शुक्रवार, 16 मई 2025

भारत पाक युद्ध के दौरान मीडिया का गैर-जिम्मेदाराना आचरण

बसंत कुमार

कुछ दिन पूर्व पाकिस्तान द्वारा समर्थित भारत में आतंकी हमले के कारण दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण माहौल रहा और कई दिनों चले अघोषित युद्ध के बाद सीजफायर की घोषणा हुई। इस बीच सोशल मीडिया पर एक्टिव लोगों और कुछ स्वयंभू चैनलों और पत्रकारों ने बिना सिर पैर की खबरें फैलाकर देश के वातावरण को इतना तनावपूर्ण बना दिया कि देश के सभी लोग डरे व सहमे हुए थे। दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव के बीच सोशल मीडिया पर गलत और भ्रामक सूचनाओं की बाढ़-सी आ गई थी। कुछ चैनलों और सोशल मीडिया वालों ने तो भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान पर कब्जा कर लेने की बात कह दी थी। वहीं कुछ ने आधा पाकिस्तान को तबाह होने की बात कर दी थी। कभी-कभी इनके द्वारा इतनी भ्रामक और झूठी खबरें फैला दी गई की कि देश के आम जन मानस के मन में इतना डर और खौफ फैल गया कि लोग देश में असुरक्षित महसूस करने लगे थे और इस बीच कुछ अनाड़ी लोग मीडिया चैनलों पर विशेषज्ञ के रूप में आकर बेतुकी राय देने लगते हैं जैसे भारतीय फौज अनाड़ियों से भरी है।

विदेश और रक्षा मामलों के जानकारों ने दोनों देशों के बीच चल रहे तनाव की स्थिति में सोशल मीडिया और कुछ चैनलों पर इस तरह की सामग्री की बाढ़ आने पर चिंता जताते हुए कहा कि नागरिकों को सोशल मीडिया का उपयोग करते समय बहुत ही सावधानी बरतने चाहिए और साथ ही इस सामग्री को लोगों के बीच शेयर करने में भी संयम बरतना चाहिए क्योंकि इस तरह कि जानकारियां भ्रामक होती हैं और सत्य से परे होते हैं। सिर्फ सोशल मीडिया ही नहीं आज घर-घर चल रहे चैनलों की भूमिका भी इस विषय में बहुत विवादित रही है। कुछ चैनल तो सरकार या सत्ता में बैठे राजनीतिक दलों को खुश करने के लिए ऐसा प्रसारित कर देते हैं कि मानों एक पक्ष ने दूसरे पक्ष कि धरती पर कब्जा कर लिया हो। दोनों देशों के बीच चल रहे तनाव पर कुछ चैनल समाचार देते रहे कि भारतीय सेना कराची तक पहुंची या फिर पाकिस्तानी सेना ने सरेंडर कर दिया है। आज कि वैश्विक राजनीति में किन्हीं दो देशों के बीच चल रहे युद्ध या तनाव सिर्फ दो देशों के बीच तनाव नहीं होते बल्कि उसका असर पूरे महाद्वीप या पूरे विश्व पर पड़ता है।

कुछ स्वयंभू रक्षा विशेषज्ञ भारत पाकिस्तान युद्ध और फिर सीज़फायर पर अपना ज्ञान बांट रहे हैं जबकि वाट्सअप यूनिवर्सिटी से प्राप्त किया हुआ उनका आधा-अधूरा ज्ञान इन गंभीर विषयों पर विचार व्यक्त करने के लिए काफी नहीं होता। इस विषय में सरकार के उच्च अधिकारियों, रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री या फिर प्रधानमंत्री को ही पता होता है कि इस प्रकार की युद्ध की स्थिति के लंबा खींचने पर देश को कितना नुकसान हो सकता है। इसलिए जो लोग भारत पाकिस्तान के बीच हुए सीजफायर के लिए बगैर सोचे-समझे प्रधानमंत्री को कोस रहे हैं उन्हें मामले की गंभीरता को समझना चाहिए और सोशल मीडिया और चैनलों पर इस मामले में अपना विशेष राय देने से बचना चाहिए। उनकी अधकचरे जानकारी वाली कमेंट सैनिकों का मनोबल गिराती हैं।

इस विषय में कुछ लोग जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पसंद नहीं करते, एका एक उन्हें देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी की याद आने लगी हैं जिन्हें सभी लोग आयरन लेडी कहते थे पर ये लोग शायद यह भूल गए है कि बांग्लादेश युद्ध के दौरान जब उन्हें नेता विपक्ष अटल बिहारी वाजपाई ने दुर्गा कहा था यानि 1971 में पूरा विश्व दो महाशक्तियों संयुक राष्ट्र अमेरिका और सोवियत यूनियनों (यूएसएसआर) में बंटा हुआ था और यदि अमेरिका पाकिस्तान के साथ खड़ा था तो सोवियत यूनियन भारत के साथ खड़ा था। इसी कारण श्रीमति इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति निक्की और उनके सातवें बेड़े की परवाह किए बिना अपनी राह में आगे बढ़ गई। इसके अतिरिक्त उनके सहयोगी के रूप में रक्षा मंत्री बाबू जगजीवन राम और भारतीय सेना चट्टान की तरह साथ खड़ी थी और आज की तरह सोशल मीडिया और चैनल सरकार और सेना का मनोबल नहीं गिरा रहे थे जैसा आज के समय चल रहा है।

अपनी रक्षा संबंधी तैयारियां का राजनीतिक लाभ लेने की चेष्टा करना भी आत्मघाती होता है। हमने यह कभी नहीं सुना कि अमेरिका, फ्रांस, चीन, रूस जैसे देश अपनी ख़तरनाक मिसाइल या औजार किस शहर में बनाते हैं न के इन चीजों का प्रचार ही करते हैं क्या कोई बता सकता है इन विकसित देशों के औजार बनाने के कारखानों की लोकेशन क्या है। अटल जी की सरकार के समय परमाणु परीक्षण (बुड्ढा स्माइल) का पता दुनिया को तब पता लगा जब इसका परीक्षण सफल हो गया पर आज के भारत युग में यह नहीं हो पा रहा है, भारत की ब्रह्मोस मिसाइल का निर्माण उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर में स्थित कारखाने में हो रहा है। इस बात का प्रचार उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ऐसे जोर-शोर से किया जा रहा है जैसी भारतीय सेना के लिए यह मिसाइल उत्तर प्रदेश बना रही है। इससे दुश्मन देशों को इस बात पता नहीं लग जाएगा कि इस मिसाइल का निर्माण कहां हो रहा है और यह सुरक्षा की दृष्टि से उचित नहीं है ऐसी भी जानकारी आ रहीं है कि ब्रह्मोस मिसाइल की जानकारी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई को भेजने के आरोप में एक व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया गया है। अतः यही अपेक्षा की जानी चाहिए कि सुरक्षा संबंधी तैयारियों का राजनीतिक लाभ न लिया जाए।

भारत की यह परम्परा रही है कि जब भी देश दुश्मन के साथ युद्ध की स्थिति में रहा हो सरकार और विपक्ष ने एक साथ मिलाकर सेना और जनता का हौसला बढ़ाने का काम किया है। सबको याद है कि 1971 के भारत पाक युद्ध के दौरान विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपाई ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को दुर्गा कहा था और युद्ध के समाप्ति के पश्चात यूएनओ में भारत का पक्ष रखने के लिए नेता विपक्ष अटल बिहारी वाजपाई जी को भेजा गया था। आज पांच दशक बाद भी पूरे विपक्ष ने सरकार के साथ खड़े रहकर भारत की एकता और अखंडता दिखाई पर मीडिया के लोगों ने भारत-पाक युद्ध के बारे में झूठी व भ्रामक खबरें फैलाकर देश की जनता के मन में झूठा भ्रम फैलाने का काम किया। अब समय आ गया है कि इन इलेक्ट्रोनिक मीडिया और सोशल मीडिया पर शिकंजा कसा जाए।

(लेखक एक पहल एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव और भारत सरकार के पूर्व उपसचिव है।)

भारत ने आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई का दुनिया के सामने प्रतिमान पेश किया

 प्रधानमंत्री का संदेश आतंकवाद के विरुद्ध मानक 

अवधेश कुमार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो टूक , प्रखर और समयानुकूल स्वाभाविक प्रखर आक्रामक तेवर और घोषणाओं के साथ भाव भंगिमाओं को देखने के बाद भारत के अंदर और पूरे विश्व में जिन्हें भी सीमा पार आतंकवाद, जम्मू कश्मीर और भारत-पाकिस्तान संबंधों को लेकर कोई भ्रम रहा होगा वह दूर हो जाना चाहिए। अगर दूर नहीं होता है तो देशों की अपनी कुटिल नीति हो सकती है और भारत के अंदर मानसिक ग्रंथि। वास्तव में 10 मई को टकराव रुकने की सेना की दोनों महिला अधिकारियों तथा विदेश सचिव के वक्तव्य के बाद कम से कम भारत के अंदर आश्वस्ति होनी चाहिए थी। उसके बाद लगातार दो दिनों तक सेना के तीनों अंगों के तीन शीर्ष अधिकारियों ने जिस तरह बिंदुवार सुस्पष्ट और मुखर भाषा में सैन्य रणनीति और स्टैंड को सामने रखा उनसे साफ हो गया था कि ऑपरेशन सिंदूर के तात्कालिक लक्ष्य और उद्देश्य पूरे हो गए हैं किंतु पाकिस्तान के विरुद्ध केवल सैन्य कार्रवाई छोड़कर संपूर्ण रणनीति जारी है। प्रधानमंत्री अगर घोषणा कर रहे हैं कि टेरर के साथ टॉक, ट्रेड यानी आतंकवाद के साथ बातचीत और व्यापार नहीं चल सकता है, पानी और खून एक साथ नहीं बह सकता है और उसके बाद अगर देश के अंदर कोई सोचता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप या वहां के विदेश मंत्री के पोस्ट के आधार पर भारत की नीति चल रही है तो वैसे लोगों के लिए क्या शब्द प्रयोग किया जाए यह पाठक तय कर लें।

प्रधानमंत्री ने कहीं भी अपने संबोधन में सीजफायर यानी युद्धविराम शब्द का प्रयोग नहीं किया और इसके पूर्व सेना के प्रवक्ताओं ने भी नहीं किया। विदेश सचिव के वक्तव्य तब में भी यह शब्द नहीं था। प्रधानमंत्री के वक्तव्य से साफ है कि आतंकवाद और सैन्य दुस्साहस रोकने की पाकिस्तान द्वारा दी गई गारंटी के आधार पर ही ऑपरेशन सिंदूर और सेना का प्रतिप्रहार रुका तथा इस कसौटी पर उसके आचरण को देखकर ही भविष्य तय होगा। वास्तव में प्रधानमंत्री के वक्तव्य में मूल पांच बातें स्पष्ट थी। पहला, पहलगाम हमले के बाद सीमा पार आतंकवाद और पाकिस्तान के संदर्भ में हमारा स्टैंड और पूरी सैन्य रणनीति कायम है। दूसरा,  पाकिस्तान के हमले के लगातार विफल होने और उनके सैन्य अड्डों के तवाह होने के बाद शांति की पहल उन्होंने की और भारत अपनी शर्तों पर इसे स्वीकार किया । यह देश के अंदर बनाए गए झूठे नैरेटिव का उत्तर था जो सेना के प्रवक्ताओं द्वारा पत्रकार वार्ताओं में पहले भी दिया जा चुका था। आत्महीनता की मानस वाले समूह इसे स्वीकारने की जगह अपनी ही  नीति को कटघरे में खड़ा करने लगे ।अगर आतंकवाद हुआ तो कार्रवाई केवल आतंकवादियों और उनके अड्डों के विरुद्ध ही नहीं होगी इसे पाकिस्तानी सत्ता की भूमिका मानकर होगी। कोई भी समझ सकता है कि यह सीधी सीधी चेतावनी है । तीसरा, अमेरिका सहित दूसरे देशों के लिए संदेश था कि यह संभव नहीं की आतंकवादी देश न्यूक्लियर ब्लैकमेल के आधार पर शांति की बात करें और हम स्वीकार कर लें। यानी मार पड़ने से डरा पाकिस्तान किसी देश के पास यह कहते हुए जाता है कि हम न्यूक्लियर अस्त्र का प्रयोग करेंगे और उसके आधार पर  कार्रवाई रोकने या समझौता करने को कहा जाएगा तो स्वीकार नहीं होगा। ध्यान रखिए, भारत ने जिन वायु सेना अड्डों पर पाकिस्तान में कार्रवाई की उनमें माना जाता है कि उसके तीन न्यूक्लियर इंस्टॉलेशन के पास थे और वह घबरा गया कि अगर भारत यहां पहुंच सकता है तो आगे हमारे लिए इसका भी उपयोग करना संभव नहीं होगा। चौथा, अगर पाकिस्तान से कोई बातचीत होगी तो केवल पाक अधिकृत कश्मीर पर और आतंकवाद पर। यह भारत के अंदर विरोधियों और विशेषकर ट्रंप प्रशासन को उत्तर था जो जम्मू कश्मीर समस्या को सुलझाने और तटस्थ स्थान पर बातचीत करने का दंभ भर रहे थे। मोदी सरकार का यह स्टैंड पहले से क्लियर था। और पांचवां, हमारे स्वदेशी निर्मित विषयों और सैनिक उपकरणों ने जैसी सफलता प्राप्त की है उसके बाद कोई देश यह न सोचे कि युद्ध के दौरान हमको उनकी अपरिहार्यता रहेगी। 

गहराई से देखें अमेरिका सहित  पश्चिमी देशों को संदेश के साथ ही यह भारत की रक्षा सामग्रियों के अंतरराष्ट्रीय बाजार की एक बड़ी ब्रांडिंग थी। यानी हम भी प्रतिस्पर्धा में उतर गये हैं। आप भले किन्ही कारण से प्रधानमंत्री मोदी का सार्वजनिक विरोध करिए लेकिन किसी घटना को वे केवल तत्कालिकता में न देखकर उसके साथ दूरगामी और भविष्य के भारत के वैश्विक उद्देश्यों के आधार पर समग्र विचार कर सामने रखते हैं। देखा जाए तो भारत ने स्वयं को ऑपरेशन सिंदूर तथा उसके बाद प्रधानमंत्री के वक्तव्य से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नेतृत्वकारी भूमिका वाले देश के रूप में प्रस्तुत किया है। अमेरिका की परेशानी यह भी हो गई कि अगर भारत इस तरह साहसिक सैन्य कार्रवाई करता रहा तो दुनिया के नेता का उसका स्थान खतरे में होगा और बड़ी संख्या में देश उसके साथ खड़े हो जाएंगे। तभी डोनाल्ड ट्रंप की भाषा भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए समान थी। उन्होंने दोनों को महान देश बताया तथा दोनों के साथ सतत् व्यापार करने की भावना व्यक्त की। अचानक चीन के साथ व्यापार टकराव दूर करने के पीछे भी यही रणनीति हो सकती है।

प्रधानमंत्री को सारी बातें ध्यान में रही होगी और उसी अनुसार 22 अप्रैल के पहलगाम हमले के बाद पूरी तात्कालिक और दूरगामी सैन्य रणनीति , कूटनीति , अंतर्राष्ट्रीय व्यापार नीति और राजनीति निश्चित हुई है। प्रधानमंत्री ने अमेरिका और यूरोप को भी यह कहते हुए आईना दिखा दिया कि आपके यहां भी 11 सितंबर, 2001 के और ब्रिटेन में ट्यूब के हमले के पीछे भी यही बहावलपुर के जैश ए मोहम्मद और मुरीदके के लश्कर ए तैयबा केंद्र की भूमिका थी। यह सच है कि तब वैश्विक आतंकवाद के केंद्र में ये स्थल थे। ओसामा बिन लादेन खुऋएआम इन स्थानों में तकरीरें - बैठकें करता था,  इनसे सीधे रिश्ते थे और अलकायदा एवं उसके द्वारा स्थापित इंटरनेशनल इस्लामिक फ्रंट के साथ सारे संगठन संबंद्ध हो गए थे। अगर प्रधानमंत्री कहते हैं कि उन्होंने हमारी माताओं - बहनों की मांगों के सिंदूर उजड़े तो हमने उनके अड्डों को ही उजाड़ दिया। साथ यह भी कि ऑपरेशन सिंदूर एक अखंड प्रतिज्ञा है। नहीं लगता कि इस समय विश्व का कोई भी नेता इतने खतरनाक पड़ोसी , जिसके पास न्यूक्लियर अस्त्रागार हो और मजहबी उन्माद के आधार पर देश के बड़े वर्ग को मरने- मारने पर उतारू करने की विचारधारा, इस प्रकार के विचार और तेवर सामने रख सकता है । अब न केवल आतंकवादियों बल्कि उनको प्रायोजित करने वाले पाकिस्तान की सेना और संपूर्ण सत्ता को इस चेतावनी को  गंभीरता से लेना होगा कि उन्हें आतंकवाद का इंफ्रास्ट्रक्चर ध्वस्त करना ही होगा। नहीं करेंगे तो फिर ऑपरेशन सिंदूर की विस्तारित प्रचंड हमले के लिए तैयार रहें और वह निर्णायक होगा। 

वास्तव में ऑपरेशन सिंदूर सीमा पार ही नहीं वैश्विक आतंकवाद से संघर्ष के लिए भी विचारधारा और रणनीति दोनों स्तरों पर एक विशिष्ट मानक बना है। यह बताता है कि नेतृत्व के पास इसके पीछे की संपूर्ण सोच और योजनाओं की पूरी समझ हो, प्रतिकार के लिए दीर्घकालिक सोच और रणनीति तथा उसे क्रियान्वित करने की संकल्पबद्धता और दृढ़ता हो तो पाकिस्तान जैसे दुष्ट देश को भी सबक सिखाया जा सकता है। प्रधानमंत्री ने साफ कर दिया है कि आतंकवाद से पीड़ित विश्व शांति की बजाय इस रणनीति को अपनायें तथा भयभीत छोटे देश भारत के साथ आएं। कुल मिलाकर यहां से भारत की  दक्षिण एशिया सहित संपूर्ण विश्व के आतंकवाद तथा कश्मीर जैसे मुद्दों के संदर्भ में विजय और समाधान के आत्मविश्वास से भरी निर्भीक, दूरगामी और तथा कमजोर देशों के लिए नेतृत्वकारी भूमिका सामने आई है। इस तरह ऑपरेशन सिंदूर के साथ भारत एक ऐसे नए दौर में प्रवेश का संदेश दे चुका है जहां उसकी स्वयं की सुरक्षा, आत्मनिर्भरता तथा वैश्विक शांति की उसकी अपनी दृष्टि सर्वोपरि है और किसी देश का इसके परे सुझाव या साथ उसे स्वीकार नहीं। क्या देश में विरोधी भी इस युगांतरकारी सच को स्वीकार करेंगे?


मंगलवार, 13 मई 2025

सर्वोदय बाल विद्यालय बुलन्द मस्जिद स्कूल का 12वीं का 95.12% और 10वीं का 95.45% रहा रिजल्ट


  • 12वीं में मो. बिलाल (83.6%) प्रथम, फैजान (78.4%) द्वितीय, कृष्णा (73.8%) तृतीय स्थान पर रहे
  • 10वीं में मोहम्मद मोहित (73.4%) प्रथम, फरहान (65.8%) द्वितीय, मो. कसन अली (61.2%) तृतीय स्थान पर रहे
  • सभी विषयों में बच्चों ने अच्छे अंक प्राप्त कर स्कूल, अध्यापकों व मां-बाप का नाम रोशन किया

नई दिल्ली। सीबीएसई द्वारा घोषित 10वीं और 12वीं के वार्षिक परीक्षा परिणाम में सर्वोदय बाल विद्यालय, बुलन्द मस्जिद स्कूल के विद्यार्थियों ने शानदार प्रदर्शन किया है। इस बार स्कूल का 12वीं कक्षा का परीक्षा परिणाम 95.12% और 10वीं कक्षा का परीक्षा परिणाम 95.45%  परीक्षा परिणाम प्रतिशत रहा। 

इस वर्ष 12वीं में मो. बिलाल (83.6%) प्रथम, फैजान (78.4%) द्वितीय, कृष्णा (73.8%) तृतीय स्थान पर रहे वहीं मोहम्मद मोहित (73.4%) प्रथम, फरहान (65.8%) द्वितीय, मो. कसन अली (61.2%) तृतीय स्थान पर रहे।

इस परीक्षा परिणाम का श्रेय यहां के प्रधानाचार्य बलराज सिंह, उनके स्टाफ (अध्यापकों) व स्कूल की एसएमसी को जाता है जिन्होंने कम सुविधा में भी स्कूल के रिजल्ट में काफी सुधार किया है, जो लगातार जारी है।

इस पर स्कूल के प्रधानाचार्य बलराज सिंह ने सफल विद्यार्थियों, उनके अभिभावकों और शिक्षकों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह सफलता विद्यार्थियों की कड़ी मेहनत, लगन और शिक्षकों के मार्गदर्शन का परिणाम है। उन्होंने कहा कि विद्यालय निरंतर छात्रों को उत्कृष्ट शिक्षा प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है और भविष्य में भी इसी तरह प्रयास करता रहेगा। प्रधानाचार्य ने सभी सफल विद्यार्थियों को उनके उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं दीं और कहा कि यह सफलता अन्य छात्रों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनेगी।

गुरुवार, 8 मई 2025

भारत का अद्भुत पराक्रम

अवधेश कुमार 

सीमा पार आतंकवाद के विरुद्ध भारत के अद्भुत पराक्रम को पूरे विश्व ने देखा। पाकिस्तान को भी उम्मीद नहीं होगी कि भारत इतनी तैयारी के साथ आधी रात के बाद न केवल पाक अधिकृत कश्मीर बल्कि पाक की अन्य सीमाओं में  एक साथ अनेक जगहों पर सटीक मिसाइल हमले करेगा। उरी में सैनिकों पर आतंकवादी हमला में भारत ने 11वें दिन पाक अधिकृत कश्मीर में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक की। पुलवामा सीआरपीएफ शिविर पर हमले के 13वें दिन बालाकोट के आतंकी ठिकानों पर एयर स्ट्राइक यानी हवाई बमबारी की गई। पहलगाम हमले के 15वें दिन भारत ने मिसाइल हमला करके अब तक के सबसे बड़े और साहसी करवाई को अंजाम दिया  है।  जैसा कर्नल सोफिया और विंग कमांडर व्योमिका सिंह ने बताया कि रात 1:05 से 1:30 पर ऑपरेशन सिंदूर के नाम से भारत में 9 ठिकानों पर हमला किया जिनमें पांच पाक अधिकृत कश्मीर और चार पाकिस्तान के अंदर हैं। इस बार भारत ने इसके साथ 18 आधिकारिक तस्वीर भी जारी कर दी जिसे किसी के पास प्रश्न उठाने का कोई कारण नहीं रह गया। वैसे भी जब जैश ए मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर बयान जारी कर रो रहा है कि उसके 10 लोग मारे गए और वह क्यों नहीं मर गया तो फिर संदेह का कारण नहीं है। 2016 के सर्जिकल स्ट्राइक को तो छोड़िए  22 फरवरी 2019 के बालाकोट हवाई बमबारी पर भी हमारे देश के नेताओं ने कटाक्ष किया , उसका उपहास उड़ाया। इस बार सबके मुंह बंद है क्योंकि पाकिस्तान ने स्वयं स्वीकार किया है। पाकिस्तान के इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस के डॉयरेक्टर लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने सबसे पहले कहा कि भारत ने 24 मिसाइलें दागी हैं। 

 वास्तव में जब प्रधानमंत्री ने मधुबनी की सभा से कहा कि इस बार की कार्रवाई दुश्मन की कल्पना से परे होगा तथा उनको मिट्टी में मिलाने का वक्त आ गया है तो साफ था कि पूर्व की दो कार्रवाइयों से ज्यादा बड़ी, विस्तृत और आतंकवाद की दृष्टि से प्रभावी एवं निर्णायक कार्रवाई हो सकती है। जैसा कर्नल सोफिया और  विंग कमांडर व्योमिका ने बताया भारत ने अपनी रक्षा आत्मरक्षा के तहत कार्रवाई की है और इस बात का ध्यान रखा गया कि आम नागरिकों और सैनिक ठिकानों को हमारी मिसाइलें स्पर्श न करें। उन स्थानों को देखिए जहां-जहां मिसाइल हमले हुए तब पता चल जाएगा कि कितनी बड़ी कार्रवाई थी। बताया गया कि जिन नौ ठिकानों पर हमले किए गए, उसके पीछे भारतीय सेना का मकसद क्या था। दोनों महिला जवानों ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए वीभत्स आतंकी हमले के शिकार नागरिकों और उनके परिवारों को न्याय देने के लिए किया गया। जिन नौ ठिकानों की पहचान कर बर्बाद किया गया उनमें में आतंकियों को प्रशिक्षित किया जाता था। ये आतंकियों के लॉन्च पैड थे। एक, नियंत्रण रेखा से 30 किलोमीटर दूर‌ मुजफ्फराबाद का सवाईनाला कैंप लश्कर का ट्रेनिंग सेंटर था। सोनमर्ग, गुलमर्ग और पहलगाम में आतंकी हमला करने वाले आतंकवादियों ने यहीं प्रशिक्षण लिया था। दो, सैयदना बिलाल कैंप (पीओजेके) जैश-ए-मोहम्मद का ठिकाना है जहां हथियारों और विस्फोटकों को रखा जाता था,  जंगल में जिंदा रहने का प्रशिक्षण मिलता था। तीन, कोटली गुलपुर भी संगठन- लश्कर-ए-तैय्यबा का अड्डा था। यहां के आतंकी जम्मू-कश्मीर के राजौरी-पुंछ में सक्रिय थे। चौथा निशाना नियंत्रण रेखा से 9 किलोमीटर दूर भींबर का बरनाला कैंप था जहां हथियारों की हैंडलिंग, बारुदी सुरंग आईईडी और जंगल  में बचे रहने का प्रशिक्षण मिल जाता था।पांचवां मिसाइल हमला नियंत्रण रेखा से 13 किमी दूरअब्बास कैंप कोटली पर किया गया जहां लश्कर के आतंकवादी आत्मघाती तैयार किए जाते थे और एक बार में यहां 15 को प्रशिक्षण देने की क्षमता थी। पाक अधिकृत कश्मीर के इन ठिकानों को नष्ट करने के बाद मिसाइल पाकिस्तानी सीमा के भीतर चल रहे आतंकी ठिकानों पर गरजे। एक,  सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय सीमा से 6 किमी दूर और जम्मू-कश्मीर के सांबा-कठुआ के सामने सरजल कैंप सियालकोट पर हमला किया। दूसरे नंबर पर अंतरराष्ट्रीय सीमा से 12-18 किमी दूर सियालकोट का महमूना जोया कैंप  था जो हिजबुल का बड़ा अड्डा था। यहां से कठुआ में आतंकवादी गतिविधियां चलतीं थीं। पठानकोट वायु सेवा अड्डे हमला का का पूरा षड्यंत्र उसे अंजाम देने की योजना यही बनी थी।तीसरे नंबर पर अंतर्राष्ट्रीय सीमा से 18-25 किमी दूर हाफिज सईद के मुरीदके में मरकज-तैयबा था जहां 2008 के मुंबई आतंकी हमले के आतंकवादी प्रशिक्षित हुए। कसाब और डेविड हेर्डली को यही प्रशिक्षित किया गया था । और सबसे अंत में अंतरराष्ट्रीय सीमासे करीब 100 किलोमीटर दूर बहावलपुर में मरकज सुभानअल्लाह पर हमला किया। यह  जैश-ए-मोहम्मद का मुख्यालय है जो आतंकवादियों का व्यापक सुरक्षित केंद्र है जहां भर्ती से लेकर वैचारिक हथियारों के प्रशिक्षण और  उन्हें सीमा पार करने सहित सारी व्यवस्थाएं थी। मसूद अजहर के परिवार के 10 लोग भी मिसाइल के प्यार हो गए। भारत को बर्बाद करने की कसमें खाने वाले मसूद आज  फूट-फूट कर रोए तो कल्पना कर सकते हैं कि हमला उसके सारे सपनों को एकबारगी ध्वस्त करने वाला साबित हुआ है। इसमें  मसूद अजहर की बड़ी बहन और उसके पति, भांजे और उसकी पत्नी और अन्य भतीजों और परिवार के पांच बच्चों के साथ  उसके करीबी सहयोगी और उसकी मां और दो अन्य करीबी सहयोगियों की भी मौत हुई है। इसमें आतंकवादी कमांडर इकबाल करी के साथ हमले में 10 अन्य आतंकी भी मारे गए हैं। बिलाल आतंकी शिविर के प्रमुख याकूब मुगल की भी मौत हुई है। बहावलपुर के बाहरी इलाके में कराची-तोरखाम राजमार्ग पर 15 एकड़ में फैले मरकज सुभान अल्लाह मसूद अजहर का किला था जो 2019 में पुलवामा आतंकवादी हमले सहित अनेक हमले का केंद्र रहा है। मसूद अजहर का घर मरकज सुभान अल्लाह में ही है। 

इस तरह देखें तो भारतीय सेना ने केवल पहलगाम हमले के दोषियों को ही सजा नहीं दी बल्कि पिछले लंबे समय से आतंकवादी हमला करने के मुख्य केंद्रों और भविष्य के षड्यंत्र रचने वालों केन्द्रों को भी तबाह कर दिया। वास्तव में एक-एक हमले पर कार्रवाई से भारत पर आतंकवादी हमले का खतरा टल ही नहीं सकता क्योंकि आप जितने मारेंगे उतने आतंकवादी यै केंद्र पैदा कर लेंगे। तो पहला रास्ता यही था कि उन सारे चिन्हित केन्द्रों को नष्ट कर दिया जाए। उनके लिए भविष्य में भी गतिविधियां आसान नहीं होगी क्योंकि अब वहां भारत सहित विश्व भर की दृष्टि होगी। क्या आप सोच सकते हैं कि मुरीदके जैसा अड्डा लश्कर या तैय्यबा या हाफिज जल्दी निर्माण कर सकता है? क्या मसूद अजहर की अब हैसियत मार्केट सुभान के पुनर्निर्माण की है? हिजबुल मुजाहिदीन को हम आप भूल गए थे किंतु सुरक्षा एजेंसियां नहीं भूली और उनको भी नहीं छोड़ा गया। निश्चय ही प्रधानमंत्री जब तीन-तीन बार तीनों सेना के प्रमुखों और दो बार चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ से मिलते हैं तथा गृह मंत्री अमित शाह लगातार बैठकें  कर रहे हैं तो उसकी परिणति इतनी ही बड़ी होनी थी जिनमें लंबे समय के लिए भारत सीमा पार के बड़े आतंकवादी खतरों से मुक्त हो जाए। पहले सीमा में घुसकर धरती पर सामान्य सर्जिकल स्ट्राइक,  फिर हवाई बमबारी और अब मिसाइल दाग कर भारत ने पाकिस्तान और दुनिया को बता दिया है कि सीमा पार आतंकवाद के विरुद्ध वह हर तरह के अस्त्रों का उनकी पूरे प्रभाविता से उपयोग करने का मन बना चुका है। आतंकवाद के विरुद्ध सबसे पहले इजरायल और अमेरिका ने मिसाइल दागने की शुरुआत की और बाद में कुछ यूरोपीय देशों ने भी ऐसा किया । अब भारत भी उस श्रेणी में शामिल हो गया है । इनमें गुणात्मक अंतर यह है कि अमेरिका या यूरोप को किसी पड़ोसी देश का सामना नहीं करना था जहां से उसे न्यूक्लियर हथियार वाले से जवाबी कार्रवाई का खतरा हो। पाकिस्तान के विरुद्ध भारत की कार्रवाई की स्थिति इसके विपरीत है और इस नाते यह बहुत बड़े साहस का किम है । भारत को हजार घाव देने की कसमें खाने वाले पाकिस्तान को कभी इस तरह का सबक मिला नहीं और बालाकोट से उसने सीखने की कोशिश नहीं की। जरा सोचिए , जनरल आसिफ मुनीर की इस समय क्या दशा होगी? शहनवाज शरीफ सरकार की अथॉरिटी आज की स्थिति में क्या है यह पाकिस्तानियों को भी नहीं समझ आ र आ रहा है। मुनीर इस्लाम और कलमा के नाम पर पाकिस्तान को जम्मू कश्मीर  के गले की नस बताते हैं और उसके लिए आतंकवाद का इस्तेमाल करते हैं‌ तो आगे उनको इससे बड़ी कार्रवाई कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा। जब भारत का राजनीतिक नेतृत्व सीमा पार आतंकवाद को जड़मूल से नष्ट करने का संकल्प ले चुका हो तो सेंड बालवीर उसके अनुरूप उत्साह के साथ तैयारी करते हैं । आगे पाकिस्तान ने नहीं माना तो उसके गर्दन की नस दबने का भी समय आ जाएगा।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208


शुक्रवार, 2 मई 2025

खालिदा शाह डॉ. फारूक अब्दुल्ला के खिलाफ मोर्चा खोलेंगी

आर सी गंजू 

जम्मू कश्मीर में राजनीतिक स्थिति के शोरगुल में, आवामी नेशनल कॉन्फ्रेंस की अध्यक्ष और शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की सबसे बड़ी संतान बेगम खालिदा शाह ने आखिरकार अपने भाई, नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। स्थानीय पॉडकास्ट एशियन मेल के साथ एक विशेष साक्षात्कार में, उन्होंने खुले तौर पर कहा, "मैं अपने भाई फारूक अब्दुल्ला से बात नहीं करती।" कश्मीर के राजनीतिक इतिहास की चश्मदीद गवाह के रूप में, बेगम खालिदा ने 1947 से लेकर वर्तमान स्थिति तक के कश्मीर के इतिहास का व्यवस्थित रूप से वर्णन किया। 

90 साल की उम्र में, उन्हें कश्मीर का इतिहास अपनी उंगलियों पर याद है और वे गोपनीय तरीके से बात करती हैं। शेख की मौत के बाद, खालिदा एक राजनेता बन गईं जब उनके छोटे भाई फारूक अब्दुल्ला को नेशनल कॉन्फ्रेंस का अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर का मुख्यमंत्री नामित किया गया, और खालिदा के पति और शेख के सबसे लंबे समय तक राजनीतिक सहयोगी जी एम शाह को दरकिनार कर दिया गया। गुलाम मोहम्मद द्वारा फारूक की सरकार को गिराने से छह सप्ताह पहले, खालिदा ने मई 1983 में नेशनल कॉन्फ्रेंस के एक प्रतिनिधि सत्र का नेतृत्व किया, जिसने फारूक को पार्टी की मूल सदस्यता से निष्कासित कर दिया और खालिदा को इसका नया अध्यक्ष चुना। इस प्रकार एनसी कानूनी और राजनीतिक आधार पर विभाजित हो गया और एनसी (खालिदा) अस्तित्व में आई। 

एक साक्षात्कार में, उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के कहा कि गुप्कर घोषणा (पीएजीडी) के लिए पीपुल्स अलायंस का गठन करते समय पहले दिन से ही उनके बेटे मुजफ्फर शाह सीनियर अवामी नेशनल कॉन्फ्रेंस (एएनसी) के उपाध्यक्ष लेकिन विधानसभा चुनाव के समय उनके बेटे की उम्मीदवारी पर विचार नहीं किया गया, जबकि पैंथर पार्टी और सीपीएम उम्मीदवार यूसुफ तरगामी को पीएजीडी के तहत समायोजित किया गया। इसके परिणामस्वरूप मुजफ्फर शाह ने अपने उम्मीदवारों को एएनसी के बैनर तले खड़ा कर दिया, जब उनकी पार्टी के पास प्रचार के लिए कम समय बचा था। पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज्य और जेकेयूटी को कम करने के बाद के राजनीतिक हालात की तुलना करते हुए उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि राज्य को वर्तमान स्थिति में लाने के लिए कश्मीर की जनता और नेतृत्व जिम्मेदार है। उनका मानना है कि अगर सभी कश्मीरी अपनी पार्टी और वैचारिक सीमाओं को पार करके एक साथ आ जाएं तो वे कश्मीर को बचा सकते हैं। वह 1983 में अपने पिता की मृत्यु के बाद राजनीति में उतरीं, जब उनके भाई डॉ फारूक अब्दुल्ला के साथ राजनीतिक मतभेदों के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस में विभाजन हो रहा था शेख परिवार की सबसे बड़ी संतान खालिदा शाह अपने पिता स्वर्गीय शेख अब्दुल्ला की आंखों का तारा थीं।

1948 में जब उनकी शादी जी.एम. शाह से हुई थी, तब उनकी उम्र बमुश्किल 13 साल थी, लेकिन वे कश्मीर की राजनीति से लगातार जुड़ी रहीं। 1953 में जब उनके पिता और पति दोनों कई सालों के लिए जेल में बंद थे, तब वे अपने पिता के पार्टी कार्यकर्ताओं और उनके परिवार के सदस्यों की देखभाल के लिए जेलों में जाती थीं। वे नेशनल कॉन्फ्रेंस के पीछे चट्टान की तरह खड़ी रहीं और जनता और कार्यकर्ताओं का सम्मान अर्जित किया। उस समय उनके भाई डॉ. फारूक अब्दुल्ला लंदन में थे। ` उन्होंने कहा कि उनके पिता ने कभी उन पर राजनीति में शामिल होने के लिए दबाव नहीं डाला। लेकिन जब उनके पिता और पति जेल में थे, तब वे मेरी मां के साथ राजनीति में पूरी तरह से शामिल थीं।

दरअसल, 1983 में उन पर अलग-अलग तरफ से जबरदस्त दबाव था कि अगर वे राजनीति में नहीं आईं तो नेशनल कॉन्फ्रेंस अपनी छवि खो देगी। वे असली नेशनल कॉन्फ्रेंस की विरासत को बचाने के लिए राजनीति में आईं। क्योंकि उस समय नेशनल कॉन्फ्रेंस को खत्म करने की योजना बनाई जा रही थी। ऐसा महसूस किया गया कि उनके (खालिदा) नेतृत्व में नेशनल कॉन्फ्रेंस असली नेशनल कॉन्फ्रेंस की विचारधारा को बचा सकती है। इस तरह सरकार बनी। उनके मुताबिक वे जनता का ख्याल रखती थीं, जबकि उनके पति जीएम शाह मुख्यमंत्री के तौर पर प्रशासन चलाते थे। आज 90 साल की खालिदा शाह भारी मन से कहती हैं कि देश के संवेदनशील राज्य पर थोपे गए शासकों ने कश्मीरी समुदाय के साथ गुलामों जैसा व्यवहार किया है। लेकिन शासक यह भूल गए हैं कि कश्मीरी समुदाय पर कठोर हाथों से शासन संभव नहीं है, क्योंकि समुदाय को हर हाल में अपना सिर ऊंचा रखने की चिंता ज्यादा है। 

उन्होंने बताया कि कश्मीरी मूल रूप से शांतिप्रिय लोग हैं। देश और बाहर कुछ निहित स्वार्थी तत्व कभी नहीं चाहते थे कि कश्मीर फले-फूले। कश्मीर दिन-ब-दिन आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से समृद्ध होता जा रहा था। यह कुछ दुष्ट ताकतों की बर्दाश्त से बाहर हो गया और उन्होंने उपद्रव को बढ़ावा दिया। कश्मीर आज वाकई बहुत बुरे हालात में है। दुष्ट ताकतें राज्य को बांटना चाहती हैं, परिवार, समाज और समुदायों को बांटना चाहती हैं। यह एक बहुत ही सोची-समझी साजिश है। वे एक बार सफल हुए, लेकिन बार-बार सफल नहीं होंगे। उन्होंने कहा कि कश्मीरियों पर भरोसा किया जाना चाहिए क्योंकि वे भारतीय क्षेत्र में शामिल हो गए हैं। उन्हें यह कहते हुए दुख होता है कि कश्मीरियों पर कभी भरोसा नहीं किया गया। अगर कश्मीरियों पर भरोसा किया जाए तो चीजें अपने आप बदल जाएंगी। उन्होंने कहा कि कश्मीर में समस्याओं के पीछे अविश्वास ही मुख्य कारण है।

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