शनिवार, 13 सितंबर 2025

पाकिस्तान के साथ खेल, कला और व्यापार जैसी गतिविधियों को जारी रखना शहीदों के बलिदान का अपमान है: बलविंदर सिंह

संवाददाता

नई दिल्ली। भारत और पाकिस्तान के बीच एशिया कप क्रिकेट मैच ने एक बार फिर से पूरे देश का ध्यान खींचा है। बलविंदर सिंह, उपाध्यक्ष, दिल्ली प्रदेश, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) ने कहा कि जब सीमा पर हर रोज हमारे जवान शहादत दे रहे हों, जब आतंकवादी हमलों में निर्दोष भारतीय नागरिक अपनी जान गँवा रहे हों, तब पाकिस्तान के साथ खेल, कला और व्यापार जैसी सामान्य गतिविधियों को जारी रखना शहीदों के बलिदान का अपमान है।

बलविंदर सिंह ने कहा कि भारत-पाकिस्तान मैच का आयोजन गलत संदेश देता है। खेल को हम भाईचारे और सद्भाव का प्रतीक मानते हैं, लेकिन पाकिस्तान के साथ खेलना तब तक उचित नहीं है जब तक वह आतंकवाद को समर्थन देता रहेगा। यह केवल एक मैच नहीं है, बल्कि करोड़ों भारतीयों की भावनाओं और सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है।

भाजपा का रवैया हमेशा से ही विरोधाभासी रहा है। एक ओर भाजपा के नेता मंचों से कहते हैं “खून और पानी साथ नहीं बह सकते”। दूसरी ओर उन्हीं की सरकार पाकिस्तान के साथ व्यापार जारी रखती है।जनता के सामने वे कड़े तेवर दिखाते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे क्रिकेट मैचों और अन्य संबंधों को अनुमति देते हैं। यही भाजपा का असली चेहरा है—जनता के लिए भाषण, और सत्ता के लिए समझौता।

बलविंदर सिंह ने भाजपा से सवाल किए - 1. यदि पाकिस्तान वाकई दुश्मन देश है, तो उसके साथ क्रिकेट और व्यापारिक संबंध क्यों जारी हैं?
2. भाजपा सरकार के राज में ही बार-बार भारत-पाकिस्तान मैच क्यों आयोजित किए जाते हैं?
3. क्या "खून और पानी" जैसे बयान केवल चुनावी भीड़ को भड़काने और वोट बटोरने के लिए दिए जाते हैं?

बलविंदर सिंह का स्पष्ट मत है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा देता है, तब तक उससे किसी भी तरह का खेल या व्यापारिक रिश्ता बंद होना चाहिए।

यदि भाजपा वास्तव में राष्ट्रवाद की राजनीति करती है, तो उसे दोहरा रवैया छोड़कर देश के सामने ईमानदार नीति रखनी चाहिए।

शहीदों के परिवारों की भावनाओं से खिलवाड़ कर वोट की राजनीति करना सबसे बड़ा पाप है।

 भाजपा जनता को गुमराह करना बंद करे।
देश को झूठे राष्ट्रवाद की नहीं, बल्कि स्पष्ट, ठोस और सच्ची नीति की जरूरत है।
शहीदों के खून का सम्मान किया जाए, और जब तक पाकिस्तान अपनी नीतियां नहीं बदलता, तब तक उसके साथ हर तरह का संबंध—खेल और व्यापार सहित—तुरंत रोका जाए।

शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

भागवत के शताब्दी संवाद से निकले संदेश

अवधेश कुमार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से राजधानी दिल्ली में 100 वर्ष की संघ -  यात्रा: नए क्षितिज पर तीन दिवसीय संवाद सत्र का आयोजन हो तो देश और विदेश में उस पर गंभीरता से चर्चा और विमर्श बिलकुल स्वाभाविक है। राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम के बवंडरों के बीच सार्थक और सकारात्मक संवाद को मीडिया में सर्वत्र स्थान मिलना बताता है कि धीरे-धीरे बौद्धिक और सक्रिय वर्ग के अंदर संघ के प्रति कायम मानसिकता में अनुकूल बदलाव आ रहा है। संघ के सरसंचालक डॉ मोहन भागवत ने शताब्दी वर्ष कार्यक्रम के औपचारिक शुरुआत के पूर्व ही विज्ञान भवन में दो दिनों तक बातें रखीं तथा तीसरे दिन प्रश्नों के उत्तर दिए तो निश्चय ही इसका अपना व्यापक उद्देश्य हो रहा होगा। तीन दिनों का ऐसा कार्यक्रम ,जिसमें उठने वाले अधिकतर प्रश्नों के उत्तर आ गए हों उनके एक-एक बिंदु का विस्तार से विवरण देना संभव नहीं हो सकता। बिल्कुल सरल , सहज , सामान्य भाषा और शब्दावलियों में संघ किन स्थितियों में और क्यों उत्पन्न हुआ, प्रयोजन क्या है, अभी तक यात्रा के अनुभव कैसे आए, संगठन के नाते उसका चरित्र कैसा है तथा आगे समाज, देश और विश्व की दृष्टि से किन लक्ष्यों और योजनाओं पर सक्रिय है एवं रहेगा आदि विषयों को समझा देना सामान्य बात नहीं है। आलोचक और विरोधी कुछ भी कहे, किंतु क्या हमारे देश में कोई संगठन है, जो अपने चिंतन या विचारधारा, संपूर्ण समाज, देश और विश्व की कल्पना तथा उन दृष्टियों से किए जाने वाले कार्यों को राजधानी दिल्ली और आसपास के बौद्धिक वर्ग, एक्टिविस्टों, एनजीओ, पत्रकारों,  विदेशी राजनयिकों तथा समाज के इस हर क्षेत्र में सक्रिय प्रतिनिधियों को बुलाकर तीन दिनों तक संवाद कर सके?

आज के भारत और विश्व के परिप्रेक्ष्य में देखें तो इस संवाद का सबसे महत्वपूर्ण स्वरुप किसी के लिए भी एक शब्द विरोध या कटुता तथा निराशा भाव का लेश मात्रा भी उपस्थित नहीं होना। आरंभ में डॉ भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ की उत्पत्ति का मूल तथा प्रयोजन एक ही है जो हम प्रतिदिन शाखा में प्रार्थना के बाद कहते हैं- भारत माता की जय।हमारा देश भारत विश्व गुरु बने पहले दिन भी यह हमारा ध्येय था और आगे भी रहेगा। विश्व गुरु का अर्थ किसी को सीख देना नहीं अपने व्यवहार से आदर्श उत्पन्न करना ताकि दूसरे हमसे सीखें। भारत इसलिए कि हर देश का अपना ध्येय होता है जिसे उसे प्राप्त करना पड़ता है। भारत का ध्येय संपूर्ण विश्व का कल्याण है। केवव भारतीयों ने ही अपने अंदर देखते - देखते संपूर्ण ब्रह्मांड से साक्षात्कार किया। तो स्वयं को ब्रह्मांड का अंग मानने वाला भारत कभी संकुचित स्वार्थ या दूसरों को कुचलने उन पर प्रभुत्व जमाने का चरित्र अपना ही नहीं सकता। इस देश ने दूसरों के कल्याण के लिए अपने स्वार्थ को तिलांजलि देने का उदाहरण प्रस्तुत किया है। संघ के आविर्भाव के पीछे डॉ केशव बलिराम हेडगेवार की स्वतंत्रता आंदोलन की सक्रिय भूमिका थी। उन्होंने क्रांतिकारी धारा, उसके बाद कांग्रेस,समाज सुधार और धर्म सुधार आंदोलनों की अपनी भूमिकाओं से समझा कि जिन कारणों से भारत लंबे समय तक गुलामी झेलता रहा उनको दूर करना तथा फिर वैसी स्थिति उत्पन्न न होने देना ही एकमात्र रास्ता है। इसीलिए उन्होंने हिंदू समाज के संगठन के रूप में संघ के शुरुआत की घोषणा 1925 में की। इसके साथ सुनिश्चित किया कि  संघ केवल शाखा के माध्यम से उस रूप में मनुष्य का निर्माण करेगा, स्वयंसेवक बनाएगा। संघ इसके अलावा कुछ नहीं करेगा लेकिन स्वयंसेवक सब कुछ करेंगे।

बनी बनाई धारणाओं से बाहर निकाल कर देखें तो संघ का यही चरित्र आपको प्रत्यक्ष दिखाई पड़ेगा। जिन्हें संघ का अनुषांगिक क्षेत्र कहा जाता है वे सारे संगठन स्वयंसेवकों द्वारा आरंभ किए गए। वे संघ के स्वयंसेवक हैं, इसलिए उनके साथ प्रत्यक्ष जुड़ाव रहता है। लेकिन जैसा भागवत ने कहा हम नियंत्रित नहीं करते सभी स्वायत्त हैं। नए क्षितिज के व्याख्यान में भागवत ने पांच परिवर्तनों की बात की। पिछले 1 वर्ष से संघ की ओर से पांचो विषय अर्थात कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, स्वदेशी और आत्मनिर्भरता ,पर्यावरण तथा नागरिक कर्तव्य बोध देश के सामने रखे जा रहे हैं। समाज संबंधहीनता की ओर बढ़ रहा है तथा परिवार परंपरा कमजोर होने, टूटने से ऐसी समस्याएं बढ़ती जा रही हैं जिनका कोई समाधान नहीं। इसलिए शताब्दी वर्ष में सबसे ज्यादा जोर इसी पर है। सामाजिक समरसता यानी समाज में कोई ऊंच-नीच नहीं, छुआछूत नहीं।

डॉ. भागवत ने कहा कि आज जाति की भूमिका है नहीं ,लेकिन हमारे अंदर यह है कि हम फलां जाति के वह फलां जाति के और इससे ऊंच- नीच का भाव पैदा होता है। तो श्मशान , पानी और देवस्थान सभी के लिए ये समान रूप से उपलब्ध हों, हमारे एक दूसरे के घर जाने- आने का संबंध विकसित हो। स्वदेशी-  जो कुछ देश में उपलब्ध है  पहले उसे लें उसके बाद विदेशी की ओर। विकास के वर्तमान ढांचे ने पूरे विश्व के समक्ष पर्यावरण का ऐसा संकट पैदा किया जिससे हमारा अस्तित्व  खतरे में है। रास्ता प्रकृति को केंद्र में रखकर जीवन प्रणाली अपनाना है। चाहा है वहां से एकाएक नहीं मुड़ सके थे लेकिन धीरे-धीरे टर्न होना पड़ेगा। प्रत्येक व्यक्ति के अंदर अपने देश व समाज के प्रति दायित्व पालन का चरित्र पैदा हो। संविधान, कानून और व्यक्तिगत सामाजिक गरिमा के स्पालन करने का सामूहिक चरित्र ही भारत को विश्व गुरु बनाएगा। स्वयंसेवक पूरे वर्ष लोगों के बीच यही बिंदु लेकर जाएंगे।

इनमें वे विषय भी आए जिन पर सबसे ज्यादा विवाद खड़े होते हैं। अर्थात हिंदू ही क्यों ? भागवत ने कहा कि आप हिंदवी कहिए भारतीय कहिए हमें आपत्ति नहीं है। हिंदू  का कंटेंट यानी विषय वस्तु हमारे लिए महत्वपूर्ण है। हिंदू यानि व्यापक व उधर सोच तथा व्यवहार। हम अपने विचार ,संस्कृति पर गर्व करें लेकिन दूसरे का जो है उसे सम्मान दें, उनसे नफरत न करें। मुसलमानों और ईसाइयों से विरोध और नफरत क्यों? भागवत ने कहां कि रामकृष्ण परमहंस ने तीनों पद्धतियों से साधना कर बताया कि सब एक ही जगह पहुंचते हैं। यहीं पर उन्होंने कहा कि 40 हजार वर्षों से हमारा डीएनए एक है केवल कर्मकांड बदला है। भागवत ने कहा कि मुसलमानों के अंदर भय पैदा किया कि आप उनके साथ मिलकर रहोगे तो मजहभ खत्म हो जाएगा और हमारे अंदरभाव है कि इन्होंने लड़ाइयां लड़ीं, धर्म परिवर्तन किया, देश बांटा, इसलिए इनको शंका से देखो। इन दोनों  से बाहर निकल परस्पर संवाद और सहकार की आवश्यकता है। तो हिंदू, मुसलमान औल ईसाई आदि को लेकर यही है संघ की सोच। राष्ट्रभाषा? भारत की सभी भाषाएं राष्ट्रभाषा है। हां , व्यवहार के लिए कोई एक भाषा अखिल भारतीय होनी चाहिए। अंग्रेजी सीखने जानने में बुराई नहीं है क्योंकि उनमें भी हमारे लिए बहुत कुछ है किंतु अंग्रेजी या विदेशी भाषा हमारी राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि हस्ताक्षर हम अपनी भाषा में शुरू करें और इसे लेकर गर्व करें। भारत को समझने के लिए संस्कृत जानना चाहिए लेकिन हम इसे अनिवार्य नहीं कर सकते। सरकार और नीतियों के संदर्भ में इतना ही कि हमारी विशेषज्ञता शाखा लगाने, मनुष्य निर्माण करने की और उनकी विशेषज्ञता राजनीति करने ,सरकार चलाने की है। वह अपना काम करते हैं हम अपना काम। हमें कुछ समझ में आता है तो सुझाव देते हैं। संघ भाजपा को नहीं चलाता और चला भी नहीं सकता है। सबसे बढ़कर मोहन भागवत ने यह कहा कि हम किसी को भी अपना विरोधी और शत्रु मानकर व्यवहार नहीं करते, इसीलिए कल के अनेक विरोधी आ साथ हैं और कल और भी आएंगे। विरोध करने वाले भी अपने ही हैं यह मानकर स्वयंसेवक व्यवहार करते हैं और यही बना रहेगा। सबके बावजूद उनका आग्रह था कि आप धारणाओं के आधार पर या हमारे कहे अनुसार संघ को मत मानिए अंदर आकर इसे देखिए समझिए।

भागवत के पूरे संवाद को निष्पक्ष होकर देखें तो निष्कर्ष आएगा कि 100 वर्षों की उम्र सीमा में पहुंचने के बाद विचारधारा तथा स्वयंसेवकों द्वारा विविध क्षेत्रों में किए गए कार्यों के अनुभव ने संगठन के अंदर अतुलनीय आत्मविश्वास उत्पन्न किया है, समाज, देश और विश्व के व्यवहारिक यथार्थ की समझ विकसित होने के साथ उनके समाधान के रास्तों की भी गहरी अनुभूति हुई है। यही कारण है कि शताब्दी वर्ष पर उपलब्धियां और उत्सव मनाने की जगह भागवत ने संवाद के दूसरे दिन उन रास्तों पर कार्य करने की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की। हालांकि वहां उपस्थित जनसमूह के अलावा सोशल मीडिया या  मुख्य मीडिया  के माध्यम से देखा, पढ़ा , जाना उनमें से हर कोई अपनी सोच के अनुसार कुछ बिंदु निकल सकता है। कुल मिलाकर कहा सकते हैं कि यह संवाद विरोधियों के अंदर संघ पर पुनर्विचार करने, समर्थकों के अंदर सोच को सही धरातल पर खड़ा करने एवं स्वयंसेवकों के भीतर दायित्व बोध के साथ अपनी भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करने वाला माना जाएगा।

गुरुवार, 4 सितंबर 2025

परिवर्तन एवं महिला शक्ति संगठन व एनसीपी (एसपी) दिल्ली इकाई ने बाढ़ पीड़ितों को दी खाद्य सामग्री, जनता से की अपील आगे आकर पीड़ितों की मदद करें


संवाददाता

नई दिल्ली। दिल्ली में आई बाढ़ से हजारों परिवार प्रभावित हुए हैं। कई लोग अपने घरों से बेघर होकर राहत शिविरों में शरण लिए हुए हैं। इस कठिन समय में परिवर्तन एवं महिला शक्ति संगठन (PEMSS) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) दिल्ली प्रदेश इकाई ने मिलकर राहत कार्यों की कमान संभाली है और लगातार बाढ़ पीड़ित परिवारों को भोजन व पेयजल उपलब्ध कराया जा रहा है।


संस्था के संस्थापक एवं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) दिल्ली प्रदेश उपाध्यक्ष बलविंदर सिंह, संस्था की चेयरमैन मीनाक्षी तथा फाउंडर मेंबर सुशील सैनी, राज कुमार, योगेश, उमेश, करन, परविंदर सिंह, मो. ईशा, अकरम, भारती, गुरप्रीत सिंह, अंकुर राणा, प्रतीक पूर्वाह, मदन, राहुल शर्मा, अरुण यादव, प्रदीप बौद्ध, कैलाश जी सहित सभी सक्रिय साथियों की टीम राहत कार्यों में लगातार जुटी हुई है।

राहत कार्य की मुख्य झलकियां- प्रभावित परिवारों के लिए भोजन वितरण केंद्र स्थापित किए गए, राहत शिविरों में स्वच्छ पेयजल की लगातार आपूर्ति सुनिश्चित की गई, संस्था के स्वयंसेवक घर-घर जाकर जरूरतमंदों तक मदद पहुँचा रहे हैं।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) दिल्ली प्रदेश इकाई उपाध्यक्ष, बलविंदर सिंह ने कहा कि बाढ़ पीड़ितों की पीड़ा हमारी अपनी पीड़ा है। यह समय राजनीति करने का नहीं, बल्कि मानवता निभाने का है। जब तक हालात सामान्य नहीं हो जाते, हम अपनी पूरी टीम के साथ हर प्रभावित परिवार तक मदद पहुंचाते रहेंगे।

परिवर्तन एवं महिला शक्ति संगठन (PEMSS)  की चेयरमैन मीनाक्षी ने कहा कि संस्था की शुरुआत ही समाज सेवा के लिए हुई थी और आज जब हजारों लोग संकट में हैं, तो हमारा दायित्व और भी बढ़ जाता है। हमें गर्व है कि हमारे सभी सदस्य तन-मन-धन से इस राहत अभियान में सहयोग कर रहे हैं।

संस्था के फाउंडर मेंबर सुशील सैनी ने कहा कि हमने इस संस्था को समाज की सेवा के उद्देश्य से बनाया था। आज जब लोग कठिन परिस्थिति से गुजर रहे हैं, तो यह हमारा फर्ज है कि हम हर जरूरतमंद तक पहुँचे। सभी सदस्यों का योगदान और जनता का सहयोग इस राहत अभियान को और मजबूत बना रहा है।

श्री गुरप्रीत सिंह ने कहा कि यह राहत अभियान सिर्फ भोजन और पानी पहुँचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य हर प्रभावित परिवार में भरोसा और हौसला जगाना भी है। जब तक हालात सामान्य नहीं होते, हमारी टीम दिन-रात मैदान में डटी रहेगी।

संस्था की जनता से अपील - परिवर्तन एवं महिला शक्ति संगठन (PEMSS) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) दिल्ली प्रदेश ने आम जनता, सामाजिक संगठनों और कॉर्पोरेट जगत से भी अपील की है कि वे राहत कार्य में सहयोग करें, ताकि अधिक से अधिक परिवारों तक मदद पहुँचाई जा सके।



गुरुवार, 28 अगस्त 2025

उपराष्ट्रपति चुनाव में सी पी राधाकृष्णन बनाम न्यायमूर्ति बी सुदर्शन रेड्डी

अवधेश कुमार

भाजपा नेतृत्व वाले राजग के सीपी राधाकृष्णन के विरुद्ध आईएनडीआईए  उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी सुदर्शन रेड्डी को उम्मीदवार बनाने पर कांग्रेस का तर्क है भाजपा ने संघ पृष्ठभूमि वाले को उम्मीदवार बनाया जबकि हमने ऐसे न्यायमूर्ति को सामने लाया है जिनकी संविधान के प्रति प्रतिबद्धता है। इस तरह कांग्रेस इसे विचारधारा से जोड़ने की राजनीति की है । आईएनडीआईए में साफ था कि किसी राजनीतिक दल या वैसे चेहरे के पक्ष में पूरे समूह का वोट सुनिश्चित मानना कठिन होगा। बी सुदर्शन रेड्डी भी दक्षिण के हैं और संयुक्त आंध्र के होने के कारण विपक्ष की सोच है कि भाजपा के सहयोगियों तेलुगूदेशम, जन सेना के साथ तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति के सामने दुविधा पैदा होगी। दोनों सदनों के अंकगणित को देखें लोकसभा की प्रभावी सदस्य संख्या 542 और राज्यसभा की 240 है। तो उपराष्ट्रपति चुनाव में कुल मतदाताओं की संख्या हुई, 782। राजग की 422 संख्या के अनुसार सीपी राधाकृष्णन का उपराष्ट्रपति बनना प्राय: निश्चित है।

आइए अब उम्मीदवारों के पीछे की रणनीति , उनकी योग्यताएं और  संदेशों को समझें। चंद्रपुरम पोन्नुसामी राधाकृष्णन के व्यक्तित्व में विवादों का स्थान नहीं रहा है। इसलिए उनके विरोध के लिए कोई तथ्य नहीं मिल सकता। वर्तमान में महाराष्ट्र के राज्यपाल के पूर्व झारखंड के भी राज्यपाल रहे तथा इसी बीच कुछ समय के लिए तेलंगाना और पुडुचेरी का भी अतिरिक्त प्रभार उनके पास रहा। लगातार जनता के बीच जाने के लिए झारखंड एवं महाराष्ट्र में यात्राएं करने के बावजूद राजनीतिक विवाद न होना या राजनीतिक दलों द्वारा प्रश्न खड़ा न किया जाना उनकी व्यवहारिक विवेकशीलता का प्रमाण है। वह 1998 और 1999 में दो बार तमिलनाडु के कोयंबटूर से लोकसभा सांसद रह चुके हैं। इसलिए कोई उन्हें संसदीय प्रणाली से भी अनभिज्ञ नहीं कह सकता। उनका राजनीतिक कैरियर लगभग पांच दशक का है। वे‌ तमिलनाडु में भाजपा के सचिव और अध्यक्ष रह चुके हैं। वैसे तमिलनाडु से ही सर्वपल्ली राधाकृष्णन पहले उपराष्ट्रपति और बाद में राष्ट्रपति बने जो न कभी किसी सदन के सदस्य रहे और न किसी दल से जुड़े थे। हां तमिलनाडु से दूसरे उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति बीबी गिरी अवश्य गवर्नर का पद संभाल चुके थे। इसलिए विपक्ष के पास इस आधार पर भी आलोचना का कोई कारण नहीं है।

सुदर्शन रेड्डी आंध्रप्रदेश और गुवाहाटी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहे और 2007 से 2011 तक उच्चतम न्यायालय में। नवर्तमान तेलंगाना की कांग्रेस सरकार ने जब सामाजिक ,आर्थिक, शैक्षणिक, जातीय सर्वेक्षण का फैसला किया तो उसके रिपोर्ट के लिए सुदर्शन रेड्डी की अध्यक्षता में ही एक समिति बनाई थी। इस तरह कांग्रेस के साथ उनका संपर्क था। हालांकि जब वे गोवा के लोकायुक्त थे तब कांग्रेस ने विरोध  किया था। उस समय उनकी नियुक्ति भाजपा सरकार की ओर से हुई थी और इसलिए कांग्रेस में उन्हें पक्षपाती माना था। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने उन्हें सिविल लिबर्टीज यानी नागरिक स्वतंत्रता का झंडा उठाने वाला न्यायाधीश कहां है। छत्तीसगढ़ में माओवादी हिंसा के विरुद्ध जनता के सलवा जुडूम संघर्ष को उन्होंने असंवैधानिक करार देकर प्रतिबंधित किया था। इस फैसले की तब से आज तक आलोचना हो रही है क्योंकि इसे जनता की अपने जीवन और संपत्ति की रक्षा तथा हिंसा के द्वारा इन्हें नष्ट करने वालों के विरुद्ध संघर्ष का अधिकार छीना गया था। तो इसका संदेश क्या हो सकता है? शीर्ष स्तर पर न्यायाधीश की योग्यता छोड़ दें तो राजनीतिक दृष्टि से कांग्रेस या किसी पार्टी के समर्थकों, नेताओं , कार्यकर्ताओं आदि के बीच इसका कोई विशेष संदेश नहीं गया होगा। कांग्रेस इसे विचारधारा का विषय भले बनाए उसके या आईएनडीआईए दलों के लिए इसमें जनता के बीच आकर्षक राजनीतिक संदेश देने का पहलू नहीं है। कांग्रेस ने पिछली बार जगदीप धनखड़ के विरुद्ध अपनी नेत्री मारग्रेट अल्वा को खड़ा किया था। सो यह दावा नहीं कर सकते कि ऐसे पद के लिए राजनीति से परे हटकर विचार करते हैं। ऐसा लगता है कि विपक्षी दलों  के मत दूसरी ओर जाने से रोकने के लिए सुदर्शन रेड्डी को उम्मीदवार बनाया गया है।

दूसरी ओर साफ दिखता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा ने उम्मीदवार पर गहराई से मंथन किया है।  प्रधानमंत्री मोदी अपनी नीतियों और व्यवहारों से तमिल बनाम अन्य, उत्तर बनाम दक्षिण के भेद को समाप्त करने के लिए सतत कोशिश कर रहे हैं। प्रधानमंत्री संपूर्ण भारत के साथ तमिल संस्कृति और वहां के आस्था स्थलों के जुड़ाव को अलग-अलग तरीकों से रेखांकित करते रहे हैं। काशी तमिल संगम तथा महत्वपूर्ण तमिल ग्रंथों का अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद आदि से तमिल राजनीति के उत्तर दक्षिण, आर्य द्रविड़ ,तमिल गैर तमिल जैसी विभाजनकारी राजनीति का उत्तर देने की भी प्रभावी कोशिश कर कर रहे हैं। भाजपा तमिलनाडु में अपना प्रभावी अस्तित्व बनाने के लिए सक्रिय है। इस दृष्टि से राधाकृष्णन का तमिल और पिछड़ा होने का राजनीतिक अर्थ समझ में आता है। एक राजनेता होते हुए भी राज्यपाल के रूप में अपनी भूमिका का निर्वहन कर  राजनीति को नहीं आने देना उनका ऐसा गुण है जिसकी प्रशंसा दोनों राज्यों के भाजपा विरोधी पार्टियां करतीं हैं। दिन रात भाजपा के विरुद्ध बयान देने वाले शिवसेना उद्धव के नेता संजय राउत ने कहा कि उनका एक अविवादित व्यक्तित्व है। झारखंड से भी उनके बारे में यही आवाज है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक आंध्र की पार्टियों से सुदर्शन रेड्डी को समर्थन देने की घोषणा नहीं है जबकि जगनमोहन रेड्डी राधाकृष्णन के समर्थन का बयान दे चुके हैं।

वैसे राधाकृष्णन को उम्मीदवार बनाने का भाजपा की दृष्टि से महत्वपूर्ण संदेश दूसरे हैं। पहले सत्यपाल मलिक और बाद में जगदीप धनखड़ के अनुभव से सीख लेते हुए ऐसा लगता है कि भाजपा पूरी तरह परीक्षित नेता को ही महत्वपूर्ण स्थानों पर लाने की नीति की ओर अग्रसर हो रही है। ऐसा होता है तो यह नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल का महत्वपूर्ण पड़ाव होगा। पिछले लोकसभा चुनाव में कार्यकर्ताओं और समर्थकों के असंतोष के पीछे यह एक प्रमुख कारण था जिसके क्षति भाजपा को उठानी पड़ी । राधाकृष्णन की पूरे राजनीतिक जीवन में वैचारिक प्रतिबद्धता स्पष्ट रही है। तमिलनाडु में तमिल और सनातन विभाजन के विरुद्ध तथा सनातन संस्कृति के पक्ष में वे प्रखर रहे हैं। कोयंबटूर में 1997 के दंगों के बीच उनकी भूमिका को हिंदू संगठनों ने काफी सराहा। जिन लोगों को पिछली सदी के अंतिम दशक में तमिलनाडु के अंदर बढ़ते मुस्लिम कट्टरवाद , दंगों और आतंकवाद की जानकारी है वे उनके कार्य को भली-भांति समझते हैं। 18 फरवरी 1998 को लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान लालकृष्ण आडवाणी की सभा के कुछ समय पूर्व सभा स्थल से लेकर जहां-जहां से सभा में लोग आने थे श्रृंखलाबद्ध विस्फोटों ने पूरे प्रदेश को हिला दिया। राधाकृष्णन तब वहां से भाजपा के उम्मीदवार थे। तत्काल 58 लोग मारे गए एवं 200 के आसपास घायल हुए थे। राधाकृष्णन ने घायलों से लेकर मृतकों के परिवारों की सहायता तथा आतंकवादियों एवं उनके समर्थकों के विरुद्ध जिस तरह निर्भीक होकर काम किया उससे उनका व्यापक जन समर्थन बढ़ा । वह करीब डेढ़ लाख मतों से विजित हुए। उनका आत्मविश्वास इतना बढ़ गया था कि 1999 के मध्यावधि चुनाव में उन्होंने घोषणा ही कर दिया कि यहां से भाजपा को वोट मांगने की आवश्यकता नहीं।    भाजपा के शुद्ध वैचारिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति के पक्ष में संपूर्ण राजग का एकजुट होना साबित करता है कि नरेंद्र मोदी द्वारा सत्ता संभालने के बाद राजनीति भाजपा के संदर्भ में कहां से कहां पहुंच गई है। यह राजग के भीतर वैचारिक द्वंद्व की संभावनाओं को तत्काल खारिज करने वाला संदेश है।  वैसे भी बिहार चुनाव के वक्त कोई पार्टी इस आधार पर दगा करेगी यह कल्पना ही बेमानी है। महाराष्ट्र में भी शिवसेना शिंदेऔर राकांपा अजीत पवार द्वारा किसी तरह के विचलन की  संभावना नहीं दिखती। चंद्रबाबू नायडू ने 2019 में भूल कर दिया था जिसका परिणाम उनको भुगतना पड़ा। काफी संघर्ष के बाद वे सत्ता में लौटे है। इस स्थिति में वे विपक्ष का साथ दे देंगे ऐसी कल्पना कठिन है। इसके उल्ट क्या महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की मुलाकात का असर हो सकता है? प्रियंका चतुर्वेदी ने प्रधानमंत्री के साथ मुलाकात की अपनी एक तस्वीर स्वयं सार्वजनिक किया। कांग्रेस द्वारा इस विचारधारा की लड़ाई बताने के बाद अगर भाजपा की वैचारिक प्रतिबद्धता वाले उम्मीदवार के पक्ष में दूसरी ओर का कुछ वोट भी आता है तो यह भाजपा नेतृत्व के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। वस्तुत: यह भारत की भावी राजनीति के लिए दिशा संकेतक होगा।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 110092, मोबाइल-9811027208

गुरुवार, 21 अगस्त 2025

इस अशोभनीय स्थिति का अंत हो तो कैसे

अवधेश कुमार

यह अभूतपूर्व अशोभनीय और अनेक अर्थों में अस्वीकार्य व  आपत्तिजनक स्थिति है। देश के कुछ नेता और राजनीतिक दल चुनाव आयोग के विरुद्ध संसद से सड़क तक अभियान चलाएं इसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी। अगर आईएनडीआईए सांसदों की बैठक में चुनाव आयोग के विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव जैसा प्रस्ताव लाने की बात उठी तो एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में इससे डरावनी स्थिति कुछ हो ही नहीं सकती। हालांकि इस सत्र का अवसान हो रहा है और इसमें प्रस्ताव आ नहीं सकता। दूसरे, प्रस्ताव आया भी तो सदस्य संख्या के हिसाब से यह गिर जाएगा। किंतु इस पर विचार होना ही अंदर से हिला देने वाला है। चुनाव आयोग ने पत्रकार वार्ता में स्पष्ट बोला है कि या तो  जो आरोप लगा रहे हैं उसका प्रमाण दें नहीं तो क्षमा मांगे। दूसरी ओर बिहार में वोट अधिकार यात्रा के नाम से यात्रा कर रहे राहुल गांधी ने सासाराम में यात्रा आरंभ करते हुए कहा कि न हम चुनाव आयोग से डरने वाले हैं और न तेजस्वी यादव। राहुल गांधी और उनके रणनीतिकारों - सलाहकारों तथा इनके पिछले लंबे समय से चुनाव आयोग और संपूर्ण चुनाव प्रणाली की साख पर चोट करने के लगातार अभियानों पर दृष्टि रखने वाले जानते हैं कि उनकी ऐसी ही प्रतिक्रिया आती रहेगी। चुनाव आयोग द्वारा पहले अपने आरोपों पर शपथ पत्र मांगने के विरुद्ध उनकी प्रतिक्रिया थी कि मुझे शपथ पत्र देने की आवश्यकता नहीं। उन्होंने यह तर्क दे  दिया कि मैंने संविधान की शपथ लिया है तो उससे बड़ा शपथ क्या हो सकता है। साफ है कि जब वह बार-बार चुनाव आयोग को भाजपा का एजेंट बता रहे हो और आईएनडीआईए के घटकों से उन्हें समर्थन भी मिल रहा हो तो वे क्यों पीछे हटेंगे? भारतीय राजनीति में संवैधानिक संस्थाओं के प्रति गरिमा और मर्यादा का भाव होता तो चुनाव आयोग के विरुद्ध इस तरह की भाषा प्रयोग नहीं की जाती।

राहुल गांधी  ने  चुनाव आयोग पर सबसे बडा हमला करते हुए अपने 1 घंटे 11 मिनट के वक्तव्य में 21 पृष्ठों के पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन से साबित करने की कोशिश की कि चुनाव आयोग भाजपा की मदद करने के लिए मतदाता सूची में जबरदस्त गड़बड़ी करता है और जहां भाजपा को चुनाव में पराजित होना चाहिए वहां मतदाताओं की फर्जी संख्या के आधार पर जीत दिला देता है। चुनाव आयोग के विरुद्ध नई लड़ाई का आरंभ उन्होंने बिहार में 17 अगस्त से 2 सितंबर तक की वोट अधिकार यात्रा से कर दिया। इसका फोकस ही चुनाव आयोग और उसके द्वारा आरंभ एसाईआर यानी विशेष मतदाता पुनरीक्षण अभियान है। राहुल गांधी का पूरा अभियान सुनियोजित है। कांग्रेस पार्टी द्वारा एक वेब पोर्टल बनाकर लोगों से कहा गया है कि कि चोरी के वीरुद्ध जवाब दें  तथा डिजिटल मतदाता सूची के मांग का समर्थन करें। कहने का तात्पर्य कि लंबी तैयारी से कांग्रेस पार्टी ने इसे आरंभ किया है। चूंकि इस तरह कभी राजनीतिक पार्टियों के नेताओं को चुनाव आयोग के विरुद्ध आरोप लगाते और अभियान छेड़ते नहीं देखा गया इसलिए यह निष्कर्ष निकालना कठिन है कि आखिर इसका परिणाम क्या आएगा? इसका अंत कैसे होगा? इसका अंत होगा या नहीं?

आखिर चुनाव आयोग क्या करे? राहुल गांधी ने कर्नाटक के मध्य बेंगलुरु संसदीय क्षेत्र के महादेवपूरा विधानसभा का अपने दृष्टि से आंकड़ा दिया उस पर पहले ही कर्नाटक चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण आ चुका है। उन्होंने पांच विधानसभा में जीतने और एक में भाजपा के वोट बढ़ जाने से पराजय को चुनाव आयोग की चोरी बता दिया। उनके अनुसार  दोनों पार्टियों को मिले वोटों का अंतर 32,707 था लेकिन महादेवपुरा की गणना में अंतर 1,14,046 का रहा। तो 1 लाख से ज्यादा वोटों की चोरी हुई। उन्होंने महाराष्ट्र और हरियाणा दोनों जगह भाजपा की बढ़त के लिए चुनाव आयोग को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। पहले कर्नाटक चुनाव आयोग ने एक महिला मतदाता शकुन रानी द्वारा दो बार वोट डालने के आरोपों का खंडन करते हुए बताया कि आपने जो दस्तावेज दिए उसको मतदान अधिकारी के हस्ताक्षर वाले नहीं थे, आपको कहां से यह जानकारी मिली बताएं? अन्य मतदाता भी सामने आए तथा बताया कि वह उन्होंने एक ही जगह वोट डाला है। राहुल गांधी ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया। उनको उत्तर देना भी नहीं है। उनको पता है कि महाराष्ट्र के धुले लोकसभा सीट पर। भाजपा भी पांच विधानसभा में आगे थी लेकिन मालेगांव सेंट्रल में कांग्रेस को 1 लाख 94000 वोट आ गए और वह जीत गई।  राहुल गांधी इन तथ्यों से अप्रभावित होकर चुनाव आयोग के विरुद्ध अपने अभियान पर कायम हैं। उनके पहले के आरोपों पर भी चुनाव आयोग ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर उत्तर दिया। एक संवैधानिक संस्था की सीमाएं होती है और वह यही कर सकता था। चुनाव आयोग ने वक्तव्य जारी किया कि आप फर्जी मतदाताओं का आरोप लग रहे हैं तो नियम के अनुसार शपथ पत्र दीजिए ताकि निर्धारित प्रक्रिया से जांच की जाए। आयोग ने नेताओं को बातचीत के लिए बुलाया तो राहुल गांधी सारे विपक्षी सांसदों को लेकर जाने लगे। यह क्या है?

चुनाव आयोग के पास कोई विकल्प बचा नहीं था तभी उसे पत्रकार वार्ता आयोजित कर उत्तर देना पड़ा। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने एक-एक प्रश्न का उत्तर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि किसी मतदाता का नाम दो जगह  होने का अर्थ नहीं है कि उसने दोनों जगह मतदान किया ही। इसका अर्थ था कि मतदाता सूची बनाने वालों से कई बार गलतियां हो सकती हैं। यह सच है। अपवादस्वरूप पूरे देश में ऐसे मतदाता होंगे जिनके नाम दो स्थानों पर हो सकते हैं। एक जगह पहले नाम रहा हो और उन्होंने वह जगह छोड़ने के बाद दूसरी जगह भी मतदाता के नाते पंजीकरण कराया हो और पहले वाले को रद्द नहीं कराया हो। कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं जो अवसर मिलने पर दोनों जगह मतदान कर दें। किंतु चुनाव आयोग जानबूझकर योजनापूर्वक ऐसा कर रहा है और वह भी केवल भाजपा का वोट बढ़ाने के लिए यह आरोप भयानक है। अगर चुनाव आयोग किसी पार्टी के पक्ष में है तो हमारी पूरी चुनाव प्रणाली ही पतित है और इसका अंत होना चाहिए। बिना जन आधार के भाजपा चुनाव आयोग द्वारा भ्रष्ट प्रणाली से सत्ता प्राप्त कर रही है तो शासन पर उसकी नैतिक अधिकारही समाप्त हो जाता है। इस तरह यह जघन्य आरोप है। इससे हमारी पूरी लोकतांत्रिक प्रणाली है की साख ही प्रश्नों के घेरे में आ जाती है।

इस दृष्टि से देखें तो राहुल गांधी और उनके सुर में ताल मिलाते विपक्ष के इस अभियान की भयानक गंभीरता समझ में आती है। कहा जा रहा है कि आरोप चुनाव आयोग पर है और जवाब भाजपा दे रही है। चुनाव आयोग भी जवाब दे रहा है। गहराई से देखें तो केंद्रीय सत्ता में होने के कारण आरोप भाजपा पर ही है। आखिर चुनाव आयोग ऐसा कर रहा है तो उसके पीछे कुछ लालच या फिर सत्ता का दबाव ही हो सकता है। यानी भाजपा  सत्ता पर कब्जा करने के लिए चुनाव आयोग में शीर्ष से नीचे तक ऐसे लोगों की नियुक्तियां करता है जो उनके लिए ही काम करे और न करने वालों के विरुद्ध परोक्ष तरीके से कदम उठाता है। किसी पार्टी पर यह आरोप लगाए कि उसकी सत्ता तो केवल चुनाव आयोग द्वारा वोट चोरी करने या लूटने के कारण है तो  वह उत्तर देगा या नहीं? दूसरे , सरकार मानती है कि सारे आरोप आधारहीन एवं गलत इरादे से लगाए जा रहे हैं तो उसका स्वाभाविक दायित्व संवैधानिक संस्थाओं पर लगने वाले आरोपों के विरुद्ध खड़ा होना तथा इसका अंतिम सीमा तक खंडन करना है। सत्तासीन पार्टी या घटक द्वारा ऐसा न करने का अर्थ सारे आरोपों को मौन रहकर स्वीकार करना माना जाएगा। चुनाव चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट नहीं है कि वह अपनी ओर से संज्ञान लेकर मुकदमा शुरू कर दे और सजा भी दे दे। लेकिन आरोप लगाना और खंडन करना भी अंतहीन नहीं हो सकता। प्रश्न यही है कि आखिर इस अशोभनीय स्थिति का अंत कैसे हो? उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियां भी राहुल गांधी एवं विपक्ष को नहीं रोक पा रही। इसलिए स्थिति ज्यादा विकेट है।

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