गुरुवार, 8 मई 2025

भारत का अद्भुत पराक्रम

अवधेश कुमार 

सीमा पार आतंकवाद के विरुद्ध भारत के अद्भुत पराक्रम को पूरे विश्व ने देखा। पाकिस्तान को भी उम्मीद नहीं होगी कि भारत इतनी तैयारी के साथ आधी रात के बाद न केवल पाक अधिकृत कश्मीर बल्कि पाक की अन्य सीमाओं में  एक साथ अनेक जगहों पर सटीक मिसाइल हमले करेगा। उरी में सैनिकों पर आतंकवादी हमला में भारत ने 11वें दिन पाक अधिकृत कश्मीर में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक की। पुलवामा सीआरपीएफ शिविर पर हमले के 13वें दिन बालाकोट के आतंकी ठिकानों पर एयर स्ट्राइक यानी हवाई बमबारी की गई। पहलगाम हमले के 15वें दिन भारत ने मिसाइल हमला करके अब तक के सबसे बड़े और साहसी करवाई को अंजाम दिया  है।  जैसा कर्नल सोफिया और विंग कमांडर व्योमिका सिंह ने बताया कि रात 1:05 से 1:30 पर ऑपरेशन सिंदूर के नाम से भारत में 9 ठिकानों पर हमला किया जिनमें पांच पाक अधिकृत कश्मीर और चार पाकिस्तान के अंदर हैं। इस बार भारत ने इसके साथ 18 आधिकारिक तस्वीर भी जारी कर दी जिसे किसी के पास प्रश्न उठाने का कोई कारण नहीं रह गया। वैसे भी जब जैश ए मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर बयान जारी कर रो रहा है कि उसके 10 लोग मारे गए और वह क्यों नहीं मर गया तो फिर संदेह का कारण नहीं है। 2016 के सर्जिकल स्ट्राइक को तो छोड़िए  22 फरवरी 2019 के बालाकोट हवाई बमबारी पर भी हमारे देश के नेताओं ने कटाक्ष किया , उसका उपहास उड़ाया। इस बार सबके मुंह बंद है क्योंकि पाकिस्तान ने स्वयं स्वीकार किया है। पाकिस्तान के इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस के डॉयरेक्टर लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने सबसे पहले कहा कि भारत ने 24 मिसाइलें दागी हैं। 

 वास्तव में जब प्रधानमंत्री ने मधुबनी की सभा से कहा कि इस बार की कार्रवाई दुश्मन की कल्पना से परे होगा तथा उनको मिट्टी में मिलाने का वक्त आ गया है तो साफ था कि पूर्व की दो कार्रवाइयों से ज्यादा बड़ी, विस्तृत और आतंकवाद की दृष्टि से प्रभावी एवं निर्णायक कार्रवाई हो सकती है। जैसा कर्नल सोफिया और  विंग कमांडर व्योमिका ने बताया भारत ने अपनी रक्षा आत्मरक्षा के तहत कार्रवाई की है और इस बात का ध्यान रखा गया कि आम नागरिकों और सैनिक ठिकानों को हमारी मिसाइलें स्पर्श न करें। उन स्थानों को देखिए जहां-जहां मिसाइल हमले हुए तब पता चल जाएगा कि कितनी बड़ी कार्रवाई थी। बताया गया कि जिन नौ ठिकानों पर हमले किए गए, उसके पीछे भारतीय सेना का मकसद क्या था। दोनों महिला जवानों ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए वीभत्स आतंकी हमले के शिकार नागरिकों और उनके परिवारों को न्याय देने के लिए किया गया। जिन नौ ठिकानों की पहचान कर बर्बाद किया गया उनमें में आतंकियों को प्रशिक्षित किया जाता था। ये आतंकियों के लॉन्च पैड थे। एक, नियंत्रण रेखा से 30 किलोमीटर दूर‌ मुजफ्फराबाद का सवाईनाला कैंप लश्कर का ट्रेनिंग सेंटर था। सोनमर्ग, गुलमर्ग और पहलगाम में आतंकी हमला करने वाले आतंकवादियों ने यहीं प्रशिक्षण लिया था। दो, सैयदना बिलाल कैंप (पीओजेके) जैश-ए-मोहम्मद का ठिकाना है जहां हथियारों और विस्फोटकों को रखा जाता था,  जंगल में जिंदा रहने का प्रशिक्षण मिलता था। तीन, कोटली गुलपुर भी संगठन- लश्कर-ए-तैय्यबा का अड्डा था। यहां के आतंकी जम्मू-कश्मीर के राजौरी-पुंछ में सक्रिय थे। चौथा निशाना नियंत्रण रेखा से 9 किलोमीटर दूर भींबर का बरनाला कैंप था जहां हथियारों की हैंडलिंग, बारुदी सुरंग आईईडी और जंगल  में बचे रहने का प्रशिक्षण मिल जाता था।पांचवां मिसाइल हमला नियंत्रण रेखा से 13 किमी दूरअब्बास कैंप कोटली पर किया गया जहां लश्कर के आतंकवादी आत्मघाती तैयार किए जाते थे और एक बार में यहां 15 को प्रशिक्षण देने की क्षमता थी। पाक अधिकृत कश्मीर के इन ठिकानों को नष्ट करने के बाद मिसाइल पाकिस्तानी सीमा के भीतर चल रहे आतंकी ठिकानों पर गरजे। एक,  सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय सीमा से 6 किमी दूर और जम्मू-कश्मीर के सांबा-कठुआ के सामने सरजल कैंप सियालकोट पर हमला किया। दूसरे नंबर पर अंतरराष्ट्रीय सीमा से 12-18 किमी दूर सियालकोट का महमूना जोया कैंप  था जो हिजबुल का बड़ा अड्डा था। यहां से कठुआ में आतंकवादी गतिविधियां चलतीं थीं। पठानकोट वायु सेवा अड्डे हमला का का पूरा षड्यंत्र उसे अंजाम देने की योजना यही बनी थी।तीसरे नंबर पर अंतर्राष्ट्रीय सीमा से 18-25 किमी दूर हाफिज सईद के मुरीदके में मरकज-तैयबा था जहां 2008 के मुंबई आतंकी हमले के आतंकवादी प्रशिक्षित हुए। कसाब और डेविड हेर्डली को यही प्रशिक्षित किया गया था । और सबसे अंत में अंतरराष्ट्रीय सीमासे करीब 100 किलोमीटर दूर बहावलपुर में मरकज सुभानअल्लाह पर हमला किया। यह  जैश-ए-मोहम्मद का मुख्यालय है जो आतंकवादियों का व्यापक सुरक्षित केंद्र है जहां भर्ती से लेकर वैचारिक हथियारों के प्रशिक्षण और  उन्हें सीमा पार करने सहित सारी व्यवस्थाएं थी। मसूद अजहर के परिवार के 10 लोग भी मिसाइल के प्यार हो गए। भारत को बर्बाद करने की कसमें खाने वाले मसूद आज  फूट-फूट कर रोए तो कल्पना कर सकते हैं कि हमला उसके सारे सपनों को एकबारगी ध्वस्त करने वाला साबित हुआ है। इसमें  मसूद अजहर की बड़ी बहन और उसके पति, भांजे और उसकी पत्नी और अन्य भतीजों और परिवार के पांच बच्चों के साथ  उसके करीबी सहयोगी और उसकी मां और दो अन्य करीबी सहयोगियों की भी मौत हुई है। इसमें आतंकवादी कमांडर इकबाल करी के साथ हमले में 10 अन्य आतंकी भी मारे गए हैं। बिलाल आतंकी शिविर के प्रमुख याकूब मुगल की भी मौत हुई है। बहावलपुर के बाहरी इलाके में कराची-तोरखाम राजमार्ग पर 15 एकड़ में फैले मरकज सुभान अल्लाह मसूद अजहर का किला था जो 2019 में पुलवामा आतंकवादी हमले सहित अनेक हमले का केंद्र रहा है। मसूद अजहर का घर मरकज सुभान अल्लाह में ही है। 

इस तरह देखें तो भारतीय सेना ने केवल पहलगाम हमले के दोषियों को ही सजा नहीं दी बल्कि पिछले लंबे समय से आतंकवादी हमला करने के मुख्य केंद्रों और भविष्य के षड्यंत्र रचने वालों केन्द्रों को भी तबाह कर दिया। वास्तव में एक-एक हमले पर कार्रवाई से भारत पर आतंकवादी हमले का खतरा टल ही नहीं सकता क्योंकि आप जितने मारेंगे उतने आतंकवादी यै केंद्र पैदा कर लेंगे। तो पहला रास्ता यही था कि उन सारे चिन्हित केन्द्रों को नष्ट कर दिया जाए। उनके लिए भविष्य में भी गतिविधियां आसान नहीं होगी क्योंकि अब वहां भारत सहित विश्व भर की दृष्टि होगी। क्या आप सोच सकते हैं कि मुरीदके जैसा अड्डा लश्कर या तैय्यबा या हाफिज जल्दी निर्माण कर सकता है? क्या मसूद अजहर की अब हैसियत मार्केट सुभान के पुनर्निर्माण की है? हिजबुल मुजाहिदीन को हम आप भूल गए थे किंतु सुरक्षा एजेंसियां नहीं भूली और उनको भी नहीं छोड़ा गया। निश्चय ही प्रधानमंत्री जब तीन-तीन बार तीनों सेना के प्रमुखों और दो बार चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ से मिलते हैं तथा गृह मंत्री अमित शाह लगातार बैठकें  कर रहे हैं तो उसकी परिणति इतनी ही बड़ी होनी थी जिनमें लंबे समय के लिए भारत सीमा पार के बड़े आतंकवादी खतरों से मुक्त हो जाए। पहले सीमा में घुसकर धरती पर सामान्य सर्जिकल स्ट्राइक,  फिर हवाई बमबारी और अब मिसाइल दाग कर भारत ने पाकिस्तान और दुनिया को बता दिया है कि सीमा पार आतंकवाद के विरुद्ध वह हर तरह के अस्त्रों का उनकी पूरे प्रभाविता से उपयोग करने का मन बना चुका है। आतंकवाद के विरुद्ध सबसे पहले इजरायल और अमेरिका ने मिसाइल दागने की शुरुआत की और बाद में कुछ यूरोपीय देशों ने भी ऐसा किया । अब भारत भी उस श्रेणी में शामिल हो गया है । इनमें गुणात्मक अंतर यह है कि अमेरिका या यूरोप को किसी पड़ोसी देश का सामना नहीं करना था जहां से उसे न्यूक्लियर हथियार वाले से जवाबी कार्रवाई का खतरा हो। पाकिस्तान के विरुद्ध भारत की कार्रवाई की स्थिति इसके विपरीत है और इस नाते यह बहुत बड़े साहस का किम है । भारत को हजार घाव देने की कसमें खाने वाले पाकिस्तान को कभी इस तरह का सबक मिला नहीं और बालाकोट से उसने सीखने की कोशिश नहीं की। जरा सोचिए , जनरल आसिफ मुनीर की इस समय क्या दशा होगी? शहनवाज शरीफ सरकार की अथॉरिटी आज की स्थिति में क्या है यह पाकिस्तानियों को भी नहीं समझ आ र आ रहा है। मुनीर इस्लाम और कलमा के नाम पर पाकिस्तान को जम्मू कश्मीर  के गले की नस बताते हैं और उसके लिए आतंकवाद का इस्तेमाल करते हैं‌ तो आगे उनको इससे बड़ी कार्रवाई कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा। जब भारत का राजनीतिक नेतृत्व सीमा पार आतंकवाद को जड़मूल से नष्ट करने का संकल्प ले चुका हो तो सेंड बालवीर उसके अनुरूप उत्साह के साथ तैयारी करते हैं । आगे पाकिस्तान ने नहीं माना तो उसके गर्दन की नस दबने का भी समय आ जाएगा।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208


शुक्रवार, 2 मई 2025

खालिदा शाह डॉ. फारूक अब्दुल्ला के खिलाफ मोर्चा खोलेंगी

आर सी गंजू 

जम्मू कश्मीर में राजनीतिक स्थिति के शोरगुल में, आवामी नेशनल कॉन्फ्रेंस की अध्यक्ष और शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की सबसे बड़ी संतान बेगम खालिदा शाह ने आखिरकार अपने भाई, नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। स्थानीय पॉडकास्ट एशियन मेल के साथ एक विशेष साक्षात्कार में, उन्होंने खुले तौर पर कहा, "मैं अपने भाई फारूक अब्दुल्ला से बात नहीं करती।" कश्मीर के राजनीतिक इतिहास की चश्मदीद गवाह के रूप में, बेगम खालिदा ने 1947 से लेकर वर्तमान स्थिति तक के कश्मीर के इतिहास का व्यवस्थित रूप से वर्णन किया। 

90 साल की उम्र में, उन्हें कश्मीर का इतिहास अपनी उंगलियों पर याद है और वे गोपनीय तरीके से बात करती हैं। शेख की मौत के बाद, खालिदा एक राजनेता बन गईं जब उनके छोटे भाई फारूक अब्दुल्ला को नेशनल कॉन्फ्रेंस का अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर का मुख्यमंत्री नामित किया गया, और खालिदा के पति और शेख के सबसे लंबे समय तक राजनीतिक सहयोगी जी एम शाह को दरकिनार कर दिया गया। गुलाम मोहम्मद द्वारा फारूक की सरकार को गिराने से छह सप्ताह पहले, खालिदा ने मई 1983 में नेशनल कॉन्फ्रेंस के एक प्रतिनिधि सत्र का नेतृत्व किया, जिसने फारूक को पार्टी की मूल सदस्यता से निष्कासित कर दिया और खालिदा को इसका नया अध्यक्ष चुना। इस प्रकार एनसी कानूनी और राजनीतिक आधार पर विभाजित हो गया और एनसी (खालिदा) अस्तित्व में आई। 

एक साक्षात्कार में, उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के कहा कि गुप्कर घोषणा (पीएजीडी) के लिए पीपुल्स अलायंस का गठन करते समय पहले दिन से ही उनके बेटे मुजफ्फर शाह सीनियर अवामी नेशनल कॉन्फ्रेंस (एएनसी) के उपाध्यक्ष लेकिन विधानसभा चुनाव के समय उनके बेटे की उम्मीदवारी पर विचार नहीं किया गया, जबकि पैंथर पार्टी और सीपीएम उम्मीदवार यूसुफ तरगामी को पीएजीडी के तहत समायोजित किया गया। इसके परिणामस्वरूप मुजफ्फर शाह ने अपने उम्मीदवारों को एएनसी के बैनर तले खड़ा कर दिया, जब उनकी पार्टी के पास प्रचार के लिए कम समय बचा था। पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज्य और जेकेयूटी को कम करने के बाद के राजनीतिक हालात की तुलना करते हुए उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि राज्य को वर्तमान स्थिति में लाने के लिए कश्मीर की जनता और नेतृत्व जिम्मेदार है। उनका मानना है कि अगर सभी कश्मीरी अपनी पार्टी और वैचारिक सीमाओं को पार करके एक साथ आ जाएं तो वे कश्मीर को बचा सकते हैं। वह 1983 में अपने पिता की मृत्यु के बाद राजनीति में उतरीं, जब उनके भाई डॉ फारूक अब्दुल्ला के साथ राजनीतिक मतभेदों के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस में विभाजन हो रहा था शेख परिवार की सबसे बड़ी संतान खालिदा शाह अपने पिता स्वर्गीय शेख अब्दुल्ला की आंखों का तारा थीं।

1948 में जब उनकी शादी जी.एम. शाह से हुई थी, तब उनकी उम्र बमुश्किल 13 साल थी, लेकिन वे कश्मीर की राजनीति से लगातार जुड़ी रहीं। 1953 में जब उनके पिता और पति दोनों कई सालों के लिए जेल में बंद थे, तब वे अपने पिता के पार्टी कार्यकर्ताओं और उनके परिवार के सदस्यों की देखभाल के लिए जेलों में जाती थीं। वे नेशनल कॉन्फ्रेंस के पीछे चट्टान की तरह खड़ी रहीं और जनता और कार्यकर्ताओं का सम्मान अर्जित किया। उस समय उनके भाई डॉ. फारूक अब्दुल्ला लंदन में थे। ` उन्होंने कहा कि उनके पिता ने कभी उन पर राजनीति में शामिल होने के लिए दबाव नहीं डाला। लेकिन जब उनके पिता और पति जेल में थे, तब वे मेरी मां के साथ राजनीति में पूरी तरह से शामिल थीं।

दरअसल, 1983 में उन पर अलग-अलग तरफ से जबरदस्त दबाव था कि अगर वे राजनीति में नहीं आईं तो नेशनल कॉन्फ्रेंस अपनी छवि खो देगी। वे असली नेशनल कॉन्फ्रेंस की विरासत को बचाने के लिए राजनीति में आईं। क्योंकि उस समय नेशनल कॉन्फ्रेंस को खत्म करने की योजना बनाई जा रही थी। ऐसा महसूस किया गया कि उनके (खालिदा) नेतृत्व में नेशनल कॉन्फ्रेंस असली नेशनल कॉन्फ्रेंस की विचारधारा को बचा सकती है। इस तरह सरकार बनी। उनके मुताबिक वे जनता का ख्याल रखती थीं, जबकि उनके पति जीएम शाह मुख्यमंत्री के तौर पर प्रशासन चलाते थे। आज 90 साल की खालिदा शाह भारी मन से कहती हैं कि देश के संवेदनशील राज्य पर थोपे गए शासकों ने कश्मीरी समुदाय के साथ गुलामों जैसा व्यवहार किया है। लेकिन शासक यह भूल गए हैं कि कश्मीरी समुदाय पर कठोर हाथों से शासन संभव नहीं है, क्योंकि समुदाय को हर हाल में अपना सिर ऊंचा रखने की चिंता ज्यादा है। 

उन्होंने बताया कि कश्मीरी मूल रूप से शांतिप्रिय लोग हैं। देश और बाहर कुछ निहित स्वार्थी तत्व कभी नहीं चाहते थे कि कश्मीर फले-फूले। कश्मीर दिन-ब-दिन आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से समृद्ध होता जा रहा था। यह कुछ दुष्ट ताकतों की बर्दाश्त से बाहर हो गया और उन्होंने उपद्रव को बढ़ावा दिया। कश्मीर आज वाकई बहुत बुरे हालात में है। दुष्ट ताकतें राज्य को बांटना चाहती हैं, परिवार, समाज और समुदायों को बांटना चाहती हैं। यह एक बहुत ही सोची-समझी साजिश है। वे एक बार सफल हुए, लेकिन बार-बार सफल नहीं होंगे। उन्होंने कहा कि कश्मीरियों पर भरोसा किया जाना चाहिए क्योंकि वे भारतीय क्षेत्र में शामिल हो गए हैं। उन्हें यह कहते हुए दुख होता है कि कश्मीरियों पर कभी भरोसा नहीं किया गया। अगर कश्मीरियों पर भरोसा किया जाए तो चीजें अपने आप बदल जाएंगी। उन्होंने कहा कि कश्मीर में समस्याओं के पीछे अविश्वास ही मुख्य कारण है।

गुरुवार, 1 मई 2025

पहलगाम के आगे

अवधेश कुमार 

पहलगाम हमले के बाद संपूर्ण देश का सामूहिक मानस ्वैसी कार्रवाई , प्रतिरोध और प्रतिशोध का है जिससे भारत को दोबारा ऐसी भयानक घटना का सामना न करना पड़े। यह स्वाभाविक है। एक समय जम्मू कश्मीर में आतंकवादी घटनाएं आम थी और तब भी लोगों के अंदर क्रोध पैदा होता था लेकिन आम मानस यह था कि इसे रोकना अभी संभव नहीं। 5 अगस्त, 2019 को जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने के बाद माहौल बदला,  आतंकवादी घटनाओं में व्यापक कमी आई है, कश्मीर घाटी भी धीरे-धीरे आर्थिक- सामाजिक -सांस्कृतिक -शैक्षणिक गतिविधियों में देश के सामान्य राज्य की तरह काफी हद तक पटरी पर लौटा है। ऐसे माहौल में हिंदू होने के कारण 26 हिंदुओं तथा एक गैर मुस्लिम का उनका विरोध करने के कारण हत्या के बाद उबाल स्वाभाविक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने भी आंतरिक और सीमा पार आतंकवाद के समूल नाश का सक्रिय संकल्प दिखाया है। मोदी सरकार ने 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक तथा 2018 में पुलवामा हमले के बाद बालाकोट हवाई बमबारी जैसी भारत की दृष्टि से अकल्पनीय माने जाने वाली कार्रवाई करके देश का विश्वास प्राप्त किया है। प्रधानमंत्री ने 24 अप्रैल को  बिहार के मधुबनी की आमसभा में केवल आतंकवादी के साथ उने सरपरस्तों के विरुद्ध ऐसी कार्रवाई की घोषणा की जिसकी कल्पना नहीं की गई होगी। बिहार की भूमि पर उन्होंने कुछ मिनट अंग्रेजी में भाषण दिया जो विश्व के लिए संदेश था कि आतंकवाद के विरुद्ध भारत कमर कस चुका है और कार्रवाई करेगा। इस भाषण से दुनिया को स्पष्ट संदेश दिया गया और इसका असर भी है । 

कोई देश सार्वजनिक संकल्प दिखाते हुए समानांतर कदम उठाता है और उसकी पृष्ठभूमि आतंकवाद के विरुद्ध शून्य सहिष्चुता की हो चुकी है तो विश्व समुदाय को भी सोच और व्यवहार को उसके अनुरूप बदलना पड़ता है। पाकिस्तान के साथ एक देश नहीं खड़ा है। वे मुस्लिम देश , जो सामान्यतः जम्मू कश्मीर पर इस्लामिक सम्मेलन संगठन या ओआईसी में उसका साथ देते थे, हिम्मत नहीं दिखा रहे। अमेरिकी विदेश विभाग की ब्रीफिंग में एक पाकिस्तानी पत्रकार के प्रश्न की विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने हिकारत के भाव से उपेक्षा की। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि वे इस पर भारत के साथ हैं। सच है कि काश पटेल के नेतृत्व में अमेरिका की एफबीआई तथा तुलसी गवार्ड के निर्देशन में नेशनल इंटेलिजेंस आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष में भारत के साथ खड़ा है। यूरोपीय देशो ने स्पष्ट रूप से भारत का समर्थन किया है। पाकिस्तान ने यद्यपि इस्लामाबाद में 26 देश के राजनयिकों को बुलाकर अपनी दृष्टि से ब्रीफिंग की किंतु कोई उससे प्रभावित है ऐसा लगता नहीं। प्रश्न है कि भारत क्या कर सकता है, क्या करेगा और कैसी संभावनाएं हैं? 

घटना के दूसरे दिन गृह मंत्री अमित शाह के जम्मू कश्मीर से लौटने के बाद मंत्रिमंडल की सुरक्षा मामलों की समिति ने तत्काल प्रभाव से पाकिस्तानियों को दिये हर तरह का वीजा रद्द करने, उन्हें देश छोड़ने, पाकिस्तानी उच्चायोग से रक्षा और सैनिक विभाग के अपने समकक्षों को इस्लामाबाद से बुलाने तथा संख्या कम करने का अदम उठाया। इसके साथ सिंधु जल संधि स्थगित करने का अभूतपूर्व कदम उठाया। पाकिस्तान ने इसकी प्रतिक्रिया में सीनेट में प्रस्ताव पारित किया तथा आतंकवादी घटना से स्वयं को अलग करते हुए भारत पर ही बदनाम करने का आरोप लगाया। पाकिस्तान का वक्तव्य है कि सिंधु जल समझौते को रद्द करना युद्ध जैसा कदम है। उसने 1972 के शिमला समझौता को समाप्त करने की धमकी दी। पाकिस्तान की दुर्दशा देखिए कि रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने स्काई न्यूज़ को दिए साक्षात्कार में आतंकी संगठनों के वित्त पोषण , प्रशिक्षण और समर्थन के इतिहास संबंधी प्रश्न पर स्वीकार किया कि हम अमेरिका और ब्रिटेन समेत पश्चिमी देशों के लिए ऐसा करते रहे हैं और हमें इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। हम अगर सोवियत संघ के खिलाफ अफगानिस्तान युद्ध या 9/11 में साथ नहीं होते तो पाकिस्तान का ट्रैक रिकॉर्ड साफ रहता। यह भी वास्तविक सच को इस मायने में झूठलाना है क्योंकि स्थिति का लाभ उठाते हुए जम्मू कश्मीर में आतंकवाद पाकिस्तान ने अपनी ओर से प्रायोजित किया और उसका पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया जो एक हद तक अभी भी कायम  है। विश्व के प्रमुख देशों की सूचना में ये सारी बातें हैं। इसलिए भारत ने जब 2018 में हवाई बमबाड़ी की तो एक भी देश ने उसका विरोध नहीं किया। उस समय भी डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के और व्लादिमीर पुतिन रूस के राष्ट्रपति थे। 

देश में पाकिस्तान के विरुद्ध सैनिक कार्रवाई या युद्ध का माहौल बना हुआ है। सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट हवाई बमबारी किया जा चुका है तथा इसके प्रभाव भी पड़े। स्वाभाविक ही इससे बड़ी कार्रवाई की स्थिति सामने है। तो आगे क्या? जम्मू कश्मीर के लिए आंतरिक और बाह्य दोनों स्तरों पर कार्रवाई की आवश्यकता थी जो हो रही है। भारत ने आंतरिक रूप से पहलगाम हमले के एक आतंकवादी सहित सहयोग करने वाले संलिप्तत नौ लोगों का घर ध्वस्त कर दिया गया। यह आतंकवादियों को सीधा संदेश है कि भारत बदल चुका है। जम्मू कश्मीर के संदर्भ में न केवल भारत बदला है बल्कि जम्मू कश्मीर तथा अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य भी बदल है। यह पहली बार है जब आतंकवादी घटना के विरुद्ध कम या ज्यादा संख्या में संपूर्ण जम्मू कश्मीर से लोग सड़कों पर आए हैं, कैंडल मार्च और छोटे-मोटे धरना प्रदर्शन हो रहे हैं। यह सब गृह मंत्री अमित शाह के कश्मीर दौरे के बाद ही आरंभ हुआ। अमित शाह के साथ बैठक में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी उपस्थित थे। उसके बाद नेशनल कांफ्रेंस ने पहली बार जिले - जिले में विरोध प्रदर्शन किया और महबूबा मुफ्ती जैसी आतंकवाद की समर्थक और पाकिस्तान के प्रति नरम रुख वालीको भी सड़क पर उतरना पड़ा। कश्मीर में जहां आतंकवादी हमले के बाद सुरक्षा कार्रवाई के विरुद्ध नारे लगाते थे, पत्थरबाजी होती थी और आतंकवादियों के निकल भागने का रास्ता तैयार किया जाता था उसके विपरीत ये दृश्य बदलाव के संदेश हैं।

थोड़ी गहराई से विचार करें तो निष्कर्ष आएगा कि सीमा पार सैन्य कार्रवाई को छोड़कर जितने कदम उठाए जा सकते थे लगभग भारत ने उठा लिया है। इसका अर्थ है कि भारत समग्रता में दीर्घकालिक समाधान की दृष्टि से बहुपक्षीय कार्रवाई की ओर अग्रसर है। सिंधु जल संधि पर भारत ने 25 अप्रैल को स्पष्ट किया कि वह एक-एक बूंद पानी रोकेगा और उसके लिए तात्कालीक , मध्यवर्ती और दीर्घकालिक उपाय के संकेत दिए गए। यह काफी हद तक संभव है। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी का पहला दौरा हुआ जहां उन्होंने दो प्रमुख सैन्य मुख्यालयों विक्टर फोर्स और चिनार कोड में वरिष्ठ कमांडरों से बातचीत की तथा  नियंत्रण रेखा पर सीमा पार से हुई गोलीबारी को भी समझा। पहले सेना अध्यक्ष और उसके बाद के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मिले। सैन्य कार्रवाई या युद्ध के पहले तैयारी करनी होती है। सेना को लक्ष्य दिया जाता है और उसके अनुरूप रणनीति बनाते हुए संघर्ष करती है। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में जैसा बाद में जनरल मानेक शा ने बताया था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें मई-जून में सैन्य कार्रवाई के लिए कहा। मानेक शा ने तैयारी के लिए लगभग 6 महीने का समय लिया और दिसंबर में भारत ने सैन्य हस्तक्षेप किया।

यह समझना होगा कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिफ मुनीर ने 17 अप्रैल के अपने भाषण में न केवल पाकिस्तान सेना, वहां के सुरक्षा बल और आतंकवादी बल्कि आम मुसलमान को भी जेहाद के लिए पूरी तरह उकसाया है। ये सच मायने नहीं रखने कि आसिफ मुनीर सेना में अपने विरुद्ध असंतोष, इमरान खान की पार्टी को नियंत्रित करने, अफगानिस्तान के साथ तनाव का सफलतापूर्वक सामना करने एवं देश के अंदर सेना पर भ्रष्टाचार , काहिली, विफलता और अय्याशी के लग रहे आरोपों का खंडन करने में विफल साबित हुए हैं। आतंकवाद के हथियार से संघर्ष करने के लिए राजनीतिक - आर्थिक स्थिरता तथा शक्तिशाली होना आवश्यक नहीं। पाकिस्तान की विचारधारा से जुड़े मुसलमानों के एक समूह के अंदर भी जम्मू कश्मीर को इस्लामी जेहाद का भाग बनाने की भावना पैदा है तो उससे केवल परंपरागत सैन्य कार्रवाई से पूरी तरह नहीं निपटा जा सकता। पाकिस्तान ने न्यूक्लियर हथियार का हवाला दिया है। मोदी सरकार की पहले की दो कार्रवाइयों से पाकिस्तान की न्यूक्लियर धमकी की हवा निकाल चुकी है। तो निश्चित मानिए पाकिस्तान के विरुद्ध बहुपक्षीय निर्णायक कार्रवाई शुरू हो गई है। लेकिन अपने देश के अंदर प्रभावी इकोसिस्टम अभी से सरकार ही नहीं संपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था के विरुद्ध नैरेटिव खड़ा करने में लगा है उसका भी प्रभावी रूप से सामना करना होगा


थाना सीलमपुर की टीम ने मात्र 6 घंटों में ₹8,000/- की लूट का मामला सुलझाया

  1. एक कुख्यात लुटेरा, सीलमपुर थाने का बीसी गिरफ्तार
  2. मात्र 6 घंटों में ₹8,000/- की लूट का मामला सुलझाया 
  3. लूटी गई राशि और वारदात में उपयोग किया गया ब्लेड बरामद
  4. आरोपी शाहनवाज़ पहले भी लूट, झपटमारी और शस्त्र अधिनियम से जुड़े 24 मामलों में शामिल पाया गया है

असलम अल्वी

उत्तर पूर्वी दिल्ली। दिनांक 01.05.2025 को सीलमपुर थाना क्षेत्र में बीकानेर स्वीट्स के पास चाकू की नोंक पर लूट की सूचना प्राप्त हुई। घटनास्थल पर पहुंचने पर शिकायतकर्ता कुलदीप दीक्षित (38 वर्ष) पुत्र श्री राजेन्द्र दीक्षित, निवासी CPJ-203, न्यू सीलमपुर ने पुलिस टीम को बताया कि जब वह अपनी दुकान G-49, सीलमपुर से लौट रहे थे और सार्वजनिक शौचालय, बीकानेर स्वीट्स के पास पहुंचे, तो दो अज्ञात व्यक्ति पीछे से आए और उन्हें ब्लेड से घायल कर ₹8,000/- लूट लिए।

इस संबंध में सीलमपुर थाने में भारतीय न्याय संहिता की धारा 309(6)/3(5) के अंतर्गत मामला दर्ज कर जांच आरंभ की गई।

जांच के दौरान, इंस्पेक्टर पंकज कुमार (SHO/PS सीलमपुर) के नेतृत्व में PSI हर्ष, हेड कांस्टेबल नवनीश, हेड कांस्टेबल विकास और कांस्टेबल मनीष की एक विशेष टीम गठित की गई, जो श्री विक्रमजीत सिंह विर्क, ACP/सीलमपुर की देखरेख  में कार्य कर रही थी।

श्री हरेश्वर वी. स्वामी, IPS, DCP उत्तर-पूर्व जिला, के मार्गदर्शन में, टीम ने घटनास्थल के आस-पास के CCTV कैमरों की गहन जांच की और गुप्त सूत्रों से महत्वपूर्ण जानकारी जुटाई। एकत्रित सूचनाओं के आधार पर टीम ने महज 6 घंटे में लूट की घटना में शामिल एक संदिग्ध आरोपी को पकड़ने में सफलता प्राप्त की।

गिरफ्तार आरोपी की पहचान शाहनवाज़ @ राजा पुत्र स्व. मुन्ना निवासी E-14/ G-399, न्यू सीलमपुर, उम्र – 40 वर्ष  के रूप में हुई। पूछताछ के दौरान आरोपी ने अपराध करना स्वीकार किया और अपने एक साथी के बारे में जानकारी दी। आरोपी के पास से लूट की गई राशि के  ₹3100/- और वारदात में उपयोग किया गया एक सर्जिकल ब्लेड बरामद हुआ। आरोपी सीलमपुर थाने का घोषित बीसी (Bad Character) है और पहले भी चोरी, लूट और शस्त्र अधिनियम से जुड़े कुल 24 मामलों में शामिल रहा है। 

उसके साथी की गिरफ्तारी और लूटी गई बाकि धनराशि की बरामदगी के लिए प्रयास जारी हैं। मामले में आगे की जांच जारी है।



बुधवार, 30 अप्रैल 2025

भगवान विष्णु के छटवें अवतार भगवान परशुराम ने देश-विदेश के 56 स्थानों का भ्रमण कर धर्म की स्थापना के लिए सन्देश दिये और अपनी अमिट छाप छोड़ी।

भगवान शिव के सच्चे प्रतिनिधि ब्रहमस्वरूप एवं युग प्रवर्तक भगवान श्री परशुराम का अवतरण

महेश चन्द्र मौर्य

युग दृष्टा के रूप में भगवान परशुराम के दिग्दर्शन और निर्दिष्ट दिशा के अनुरूप युग बदलेगा और जरूर बदलेगा, फिर से सतयुग आयेगा व भगवान स्वयं अवतरित हो जगत का कल्याण करेंगे। उनकी प्रेरणा हमें बदलेगी और हम उन्हीं के अनुरूप युग को बदलेंगे। 

भारतीय दर्शन निरंतर चलने वाली समय परिवर्तन की घड़ी के चलते इस हजारों वर्षों के समय काल को चार कालों/युगों में विभक्त किया गया, जिन्हें क्रमशः सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग के नाम दिये गये। इन युगों के प्रारम्भ से ही परिवर्तन की प्रकिया सतत् चलायमान रही और हम मानवों को हमेंशा सीख और ज्ञान देती रही।

सतयुग ईश्वरीय युग था, जहाँ ईश्वर और ईश्वर तुल्य देवी, देवता, शुद्धि और सत्य के रास्ते पर चलते रहे। "सत्यं वद्, धर्मम चर” के सिद्धान्त पर जगत का कल्याण सुनिश्चित करते गये।

उसी सतयुग में जन्में दमयग्नि पिता और माँ रेणुका के पुत्र भगवान शिव के भक्त, महाशक्तिमान भगवान परशुराम अवतरित हुये। उस युग में उनसे बढ़कर और कोई शक्तशाली महर्षि नहीं हुआ।

उसके बाद त्रेता युग आया जिसमें ईश्वर के ही अवतरण, जग को जीवन देने वाले भगवान राम देश दुनिया के आदर्श बनें और जगत को मानवता का पाठ पढ़ाते हुये मानव को मर्यादित जीवन जीने की सीख दे गये। इसलिए वे "मर्यादा पुरुषोत्तम राम” कहलायें। जिस प्रकार सतयुग में भगवान शिव के भक्त भगवान परशुराम कहलायें, वहीं त्रेता युग में भगवान राम के भक्त महाबली हनुमान अग्रणी भक्त कहलायें। इसके बाद द्वापर युग में संसार को नीति और रीति का मार्ग बताते हुये भगवान श्री कृष्ण अवतरित हुए और उन्होंने मानव को जीवन का सार और आत्मा के स्वरूप के सिद्धांत को बताया। "सत्चिदानन्द स्वरूपाय" होते हुए भगवान श्री कृष्ण ने संसार को गीता का ज्ञान दिया, उससे जगत में ज्ञान और प्रकाश के अद्धभुत संगम का श्रृजन हुआ। उस युग में भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त, पराक्रर्मी, सूरवीर और हर समय शक्ति प्रदर्शन और विध्वंशकारी विचारों से सने-लिपटे पड़े थे, वहीं अनेक कृष्ण भक्तों में कृष्ण भक्ति में सराबोर मीराबाई और नीतिगत विचारों को जानने वाले 'भीष्म पितामह' का नाम सदैव उनके साथ जुड़ा रहेगा, भले ही युद्ध के मैदान में सामने से कुछ ओर और अन्दर से कुछ ओर वाली स्थति थी उनकी, इसीलिए उन्होंने सरसैया पर लेटे भगवान श्री कृष्ण को याद कर दम तोड़ा और मुक्ति को प्राप्त हुए।

यद्यपि वर्तमान युग कलयुग है और सभी युगों का समन्वय काल है, जिसमें सतयुग के महादेव भगवान शिव, भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु, त्रेता युग के भगवान राम, माँ जानकी, महाबलि हनुमान और द्वापर युग के अभीष्ठ लीलाधर भगवान श्री कृष्ण, उनकी महिंमा, लीलाएँ, नीति, रीति और अनीति का नाश करने के लिए उनके द्वारा, महाभारत जैसे युद्ध का आगाज सभी को अपने आप में समाहित किये हुए हैं। युगों के इस अनुपम और आदर्श समय में भगवान परशुराम आज भी समीचीन हैं व महाशक्ति और युग परिवर्तन के प्रतीक हैं। वे भगवान शिव के प्रिय और धर्म रक्षक, वीर, वृतधारी और महाबली हैं। यह इस बात से सिद्ध होता है कि जब शिव जी का धनुष श्री राम ने तोड़ा तो श्री परशुराम ने यह जानते हुए भी कि भगवान शिव के धनुष को कोई भगवान ही क्षति पहुँचा सकता है और यह किसी साधारण मनुष्य के बसकी बात नहीं। फिर भी उन्होंने निर्भीक होकर श्रीराम और श्री लक्ष्मण को डांटते हुए नसीहत दे डाली "रे नृप बालक कालबस बोलत तोहि न संभार, धनुही सम त्रिपुरारिधनु बिदित सकल संसार"।

इसलिए भगवान परशुराम आज भी प्रासंगिक हैं और सनातन के महानायक के रूप में युग परिवर्तन को सुनिश्चित करेगें- "बात से नही तो दण्ड से और दण्ड से नही तो डण्डा से" यह कैसा संयोग हैं कि भारतीय सस्कृति और सभ्यता को सदियों से सींचती, सँवारती और संजोती गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों (त्रिवेणी) के प्रयाग राज स्थित संगम तट पर 144 वर्षों के बाद महाकुम्भ आयोजित हुआ जिसमें 67 करोड़ श्रद्धालुओं ने संगम के पवित्र जल में डुबकी लगायी और अपने जीवन को धन्य किया। इन श्रद्धालुओं में भारत के कौने-कौने से ही नहीं, अपितु विश्व के अनेक देशों से भी लोगों ने आकर स्नान-ध्यान किया। इस अद्धभुत महाकुम्भ में चारों शंकराचार्यों, महामण्डलेश्वरो, साध-सन्तों, महन्तों, अखाड़ो के प्रमुख, नागा, औघड़, अधौरियों ने भी आस्था की डुबकी लगायी।

यूं तो भगवान परशुराम की चर्चा तो अनेकानेक लोग करते है लेकिन मेरी दृष्टि से भगवान परशुराम के सबसे बड़े भक्त पंडित सुनील भराला जी साबित हुए क्योंकि श्री परशुराम के व्यक्तित्व व कृतित्व से मन की गहराईयों से प्रभावित श्री भराला जी ने अपना विशाल हृद्य दिखलाते हुए प्रयागराज में सदी के सबसे बड़े महाकुम्भ में अपने तन-मन और धन को सच्ची श्रद्धा से अर्पित किया।

युग-युगों से चली आ रही हमारी सनातन परम्परा को धर्मप्रज्ञ, ओजस्वी, झुजारू और राजनेता पण्डित सुनील भराला, जिन्होंने राष्ट्रीय परशुराम परिषद का श्रजन किया और उसका कुशल नेतृत्व कर अपना विशाल हृद्य दिखलाते हुए इस प्रयागराज में 2 लाख वर्ग फुट भूमि पर भगवान परशुराम की 51 फीट उँची आकर्षक एवं सौम्यरूप दर्शाती अद्धितीय प्रतिमा स्थापित करायी और विशाल व भव्य सप्तऋषि पंडाल व शिविर आयोजित किया।

पंडित भराला जी के नेतृत्व में पूरे 45 दिन लगातार महायज्ञ आयोजित किया गया, जिसमें लगभग 1 करोड़ 8 हजार आहुतियाँ दी गई, सनातन परम्परा के महत्व को कथा वाचकों, धर्माचार्यों, पीठाधीश्वरों ने अपने ज्ञान से लाखों लोगों को लाभान्वित कराया, साथ ही साथ भगवान परशुराम कथा, शिवपुराण, श्रीमद् भागवत् कथा, राम कथा का सुन्दर वाचन किया गया और भगवान परशुराम की आरती के साथ-साथ "परशुराम चालीसा" का प्रकाशन और वितरण भी किया गया। भगवान परशुराम की 1 लाख छोटी और आकृषक मूर्तियों को भक्तों को अपने घर के मन्दिर और गाड़ियों में स्थित करने के लिए वितरित किया गया। सम्मेलन में संगोष्ठियों और अन्तर्राष्ट्रीय गोष्ठियों का भी आयोजन किया गया और आगंतुका को भगवान परशुराम कें विराट व्यक्तित्व के विषय में बताया गया।

इस प्रकार हमारे यशस्वी प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की "वसुधैव कुटुम्बकम” की परिकल्पना को साकार करने में भगवान परशुराम शीर्ष संवाहक बने क्योंकि उनके चरण हमारी सांस्कृतिक धरोहरो, पर्वत मालाओं, नदी, सागर, सरोवर, भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगो के तीर्थ स्थानों, शक्तिपीठो की पावन भूमि और अनेक चमत्कारिक व धार्मिक महत्व के स्थानों, जिनमें अनेक देशों के भी पवित्र धार्मिक स्थान शामिल है पर पडे।

एक शोध के अनुसार जहाँ भगवान श्री परशुराम जी के चरण पड़े वे क्रमशः 21 स्थान इस प्रकार जाने जाते हैं:- १. कश्मीर, २. दरद, ३. कुन्तिभोज, ४. क्षुद्रक, ५. मालव, ६. शक, ७. चेदि, ८. काशिकरूष, ९. ऋषिक, १०. क्रथ, ११. कैशिक, १२. अङ्ग, १३. बङ्ग, १४. कलिङ्ग, १५. मागध, १६. काशी, १७. कोसल, १८. रात्रायण, १९. वीतिहोत्र, २०. किरात, व २१. मार्तिकावत।

उपर्युक्त प्राचीन नाम वर्तमान में 56 स्थानों में विभक्त है। भगवान परशुराम ने विभिन्न युद्धों में विजय प्राप्त कर महर्षि कश्यप को दान दिया और महान दानवी कहलायें। इन स्थानों को क्रमशः निम्नलिखित नामों से पहचाना जाता हैः

1. अङ्ग - वर्तमान बिहार और झारखंड का भाग 2. वङ्ग -वर्तमान बंगाल क्षेत्र (पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश) 3. कलिङ्ग -वर्तमान ओडिशा 4. कालिङ्ग- ओडिशा के समान क्षेत्र 5. केरल - वर्तमान केरल राज्य 6. सिद्धकेरल - केरल से संबंधित क्षेत्र 7. हंसकेरल - केरल का ऐतिहासिक संदर्भ 8. काश्मीर - वर्तमान जम्मू और कश्मीर 9. कामरूप - वर्तमान असम 10. महाराष्ट्र -वर्तमान महाराष्ट्र 11. आन्ध्र- वर्तमान आंध्र प्रदेश 12. सौराष्ट्र -वर्तमान गुजरात का काठियावाड़ क्षेत्र 13. तैलङ्ग – तेलंगाना 14. मलयाल - केरल क्षेत्र 15. कर्णाटक- वर्तमान कर्नाटक 16. अवन्ती - वर्तमान मध्य प्रदेश (उज्जैन क्षेत्र) 17. विदर्भ - महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र 18. मरुदेश - राजस्थान 19. आभीर - महाराष्ट्र और गुजरात का हिस्सा 20. मालव - राजस्थान और मध्य प्रदेश 21. चोल - तमिलनाडु का चोल साम्राज्य 22. पाञ्चाल - उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड क्षेत्र 23. काम्बोज- अफगानिस्तान और पंजाब का क्षेत्र 24. वैराट - राजस्थान का विराट नगर 25. पाण्ड्य -तमिलनाडु का पांड्य क्षेत्र 26. विदेह- बिहार और नेपाल का तराई क्षेत्र 27. बाह्वीक - पंजाब का हिस्सा 28. किरात - नेपाल और उत्तर-पूर्व भारत 29. बक्तान- अफगानिस्तान 30. खुरासन - ईरान का पूर्वी क्षेत्र 31. ऐराक - ईरान (इराक) 32. भोटान्त - तिब्बत का क्षेत्र 33. चीन - वर्तमान चीन 34. महाचीन- चीन और उससे आगे का क्षेत्र 35. नेपाल - वर्तमान नेपाल 36. शिलहट्ट - वर्तमान सिलहट (बांग्लादेश) 37. गौड- पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश 38. महाकोशल - छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश 39. मगध- बिहार 40. कीकट - बिहार 41. उत्कल- ओडिशा 42. श्रीकुन्तल - कर्नाटक का भाग 43. हूण - मध्य एशिया (हूण साम्राज्य) 44. कोङ्कण -महाराष्ट्र और गोवा का कोंकण क्षेत्र 45. कैकय- पंजाब और पाकिस्तान का क्षेत्र 46. शौरसेन- मथुरा और आसपास का क्षेत्र 47. कुरु - हरियाणा और दिल्ली का क्षेत्र 48. सिंहल – श्रीलंका 49. पुलिन्द - मध्य भारत (आदिवासी क्षेत्र) 50. कच्छ - गुजरात का कच्छ क्षेत्र 51. मत्स्य- राजस्थान का अलवर क्षेत्र 52. मद्र- पंजाब और हिमाचल प्रदेश 53. सौवीर- सिंध और पंजाब 54. लाट – गुजरात 55. बर्बर - अफ्रीका का बर्बर क्षेत्र 56. सैन्धव - सिंध (पाकिस्तान)

ये सभी धार्मिक स्थल अध्यात्मिक होते हुए हमारी "अखण्ड और एकीकृत" भारत की कल्पना को साकार करने के साथ-साथ समूचे विश्व को "वसुधैव कुटुम्बकम” के सूत्र में पिरोने का कार्य करेगें।

इस आलेख के माध्यम से मेरा सुझाव है कि इन सभी प्राचीन तौर पर जाने जाने वाले 21 प्राचीन स्थानों जिनको वर्तमान में 56 स्थानों में विभक्त किया गया है, में इन सभी स्थानों पर भगवान परशुराम की स्मृति को अक्षुण्य बनाने के लिए और नई पीढ़ी को उनके शौर्य और पराक्रम को दर्शाने के लिए संग्रहालय विकसित किये जाये क्योंकि वे हमारी महान विरासत के प्रमुख श्रोत्र होगें और साथ ही साथ नोजवानों में देश भक्ति का भाव पैदा करेगें।

मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि युग पुरुष भगवान परशुराम के आदर्श देश, समाज और धर्म को एक नई दिशा और ऊर्जा प्रदान कर एकीकृत, समृद्ध और आध्यात्मिक भारत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाऐगें।

ऐसे भगवान परशुराम को समस्त हिन्दू व सनातन प्रेमियों का सत्-सत् नमन।
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