पर फोकस है तो कारोबारी,उद्योग, किसान, गांव,गरीब,असंगठित क्षेत्र मंें काम करने वालों, खुदरा व्यापारियों आदि के कल्याण के लिए काफी कुछ किया गया है। शहरी आबादी, युवाओं, महिलाओं सबके लिए बजट में काफी कुछ है। बजट की थीम यह है कि अर्थव्यवस्था के सभी अंगों को एक साथ मिलाकर समग्रता में ध्यान दिया जाए तो उसका परिणाम हर क्षेत्र के बीच संतुलन बनाने के रुप में सामने आएगा। 5000 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए 4 प्रतिशत से नीचे मुद्रास्फीति एवं आठ प्रतिशत की विकास दर चाहिए। पिछले वित्त वर्ष के अंतिम तिमाही में विकास दर 5.8 प्रतिशत पर आ गया था। इसका मुख्य कारण एनबीएफसी यानी गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की खस्ताहाली, विनिर्माण एवं कृषि विकास का धीमापन माना गया था।  बजट मे वित्त मंत्री ने एनबीएफसी की समस्याओं के समाधान के लिए सारे संभव कदम उठाए गए हैं। चरमरा रहे बैंकों के लिए 70 हजार करोड़ के पुनर्पूंजीकरण का ऐलान अत्यंत महत्वपूर्ण है। मोदी सरकार के कार्यकाल में नए कानूनों के कारण 4 लाख करोड़ का कर्ज वसूला गया है। एनपीए में एक लाख करोड़ की कमी आ गई है। बैंकों के पास धन आने का मतलब हुआ उद्योग और करोबार को कर्ज के लिए धन की उपलब्धता। इस तरह विनिर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहन मिल सकता है। वित्त मंत्री ने कहा कि आजादी के पूर्व जो भावना स्वदेशी की थी वही भावना अब मेक इन इंडिया का है।

तो मेक इन इंडिया के लिए बजट में जितने प्रावधान हैं उनसे उम्मीद जगती है कि भारत विनिर्माण हब का ठोस केन्द्र हो सकता है। अगले पांच वर्ष में 100 लाख करोड़ रुपया आधारभूत संरचना तथा 25 लाख करोड़ रुपया कृषि एवं ग्रामीण आधारभूत संरचना के लिए खर्च की घोषणा बहुत बड़ी है। अंतर्राष्ट्रीय वित्त पर नजर रखने वाले जानते हैं कि बाजार में भारी धन निवेश के लिए पड़ा हुआ है। आपको बस उनको अपने यहां लाने के लिए कोशिश करनी है। यह ऐसी महात्वाकांक्षी योजना है जिसके साकार होेने के बाद वाकई जैसा प्रधानमंत्री ने कहा न्यू इंडिया की कल्पना साक्षात होगी। इसके लिए बजट जो कहता है उसे देखिए। इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनैंसिंग के लिए साधनों को लेकर कई सुधारों के प्रस्ताव किए गए हैं। क्रेडिट गारंटी एन्हैंसमेंट कॉर्पाेरेशन के लिए आरबीआई से नोटिफेशन आ चुका है। इसकी स्थापना 2019-20 में हो जाएगी। इन्फ्रास्ट्रक्चर डेट फंड्स और एनबीएफसी की ओर से जारी डेट सिक्यॉरिटीज में एफआईआई और एफआई निवेश को घरेलू निवेशकों को निश्चित अवधि के लिए ट्रांसफर करने की अनुमति दी जाएगी। वित्त मंत्री ने सड़क, जलमार्ग और वायुमार्ग को मजबूती प्रदान करने के सरकार के लक्ष्यों का जिक्र किया।

वास्तव मे 5000 खरब डॉलर पाना लक्ष्य है और उसका पूरा आधार बनाया गया है। पहली बार उपभोग पर फोकस की बजाय  विकास की वृद्धि को बचत, निवेश और निर्यात के अच्छे चक्र से बनाए रखने की बात है। निवेश, विशेषकर निजी निवेश विकास का मुख्य प्रेरक होता है, जो मांग, क्षमता, निर्माण, श्रम उत्पादकता में वृद्धि करता है। पिछले पांच वर्षों में इन्सॉल्वंसी ऐंड बैंकरप्ट्सी कोड जैसे बड़े सुधारों के कारण हमारी अर्थव्यवस्था छलांग लगाने को तैयार है। जैसा बजट में साफ किया गया है कि मुद्रास्फीति  लगातार नियंत्रण मंें है और रहेगी जो कि विकास को ताकत देगा। गहराई से देखा जाए तो बजट ने मांग, नौकरियों, निर्यात की विभिन्न आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए इन्हें अलग समस्याओं के रूप में नहीं, बल्कि एक साथ जोड़कर प्रावधान और नीतियां बनाई गईं हैं। मोदी सरकार ने पिछले 1000 दिनों में 130 से 135 कि.मी. लंबी सड़कें रोज बनाईं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत ग्रीन टेक्नॉलजी के इस्तेमाल से 30 हजार किलोमीटर लंबी सड़कें बनाई जा चुकी हैं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तीसरे चरण में 1.25 लाख कि.मी. सड़कों को अगले पांच सालों में अपग्रेड किया जाएगा। इस पर 80,250 करोड़ रुपये की लागत आएगी।

कृषि की ओर आएं तो इसमें व्यापक निवेश की बात है। 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए पहले की नीतियों को आगे बढ़ाया गया है। इसमें कृषि से जुड़े उद्योगों पर भी फोकस है। कहा गया है कि अन्नदाता को ऊर्जादाता बनाने के लिए हमारे पास कार्यक्रम हैं। उदाहरण के लिए सौर उर्जा ईकाइयों से किसान उर्जा बचाकर उसकी बिक्री कर सकते हैं। बजट मंे सबसे बड़ी बात यह है कि आने वाले समय में किसानों के लिए बजट लाने की जरुरत नहीं पड़ेगी। स्किम ऑफ फंड फॉर अपग्रेडेशन ऐंड रीजनरेशन ऑफ ट्रेडिशनल इंडस्ट्रीज (स्फूर्ति) योजना के तहत ज्यादा कॉमन फसिलिटी सेंटर्स स्थापित किए जाएंगे और ऐग्रो रूरल इंडस्ट्री सेक्टर में 75 हजार स्किल्ड आंट्रप्रन्योर्स तैयार किए जाएंगे। ह2022 तक सभी को आवास, बचे सभी परिवारों को शौचालय, इच्छुक सभी परिवारों को रसोई गैस कनेक्शन, सभी को बिजली, पेयजल उपलब्ध कराने की घोषणा गांवों के जीवन स्तर में कितना बदलाव जाएगा इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है।

बजट का एक सिद्धांत अमीरांे पर कर लगाओ और गरीबों का कल्याण करों है।  उदाहरण के लिए 2 से 5 करोड़ आय पर 3 प्रतिशत अधिभार लगेगा। 5 करोड़ रुपये सालाना से अधिक आय वाले लोगों पर 7 प्रतिशत अतिरिक्त अधिभार लगेगा। कारोबार में नकदी के प्रयोग को कम करने के लिए प्रावधान किया गया है कि एक खाते में 1 साल में 2 करोड़ से ज्यादा की निकासी होगी तो 2 प्रतिशत टीडीएस कट जाएगा। निस्संदेह, एक वर्ग को यह पसंद नहीं आएगा। किंतु देश को विकास के लिए धन चाहिए तो अमीरों को उसका भार वहन करना ही होगा। यह नहीं भूलना चाहिए कि 400 करोड़ रुपये का कारोबार करने वाली कंपनियों को अब 25 प्रतिशत की दर से कॉरपोरेट कर देना होगा। इससे पहले 250 करोड़ रुपये तक का कारोबार करने वाली कंपनियों पर कम दर से कर लगाया गया था। इन दोनों को एक साथ मिलाकर देखना चाहिए। आम आय कर स्लैब में कोई बदलाव नहीं किया गया है। अंतरिम बजट को कायम रखते हुए 5 लाख रुपये सालाना से अधिक आय पर ही कर देना होगा। नौकरीपेशा लोगों के लिए मानक छूट (स्टैंडर्ड डिडक्शन) की सीमा 40 हजार रुपये से बढ़ाकर 50 हजार रुपये कर दी गई। अब नौकरी-पेशा लोग दो घरों के लिए एचआरए का आवेदन कर सकते हैं। एचआरए पर कर छूट 1.80 लाख रुपये से बढ़कर 2.40 लाख कर दी है। मध्यम वर्ग के लिए 45 लाख का घर खरीदने पर कर्ज के ब्याज पर 3.5 लाख रुपये की छूट मिलेगी। पहले यह 2 लाख रुपये थी। इस ऐलान से 15 साल की अवधि के आवास कर्ज पर लाभार्थी को सात लाख रुपये तक का फायदा होगा। इस तरह निम्न मध्यम वर्ग एवं मध्यम वर्ग के लिए यह बजट बेहतर प्रावधान लेकर आया है। यह लोगों को घर खरीदने के लिए प्रेरित करेगा और आवास क्षेत्र को गति देगा। जैसा हम जानते हैं सबसे ज्यादा रोजगार आवास निर्माण क्षेत्र से ही मिलता है। इस तरह आवास एवं आधारभूत संरचना संबंधी निर्माण भारत को विकसित देशों की श्रेणी में ही लाएगा बल्कि रोजगार और करोबार का व्यापक अवसर प्रदान करेगा।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है यह भारत के सभी वर्गो और क्षेत्रों की विकास को परवान चढ़ाने के लिए सभी संभाव उपाय करते हुए आकांक्षओं को बढ़ाने और उसे पूरा करने का विश्वास दिलाने वाला बजट है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

मंगलवार, 2 जुलाई 2019

सोमवार, 1 जुलाई 2019

चीनी कंपनी के सीसीटीवी कैमरे न लगाने के लिए सीएम आवास पर प्रदर्शन कर ज्ञापन दिया

संवाददाता

नई दिल्ली। जनशक्ति पार्टी (राष्ट्रीय) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ज्वाला सिंह के नेतृत्व में दिल्ली सरकार द्वारा दिल्ली में सीसीटीवी कैमरे के खिलाफ मोर्चा खोला और दिल्ली के मुख्यमंत्री आवास पर इस विषय पर जांच करने के लिए ज्ञापन दिया।
पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ज्वाला सिंह ने बताया कि दिल्ली में सीसीटीवी कैमरे लगाए जा रहे हैं परंतु यह सीसीटी वी कैमरे एक चाइनीज कंपनी हिकविजन के हैं। जिससे देश की सुरक्षा को खतरा होने की संभावना है। हमारा पड़ोसी मुल्क चाइना जिसकी बुरी नजर हमेशा भारत पर होती है, चाइना में बैठे-बैठे हमारे देश के राजधानी के कोने-कोने को देख सकता है। जिससे देश के जनता अधिकारियों शासन-प्रशासन और सरकारों को सुरक्षा का खतरा है। उन्होंने बताया कि हमने सीएम जी मिलने का समय लिया था पर जब हम यहां आए तो सीएम जी अपने सभी पार्टी सहयोगियों के साथ वहां से जा चुके थे।
पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ज्वाला सिंह ने आगे बताया इसलिए हमने यह ज्ञापन उस समय मौजूद कैंपस इंचार्ज गुरुदत्त रंगा को सौंपा और उनसे लगभग 1 घंटे तक बातचीत हुई जिसमें हमने देश की सुरक्षा में चीन की सेंध होने की संभावना जताते हुए एक पारदर्शी निरीक्षण की मांग की गई और पार्टी नेता कृष्ण कुमार पटैरिया ने गुरुदत्त रंगा को तकनीकी पहलुओं से रूबरू कराया गया और सबूतों के साथ उन्हें यह बताया गया कि इन कैमरों से देश की सुरक्षा को कैसे खतरा होने की पूरी संभावना है जिसकी तत्काल जांच की जानी चाहिए। साथ ही पटैरिया ने चेतवानी दी कि अगर इसकी पारदर्शी जांच नहीं हुई तो हम सड़कों से सुप्रीम कोर्ट तक का रास्ता अपनाएंगे।











 

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