रविवार, 18 अगस्त 2024

विश्व स्तरीय स्वास्थ्य सेवाओं की सशक्त नींव

डॉ. विपिन कुमार

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा हाल ही में मंकीपॉक्स को अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर दिया गया। इसी विषय को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने भी मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक करते हुए, मंकीपॉक्स की स्थिति और तैयारियों की विस्तृत समीक्षा की। हालाँकि, भारत में अब तक मंकीपॉक्स का कोई मामला सामने नहीं आया है।

इस बैठक में यह निर्णय लिया गया कि पूर्ण रूप से सावधानी बरतने के लिए कुछ विशेष उपाय, जैसे कि सभी हवाई अड्डों, बंदरगाहों और ग्राउंड क्रॉसिंग पर स्वास्थ्य इकाइयों को संवेदनशील बनाना; परीक्षण प्रयोगशालाओं को तैयार करना; किसी भी मामले का पता लगाना, उसे आइसोलेट करना और उसका प्रबंधन करने के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं को तैयार करना, आदि किए जाएं। भविष्य में किसी भी संभावित खतरे को न्यूनतम रखने की दिशा में स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा की यह तत्परता वास्तव में प्रशंसा के योग्य है।

 

हमने कुछ समय पूर्व ही कोरोना वैश्विक महामारी की विभीषिका देखी। इस महामारी ने दुनिया में करोड़ों लोगों के जीवन का अंत कर दिया। यह एक ऐसी घटना थी, जिसने दुनिया के समस्त देशों को अपनी स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को लेकर नए सिरे से सोचने के लिए विवश किया। भारत में भी इस महामारी का व्यापक असर देखने के लिए मिला।

लेकिन, हमने पीएम मोदी के कुशल नेतृत्व में इससे तेजी से उबरने में सफलता हासिल की है। ध्यान देने वाली बात यह है कि योग हो चाहे आयुर्वेद, पीएम मोदी ने पहली बार सत्ता में आते ही स्वास्थ्य और स्वच्छता को लेकर सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर कार्य किया। तब शायद कोई संपूर्ण मानवजाति को खतरे में डालने वाले इस वायरस के बारे में सोच भी नहीं रहा था।

बेशक, भारत ने आजादी के बाद, आर्थिक मोर्चों पर काफी सफलता हासिल की थी। लेकिन निरंकुशता के कारण, संसाधनों पर सिर्फ संपन्न लोगों को वर्चस्व हासिल था। इस वजह से समाज में अमीर और गरीब के बीच एक गहरी खाई थी। नतीजन, गरीब और बेसहारा लोगों को मूल स्वास्थ्य सुविधाएं भी नसीब नहीं हो पाती थीं।

पूर्ववर्ती सरकारों की जन-स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति संवेदनशीलता को इसी बात से समझा जा सकता है कि आजादी के 70 वर्षों के बाद भी, देश में सिर्फ 7 एम्स और 387 मेडिकल कॉलेज थे, जिसमें 82 हजार छात्रों के पढ़ाई की व्यवस्था थी।

 

लेकिन पीएम मोदी ने 2014 में सत्ता में आते ही, स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर लोगों में एक नए विमर्श को जन्म दिया और उनके कार्यकाल में अभी तक 15 एम्स स्वीकृत हो चुके हैं। वहीं, आज़ादी के बाद साल 2014 तक जहाँ देश में केवल 380 मेडिकल कॉलेज बनाए गए, भाजपा सरकार ने बीते एक दशक में ही 300 मेडिकल कॉलेज बना दिए गए।

पीएम मोदी ने देश के तमाम स्वास्थ्य उपकेंद्रों, प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों, और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को ढ़ांचागत रूप से काफी मजबूत करते हुए, आयुष्मान भारत और पीएम जन औषधि जैसे महत्वाकांक्षी योजनाओं की भी शुरुआत की। ताकि आम लोगों को भी अच्छी और सस्ती स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सके।

इसके अलावा, उन्होंने अपने कार्यकाल में योग को भी एक अंतरराष्ट्रीय पहचान देने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है, जिससे लोगों को कई बीमारियों से बिना किसी खर्च से राहत पाने में मदद मिल रही है।

उनके कार्यकाल में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने अपनी आचार संहिता में बड़ा बदलाव करते हुए, पहली बार ‘आधुनिक चिकित्सा’ को परिभाषित किया है। इस मसौदे के अनुसार, अब पंजीकृत पेशेवर अपने नाम से पहले ‘मेडिकल डॉक्टर’ जोड़ सकते हैं।

इतना ही नहीं, इस मसौदे के अनुसार, अब सभी पंजीकृत चिकित्सा पेशेवरों को बीते 5 वर्षों की कमाई के संबंध में हलफनामा देने की भी व्यवस्था है। इस मसौदे में, उनके सम्मान की रक्षा के लिए यह प्रस्ताव दिया गया है कि यदि किसी मरीज के रिश्तेदार उनके साथ गाली-गलौच या दुर्व्यवहार करते हैं, तो उन्हें मरीज का इलाज न करें की अनुमति होगी।

आज डॉक्टरों द्वारा मरीजों से मनमाने तरीके से पैसे वसूलने की खबरें अक्सर आती रहती हैं। लेकिन राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने इस पर भी नकेल कसने की तैयारी शुरू कर दी है।

इस मसौदे के अनुसार, अब डॉक्टरों को महंगी दवा बेचने की अनुमति नहीं होगी। इसके अलावा उनके दुकान खोलने और मेडिकल उपकरणों को भी बेचने पर सख़्ती बरती गई है।

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के इन प्रावधानों का सीधा लाभ दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों को है। क्योंकि अक्सर देखा जाता है कि छोटे शहरों में अपना क्लिनिक चलाने वाले डॉक्टर खुद ही अपनी दवाई की दुकान खोल लेते हैं और मरीजों को काफी महंगी दवाइयां बेचते हैं। इससे आर्थिक रूप से कमजोर लोगों पर इलाज का खर्च काफी बढ़ जाता है और उन्हें अपने घर को चलाने में कई मुसीबतों का सामना करना पड़ता है।

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग द्वारा हाल ही में सभी मेडिकल कॉलेजों और संस्थानों के लिए एक परामर्श ज़ारी किया है, जिसमें सभी कॉलेजों और अस्पताल परिसरों में संकाय, छात्रों और रेजिडेंट डॉक्टरों सहित सभी कर्मचारियों के लिए सुरक्षित कार्य वातावरण के लिए नीति विकसित करने का आग्रह किया गया है। यह परामर्श कोलकाता के एक सरकारी अस्पताल में एक प्रशिक्षु डॉक्टर के साथ कथित बलात्कार और हत्या के विरोध में देश भर के कई अस्पतालों में रेजिडेंट डॉक्टरों के हड़ताल पर जाने के मद्देनजर ज़ारी किया गया है।

बहरहाल, एलौपेथी के अलावा, पीएम मोदी के कार्यकाल में आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति को भी काफी प्रोत्साहित किया गया है। बता दें कि भारत में आयुर्वेद का इतिहास, सभ्यता के आरंभ से जुड़ा हुआ है।

यह एक ऐसी पद्धति है, जो किसी भी बीमारी को जड़ से ही मिटा देती है। यही कारण है कि भारत में इसका स्थान कोई और पद्धति नहीं ले पाई है। आज बीमारियों के इलाज औक महामारी विज्ञान के नए-नए आयामों में आयुर्वेद की प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए सभी हितधारकों को साथ आने की जरूरत है।

साथ ही, मेडिकल की पढ़ाई के लिए आज एक ऐसे पाठ्यक्रम को विकसित करने की जरूरत है, जिसमें आयुर्वेद और एलोपैथी, दोनों का ज्ञान समाहित हो और लोगों को सस्ती और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिले। हमें पूर्ण विश्वास है कि बीते एक दशक में हमने भारत में एक विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सेवा को विकसित करने की जो बुनियाद रखी है, पीएम मोदी और जेपी नड्डा की अगुवाई में तकनीक, परंपरा और अनुशासन की मदद से अगले 5 वर्षों में उसे एक नई उँचाई मिलेगी।

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

दुष्कर्मियों के लिए जल्द से जल्द कड़ी से कड़ी सज़ा व फांसी हो : रोहन वॉशिंगटन

कोलकाता में महिला डॉक्टर और उत्तराखंड में महिला स्टाफ नर्स के साथ हुए रेप व आए दिन देश भर में हो रहे रेप गैंग रेप जैसी घटनाएं, कुछ महीनो की बच्ची के साथ से लेकर 80-90 साल तक की बुजुर्ग महिलाओं के साथ दुष्कर्म जैसी घटनाएं बहुत ही निंदनीय है, इन घटनाओं से समाज में एक डर का माहौल पैदा हो गया है, इससे ये साबित होता है की ऐसी घिनौनी सोच रखने वाले लोगों को किसी का भी कोई डर/खौफ नहीं है। ऐसी घिनौनी सोच रखने वालो और ऐसे घिनौने काम करने वालो को कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी ही चाहिए, अपराधियों में कानून और सरकार का कोई डर ही नही है, ऐसी घटनाओं को देखते हुए सरकार को महिला हेल्थ वर्कर्स के लिए सुरक्षा का कड़ा इंतज़ाम करना प्राथमिकता होना चाहिए। ऐसे माहौल में महिलाओं का घरों से निकलना बहुत मुश्किल हो गया है साथ ही साथ परिजनों में भी डर और बेचैनी बनी रहती है, मैं आपके अखबार के माध्यम से सरकार से दरख्वास्त करता हूं की ऐसे अपराधियों को सार्वजनिक रूप से कैपिटल पनिशमेंट देना ही ठीक निर्णय होगा ताकि ऐसी सोच रखने वालो के दिलों में भी खौफ बना रहे और
उनकी घिनौनी सोच बदल सके, मैं आपके अखबार के माध्यम से आम जन से भी अपील करता हूं कि सरकार, प्रशासन और पुलिस तो बाद की बात है, बच्चों के लिए उनका घर ही एक इंस्टीट्यूशन होता है तो अपनी बेटियो को सही गलत की समझ के साथ साथ अपने बेटो को भी महिलाओं के इज़्ज़त करना उनके बचपन से ही सीखाते रहे ताकि ऐसी घिनौनी सोच उनके दिलों में पैदा ही न हो सके, मैं आपके अखबार के माध्यम से सरकार से दरख्वास्त करता हु की दुष्कर्मियों के लिए जल्द से जल्द कड़ी से कड़ी सज़ा मुकर्रर करके अमल में लाया जाएगा तो ऐसी घटनाओं पर रोक लग सकता है।
धन्यवाद।
रोहन वॉशिंगटन, सचिव, उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी (अवि)

शनिवार, 17 अगस्त 2024

दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन ने समर्थन जताया राष्ट्रव्यापी मेडिकल बंद, पीड़िता के लिए न्याय की मांग

संवाददाता

नई दिल्ली। आज के दिल्ली मेडिकल बंद को मेडिकल समुदाय के सभी वर्गों से शानदार प्रतिक्रिया मिली है। लगभग सभी बड़े निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम ने इस बंद का समर्थन करने और अपने ओपीडी और इलेक्टिव ओटी बंद रखने की प्रतिबद्धता जताई है। नर्सिंग होम, डायग्नोस्टिक सेंटर और क्लीनिक ने भी इसी तरह की प्रतिबद्धता जताई है। इसे आम जनता से भी अच्छा समर्थन मिल रहा है।

शक्ति, एकजुटता और एकता का यह प्रदर्शन हमारे पेशे के भविष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। हमारी मांगें जायज हैं और हमें उम्मीद है कि सरकार सकारात्मक प्रतिक्रिया देगी।

हम, दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन (डीएमए) और इसकी जेडीएन और एमएसएन शाखाएँ, कोलकाता के आरजी कार मेडिकल कॉलेज में द्वितीय वर्ष की स्नातकोत्तर छात्रा के साथ हुए क्रूर बलात्कार और हत्या की भयावह घटना के बारे में अपना आक्रोश और निंदा व्यक्त करने के लिए बहुत दुःख और अत्यधिक गुस्से के साथ लिख रहे हैं। यह घृणित अपराध न केवल चिकित्सा बिरादरी की अंतरात्मा को झकझोरता है, बल्कि देश भर में रेजिडेंट डॉक्टरों के काम करने की भयावह और असुरक्षित परिस्थितियों को भी उजागर करता है।

इससे भी ज्यादा दुखद बात यह है कि पीड़ित के लिए न्याय की मांग करने के लिए शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन कर रहे रेजिडेंट डॉक्टरों पर हिंसा की गई। एक बड़ी और आक्रामक भीड़ ने सभा पर हमला किया, मंच को नष्ट कर दिया और कई रेजिडेंट डॉक्टरों को घायल कर दिया। शांतिपूर्ण विरोध के अपने लोकतांत्रिक अधिकार का प्रयोग करने वाले स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों पर यह अकारण हमला असहनीय है और इसके लिए त्वरित और निर्णायक कार्रवाई की आवश्यकता है।

दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन इस बर्बरतापूर्ण कृत्य की स्पष्ट रूप से निंदा करती है तथा आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज और देश भर में हमारे सहकर्मियों के साथ पूरी एकजुटता से खड़ी है।

सरकार से हमारी मांगेंः

1. एक सशक्त एवं पारदर्शी जांच समिति का गठन हम इस मामले की गहन जांच के लिए एक स्वतंत्र, सशक्त एवं पारदर्शी जांच समिति के गठन की मांग करते हैं। जांच में निष्पक्षता एवं निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए समिति में चिकित्सा बिरादरी के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाना चाहिए।

2. अपराधियों के खिलाफ त्वरित और सख्त कार्रवाईः इस बर्बर कृत्य के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों को पकड़ा जाना चाहिए और उनके खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। न्याय को तेजी से पूरा किया जाना चाहिए ताकि यह स्पष्ट संदेश जाए कि ऐसे अपराधों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

3. आरजी कर मेडिकल कॉलेज के अधिकारियों की जवाबदेही: हम आरजी कर मेडिकल कॉलेज के अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करते हैं, क्योंकि वे अपने रेजिडेंट डॉक्टरों के लिए सुरक्षित कामकाजी माहौल प्रदान करने में विफल रहे हैं। प्रशासन की लापरवाही और अपने छात्रों और कर्मचारियों के लिए बुनियादी सुरक्षा सुनिश्चित करने में असमर्थता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

4. राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) द्वारा दिशा-निर्देश जारी करनाः हम एनएमसी से आग्रह करते हैं कि वह पूरे भारत में सभी डॉक्टरों के लिए सुरक्षित और संरक्षित कार्य स्थितियों को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से व्यापक दिशा-निर्देश तत्काल जारी करे। इन दिशा-निर्देशों को सभी चिकित्सा संस्थानों में समान रूप से लागू किया जाना चाहिए ताकि आगे और अधिक त्रासदियों को रोका जा सके।

5. चिकित्सा हिंसा के विरुद्ध केंद्रीय अधिनियम: हम चिकित्सा पेशेवरों के विरुद्ध हिंसा को रोकने के लिए विशेष रूप से बनाए गए एक केंद्रीय कानून को तत्काल लागू करने का आग्रह करते हैं। इस कानून में कठोर दंड शामिल होना चाहिए।

शुक्रवार, 16 अगस्त 2024

एससी-एसटी आरक्षण मे क्रीमी लेयर क्या संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है

बसंत कुमार
वर्ष 2015 मे जब डॉ. आंबेडकर की 125वीं जयंती के उपलक्ष्य मे संविधान का विशेष अधिवेशन बुलाया गया था तो सदन को संबोधित करते हुए प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, बाबा साहब की विशेषता की हम बात करते हैं तो पाते है कि अगर किसी को सरकार पर प्रहार करना है तो कोटेशन बाबा साहब का देता है और किसी को अपना बचाव करना है तो उसके काम बाबा सहाब का कोटेशन बाबा साहब का ही काम आता है, मतलब उनमे कितनी दूर दृष्टि थी , कितना विजन था कि आज भी विरोध करने के लिए मार्गदर्शक और शासन करने के लिए मार्गदर्शक! इसी कारण जब सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने इस बात का परीक्षण करते हुए कि क्या पंजाब मे अनुसूचित जाति और पिछड़ी जाति एक्ट 2006 के तहत बाल्मिकी और मजहबी सिखों को एस सि आरक्षित कोटे के तहत सरकारी नौकरियों मे प्राथमिकता मिलानी चाहिए! साथ मे न्यायालय ने यह भी देखना था कि क्या राज्य सरकारे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कोटे के अंदर सब कलास बनाकर अति पिछड़े और गरीबी की मार झेल रहे महादलितो को आरक्षण मे प्राथमिकता दे सकती हैं! यद्यपि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला महादलितो और उपेक्षित आदिवासीयो के हित मे लिया हुआ फैसला माना जा सकता हैं, क्योकि आजादी के साथ दसक बाद भी बल्मिकी, मुसहर, चमार, डोम और जंगलो मे रह रही आदिवासी समुदाय को आरक्षण का लाभ नही मिल रहा है और वे बेचारे आरक्षण का मतलब ही नही जानते।
इस फैसले के आते ही हर राजनीतिक दल को इस पर राजनीति करनी ही थी क्योकि सबको दलित वोट की जो चिंता है, विपक्ष ऐसी बहाने जाति पर आधारित जनगड़ना की मांग और जोर से उठाने लगा और अभिज्यात दलित समुदाय के लोग जो कई पीढियों से आरक्षण का लाभ उठाकर और अधिक संपन्न हो रहे थे इस फैसले को दलित और आदिवासियों को तोड़ने का षड्यंत्र कह रहे थे, ऐसे मे मोदी जी के नेतृत्व वाली सरकार भी इस दबाव को कैसे झेल पाती और घोषणां कर दी एस सी एस टी आरक्षण जिस तरह से चल रहा था वैसे ही चलता रहेगा कोक डा अम्बेडकर के संविधान मे इस प्रकार के वर्गीकरण का कोई प्रावधान नही है! पर इस बात से इनकार नही किया जा सकता कि इन सत्तर वर्षो मे एस सी एस टी समुदाय मे आरक्षण का लाभ लेकर एक वर्ग  इतना धनाडय हो गया हा गया है कि अब उनका गरीब दलितो से कोई सरोकार नही रह गया है! यह इलिट क्लास सवर्णो के साथ रह रहा है और उन्ही के साथ वैवाहिक रिश्ते भी हो रहे है तो क्या अम्बेडकर के संविधान की आड़ मे इस फैसले को प्रभावहीन किया जाना चाहिए।
अब सुप्रीम कोर्ट ने इस आरक्षण के प्रविधान मे क्रीमी लेयर और सब क्लास के नियम की बात की है तो सारे राजनीतिक दलों को वोट बैंक की राजनीति छोड़कर न्यायालय के निर्देशों का पालन करना चाहिए! जिससे महादलित और सदियों से उपेक्षित आदि वासी समाज राष्ट्र की मुख्य धारा मे शामिल हो सके। अभी कुछ माह पूर्व चुनाव संपन्न हुए हैं और कांग्रेस सहित इंडिया गठबंधन सहयोगियों ने पूरे चुनाव मे संविधान की कॉपी लेकर यहि प्रचार किया कि डा आंबेडकर का संविधान खतरे में है पर कांग्रेस यह क्यों भूल गई कि डॉ. आंबेडकर द्वारा निर्मित संविधान की ही मूल भावना से 1975 मे आपात काल के दौरान 42वें संसोधन के द्वारा नष्ट करने का प्रयास किया गया और उसी कांग्रेस ने सारे जतन करके लोक सभा चुनाव मे डा आंबेडकर को जीतने नही दिया! एस सी एस टी के प्रोमोशन मे आरक्षण के प्रश्न पर सपा के संस्थापक श्री मुलायम सिंह यादव ने सदन मे कह दिया था कि यदि एस सी एस टी को प्रोमोशन मे आरक्षण मिल गया सचिव और कैबिनेट सचिव के काबिल अधिकारी ढूढ़ने से नही मिलेंगे, आज वही सपा और उसके गठबंधन के लोग डा आंबेडकर के नाम पर जातिगत जनगणना की मांग करके जितनी जिसकी है आवादी उसकी उतनी हिस्सेदारी की बात कर रहे है।
जहाँ तक डॉ. आंबेडकर की बात है तो वे कभी भी वर्तमान आरक्षण पद्धति के पक्ष मे नही थे! देश मे एस सी एस टी आरक्षण पूना पैक्ट 1932 की देन था जो कहने के लिए महात्मा गॉंधी और डॉ. आंबेडकर के बीच एक समझौता था पर असलियत मे यह गाँधी जी, सरदार पटेल और मदन मोहन मालवीय के दबाव मे उनसे हस्ताक्षर कराया गया था, पर आरक्षण का विरोध करने वाले लोग  वास्तविकता जाने बगैर इस आरक्षण के लिए डॉ. आंबेडकर को कोसते है! दर असल लंदन मे आयोजित द्वितीय गोलमेज कांफ्रेंस मे डॉ. आंबेडकर ने दलितो के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग की और उनकी मांग स्वीकार करते हुए अंग्रेज सरकार ने दलितो के लिए अलग निर्वाचन मंडल की घोषणां की, जिससे दलितो को दो मतो का अधिकार मिला, एक वोट से दलित अपना प्रतिनिधि चुनते और दूसरे वोट से समान्य प्रतिनिधि चुनते और ब्रिटिश प्रधानमन्त्री रेम्सजे मैकडोनाल्ड ने दि 16-8-1932 को यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जिसे communal award की संज्ञा दी गयी! पर यरावदा जेल मे बंद गाँधी जी को जब यह पता चला तो इसके विरोध मे आमरण अनशन की धमकी दे दी और गाँधी, पटेल और प मदन मोहन मालवीय आदि के  दबाव मे गाँधी जी और डा आंबेडकर के बीच पूना पैक्ट हुआ! जिसके कारण वर्तमान आरक्षण अस्तित्व में आया और डा आंबेडकर को दलितो के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की मांग छोड़नी पड़ी! कहने का अभिप्राय यह है कि वर्तमान आरक्षण के लिए डा आंबेडकर नही अपितु गाँधी, पटेल और प मदन मोहन मालवीय जिम्मेदार थे।
यह तो विपक्षी भी स्वीकार करते हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के पश्चात अनेक प्रगति शाली कदम उठाये गए है- संविधान मे अनुच्छेद 370 जो संविधान निर्माता डा आंबेडकर की इक्षा के विरुद्ध नेहरू जी की इक्षा के विरुद्ध जोड़ा गया और अस्थायी प्राविधान था पर यह आजादी के पश्चात 7 दशकों तक चलता रहा और कोई भी सरकार इस विभाजन कारी अनुच्छेद को हटाने का साहस न कर सकी! मोदी जी के सत्ता मे आने के पश्चात इसे समाप्त किया गया, जिसका परिणाम है कि जम्मू कश्मीर आज देश के साथ विकाश' की मुख्य धारा मे शामिल हो रहा है! मुस्लिम महिलाओं के लिए अमानवीय ट्रिपल तलाक़ को बैन किया गया, सीएए लागू किया गया! फिर मोदी सरकार  उन महादलितो आदिवासियों जिन्हे आजादी के सात दशकों के बाद भी आरक्षण का लाभ नही मिला है उनके लिए अवसर प्रदान करने वाले फैसले को मूर्त रूप देने के स्थान पर इसे न लागू करने का विचार क्यो कर रही है, जैसा कि चर्चा है इसे प्रभाव विहीन करने के लिए अध्यादेश का सहारा लिया जाये अगर ऐसा हुआ तो 1985 में राजीव गाँधी सरकार द्वारा शाहबानो मामले मे सर्वोच्च् न्यायालय के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए जो कदम उठाये गए थे उसकी पुनरावृत्ति जैसी होगी! जो उचित नही है।
चाहे मुस्लिम महिलाओं को हक दिलाने के मामले मे सुप्रीम कोर्ट का फैसला रहा हो या फ़िर अत्यंत पिछड़ी दलित और आदिवासी लोगो को समाज की मुख्य धारा मे शामिल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का एस सी- एस टी आरक्षण मे क्रीमी लेयर और सब क्लास का मामला हो राजनीतिक दलों द्वारा वोट बैंक के खातिर संविधान संशोधन व अध्यादेश के जरिये फैसले को निष्प्रभावी करना सरा सर गलत है, साथ ही साथ यह प दीन दयाल उपाध्याय जी के एकात्म मानव वाद के दर्शन के खिलाफ है क्योकि प दीन दयाल उपाध्याय यही चाहते थे कि पंक्ति की अंतिम छोर मे खड़े व्यक्ति का कल्याण ही सरकार और प्रशासन का उतर दायित्व होना चाहिए।
http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/