बुधवार, 10 अप्रैल 2024

राष्ट्रवादी चिंतक व वरिष्ठ भाजपा नेता बसंत कुमार को चुनाव लड़ाना चाहती है बसपा

संवाददाता
जौनपुर। जौनपुर जनपद की मछली शहर लोकसभा सीट से भाजपा ने एक बार फिर अपने मौजूदा सांसद बीपी सरोज पर दांव लगाया है। अगर हम लोकसभा चुनाव 2019 की बात करें तो इस सीट से भाजपा के बीपी सरोज ने मात्र 181 वोटों से जीत हासिल की थी। इन्हें इस चुनाव में 4,88,397 वोट मिले थे, जबकि बसपा के त्रिभुवन राम 4,88,216 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे और एसबीएसपी के राज नाथ 11,223 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे थे। मोदी लहर में भी इन्हें बसपा के प्रत्याशी त्रिभुवन से कड़ी की टक्कर मिली थी और बीपी सरोज हारते-हारते बच थे। इस बार फिर भाजपा ने इन पर दांव लगाया है पर इनसे मजबूत दावेदारी पेश कर रहे राष्ट्रवादी चिंतक व वरिष्ठ भाजपा नेता बसंत कुमार को टिकट न देकर भाजपा ने सबको चौंका दिया है।

वरिष्ठ भाजपा नेता व राष्ट्रवादी लेखक बसंत कुमार जिन्होंने उप सचिव पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद वर्ष 2011 में भाजपा जॉइन की और विगत 14 वर्षों में बड़े मनोयोग से सेवा की और राष्ट्रवाद और हिंदुत्व पर दर्जनों किताबे लिखी हैं। इन्होंने सांसद कलराज मिश्र के चुनाव प्रचार से लेकर उनके सलाहकार तक का काम किया। भाजपा ने उन्हें जातीय समीकरण की आड़ में कभी भी लोकसभा का टिकट नहीं दिया।

अब ऐसी खबर मिल रही है कि बसपा उन्हें अपना टिकट देकर जौनपुर या मछली शहर से मैदान में उतार सकती है क्योंकि 2019 के चुनाव में बसपा ने जौनपुर सीट पर कब्जा कर लिया था पर मछली शहर सीट सिर्फ 181 वोटों से हार गई थी। ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि बसपा के कुछ वरिष्ठ नेता चाहते हैं कि किसी तरह से बसंत कुमार की सुश्री मायावती से मुलाकात करवाई जाए ताकि वह बहनजी की बात मानकर बसपा जॉइन कर लें। अगर वह किसी तरह से बसपा में आ जाते हैं तो बसपा उन्हें जौनपुर या मछली शहर से अपना प्रत्याशी बनाकर मैदान में उतार सकती है क्योंकि बसपा पिछले लोकसभा चुनाव में मछली शहर सीट पर करीबी हार को इस बार वह जीत में बदलना चाहती है।

यह सर्व विदित है कि बसंत कुमार पुराने भाजपाई हैं और भाजपा कार्यकर्ता उन्हें बहुत सम्मान भी देते हैं। अगर किसी तरह से बसपा के वरिष्ठ नेताओं ने सुश्री मायावती से उनकी मुलाकात करवाकर बसपा जाइन करवा दी तो बसपा उन्हें मछलीशहर या जौनपुर से अपने टिकट पर चुनाव लड़ा सकती है जिससे भाजपा और मछली शहर से सांसद बीपी सरोज की मुश्किल बढ़ सकती है।

 आपको बता दें कि जौनपुर की सीट वर्ष 2019 में भी बसपा के खाते में गई थी और मछली शहर सीट पर बीपी सरोज भी बसपा के प्रत्याशी से मात्र 181 मतों से जीत हासिल कर पाए थे। अबदेखना यह है कि बसपा के वरिष्ठ नेता बसंत कुमार को अपने पाले में लाने में सफल हो पाती हैं या नहीं। अगर सफल हो गए तो जौनपुर व मछली शहर में भाजपा व उनके प्रत्याशियों के लिए मुश्किलें बढ़ जाएंगी।

एटलस साइकिल्स ने अपना परिचालन फिर से शुरू किया

संवाददाता

हरियाणा। भारत की प्रसिद्ध साइ‌किल निर्माता कपनी एटलस साइकिल्स (हरियाणा) लिमिटेड में अस्थाई बदी के बाद अपना व्यवसायिक सचालन फिर से शुरू कर दिया है। कपनी जल्द ही पासी लेडीज और किडस साइकिल के कुछ नए मॉडल बाजार में दुबारा लॉन्च करने जा रही है।

इस बाबत एटलस ने 5 अप्रैल 2024 को आगरा, मुजफ्फरनगर और अलीगढ़ के कुछ प्रमुख साइकिल डीलरों को अपने साहिबाबाद प्लाट में आमत्रित किया और उन्हें कपनी की आगामी योजनाओं से अवगत कराया।

सभी डीलर कपनी की पुनरूद्वार योजना को जानकर बेहद उत्साहित थे और उन्होंने मौजूदा साइकिल बाजार के बारे में अपने विचार साझा किये। बैठक के दौरान डीलरों ने कपनी को अपने बहुमूल्य सुझाय दिये।

कंपनी के निदेशक श्री आई डी बुध ने कपनी के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ डीलरा से इस कठिन वक्त पर कपनी के लिए सहयोग मागा और उन्हे निकट भविष्य में भारतीय साइकिल बाजार में एटलस को एक प्रमुख साइकिल ब्रांड के रूप में फिर से स्थापित करने के लिए कपनी द्वारा उठाए गए कदमो के बारे में जानकारी दी।



रीता बहुगुणा, किरण खेर सहित कई के टिकट कटे, भाजपा ने जारी की कैंडिडेट्स की नई लिस्ट

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव के पहले भारतीय जनता पार्टी ने अपने उम्मीदवारों की 10वीं लिस्ट सूची जारी कर दी है। इसमें यूपी सरकार में मंत्री रहीं रीता बहुगुणा जोशी का नाम नहीं है। उन्हें इस बार टिकट नहीं मिला है। चंडीगढ़ से किरण खेर को भी इस बार टिकट नहीं दिया गया है। उनकी जगह संजय टंडन को टिकट मिला है। वहीं इलाहाबाद से रीता बहुगुणा जोशी की जगह नीरज त्रिपाठी को उम्मीदवार बनाया है। इसके अलावा आसनसोल से शत्रुघ्न सिन्हा के खिलाफ बीजेपी ने एसएस अहलुवालिया को उतारा गया है।

 



 

 

 

 

 

मंगलवार, 9 अप्रैल 2024

शास्त्री पार्क क्षेत्र में स्थित मस्जिदों में ईद-उल-फितर की नमाज का समय

नई दिल्ली। देशभर में इस साल ईद-उल-फितर 11 अप्रैल, 2024 (सिर्फ केरल को छोड़कर, जहां 10 अप्रैल) को ईद की नमाज अदा की जाएगी। ईद पर सुबह के समय मुस्लिम समुदाय के लोग पाक-साफ होकर नए कपड़े पहनते हैं और ईद की नमाज पढ़ने मस्जिद जाते हैं। इसके बाद एक-दूसरे से गले मिलकर ईद की मुबारकबाद देते हैं। ईद का त्योहार भाईचारे का प्रतीक माना जाता है। इस दिन मुस्लिम लोग नमाज के जरिए अल्लाह का शुक्रिया अदा करते हैं।

इसी को देखते हुए शास्त्री पार्क क्षेत्र में स्थित मस्जिदों में ईद-उल-फितर की नमाज का समय कुछ इस प्रकार है: बुलंद जामा मस्जिद में सुबह 8:15 बजे, रशीदिया मस्जिद (इस मस्जिद में दो बार नमाज होगी) में सुबह 7:00 व 8:00 बजे, कादरी मस्जिद में सुबह 8:45 बजे, मदनी मस्जिद में सुबह 7:30 बजे, बिलाल मस्जिद में सुबह 7:30 बजे, गौसिया मस्जिद (मजार, बुलंद मस्जिद स्कूल के पास) में सुबह 8:00 बजे, वाहिद जामा मस्जिद में सुबह 7:30 बजे, कोट मार्किट मस्जिद में  सुबह 7:00 बजे, मक्का मस्जिद (शास्त्री पार्क थाने के पीछे खेत में) में सुबह 7:15 बजे, चांद मस्जिद (इस मस्जिद में दो बार नमाज होगी) में सुबह 6:45 व 7:45 बजे, रजा मस्जिद में सुबह 8:30 बजे, साबिर मस्जिद में (शास्त्री पार्क मेट्रो दरगाह) सुबह 7:15 बजे, फैजाने मदीना मस्जिद (शास्त्री पार्क गैस एजेंसी के पास) में सुबह 7:00 बजे, मुस्तफा मस्जिद (रेलवे के किनारे) में सुबह 7:45 बजे और मस्जिद कैलाश नगर  में सुबह 8:00 बजे अदा की जाएगी।

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

आम चुनाव: सरकार किसी की बने पर लोकतंत्र और संविधान सुरक्षित रहना चाहिए

बसंत कुमार

आज कल प्रात: जब भी न्यूज पेपर का पन्ना खोलते हैं तो मुख पृष्ठ पर यही पढ़ने को मिलता है कि फलां दल के इतने लोगों ने अपनी पार्टी से त्याग पत्र देकर फलां पार्टी का दामन थाम लिया है। दो दिन तक यह था कि पूर्व बाक्सर बिजेंद्र सिंह कांग्रेस के टिकट पर भाजपा के किसी दिग्गज नेता को चुनौती देने वाले हैं पर वो रातोंरात पाला बदल कर भाजपा में आ गए और अपना लोकसभा टिकट पक्का करने में सफल हो गए। इन जैसे नेताओं के कारण भाजपा में दरिया बिछाने वाले कार्यकर्ताओं को दरिया बिछाते-बिछाते दशकों निकल जाते हैं और जब टिकट का नंबर आता है तो नवीन जिंदल और बिजेंद्र सिंह जैसे आयातित लोगों के आ जाने से उनके सपने ताश के पत्तों जैसे बिखर जाते हैं। अभी कुछ दिन पूर्व कांग्रेस के दिग्गज नेता संजय निरुपम जिन्हें भाजपा के विरुद्ध अतिवादी टिप्पणियों के लिए जाना जाता रहा है और भाजपा नेत्री स्मृति ईरानी के खिलाफ अमर्यादित टिप्पणियों के लिए चर्चा में आये थे। वह कांग्रेस से नाता तोड़कर महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने वाले हैं। वैसे देश के 70 वर्ष के लोकतांत्रिक इतिहास में वर्ष 2024 का चुनाव नेताओं द्वारा पार्टी बदलने और निष्ठाये बदलने के इतिहास के रूप में जाना जायेगा। यह चुनाव देश मौजूद 'दल-बदल निरोधक कानून' का परिहास उड़ाने के लिए जाना जाएगा।

इस समय पार्टियों द्वारा चुनाव लड़ाने के लिए प्रत्याशियों की घोषणा हो रही है और विभिन्न पार्टियों के मौजूदा सांसदों के टिकट काटे जा रहे हैं पर जिन लोगों का टिकट कटा है वे यह विचार किए बिना कि उन्होंने अपनी पार्टी में रहकर वर्षों सत्ता का सुख भोगा है पाला बदलकर दूसरी पार्टियों में टिकट की जुगाड़ में लग रहे हैं और राजनीतिक दल भी अपनी पार्टी से जुड़े हुए समर्पित कार्यकर्ताओं को अवसर देने के बजाय इन भगोड़े नेताओं को उपकृत कर रही है।

जो नेता वर्षों तक कांग्रेस व अन्य विपक्षी पार्टियों में रहकर अपने आप को सेकुलरिज्म के योद्धा के रूप में पेश करते रहे हैं और अटल-अडवाणी के नेतृत्व वाली पार्टी भाजपा को सांप्रदायिक कह कर इसे छूने से परहेज करते थे आज नरेंद्र मोदीजी के करिश्माई नेतृत्व के आगे रचनात्मक विपक्ष कि भूमिका निभाने के स्थान पर सत्ता की मलाई खाने के लोभ में नतमस्तक होकर भाजपा की ओर भाग रहे हैं। भाजपा भी देश को भ्रष्टाचार का पर्याय माने-जाने वाली कांग्रेस से मुक्त भारत बनाने के स्थान पर कांग्रेस युक्त भाजपा बनाने जा रही है जो राष्ट्रवादी विचारधारा वाली पार्टी के हित में नहीं है क्योंकि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के भ्रष्ट संस्कृति में पले हुए लोग इस पार्टी में आकर भाजपा को भी ऐसा नहीं कर देंगे इसकी कोई गारंटी नहीं है।

ऐसी परिस्थिति में माननीय अटलजी की 13 महीने की सरकार के बहुमत के दौरान एक मत से गिरने की घटना याद आती है कि अटल जी को यह अहसास हो गया था कि हमारी सरकार गिर सकती है तो अटलजी के एक सहयोगी मंत्री शरद यादव ने कुछ सांसदों को दलबदल करा कर सरकार बचा ली जाए तो अटलजी ने यह कहकर मनाकर दिया कि मुझे यदि इस प्रकार से बने रहना है तो ऐसी सत्ता को मैं चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करूंगा। यद्यपि अटलजी इससे पूर्व नरसिंहा राव सरकार को बचाने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को रिश्वत देकर अपने पक्ष में वोट दिलाकर सरकार बचाने का तमाशा देख चुके थे पर उन्होंने अपने पूरे राजनीतिक जीवन में आया राम-गया राम की राजनीति का कभी भी साथ नहीं दिया।

इस संबंध में भाजपा के वरिष्ठतम नेताओं में माने जाने वाले हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार के साथ हुई वार्ता का उल्लेख करना चाहता हूं। उन्होंने बताया कि वे प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और वहा विधानसभा चुनाव हो गए थे और परिणाम आने पर भाजपा के पास सरकार बनाने के अपेक्षित सीटों से दो-तीन सीटें कम आई और दो-एक विधायकों की खरीद-फरोख्त से सरकार बनाई जा सकती थी पर इस मामले में अपनी अनिक्षा शांता कुमार जी ने अटलजी को बताई तो अटलजी ने अपने वक्तव्य में यह कहा कि हमें हिमाचल प्रदेश में विपक्ष में बैठेने का जनादेश मिला है और संगठन में बैठे उन नेताओं का मुहं बन्द कर दिया जो खरीद के माध्यम से प्रदेश में सरकार बनाना चाहते थे। यदि हम विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी को अपने देश में सुरक्षित देखना चाहते हैं तो आम चुनाव के समय पार्टियां बदलने की भागमभाग को रोकना होगा।

यह सही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के अपने दस वर्षों के कार्यकाल में आर्थिक विकास के क्षेत्र में, इंफ्रास्ट्रक्चर विकास और सड़क निर्माण के क्षेत्र मे, उद्यमिता विकास के क्षेत्र में देश ने अभूतपूर्व सफलता अर्जित की है और ऐसी आशा है कि देश के मतदाता अपने अधूरे कार्यों को पूरा करने के लिए एक अवसर और दे जिससे देश विश्व के सामने विकसित अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित कर सके। इसका अर्थ यह नहीं कि विपक्षी पार्टियों के लोग सरकार की कमियों की आलोचना करें और सरकार को और एक्टिव मोड में लाए न कि अपनी पार्टी को छोड़कर सत्ता के लोभ में सत्ता पार्टी में मिल जाए। उनके ऐसा करने से देश में लोकतंत्र की पराजय होगी जो देश के लिए खतरनाक है, ऐसी स्थिति में हमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के उस वक्तव्य का ध्यान देना चाहिए जो उन्होंने अपनी 13 दिनों की सरकार के अविश्वास प्रस्ताव के दौरान कही थी "सरकारे आएंगी और जाएंगी, पार्टियां बनेंगी और बिगड़ेंगी पर देश का लोकतंत्र बचना चाहिए। अटलजी की यह बात आज के परिप्रेक्ष में और भी सार्थक हो रही हैं जहां लोग संसद में पहुंचने के लोभ में अपने दलों को 24 घंटे में छोड़कर पाला बदल रहे है जहां रहकर उन्होंने वर्षो तक सत्ता की सुख भोगा है। अब तो अपने दलों की नीतियां व रीतियां सब कुछ कुर्सी पाने की चाह में भूल गए हैं, जो लोग कांग्रेस में रहते हुए अटल-अडवाणी की राष्ट्रवादी विचार धारा को सांप्रदायिक कहकर उनकी आलोचना करते थे वे लोग अब राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की विचारधारा के झंडा बरदार बने हुए हैं।

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