सोमवार, 24 जून 2024

मोहन भागवत के वक्तव्यों को कैसे देखें

 
अवधेश कुमार 

संघ प्रमुख डॉ मोहन भागवत के भाषण पर अभी तक जबरदस्त बहस चल रही है। वैसे तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ अधिकारियों के भाषणों और वक्तव्यों पर मीडिया ,विश्लेषकों तथा समर्थकों के अलावा विरोधियों की भी गहरी नजर रहती है। किंतु संघ प्रमुख के दो भाषण वर्ष में सर्वाधिक महत्वपूर्ण होते हैं और उनसे भविष्य की दिशा मिलती है-  विजयादशमी महोत्सव और दूसरा नागपुर में आयोजित तृतीय वर्ष कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर के समापन पर दिया गया भाषण। वर्तमान उद्बोधन भी कार्यकर्ता विकास वर्ग के समापन समारोह का ही है। निष्पक्षता से कोई उनके पूरे उद्बोधन को सुनेगा तो उसका वह अर्थ नहीं निकालेगा जो मुख्य मीडिया और सोशल मीडिया में छाया हुआ है। सबका निष्कर्ष एक ही है कि डॉक्टर भागवत ने भाजपा के बहुमत न पाने को लेकर ही अपनी टिप्पणी की है तथा उसको चेताया है। उसमें चाहे अहंकार की बात हो, मिलकर चलने की, सत्य बोलने की, आत्ममंथन… सब केवल नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए है। प्रश्न है कि क्या संघ और भाजपा के संबंध ऐसे हो गए हैं कि संघ प्रमुख को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या भाजपा को कुछ कहना हो तो  सार्वजनिक भाषण में बोलेंगे और वह भी कार्यकर्ता विकास वर्ग के समापन में जबकि प्रशिक्षण के बाद स्वयंसेवकों को सकारात्मक भाव से निकलकर देश के लिए काम करने की प्रेरणा देनी होती है? दूसरे अगर ये बातें केवल सरकार के लिए हैं तो विपक्ष के लिए क्यों नहीं?  हालांकि कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर का निर्णय महीनों पहले हुआ होगा और समापन भाषण का भी। उस समय किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह चुनाव  परिणाम आने और सरकार गठित होने का दिन होगा। बावजूद चुनाव हो ,सरकार और विपक्ष के बीच अनेक मुद्दों पर बाहर चल रही हो , सरकार गठित हुई हो और संघ प्रमुख उसकी पूरी तरह अनदेखी कर दें यह नहीं हो सकता। उद्बोधन के समय उनके ध्यान में पूरा राजनीतिक परिदृश्य पर रहा होगा। पर जिन लोगों ने निष्पक्षता से संघ को समझा है , अध्ययन किया है वो इन ज्यादातर टिप्पणियों से सहमत नहीं हो सकते। तो फिर क्या होंगे डॉक्टर मोहन भागवत के वक्तव्यों के निहितार्थ?

जिन पंक्तियों को बहस का आधार बनाया गया है उनमें पहला है , चुनाव । वे कहते हैं कि चुनाव संपन्न हुए हैं। उसके परिणाम भी आए और कल सरकार भी बन गई।  ….ये अपने देश के प्रजातांत्रिक तंत्र में प्रत्येक पांच वर्ष में होने वाली घटना है। उसके अपने नियम और डायनेमिक्स हैं। ..अपने देश के संचालन के लिए कुछ निर्धारण करने वाला वो प्रसंग है, इसलिए महत्वपूर्ण है। लेकिन इतना महत्वपूर्ण क्यों है? समाज ने अपना मत दे दिया, उसके अनुसार सब होगा। ध्यान रखिए इसी में वह कहते हैं कि क्यों, कैसे, इसमें संघ के हम लोग नहीं पड़ते। हम लोकमत परिष्कार का अपना कर्तव्य करते रहते हैं। प्रत्येक चुनाव में करते हैं। इस बार भी किया है। इन पंक्तियों को कोई उद्धृत नहीं करता जबकि संघ और उसके सारे संगठनों में काम करने वाले स्वयंसेवकों तथा समाज के लिए उनका पक्ष यही है। आगे वे कहते हैं -कल ही आदरणीय सत्य प्रकाश जी महाराज ने हमको कबीर जी का एक वचन बताया। . कबीर कहते हैं “निर्बंधा बंधा रहे बंधा निर्बंधा होई कर्म करे करता नहीं दास कहाय सोई”। जो सेवा करता है, जो वास्तविक सेवक है, जिसको वास्तविक सेवक कहा जा सकता है उसको कोई मर्यादा रहती है यानी वो मर्यादा से चलता है। .. जैसा कि तथागत ने कहा है—कुशलस्य उपसंपदा, यानी अपनी आजीविका पेट भरने का काम सबको लगा ही है, करना ही चाहिए.. लेकिन कौशलपूर्वक जीविका कमानी है और कार्य करते समय दूसरों को धक्का नहीं लगना चाहिए। ये मर्यादा भी उसमें निहित है। ..वो मर्यादा ही अपना धर्म है, संस्कृति है। जो पूज्य महंत गुरुवर्य महंत रामगिरी जी महाराज जी ने अभी बहुत मार्मिक कथाओं से थोड़े में बताई, उस मर्यादा का पालन करके जो चलता है, कर्म करता है, कर्मों में लिप्त नहीं होता, उसमें अहंकार नहीं आता। वही सेवक कहलाने का अधिकारी रहता है। साफ है कि इन संतों का वहां उद्बोधन हुआ और उसी को उद्धृत करते हुए डॉक्टर भागवत ने स्वयंसेवकों को नीति और व्यवहार समझने की कोशिश की जिसमें से अहंकार, धक्का देना आदि शब्दों को उठाकर बिना पूरे प्रसंग को लिए विश्लेषण करेंगे तो निष्कर्ष कुछ भी आ सकता है । 

मजे की बात देखिए कि मोहन भागवत कहते हैं कि इन

 चार पंक्तियों में संघ की वृत्ति ध्यान में आती है। इन बातों में उलझे रहेंगे तो काम रह जाएंगे। यानी संघ अपना काम करता है उसमें उलझता नहीं। और बहस इसी पर हो रही है कि संघ इसी वृत्ति में लिप्त है। तो संघ प्रमुख ने राजनीति को लोकतंत्र में आवश्यक बताते हुए भी यह कहा है कि उसमें कैसे व्यवहार हों लेकिन हमारी भूमिका उससे अलग है। चुनाव को  प्रजातंत्र की आवश्यक प्रक्रिया बताते हुए वे कहते हैं कि उसमें दो पक्ष रहते हैं, इसलिए स्पर्धा रहती है। स्पर्धा रहती है तो दूसरे को पीछे करने और स्वयं को आगे बढ़ने का काम होता ही है …. परंतु उसमें भी एक मर्यादा है। असत्य का उपयोग नहीं करना। चुने हुए लोग संसद में बैठकर देश को चलाएंगे, सहमति बनाकर चलाएंगे। तो भागवत का देश के लिए दिशा यही है कि चुनाव में आवेश हुआ , गुस्सा हुआ, सब कुछ हुआ लेकिन अब सत्ता और विरोधी की जगह सबको देश चलाना है इसलिए सहमति बनाकर आगे काम होना चाहिए। वे कहते हैं कि हमारे यहां तो परंपरा सहमति बनाकर चलने की है—“समानो मंत्र: समिति: समानी। समानम् मनः सह चित्तमेषाम”। यह सच है कि ऋग्वेदकारों को मानवी मन का ज्ञान था। सब जगह उन्होंने ‘सम’ कहा है (समानो मंत्रः समिति समानी समानम् मनः), लेकिन चित्त के बारे में सम नहीं कहा, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति का चित्त, मानस अलग-अलग होता ही है। इसलिए 100 प्रतिशत मतों का मिलान होना संभव नहीं है। लेकिन जब चित्त अलग-अलग होने के बाद भी एक साथ चलने का निश्चय करते हैं तो सह चित्त बन जाता है।

 वे संसद में दो पक्षों को भी आवश्यक इसलिए मानते हैं क्योंकि उनके अनुसार किसी भी प्रश्न के दो पहलू रहते हैं और दोनों सामने आने के बाद ही पूर्णता होती है। चूंकि राजनीति में स्पर्धा होती है इसलिए ऐसी पूर्णता नहीं हो पाती । यही आज की राजनीति का सच है जिसके बारे में मोहन भागवत ने स्पष्ट कहा है कि स्पर्धा होने के कारण  असत्य का सहारा लिया जाता है ,तकनीकी का उपयोग करते हुए असत्य बाती पड़ोसी गई।  इस संदर्भ में मोहन भागवत का यह प्रश्न उचित है कि क्या ज्ञान -विज्ञान एवं विद्या का यही उपयोग है? कायदे से इस प्रश्न पर देश में बहस होनी चाहिए । मोहन भागवत की बातों को स्वीकार करें तो संघ की कल्पना है कि देश के राजनेताओं को स्पर्धा रखते हुए भी असत्य के आधार पर राजनीति और चुनाव नहीं करना चाहिए । सबको देश का ध्यान रखना चाहिए । उन्होंने कहा कि सज्जन विद्या का ये उपयोग नहीं करते। विद्या विवादाय ये खलस्य यानी दुर्जन का काम कहा गया है—“विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय। खलस्य साधोर् विपरीतमेतद् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय”॥ विद्या का उपयोग प्रबोधन करने के लिए होता है, लेकिन आधुनिक विद्या (टेक्नोलॉजी) का उपयोग असत्य परोसने के लिए किया गया। उनकी चिंता है कि देश के शीर्ष राजनेता इस तरह का व्यवहार करेंगे तो देश का भला नहीं हो सकता है। इसी में विरोधी को प्रतिपक्ष कहने की बात करते हैं क्योंकि उनके अनुसार वह विषय का एक पहलू उजागर करते हैं जिनका विचार होना चाहिए। सच कहा जाए तो उनका देश की सभी पार्टियों के राजनेताओं से अपील है कि चुनाव खत्म हो गया जिसमें मर्यादा का पालन नहीं हुआ। किंतु देश के सामने चुनौतियां हैं और उनके लिए सबको सत्य और एक दूसरे को धक्का देने की प्रतिस्पर्धा से बाहर निकाल कर समान मन से काम करना चाहिए। सत्ता पक्ष प्रतिपक्ष के विचारों का सम्मान करें और प्रतिपक्ष सत्ता पक्ष का। उन्होंने पिछले 10 वर्षों में भारत के विकास की भी चर्चा की है और कहा है कि  आधुनिक दुनिया जिन मानकों को मानती है, जिनके आधार पर आर्थिक  स्थिति का मापन किया जाता है उनके अनुसार भी हमारी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी हो रही है। हमारी सामरिक स्थिति निश्चित रूप से पहले से अधिक अच्छी है। दुनियाभर में हमारे देश की प्रतिष्ठा बढ़ी है। कला क्षेत्र में, क्रीडा क्षेत्र में, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में, संस्कृति के क्षेत्र में हम सब लोग विश्व के सामने आगे बढ़ रहे हैं। विश्व के प्रगत देशों ने भी हमको धीरे-धीरे मानना शुरू किया है। जो कहते हैं कि भागवत ने केवल मोदी और उनकी सरकार को कटघरे में खड़ा किया है उन्हें भाषण का यह पक्ष भी ध्यान रखना चाहिए। एक समय शांत होता दिख रहा मणिपुर में फिर से अशांति आई तो इस पर चिंता प्रकट करना वहां शांति स्थापना की अपील है। उनका यही मत है कि सबको ऐसे विषयों को प्राथमिकता में लेकर मिलजुल कर शांति स्थापना के लिए काम करना चाहिए । राजनीतिक विचारधारा से परे हटकर पूरे भाषण को देखें तो इसमें भारत के वर्तमान और भविष्य की चिंता तथा उसके लिए समाज के नीचे से ऊपर तक के व्यक्तियों जिनमें नीति निर्माण करने और उसके लिए दबाव बनाने वाले शामिल हैं, के भी आदर्श और मर्यादित व्यवहार का सूत्र निहित है। यह केवल राजनीति नहीं समाज के हर सक्रिय पक्ष के लिए है। आप संघ के विरोधी हों या समर्थक उनके पूरे भाषण को सुना और शांत मन से मनन किया जाएगा तो हमें आपको कोई विरोधी या शत्रु सहसा नजर नहीं आएगा तथा सबके अंदर देश के लिए संकुचित स्वार्थ से परे हटकर मिलजुल कर काम करने की भावना सशक्त होगी।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208

शनिवार, 22 जून 2024

देश में बढ़ती वीआईपी कल्चर और उसका दुष्प्रभाव

बसंत कुमार

देश की राजधानी दिल्ली में लगभग डेढ़ दशक पूर्व समाज सेवी अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक आंदोलन चलाया जा रहा था और और इस आंदोलन की आड़ में अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, जनरल वीके सिंह, गोपाल राय, संजय सिंह और न जाने कितने नेता आये और मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, उप राज्यपाल, प्रदेश में मंत्री बनने में सफलता प्राप्त की। उस समय इन सभी नेताओं ने सार्वजनिक जीवन में उच्च नैतिक आदर्शों को अपनाने और वीआईपी कल्चर से दूर रहने की बात की थी। अरविंद केजरीवाल ने खुले मंच से ऐलान किया था कि जब मै जीवन में मंत्री या मुख्यमंत्री बनूंगा तो न सरकारी बंगला लूंगा, न सुरक्षा लूंगा और न ही सरकारी गाड़ी इस्तेमाल करूंगा। ये अलग बात है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपने किए गए वायदों को झुठलाते हुए करोड़ों रुपए खर्च करके आलिशान बंगला तैयार कराया और इतनी बड़ी सुरक्षा ली कि जब दिल्ली की सड़कों पर उनका काफिला चलता है तो कि यह अन्ना हज़ारे के आंदोलन से निकला एक व्यक्ति नहीं बल्कि किसी स्टेट का महाराजा निकल रहा है और जहां तक शासन में व्याप्त भ्रष्टाचार रोकने की बात है तो शराब घोटाले, मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में स्वयं केजरीवाल, उनके उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और एक मंत्री सतेन्द्र कुमार जैन जेल में है और एक सांसद जमानत पर जेल के बाहर है। अब प्रश्न यह उठता है कि जिस वीआईपी कल्चर को हटाने के वादे पर अरविंद केजरीवाल को लोगों ने तीन तीन बार मुख्यमंत्री चुना, क्या भारतीय समाज से यह हट सकता है, क्योंकि देश में लाखों वीआईपी लोगों को सुरक्षा उपलब्ध कराने के नाम पर लाखों पुलिस कर्मी लगा दिए जाते है और लोगों की सुरक्षा राम जी के भरोसे चलती है।

इस वीआईपी कल्चर ने न सिर्फ भारत को बल्कि पूरे विश्व के देशों को प्रभावित किया है। विगत 10-15 वर्षों में जिस प्रकार से इस समस्या ने भारत की अर्थव्यवस्था एवं ला एंड ऑर्डर को प्रभावित किया है वह चिंतनीय है। विश्व के सबसे विकसित राज्य अमेरिका में वीआईपी की संख्या 252 है, फ्रांस में कुल 109 वीआईपी है, जापान में कुल 125 वीआईपी है, रूस में 312, जर्मनी में 142 और आस्ट्रेलिया में 205 वीआईपी है परंतु भारत जहां देश की 80 करोड़ जनता 5 किलो मुफ्त राशन पर गुजारा करती है वहां पर इन वीआईपी लोगों की संख्या 5,79,092 है और सरकार को इनकी सुरक्षा, मुफ्त हवाई यात्रा, चिकित्सा आदि पर करोड़ों रुपये खर्च करना पड़ता है। हमारे देश में कुछ वीआईपी उम्र के ऐसे पड़ाव पर है जिनके पास यमराज के अलावा और कोई नहीं आने वाला पर उनकी सुरक्षा के लिए वाई प्लस और जेड प्लस सुरक्षा के नाम पर दर्जनों पुलिस कर्मी सुरक्षा का घेरा बनाये रखते है।

जिन गुंडों और भूमाफियाओं के आतंक से पूरा समाज डरा और सहमा रहता है और ये लोग जहां खड़े हो जाते हैं तो भयवश लोग उनके पैर छूने और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए लाइन लगा देते है और इन गुंडों भूमाफियाओं की सुरक्षा में तैनात वर्दी धारी पुलिस कर्मी इनका बैग पकड़े खडा रहता है, इन स्वयंभू वीआईपी लोगों की सुरक्षा इतनी आवश्यक होती हैं कि थाने में स्टाफ है या नहीं इसकी परवाह नहीं करते, यदि कहीं थाने में इमर्जेंसी में पुलिस फोर्स की आवश्यकता पड़ जाए तो थानाध्यक्ष स्टाफ न होने की अपनी लचरि बता देता है, क्योंकि अधिकांश फोर्स तो इन फर्जी वीआईपी की सुरक्षा और सेवा में लगी होती है। कैसी त्रासदी है कि जो पुलिस फोर्स आम जनता की सुरक्षा के लिए बनाई गई थी वह उन नागरिकों की सुरक्षा में मौजूद रहने के बजाय क्षेत्र में दौरे पर आये सांसदों और मंत्रियों की सेवा सुरक्षा में खड़ी रहती है। आखिर यह वीआईपी कल्चर भारत जैसे लोकतंत्रिक देश में पूरे सिस्टम का सत्यानाश कर देगी।

सांसदों, मंत्रियों, उच्च अधिकारियों की बात तो छोड़ दीजिये, उन छुटभैये नेताओं जो जीवन में कभी भी सांसद, विधायक या पार्षद नहीं बने उन्हें सिर्फ जनता के ऊपर रोब जमाने के लिए पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराना और वीआईपी स्टेट्स देना कितना हाष्यास्पद लगता है, मैंने अपनी आंखों से ऐसे नेताओं को मिली पुलिस सुरक्षा देखी है जिनके ऊपर 10-15 क्रिमिनल केस पेंडिंग है अर्थात जिन लोगों को पुलिस कस्टडी में होना चाहिए था उनको पुलिस द्वारा सुरक्षा प्रदान करवाई जा रही है। कहा जाता है कि ये लोग जुगाड़ करके एलआईयू से फर्जी रिपोर्ट प्राप्त कर लेते है कि इन्हें खतरा है और इस आधार पर इन्हें पुलिस सुरक्षा मिल जाती है और सरकार को इस पर करोड़ों रुपए खर्च करने पड़ते है। यह एक जांच का विषय है कि सुरक्षा प्रदान करने के लिए मुख्य आधार एलआईयू रिपोर्ट निष्पक्ष रूप से बिना किसी प्रलोभन के दी जाती है, क्योंकि प्राय: यह देखा गया है कि कुछ ऐसे लोगों को वीआईपी सुरक्षा प्रदान कर दी जाती है जिनको इसकी जरूरत नहीं होती।

 

इस देश में आजादी के बाद रामधारी सिंह दिनकर, सुमित्रा नंदन पंत, बिस्मिला खान, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया जैसे अनेक साहित्यकार और पृथ्वीराज कपूर, दिलीप कुमार जैसे अनेक कलाकार दिए पर इनमें से किसी को भी वीआईपी मानकर कभी वाई या जेड की सुरक्षा नहीं दी गई पर आज शाहरुख खान, सलमान खान या अक्षय कुमार को इतनी सिक्योरिटी क्यों?

आखिर इन लोगों को वीआईपी बनाकर कर सुरक्षा कवच देने का औचित्य क्या है और इन तमाम लोगों को वीआईपी दर्जा देने के लिए करदाताओं के ऊपर करोड़ों का बोझ पड़ता है जो सरासर गलत है। अब समय आ गए है कि सरकार इन वीआईपी सुरक्षा और उनको दिए जाने वाली व अन्य सुविधाओ की समीक्षा करे और देश में वीआईपी लोगों की लाखों की संख्या सीमित करे। यह सही है कि देश ने आतंकवादियों के हाथो एक प्रधानमंत्री और एक पूर्व प्रधानमंत्री खोया है फिर भी वीआईपी सुरक्षा के नाम पर छुट भैये नेताओ की सुरक्षा के नाम पर करोड़ो रुपए बहाना व्यर्थ है।

भारत विश्व में इकलौता देश है जहां थानों में पुलिसकर्मियों का काम होमगार्ड करते है क्योंकि रेगुलर पुलिस कर्मी अधिकांश समय वीआईपी सुरक्षा में व्यस्त रहते और कुछ पुलिसकर्मी थानों में ड्यूटी करने के बजाय अपने उच्च अधिकारियों के बंगलों पर ड्यूटी लगवाकर साहब के बच्चों को स्कूल छोड़ने, कुत्तों को घुमाने का काम पसंद करते है और सरकारी चिकिस्यालों में मरीजों को फरमैसिस्ट और वार्ड बॉय देखते है क्योंकि डॉक्टर्स तो इलाके के वीआईपी और नेताओं की देखरेख में व्यस्त रहते हैं आखिर देश में ये वीआईपी कल्चर कब समाप्त होगी।

गुरुवार, 20 जून 2024

स्वतंत्र पत्रकारों के लिए अपनी आय बढ़ाने के कुछ सुझाव

अपने काम में विविधता लाएं: एक प्रकाशन या आय के स्रोत पर भरोसा करने के बजाय, कई आउटलेट्स पर कहानियों को पिच करने या लेखन, संपादन या परामर्श जैसी विभिन्न प्रकार की सेवाओं की पेशकश करने पर विचार करें।

एक मजबूत ऑनलाइन उपस्थिति बनाएं: अपना काम दिखाने के लिए एक वेबसाइट या ब्लॉग स्थापित करें और संभावित ग्राहकों के लिए आपको ढूंढना आसान बनाएं। आप अन्य पेशेवरों के साथ नेटवर्क बनाने और अपने काम को बढ़ावा देने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का भी उपयोग कर सकते हैं।

एक आला विकसित करें: किसी विशिष्ट क्षेत्र या विषय में विशेषज्ञता आपको अन्य स्वतंत्र पत्रकारों से अलग दिखाने और उच्च दर प्राप्त करने में मदद कर सकती है।

नए कौशल सीखें: लेखन से परे अपने कौशल का विस्तार करने से आप अधिक बिक्री योग्य बन सकते हैं और अपनी कमाई की क्षमता बढ़ा सकते हैं। मल्टीमीडिया पत्रकारिता, डेटा विश्लेषण, या सोशल मीडिया प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में पाठ्यक्रम या कार्यशालाएँ लेने पर विचार करें।

बातचीत की दरें: यह सुनिश्चित करने के लिए कि आपके काम के लिए आपको उचित मुआवजा दिया जा रहा है, ग्राहकों के साथ दरों पर बातचीत करने से डरो मत।

लंबी अवधि के अनुबंधों पर विचार करें: यदि आपका किसी प्रकाशन या ग्राहक के साथ मजबूत संबंध है, तो लंबी अवधि के अनुबंध पर बातचीत करने से आय का अधिक स्थिर स्रोत मिल सकता है।

मूल्य वर्धित सेवाओं की पेशकश करें: लेखन के अलावा, अन्य सेवाओं की पेशकश करने पर विचार करें जो आपके ग्राहकों के लिए मूल्य जोड़ती हैं, जैसे कि सोशल मीडिया प्रबंधन, पॉडकास्ट उत्पादन या वीडियो उत्पादन।

उच्च-भुगतान वाले ग्राहक खोजें: अनुसंधान करें और ऐसे ग्राहकों की पहचान करें जो गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता के लिए उच्च दर का भुगतान करने को तैयार हैं। इसके लिए बड़े, राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशनों को पिचिंग करने या किसी विशिष्ट विषय पर ध्यान केंद्रित करने वाले विशेष प्रकाशनों की तलाश करने की आवश्यकता हो सकती है।

अपनी विशेषज्ञता का लाभ उठाएं: यदि आपके पास किसी विशेष क्षेत्र में अनुभव या विशेषज्ञता है, तो उस विषय के बारे में लिखने या उस उद्योग में ग्राहकों को परामर्श सेवाएं प्रदान करने पर विचार करें।

नेटवर्किंग कार्यक्रमों में भाग लें: अन्य पत्रकारों और संभावित ग्राहकों से मिलने के लिए सम्मेलनों, कार्यशालाओं और अन्य उद्योग आयोजनों में भाग लें। संबंध बनाने और संबंध बनाने से भविष्य में काम के अवसर पैदा हो सकते हैं।

अपना काम सीधे बेचें: ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से अपने काम को स्वयं-प्रकाशित करने या अपने लेख सीधे पाठकों को बेचने पर विचार करें। यह विशेष रूप से प्रभावी हो सकता है यदि आपके पास मजबूत अनुयायी या आला दर्शक हैं।

याद रखें, एक स्वतंत्र पत्रकार के रूप में अपनी आय बढ़ाने में समय और मेहनत लगती है। एक मजबूत नेटवर्क बनाना, अपने कौशल का विस्तार करना और लगातार नए अवसरों की तलाश करना आपको अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद कर सकता है।

द हरिश्चन्द्र
The Harishchandra
+91 82383 22999

देश में बढ़ती वीआईपी कल्चर और उसका दुष्प्रभाव

बसंत कुमार

देश की राजधानी दिल्ली में लगभग डेढ़ दशक पूर्व समाजसेवी अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक आंदोलन चलाया जा रहा था और और इस आंदोलन की आड़ में अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, जनरल वीके सिंह, गोपाल राय, संजय सिंह और न जाने कितने नेता आये और मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री. उप राज्यपाल, प्रदेश में मंत्री बनने में सफलता प्राप्त की। उस समय इन सभी नेताओ ने सार्वजनिक जीवन में उच्च नैतिक आदर्शों को अपनाने और वीआईपी कल्चर से दूर रहने की बात की थी। अरविंद केजरीवाल ने खुले मंच से ऐलान किया था कि जब मैं जीवन में मंत्री या मुख्यमंत्री बनूंगा तो न सरकारी बंगला लूंगा, न सुरक्षा लूंगा और न ही सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल करूंगा। ये अलग बात है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपने किए गए वायदों को झुठलाते हुए करोड़ों रुपए खर्च करके आलिशान बंगला तैयार कराया और इतनी बड़ी सुरक्षा ली कि जब दिल्ली की सड़कों पर उनका काफिला चलता है तो कि यह अन्ना हज़ारे के आंदोलन से निकला एक व्यक्ति नहीं बल्कि किसी स्टेट का महाराजा निकल रहा है और जहां तक शासन में व्याप्त भ्रष्टाचार रोकने की बात है तो शराब घोटाले, मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में स्वयं केजरीवाल, उनके उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और एक मंत्री सतेंद्र जैन जेल में है और एक सांसद जमानत पर जेल के बाहर हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि जिस वीआईपी कल्चर को हटाने के वादे पर अरविंद केजरीवाल को लोगों ने तीन-तीन बार मुख्यमंत्री चुना, क्या भारतीय समाज से यह हट सकता है, क्योंकि देश में लाखों वीआईपी लोगों को सुरक्षा उपलब्ध कराने के नाम पर लाखों पुलिस कर्मी लगा दिये जाते है और लोगों की सुरक्षा राम जी के भरोसे चलती है।

इस वीआईपी कल्चर ने न सिर्फ भारत को बल्कि पूरे विश्व के देशों को प्रभावित किया है। विगत 10-15 वर्षों में जिस प्रकार से इस समस्या ने भारत की अर्थव्यवस्था एवं लॉ एंड ऑर्डर को प्रभावित किया है वह चिंतनीय है। विश्व के सबसे विकसित राज्य अमेरिका में वीआईपी की संख्या 252 है, फ्रांस में कुल 109 वीआईपी है, जापान में कुल 125 वीआईपी है, रूस में 312, जर्मनी में 142 और आस्ट्रेलिया में 205 वीआईपी है परंतु भारत जहां देश की 80 करोड़ जनता 5 किलो मुफ्त राशन पर गुजारा करती है वहां पर इन वीआईपी लोगों की संख्या 5,79,092 है और सरकार को इनकी सुरक्षा, मुफ्त हवाई यात्रा, चिकित्सा आदि पर करोड़ों रुपये खर्च करना पड़ता है। हमारे देश में कुछ वीआईपी उम्र के ऐसे पड़ाव पर है जिनके पास यम राज के अलावा और कोई नहीं आने वाला पर उनकी सुरक्षा के लिए वाई प्लस और जेड प्लस सुरक्षा के नाम पर दर्जनों पुलिस कर्मी सुरक्षा का घेरा बनाये रखते है।

जिन गुंडों और भूमाफियाओ के आतंक से पूरा समाज डरा और सहमा रहता है और ये लोग जहां खड़े हो जाते हैं तो भय वश लोग उनके पैर छूने और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए लाइन लगा देते है और इन गुंडों भूमाफियाओ की सुरक्षा में तैनात वर्दीधारी पुलिस कर्मी इनका बैग पकड़े खड़ा रहता है, इन स्वयंभू वीआईपी लोगों की सुरक्षा इतनी आवश्यक होती हैं कि थाने में स्टाफ है या नहीं इसकी परवाह नहीं करते, यदि कही थाने में इमर्जेंसी में पुलिस फोर्स की आवश्यकता पड़ जाए तो थानाध्यक्ष स्टाफ न होने की अपनी लचरि बता देता है, क्योंकि अधिकांश फोर्स तो इन फर्जी वी आई पीयो की सुरक्षा और सेवा में लगी होती है। कैसी त्रासदी है कि जो पुलिस फोर्स आम जनता की सुरक्षा के लिए बनाई गई थी वह उन नागरिको की सुरक्षा में मौजूद रहने के बजाय क्षेत्र में दौरे पर आये सांसदो और मंत्रियों की सेवा सुसरुशा में खड़ी रहती है। आखिर यह वीआईपी कल्चर भारत जैसे लोकतंत्रिक देश में पूरे सिस्टम का सत्यानाश कर देगी।

सांसदो, मंत्रियों, उच्च अधिकारियों की बात तो छोड़ दीजिये, उन छुट भैये नेताओ जो जीवन में कभी कभी सांसद, विधायक या पार्षद नहीं बने उन्हें सिर्फ जनता के उपर रोब जमाने के लिए पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराना और वीआईपी स्टेट्स देना कितना हाष्यास्पद् लगता है, मैने अपनी आँखों से ऐसे नेताओ को मिली पुलिस सुरक्षा देखा है जिनके उपर 10-15 क्रिमिनल केस पेंडिंग है अर्थात जिन लोगों को पुलिस कस्टडी में होना चाहिए था उनको पुलिस द्वारा सुरक्षा प्रदान करवाई जा रही है। कहा जाता है ये लोग जुगाड़ करके एल आई यू से फर्जी रिपोर्ट प्राप्त कर लेते है कि इन्हे खतरा है और इस आधार पर इन्हे पुलिस सुरक्षा मिल जाती है और सरकार को इस पर करोड़ो रुपए खर्च करने पड़ते है। यह एक जांच का विषय है कि सुरक्षा प्रदान करने के लिए मुख्य आधार एलआईयू रिपोर्ट निष्पक्ष रूप से बिना किसी प्रलोभन के दी जाती है, क्योंकि प्राय: यह देखा गया है कि कुछ ऐसे लोगों को वीआईपी सुरक्षा प्रदान कर दी जाती है जिनको इसकी जरूरत नहीं होती।

इस देश में आजादी के बाद राम धारी सिंह दिनकर, सुमित्रा नंदन पंत, बिस्मिला खान, प. हरि प्रसाद चौरसिया जैसे अनेक साहित्यकार और पृथ्वी राज कपूर, दिलीप कुमार जैसे अनेक कलाकार दिये पर इनमे से किसी को भी वीआईपी मानकर कभी वाई या जेड की सुरक्षा नहीं दी गई पर आज शाहरुख खान, सलमान खान या अक्षय कुमार को इतनी सिक्योरिटी क्यों?

आखिर इन लोगों को वीआईपी बनाकर कर सुरक्षा कवच देने का औचित्य क्या है और इन तमाम लोगों को वीआईपी दर्जा देने के लिए करदाताओं के ऊपर करोड़ों का बोझ पड़ता है जो सरासर गलत है, अब समय आ गए है कि सरकार इन वीआईपी सुरक्षा और उनको दिये जाने वाली व अन्य सुविधाओं की समीक्षा करे और देश में वीआईपी लोगों की लाखों की संख्या सीमित करे। यह सही है कि देश ने आतंकवादियों के हाथों एक प्रधानमंत्री और एक पूर्व प्रधानमंत्री खोया है फिर भी वीआईपी सुरक्षा के नाम पर छुटभैये नेताओ की सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपए बहाना व्यर्थ है।

भारत विश्व में इकलौता देश है जहां थानों में पुलिसकर्मियों का काम होम गार्ड करते है क्योंकि रेगुलर पुलिस कर्मी अधिकांश समय वीआईपी सुरक्षा में व्यस्त रहते और कुछ पुलिस कर्मी थानों में ड्यूटी करने के बजाय अपने उच्च अधिकारियों के बंगलों पर ड्यूटी लगवा कर साहब के बच्चों को स्कूल छोड़ने, कुत्तों को घुमाने का काम पसंद करते है और सरकारी चिकित्सालयों में मरीजों को फरमैसिस्ट् और वार्ड बॉय देखते है क्योंकि डॉक्टर्स तो इलाके के वीआईपी और नेताओ की देखरेख में व्यस्त रहते हैं आखिर देश में ये वीआईपी कल्चर कब समाप्त होगी।

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