शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

सीमा सील करने का विचार कितना व्यावहारिक

 

अवधेश कुमार

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह द्वारा यह कहने के बाद कि वर्ष 2018 तक भारत-पाकिस्तान की सीमा को पूरी तरह से सील कर दिया जाएगा इस पर बहस छिड़ गई है। एक पक्ष का मानना है कि यह कहना जितना आसान है करना उतना ही कठिन। उनके अनुसार पाकिस्तान से लगे सीमा क्षेत्रों की भौगोलिक स्थितियां ऐसी हैं कि यह पूरी तरह सील हो ही नहीं सकतीं। दूसरी ओर ऐसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि ऐसा हो सकता है। ये इजरायल का उदाहरण देते हैं जिसने यह करके दिखा दिया है। राजनाथ सिंह ने यह बात राजस्थान के जैसलमेर में आयोजित पाकिस्तान सीमा से लगने वाले राज्यों की ताजा सुरक्षा प्रबंधों की समीक्षा बैठक के बाद कही। ध्यान रखिए उन्होंने यह भी कहा कि सीमा को सील करने का कार्य तय वक्त में काम पूरा कर लिया जाएगा। उनके पूरे कथन का भाव यह था कि सीमा सील करने की बात केवल कल्पना नहीं है, उसकी योजना बन चुकी है और काम आरंभ हो चुका है। उनके अनुसार सीमा को सील करने के लिए आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि सीमा की निगरानी के लिए बॉर्डर सिक्योरिटी ग्रिड स्थापित किया जाएगा, जिसमें पाकिस्तान की सीमा से लगे चारों राज्यों का सहयोग लिया जाएगा। ये राज्य इस ग्रिड को अपने इनपुट देंगे, जिसके हिसाब से जरूरी कदम उठाए जाएंगे।

राजनाथ सिंह के कथन को केन्द्र सरकार की सीमा संबंधी एप्रोच के साथ मिलाकर देखा जाए तो वे एक समग्र सीमा प्रबंधन की बात कर रहे हैं, जो न केवल अभेद्य दीवारों से घिरा होगा बल्कि उसमें ऐसे तकनीक होंगे, मानव प्रंबंधन इतना कुशल होगा कि सामन्य उल्लंघन की क्रिया पर भी पूरी प्रणाली सक्रिय हो जाएगी। यानी हर हाल में सीमा पार से घुसपैठ रोक दिया जाएगा। भारत पाकिस्तान की सीमा नियंत्रण रेखा को मिलाकर कुल 3323 किलोमीटर है जिसमें चार राज्य पंजाब, राजस्थान, जम्मू कश्मीर और गुजरात आते हैं। सरकार की योजना में सीमा पर कंक्रीट, लेजर बीम, रडार और उपग्रह सेंसर की दीवार खड़ी करने की बात है। इसकी जिम्मेदारी बॉर्डर मैनेजमेंट डिविजन को दे दी गई है। चारों राज्यों की अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों के मुताबिक सुरक्षा दीवार बनाए जाने पर काम चल रहा है। पंजाब और जम्मू-कश्मीर में कई जगहों पर पक्की दीवार तो गुजरात के रण और सर क्रीक में लेजर वॉल और लेजर बीम से सीमा सील होगी। कैमरे, रडार और उपग्रह से नियंत्रित होने वाले सेंसर लगाए जाएंगे। इससे छोटी से छोटी हरकत की जानकारी भी कुछ सेकंड में मिल जाएगी। सबसे पहले जम्मू-कश्मीर में पक्की दीवार बनेगी। यह 10 फीट ऊंची होगी। सैटेलाइट सेंसर कोहरे में भी सीमा पर पैनी नजर रखेंगे। जम्मू-कश्मीर में सेंसर और लेजर से युक्त 6.9 किमी लंबी दीवार बनाने का प्रयोग सफल रहा है। सीमा सुरक्षा बल इस समय पंजाब में 45 स्थानों पर प्रायोगिक तौर पर लेजर वॉल से सुरक्षा कर रहा है।

आइए एक-एक राज्य की चुनौतियां, वर्तमान सीमा सुरक्षा व्यवस्था पर नजर दौड़ाएं। सबसे पहले जम्मू कश्मीर, क्योंकि आतंकवाद सहित ज्यादा सुरक्षा चुनौतियां यहीं हैं। नियंत्रण रेखा सहित जम्मू कश्मीर की सीमा लंबाई 1225 किमी है। इनमें 210 कि. मी. सीमा ऐसी है जिसमें पहाड़ों की 18,000 फीट तक ऊंची दुर्गम चोटियां हैं। यहां पारा शून्य से 50 डिग्री नीचे तक जाता है। यहां दोहरी तारबंदी, गश्ती के वाहन, सामान ढोने के लिए खच्चर आदि का प्रयोग किया जाता है। गुजरात से 508 कि. मी. सीमा लगती है। यहां दलदल और नमक के सफेद रण हैं।  262 किमी के दलदल में तारबंदी भी नहीं है। यहां जीरो लाइन पिलर भी नहीं दिखते। सफेद रण में तो दिशा तक का पता नहीं चलता। सर क्रीक में पानी के कारण बॉर्डर का पता ही नहीं चलता। जो उपाया सीमा सुरक्षा के किए गए हैं वो हैं, पानी, जमीन और दलदल में लड़ने में दक्ष क्रोकोडाइल कमांडो की तैनाती। इसके अलावा तैरती बोओपी, होवरक्राफ्ट, कोबरा वायर (करंट वाली तारबंदी) आदि का उपयोग भी होता है। राजस्थान में 1037 किमी है सीमा है। यहां 50 डिग्री सेल्सियस तक तापमान चला जाता है। रेत के 80-90 फीट ऊंचे शिफ्टिंग वाले टीले है। इसमें कोई भी भटक सकता है। तारबंदी रेत में दब जाती है और सीमा का पता नहीं चलता। अभी यहां पैदल, ऊंटों से गश्त, तारबंदी पर घंटियां बांधने जैसे प्रयोग हुए हैं। साथ ही फ्लड लाइट, सैंड स्कूटर, हाइटेक कम्पास, 90 फीट ऊंचे टावर लगे हैं। पंजाब में कुल सीमा 553 किमी है। यहां नदी-नालों की रचना ऐसी जटिल है कि सीमा प्रबंधन बड़ी चुनौती बन जाती है। उदाहरण के लिए रावी नदी 11 बार तथा सतुलज 9 बार सीमा के अंदर और बाहर होती है। घुसपैठ का खतरा यहीं से होता है। सर्दियों में इतना घना कोहरा होता है कि अपना हाथ तक न दिखाई दे। यहां आतंकी घुसपैठ के साथ हथियारों और ड्रग्स की तस्करी रोकना सबसे बड़ी चुनौती। यहां पैदल, घोड़ों, बाइक, जिप्सी व बोट से गश्त की जाती हैं, नावों पर नाके बने हैं.. कहीं-कहीं कैमरे, फ्लड लाइट आदि भी लगे हैं।

जाहिर है, इसे देखने के बाद सरकार की सीमा को अभेद बनाने की चुनौतियां का आभास हो जाता है। किंतु हमारे पास चारा क्या है। मरता क्या न करता। जब इजरायल ऐसा कर सकता है तो हम क्यों नहीं कर सकते। आतंकवादी घुसपैठ की समस्या से निपटने का सबसे कारगर रास्ता यही है कि सीमा ही अभेद हो जाए कि कोई प्रवेश न करे। इजरायल में 1994 में सीमा घेरने का काम शुरू हुआ था। इसने कर दिखाया और उसके बाद आतंकवादी हमलों में 90 प्रतिशत तक कमी आ गई। वैसे इजरायल की सीमा केवल 1068 किमी लंबी है। यानी हमारी पाकिस्तान से लगने वाली सीमा ही इससे तीन गुणा ज्यादा है। किंतु न भूलिए कि इजरायल की सीमा चार देशों मिस्र, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान और फलस्तीन से लगा हुआ है। मिस्र और सीरिया सीमा पर 16 फीट ऊंची फेंसिंग, लेबनान सीमा पर रेजर फेंसिंग, गाजा पट्टी पर कंक्रीट की दीवार और फेंसिंग है। दीवारों को जमीन से 8 फीट नीचे से बनाया गया है। राजनाथ सिंह के इजरायल दौरे का एक प्रमुख उद्देश्य उनकी सीमा प्रबंधन को समझना था। उनके साथ गए अधिकारियों ने इसे समझा एवं इस पर काफी समय पहले से काम आरंभ हो चुका है।

कह सकते हैं कि भारत की सीमा केवल पाकिस्तान से ही नहीं लगती। यह चीन, म्यान्मार, बंगलादेश, भूटान और नेपाल से तथा समुद्री सीमा श्रीलंका और मालदीव से भी लगती है। हर क्षेत्र की अलग समस्याएं हैं, पर मुख्य समस्या पाकिस्तान ही है। वैसे चीन के साथ बाड़ नहीं लग सकता, क्योंकि पूरी सीमा चिन्हित नहीं है। सीमा सुरक्षा को सशक्त किया जा रहा है। संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी तथा वायुसेना एवं थल सेना के डिविजन बढ़ाए गए हैं जिन पर चीन से चिंता भी प्रकट की जा रही है। सीमा को लेकर मोदी सरकार आरंभ से ही नए दृष्टिकोण से विचार करती रही है। गृह मंत्रालय ने देश की पूर्वी सीमा पर सुरक्षा को और अधिक पुख्ता बनाने के लिए एक समिति का गठन किया। उसके बाद भारत और बांग्लादेश सीमा भी एक समिति का गठन किया गया। एक अन्य समिति पश्चिम सीमा के लिए बनाई गई थी इन सारी समितियों की रिपोर्ट सरकार को मिल चुकी है। केंद्र ने सभी सीमाओं के मूल्यांकन के लिए एक वर्ष का समय निर्धारित किया था। इस दौरान भारत नेपाल से लेकर देश की समुद्री सीमाओं तक सभी का मूल्यांकन किया गया। जून 2015 में ही भारत-बांग्लादेश की सीमा सुरक्षा योजना के तहत फ्लोटिंग एल्यूमीनियम बाड़ लगाने का निर्णय हुआ।  हल्के और कम वजन वाले इस बाड़ को लगाने का जिम्मा केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी) को सौंपा गया है। इस परियोजना की शुरुआत नदी वाले भारत-बांग्लादेश की सीमा पर गोजाडांगा क्षेत्र से हुई है। इन बाड़ों को नदी वाले सीमा क्षेत्र में कंक्रीट और सीमेंट पर धातु के डंडों के सहारे लगाया जा रहा है। गृह मंत्री ने स्वयं कहा था कि  लगभग 1751 किलोमीटर भारत नेपाल की सीमा और 699 किलोमीटर भारत-भूटान सीमा पर चौकसी रखना चुनौती भरा कार्य है। कारण, यहां खुली सीमा है और दोनों देशों के लोगों का आना जाना लगा रहता है। तो यहां जवानों की मुश्तैदी पर सबसे ज्यादा बल दिया गया है। भारत म्यान्मार सीमा को लेकर भी पूर्वोत्तर वाली समिति ने अपने सुझाव दिए थे जिस पर काम हो रहा है। भारत-म्यांमार सीमा के 10 किलोमीटर के दायरे में 240 गांवों में दो लाख से अधिक आबादी रहती है। यहां की समस्या उग्रवाद तथा हथियार और मादक पदार्थो की तस्करी की है।  इसमें सीमा पर अधिक से अधिक पुलिस थाने खोलने की योजना है।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

धर्मपुरा वार्ड के शास्त्री पार्क में समुदाय भवन का उद्घाटन करते अरविंदर सिंह लवली, पूर्व विधायक गांधी नगर व साथ में धर्मपुरा वार्ड 233 की निगम पार्षद तुलसी गांधी

धर्मपुरा वार्ड 233 की निगम पार्षद तुलसी गाँधी के प्रयासों द्वारा गरीब लोगों का ध्यान रखते हुए शास्त्री पार्क बाल्मीकि मार्ग पर डी.डी.ए फ्लैट के सामने ई.डी.एम.सी ने एक नया मिनी समुदाय भवन बनाया है, जिसका उद्घाटन 14/10/2016 को पूर्व दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष एवं मंत्री दिल्ली सरकार श्री अरविंदर सिंह लवली जी के करकमलों द्धारा गया। मिनी समुदाय भवन के उद्घाटन पर क्षेत्र के लोगो ने निगम पार्षद श्रीमती तुलसी गाँधी और श्री अरविंदर सिंह लवली जी स्वागत किया और नए समुदाय भवन के लिए धन्यवाद किया। इस मिनी समुदाय भवन के बनने से क्षेत्र के उन लोगो में ख़ुशी का माहोल है जो छोटे कार्यक्रम जैसे शादी-विवाह, जन्मदिन, खतना और कुआँ पूजन करने के लिए भी ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते थे। अब इस नए समुदाय भवन में लोगो को ज्यादा पैसे खर्च नहीं करने पड़ेंगे क्योंकि इस मिनी समुदाय भवन की बुकिंग सिर्फ रु० 700/-  में होगी।
 


 

शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

आतंकवाद का प्रायोजक आतंकवाद के खात्मे पर प्रवचन दे तो कैसा लगेगा, यही नवाज के भाषण के साथ हुआ

 

अवधेश कुमार

यह उम्मीद तो थी कि देश के अंदर अपनी आंतरिक परेशानियों से ग्रस्त नवाज शरीफ संयुक्त राष्ट्र मंे कश्मीर मामले को उठाएंगे लेकिन अपने भाषण को ही वे भारत विरोध पर केन्द्रित कर देंगे इसकी संभावना किसी ने भी व्यक्त नहीं की थी। अपने 19 मिनट से थोड़ा ज्यादा के भाषण में उन्होंने दो तिहाई समय भारत को आरोपित करने में लगाया। संयुक्त राष्ट्र संघ के पुराने रिकॉर्ड खंगालने होंगे कि शीतयुद्ध काल में पाकिस्तान के किस नेता ने इतना ज्यादा समय भारत को आरोपित करने में लगाया। क्या-क्या नहीं कहा नवाज ने। अपने देश के आतंकवाद को विदेश द्वारा समर्थित, प्रयोजित और वित्तपोषित कहा। साफ है कि इशारा भारत की ओर था। उनकी नजर में भारत आतंकवाद का प्रायोजक, हथियारों का विस्तारक, दक्षिण एशिया में हथियार होड़ के लिए उत्तरदायी, कश्मीर में निर्दोष नागरिकों का हत्यारा, आजादी की वाजिब मांग को सेना की गोलियों से जवाब देने वाला, बातचीत से भागने के लिए अस्वीकार्य शर्तें लगाने वाला.....आदि आदि है। यानी उनके यहां जो समस्याएं हैं या दक्षिण एशिया में जो समस्याएं हैं उन सबके लिए कोई दोषी है तो वह भारत है। सवाल है कि नवाज शरीफ के इस भाषण को दुनिया के कितने देशों ने गंभीरता से लिया होगा?

हम आगे बढ़ें इसके पहले यह ध्यान दिलाना आवश्यक है कि नवाज से पांच भाषण पहले अफगानिस्तान के उप राष्ट्रपति सरवर दानिश का भाषण हुआ था। उन्होंने आतंकवाद के मामले पर पाकिस्तान को नंगा कर दिया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में रची गई साजिशों से उसकी सरजमीं पर आतंकवादी संगठन बेरहमी से निर्दोष नागरिकों पर हमले कर रहे हैं। हमने बार-बार पाकिस्तान से आतंकवादियों को मिलने वाले सुरक्षित पनाहगाह को ध्वस्त करने के लिए कहा लेकिन कोई अंतर नहीं आया। दानिश ने साफ कहा कि पाकिस्तान मंे तालिबान, हक्कानी नेटवर्क को प्रशिक्षण के साथ हथियार और धन तक मुहैया कराया जा रहा है। पाकिस्तान का आतंकवाद पर रवैया दोहरा है। जरा सोचिए, दुनिया के जो नेता या राजनयिक वहां बैठे थे या बाहर टेलीविजन पर सुन रहे थे वे किसकी बातों पर विश्वास करेंगे? पाकिस्तान पर या अफगानिस्तान पर? खैर, भारत ने भी अपनी प्रतिक्रिया दे दी है। भारत ने कहा है कि उसकी पाकिस्तान के साथ एक ही शर्त है कि आतंकवाद खत्म हो।

आतंकवाद पर नवाज के प्रवचन को कौन देश सुनेगा। अमेरिका में मैनहट्टन का जो धमाका हुआ उसका आरोपी अहमद खान रहामी ने क्वेटा में प्रशिक्षण लिया था। सैन बर्नाडिनो हमले में शामिल तशफीन मलिक पाकिस्तान मूल की निकली। पेरिस हमले का एक आरेापी लश्कर ए तैयबा का था। बेल्जियम हमले में शामिल छः पाकिस्तानी मूल के आतंकवादी पकड़े गए। जहां आतंकवादी हमला उसका कोई न कोई सूत्र पाकिस्तान से जुड़ता है। उड़ी आतंकवादी हमले पर दुनिया भर से जो प्रतिक्रियाएं आईं हैं पता नहीं पाकिस्तान के रणनीतिकारों ने उनका भी ठीक से अध्ययन किया या नहीं। आप आतंकवाद के खिलाफ 21 सितंबर को भाषण दे रहे हैं और एक बार भी 17 सितंबर को हुए उड़ी हमले का जिक्र नहीं किया जिसमें 19 सैनिक शहीद हो चुके हैं। क्या इसका असर नहीं होगा? फिर जिस बुरहान वानी को दुनिया हिज्बुल मुजाहिद्दीन का आतंकवादी मान चुकी है उसे आप अपने भाषण में आजादी के जंग का नेता तथा शहीद बता रहे हैं। इसे कहते हैं अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारना। सच कहें तो इसके द्वारा पाकिस्तान ने अंग्रेजी में जिस सेल्फ गोल कहते हैं वही किया।

 जो सूचना है भाषण के ठीक पहले नवाज शरीफ ने अपने सेना प्रमुख जनरल राहिल शरीफ से बातचीत की थी। कम से कम भारत के प्रधानमंत्री या किसी नेता को अंतरराष्ट्रीय मंच पर भाषण देने के पहले ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है। जाहिर है, नवाज जो कह रहे थे उसमें पाकिस्तानी सेना की सोच शामिल थी। ऐसा नहीं है कि इसे संयुक्त राष्ट्र के महासचिव सहित दूसरे राजनयिक या दुनिया के प्रमुख देशों ने नोट नहीं किया होगा। आतंकवाद पर पाकिस्तान का सच पूरी दुनिया को पता है। लेकिन जरा सोचिए, जो विश्व का सबसे बड़ा नाभिकीय प्रसारक है वह नाभिकीय निरस्त्रीकरण पर प्रवचन कर रहा था। नवाज ने भारत के साथ द्विपक्षीय नाभिकीय परीक्षण प्रतिबंध संधि का प्रस्ताव रखा। वे लगातार नाभिकीय अस्त्र बढ़ा रहे हैं। आज इजरायल एवं उ. कोरिया से ज्यादा नाभिकीय अस्त्र उनके पास है। क्या इसकी जानकारी संयुक्त राष्ट्र और दुनिया के प्रमुख देशों को नहीं है? उ. कोरिया के बाद पाकिस्तान दूसरा देश है जो नाभिकीय अस्त्र की धमकी देता है। हाल ही में भारत की ओर इशारा करते हुए पाक के रक्षा मंत्री ने कहा कि हम टैक्टिकल नाभिकीय अस्त्र के प्रयोग से नहीं हिचकेंगे। नाभिकीय अस्त्र को लेकर एक दिन पहले ही अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन केरी ने मुलाकात मंे नवाज को झाड़ लगाई थी। उन्होंने कहा था कि आप नाभिकीय अस्त्र विस्तार पर विराम लगाएं। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने तो खैर उनसे मुलाकात ही रद्द कर दी।

अब आइए कश्मीर पर। पिछले दो सालों में कश्मीर में हस्तक्षेप का पाकिस्तान की आधा दर्जन औपचारिक अपील संयुक्त राष्ट्रसंघ ठुकरा चुका है। संयुक्त राष्ट्र ने अंततः 2010 मेें कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय विवादों की सूची से बाहर कर दिया। क्या वह इसे दोबारा वापस लाएगा? वे जिस आत्मनिर्णय संबंधी प्रस्ताव को लागू करने की अपील कर रहे थे उसमें पाकिस्तान स्वयं कठघरे में खड़ा होता है। उसमें पहले पाकिस्तान को ही अधिकृत क्षेत्र खाली करना था, उसे सेना हटानी थी जो आज तक उसने नहीं किया। जम्मू कश्मीर में हमारे 14 हजार से ज्यादा निर्दोष नागरिक आतंकवादियों के हमलों मेें मारे गए हैं यह तथ्य दुनिया के सामने रखा जा चुका है। वे कह रहे थे कि कश्मीरियों की हत्याओं की स्वतंत्र जांच कराएं। वे भूल गए कि फिर उसके तार पाकिस्तान तक भी पहुंचेंगे। हालांकि संयुक्त राष्ट्र इसमें किसी तरह हाथ डालने ही वाला नहीं है। बड़े देश पहले ही इसे द्विपक्षीय मुद्दा मान चुके हैं। इसलिए नवाज की इस कवायद का व्यर्थ जाना पहले से ही निश्चित था। ऐसा नहीं है कि नवाज इसे नहीं जानते। किंतु पाकिस्तान की जो अंदरुनी स्थिति है। पनामा लीक में े परिवार के सदस्यों के नाम आने के बाद उनके खिलाफ जो वातावरण है उसमें अपनी रक्षा के लिए उनके पास यही एक चारा था जिससे वे परंपरागत भारत विरोधी मानसिकता वालों के सामने हीरो बन सकते थे तथा सेना की नजर में सुर्खरु कहला सकते थे।

किंतु इसमें वे गलतियां करते चले गए। नवाज का भाषण ऐसा था मानो वहां जो बैठे हैं वो अशिक्षित हैं या अखबार नहीं पढ़ते, उनके बारे में जानते नहीं। उनकी बॉडी लैंग्वेज भी देखने लायक थी। चेहरे पर थकान का भाव, एकदम लयहीन भाषण, आवाज मंे दम नहीं.....। ऐसा तभी होता है जब आपको पता होता है कि जो कुछ आप बोल रहे हैं उसमें सच का अभाव है तथा जिसकी आप अपील कर रहे हैं उसे स्वीकारना तो छोड़िए, कोई सुनने वाला नहीं है।

अवधेश कुमार, ई.ः30,गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्पलेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

 

शनिवार, 17 सितंबर 2016

कश्मीर का यह संकट ही समाधान दे सकता है बशर्ते

 

अवधेश कुमार

समस्याएं, संकट या चुनौतियां हमें परेशान जरुर करती हैं, लेकिन कई बार उन्हीं से ऐसे समाधान भी निकल जाते हैं जिनकी हम कल्पना नहीं करते। हां, यह तभी संभव है जब हम संकट को समाधान की दृष्टि से देखें और लाख विरोधों, आलोचनाओं के बावजूद उस पथ पर डटे हुए आगे बढ़ते रहें। कश्मीर के वर्तमान संकट को लेकर केन्द्र एवं राज्य सरकार की परेशानियां समझ में आतीं हैं। लेकिन इसके साथ कुछ ऐसी बातें भी हो रहीं हैं जो इसके पहले कभी नहीं हुईं और उनसे ही आशा की किरण झलक रहीं हैं। इसमें तो दो राय नहीं कि 8 जुलाई को आतंकवादी बुरहान वानी और उसके दो साथियों के मुठभेड़ में मारे जाने के बाद जो हिंसा एवं उपद्रव आरंभ हुआ वह अवांछित था। 2010 मे ंचार लोगों के गलत तरीके से मारे जाने का मामला था और उसको आधार बनाकर ंिहंसा कराने वालों को अपने पक्ष में कुछ तर्क भी मिल सकता था। इस बार आतंकवादी के मारे जाने का मामला है। चाहे अलगाववादी जो तर्क दें, पूरे देश में और दुनिया के स्तर पर भी लोगों को यही लग रहा है कि ये सब आतंकवादियों के समर्थक हैं। इसलिए उनके प्रति पाकिस्तान के घड़ियाली आंसू के अलावा किसी की सहानुभूति नहीं हो सकती। यहां तक कि हुर्रियत से बातचीत का सुझाव देने वाले भी सार्वजनिक तौर पर नहीं कह सकते कि आतंकवादी का मारा जाना गलत था और इसलिए आपका गुस्सा जायज है।

हुर्रियत या अलगाववादी समस्या के मूल में हैं। कश्मीर में आतंकवाद और हिंसा के पिछले ढाई दशकों के इतिहास में अलगाववादी इस बार जितने नंगे हुए हैं उतना पहले कभी नहीं हुए। मीडिया की कृपा से उनकी पूरी कलई खुली है। उन पर आम जनता के कर का भारी रकम खर्च लंबे समय से किया जा रहा है, पर देश के सामने उसका एक-एक पक्ष इस तरह कभी आया नहीं था। जिस ढंग से इस विषय को रखा गया उससे देश का माहौल यह बना है कि अरे, ये हमारे पैसे पर ऐश करते हैं और हमारे देश को ही गाली देते हैं! बंद करो इनको धन देना, रोक दो इनकी सुविधाएं....। यह माहौल भारत में इसके पहले कभी नहीं बना था। ये भी अच्छा हुआ कि सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के कुछ सदस्य सुर्खरु बनने के चक्कर में इनके दरवाजे खटखटाने पहुंच गए और इनने उनसे बातचीत नहीं की। बहुमत जनता ने उन छः सांसदों के इस व्यवहार को ठीक नहीं माना, लेकिन हुर्रियत के नेताओं के इस व्यवहार ने उनके खिलाफ आक्रोश को और घनीभूत किया है। कभी यह कल्पना नहीं की जा सकती थी कि पीडीपी और मेहबूबा मुफ्ती खुलकर हुर्रियत की आलोचना करेंगी। आप देख लीजिए, मेहबूबा कह रहीं हैं मेहमान को दरवाजे से वापस करके इनने उनका नहीं अपना अपमान किया है। मेहबूबा ने तो यहां तक कह दिया कि ये गरीब के बच्चों के हाथों में पत्थर पकड़ाते हैं और वे मरते हैं। अगर पत्थरबाजी में इनके बच्चे मरे या घायल हुए हों तो मैं राजनीति छोड़ दूुगी। मेहबूबा का यह रुख असाधारण है। उनका और उनकी पार्टी की सोच अलगाववादियों के प्रति नरमी और सहानुभूति का रहा है।

हुर्रियत के इसी व्यवहार ने नरेन्द्र मोदी सरकार के इस निर्णय को बल प्रदान किया कि उनसे बात नहीं करनी है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह को जम्मू में यह कहने का अवसर मिल गया कि ये कश्मीरियत, जम्हूरियत और इन्सानियत तीनों में विश्वास नहीं करते। राजधानी दिल्ली में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल की बैठक के बाद सरकार ने साफ किया कि जो बात करने के इच्छुक हैं उनसे बात की जाएगी लेकिन देश के संप्रभुता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। हालांकि मेहबूबा मुफ्ती ने भी पीडीपी के अध्यक्ष के रुप में हुर्रियत नेताओं को पत्र लिखकर सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल से बात करने को आमंत्रित कर दिया था, लेकिन उनको भी पता था कि वे नहीं आने वाले। जाहिर है, अब उनके खिलाफ कोई कार्रवाई होगी तो मेहबूबा भी उनके साथ खड़ी नहीं हो सकतीं। पहली बार इतनी गहराई से एनआईए हुर्रियत नेताओं सहित कइयों के लेनदेन की जांच कर रही है जिनमें सैयद अली शाह गिलानी का बेटा भी है। हवाला से धन आने का भी खुलासा हो जाए तो इनका पक्ष और कमजोर होगा।

अन्य दलों और समूहों ने जो बातें रखीं उनकी सूची देखें तो उसमें पुरानी बातें ही हैं अफस्फां हटे, पैलेट गनों का प्रयोग बंद हो, राजनीतिक समाधान हो, ज्यादा स्वायत्तता मिले.... आदि आदि। सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के पूर्व राजनाथ सिंह दो बार श्रीनगर जाकर राजनीतिक दलों और नागरिक समूहों से मिल चुके थे। जम्मू कश्मीर का सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री से भी आकर अपनी बात रख चुका था। तो सरकार के सामने यह साफ था कि वहां के दल क्या चाहते हैं और समस्या क्या है? आज का सच यह है कि किसी दल या समूह ने वर्तमान संकट या कश्मीर समस्या के समाधान का कोई ठोस सूत्र नहीं दिया। यानी सब अंधेरे में तीर चला रहे हैं। वर्तमान हिंसा दक्षिण कश्मीर के मूलतः चार जिलों तक सीमित है। उसे विस्तारित करने की कोशिशें हो रहीं हैं और उनके भय से गांवों में भी लोग इनकी सभाओं में आ रहे हैं। किंतु यह स्थिति किसी समय बदल सकती है।

लंबे समय बाद पाकिस्तान ने कश्मीर पर पुरानी उग्रता दिखाकर भारत भर में गुस्सा पैदा किया है और यह धारणा पुष्ट हुई है कि जो कुछ हो रहा है उसके पीछे पाकिस्तान है। 2010 और 2008 की हिंसा के समय पाकिस्तान का ऐसा रुख नहीं था। पाकिस्तान ने अपने व्यवहार से कश्मीर पर दिखावे के लिए भी बातचीत की संभावना पर तत्काल विराम दे दिया है। इसे अच्छा ही मानना चाहिए। कश्मीर का संकट इसलिए अनसुलझा रहता था कि हम कभी पाकिस्तान से बातचीत की भावुकता में फंसते थे तो कभी हुर्रियत का मत समझने की कोशिशों में। माकपा के सीतराम येचुरी और उनके जैसे कुछ नेता भले हुर्रियत और पाकिस्तान से बातचीत की वकालत करे, इस राय का भारत मंे आज खरीदार नहीं है। वैसे भी जो नेता देशद्रोही नारा लगाने वालों के खिलाफ खड़े हो सकते हैं, उनको हीरो बना सकते हैं उनसे हम कश्मीर मामले पर माकूल कठोर कदम के समर्थन की उम्मीद नहीं कर सकते। आज सरकार के पास उनको जवाब देने का आधार है कि ये हुर्रियत जब आपसे बात को तैयार नहीं हुए, पाकिस्तान जब कश्मीर में आग लगाने पर तुला है तो उसका सामना करें कि बात करें।

सरकार ने आजादी के बाद पहली बार गिलगित बलतिस्तान सहित पाक अधिकृत कश्मीर पर खुलकर हक जताया है। पाकिस्तान से पूछकर कि आप इसे कब खाली कर रहे हैं कश्मीर समस्या के स्वरुप को बदलने की रणनीति अपनाई है। बलूचिस्तान के बारे मंे प्रधानमंत्री के एक वक्तव्य नें बलूच राष्ट्रवाद की ज्वाला को फिर से प्रज्वलित कर दिया है। भारत जहां तक आगे बढ़ गया है उसमें पीछे हटने की संभावना फिलहाल नहीं है। इसमें केन्द्र सरकार को अपने नजरिए से पहल करने या कदम उठाने में बहुत ज्यादा समस्या नहीं है। वैसे भी 2014 के आम चुनाव में कश्मीर भी एक प्रमुख मुद्दा था और नरेन्द्र मोदी को जनादेश इसके अपने दृष्टिकोण से समाधान के लिए मिला था। लोकतंत्र में आप सर्वदलीय बातचीत करें, प्रतिनिधिमंडल ले जाएं, सबसे विचार करें, यहां तक कोई समस्या नहीं है, लेकिन अपेक्षा यही होगी कि आप अपना दृष्टिकोण साफ रखें और बिना किसी हिचक के कदम उठाएं। यह संकट वाकई समाधान का आधार बन सकता है। वर्तमान संकट या पूरी कश्मीर समस्या सैन्य-राजनीतिक समस्या है और इसका समाधान इसी रास्ते हो सकता है। सरकार हिंसा रोकने के लिए कठोर कदम उठाए, हुर्रियत की सारी सुविधाएं वापस ले, े धन के स्रोतों की जांच कर उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करे और साथ में कश्मीर के आम आदमी के विकास और रोजगार के लिए जो आर्थिक राजनीतिक निर्णय करने हो वह भी करे। दूसरी ओर बलूचिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर पर तीव्र कूटनीति से पाकिस्तान को उलझने को मजबूर करे। किंतु इन सबके लिए दृढ़ संकल्प की आवश्यकता है। परिस्थितियां आपके पक्ष में हैं, कुछ विरोधी खड़े हो सकते हैं, मानवाधिकार के नाम पर छातियां पीट सकते हैं, कुछेक नेता संसद में हंगामा करने की कोशिश कर सकते हैं...इनसे अप्रभावित हुए सरकार को काम करना होगा। फिर देखिए जो कुछ वर्षों में नहीं हुआ वह चमत्कार हमंें देखने को मिल सकता है।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरः01122483408, 09811027208

 

 

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