जन्माष्टमी पर विशेष
शुक्रवार, 15 अगस्त 2025
नियत कर्म करने वाले को कर्तृत्व भाव से युक्त होना होता है
गुरुवार, 14 अगस्त 2025
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष - उर्दू शायरों ने भी कान्हा को लेकर बहुत खूब लिखा है.. हसरत की भी क़बूल हो मथुरा में हाज़िरी
तहसीन मुनव्वर
भारत की अभी हाल ही में ओवल में इंग्लैंड के खिलाफ़ जीत में सिराज और कृष्णा की जोड़ी ने इतिहास रचने का काम किया है. भारत की जीत को लेकर देश के सभी लीडरों ने सिराज के साथ साथ कृष्णा की भी प्रशंसा की. लेकिन सब से अधिक अगर किसी को भारत वासियों का प्यार मिला तो वो सिराज हैं. सिराज की जीत को लेकर एमआईएम प्रमुख सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने उन की भरपूर तारीफ की लेकिन ऐसा प्रतीत हुआ जैसे एक प्रकार से उन्हें हैदराबाद तक ही सीमित करने की कोशिश की. उन्हों ने अपने ट्वीट में लिखा “हमेशा ही विजेता, जैसे हम हैदराबाद में बोलते हैं कि, पूरा खोल दिए पाशा”. सिराज की प्रशंसा करने से आप को कोई नहीं रोकता है लेकिन न जाने क्यों इस ट्वीट से ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि आप एक राष्ट्रीय धरोहर को केवल अपनी गली तक सीमित करने की कोशिश कर रहे हैं. अगर ऐसा है तो फिर सिराज की पूरी मेहनत पर पानी फिर जाता है. यही सोच हमें पूरी तरह से घुलने मिलने नहीं देती. ऐसा केवल एक ही तरफ़ की सोच हो ऐसा भी नहीं है.
हसरत की भी क़बूल हो मथुरा में हाज़िरीसुनते हैं आशिक़ों पे तुम्हारा करम है खास
मौलाना हसरत मोहानी की श्री कृष्ण पर एक कविता है जिस में कहते हैं;
पैग़ाम-ए-हयात-ए-जावेदाँ थाहर नग़्मा कृष्ण बाँसुरी का
फूल की पत्ती से कट सकता है हीरे का जिगरमरद-ए-नादाँ पर कलाम-ए-नरम-ओ-नाज़ुक बेअसरइक़बाल के बहुत से शेरों में हमें गीता के उपदेश सांस लेते महसूस होते हैं;यक़ीं मोहकम, अमल पैहम, मुहब्बत फ़ातिह-ए-आलमजिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरें
गुरुवार, 7 अगस्त 2025
मालेगांव मामले में हिंदू आतंकवाद भगवा आतंकवाद की कहानी बनाई गई
अवधेश कुमार
एनआईए विशेष न्यायालय द्वारा मालेगांव द्वितीय विस्फोट पर दिए गए फैसले के बाद तत्काल टिप्पणी के लिए शब्द तलाशना कठिन है। विश्व में कोई देश नहीं होगा जहां स्थानीय पुलिस को आतंकवादी हमले के पीछे की साजिशें के सच की गंध होने के बावजूद राजनीति के लिए नई कहानी गढ़े जाएं ,निर्दोष लोगों को गिरफ्तार कर व्यापक दुष्प्रचार हो तथा उन्हें सजा दिलाने के लिए नकली गवाह, फर्जी सबूत यहां तक कि जांच अधिकारी तक पैदा कर दिया जाए। आतंकवादी हमला देश पर हमला माना जाता है और उनसे संघर्ष के लिए सभी राजनीतिक दलों अधिकारियों और आम लोगों को एकजुट होकर दोषियों के विरुद्ध टूट पड़ने की आवश्यकता होती है। न्यायालय ने सातों आरोपियों के विरुद्ध किसी तरह के सबूत न मिलने पर बरी कर दिया। जिन निर्दोष लोगों की जिंदगी नष्ट हो गई तथा संगठनों की छवि पर कालिख पोती गई उनके साथ न्याय कैसे हैगा। जमीयत उलेमा ए हिंद इसके विरुद्ध उच्च न्यायालय जाएगा। हालांकि जिन लोगों ने पूरे मामले पर दृष्टि रखी थी उनके लिए यही फैसला अपेक्षित था। उन्हें पता था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ , भाजपा तथा कुछ हिंदू संगठनों को आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्त साबित करने के लिए हिंदू आतंकवाद, भगवा आतंकवाद जैसे शब्द कहे गए और निर्दोष लोग आरोपी बनाए गए। जरा सोचिए, 2008 से 2025 तक इन आरोपियों को किन-किन अवस्थाओं से गुजरना पड़ा होगा। साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को तो भाजपा ने 2019 में भगवा आतंकवाद ,हिंदू आतंकवाद , संघी आतंकवाद के विरुद्ध स्वयं को देश का सबसे बड़ा झंडाबरदार साबित करने वाले दिग्विजय सिंह के विरुद्ध लोकसभा चुनाव लड़ाकर संसद बना दिया था। अन्य ऐसे सौभाग्यशाली साबित नहीं हुए। लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित को 2008 से ही निलंबन में जीवन गुजारना पड़ा। इन सबको आरंभ में महाराष्ट्र आतंक निरोधी दस्ता या एटीएस और फिर एनआईएनए ने जैसी यंत्रणाएं दी, नदी थर्ड डिग्री का इस्तेमाल किया उसकी उसके विवरण से ही कलेजा कहां पर जाता है।
न्यायालय ने कहा है कि इन लोगों पर लगे आरोपों की पुष्टि के सबूत नहीं है। 29 सितंबर, 2008 को मालेगांव के भिखू चौक पर हुए विस्फोट में जिस मोटरसाइकिल के प्रज्ञा ठाकुर के होने की बात की गई उसके नंबर नकली थे तो चेचिस और इंजन तक के नंबर गायब कर दिए गए थे। कर्नल प्रसाद पुरोहित ने विस्फोट के लिए कश्मीर से आरडीएक्स लाकर अपने घर में बम बनाया इसके कोई चिन्ह नहीं थे। हां, न्यायालय ने आदेश दिया है कि सुधाकर चतुर्वेदी के घर में विस्फोटक किसने रखा इसकी जांच की जाए। भोपाल और एक अन्य बैठक में सबके शामिल होने और विस्फोट करने की योजना का इसमें जिक्र है किंतु वहां ऐसी बातचीत के भी प्रमाण नहीं है। अगर मेजर रमेश उपाध्याय या किसी ने हिंदू राष्ट्र बनाने की बात की तो इसके आधार पर वे आतंकवादी नहीं माने जा सकते। न्यायालय में एक समय मेजर रमेश उपाध्याय ने चीखकर कहा कि मैं फौजी हूं, आतंकवादी नहीं हो सकता। उनकी कोई सुनने वाला नहीं था। फॉरेंसिक जांच की सामग्री में जालसाजी हुई। उपयुक्त पंचनामा नहीं, कोई फिंगर प्रिंट नहीं। 323 गवाह आए जो केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद 34 गवाहों ने स्वीकार किया कि उनसे झूठी गवाही दिलवा कर दस्तखत करवाए गए। कल्पना करिए जिस राजनीतिक नेतृत्व और सुरक्षा अधिकारियों के जिम्मे देश की सुरक्षा का दायित्व हो षड्यंत्र कर आतंकवाद के मामले में लोगों को फसाने में सत्ता का दुरुपयोग करने लगें तो उन्हें क्या कहा जाएग?
तत्कालीन महाराष्ट्र एटीएस के प्रमुख हेमंत करकरे अब दिवंगत हो चुके हैं। जब साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने उनको राक्षस कहकर टॉर्चर कि आप बीती सुनाई तो नेताओं, पत्रकारों, एक्टिविस्टों आदि के प्रभावी वर्ग ने विरोध किया। स्वर्गीय करकरे की दिग्विजय सिंह के साथ बातचीत का लंबा ऑडियो वायरल हो गया। तत्काल महाराष्ट्र पुलिस के एक अधिकारी महबूब मोहव्वर ने कहा है कि उन्हें संघ प्रमुख डॉ मोहन भागवत को पकड़ने के लिए कहा गया और इससे इनकार करने पर उनके साथ बुरा बर्ताव किया। उन्होंने तत्कालीन एटीएस प्रमुख परमवीर सिंह पर आरोप लगाया कि जब उन्हें पता चला कि मुझे पूरे षडयंत्र की जानकारी है तो आरोप लगाकर फंसाया और निलंबित करवा दिया। निलंबन में उनकी सेवा निवृत्ति हो गई और उन्हें केवल 10 हजार पेंशन मिलता है। उनका बयान न्यायालय की रिकॉर्ड में अंकित है। हालांकि पहले के उनके कुछ आप जांच पर सच साबित नहीं हुए। ऐसे कई बयान हैं जिनसे पता चला है कि संघ, उससे जुड़े संगठनों और भाजपा नेताओं तक के नाम लेने के लिएआरोपियों और गवाहों पर दबाव डाले गए। ऐसी धमकियां दी गई ताकि उनके सामने कोई चारा न बचे। पुलिस के अंदर जिनने भी साथ नहीं दिया वे परेशान किए गए। सोचिए केंद्र में सरकार नहीं बदलती तो क्या होता?
ध्यान रखिए, मालेगांव ऐसा अकेला मामला नहीं था। इसमें भगवा या हिंदू आतंकवाद का आरोप लगने के साथ इसके पूर्व के दो विस्फोटो और मालेगांव प्रथम को भी हिंदू संगठनों की साजिश मानकर जांच शुरू की गई। 19 फरवरी, 2007 को 4001 अप अटारी समझौता एक्सप्रेस में हरियाणा के पानीपत जिले के चांदनी बाग पुलिस थाना में आने वाले शिव गांव के नजदीक विस्फोट हुआ था जिसमें तत्काल 68 लोगों की मृत्यु हुई तथा डेढ़ सौ से ज्यादा घायल हुए। 18 मई, 2007 को हैदराबाद के मक्का मस्जिद में विस्फोट हुआ जिसमें तत्काल नौ लोगों की मृत्यु हुई और 58 घायल हो गए थे। इन दोनों में भी हिंदू आतंकवाद के नाम से गिरफ्तार आरोपियों को न्यायालय ससम्मान आरोपों से मुक्त कर चुका है। समझौता एवं मक्का मस्जिद दोनों में इस्लामी आतंकवादियों का नाम आया, मक्का मामले में आंध्र एटीएस ने दो को गिरफ्तार किया और डीजीपी ने बयान दिया कि लश्कर ए तैयबा के कहने पर सिमी ने विस्फोट कराए हैं। सार्वजनिक रूप से कुछ तथ्य भी पेश किये। समझौता मामले में भी अमेरिकी एफबीआई ने लश्कर ए तैयबा के हाथ होने की ऑन रिकॉर्ड बात कही। मालेगांव प्रथम में भी पांच आरोपी गिरफ्तार हुए। तत्कालीन कर्नाटक के एसएफएल प्रमुख पी ए मोहन ने कई इंटरव्यू दिए जिसमें कहा कि आरोपियों ने न केवल नारको, बल्कि लाई डिटेक्टर, पोलीग्राफी सभी टेस्ट में बताया था कि हमने कैसे विस्फोट किए। तब महाराष्ट्र एटीएस द्वारा न्यायालय में प्रस्तुत आरोप पत्र में सारी बातें हैं। हिंदू आतंकवाद कहानी गढ़ने के बाद उन सबको रिहा कर दिया गया। आखिर इन हमलों में मारे गए निर्दोष लोगों के अपराधियों को सजा न दिलाने का दोषी किस मानेंगे?
तब आधे दशक के आतंकवाद पर हुए विमर्श को याद करिए। पत्र पत्रिकाओं में आलेखों, रिपोर्टों, टीवी डिबेटों, एनजीओ, अन्य संगठनों की विचार गोष्ठियों यहां तक कि संसद के अंदर भी आतंकवाद पर हिंदू संगठनों को लांछित करने का लगातार अभियान चला। इसी अभियान की एक परिणति 26 नवंबर, 2008 के भयानक मुंबई विस्फोटों को भी हिंदुओं का षड्यंत्र साबित करने की शर्मनाक कोशिश हुई। मुंबई हमला आरएसएस की साजिश नामक पुस्तक के मुंबई विमोचन में दिग्विजय सिंह भी थे और उनके भाषण के वीडियो देख लीजिए। तत्कालीन महाराष्ट्र पुलिस प्रमुख राकेश मारिया ने अपने संस्मरण में लिखा है कि अगर अजमल कसाब जिंदा नहीं पकड़ा जाता तो जिस तरह सभी आतंकवादियों ने हाथों में कलावा बांध रखे थे उसे भी हिंदू आतंकवादियों का ही षड्यंत्र साबित कर दिया जाता। जिन पापियों ने षड्यंत्र रचा उन्होंने वास्तव में सीमा पर आतंक के षडयंत्र रचने वालों को भी साहस दे दिया कि हमला कर हिंदू संगठनों पर इसके आरोप मढ़वा सकते हैं। पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र संघ तक में हिंदू आतंकवाद विषय को उठाया। अगर यह साबित हो जाता तो भारत का आतंकवाद विरोधी संघर्ष वैश्विक स्तर पर विफल रहता। आज देश की क्या स्थिति होती इसकी कल्पना से भय पैदा होता है। जिस साहस के साथ भारत पश्चिमी देशों को आईना दिखाता है कि आतंकवाद पर दोहरा रवैया नहीं चलेगा पाकिस्तान को घेर पता है वह संभव ही नहीं रहता। भारत का सिर्फ शर्म से झुका रहता है। इसके साथ इसका लाभ भी में देश में आतंकवाद के विरुद्ध सुरक्षा एजेंसियों ने कैसी भूमिका अपनी होगी? सच कह तो केंद्र से लेकर अनेक राज्यों तक के आतंकवादी विरोधी ढांचे की विचारधारा बदल गई।
इन तथ्यों को देखिए और निष्कर्ष निकालिए। इन चारों विस्फोटों के अपराधी आज तक बाहर हैं और पता नहीं वे क्या-क्या कर रहे होंगे। स्वाभाविक ही किसी भारतीय की पहली प्रतिक्रिया यही होगी कि जो इन षडयंत्रों के पीछे थे उन सबको कानून के तहत कठोर सजा दिलवाई जानी चाहिए। नेताओं से लेकर सुरक्षा व प्रशासनिक अधिकारियों तथा एक्टिविस्टों तक को न्याय के दायरे में खड़ा किया जाना आवश्यक है ताकि भविष्य में कोई देश की सुरक्षा के साथ ऐसा घृणित षड्यंत्र नहीं कर सके।
अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स , दिल्ली - 110092 , मोबाइल- 9811027208
शनिवार, 2 अगस्त 2025
बलविंदर सिंह ने एनसीपी (एसपी) की मुंडका विधानसभा की जिम्मेदारी गुरप्रीत सिंह को सौंपी
शुक्रवार, 25 जुलाई 2025
बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण हंगामा का सच
अवधेश कुमार
बिहार में विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण या इंटेंसिव रिवीजन का इलेक्टरल रोल जिस तरह विरोध और हंगामा का विषय बना है वह अनपेक्षित कतई नहीं है। कांग्रेस पार्टी और अनेक भाजपा विरोधी दल ,एक्टिविस्ट , पत्रकार एनजीओ आदि काफी समय से चुनाव आयोग विरोधी तीखा अभियान चला रहे हैं। राहुल गांधी तो पुनरीक्षण आरंभ होने के पहले से ही आरोप लगा रहे हैं कि हेर-फेर कर भाजपा को जीताने का काम चुनाव आयोग करेगा। विरोधी बार-बार आयोग के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय जाते और निराश वापस आते हैं । उच्चतम न्यायालय ने इस बार भी पुनरीक्षण प्रक्रिया रोकने की उनकी अपील खारिज कर दिया। हालांकि आगे वह सुनवाई के लिए सहमत हुआ है। सुनवाई के एक दिन पहले आईएनडीआईए की ओर से राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के नेतृत्व में बिहार की राजधानी पटना में चुनाव आयोग के कार्यालय तक मार्च किया गया।
वैसे इन पंक्तियों के लिखे जाने तक चुनाव आयोग के आंकड़े के अनुसार लगभग 85 प्रतिशत पुनरीक्षण फॉर्म मतदाताओं ने जमा कर दिए । चुनाव आयोग का विज्ञापन कहता है कि गणना प्रपत्र भरने की अवधि 25 जून से 26 जुलाई है और मतदाता सूची का प्रारूप प्रकाशन 1 अगस्त , 2025 को होगा। दावे और आपत्तियों की अवधि 1 अगस्त से 1 सितंबर, 2025 है और अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन 30 सितंबर, 2025 को किया जाएगा। इसका अर्थ हुआ कि किसी का नाम छूट गया तो दावा करने के लिए एक महीने का समय है। तो बिना देखे कि किसका नाम जुड़ा ,नहीं जुड़ा इस तरह के विरोध का औचित्य क्या है? आयोग पर पहला आरोप है कि वह इतनी जल्दी बड़े प्रदेश के मतदाताओं की सूची कैसे बना लेगा? जब 2002 में मतदाता सूची का बिहार में पुनरीक्षण हुआ था तब 15 जुलाई से 14 अगस्त यानी वर्तमान के अनुसार ही 31 दिन का समय था। क्या 22- 23 वर्ष के बाद मतदाता सूची की गहनता से जांच परख नहीं होनी चाहिए? अगर चुनाव आयोग ने इसके लिए आवश्यक जनसंपर्क और आधार कार्य नहीं किया तो आलोचना होगी। मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा है कि पिछले 4 महीने में प्रत्येक विधानसभा, जिला में सर्व दलीय बैठक की गई और लगभग 5 हजार ऐसी बैठकों में 28 हजार लोगों ने भाग लिया। आयोग ने लगभग 80 हजार बीएलओ या बूथ लेवल ऑफिसर नियुक्त किए हैं जो मतदाताओं के घर पहुंच रहे है। राजनीतिक दलों ने भी 1.54 लाख बूथ लेवल एजेंट बीएलए बनाए हैं। भारी संख्या में स्वयंसेवक भी सक्रिय हैं। कुल 16 करोड़ इन्यूमरेशन फॉर्म प्रकाशित किए गए। एक फॉर्म रिसिप्ट के रुप में मतदाता के पास रहेगा और दूसरा बीएलओ रखेंगे। ऑनलाइन पोर्टल पर भी फॉर्म जमा करने की व्यवस्था है । इसलिए यह नहीं कह सकते कि ड्राइव बिल्कुल अव्यावहारिक है।
पहचान सुनिश्चित करने पर चुनाव आयोग के जोर का सबसे तीखा विरोध हो रहा है । जिन 11 दस्तावेजों की सूची आयोग ने रखी है उसे पढ़ने पर कठिनाई का आभास होता है। पहले कुछ तथ्य पर बात करें। 1 जनवरी, 2003 की सूची में मतदाताओं की संख्या 4 करोड़ 96 लाख थी। वर्तमान में यह संख्या 7 करोड़ 89 लाख है। तो लगभग 2 करोड़ 93 लाख मतदाताओं को ही पहचान सुनिश्चित करनी होगी। जिन मतदाताओं के नाम 2003 में है उसके अलावा जिनका नाम आया उनको ही जन्मतिथि, जन्म स्थान आदि साबित करने वाले दस्तावेज देने होंगे। उनमें भी माता-पिता का नाम 2003 मतदाता सूची में है तो माता-पिता की पहचान साबित करने के लिए दस्तावेज देने की आवश्यकता नहीं। केवल 2003 वाली मतदाता सूची के उस हिस्से की कॉपी बीएलओ को देनी होगी जिसमें उनके माता-पिता का नाम लिखा है। जिनके नाम 2003 में है उन्हें केवल उसकी फोटो कॉपी बीएलओ को फॉर्म जमा करते समय देनी है जिसमें उनका नाम है।
क्या 2003 की मतदाता सूची में नाम न होने वाले के पास अगर जन्मतिथि तथा जन्म स्थान साबित करने के प्रमाण नहीं हो तो नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं होगा? इसकी आशंका है। पर आयोग का कहना है कि दस्तावेजविहीन व्यक्ति की भारतीय पहचान को सुनिश्चित करने का काम क्षेत्र के एसडीम करेंगे और उनके कागजात का पता लगाने के लिए वालंटियर नियुक्त किए गए हैं। किसी की पहचान साबित करने का बिल्कुल दस्तावेज नहीं मिलता या उसे गली - मोहल्ले में भी कोई पहचानता नहीं है तो ऐसे लोगों का नाम काट दिया जाएगा। आयोग ने कहा है कि यदि आवश्यक दस्तावेज तथा फोटो उपलब्ध नहीं है तो प्रपत्र भरकर बीएलओ को जमा कर दें। निर्वाचक निबंधन पदाधिकारी द्वारा स्थानीय जांच या अन्य दस्तावेज के साक्ष्य के आधार पर निर्णय लिया जा सकेगा।
सामान्य तौर पर विचार करें तो मतदान की दृष्टि से बहुत ज्यादा कागजातों की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। एक समय कोई पहचान पत्र लेकर जाने की आवश्यकता नहीं थी और मतदान केंद्र पर केवल राजनीतिक दलों के पोलिंग एजेंट बताते थे कि ये अमुक व्यक्ति हैं या नहीं। यह अत्यंत सरल व्यवस्था थी। लोकतंत्र मतदाताओं, राजनीतिक दलों और अधिकारियों सबकी नैतिकता, ईमानदारी और व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता पर निर्भर करती है। बूथ लूट से लेकर फर्जी मतदाताओं की घटनाओं ने धीरे-धीरे पहचान सुनिश्चित करने की प्रक्रिया को जटिल बना दिया है। यह किसी के हित में नहीं किंतु वर्तमान ढांचे में इसके विकल्प की कल्पना ज्यादा चिंताजनक दिखने लगती है। बिहार में चुनाव आयोग ने यह डरावनी जानकारी दी है की पुनरीक्षण में ऐसे विदेशी नागरिक मिले जो मतदाता बन चुके हैं। उनकी जानकारी गृह मंत्रालय को दी जा रही है और नागरिकता सुनिश्चित होने के बाद ही तय होगा कि वे मतदाता रहेंगे या नहीं। राजनीतिक दलों ने इस पर भी तूफान खड़ा कर दिया । क्या यह उचित है? निस्संदेह,आधार कार्ड या राशन कार्ड बनवाना आसान नहीं होता। इसलिए चिंता का विषय है कि यह हमारी नागरिकता का प्रमाण पत्र नहीं है।आधार को सबसे सुरक्षित माना गया। देश भर में फर्जी आधार कार्ड पकड़ में आ रहे हैं। अवैध अप्रवासियों घुसपैठियों तक के आधार कार्ड बने हुए हैं। बिहार के भारी मुसलमान जनसंख्या वाले चार सीमांचल जिलों में आधार कार्ड के आंकड़े हैरत में डालते हैं । बिहार में औसत आधार कार्ड आबादी के 94% है । किशनगंज में 68 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है और आधार सैचुरेशन 126 प्रतिशत है, कटिहार (44%) में 123%, अररिया (43%) में 123%, और पूर्णिया (38%) में 121% आधार सैचुरेशन है। आबादी से अधिक आधार कार्ड कैसे बने हुए हैं? पिछले वर्ष अररिया में एक बंगलादेशी घुसपैठियों पकड़ा गया जिसके पास पश्चिम बंगाल के 24 परगना से बना आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र था। बांग्लादेशी घुसपैठियों की लड़ाई केवल असम और बंगाल में नहीं बिहार के इन सीमांचल जिलों में भी रही है।
स्थानीय पुराने लोग उनके बारे में कुछ जानते हैं लेकिन ज्यादातर की कई पीढ़ी हो चुकी है और उनके अलग बस्तियों में होने के कारण पहचान मुश्किल रहती है। क्या विरोधियों के दबाव में उन सबकी जांच नहीं होनी चाहिए? संविधान की धारा 326 चुनाव आयोग को भारतीय नागरिकों को मतदाता के रूप में अंकित करने का अधिकार देता है। हालांकि नागरिकता की पहचान चुनाव आयोग की जिम्मेवारी नहीं है। इसीलिए उसने गृह मंत्रालय को मामला स्थानांतरित किया है। विरोधी चाहे इसे एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर को परोक्ष रूप से लागू करना माने या कुछ और किंतु भारतीय नागरिकों तक ही मतदान की व्यवस्था और पूरी मतदान प्रणाली की शुचिता तथा भारतीय सुरक्षा व्यवस्था की दृष्टि से सतर्कता आवश्यक है। बावजूद मेरा मानना है कि पहचान सुनिश्चित करने के कागजात के संदर्भ में स्पष्ट राष्ट्रीय नीति हो जो विदेशियों घुसपैठियों को तो सामने ले परंतु किसी पात्र भारतीय के लिए तनाव और परेशानी का कारण न बने। आधार और राशन कार्ड पर उच्चतम न्यायालय ने चुनाव आयोग को विचार करने का सुझाव दिया है। इन्हें सुरक्षित बनाया जाना अति आवश्यक है। आधार के पीछे कल्पना यही थी कि इससे अनेक कार्डों की आवश्यकता खत्म हो जाएगी। दूसरे, स्थानीय लोग किसी के भारतीय होने की पुष्टि करते हैं तो पंचायत, प्रखंड ,अनुमंडल सबको पहचान सुनिश्चित करने के लिए दस्तावेज उपलब्ध कराने का दायित्व लेना चाहिए।
एक बार मतदाता सूची का प्रारूप आ जाने दीजिए और देखिए कि कितने लोग पात्र लोग इससे वंचित होते हैं। अगर संख्या बहुत ज्यादा होती है तो उसके लिए आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए। जहां एक भी पात्र नागरिक सूची में स्थान पाने से वंचित नहीं हो वही एक भी अपात्र उसमें शामिल नहीं हो यह भी आयोग, राजनीतिक दलों, प्रशासन और हम सबका दायित्व है।
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