शनिवार, 18 नवंबर 2023

पिछड़ों और महादलितों के कल्याण की बात करना राजनीति है या कुछ और?

 

बसंत कुमार

पिछले सप्ताह डॉ. राम मनोहर लोहिया और लोक नायक जयप्रकाश नारायण के आदर्शों की राजनीति का दंभ भरने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सदन में महिलाओं की शिक्षा और बिहार के इतिहास में इकलौते महादलित मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के विषय में इतनी आपत्तिजनक बातें कह दीं, उससे यह पता लगाना मुश्किल है कि जातिगत जनगणना और जितनी जिसकी है आबादी उसकी उतनी हिस्सेदारी की बात करने वाले नीतीश कुमार महिलाओं और दलितों के प्रति किस तरह का पूर्वाग्रह रखते हैं। भरे सदन में शिक्षित महिलाओं के बारे में उन्होंने जो कह दिया उसकी कल्पना नहीं की जा सकती। उसी तरह प्रदेश के इतिहास में महादलित समुदाय से संबंध रखने वाले इकलौते मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी द्वारा दलित समुदाय की उपेक्षा पर बोलना उनको इतना नागवार गुजरा कि उन्होंने भरे सदन में यह कह दिया कि मेरा दिमाग खराब था कि वर्ष 2014 में जीतन राम मांझी को प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया जबकि वास्तविकता यह है कि श्री मांझी 1980 से विधायक थे और नीतीश जी के मंत्रिमंडल में वरिष्ठ मंत्री थे। नीतीश जी उनकी कार्य क्षमता के बारे में भली भांति जानते थे फिर उन्होंने 2014 में चुनाव में पार्टी द्वारा खराब प्रदर्शन होने के कारण जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाने की गलती क्यों की।

सभी राजनीतिक दलों की कमोबेस रणनीति यही रहती है कि राजनीतिक लाभ के लिए अपनी सुविधा के अनुसार दलित, आदिवासी, पिछड़े नेता का नाम आगे कर दिया जाए जिससे समाज में यह संदेश चला जाए कि हम ही इनके हितैषी हैं और अपना काम निकल जाने के पश्चात् इन्हें दूध में पड़ी मक्खी की तरह बाहर निकाल दो जैसा नीतीश कुमार ने वर्ष 2014 में जीतन राम मांझी के साथ किया। वर्ष 1969 में कांग्रेस का विभाजन होने पर इंदिरा गांधी ने अपनी चुनावी नैया पार करने के लिए बाबू जगजीवन राम को अपनी पार्टी का अध्यक्ष बना दिया और चुनाव जितने के बाद उन्हें पार्टी छोड़कर जनता पार्टी के साथ जाने को मजबूर कर दिया और वर्ष 1980 में उनको प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए संसद भंग करवा दी। अब कांग्रेस की डूबती नैया पार करने के लिए दलित नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को पार्टी का अध्यक्ष बना दिया है तो क्या यह मान लिया जाए कि पार्टियों द्वारा समय पड़ने पर इन दलितों आदिवासियों को आगे लाकर लाभ उठाना अवसरवादिता है या कुछ और।

आजादी से पहले महात्मा गांधी ने अस्पृश्यता निवारण के अपने आंदोलन के समय यह कहा था कि मेरा सपना तभी साकार होगा जब एक दलित (अछूत) इस देश का प्रधानमंत्री बनेगा। पर कितने आश्चर्य की बात है कि जब देश के आजाद होने का समय आया और देश के प्रधानमंत्री रूप में पंडित नेहरू, सरदार पटेल और मोहम्मद अली जिन्ना के नामों की चर्चा चल रही थी पर गांधी जी ने देश के सबसे शिक्षित नेता जो संविधान के ज्ञाता थे, कानूनविद् थे और अर्थशास्त्री थे यानी डॉ. अंबेडकर का नाम क्यों नहीं चलाया जिससे एक दलित के देश का प्रधानमंत्री बनने का गांधी का सपना पूरा हो जाता। उनके प्रधानमंत्री बनने से देश को निम्न फायदे होते

1. डॉ. अंबेडकर यदि देश के प्रधानमंत्री होते तो संविधान में अनुसूचित जातियों और जनजातियों को दिया जाने वाला आरक्षण मात्र 10 वर्षों के लिए होता क्योंकि एक अर्थशास्त्री होने के नाते वे देश का आर्थिक विकास सुनिश्चित करते जिससे दलित व आदिवासी समाज देश की मुख्यधारा में शामिल हो जाता और उनके लिए आरक्षण की अवधि 10 वर्ष से अधिक बढ़ाने की आवश्यकता न होती। देश के राजनीतिक दलों को दलितों आदिवासियों और अल्पसंख्यकों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करने का अवसर न मिलता।

2. अंबेडकर जी का विचार था कि यदि देश का धर्म के आधार पर बंटवारा होना ही है तो जनसंख्या का सम्पूर्ण स्थानांतरण हो यदि वे देश के प्रधानमंत्री बनते तो पाकिस्तान बनने की दशा में देश की सारी मुस्लिम आबादी पाकिस्तान स्थानांतरित हो जाती तो भारत में हिंदू-मुस्लिम का झगड़ा ही नहीं होता और दोनों देश पड़ोसी मित्रों की तरह रहते और दोनों देशों को एक-दूसरे के विरुद्ध इस्तेमाल करने हेतु इतने भारी पैमाने पर हथियारों की खरीद-फरोख्त नहीं करनी पड़ती।

3. अंबेडकर जी शुरू से जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 लागू करने के विरुद्ध में थे और जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देना नहीं चाहते थे। ये दोनों ही काम पंडित नेहरू ने उनकी इच्छा के विरुद्ध किए और सभी जानते हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद का विषय कश्मीर घाटी ही रहा, परंतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की दृढ़ इच्छा शक्ति की वजह से वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया गया।

4. अंबेडकर प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की विदेश नीति के घोर आलोचक थे, वे चाहते थे कि भारत के आजाद होने के पश्चात् गुट निरपेक्ष आंदोलन में अहम भूमिका निभाने के बजाय दो महाशक्तियों यानि सोवियत संघ और अमेरिका के बीच चल रहे शीत युद्ध में अमेरिका के साथ हाथ मिलाते जिससे अमेरिका की सहायता से भारत का विकास होता और भारत को यूएन की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता मिल जाती और हम इतने सशक्त हो जाते कि चीन 1962 मे आक्रमण करके हमारी हजारों वर्ग किमी जमीन हथियाने का साहस न करता।

डॉ. अंबेडकर में प्रधानमंत्री बनने की सारी योग्यताएं होने के बावजूद अपने पूर्वाग्रह के कारण गांधी जी ने उन्हें देश का प्रधानमंत्री बनने का अवसर नहीं दिया। अन्यथा भारत के आर्थिक विकास की आधारशिला 50 और 60 के दशक में ही रख दी गई होती, जो काम अब 6 दशक के पश्चात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शिता पूर्ण कदम के कारण अब संभव हो पा रहा है। एक दलित को देश का प्रधानमंत्री बनाने का अवसर वर्ष 1980 में आया जब देश के सफल मंत्रियों में से एक बाबू जगजीवन राम को जनता पार्टी का नेता बनाया गया और वे सदन में अपना बहुमत साबित करने की स्थिति में थे पर श्रीमती इंदिरा गांधी और चौधरी चरण सिंह की सांठगांठ के कारण तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने जगजीवन राम को सरकार बनाने का अवसर देने के बजाय लोक सभा भंग कर दी, यदि दक्षिण अफ्रीका जैसे रंगभेद समर्थक देश में अश्वेत प्रधानमंत्री बन सकता है तो क्या कारण है कि भारत में आज तक दलित प्रधानमंत्री का बापू का सपना अधूरा है।

यदि हम जाति और संप्रदाय से दूर एक विकसित भारत की स्थापना करना चाहते हैं और देश को जाति पर आधारित आरक्षण की भरमार से बचना चाहते हैं तो दलितों अछूतों और आदिवासियों के प्रति पूर्वाग्रह से बचना होगा और जो भी दलित आदिवासी अपनी मेहनत और योग्यता के बल पर देश का नेतृत्व करने की स्थिति में हो उनके राह में रोड़े न अटकाएं जाएं, तभी हम एक जाति विहीन और धर्मनिरपेक्ष भारत की स्थापना कर सकेंगे। देश के कोने-कोने से जाति के आधार पर उठ रही मांगों पर विराम लगा सकेंगे और वर्तमान समय की यही आवश्यकता है।

मंगलवार, 14 नवंबर 2023

संघ कार्यकारी मंडल बैठक : देश की इतनी चिंता करने वाला संगठन फासिस्ट नहीं हो सकता

अवधेश कुमार 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की गुजरात के भुज में आयोजित बैठक से निकले संदेश को तटस्थता से समझने की आवश्यकता है। बैठक में संघ के कार्यों की दृष्टि से 45 प्रांतों व 11 क्षेत्रों के संघचालक, कार्यवाह, प्रचारक, अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य तथा कुछ विविध संगठनों के अखिल भारतीय संगठन मंत्रियों सहित 357 प्रतिनिधि उपस्थित रहे। हमारे देश में अनेक राजनीतिक दलों से लेकर, एक्टिविस्टों व पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग हमेशा संघ को विरोधी दृष्टिकोण से देखता और विचारता है और उनके व्यवहार में कई कारणों से बदलाव की संभावना अति क्षीण है। कुछ मुद्दों और विचार के स्तर पर मतभेद हो सकते हैं। आप यह सोचेंगे ही नहीं कि 98 वर्षों से सक्रिय संगठन धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए भारत से विश्व के अनेक देशों तक स्वयं या अपने अनुषांगिक संगठनों के साथ पहुंचा है तो उसमें अवश्य ही सकारात्मक पहलू होंगे आप सच्चाई तक नहीं पहुंच सकते। ऐसा नहीं होता तो जिस तरह कार्यकारी मंडल और उसके पूर्व की संघ की बैठकों से देश और समाज के लिए काम करने की ध्वनियां बाहर आईं कम से कम उसकी प्रशंसा नहीं तो समर्थन अवश्य किया जाता। पिछले एक वर्ष के संघ की अखिल भारतीय बैठकों और कार्यक्रमों में पारित प्रस्तावों और योजनाओं को देखें तो सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह नजर आती है कि वे यह निश्चय करते हैं कि हमें क्या करना है न कि सरकार यह करे। यही संघ को अन्य अनेक संगठनों से बिल्कुल अलग करता है। यद्यपि कार्यकारी मंडल में कोई प्रस्ताव पारित नहीं हुआ किंतु संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले द्वारा पत्रकार वार्ता में दिए गए वक्तव्यों से वर्तमान एवं भावी कार्यक्रमों की स्पष्ट रूपरेखा मिलती है।

वास्तव में इसमें ऐसी कई बातें हैं जिनका देश के दूसरे संगठनों को भी संज्ञान लेना चाहिए। उदाहरण के लिए होसबोले ने कहा कि देशभर में सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा की दृष्टि से सीमा जागरण मंच के माध्यम से इन क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधा, शिक्षा, सुरक्षा, स्वावलंबन, सहित नागरिक कर्तव्य के संबंध में प्रयास किए जाएंगे और इस कार्य को अधिक गति से आगे बढ़ाया जाएगा। देश के अनेक सीमावर्ती क्षेत्र कई कारणों से ऐसी सामान्य जीवन की समस्याओं से जूझते रहे हैं। सरकार भी अपने स्तर से सीमावर्ती क्षेत्र के लोगों के सामाजिक आर्थिक विकास एवं आम समस्याओं के समाधान की कोशिश कर रही है। यह पर्याप्त नहीं है जो सुरक्षा के लिए भी जोखिम भरी है। सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थानीय नागरिक एवं सुरक्षा तंत्र के साथ सामंजस्य बढ़ाने के लिए भी विशेष प्रयत्न किये जाने की बात उन्होंने कही। जब आप धरातल पर काम करते हैं आपके पास कई प्रकार की सूचनाओं अपने आप आती हैं,उससे संबंधित सरकारी विभाग तक पहुंचने से उनका समाधान होता है और सुरक्षा भी सशक्त होती है। देश की चिंता करने वाले किसी संगठन की यही उपयुक्त भूमिका हो सकती है। उन्होंने अन्य संगठनों की तरह इसके लिए सरकार और प्रशासन से कोई विशेष मांग नहीं की। यानी संगठन अपने स्तर से इस दिशा में काम करेगा। स्वाभाविक ही उसमें सरकारी सहयोग मिल सकता है तो लिया जाएगा। सरकार को केंद्र में रखकर कोई योजना नहीं बनी है।  संघ शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ रहा है जिसकी दृष्टि से उसकी बैठकों में कुछ न कुछ बातें सामने आती है। शताब्दी वर्ष में सामाजिक समरसता, ग्राम विकास, पर्यावरण संरक्षण, गौ-सेवा एवं परिवार प्रबोधन जैसे विषय आग्रहपूर्वक समाज के समक्ष रखने का ही कार्यक्रम है। सामाजिक समरसता के कार्यक्रम में स्वयंसेवक समाज को जोड़ने का अभियान चला रहे हैं तो परिवार प्रबोधन के द्वारा परिवारों को सांस्कृतिक मूल्यों के साथ आवद्ध रखने का लक्ष्य है। इसी तरह पर्यावरण रक्षा के कई कर्मों में वृक्ष लगाने और पॉलिथीन के उपयोग को कम करने तथा जल संरक्षण पर फोकस किया जा रहा है। राजस्थान में संघ दृष्टि से जोधपुर प्रांत , जो प्रदेश का एक तिहाई हिस्सा है, उसमें संघ के कार्यकर्ताओं ने 14,000 किमी यात्रा कर 15 लाख पेड़ लगाए। कर्नाटक में सीड बॉल पद्धति से एक करोड़ पौधे लगाने के लक्ष्य पर काम हो रहा है। जो संगठन ऐसे कार्यों के लिए अपने स्वयंसेवकों को प्रेरित करता है और शताब्दी वर्ष में भी इसे ही आगे बढ़ता है उसे आप किस श्रेणी में रखेंगे? कोई फासिस्ट या सांप्रदायिक संगठन इस तरह के कार्यक्रम और अभियान नहीं चला सकता।

लव जिहाद भारत में अब एक बड़ा मुद्दा हो चुका है और स्वभाविक ही संघ उस पर काम कर रहा है। किंतु जब लड़कियां उन संबंधों से बाहर आती हैं उनमें से अनेक परिवार ही उन्हें स्वीकार नहीं करते। संघ महिलाओं के पुनर्वास पर काम कर रहा है। विरोध या मुकदमे से आप किसी को मुक्त करा देंगे लेकिन आगे उनकी जिंदगी कैसे चले यह महत्वपूर्ण विषय है। संघ इस पर काम कर रहा है तो निश्चय ही आने वाले समय में ऐसी लड़कियों और महिलाओं के अंदर असुरक्षा बोध नहीं रहेगा। संघ की एक विशेषता समय-समय पर अपने कार्यों और गतिविधियों की समीक्षा तथा उनमें मूल्य लक्ष्य का ध्यान रखते हुए आवश्यक संशोधन और बदलाव करना है। संघ के प्रशिक्षण वर्गों में बदलाव इसी का प्रमाण है। जैसा दत्तात्रेय होसबोले ने बताया अब हर आयु वर्ग के लिए अलग-अलग पाठ्यक्रम होंगे। संघ के कार्यकर्ता समाज के सभी क्षेत्रों में काम कर रहे हैं इसलिए परंपरागत बौद्धिक और शारीरिक के अतिरिक्त उनकी रुचि के अनुरूप क्षेत्र से संबंधित प्रशिक्षण दिया जाएगा। तत्काल यह सकारात्मक बदलाव दिखता है। इसका अर्थ है कि संघ ऐसे कार्यकर्ताओं का समूह तैयार करने की कोशिश कर रहा है जिनमें हर क्षेत्र का आवश्यक व्यवहारिक ज्ञान और कार्य करने का अनुभव वाले हों। स्वाभाविक ही ऐसे कार्यकर्ताओं की संख्या जितनी बढ़ेगी संघ की पहुंच उतने ही परिवार और लोगों तक होगी।

जैसा हम जानते हैं 22 जनवरी, 2023 को राम जन्मभूमि मंदिर में श्रीराम की मूर्ति प्रतिस्थापित होने वाली है। मंदिर निर्माण आंदोलन में संघ की प्रमुख भूमिका रही है, इसलिए यह अवसर उसके लिए संपूर्ण भारत और विश्व भर में फैले हिंदुओं को इससे भावनात्मक रूप से जोड़ने का है। उसके लिए स्वयंसेवक 1 से 15 जनवरी तक अधिक से अधिक परिवारों तक पूजित अक्षत और श्रीराम की तस्वीर लेकर जाने वाले हैं। श्री राम मंदिर संबंधी संघ के विचारों को देखें तो साफ हो जाएगा कि यह केवल एक मंदिर का नहीं बल्कि भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आंदोलन था। श्रीराम को आदर्श मानकर भारत के लोग जीने और काम करने की प्रेरणा लें यह संदेश कायम रखने की यह कोशिश है।कार्यकारी मंडल से निकले संदेशों और कार्यक्रमों की वस्तुनिष्ठ समीक्षा करें तो जिस तरह का संदेहजनक माहौल संघ को लेकर एक बड़ा वर्ग बनाता है वह निराधार साबित हो जाएगा। बनाई जा रही धारणाओं के विपरीत राजनीति का कोई बिंदु नहीं तथा विरोधियों के प्रति किसी तरह के विरोध का वक्तव्य भी नहीं। बड़े और दुरगामी लक्ष्य से काम करने वाले संतुलित संगठन का यही चरित्र हो सकता है। आप विरोधियों को प्रत्युत्तर देने या उनसे संघर्ष में उलझ गए तो फिर लक्ष्य बाधित हो जाता है। ये सब थे वो भीमैं ये में में भी में भी बड़ी सी ये ये सब कुछ भी थे ये थे उसके थे ये सब ही ये सबअन्य संगठन भी संघ के इस आचरण को चरित्र में अपना लें तो पूरे देश का माहौल सकारात्मक बनेगा तथा अनावश्यक तनाव और टकराव में कमी आएगी। विचारधारा के स्तर पर आपको लगता है कि संघ से सहमति नहीं हो सकती तो भी उसे समझिए, अपनी असहमति व्यक्त करिए किंतु दुश्मनी, घृणा और जुगुप्सा के व्यवहार से बाहर निकलिए।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली 110092, मोबाइल- 98110 27208

शुक्रवार, 10 नवंबर 2023

मुफ्त राशन वितरण योजना पर राजनीति

बसंत कुमार

इस समय देश में पांच राज्यों के विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं और वोटरों को आकर्षित करने के उद्देश्य से हर राजनीतिक दल चुनावी रेवड़ियां बांटने के चुनावी वायदों की झड़ी लगा रहा है। ऐसे चुनावी वातावरण में छत्तीसगढ़ की एक चुनावी सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा कर दी कि देश के 81 करोड़ गरीबों को दी जाने वाली मुफ्त अनाज वितरण योजना पांच वर्ष तक जारी रहेगी। प्रधानमंत्री के इस भाषण के बाद केंद्र सरकार के कई वरिष्ठ मंत्रियों ने ट्वीट करके वाहवाही लूटने की कोशिश की, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने इसे चुनावी रेवड़ी मानकार इसकी शिकायत चुनाव आयोग से करने का फैसला किया। इसके बाद आर्थिक जानकारों के बीच यह बहस छिड़ गई कि विश्व की पांचवीं आर्थिक महाशक्ति का दावा करने वाले देश में 81 करोड़ से अधिक जनसंख्या बीपीएल कार्ड धारक हैं और मुफ्त अन्न वितरण योजना का लाभ उठाने के हकदार हैं अर्थात जिस देश की आबादी 141 करोड़ हो और उसमें से 81 करोड़ (58%) लोग अपना पेट भरने के लिए मुफ्त अन्न वितरण योजना पर निर्भर करते हो तो उस देश को विश्व की पांचवीं आर्थिक महाशक्ति कैसे माना जा सकता है।

ताजा आंकड़ों के अनुसार ऐसे लाभार्थियों की संख्या बढ़कर 81.35 करोड़ हो गई है और नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट की शुरुआत वर्ष 2013 में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने की थी। इस योजना के तहत बीपीएल कार्ड धारकों को एक रुपए किलो गेहूँ और तीन रुपए किलो चावल देने की बात की गई थी। इसके तहत प्रति व्यक्ति को हर माह 5 किलो अनाज मिलता था फिर नरेंद्र मोदीजी की सरकार अंत्योदय योजना लेकर आई जिसमें 35 किलो अनाज की सीमा निर्धारित की गई, फ्री राशन योजना इस वर्ष दिसंबर में समाप्त होने वाली थी जिसे अब प्रधानमंत्री ने इसे पांच वर्ष के लिए बढ़ा दिया है। पौने दो लाख करोड़ की राहत से यह योजना शुरू की गई थी, निश्चित तौर पर यह योजना कोरोना काल में गरीब परिवारों को मुसीबत की घड़ी में बहुत कामयाब रही परंतु इस योजना के चलते अधिकांश लोगों के घर बैठने की प्रवृत्ति के कारण मजदूरों की कमी से छोटे और मझोले उद्यमों को बहुत झटका लगा है तब इस योजना की उपयोगिता पर प्रश्न खड़ा करना जायज लगता है।

प्रश्न यह है कि देश के मध्यम वर्ग के बूते पर करोड़ों लोगो को फ्री राशन मिलेगा। भोजन की गारंटी देना किसी भी जन कल्याणकारी सरकार की अहम् जिम्मेदारी है पर उसके लिए मध्यम वर्ग की जेब काटना कोई भी समझदारी नहीं है। फ्री राशन और हर चीजों पर सब्सिडी देने से करोड़ों की आबादी नकारा बन जाती है पर हमारे देश में सरकारों द्वारा वोट पाने के लिए फ्री राशन और फ्री भोजन की योजनाएं चलाई जा रही हैं जबकि होना यह चाहिए कि सबको शिक्षा और स्वास्थ के साथ-साथ रोजगार की गारंटी दी जानी चाहिए। इस बारे में मुगलकाल में उप्र की राजधानी लखनऊ स्थित इमाम बाड़ा के निर्माण की कहानी से प्रेरणा ली जानी चाहिए, इसका निर्माण 1784 में अवध के नवाब आसिफउद्दौला ने अकाल के दौरान इसलिए कराया था कि लोगों को रोजगार मिल सके, दिन में इसका निर्माण होता और रात में इसे गिरा दिया जाता, कहते हैं कि इस इमाम बाड़ा का निर्माण और अकाल, 11 साल तक चला, इमाम बाड़े के निर्माण में करीब 20000 श्रमिक शामिल थे और इसके निर्माण में उस जमाने में 8 से 10 लाख रुपए की लागत आई पर नवाब ने अकाल के समय काम दिया पर खैरात नहीं दी।

अब राजनीतिक दलों के लिए यह नुस्खा बन गया है कि मुफ्त राशन, सस्ते भोजन की घोषणाएं करो और जब किसी को मुफ्त भोजन मिलेगा तो वह काम क्यों करेगा। देश में पहले विकसित देशों की कंपनिया आकर कारखाने लगाती थीं इससे मजदूरों को बेहतर रोजगार मिलता था और उनके जीवन का स्तर ऊपर उठता था क्योंकि विकसित देशों में आबादी कम होने के कारण मजदूर बहुत महंगे मिलते थे इसलिए ये कंपनियां भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश की तरफ रुख करती थीं परंतु अब भारत में मुफ्त राशन मिलने से यहां के मजदूर कामचोरी करने लगे हैं। अब उनके लिए काम हो या न हो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उन्हें अब मुफ्त का राशन मिल ही रहा है। अब तो शहरों के छोटे कारखाने के लिए मजदूर मिलना बहुत मुश्किल हो गया है क्योंकि जो लोग कोरोना काल में शहरों को छोड़कर गांवों में पलायन कर गए थे वे फिर वापस नहीं आये।

दुर्भाग्य यह है कि मुफ्त राशन और फ्री बिजली बांटने का काम हर राजनीतिक दल कर रहा है, इस समय मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान जैसे राज्यों में विधानसभा चुनावों के दौरान सभी पार्टियों में परस्पर होड़ मची हुई है कि कि मुफ्त बिजली, मुफ्त भोजन बांटने की घोषणा में कौन किससे आगे दिख रहा है। दिल्ली में तो मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उत्तर भारतीय वोटरों को मुफ्त राशन, मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, महिलाओं के लिए मुफ्त डीटीसी बस कि ऐसी आदत डाली कि उसके बुते पर वे दो बार से लगातार एकक्षत्र राज कर रहे हैं। उनकी देखा-देखी कांग्रेस और भाजपा सहित सभी राजनीतिक दल यह सीखने की कोशिश कर रहे हैं कि मुफ्तखोरी की लालच से वोटरों को पटाया जाए। अब वोटरों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि इस सरकार के कई मंत्री भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में हैं क्योंकि जनता को फ्री की रेवड़ी खाने की आदत पड़ गई है। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि लोग गांव के कोटेदार के यहां अपनी चौपहियां गाड़ी से बीपीएल कार्ड पर मुफ्त राशन लेने जाते हैं। ये तथ्य हमारी व्यवस्था में भारी पैमाने पर हो रहे भ्रष्टाचार की ओर इशारा करते हैं और इसी कारण देशभर में गरीबों के लिए प्रारंभ की गई योजनाओं का लाभ लाखों की गाड़ियों में घूमने वाले और करोड़ों के घरों में रहने वाले लोग उठाते हैं। फिर भी गरीबों को दी जाने वाली मुफ्त राशन वितरण कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों की संख्या 81 करोड़ से अधिक हो जाना सचमुच चिंता की बात है आखिर देश में मुफ्त रेवड़ी बांटने की प्रथा कब खत्म होगी।

(लेखक भारत सरकार में उप सचिव पद पर रह चुके हैं।)

मंगलवार, 7 नवंबर 2023

हिन्दी के वैश्वीकरण का वर्तमान

मीना शर्मा

20वीं सदी के अंतिम दशक में उत्पन्न क्रांतिकारी नव तकनीक क्रांति, संचार क्रांति सूचना क्रांति उदारीकरण, बाजारीकरण, भूमंडलीकरण ने समूचे वैश्विक परिदृश्य को बदलकर रख दिया। सवाल यहाँ पर यह है कि भारतीय परिदृश्य और अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य में समग्र बदलाव के बीच हिन्दी स्वयं को कहाँ खड़ा पाती है? तमाम उथल-पुथल के बीच नवीन चुनौतियों के बीच हिन्दी की अपनी भूमिका क्या रही? वर्तमान के वैश्वीकरण की ऐतिहासिक शक्तियों का सामना हिन्दी ने कैसे किया। तभी हम हिन्दी के वैश्वीकरण के वर्तमान का सही आकलन एवं सही तस्वीर को समझ पाएंगे।
सभागार में उपस्थित प्रिय बुद्धिजीवी साथियों, संकट और सृजन में एक गहरा अन्त: संबंध होता है, एक रचनात्मक संबंध होता है। संकट के गर्भ से ही सृजन का जन्म होता है। कुछ ऐसा ही रचनात्मक रिश्ता हिन्दी का वैश्वीकरण के साथ रहा है। संकट के समय कछुआ सिमट या सिकुड़ जाता है लेकिन हिन्दी की अपनी कहानी है, अलग दर्शन है। वैश्विक सिकुड़न की बेला में कछुआ धर्म के विपरीत हिन्दी विस्तार के रास्ते पर चलती है। बदले हुए परिदृश्य में और बदलाव की घड़ी में हिन्दी अपनी एक रचनात्मक भूमिका निभाती है। वक्त का दामन थामकर वैश्विक बदलाव के लिए हिन्दी खुद को प्रस्तुत करती है, बदलाव के लिए तैयार होकर हिन्दी अपना कदम ताल मिलाती है। हिन्दी अपनी जिजीविषा शक्ति और युगानुसरण की क्षमता, उत्तरोत्तर बदलती हुई स्थितियों के साथ सामंजस्य स्थापित करने की क्षमता, अपनी उदारता एवं लोचदार गुणों के साथ अनुकूलन की क्षमता के साथ बाजार और संसार से खुद को कनेक्ट करती है। इस कार्य मे हिन्दी ने सूचना-संचार, तकनीक, हिन्दी फिल्म्स, हिन्दी गीत-संगीत, मनोरंजन, स्पोट्स, वैश्वीकरण प्रक्रिया और मीडिया जैसे सशक्त माध्यम का साथ लेकर अपना सफर तय किया है। 
आज चीन जैसे देश में भी हिन्दी का मार्केट है, जिसमें फिल्म 'दंगल' 2000 करोड़ का आंकड़ा पार करते हुए भाषा और समाज के बीच सतत् परिवर्तनशील और गतिशील संबंधों को धारण कर हिन्दी अपना सामर्थ्य दिखलाते हुए लोकल से ग्लोबल और राष्ट्रीय से अन्तरर्राष्ट्रीय व्याप्ति दिखाते हुए सात समुन्दर पार तक अपना साम्राज्य विस्तार कायम कर चुकी है। नये विभावों के साथ भावों के सामंजस्य स्थापित करने का जो सौन्दर्य, जो संतुलन, जो सामर्थ्य, जो सरवाइवल इंस्टिक्ट जो क्षमता हिन्दी के पास है, वह किसी अन्य भाषा में दुलर्भ है। मुझे यहाँ पर अनायास महान वैज्ञानिक चॉर्ल्स डारविन की इस उक्ति का स्मरण हो रहा है कि सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट हिन्दी अपने आपको इस कसौटी पर शत-प्रतिशत खड़ा साबित करती है, जो फिट भी है और हिट भी है। 
आजकल फिटनेस को चैलेंज करने का एक नया चलन शुरू हुआ है। विराट कोहली पीएम मोदी को चैलेंज करते हैं तो पीएम मोदी उस चैलेंज को एक्सेप्ट करते हैं, फिर आगे कुछ लोग तेल की बढ़ी करते हैं, कीमतों, रोजगार आदि मसले पर पीएम मोदी को चैलेंज करते हैं, खैर, बात यहाँ इस बात की नहीं है कि कौन किसको किस मसले पर चैलेंज कर रहा है, बात यहाँ चैलेंज की है और हिन्दी ने अपने भीतर दृश्य-अदृश्य ऐतिहासिक शक्तियों के तमाम चैलेंज को हमेशा स्वीकार कर, देशी और विदेशी को साधकर, देशी भारतीय भाषाओं के साथ-साथ विदेशी भाषाओं के साथ, समस्त देशवासियों के साथ-साथ करोडो प्रवासी भारतीयों के साथ, समस्त राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ने के लिए भारतीय अस्मिता के साथ-साथ, पूरे विश्व में फैले भारतीयों को जड़िने एवं संपर्क स्थापित करने के लिए एशियाई अस्मिता से जोड़ने के लिए संपर्क भाषा के तौर पर, हिन्दी लिंक लैंग्वेज के तौर पर सेतू के रूप में एक सूत्र में जोड़ने वाली, पिरोने वाली एक ऐसी भाषा के रूप में उभरकर सामने आयी है जो केवल एक भाषा नहीं है, बल्कि अनेक भाषाओं से निर्मित एक भाषा है। इस भाषा का श्रृंगार अन्य भारतीय भाषाओं/विदेशी भाषाओं ने स्वयं अपने हाथों से किया है। इसीलिए हिन्दी इतनी सुन्दर है, क्योंकि सभी का इसमें कुछ-न-कुछ है और हिन्दी भी सबकी है, सो अबकी बार हिन्दी सरकार।" जिसमें सबका सहकार है, जिसमें सबका सरोकार है। 
हिन्दी की महानता एवं विराटता का रहस्य, यही आदान-प्रदान की शक्ति और लोचदार है। जिसमें कई नदियां आकर मिलती हैं और फिर यही नदियां संसार रूपी सागर से मिलती हैं तभी तो सात समुन्दर पार भी हिन्दी का परचम आज लहरा रहा है, जो अपने भीतर लोकतांत्रिक और वैश्विक मानवीय संवेदना को धारण कर विश्वव्यापी सत्ता कायम करने की राह पर निकल चुका हिन्दी है। हीनता और पराधीनता भाव से मुक्त आज की आत्म-विश्वास से लबालब है, जिसके प्रति विश्व में गौरव और सम्मान बढ़ा है, कुछ हम भी कर लें। क्योंकि पूरे कमी हमारी हिन्दी भाषा में नहीं, हममें है। हमारी सोच में है, घर की मुर्थी बसबर जो समझते हैं, इसीलिए इस सोच के बारे में सोचें, थोड़ी सोच को स्वच्छ कर लें।

गुरुवार, 2 नवंबर 2023

आखिर एक आधुनिक भारत की स्थापना हम क्यों नहीं कर पा रहे हैं

बसंत कुमार

जीवन की आखिरी संध्या पर व्यक्ति जीवन मे हानि लाभ का गुणा भाग करने के बजाय अपना ब्लड प्रेशर ठीक करने के लिए ऐसा वातावरण चाहते है जहा घंटे दो घंटे खुश रहे और हमने चार पांच दोस्तो ने शाम को टहलने  के बहने अपने बैठने का बंदोबस्त कर लिया जहा गप्पे मारना खुश रहना और टेंशन को दूर रखना ही हमारा ध्येय होता और यकीन मानिये शाम को घर जाते समय सबका बी पी समान्य होता जबकि एकाध अपवाद को छोड़कर सबकी उम्र 65 से 80 के बीच होती,कुछ दिन बाद एक मेम्बर और जुड़ गए अच्छा लगा की हमारी संख्या बढ़ी पर पता लगा कि वो गाव इसलिए नही जाना चाहते क्योकि वे अम्बेडकर के लोगो का व्यवहार बर्दाश्त नही कर पाते कभी उन्हे यह दर्द सताता कि दलित उनके यहा बरही/तेराही मे भोज मे बुलाने पर इसलिए नही आते कि खाने के बाद उन्हे पत्तल् फेकना पड़ेगा हमारे क्लब के नये सदस्य की इन शंकाओ ने यह सोचने को मजबूर कर दिया कि क्या कारण है हम एक आधुनिक भारत का निर्माण नही कर पा रहे है।
संविधान निर्माता डा अम्बेडकर जीवन पर्यंत एक अखंड भारत का निर्माण करना चाहते थे, इसी कारण जब वर्ष 1927 मे ब्रिटिश हुकूमत ने मुसलमानो के साथ दलितो के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों की बात की और डा अम्बेडकर मुस्लिम लीग की तरह अछूतो के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की बात मान लेते तो पाकिस्तान की तर्ज पर देश का एक और विभाजन होता तो देश की स्थिति और विकट हो जाती! भारत की एकता हेतु उन्होंने गाँधी के साथ 1932 मे पूना पैक्ट किया और बटवारे के बाद भी अछूत भारत का हिस्सा बने रहे और उनके विकाश के लिए संविधान मे अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियो के लिए आरक्षण का प्रविधान किया गया! परन्तु कुछ रुढिवादी लोग देश मे आरक्षण के लिए डा अम्बेडकर को दोषी मानते है जबकि वस्तविकता यह है कि डा अम्बेडकर ने देश को एक और विभाजन से बचा लिया था! यदि विभाजन की सूरत मे धार्मिक आधार पूर्ण जनसंख्या की अदला बदली की उनकी बात मान ली गयी होती तो देश मे आज इस तरह के साम्प्रदायिक तनाव नही होता।
किसी भी देश और समाज मे समता, समानता, स्वतंत्रता और न्याय जैसे मानवीय मूल्य काफी महत्व रखते है , बाबा साहब अम्बेडकर ऐसे ही मानवीय मुल्यो का भारत देखना चाहते थे- जहा समता हो, बराबरी, सभी नागरिको को, सभी नागरिको को स्वतंत्रता हो और सभी मे बंधुत्व की भावना हो! क्षेत्र भाषा जाति लिंग् आदि के आधार पर कोई भेद भाव न हो, जहा महिलाओ का सम्मान हो, विविधता मे एकता हो! ऐसे वातावरण मे देश निश्चित रूप मे चहुंमुखी विकाश कर सकता है, परंतु भारतीय समाज मे हर क्षेत्र मे असमानता दिखाई देती है, हमारा समाज धर्मो और जातियों मे बटा है, यहाँ लोग पहले हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन समझते है और उसके बाद भारतीय है, भले ही यहाँ सबको अपना धर्म अपनाने की आजादी है पर यहाँ मजहब के नाम पर दंगे होते रहते है और फासी वादी तiकतो को किसी दलित द्वारा जाति वाद से असंतुष्ट होकर अपना धर्म त्याग कर दूसरा धर्म अपना लेने पर बर्दास्त नही होता होता है, आज भी विद्यालयो मे जाति के नाम पर छात्रावiस बन रहे है और आये दिन जाति के नाम पर सम्मेलन आयोजित होते रहते है कहने का तात्पर्य है कि पूरा हिंदू समाज जातियों मे बटा हुआ है!
जहां तक आर्थिक स्थिति की बात है तो भारतीय समाज मे आर्थिक समानता अपने विकराल रूप मे है! वैश्विक असमानता रिपोर्ट के मुताबिक 10% भारतीय आवादी के पास कुल राष्ट्रीय आय का 57% हिस्सा है,  इन 10% मे 1% के पास 22% हिस्सा है, वही निचली 50% आवादी के पास केवल 13% हिस्सा है!  नीति आयोग की गरीबी सूचकांक(एम पी आई) रिपोर्ट के अनुसार उ प, बिहार और मध्य प्रदेश के 10 संयुक्त जिलों मे अन्य राज्यो के मुकाबले बेहद गरीबी है!  यह पहली एम पी आई रिपोर्ट है जिसके अनुसार ये गरीबी अनुपात करीब 25.01% है। बिहार मे लगभग51. 91% आबादी बहु आयामी गरीब है, इसी प्रकार यू पी के तीन जिलों मे गरीबी 70% है, मध्य प्रदेश के तीन जिलों मे गरीबी अनुपात, 60% है।
डाॅ. अम्बेडकर भारतीय समाज को वैज्ञानिक चेतना से लैश देखना चाहते थे पर 21 वी शताब्दी मे भी भरतीय समाज मे अंध विश्वास व्याप्त है और अंध विश्वास के प्रति लोगो की आसथा और बढ़ती जा रही है कभी कभी तो आदिवासी और शैक्षिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों मे महिलाओ को डायन कह कर मार दिया जाता है मासूम बच्चो की बलि दे दी जाती है, धर्म के नाम पर लोग मरने को उतारू हो जाते है, इसलिए डा अम्बेडकर ने शिक्षा पर जोर दिया और वे चाहते थे कि लोग शिक्षित होकर चेतन शील बने, वैज्ञानिक चेतना को जगाये, अंधविश्वास को दूर भगाये और अपने जीवन को बेहतर बनाये।
आज की राजनीति मे जिस तरह से धर्म और पूजी का इस्तेमाल हो रहा है वह हमारे संविधान और लोक तंत्र के लिए खतरनाख है, यहाँ राजनीतिक दल बiकायदा से समीकरण बनाते है कि इतने फिसदी वोट हिंदुओ के होंगे, इतने दलितो के, इतने मुसलमानो, सिखों के आदि, यही कारण है कि यहाँ पर धर्म और जाति के आधार पर ध्रुवीकरण किया जाता है, नेताओ और पूजी पतियों के गठजोड़ के चलते आम नागरिको के हितो का दोहन होता है! जब राजनीति अपने साथ धर्म और पूजी दोनों को एक साथ ले लेती है तो लोकतंत्र के विरुद्ध एक सशक्त त्रिभुज बनता है और मीडिया इस त्रिभुज को चतुर्भुज बनाने मे इनके साथ होता है और देश की गरीब जनता चौतरफा मार झेलने को मजबूर होती है और इसके परिणाम स्वरूप अम्बेडकर और संविधान सभा के सदस्यों के सपनो का भारत ध्वस्त हो रहा है, संविधान का नुक्सान हो रहा है और लोकतंiत्रिक् मुल्यो का ह्रास हो रहा है! मसल पॉवर और मनी पॉवर के अपवित्र गठजोड़ के कारण देश का लोकतंत्र तानाशाही मे बदल रहा है।

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