शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

नियत कर्म करने वाले को कर्तृत्व भाव से युक्त होना होता है

जन्माष्टमी पर विशेष

शिव शंकर द्विवेदी
 
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।। श्रीमद्भगवद्गीता,अध्याय -4श्लोक-13।।
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।। श्रीमद्भगवद्गीता,अध्याय -4श्लोक-14।।
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते।। श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय -3, श्लोक- 27।।
यहां प्रश्न है कि वह अर्थात् परमात्मा अकर्ता हैं तो स्वयं को कर्ता भी कैसे समझा रहे हैं।वह स्वयं को गुण कर्म के विभाग से बनी वर्ण व्यवस्था के कर्ता घोषित भी कर रह रहे हैं - तस्य कर्तारमपि मां विद्धि ......।
उक्त श्लोक ही उक्त प्रश्न का समुचित उत्तर देने में सक्षम है। उक्त श्लोक यह समझाने में सक्षम है कि जो गुणों के आधीन हैं या जो लोग प्रकृति के आधीन हैं वे प्रकृति के निर्देश पर काम करते हैं अर्थात् उनके द्वारा जो कुछ किया जाता है उसे उनके स्वभाव या उनकी प्रकृति नियन्त्रित करती है इस कारण उनका अज्ञान है कि वे स्वयं को कर्ता समझते हैं क्योंकि उन्हें तो आदेश उनका स्वभाव दे रहा है। इसके विपरीत परमात्मा के वश में उनका स्वभाव या उनकी प्रकृति है। ऐसे में उनकी प्रकृति जो कुछ कर रही होती है वह परमात्मा के निर्देश में कर रही होती है।यही कारण है कि परमात्मा ने स्वयं को वर्ण व्यवस्था का कर्ता घोषित किया था क्योंकि वर्ण व्यवस्था उनके द्वारा सोची समझी गयी व्यवस्था है। वर्ण-व्यवस्था को उनके स्वभाव ने नहीं सोचा है अपितु परमात्मा ने सोचा है इस कारण उसे मूर्त रूप देने वाले परमात्मा ही इसके कर्ता हैं।
श्रीकृष्ण की संवीक्षा है कि व्यक्ति जब गुणों के आधीन होता है तब वही काम करता है अथवा उसी के विषय में सोचता है जिस गुण की प्रधानता के वशीभूत होता है। जैसे कि जब वह सत्वगुण की प्रधानता में रहता है तब उससे बुरे या समाज विरोधी कार्यों के करपाने की आशा नहीं व्यक्त करना चाहिए क्योंकि वह बुरे या समाज विरोधी कार्यों को कर ही नहीं सकता है। इसी तरह से तमोगुण प्रधान वाले व्यक्ति से अच्छे अथवा समाजोपयोगी कार्यों की अपेक्षा करनी ही नहीं चाहिए क्योंकि तमोगुण प्रधान वाले लोग अच्छे या समाजोपयोगी कार्यों को कर ही नहीं सकते हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण का अभिमत है कि गुणों के वशवर्ती लोग वही कर पाते हैं जिस गुण की प्रधानता में वे रहते हैं।ऐसे में जबकि वे गुणों के वशवर्ती होने के कारण स्वेच्छा से कोई काम कर ही नहीं पाते हैं तो इसके बाद भी वे स्वयं को कर्ता समझ रहे होते हैं तो इसका अर्थ है कि वे अहंकार के वशीभूत भी होते हैं।अहंकार उन्हें इस तथ्य से अवगत होने ही नहीं देता है कि वे गुणों के वशवर्ती हैं। अत एव वे वही कर रहे होते हैं या कर सकते हैं जो प्रधान गुण उनसे कराना चाहते हैं।गुण प्रकृति अर्थात् स्वभाव के द्योतक हैं। अत एव यह समझना ही तथ्य को समझना है कि जो लोग स्वभाव के वशवर्ती होते हैं वे वास्तविक रूप से कर्ता नहीं हैं क्योंकि वास्तविक कर्ता तो उनका स्वभाव है, उनकी प्रकृति है जिसके वशवर्ती वे लोग होते हैं। इसके बावजूद भी स्वयं को कर्ता समझना उनकी मूढ़ता है।यही है -अहंकार विमूढात्मा का अर्थ।
जब श्रीकृष्ण स्वयं को कर्ता समझाते हैं तो उसका अर्थ होता है कि,वह स्वभाव के वशवर्ती नहीं हैं अपितु स्वभाव ही उनके वशर्ती हैं। हमें इस त्रुटिपूर्ण सोच से बचना चाहिए कि परमात्मा स्वभाव शून्य हैं। वास्तविकता तो यह है कि परमात्मा स्वभाव शून्य नहीं हैं अपितु स्वभाव उनके वश में है।हम मानव, स्वभाव के वश में हैं और परमात्मा के वश में उनका स्वभाव है,उनकी प्रकृति है-
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया।। श्रीमद्भगवद्गीता,अध्याय -4श्लोक -6।
आगे वह संसार की रचना करते हुए की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए बताते हैं कि वह 
अपनी प्रकृति को अपने वश में करके संसार की रचना करते हैं -
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्।।
श्रीमद्भगवद्गीता,अध्याय- 9,श्लोक-8।।
उक्त दोनों श्लोक यह समझने के लिए पर्याप्त हैं कि परमात्मा की प्रकृति या परमात्मा का स्वभाव उनके वश में है न कि वह अपने स्वभाव या अपनी प्रकृति के वश में हैं।
परमात्मा के वश में उनकी प्रकृति है इसी कारण उन्होंने स्वयं को कर्ता कहा है और मनीषी लोग भी उन्हें कर्ता ही समझते और समझाते हैं।
परमात्मा ने स्वयं को अकर्ता समझा है और यह भी कहा कि मनीषी लोग उन्हें अकर्ता समझते हैं क्योंकि वह स्वयं कुछ नहीं करते हैं वास्तविकता तो यह है कि वह अपनी प्रकृति या स्वभाव से कर्म करवाते हैं। वह लोगों से कर्म करवाते हैं।लोग उनके लिए निमित्त बनकर उनके निर्देशों का पालन करते हैं। यही कारण रहा है कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन से सम्मुख उपस्थित युद्ध में निमित्त कर्ता बनने का अनुरोध किया था-
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लाभस्व
जित्वा शत्रुन् भुङ्क्षव राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।।
श्रीमद्भगवद्गीता,अध्याय- 11, श्लोक-33।
उक्त से सुस्पष्ट है कि जब श्रीकृष्ण अकर्ता होते हुए भी स्वयं को कर्ता भी घोषित करते हैं तो इसका कारण यह है कि वह लोगों के लिए कर्म नियत या निर्धारित करते हैं। व्यवस्था हेतु लोगों के लिए नियतकर्म निर्धारित करते समय वह कर्ता होते हैं।   
इसका अर्थ है कि वास्तविक कर्ता वह है जो त्रिगुतीत होकर अथवा अपनी प्रकृति को अपने वश में करके कर्तव्य बोध से युक्त होकर वह करे, जो उसके लिए नियत हो।  
व्यवस्था के लिए लोगों के गुण और कर्म के विभाग से आधार पर उनके करने योग्य कर्मों का निर्धारण करना परमात्मा ने अपने लिए कर्म नियत कर रखा है इतना ही नहीं, व्यवस्था पर संकट की स्थिति में व्यवस्था को सुचारू रूप संचालित करने के लिए बार-बार अवतरित होना भी परमात्मा ने अपने लिए नियत कर्म के रूप में निर्धारित कर रखा है-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ श्रीमद्भगवद्गीता,अध्याय -4, श्लोक-7॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसं स्थापनार्थाय संभावनामि युगे युगे ॥ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय -4, श्लोक-8॥
मद्भाव का अर्थ बोध 
जब श्रीकृष्ण कहते हैं कि,उनकी कृपा से लोग मद्भाव को प्राप्त करते हैं तो उसका यही अर्थ होता है कि उनकी कृपा से लोग अपने स्वभाव को अपने वश में उसी तरह करने में सक्षम होते हैं जिस तरह से परमात्मा अपने स्वभाव को अपने वश में करने में सक्षम हैं।
परमात्मा ही वह हैं जिनका स्वभाव उनके वश में हैं और वह नियतकर्म करने में सक्षम हैं। लोगों के लिए नियतकर्म निर्धारित करते समय भी परमात्मा निस्पृह होकर नियतकर्म निर्धारित करते हैं। अपने हित के आधार पर वह लोकहित को नहीं देखते हैं।ऐसे में लोकहित में व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने के उद्देश्य से लोगों के लिए नियतकर्म निर्धारित करते समय वह केवल और केवल लोकहित को ही ध्यान में रखते हैं। ऐसे में वास्तविक रूप में कर्ता वे हैं जिसके वश में उसके स्वभाव हैं। स्वभाव को अपने वश में रखने वाला ही ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त हुआ होता है। ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त हुआ व्यक्ति ही मद्भाव को प्राप्त हुआ व्यक्ति है।ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त हुआ व्यक्ति ही नियतकर्म करता है क्योंकि इस स्थिति में पहुंचने वाले लोगों के पास काम्य कर्म बचता ही नहीं है।वे इस स्थिति में आने के उपरान्त निजी कामनाओं के वशीभूत होकर कुछ नहीं करते हैं इस दृष्टि से वे भी कर्ता होते हैं। इस प्रकार जो कर्ता होते हैं उन्हें उनके द्वारा किये गये कर्मों के परिणाम बाधित नहीं करते हैं क्योंकि वे किसी परिणाम की प्रत्याशा में कोई कर्म नहीं करते हैं अपितु इस लिए करते हैं कि वे उनके लिए निर्धारित हैं।
कर्ता और अकर्ता का अर्थ बोध 
उक्त से सुस्पष्ट है कि गुणों,प्रकृति या स्वभाव के वश में न रहने वाले परमात्मा स्वाभाविक रूप से अकर्ता हैं क्योंकि लोकहित में निर्धारित कर्मों को लोगों से करवाते हैं किन्तु जब वे लोकहित में नियतकर्म करते तब वे कर्ता होते हैं क्योंकि नियतकर्म वे किसी गुण के अधीन होकर नहीं करते हैं अपितु कर्तव्य बुद्धि से करते हैं।इस प्रकार समझ सकते हैं कि कर्तव्य बुद्धि से युक्त होकर कार्य करने वाले ही वास्तविक रूप से कर्ता हैं।इसी लिए परमात्मा ने स्वयं को कर्ता घोषित किया है। वह अकर्ता होते हुए भी नियतकर्म करते हैं इस कारण वह कर्ता भी हैं।
(लेखक अ-मोक्ष साधना केंद्र राजनिकेतन वृन्दावन योजना लखनऊ हैं।)

गुरुवार, 14 अगस्त 2025

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष - उर्दू शायरों ने भी कान्हा को लेकर बहुत खूब लिखा है.. हसरत की भी क़बूल हो मथुरा में हाज़िरी

तहसीन मुनव्वर

भारत की अभी हाल ही में ओवल में इंग्लैंड के खिलाफ़ जीत में सिराज और कृष्णा की जोड़ी ने इतिहास रचने का काम किया है. भारत की जीत को लेकर देश के सभी लीडरों ने सिराज के साथ साथ कृष्णा की भी प्रशंसा की. लेकिन सब से अधिक अगर किसी को भारत वासियों का प्यार मिला तो वो सिराज हैं. सिराज की जीत को लेकर एमआईएम प्रमुख सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने उन की भरपूर तारीफ की लेकिन ऐसा प्रतीत हुआ जैसे एक प्रकार से उन्हें हैदराबाद तक ही सीमित करने की कोशिश की. उन्हों ने अपने ट्वीट में लिखा “हमेशा ही विजेता, जैसे हम हैदराबाद में बोलते हैं कि, पूरा खोल दिए पाशा”. सिराज की प्रशंसा करने से आप को कोई नहीं रोकता है लेकिन न जाने क्यों इस ट्वीट से ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि आप एक राष्ट्रीय धरोहर को केवल अपनी गली तक सीमित करने की कोशिश कर रहे हैं. अगर ऐसा है तो फिर सिराज की पूरी मेहनत पर पानी फिर जाता है. यही सोच हमें पूरी तरह से घुलने मिलने नहीं देती. ऐसा केवल एक ही तरफ़ की सोच हो ऐसा भी नहीं है.

भारत रत्न डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने जिस प्रकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का गौरव बढ़ाया वह दर्शाता है कि जो भारत के सच्चे सपूत होते हैं उन्हें इस देश की आत्मा सर आंखों पर बिठाती है. लेकिन हमारी संकीर्ण सोच हमें चिंतन के स्तर पर ऊंचा उठने नहीं देती. मेरा हमेशा मानना रहा है कि हर देश की एक आत्मा होती है. भारत की आत्मा विविधता में एकता में बसी है. अध्यातम हमारी आत्मा का सार है. अभी पिछलों दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने नागपुर में इसी ओर ध्यान आकर्षित करवाते हुए कहा था कि दुनिया में कई अमीर देश हैं. हम 3 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन भी जाएं तो यह दुनिया में कोई नई बात नहीं होगी. कई ऐसे काम हैं जो दूसरे देशों ने किए हैं, हम भी कर लेंगे लेकिन दुनिया के पास अध्यात्म और धर्म नहीं है जो हमारे पास है.
उनका कहना सच है क्योंकि भारत की शक्ति आध्यात्मिक और उस धार्मिक चिंतन में है जो वसुधैव कुटुंबकम यानि पूरी पृथ्वी को एक परिवार के रूप में देखता है. जहां तक धर्म की बात है तो कोई भी धर्म आप को भटकाने के लिए नहीं आया है. धर्म का मर्म ही मानव सेवा और आपसी सामंजस्य है. धर्म जोड़ता है तोड़ता नहीं है. हमें केवल उन लोगों को और उनकी ही सुनना चाहिए जो धर्म को आपसी प्रेम, सौहार्द और एकता को बढ़ावा देने के लिए आगे बढ़ाते हों. इसी प्रकार धर्म से जुड़े जो देवी देवता या सम्मानित महान मज़हबी देवपुरुष आदि हैं वह किसी एक धर्म के लोगों को मार्ग दिखाने नहीं आए थे बल्कि वह तो पूरी मानवता का मार्गदर्शन करने वाले थे. यही कारण है कि जो सत्य को पहचानते हैं वह हर धर्म के महपुरुषों का सम्मान करते हैं. इस मामले में लेखकों और शायरों में यह अधिक देखने को मिलता है कि वह जहां अपने धर्म के महापुरुषों को लेकर लिखते हैं वहीं दूसरे धर्मों के महापुरुषों के लिए भी उनकी लेखनी से श्रद्धा के पुष्प अर्पण होते रहते हैं.
भारत में हिंदू देवी देवताओं की तारीफ़ में काव्य रचना करने वाले मुस्लिम शायरों में मौलाना हसरत मोहानी का नाम भी लिया जाता है. मौलाना हसरत मोहानी वही स्वतंत्रता सेनानी हैं जिन्हों ने इन्क़लाब ज़िन्दाबाद का नारा दिया था. मौलाना हसरत मोहानी श्री कृष्ण को हज़रत कृष्ण कहते थे. उन्हें बहुत मानते थे. उन्होंने श्री कृष्ण पर बहुत रचनाएं लिखी हैं;
हसरत की भी क़बूल हो मथुरा में हाज़िरी
सुनते हैं आशिक़ों पे तुम्हारा करम है खास

मौलाना हसरत मोहानी की श्री कृष्ण पर एक कविता है जिस में कहते हैं;

पैग़ाम-ए-हयात-ए-जावेदाँ था
हर नग़्मा कृष्ण बाँसुरी का
भारत सूफ़ी संतों की धरती है. यहाँ सूफ़ी संतों ने आपसी प्रेम को बढ़ावा दिया और सभी धर्मों को अपनी दिव्य दृष्टि से देखा. उन्हें संकीर्ण सोच के दायरे में नहीं आने दिया. इसी लिए हम देखते हैं कि हर धर्म में दूसरे धर्म के प्रति आदर भाव दिखाई देता है.अगर हम पैग़ंबर साहब पर 450 से अधिक हिन्दू शायरों की रचना ‘’हमारे रसूल” नामक पुस्तक में देखते हैं तो हिन्दू देवी देवताओं पर मुस्लिम कवियों को भी लिखता पाते हैं. अल्लामा इक़बाल की शायरी के बारे में तो कहा जाता है कि वह भरतरी हरी तथा श्री कृष्ण के जीवन दर्शन से अधिक प्रभावित है;
फूल की पत्ती से कट सकता है हीरे का जिगर
मरद-ए-नादाँ पर कलाम-ए-नरम-ओ-नाज़ुक बेअसर
इक़बाल के बहुत से शेरों में हमें गीता के उपदेश सांस लेते महसूस होते हैं;
यक़ीं मोहकम, अमल पैहम, मुहब्बत फ़ातिह-ए-आलम
जिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरें
जैसा कि पहले भी कहा गया है कि भारत सूफ़ीयों संतों की धरती है. रेखता ने अपनी साइट पर कई ऐसे सूफ़ी शायरों का कलाम रखा है जिन्हों ने श्री कृष्ण पर शेर कहे हैं. उन में कुछ शेर देखिए;

‘औघट’ रहो प्रेम के भगती जब तक घट में प्राण
पूजा करो कृष्ण का और जमुना में अश्नान
(औघट शाह वारसी)
गोकुल की सी नागरी मथुरा का सा गाँव
तुम हो मालिक बृज के कृष्ण तुम्हारा नाँव
(मुज़्तर ख़ैराबादी)

बलदेव जसोदा नंद कहूँ
तैनूँ किशन कनहैया कान कहूँ
(ख़्वाजा ग़ुलाम फ़रीद)
तुम चतुराई कोऊ जान न पाई
कोऊ छल बल संसार लुभाई
मथुरा छाँड बिरहा जग बोयो
कूबर कुल बिंदराबन छाई
(अमीनुद्दीन वारसी)

ऐसा नहीं है कि भगवान श्री कृष्ण को लेकर मुस्लिम कवियों ने हाल ही में लिखा हो. कई शताब्दी पहले से ही श्री कृष्ण पर लोग लिखते रहे हैं. केवल रसखान या रहीमन को ही नहीं देखें तो बहुत से और भी कवि रहे हैं जिन्हों ने कृष्ण भक्ति की शायरी की है. इंटरनेट पर उर्दू में ऐसे बहुत से लेख मिल जाते हैं जिन से पता चलता है कि सोलहवीं शताब्दी में शाह बदर उद्दीन जानम, अठारवीं शताब्दी में शाह तय्यब चिशती, वली दक्कनी और बाद में आलम शेख़ की शायरी में भी श्री कृष्ण पर शायरी मोजूद है. हफ़ीज़ जालंधरी की ‘कृष्ण कनहिया’ तथा वाजिद अली शाह की ‘रास लीला’ भी श्री कृष्ण के प्रेम में रची बसी है.
एक नाम तो हम छोड़ ही नहीं सकते वो है नज़ीर अकबराबादी का जिन की पूरी शायरी भारत के सभी रंगों में रंगी हुई है. ‘जन्म कनहिया जी’, ‘कनहिया जी की शादी’ और ‘कनहिया जी का रास’ जैसी उनकी कविताएं आज भी पढ़ी जाती हैं;
मोहन मदन गोपाल हरी बंस मन हरण
बलिहारी उनके नाम ये मेरा तन बदन
गिरधारी नंद लाल हरी नाथ गोवर्धन
लाखों किए बनाओ हज़ारों किए जतन

एक और नाम मोहसिन काकोरवी का भी है जिन्हों ने पैग़म्बर साहब पर लिखी नात शरीफ में जिस प्रकार मथुरा की चर्चा की है उर्दू वाले इसे सदा उपयोग करते रहते हैं;
देखिए होगा सिरी किशन का क्यों कर दर्शन
सीना-ए-तंग में दिल गोपियों का है बेकल
सिम्ते काशी से चला जानिबे मथुरा बादल
तैरता है कभी गंगा कभी जमुना बादल

मोहसिन काकोरवी के ही रास्ते पर चलते हुए काकोरी के ही एक शायर शाह क़ाज़िम अब्बासी काकोरवी ने भी श्री कृष्ण के इश्क़ में डूब कर शेर कहे हैं;
कहाँ गए बृज लाल बसइया
मन मोहिनी बंसी के बजइया
कहाँ छुपी जाये मोहिनी मूरतिया
सगरे नगर के मन के छलइया

श्री कृष्ण और गीता उर्दू शायरी को हमेशा से ही अपनी ओर खींचते रहे हैं. मुझे इंटरनेट पर घूमते हुए पाकिस्तान की बड़ी कवीयत्री परवीन शाकिर का श्री कृष्ण पर केंद्रित कलाम भी मिला है. परवीन शाकिर भारतीय उपमहाद्वीप की नारी की संवेदनाओं को अपनी शायरी में ढालती रहीं हैं. लेकिन उनका श्री कृष्ण पर यह कलाम देख कर आप चौंक जाएंगे;
तू है राधा अपने कृष्ण की
तेरा कोई भी होता नाम
मुरली तेरे भीतर बाजती
किसी बन करती बिसराम
या कोई सिंघासन बिराजती
तुझे खोज ही लेते श्याम

श्री कृष्ण पर कुछ और शायरों का भी कलाम देखिए;
दिलों में रंग मुहब्बत का उस्तावर किया
सवादे हिंद को गीता से नग़मा बार किया
(सीमाब अकबराबादी)

एक प्रेम पुजारी आया है चरणों में ध्यान लगाने को
भगवान तुम्हारी मूरत पर श्रधा के फूल चढ़ाने को
(आफ़ताब रईस पानीपती)
कृष्ण‌ कनहिया आन बिराजे मोरे मन के मंदिर में
भगवन मोरे साथ हैं अब तो द्वार खुले हैं दर्पण के
(अब्दुल्लाह हादी काविश)

मेरा काबा मेरा शिवाला देवकी नंदन आप ही हैं
मेरा तो हर एक हवाला देवकी नंदन आप ही हैं
वृंदावन से चंबल तक जो गाय चराने आता था
नंद का वो गिरधर गोपाला देवकी नंदन आप ही हैं
(शाहिद अंजुम)
अंत में उन सभी के आभार के साथ कि जिन के लेख से इस लेख की राह आसान हुई अपने दो शेर भी प्रस्तुत करता चलूँ.

किशन मुरारी, कुंज बिहारी, गोवर्धन, गोपाला रे
बंसी बजइया, रास रचइया, सांवरिया, नन्द लाला रे
ज़ालिम थर थर काँप रहे हैं ऐसी शुभ घड़ी आई है
मथुरा गोकुल झूम रहे हैं लाज रखइया आला रे
श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शायर हैं। यह लेखक के अपने विचार हैं।)

गुरुवार, 7 अगस्त 2025

मालेगांव मामले में हिंदू आतंकवाद भगवा आतंकवाद की कहानी बनाई गई

अवधेश कुमार

एनआईए विशेष न्यायालय द्वारा मालेगांव द्वितीय विस्फोट पर दिए गए फैसले के बाद तत्काल टिप्पणी के लिए शब्द तलाशना कठिन है। विश्व में कोई देश नहीं होगा जहां स्थानीय पुलिस को आतंकवादी हमले के पीछे की साजिशें के सच की गंध होने के बावजूद राजनीति के लिए नई कहानी गढ़े जाएं ,निर्दोष लोगों को गिरफ्तार कर व्यापक दुष्प्रचार हो तथा उन्हें सजा दिलाने के लिए नकली गवाह,  फर्जी सबूत यहां तक कि जांच अधिकारी तक  पैदा कर दिया जाए। आतंकवादी हमला देश पर हमला माना जाता है और उनसे संघर्ष के लिए सभी राजनीतिक दलों अधिकारियों और आम लोगों को एकजुट होकर दोषियों के विरुद्ध टूट पड़ने की आवश्यकता होती है। न्यायालय ने सातों आरोपियों के विरुद्ध किसी तरह के सबूत न मिलने पर बरी कर दिया। जिन निर्दोष लोगों की जिंदगी नष्ट हो गई तथा संगठनों की छवि पर कालिख पोती गई उनके साथ न्याय कैसे हैगा। जमीयत उलेमा ए हिंद  इसके विरुद्ध उच्च न्यायालय जाएगा। हालांकि जिन लोगों ने पूरे मामले पर दृष्टि रखी थी उनके लिए यही फैसला अपेक्षित था। उन्हें पता था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ , भाजपा तथा कुछ हिंदू संगठनों को आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्त साबित करने के लिए हिंदू आतंकवाद, भगवा आतंकवाद जैसे शब्द कहे गए और निर्दोष लोग आरोपी बनाए गए। जरा सोचिए, 2008 से 2025 तक इन आरोपियों को किन-किन अवस्थाओं से गुजरना पड़ा होगा। साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को तो भाजपा ने 2019 में भगवा आतंकवाद ,हिंदू आतंकवाद , संघी आतंकवाद के विरुद्ध स्वयं को देश का सबसे बड़ा झंडाबरदार साबित करने वाले दिग्विजय सिंह के विरुद्ध लोकसभा चुनाव लड़ाकर संसद बना दिया था। अन्य ऐसे सौभाग्यशाली साबित नहीं हुए। लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित को 2008 से ही निलंबन में जीवन गुजारना पड़ा। इन सबको आरंभ में महाराष्ट्र आतंक निरोधी दस्ता या एटीएस और फिर एनआईएनए  ने जैसी यंत्रणाएं दी, नदी थर्ड डिग्री का इस्तेमाल किया उसकी उसके विवरण से ही कलेजा कहां पर जाता है।

न्यायालय ने कहा है कि इन लोगों पर लगे आरोपों की पुष्टि के सबूत नहीं है। 29 सितंबर, 2008 को मालेगांव के भिखू चौक पर हुए विस्फोट में जिस मोटरसाइकिल के प्रज्ञा ठाकुर के होने की बात की गई  उसके  नंबर नकली थे तो चेचिस और इंजन तक के नंबर गायब कर दिए गए थे। कर्नल प्रसाद पुरोहित ने विस्फोट के लिए कश्मीर से आरडीएक्स लाकर अपने घर में बम बनाया इसके कोई चिन्ह नहीं थे। हां, न्यायालय ने आदेश दिया है कि सुधाकर चतुर्वेदी के घर में विस्फोटक किसने रखा इसकी जांच की जाए।  भोपाल और एक अन्य बैठक में सबके शामिल होने और विस्फोट करने की योजना का इसमें जिक्र है किंतु वहां ऐसी बातचीत के भी प्रमाण नहीं है। अगर मेजर रमेश उपाध्याय या किसी ने हिंदू राष्ट्र बनाने की बात की तो इसके आधार पर वे आतंकवादी नहीं माने जा सकते। न्यायालय में एक समय मेजर रमेश उपाध्याय ने चीखकर कहा कि मैं फौजी हूं, आतंकवादी नहीं हो सकता। उनकी कोई सुनने वाला नहीं था। फॉरेंसिक जांच की सामग्री में जालसाजी हुई। उपयुक्त पंचनामा नहीं, कोई फिंगर प्रिंट नहीं। 323 गवाह आए जो केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद 34 गवाहों ने स्वीकार किया कि उनसे झूठी गवाही दिलवा कर दस्तखत करवाए गए। कल्पना करिए जिस राजनीतिक नेतृत्व और सुरक्षा अधिकारियों के जिम्मे देश की सुरक्षा का दायित्व हो षड्यंत्र कर आतंकवाद के मामले में लोगों को फसाने में सत्ता का दुरुपयोग करने लगें तो उन्हें क्या कहा जाएग?

तत्कालीन महाराष्ट्र एटीएस के प्रमुख हेमंत करकरे अब दिवंगत हो चुके हैं। जब साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने उनको राक्षस कहकर टॉर्चर कि आप बीती सुनाई तो नेताओं, पत्रकारों, एक्टिविस्टों आदि के प्रभावी वर्ग ने विरोध किया। स्वर्गीय करकरे की  दिग्विजय सिंह के साथ बातचीत का लंबा ऑडियो वायरल हो गया। तत्काल महाराष्ट्र पुलिस के एक अधिकारी महबूब मोहव्वर ने कहा है कि उन्हें संघ प्रमुख डॉ मोहन भागवत को पकड़ने के लिए कहा गया और इससे इनकार करने पर उनके साथ बुरा बर्ताव किया। उन्होंने तत्कालीन एटीएस प्रमुख परमवीर सिंह पर आरोप लगाया कि जब उन्हें पता चला कि मुझे पूरे षडयंत्र की जानकारी है तो आरोप लगाकर फंसाया और निलंबित करवा दिया। निलंबन में उनकी सेवा निवृत्ति हो गई और उन्हें केवल 10 हजार  पेंशन मिलता है। उनका बयान न्यायालय की रिकॉर्ड में अंकित है। हालांकि पहले के उनके कुछ आप जांच पर सच साबित नहीं हुए। ऐसे कई बयान हैं जिनसे पता चला है कि संघ,  उससे जुड़े संगठनों और भाजपा नेताओं तक के नाम लेने के लिएआरोपियों और गवाहों पर दबाव डाले गए। ऐसी धमकियां दी गई ताकि उनके सामने कोई चारा न बचे। पुलिस के अंदर जिनने भी  साथ नहीं दिया वे परेशान किए गए। सोचिए केंद्र में सरकार नहीं बदलती तो क्या होता?

ध्यान रखिए, मालेगांव ऐसा अकेला मामला नहीं था। इसमें भगवा या हिंदू आतंकवाद का आरोप लगने के साथ  इसके पूर्व के दो विस्फोटो और मालेगांव प्रथम को भी हिंदू संगठनों की साजिश मानकर जांच शुरू की गई। 19 फरवरी, 2007 को 4001 अप अटारी समझौता एक्सप्रेस में हरियाणा के पानीपत जिले के चांदनी बाग पुलिस थाना में आने वाले शिव गांव के नजदीक विस्फोट हुआ था जिसमें तत्काल 68 लोगों की मृत्यु हुई तथा डेढ़ सौ से ज्यादा घायल हुए। 18 मई, 2007 को हैदराबाद के मक्का मस्जिद में विस्फोट हुआ जिसमें तत्काल नौ लोगों की मृत्यु हुई और 58 घायल हो गए थे। इन दोनों में भी हिंदू आतंकवाद के नाम से गिरफ्तार आरोपियों को न्यायालय ससम्मान आरोपों से मुक्त कर चुका है।  समझौता एवं मक्का मस्जिद दोनों में इस्लामी आतंकवादियों का नाम आया, मक्का मामले में  आंध्र एटीएस ने दो को गिरफ्तार किया और डीजीपी ने बयान दिया कि लश्कर ए तैयबा के कहने पर सिमी ने विस्फोट कराए हैं। सार्वजनिक रूप से कुछ तथ्य भी पेश किये। समझौता मामले में भी अमेरिकी एफबीआई ने लश्कर ए तैयबा के हाथ होने की ऑन रिकॉर्ड बात कही। मालेगांव प्रथम में भी पांच आरोपी गिरफ्तार हुए। तत्कालीन कर्नाटक के एसएफएल  प्रमुख पी ए मोहन ने  कई इंटरव्यू दिए जिसमें कहा कि आरोपियों ने न केवल नारको, बल्कि लाई डिटेक्टर, पोलीग्राफी सभी टेस्ट में बताया था कि हमने कैसे विस्फोट किए। तब महाराष्ट्र एटीएस द्वारा न्यायालय में प्रस्तुत आरोप पत्र में सारी बातें हैं। हिंदू आतंकवाद कहानी गढ़ने के बाद उन सबको रिहा कर दिया गया। आखिर इन हमलों में मारे गए निर्दोष लोगों के अपराधियों को सजा न दिलाने का दोषी किस मानेंगे?

तब आधे दशक के आतंकवाद पर हुए विमर्श को याद करिए। पत्र पत्रिकाओं में आलेखों, रिपोर्टों, टीवी डिबेटों, एनजीओ, अन्य संगठनों की विचार गोष्ठियों यहां तक कि संसद के अंदर भी आतंकवाद पर हिंदू संगठनों को लांछित करने का लगातार अभियान चला। इसी अभियान की एक परिणति 26 नवंबर, 2008 के भयानक मुंबई विस्फोटों को भी हिंदुओं का षड्यंत्र साबित करने की शर्मनाक कोशिश हुई।  मुंबई हमला आरएसएस की साजिश नामक पुस्तक के मुंबई विमोचन में  दिग्विजय सिंह भी थे और उनके भाषण के वीडियो देख लीजिए। तत्कालीन महाराष्ट्र पुलिस प्रमुख राकेश मारिया ने अपने संस्मरण में लिखा है कि अगर अजमल कसाब जिंदा नहीं पकड़ा जाता तो जिस तरह सभी आतंकवादियों ने हाथों में कलावा बांध रखे थे उसे भी हिंदू आतंकवादियों का ही षड्यंत्र साबित कर दिया जाता। जिन पापियों ने षड्यंत्र रचा उन्होंने वास्तव में सीमा पर आतंक के षडयंत्र रचने वालों को भी साहस दे दिया कि हमला कर हिंदू संगठनों पर इसके आरोप मढ़वा सकते हैं। पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र संघ तक में हिंदू आतंकवाद विषय को उठाया। अगर यह साबित हो जाता तो भारत का आतंकवाद विरोधी संघर्ष वैश्विक स्तर पर विफल रहता। आज देश की क्या स्थिति होती इसकी कल्पना से भय पैदा होता है। जिस साहस के साथ भारत पश्चिमी देशों को आईना दिखाता है कि आतंकवाद पर दोहरा रवैया नहीं चलेगा पाकिस्तान को घेर पता है वह संभव ही नहीं रहता। भारत का सिर्फ शर्म से झुका रहता है। इसके साथ इसका लाभ भी में देश में आतंकवाद के विरुद्ध सुरक्षा एजेंसियों ने कैसी भूमिका अपनी होगी? सच कह तो केंद्र से लेकर अनेक राज्यों तक के आतंकवादी विरोधी ढांचे की विचारधारा बदल गई।

 इन तथ्यों को देखिए और निष्कर्ष निकालिए। इन चारों विस्फोटों के अपराधी आज तक बाहर हैं और पता नहीं वे क्या-क्या कर रहे होंगे। स्वाभाविक ही किसी भारतीय की पहली प्रतिक्रिया यही होगी कि जो इन षडयंत्रों के पीछे थे उन सबको कानून के तहत कठोर सजा दिलवाई जानी चाहिए। नेताओं से लेकर सुरक्षा व प्रशासनिक अधिकारियों तथा एक्टिविस्टों तक को न्याय के दायरे में खड़ा किया जाना आवश्यक है ताकि भविष्य में कोई देश की सुरक्षा के साथ ऐसा घृणित षड्यंत्र नहीं कर सके।

अवधेश कुमार, ई-30,  गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स , दिल्ली - 110092 , मोबाइल- 9811027208

शनिवार, 2 अगस्त 2025

बलविंदर सिंह ने एनसीपी (एसपी) की मुंडका विधानसभा की जिम्मेदारी गुरप्रीत सिंह को सौंपी


संवाददाता

नई दिल्ली। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचन्द्र पवार) दिल्ली प्रदेश में सिख समाज की भागीदारी को मजबूत करते हुए मुंडका विधानसभा क्षेत्र की जिम्मेदारी गुरप्रीत सिंह जी को सौंपी गई है।

यह जिम्मेदारी आज पार्टी के दिल्ली प्रदेश उपाध्यक्ष माननीय सरदार बलविंदर सिंह जी द्वारा सौंपी गई। इस अवसर पर दिल्ली प्रदेश संयोजक माननीय डी.सी. कपिल जी एवं प्रदेश महासचिव राजेश घाघट जी भी विशेष रूप से उपस्थित रहे।

इस अवसर पर सरदार बलविंदर सिंह जी ने कहा कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचन्द्र पवार) सिख समाज को राजनीतिक, सामाजिक और संगठनात्मक स्तर पर बराबर का प्रतिनिधित्व देने के लिए संकल्पित है। दिल्ली में सिख समाज जिन समस्याओं का सामना कर रहा है—चाहे वह शिक्षा, रोजगार हो या सामाजिक न्याय—पार्टी उन मुद्दों को प्राथमिकता के आधार पर उठाएगी और हर मंच पर सिख समाज की आवाज़ को मजबूती से रखेगी।"

वहीं दिल्ली प्रदेश संयोजक माननीय डी.सी. कपिल जी ने कहा कि "राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचन्द्र पवार) हमेशा से आम जनता, पिछड़े वर्गों, किसानों, मजदूरों, युवाओं और वंचित समुदायों की आवाज़ को आगे बढ़ाने का कार्य करती रही है। पार्टी की विचारधारा समावेशी और जनकल्याणकारी है, जो समाज के हर तबके को न्याय और सम्मान देने में विश्वास रखती है। हमारा लक्ष्य है कि इस विचारधारा को हर गली, मोहल्ले और गांव-शहर तक पहुंचाया जाए, ताकि देश की राजनीति में एक सकारात्मक बदलाव लाया जा सके।"

राजेश घाघट जी, दिल्ली प्रदेश महासचिव, ने कहा कि गुरप्रीत सिंह जैसे समर्पित कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी सौंपकर पार्टी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह मेहनतकश और जमीनी कार्यकर्ताओं को महत्व देती है।

गुरप्रीत सिंह पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता हैं और सामाजिक व सिख समुदाय के मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाते आए हैं। पार्टी को विश्वास है कि उनके नेतृत्व में मुंडका विधानसभा में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचन्द्र पवार) और अधिक मज़बूती से आगे बढ़ेगी।

इस नियुक्ति से दिल्ली प्रदेश में सिख समाज के बीच पार्टी का आधार और व्यापक होगा और सबको साथ लेकर चलने की नीति को मजबूती मिलेगी।

शुक्रवार, 25 जुलाई 2025

बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण हंगामा का सच

अवधेश कुमार

बिहार में विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण या इंटेंसिव रिवीजन का इलेक्टरल रोल जिस तरह विरोध और हंगामा का विषय बना है वह अनपेक्षित कतई नहीं है। कांग्रेस पार्टी और अनेक भाजपा विरोधी दल ,एक्टिविस्ट , पत्रकार एनजीओ आदि काफी समय से चुनाव आयोग विरोधी तीखा अभियान चला रहे हैं। राहुल गांधी तो पुनरीक्षण आरंभ होने के पहले से ही आरोप लगा रहे हैं कि हेर-फेर कर भाजपा को जीताने का काम चुनाव आयोग करेगा।  विरोधी बार-बार आयोग के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय जाते और निराश वापस आते हैं । उच्चतम न्यायालय ने इस बार भी पुनरीक्षण प्रक्रिया रोकने की उनकी अपील खारिज कर दिया। हालांकि आगे वह सुनवाई के लिए सहमत हुआ है। सुनवाई के एक दिन पहले आईएनडीआईए की ओर से राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के नेतृत्व में बिहार की राजधानी पटना में चुनाव आयोग के कार्यालय तक मार्च किया गया।

वैसे इन पंक्तियों के लिखे जाने तक चुनाव आयोग के आंकड़े के अनुसार लगभग 85 प्रतिशत पुनरीक्षण फॉर्म मतदाताओं ने जमा कर दिए । चुनाव आयोग का विज्ञापन कहता है कि गणना प्रपत्र भरने की अवधि 25 जून से 26 जुलाई है और मतदाता सूची का प्रारूप प्रकाशन 1 अगस्त , 2025 को होगा। दावे और आपत्तियों की अवधि 1 अगस्त से 1 सितंबर, 2025 है और अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन 30 सितंबर, 2025 को किया जाएगा। इसका अर्थ हुआ कि किसी का नाम छूट गया तो  दावा करने के लिए एक महीने का समय है। तो बिना देखे कि किसका नाम जुड़ा ,नहीं जुड़ा इस तरह के विरोध का औचित्य क्या है? आयोग पर पहला आरोप  है कि वह इतनी जल्दी बड़े प्रदेश के मतदाताओं की सूची कैसे बना लेगा? जब 2002 में मतदाता सूची का बिहार में पुनरीक्षण हुआ था तब 15 जुलाई से 14 अगस्त यानी वर्तमान के अनुसार ही 31 दिन का समय था। क्या 22- 23 वर्ष के बाद मतदाता सूची की गहनता से जांच परख नहीं होनी चाहिए? अगर चुनाव आयोग ने इसके लिए आवश्यक जनसंपर्क और आधार कार्य नहीं किया तो आलोचना होगी। मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा है कि पिछले 4 महीने में प्रत्येक विधानसभा, जिला में सर्व दलीय बैठक की गई और लगभग 5 हजार ऐसी बैठकों में 28 हजार लोगों ने भाग लिया।‌ आयोग ने लगभग 80 हजार बीएलओ या बूथ लेवल ऑफिसर नियुक्त किए हैं जो मतदाताओं के घर पहुंच रहे है। राजनीतिक दलों ने भी 1.54 लाख बूथ लेवल एजेंट बीएलए बनाए हैं।‌ भारी संख्या में स्वयंसेवक भी सक्रिय हैं। कुल 16 करोड़ इन्यूमरेशन फॉर्म प्रकाशित किए गए। एक फॉर्म रिसिप्ट के रुप में मतदाता के पास रहेगा और दूसरा बीएलओ रखेंगे।  ऑनलाइन पोर्टल पर भी फॉर्म जमा करने की व्यवस्था है । इसलिए यह नहीं कह सकते कि ड्राइव बिल्कुल अव्यावहारिक है।

पहचान सुनिश्चित करने पर चुनाव आयोग के जोर का सबसे  तीखा विरोध हो रहा है । जिन 11 दस्तावेजों की सूची आयोग ने रखी है उसे पढ़ने पर कठिनाई का आभास होता है। पहले कुछ तथ्य पर बात करें। 1 जनवरी, 2003 की सूची में मतदाताओं की संख्या 4 करोड़ 96 लाख थी। वर्तमान में यह संख्या 7 करोड़ 89 लाख है। तो लगभग 2 करोड़ 93 लाख मतदाताओं को ही पहचान सुनिश्चित करनी होगी। जिन मतदाताओं के नाम 2003 में है उसके अलावा जिनका नाम आया उनको ही जन्मतिथि, जन्म स्थान आदि साबित करने वाले दस्तावेज देने होंगे। उनमें भी माता-पिता का नाम 2003 मतदाता सूची में है तो माता-पिता की पहचान साबित करने के लिए दस्तावेज देने की आवश्यकता नहीं। केवल 2003 वाली मतदाता सूची के उस हिस्से की कॉपी बीएलओ को देनी होगी जिसमें उनके माता-पिता का नाम लिखा है। जिनके नाम 2003 में है उन्हें केवल उसकी फोटो कॉपी बीएलओ को फॉर्म जमा करते समय देनी है जिसमें उनका नाम है।

क्या 2003 की मतदाता सूची में नाम न होने वाले के पास अगर जन्मतिथि तथा जन्म स्थान साबित करने के प्रमाण नहीं हो तो नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं होगा? इसकी आशंका है। पर आयोग का कहना है कि दस्तावेजविहीन  व्यक्ति की भारतीय पहचान को सुनिश्चित करने का काम क्षेत्र के एसडीम करेंगे और उनके कागजात का पता लगाने के लिए वालंटियर नियुक्त किए गए हैं। किसी की पहचान साबित करने का बिल्कुल दस्तावेज नहीं मिलता या उसे गली - मोहल्ले में भी कोई पहचानता नहीं है तो ऐसे लोगों का नाम काट दिया जाएगा। आयोग ने कहा है कि यदि आवश्यक दस्तावेज तथा फोटो उपलब्ध नहीं है तो प्रपत्र भरकर बीएलओ को जमा कर दें। निर्वाचक निबंधन पदाधिकारी द्वारा स्थानीय जांच या अन्य दस्तावेज के साक्ष्य के आधार पर निर्णय लिया जा सकेगा।

सामान्य तौर पर विचार करें तो मतदान की दृष्टि से बहुत ज्यादा कागजातों की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। एक समय कोई पहचान पत्र लेकर जाने की आवश्यकता नहीं थी और मतदान केंद्र पर केवल राजनीतिक दलों के पोलिंग एजेंट  बताते थे कि ये अमुक व्यक्ति हैं या नहीं। यह अत्यंत सरल व्यवस्था थी। लोकतंत्र मतदाताओं, राजनीतिक दलों और अधिकारियों सबकी नैतिकता, ईमानदारी और व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता पर निर्भर करती है। बूथ लूट से लेकर  फर्जी मतदाताओं की घटनाओं ने धीरे-धीरे पहचान सुनिश्चित करने की प्रक्रिया को जटिल बना दिया है। यह किसी के हित में नहीं किंतु वर्तमान ढांचे में इसके विकल्प की कल्पना ज्यादा चिंताजनक दिखने लगती है। बिहार में चुनाव आयोग ने यह डरावनी जानकारी दी है की पुनरीक्षण में ऐसे विदेशी नागरिक मिले जो मतदाता बन चुके हैं। उनकी जानकारी गृह मंत्रालय को दी जा रही है और नागरिकता सुनिश्चित होने के बाद ही तय होगा कि वे मतदाता रहेंगे या नहीं। राजनीतिक दलों ने इस पर भी तूफान खड़ा कर दिया । क्या यह उचित है? निस्संदेह,आधार कार्ड या राशन कार्ड बनवाना आसान नहीं होता। इसलिए चिंता का विषय है कि यह हमारी नागरिकता का प्रमाण पत्र नहीं है।आधार को सबसे सुरक्षित माना गया। देश भर में फर्जी आधार कार्ड पकड़ में आ रहे हैं। अवैध अप्रवासियों घुसपैठियों तक के आधार कार्ड बने हुए हैं। बिहार के भारी मुसलमान जनसंख्या वाले चार सीमांचल जिलों में आधार कार्ड के आंकड़े हैरत में डालते हैं । बिहार में औसत आधार कार्ड आबादी के 94% है ।  किशनगंज में 68 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है और आधार सैचुरेशन 126 प्रतिशत है,  कटिहार (44%) में 123%, अररिया (43%) में 123%, और पूर्णिया (38%) में 121% आधार सैचुरेशन है। आबादी से अधिक आधार कार्ड कैसे बने हुए हैं? पिछले वर्ष अररिया में एक बंगलादेशी घुसपैठियों पकड़ा गया जिसके पास पश्चिम बंगाल के 24 परगना से बना आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र था। बांग्लादेशी घुसपैठियों की लड़ाई केवल असम और बंगाल में नहीं बिहार के इन सीमांचल जिलों में भी रही है।

स्थानीय पुराने लोग उनके बारे में कुछ जानते हैं लेकिन ज्यादातर की कई पीढ़ी हो चुकी है और उनके अलग बस्तियों में होने के कारण पहचान मुश्किल रहती है। क्या विरोधियों के दबाव में उन सबकी जांच नहीं होनी चाहिए? संविधान की धारा 326 चुनाव आयोग को भारतीय नागरिकों को मतदाता के रूप में अंकित करने का अधिकार देता है। हालांकि नागरिकता की पहचान चुनाव आयोग की जिम्मेवारी नहीं है। इसीलिए उसने गृह मंत्रालय को मामला स्थानांतरित किया है। विरोधी चाहे इसे एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर को परोक्ष रूप से लागू करना माने या कुछ और किंतु भारतीय नागरिकों तक ही मतदान की व्यवस्था और पूरी मतदान प्रणाली की शुचिता तथा भारतीय सुरक्षा व्यवस्था की दृष्टि से सतर्कता आवश्यक है। बावजूद मेरा मानना है कि पहचान सुनिश्चित करने के कागजात के संदर्भ में स्पष्ट राष्ट्रीय नीति हो जो विदेशियों घुसपैठियों को तो सामने ले परंतु किसी पात्र भारतीय के लिए तनाव और परेशानी का कारण न बने। आधार और राशन कार्ड पर उच्चतम न्यायालय ने चुनाव आयोग को विचार करने का सुझाव दिया है। इन्हें सुरक्षित बनाया जाना अति आवश्यक है। आधार के पीछे कल्पना यही थी कि इससे अनेक कार्डों की आवश्यकता खत्म हो जाएगी। दूसरे, स्थानीय लोग  किसी के भारतीय होने की पुष्टि करते हैं तो पंचायत, प्रखंड ,अनुमंडल सबको पहचान सुनिश्चित करने के लिए दस्तावेज उपलब्ध कराने का दायित्व लेना चाहिए। 

एक बार मतदाता सूची का प्रारूप आ जाने दीजिए और देखिए कि कितने लोग पात्र लोग इससे वंचित होते हैं। अगर संख्या बहुत ज्यादा होती है तो उसके लिए आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए। जहां एक भी पात्र नागरिक सूची में स्थान पाने से वंचित नहीं हो वही एक भी अपात्र उसमें शामिल नहीं हो यह भी आयोग, राजनीतिक दलों, प्रशासन और हम सबका दायित्व है।


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