बुधवार, 27 सितंबर 2023

स्त्री-चेतना: स्वानुभूति बनाम सहानुभूति

 मीना शर्मा

सत्य क्या है? चेतना क्या है? सत्य स्त्रीलिंग है अथवा पुलिंग या उभयलिंग? चेतना स्त्री की है? चेतना पुरुष की है? अथवा चेतना मनुष्य मात्र की (मानवीय) है? सत्य भक्ति का होता है? सत्य रचयिता का होता है? सत्य पाठक का होता है? सत्य सार्वभौम होता है अथवा सत्य विशिष्ट होता है? या सत्य इनमें से कोई भी नहीं होता है? या सत्य समन्वित निर्मिति है। ऐसे अनगिनत प्रश्नों की वर्षा होने लगती है जब हम सत्य को खंगालना शुरू करते हैं और सत्य को खंगालाना भी जरूरी है, क्योंकि इसी से जुड़ा है अनुभूति का सत्य। अपनी अनुभूति (स्वानुभूति) सत्य है अथवा अनुभूति - सामर्थ्य के सहारे दूसरे की अनुभूति तक पहुंचकर सत्य का साक्षात्कार करना यानी सह- अनुभूति, समान अनुभूति के सत्य को उपलब्ध करना सत्य है। दूसरे शब्दों में क्या सह अनुभूति (सहानुभूति) सत्य है? ये इतने सारे सवाल क्यों? तो उत्तर यह है कि सत्य की उपलब्धि का दावा सभी करते हैं और प्रत्येक दावा करने वाला अपने सत्य को परम सत्य और अन्तिम सत्य मानने लगता है, परम ब्रह्म की तरह और फिर इस परमब्रह्म का परमज्ञानी दूसरे के सत्य को अंतिम सत्य भी नहीं मानता तो फिर निर्णय कैसे हो? झगड़ा और विवाद की जड़ यही है कि मेरा सत्य और तेरा सत्य, मेरी अनुभूति और तेरी अनुभूति, स्वानुभूति और सहानुभूति, रचनाकार और भोक्ता का सत्य, स्त्री लेखक का सत्य और लेखक का सत्य।
इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि सत्य क्या है, वह महत्त्वपूर्ण नहीं है, सत्य को कौन देख रहा है यह महत्त्वपूर्ण है किस चश्मे से सत्य को देखा जा रहा है, वह चश्मा सत्य को निर्धारित करता है। आदमी की निगाह में औरत का सत्य बनाम औरत की निगाह में औरत का सत्य, दोनों सत्य में से किसका सत्य मान्य और किसका सत्य अमान्य हो, यह कौन तय करेगा, आदमी या औरत ? पुरुष लेखक होकर भी पहले पुरुष है तो वहीं स्त्री लेखक होकर भी पहले वह स्त्री है, तो क्या अपने-अपने पूर्वाग्रह के साथ इस सत्योपलब्धि की प्रक्रिया में अनायास अथवा सायास चले आते हैं और इस कारण सामने वाले के सत्य को लिंग भेद, स्थिति भेद, अनुभूति भेद, अनुभव भेद के आधार पर हम स्वीकार नहीं करते हैं अथवा महजीह नहीं देते हैं। दोनों एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने लगते हैं, एक दूसरे के सत्य को स्वीकार अथवा अस्वीकार करने के तर्क रखते हैं, उसका लॉजिकल फार्मूला स्त्री के अलग प्रजाति होने के आधार पर देते है-
'हर स्त्री मनुष्य है-
किन्तु हर मनुष्य स्त्री नहीं।'
इस तर्क को थोड़ा और बारीक करते हैं कि हर मनुष्य तो क्या, कोई भी स्त्री मनुष्य नहीं होती। अगर स्त्री मनुष्य होती तो उसकी मानव सत्ता अक्षुण्ण रहती, उसकी जैविक सत्ता के साथ-साथ। किन्तु स्त्री की मानव सत्ता की सर्वस्वीकार्यता कारिता होती तो फिर उसे उपनिवेश की श्रेणी में क्यों रखतो उसे परजीवी क्यों मानते, उसका दोयम दर्जा क्यों मानते? उसे वस्तु 'अन्या' आदि की श्रेणी में क्यों रखते? निम्नलिखित कथन को पढ़कर तो इसी तथ्य की पुष्टि होती है- "दरअसल भारतीय समाज में औरत और दलित दोनों ही परजीवी हैं। दोनों अपने जन्म के कारण ही भेदभावपूर्ण व्यवहार के शिकार होते हैं। दलितों के साथ जन्म-परक भेदभाव, एक वर्गीय व्यवस्था, ऊँची-नीच मालिक-गुलाम, विजेता-विजित आदि एक राजनीतिक साजिश का परिणाम है जो मनु की आचार संहिता पर आधारित सामन्ती/वर्ण-व्यवस्था के कारण घटित हुआ है। यह केवल भारत में ही है। औरत के साथ यह भेदभाव उसके स्त्री होने के कारण होता है, चाहे वह ऊंचे वर्ग की हो या निम्न- सर्वहारा वर्ग की, यानी गरीब हो या अमीर, गोरी या पीली अथवा काली या किसी भी रंग की हो, चपटी नाकवाली हो या चपटे माथे वाली या तीखी रोमन नाक वाली हिंदू हो या मुसलमान, ईसाई हो या यहूदी, पूरब की हो या पश्चिमी की स्त्री जाति में जन्म लेने वाली यानी स्त्री प्रजाति की होने के कारण ही उसे विश्व भर में दोयम दर्जा ही दिया जाता रहा है।

औरत, औरत होने के कारण यदि कमतर है तो एक बात है, ऊपर से यदि यह दलित जाति से ताल्लुक रखती है, उससे भी बड़ी बात, साथ ही यदि वह गरीब भी हो तो फिर तो वह उपनिवेश -द-उपनिवेश के चक्रव्यूह फंसी स्त्री हुई। यानी लिंग, जाति, वर्ग जैसी भिन्न स्थितियों में जाने वाली स्त्रियों को क्या पितृसत्ता एक ही प्रकार की प्रकटित करेगी? ऊपर से यदि वह स्त्री पिछड़ी जाति की निरक्षर, बेसहारा स्त्री हुई तब क्या होगा? शायद गांव का काई दबंग डायन, चुड़ैल बताकर निर्वस्त्र करके गांव में घुमाए अथवा बलात्कार आदि घटना को अंजाम देकर, काटकर नदी में बहा दे, तो क्या उस स्त्री की स्वानुभूति को उसी लिंग की कोई महानगरीय संभांत उच्च जाति की महिला 2000 किमी दूर वातानुकूलित कक्ष में बैठकर अपनी अनुभूति को उस पीड़ित महिला की अनुभूति के साथ समरूप कर सकती है? या फिर सिर्फ अपनी तरफ से सहानुभूति ही व्यक्त कर सकती है यानी एक महिला एक का ही सत्य (स्वानुभूति) दूसरी महिला का सत्य (सहानुभूति) नहीं बन पाता, तो ऐसी स्थिति मतें फिर कोई पुरुष उस पीड़ित महिला के दर्द की अनुभूति बयान करें तो वह अकेला 'हाऊटसाइडर कैसे? यह पुरुष भी तो उस पीड़ित महिला के साथ सहानुभूति ही तो व्यक्त करता है दूसरी स्त्री महिला लेखक के समान क्या सिर्फ लिंग एक होने से अनुभूति भी एक हो जाती है? सत्य भी एक हो जाता है? एक की स्वानुभूति दूसरे की स्वानुभूति हो पाती है क्यों?
अतएव जब स्त्री विमर्श की बात आती है तो पुरुष लेखक बाहरी कैसे? और स्त्री लेखक ही हमेशा हर स्थिति में अन्तरंग कैसे? फिर एक स्त्री भी पुरुष के चश्मे से स्त्री के सत्य को देख सकती/देखती है। यही बात दलित विमर्श के सन्दर्भ में भी उठता है स्वानुभूति और सहानुभूति का मसला वहां भी है, किन्तु दलितों में एलीट' वहां भी है, जो उससे अपनी वर्गीय हैसियत के कारण उतना ही दूसरी बनाकर रखता है जैसे वर्णव्यवस्था में एक सवर्ण व्यक्ति किसी अवर्ण व्यक्ति के साथ रखता था। वह 'एलीट उस गरीब के साथ खान-पान, उठ-बैठ, विवाह-रिश्ते, आना-जाना आदि मामलों में उसकी तरफ हिकारत भरी नजरों से देखता है। साथ ही दलितों के भीतर भी जाति-व्यवस्था उतनी ही कठोर (क्रूर नहीं क्योंकि यहाँ जान लेने वाला मसला नहीं है।) नियम का पालन कर अपनी विशिष्टता, पृथकता को बनाए रखना चाहता है। तो फिर क्या यह एलीट दलित व्यक्ति उस गरीब व्यक्ति के अन्तःकरण का साक्षात्कार उस स्वानुभूति की तीव्रता और गहराई के साथ कर पाएगा जैसा कि वह गरीब दलित व्यक्ति करता है। तो फिर यह एलीट व्यक्ति यदि लेखक बनकर उस पर लिखने की पात्रता रखने वाला इन 'साइडर' है अथवा 'आउट साइडर ? स्वानुभूति बनाम आत्मानुभूति का सवाल तो वहाँ भी उठना चाहिए। सिर्फ यह कहना कि सभी दलित एक हैं, दलित-दलित एक हैं. सभी दलित की स्थिति, सत्य, वेदना, अनुभूति एक है, स्वानुभूति एक है (?) कहकर इस सवाल से कन्नी नहीं काटा जा सकता । यानी जब भिन्न अभिव्यक्ति में पूर्ण सक्षम अथवा समरूप जीवनानुभव न रखने के कारण, सौ फीसदी उपयुक्त लेखकीय पात्र नहीं है, वह भी (एलीट) उसके (गरीब दलित) लिए उतना ही हाउट साइडर बाहरी व्यक्ति है, जितना कि सवर्ण लेखक उस गरीब दलित के लिए होगा। भिन्न स्थिति में रहने के कारण एवं जाति विशेष होने के कारण ही किसी भी सहानुभूति स्वानुभूति नहीं बन सकती। स्वानुभूति और सहानुभूति के झगड़े में सत्य से ज्यादा राजनीति ज्यादा काम करती है।
वास्तव में स्त्री विषय हो या दलित विषय, दोनों की विमर्श में जाति, पितृसत्ता, वर्ण-व्यवस्था के प्रश्नों से काटकर, उनकी भिन्न स्थिति, सन्दर्भ में विच्छिन्न कर देखना सत्य का औसतीकरण होगा क्योंकि "स्त्रीवाद की मुख्य चिता, आज की पितृसत्ता ही है। लेकिन क्या पितृसत्ता प्रत्येक देश और प्रत्येक काल में एक जैसी है ?... वह एक जैसी नहीं होती। एक ही समय और एक ही समाज में भी वह एक जैसी नहीं होती। उदाहरण के लिए हम आज के अपने भारतीय समाज में देखें, तो क्या उच्च या उच्च मध्यवर्गीय, शिक्षित और कामकाजी स्त्रियों की स्थिति निम्न या निम्न मध्यवर्गीय, अशिक्षित और घरेलू स्त्रियों से भिन्न नहीं है? शहरी और देहाती स्त्रियों की धनी और निर्धन परिवारों की, ऊँची जातियों और नीची जातियों की स्थिति भिन्न नहीं है? क्या ऐसी तमाम स्थिति भिन्न नहीं है? क्या ऐसी तमाम भिन्न स्थितियों में जीने वाली स्त्रियों को पितृसत्ता एक ही प्रकार से प्रभावित करती है? यदि वह सब स्त्रियों को एक ही प्रकार से प्रभावित नहीं करती, तो क्या आज के स्त्रीवाद के पितृसत्ता विरोधी संघर्ष तक ही सीमित रहना चाहिए? क्या उसे वर्ण और जाति के प्रश्नों से नहीं जोड़ना चाहिए?"
अतएव वर्ण और जाति की असमानताओं से सत्य निरपेक्ष नहीं है। स्त्री की चेतना इनके सापेक्ष में ही मूल्य अर्थ और दिशा पाती है। वर्ण-व्यवस्था भी असमानता का एक ढाँचा है किन्तु वह वर्ग और जाति के सत्य से मुक्त नहीं है। वर्ग और जाति की असमानता का एक ढाँचा है, किन्तु वह वर्ग और जाति के सत्य से मुक्त नहीं है। वर्ग और जाति की असमानताओं को भूलकर उनकी आंतरिक विसंगति को छोड़कर अगर हम यह सोचें कि केवल वर्ण-व्यवस्था का विरोध करके या उखाड़ फेंकने से हम सब तरह की असमानताओं से या दलितों के साथ होने वाले अत्याचार भेदभाव से हम मुक्त हो जाएंगी, या स्त्री वर्ग, जाति की असमानताओं को भूलकर पितृसत्तात्मक व्यवस्था को उखाड़ फेंगेगी, तो यह एक भ्रामक धारणा होगी। एक समतामूलक मानवीय समाज के निर्माण में सभी विघ्न-बाधाओं तत्वों की पहचान करके ही इस लड़ाई को निर्णायक मोड़ एवं दिशा दी जा सकती है। अन्यथा इतिहास गवाह है कि इन तथ्यों को भुलाकर आंतरिक विसंगतियों को भुलाकर जल्दबाजी मतें कई देशों में की गई क्रांतियां कालांतर में ऐसा अभिशाप बन जाती हैं कि उसे मिटाने के लिए एक और क्रांति करनी पड़ती है, फिर एक और, और यह क्रम निरंतर चलता रहता है। वहां के समाजों में आंतरिक अशांति, उपद्रव, गृह क्लेश, आपातकाल जैसी स्थितियाँ और घटनाएं अक्सर देखे जा सकते हैं। शायद इन्हीं आंतरिक विसंगतियों और अन्विति के अभाव में ही इतिहास को फिर से अपना इतिहास दोहराना पड़ता है इतिहास दोहराने का भी इतिहास रहा है।
वास्तविकता यह यहै कि केवल पितृसत्ता के कारण ही स्त्रियों का दमन और उत्पीड़न नहीं होता बल्कि वर्ग ओर जाति के आधार पर भी स्त्रियाँ उसका शिकार होती हैं इस तरह की खबरें अक्सर देखने-सुनने को मिलती हैं। है एक दिलचस्प उदाहरण मार्क्सवाद का ही है जो समतामूलक मानवीय व्यवस्था के दर्शन के साथ संपूर्ण विश्व में निकला था, इस धारणा के साथ कि समाज में वर्ग-भेद एक बार मिटा तो जाति-भेद और स्त्री-पुरुष भेद स्वतः चला जाएगा। किन्तु तमाम क्रांतियों के बाद भी पूरे विश्व में पितृसत्ता बनी रही। जहाँ साम्यवादी शासन था वहाँ की स्त्रियाँ यह कहते हुए सुनी जा सकती थीं कि "मेरा पति, जो बाहर कॉमरेड है घर में मुझे क्यों पीटता है ?"
स्त्री चेतना को स्वानुभूति या सहानुभूति के सन्दर्भ में एक बार महिला का विषय की भी है यह यह कि जब टी.एस. इलियट (TS. Eliot) कहते हैं कि रचनाकार और भोक्ता में अन्तर होता है, जितना बड़ा अन्तर होगा, उतना बड़ा बदलाव होगा और इसका सीधा अर्थ यही होता है कि रचनागत सत्य / काव्यगत सत्य और व्यक्तिगत सत्य दो अलग सत्य हैं। रचना प्रक्रिया में जब तक रचने वाला निर्धेयक्ति नहीं हो पाता, तब तक वह कलाकार नहीं बन पाता। स्वानुभूति के आधार पर व्यक्तिगत या आत्मगत सत्य और तथ्य को सीधे एवं सपाट ढंग से प्रस्तुत करने पर साहित्य, साहित्य न रहकर रिपोर्टिंग रह जाएगा। साहित्य सूचना, तथ्य या समाचार बन जाएगा और सूचना अथवा समाचार साहित्य नहीं होता। इस कसौटी पर महान साहित्य का मूल्यांकन करना भी संभव नहीं होगा, मसलन स्वानुभूति के आधार पर कामायनी में जयशंकर प्रसाद का जीवन खोजना, रामायण में तुलसीदास अथवा वाल्मीकि का कहाँ है? या साकेत के अनदर मैथिली शरण गुप्त का स्वानुभूत सत्य या व्यक्तिगत सत्य कहाँ और कितना है? गोदान में प्रेमचन्द का जीवन कितना है, गोदान में होरी का सत्य क्या प्रेमचंद का सत्य है या प्रेमचंद का सत्य क्या होरी का सत्य है? दोनों में किसी स्वानुभूति और किसकी सहानुभूति है? पछाड़ खाकर गिरते होरी की त्रासदी सिर्फ होरी की त्रासदी है या भारत के आम किसान की त्रासदी है या प्रेमचंद की त्रासदी है?
अतएव स्वानुभूति और सहानुभूति की कसौटी पर साहित्य के मूल्यांकन में अत्यधिक सचेत होने की आवश्यकता है। फार्मूलाबद्ध तरीके से न तो साहित्य का सृजन हो सकता है, न मूल्यांकन और न ही पाठन सृजन-प्रक्रिया, आलोचना-प्रक्रिया और पाठकीय प्रक्रिया में अनुभूति कई स्तरों पर संक्रमित होती है, अनुभूति के पैटर्न में बदलाव दिखाई पड़ता है। यदि गोदान में पछाड़ खाकर गिरते होती की त्रासदी प्रेमचन्द का सहानुभूति-सत्य है, तब भी वह महान रचनागत सत्य है जो मानवीय संवेदना को झंकृत करता है। साहित्य की परकाया प्रवेश की भूमिका वहाँ देखी जा सकती है।

गुरुवार, 21 सितंबर 2023

संघ की दृष्टि में सनातन एक आध्यात्मिक लोकतंत्र

लोग देश की उन्नति के लिए एक काम करें इसका चलेगा अभियान 

अवधेश कुमार

पुणे में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के संगठनों की अखिल भारतीय समन्वय बैठक पर स्वाभाविक ही पूरे देश की दृष्टि थी। वर्ष में एक बार आयोजित इस बैठक में संघ से जुड़े सारे संगठन के नेता उपस्थित होकर वर्ष भर के अपने कार्य वृत्त के साथ भविष्य की योजनाओं की रूपरेखा रखते हैं। एक वर्ष की दृष्टि से कुछ सामूहिक निश्चित कार्य योजनाएं निर्धारित होती हैं। इस नाते यह बैठक अत्यंत महत्वपूर्ण थी। विरोधी वैसे भी अपने आरोपों औरक् विरोधों सेशन को चर्चा में बने ही रखते हैं। भारत सहित विश्व भर में घटी घटनाओं पर संघ का मत जानने की  उत्सुकता एक बड़े वर्ग में रहती है। बैठक के पूर्व कुछ ऐसी घटनाएं घटीं जिस कारण वहां से आने वाले समाचारों को गहरी दिलचस्पी से देखा गया।

•संघ की पूरी वैचारिक आधारभूमि हिंदुत्व और सनातन है। तमिलनाडु सरकार में मंत्री और मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे उदय निधि स्टालिन ने सनातन को बीमारी की संज्ञा देते हुए इसके उन्मूलन का बयान दिया और विवाद उभरने पर कहा कि हम अपने बयान पर कायम है। भाजपा की प्रतिक्रिया लोग पहले दिन से सुन रहे हैं लेकिन संघ ने‌ स्पार्क कोई औपचारिक बयान नहीं दिया।

• संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपील की थी कि देश का नाम भारत है और इसका ही प्रयोग किया जाए। उसके कुछ दिनों बाद जी 20 नेताओं के सम्मान में आयोजित भोज के निमंत्रण पत्र में प्रेसिडेंट ऑफ भारत लिखा गया। कांग्रेस ने आरोप लगाया के संघ प्रमुख के कहने के कारण ही देश का नाम बदल जा रहा है।  जी 20 सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने लकड़ी की पट्टिका पर भी भारत लिखा था। भारत और इंडिया के विवाद मैं संघ क्या बोलता है यह जानने में भी लोगों की रुचि थी।

•आईएनडीआईए गठबंधन लगातार संघ की विचारधारा के विरुद्ध राजनीति करने की बात कर रहा है। राहुल गांधी ने विदेशों में संघ का नाम लेकर इसके हिंदुत्व को अल्पसंख्यकों के साथ दलित और पिछड़ा विरोधी बताया था।

  संघ सामान्यत: आरोपी और विरोधों पर अन्य संगठनों की तरह प्रतिक्रिया नहीं देता। उसका चरित्र इन सबसे आप प्रभावित रहते हुए शांतिपूर्वक अपना काम करने का है। संघ को निकट से देखने वाले जानते हैं कि जो बैठक जिस उद्देश्य से आयोजित है उसी पर फोकस किया जाता है। समन्वय में बैठक के बाद पत्रकार वार्ता में जानकारी देते हुए संघ के सह सरकार्यवाह डॉक्टर मनमोहन वैद्य ने भी अपनी ओर से इन पर कुछ नहीं कहा।

सनातन संस्कृति को लेकर पूछे गए प्रश्न का उत्तर उन्होंने अवश्य दिया। 

उन्होंने तीन बातें कहीं। 

•एक, सनातन का अर्थ रिलिजन नहीं है। यानी या किसी मजहब की तरह मजहब का पर्याय नहीं है। तो फिर? 

•दो,  संघ की दृष्टि में सनातन सभ्यता एक आध्यात्मिक लोकतंत्र (स्पिरिचुअल डेमोक्रसी) है। वास्तव में इसे मान्य परिभाषा सनातन की कुछ हो नहीं सकती। •तीसरे,उन्होंने इतना ही कहा कि जो लोग सनातन को लेकर वक्तव्य देते हैं, उन्हें पहले इस शब्द का अर्थ समझ लेना चाहिए। 

•इंडिया और भारत पर भी एक सामान्य प्रतिक्रिया थी।  उदाहरण के लिए देश का नाम भारत है, वह भारत ही रहना चाहिए। प्राचीन काल से यही प्रचलित नाम है।भारत नाम सभ्यता का मूल है।

साफ है कि इसमें सनातन का विरोध या उन्मूलन करने की बात करने वालों करने  पर कोई प्रतिक्रिया नहीं। सरसंघचालक ने अपने एक भाषण में कहा था कि हमको विरोधियों का भी विरोधी नहीं होना है।

भारत के संदर्भ में भी संघ प्रमुख के भाषण के कारण ऐसा हुआ इसकी श्रेय लेने की कोई कोशिश नहीं।

आप चाहे संघ के विरोधी हो या समर्थन उनके कार्य और व्यवहार के इस तरीके से बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है।

हमारी घटनाओं पर राजनीति के वर्चस्व के कारण ऐसी सभी बैठकों को राजनीतिक दृष्टि से देखा जाता है। चूंकि समन्वय बैठक में भाजपा की ओर से अध्यक्ष जगत प्रसाद  नड्डा और संगठन महासचिव बीएल संतोष उपस्थित थे इसलिए भी उसकी राजनीतिक रंग देना आसान है।  पर किसी संगठन को उसके अनुसार विश्लेषित करने से ही सच्चाई के निकट पहुंचा जा सकता है। संघ के कार्य व्यवहार पर निकट से अध्ययन करने वाले देखने वाले जानते हैं कि हम जितनी चर्चा करते हैं उस तरह राजनीति पर उनकी बैठकों में बातचीत नहीं होती। समन्वय बैठक का मूल उद्देश्य ही होता है कि सारे संगठन एक दूसरे के क्रियाकलापों से अवगत रहे तथा जहां एक दूसरे का सहयोग कर सकते हैं करें। सब अपने -अपने क्षेत्र में स्वायत्ततापूर्वक कम करते हैं लेकिन इनके बीच सुसंगति बनाने की भूमिका संघ की है। संघ मातृ संगठन के रूप में सभी की सोच को ध्यान में रखते हुए भविष्य की दृष्टि से योजनाएं रखता है। इस बैठक में भी यही हुआ। 

•समन्वय बैठक की समाप्ति के बाद संघ के सारे कार्यवाही डॉक्टर मनमोहन वैद्य ने पत्रकार वार्ता में जो कुछ कहा उसमें राजनीति का लेश मात्र भी नहीं था। 

•बैठक में 36 विभिन्न संगठनों के कुल 246 प्रतिनिधि उपस्थित थे। भाजपा उन 36 संगठनों में ही एक है। तीन दिनों के कार्यक्रम में सभी को वर्ष भर और भविष्य की योजनाओं का वृत देना था। इसमें एक भाजपा और  चुनाव पर तो बात नहीं हो सकती।

संघ अपने 97 वर्ष की आयु पूरी कर शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ रहा है।

इसमें  संघ का आगामी फोकस हर क्षेत्र में महिलाओं की सहभागिता बढ़ाने पर होगा। हालांकि विरोधियों की महिलाओं को महत्व न देने के आरोप के विपरीत संघ यह कार्य कुटुंब प्रबोधन और परिवार परंपरा को सशक्त करने के कार्यक्रम में पहले से कर रहा है।

• डॉ. वैद्य ने कहा कि भारत के चिंतन में परिवार सबसे छोटी इकाई होती है। परिवार में महिलाओं की भूमिका सबसे प्रमुख होती है। संघ की शताब्दी योजना के अंतर्गत महिलाओं की सहभागिता बढ़ाने पर बैठक में चर्चा की गई।‌ 

•महिलाओं में आपसी संपर्क बढ़ाने के साथ देशभर में 411 सम्मेलन आयोजित करने की योजना बताता है कि इसे लेकर कितनी गंभीरता है। अभी तक 12 प्रांतों में इस तरह के 73 सम्मेलन आयोजित किए जा चुके हैं। इनमें 1 लाख 23 हजार से अधिक महिलाएं शामिल हुई। गैर राजनीतिक स्तर पर महिलाओं का सम्मेलन बुलाना आसान नहीं होता।

 संघ के 97 वर्ष की यात्रा के मुख्य चार पड़ाव रहे हैं।  संगठन, विस्तार, संपर्क व गतिविधि ये तीन पड़ावों पर लंबे समय तक फोकस रहा। सन् 2006 में संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी की जन्मशती के के साथ हर स्वयंसेवक द्वारा राष्ट्र की उन्नति के लिये कुछ न कुछ कार्य करने का प्रण लेने की बात आई और तीन  के साथ यह चौथा तब से आगे बढ़ रहा है। स्वयंसेवक चाहे जिस संगठन में हो, वो भारत की उन्नति के लिए एक कार्य अपने हाथ में ले इसके लिए लगातार कोशिश हो रही है। जरा सोचिए , भारत में ऐसे कितने संगठन हैं जो अपने सदस्यों को देश की उन्नति के लिए कोई एक काम करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं? आप देखेंगे कि संपूर्ण देश में स्वयंसेवकों द्वारा ऐसे कार्य किया जा रहे हैं जिनकी अनजान लोगों को उम्मीद भी नहीं होती। कोई ऐसा क्षेत्र नहीं जहां संघ के लोग काम नहीं कर रहे हैं। कई बार आप उस कम की सराहना करते हैं यहां तक कि उसमें सहयोग भी करते हैं किंतु आपको पता भी नहीं चलता कि वह संघ के स्वयंसेवकों के द्वारा किया जा रहा है। संघ के हर बैठक में समाज में अच्छे लोगों जिन्हें संघ सज्जन शक्ति कहता है वो सामाजिक कार्यों में सक्रिय हो इसके प्रयास पर हमेशा चर्चा होती है। समन्वय बैठक का भी एक प्रमुख बिंदु यही था। यानी शाखा और संगठन विस्तार के अलावा समाज के अच्छे लोगों के पास जाकर उन्हें पेश की उन्नति के लिए कोई एक काम करने के लिए प्रेरित करने का अभियान संघ लगातार चलाएगा। ऐसे अभियानों से भी संघ के संगठन शक्ति बढ़ती है। इसके संगठन संबंधी कुछ आंकड़े देखिए।

 •संघ की शाखाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। कोरोना से पूर्व  सन् 2020 में देश में 38 हजार 913 स्थानों पर शाखाएं थीं, 2023 में यह बढ़कर 42 हजार 613 हो गया है।  यानी 9.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

• संघ की दैनिक शाखाओं की संख्या 62 हजार 491 से बढ़कर 68 हजार 651 हो गई है। इनमें 60 प्रतिशत विद्यार्थी शाखाएं हैं।

 • संघ की आधिकारिक वेबसाइट पर जॉइन आरएसएस के माध्यम से प्रति वर्ष एक से सवा लाख नए लोग जुड़ने की इच्छा जता रहे हैं। उनमें से अधिकतर 20 से 35 वर्ष तक की आयु के हैं।

विरोधी महिलाओं पर फोकस करने या फिर लोगों से देश की उन्नति के लिए एक काम करने के अभियान को भी संघ का छद्म व्यवहार कहेंगे, पर समाज वही धारणा बनाएगा जो प्रत्यक्ष देखता है। संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों का अगर लगातार विस्तार हो रहा है तो इसी कारण कि राजनीतिक और वैचारिक विरोध के विपरीत आम समाज इसके प्रति अच्छी धारणा रखता है। विरोधी शांत मन से इस पर विचार करें तो वह भी काफी कुछ सीख सकते हैं।



गुरुवार, 14 सितंबर 2023

जीएमएफ और अरिहंत हॉस्पिटल, देहरादून द्वारा सभी समुदायों और सभी धर्मों के लिए पैन इंडिया हेल्थकेयर लंगर सेवा

संवाददाता

नई दिल्ली। ग्लोबल मिडास फाउंडेशन (जीएमएफ), दिल्ली स्थित एक सामाजिक संगठन, पिछले 3 वर्षों से "सरबत दा भला" और "चरदी कला" के सिखी मूल्यों और विचारधारा के आधार पर पंथ और संगत सेवा कर रहा है। यह हेल्थकेयर लंगर के हिस्से के रूप में है सेवा ने धार्मिक और आध्यात्मिक संगठनों, निवासी कल्याण संघों, बाजार कल्याण संघों, शैक्षणिक संस्थानों और दिल्ली पुलिस के सहयोग से पिछले 3 वर्षों के संचालन में दिल्ली और पंजाब भर में कई मुफ्त स्वास्थ्य जांच शिविर, नेत्र जांच शिविर आयोजित किए हैं। इसके अलावा उन्होंने ग्लोबल मिडास फाउंडेशन (जीएमएफ) द्वारा अनुशंसित लोगों को रियायती दरों और समय पर परामर्श, परीक्षण, निदान, जांच, उपचार और सर्जरी प्रदान करने के लिए विभिन्न प्रयोगशाला परीक्षण सुविधाओं, डायग्नोस्टिक केंद्रों, नर्सिंग होम और अस्पतालों के साथ समझौता किया है।

अब, उन्होंने अरिहंत अस्पताल, देहरादून से गठजोड़ किया है और उन्हें समर्थन मिला है, जो एक मल्टी स्पेशियलिटी अस्पताल है, जो नवीनतम अद्यतन अस्पताल सुविधाओं और सर्वोत्तम विशेषज्ञ, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुभवी डॉक्टरों और प्रबंधन टीम के साथ बहुत प्रतिष्ठित है। जीएमएफ के संस्थापक सरदार इंदरप्रीत सिंह कहा कि उन्होंने अब जीएमएफ और अरिहंत अस्पताल द्वारा संयुक्त रूप से मुफ्त हेल्थकेयर कार्ड पेश किया है, जो पूरे भारत में सभी समुदायों और सभी धर्मों के लोगों और एनआरआई के लिए हेल्थकेयर लंगर सेवा लाभ प्रदान करता है। जीएमएफ फेसबुक पेज, साड्डा खिडदा पंजाब यूट्यूब चैनल और हेल्पलाइन नंबर पर जाकर हेल्थ कार्ड बनवाया जा सकता है। +91 8368018195, 9289334641, 9289351596 और www.arihanthospitals.com/
 
किडनी प्रत्यारोपण और डायलिसिस के लिए उपचार और सर्जरी के लिए 20% रियायती छूट और समय की प्राथमिकता प्रदान की जाएगी। यह अखिल भारतीय स्तर पर सभी समुदायों, सभी धर्मों और भारत में अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा पर्यटन पहल के हिस्से के रूप में आने वाले विदेशियों / एनआरआई के लिए लागू है। स्वास्थ्य सेवाओं में समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से आने वाले सिख संगत और आम जनता को परीक्षण, उपचार, सर्जरी आदि और ऐसी अन्य महत्वपूर्ण स्वास्थ्य सुविधाओं पर 30% तक रियायती छूट और प्राथमिकता । भारत भर में गुरुद्वारा समिति के सेवादारों, कथा वाचकों, ग्रंथी साहिबानों और बोर्ड पर सेवा करने वाले पदाधिकारियों और कर्मचारियों को परीक्षण, उपचार, सर्जरी आदि और ऐसी अन्य महत्वपूर्ण स्वास्थ्य सुविधाओं पर 50% तक रियायती छूट और प्राथमिकता । ये सभी लाभ देहरादून और चमोली, उत्तराखंड में मौजूदा स्वास्थ्य सुविधाओं और भविष्य में आने वाली अन्य सुविधाओं में प्रदान किए जाएंगे और ग्लोबल मिडास फाउंडेशन द्वारा पेश किए गए पूरी तरह से मुफ्त स्वास्थ्य कार्ड बनाकर आज ही इसका लाभ उठाया जा सकता है।

बुधवार, 13 सितंबर 2023

भारत ने जी 20 को दिया नया कलेवर

अवधेश कुमार


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जी-20 अध्यक्ष के नाते जब स्वस्तिअस्तु विश्व: यानी संपूर्ण विश्व सुखी हो के साथ शिखर सम्मेलन के समापन की घोषणा की तो ये कोरे शब्द नहीं थे। जी 20 का नई दिल्ली शिखर सम्मेलन अनेक दृष्टियों से ऐतिहासिक और सफल माना जाएगा। यूक्रेन युद्ध के बाद  पहला सम्मेलन है जिसकी घोषणा पत्र से कोई सदस्य देश नाखुश या असंतुष्ट नहीं है। अमेरिका और पश्चिमी देश संतुष्ट हैं तथा रूस और चीन भी। इस कूटनीति को भारत ने कैसे साधा होगा इसकी कल्पना आसान नहीं है। 37 पृष्ठों के घोषणा पत्र में पृथ्वी, यहां के लोग, शांति व समृद्धि वाले खंड में चार बार यूक्रेन युद्ध की चर्चा है किंतु रुस का नाम नहीं है। इन पंक्तियों को देखिए,  सभी देशों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों व सिद्धांतों के अनुरूप कार्य करना चाहिए। किसी भी दूसरे देश की अखंडता व संप्रभुता का उल्लंघन धमकी या बल के उपयोग से बचना चाहिए। नाभिकीय हथियारों के इस्तेमाल या इस्तेमाल की धमकी अस्वीकार्य है। यूक्रेन युद्ध के बीच में राष्ट्रपति पुतिन ने नाभिकीय हथियार के उपयोग तक की धमकी दे दी थी। इसमें प्रधानमंत्री की वह पंक्ति भी है जो उन्होंने पुतिन को कहा था कि यह समय युद्ध का नहीं है। अगर पिछले बाली घोषणा पत्र को देखें तो वह रूस के विरुद्ध था और रूस से यूक्रेन खाली करने की आवाज उठाई गई थी। तुलना करें तो इस प्रश्न का उत्तर सामान्यतः नहीं मिलेगा कि भारत ने अमेरिका को कैसे यह प्रस्ताव स्वीकार करने के लिए तैयार किया। 

 सम्मेलन के पहले दिन दूसरे सत्र में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली घोषणा पत्र स्वीकार करने की घंटी बजाई तभी साफ हो गया कि भारत की कूटनीति सफल रही है।  सम्मेलन आरंभ होने के एक दिन पहले तक यूक्रेन से लेकर जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा, विकासशील और कमजोर देश को वित्तीय सहायता व सस्ते कर्ज उपलब्ध कराने ,साइबर सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सहमति नहीं बन रही थी। घोषणा पत्र में यूक्रेन युद्ध से जुड़ा पैराग्राफ खाली छोड़ना पड़ा था। भारतीय प्रयासों ने रंग लाया और घोषणा पत्र में यूक्रेन युद्ध, जलवायु परिवर्तन, लैंगिक असमानता ,आर्थिक चुनौतियां, हरित विकास, आतंकवाद, क्रिप्टो करेंसी, महिलाओं के उत्थान समेत वो सारे मुद्दे शामिल किए गए जिन्हें भारत ने तैयार किया था।

इस एक पहलू से साफ हो जाता है कि अपनी अध्यक्षता में भारत ने किस तरह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, देशों के संबंध, राजनय, व्यक्ति के जीवन आदि से संबंधित भारतीय विचारों को लेकर पिछले एक वर्ष तक काम किया होगा। भारत के लगभग 60 शहरों में 220 से ज्यादा बैठकें जी 20 की हुई है। इस कारण भी यह इतिहास का सबसे विस्तारित, महत्वाकांक्षी और सफल सम्मेलन साबित हुआ क्योंकि इनमें कुल 112 परिणाम दस्तावेज व अध्यक्षीय दक्षतावेज तैयार हुए। पिछले इंडोनेशिया की राजधानी बाली के सम्मेलन में कुल 50 परिणाम व अध्यक्षीय दस्तावेज स्वीकृत हुए थे। इनमें 73 परिणाम दस्तावेज यानी आउटकम डॉक्यूमेंट हैं जो देश के विभिन्न शहरों में सदस्य देशों के मंत्रियों और अधिकारियों के ओर से बैठकों में बनी सहमति पर तैयार हुए हैं। ऐसा कोई विषय नहीं जिन पर बैठक नहीं हुई। जब भारत ने इसका नारा ही एक पृथ्वी, एक परिवार और एक भविष्य दिया तथा इसके साथ वसुधैव कुटुंबकम जोड़ दिया तो फिर इसके परे कुछ हो ही नहीं सकता था। सच कहा जाए तो भारत ने जी 20 की न केवल कुछ बदली बल्कि इसे नया कलेवर दे दिया। निश्चय ही इसके सदस्य देशों के साथ अन्य देशों को भी इन शब्दों के भारतीय अर्थ समझाए गए होंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने इंडिया की जगह भारत लिखा हुआ था। भारत नाम के वैश्विक स्वीकृति की ठोस नींव पड़ चुकी है। भारत शब्द के साथ विश्व यह मानने को विवश होगा कि हम लाखों वर्ष पूर्व के प्राचीनतम राष्ट्र हैं। इस नाते भी जी 20 सम्मेलन को इतिहास के अध्याय में याद किया जाएगा। 


भारत के लिए यह पहला अवसर था जब विश्व के सभी शक्तिशाली देशों के प्रतिनिधि तथा रूस, चीन और स्पेन को छोड़कर सारे राष्ट्र प्रमुख, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रमुख एवं सत्ता शीर्ष से जुड़े अधिकारी उपस्थित थे। भारत में स्वयं नौ देशों को विशेष तौर पर आमंत्रित किया था। भारत के लिए भविष्य की महाशक्ति संभावना का विश्वास दिलाने का अब तक का सबसे बड़ा अवसर था और यह मानने में कोई हिचक नहीं है कि इस उद्देश्य को कल्पना से भी श्रेष्ठ तरीके से भारत ने प्राप्त किया है। भारत मंडपम देखने से ही भारत की सांस्कृतिक ,आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत के साथ आधुनिक ज्ञान विज्ञान की उपलब्धियां ,आर्थिक व सैनिक क्षमता, विविधताओं, राष्ट्र की अवधारणा, राष्ट्र - राज्य के रूप में भविष्य के उद्देश्यों की समझ आने वाली लायक झलक मिल रही थी। स्वयं प्रधानमंत्री कोणार्क के जिस काल चक्र के सम्मुख खड़े होकर सभी नेताओं का स्वागत कर रहे थे उसके दर्शन में ही संपूर्ण सृष्टि के संचालन का ज्ञान निहित है। राष्ट्रपति के रात्रि भोज में स्वागत करने की पृष्ठभूमि नालंदा विश्वविद्यालय की तस्वीर यह बताने के लिए थी कि जब विश्व आधुनिक शिक्षा पद्धति से अनभिज्ञ था तब भी भारत में व्यवस्थित विश्वविद्यालय थे जहां हर विषयों की शिक्षा थी और अलग-अलग देशों से छात्र यहां पढ़ने आते थे। 

भारत ने इस सम्मेलन को महिमामंडित कर  जैसी भव्यता और सुव्यवस्थित आयोजन बनाया वह अगले अध्यक्ष ब्राजील के लिए एक मानक बन गया है। यह स्वीकार करना होगा कि भारत ने अपने नेतृत्व में जी 20 का एजेंडा, लक्ष्य, सदस्यों की सोच को काफी हद तक बदलने में सफलता पाई है। वसुधैव कुटुंबकम यानी संपूर्ण विश्व को एक परिवार मानकर विश्व व्यवस्था की रचना करने की दिशा में 55 सदस्यीय अफ्रीकन यूनियन को सदस्य बनाने में भारत क़ो सफलता मिली, 125 विकासशील व गरीब देशों का सम्मेलन बुलाकर ग्लोबल साउथ या वैश्विक दक्षिण के एजेंडा को इसमें रखा गया। इस तरह भारत ने संदेश दिया कि अंतरराष्ट्रीय समस्याओं का समाधान ज्यादा लोकतांत्रिक तरीके से संभव है और इसमें छोटे -बड़े, संपन्न विकासशील और गरीब सभी देशों को सहभागी बनाया जाए ताकि उन्हें आभास हो कि विश्व व्यवस्था की रचना में उनकी भूमिका है। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में मुख्य भूमिका निभाने वाले देशों से इनका संवाद एवं मिलन ही नहीं होगा तो असंतोष और गुस्सा पैदा होगा। 

  प्रधानमंत्री ने 15 द्विपक्षीय बैठकें भी कीं।  चीन भारत की सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव के विरुद्ध भारत काम कर रहा है। इटली की प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि वह इससे बाहर निकल रहा है।  भारत, पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच संपर्क गलियारे को जल्द लॉन्च करने की घोषणा हुई। भारत, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, फ्रांस, इटली, जर्मनी व यूरोपीय संघ के अन्य देशों तथा अमेरिका को शामिल करते हुए इस संपर्क गलियारे और बुनियादी ढांचे पर सहयोग की आधारभूमि बन गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेरिस जलवायु सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन की शुरुआत की। इस बार वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन की शुरुआत हुई। वैश्विक स्तर पर पेट्रोल के साथ एथेनॉल मिश्रण को बढ़ाकर 20% तक करने की अपील के साथ इसके सदस्य बनने की अपील की गई। बहुपक्षीय विकास बैंक से लेकर डिजिटल सार्वजनिक आधारभूत संरचना आदि अनेक ऐसे बिंदु हैं जिनको उपलब्धियां के रूप में उल्लेखित किया जा सकता है। 

कुल मिलाकर विश्व के नेताओं ने एक वर्ष के सम्मेलनों और दिल्ली समापन के साथ भारत की प्राचीन सभ्यता - संस्कृति ,धर्म ,विरासत, राष्ट्र - राज्य की अवधारणा, वर्तमान ताकत, एकता, अखंडता के इसके सूत्र, वैश्विक सोच, आधुनिक प्रगति और भविष्य में विश्व का शीर्ष देश बनने के संकल्प को साक्षात्कार देखा और समझा। इस मनोविज्ञान का असर आने वाले समय में दिखाई देगा और भारत ज्यादा मुखर होकर अपनी सोच के अनुरूप भावी विश्व व्यवस्था को दिशा देने में सफल भूमिकाएं निभाएगा।  जी 20 को इसके अनुकूल एक सशक्त आधार भारत के नेतृत्व में दे दिया गया है। उम्मीद की विश्व आर्थिक और तकनीकी विकास से लेकर संपूर्ण विश्व में खाद्यान्न व स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं उपलब्ध कराने आदि की दृष्टि से समावेशी होगा तथा सहयोग और सहकार की भूमिका निभाते हुए तनाव दूर करने में भी सफल होगा।



गुरुवार, 7 सितंबर 2023

उदयनिधि के सनातन धर्म विरोधी वक्तव्य के निहितार्थ

 अवधेश कुमार

उदयनिधि स्टालिन तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे और युवा मामलों के मंत्री भी हैं। ऐसे शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वो ऐसा वक्तय न दें जिससे करोड़ लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हों। उदयनिधि ने सनातन धर्म की तुलना डेंगू, मलेरिया और कोरोना से करते हुए कहा कि ये कुछ ऐसी चीजें हैं, जिनका केवल विरोध नहीं किया जा सकता, बल्कि उन्हें खत्म करना जरूरी होता है। इस बयान के विरुद्ध संपूर्ण विश्व के हिंदू समाज के भीतर आक्रोश पैदा होना स्वाभाविक है।  लेकिन तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति और उदयनिधि की पार्टी द्रमुक की विचारधारा तथा अतीत एवं वर्तमान को देखने पर यह निष्कर्ष सही नहीं लगेगा। उन्होंने जो कुछ बोला है वह उनकी राजनीतिक धारा की सोच है।  उनके विरुद्ध मुकदमा दर्ज होने के बाद उनकी प्रतिक्रिया देखिए।  उन्होंने कहा कि हम पेरियार और अन्ना के फॉलोवर हैं। मैं आज, कल और हमेशा यही कहूंगा कि द्रविड़ भूमि से सनातन धर्म को रोकने का हमारा संकल्प बिल्कुल भी कम नहीं होगा। 

इसके बाद आप यह नहीं कह सकते कि वह उत्तेजना या भावावेश में बोल गए। वे जिस कार्यक्रम में बोल रहे थे उसका नाम ही था, सनातन उन्मूलन कार्यक्रम।  उन्होंने इस नाम की भी प्रशंसा की और कहा- सनातन क्या है? यह समानता और सामाजिक न्याय के खिलाफ है। सनातन का अर्थ होता है- स्थायी यानी ऐसी चीज जिसे बदला नहीं जा सकता। सनातन उन्मूलन सम्मेलन में उदयनिधि स्टालिन के अलावा कई मंत्री और द्रमुक नेता शामिल हुए। सनातन के उन्मूलन नामक शीर्षक से कार्यक्रम का आयोजन ही बताता है कि तमिलनाडु में किस तरह की विचारधारा और राजनीति को प्रश्रय दिया जा रहा है। निश्चित रूप से इसकी निंदा की जाएगी और विरोध भी होगा। द्रमुक आईएनडीआईए गठबंधन का एक मुख्य घटक है इसलिए अन्य घटक दलों से पूछा जाएगा कि आपका इस पर क्या मत है? कांग्रेस सहित अन्य पार्टियों ने इस बयान से तो अपने को अलग किया लेकिन जितना प्रखर विरोध इसका होना चाहिए नहीं किया। यह राजनीतिक विवशता दुर्भाग्यपूर्ण है। 

हालांकि उदयनिधि के बयान पर आश्चर्य का कोई कारण नहीं है। उदयनिधि के दादा करुणानिधि के ऐसे बयान आते रहते थे। अयोध्या में श्रीराम मंदिर के विरोध में उन्होंने कहा था कि राम का जन्म प्रमाण पत्र कहां है? राम सेतु के बारे में उन्होंने कहा कि उसको किस सिविल इंजीनियर ने बनाया था? भाजपा उसका नाम बताए। द्रमुक के नेताओं के ऐसे बयान आते हैं। 1960 दशक में द्रमुक नेता रामास्वामी नायककर ने तब मद्रास शहर में ट्रकों पर श्रीराम, सीता जी और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियों की झाड़ू और जूतों से पिटाई करने वाली झांकियां निकाली थी। इसके पीछे लक्ष्य था कि ब्राह्मणों व‌ सनातनियों को भड़काओ और उनके विरुद्ध दूसरी जातियों को लामबंद करो। ब्राह्मण और शुद्र नाम लेकर द्रमुक बहुसंख्यक दलितों का समर्थन पाता है। 

दरअसल, द्रमुक निकला ही हिन्दू धर्म विरोधी विचारधारा से। 1916 में टीएम नायर और पी त्यागराज चेट्टी ने द्रविड़ राजनीति की शुरुआत इस आधार पर की कि हम उत्तर भारतीय आर्यों से अलग हैं। उन्होंने जस्टिस पार्टी की स्थापना की जिसमें आई रामास्वामी पेरियार भी शामिल हुए। अंग्रेजों ने भारत में फूट डालो राज करो की नीति के तहत लोगों की सोच बदलने के लिए इतिहास, धर्म, संस्कृति ,समाजशास्त्र की पुस्तकें अपने अनुसार लिखवाईं जिसमें कहा गया कि आर्य बाहर से आए और उनका द्रविड़ों के साथ संघर्ष हुआ जो जारी है। आर्यों ने द्रविड़ों पर अपनी धर्म व्यवस्था लादने की कोशिश की। अंग्रेजों ने ही जस्टिस पार्टी की स्थापना के लिए प्रेरित किया और उसे  मदद देते रहे। अन्नादुरई भी पेरियार के साथ आए लेकिन बाद में अलग होकर उन्होंने द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम या द्रमुक की स्थापना की। पूरा आंदोलन हिंदू धर्म की मान्यताओं पर चोट कर ऐसी सोच स्थापित करने वाला था जिसके कारण तमिलनाडु के निवासियों को लगे कि वे‌ भारत और यहां की संस्कृति या धर्म के अंग है ही नहीं। इसी कारण तमिलनाडु में अलग देश का भी आंदोलन चला। हिंदी विरोध का सबसे तगड़ा आंदोलन तमिलनाडु में ही चला। यह बात अलग है कि तमिलनाडु के ही विवेकशील नेताओं ने इन सबका विरोध किया। उदाहरण के लिए सी राजगोपालाचारी ने भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी की वकालत की। उन्होंने गीता और उपनिषदों पर टीकायें लिखकर बताया कि आर्य द्रविड़ के नाम पर झूठ फैलाया जा रहा है। रामचरितमानस और रामायण के बारे में गलत बातें फैलाये जाने की काट के लिए उन्होंने गद्य में चक्रवर्ति तिरुमगन लिखा जो रामायण कथा है। उन्होंने स्वयं और उनकी प्रेरणा से काफी लोग ऐसे लेख लिखते रहे जिससे साबित होता था कि आर्य द्रविड़ भेद भारत में या हिंदू धर्म में  नहीं है और तमिल भी सनातनी हिंदू हैं।

बाद के कालखंड में कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी कमजोर हुई और द्रविड़ राजनीति आगे बढ़ने लगी। हिंदी के विरुद्ध 60 और 70 के दशक के आंदोलन की उग्रता और उत्तेजना के कारण तमिलनाडु की सोच में व्यापक अंतर आया और द्रविड़ दल सशक्त हुये। 1977 से आज तक द्रमुक और अन्नाद्रमुक दो पार्टियों के इर्द-गिर्द तमिलनाडु की राजनीति चल रही है।  भाजपा पहले वहां शक्तिशाली नहीं है लेकिन उसका समर्थन बढा है।दूसरे दलों को लगता है कि हिंदू धर्म पर जितना चोट करेंगे, उनकी राजनीति की धारा वहां सशक्त होगी। अन्नाद्रमुक के भाजपा के साथ होने कारण भी वे अपने इस हिंदू धर्म विरोधी, हिंदी विरोधी तेवर को आक्रामक बनाए रखती है।

जो कुछ उदयनिधि या दूसरे नेता अपनी राजनीति के लिए बोलते हैं वह सच नहीं है और उनकी अज्ञानता का भी द्योतक है। सनातन का अर्थ ठहराव या जड़ता नहीं है। नित्य नूतन सनातन: यानी जो नित्य नूतन है वही सनातन है। जैसे सूर्य सनातन है। सुबह सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक को क्या आप जड़ ,स्थिर या ठहरा हुआ कहेंगे ? यही तो सनातन है। दूसरे, तमिलनाडु हिंदू धर्म, सभ्यता- संस्कृति और अध्यात्म का महत्वपूर्ण केंद्र है। पूरे तमिल संगम साहित्य को उठा लीजिए हिंदू इतिहास, विचारों और कथाओं से भरे पड़े हैं। विविधता में एकता हमारी संस्कृति है लेकिन विरोधी इस एकता की बजाय विविधता को उठाकर तमिल संस्कृति को भारतीय संस्कृति से अलग साबित करते रहे हैं। तमिल संस्कृति भारतीय संस्कृति ही थी। संत तिरुवल्लुवर की रचना तिरुक्कुरल का अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। यह ग्रंथ लोगों को ईश्वर में आस्था की ही बात करता है और बताता है कि पूजा पाठ के लिए संन्यासी होने की आवश्यकता नहीं, गृहस्थ होकर भी आप ऐसा कर सकते हैं। यह तो हिन्दू धर्म की ही धारा है। हिंदू धर्म की दो प्रमुख शाखाएं शैव और वैष्णव तमिलनाडु में न केवल मजबूत रहे बल्कि वहां के संतो ने अपने मार्ग का प्रसार भारत के दूसरे क्षेत्रों में भी किया। नयनमार या नयनार संतों की लंबी परंपरा है जो भगवान शिव के भक्त थे। ऐसे 63 संतों के नाम हमारे ग्रंथो में उपलब्ध हैं। झूठ है कि सारे ब्राह्मण थे। ये समाज के सभी जातियों से आते थे। इनके रचित भजन व मंत्र संपूर्ण देश में गाये व पढ़े जाते हैं।   विष्णु या नारायण की उपासना करने वाले 12 संतों, जिन्हें आलवार कहते हैं, सर्वत्र सम्मान है और इनमें  निम्न जाति के भी थे।  वैष्णव संप्रदाय के पंथ विशिष्टाद्वैतवाद , अद्वैतवाद, द्वैतवाद सबका स्रोत तमिलनाडु और आसपास ही है। विशिष्टाद्वैतवाद के संस्थापक संत रामानुजाचार्य के मानने वाले पूरे भारत में है। द्वैतवाद के संत माधवाचार्य ने जिन 37 ग्रंथों की रचना की वह संपूर्ण भारत में प्रचलित हैं। इसलिए आर्य और द्रविड़ भेद या तमिल संस्कृति भारतीय संस्कृति से अलग आदि विचार तथ्यों से बिल्कुल पड़े हैं।

 कोई पार्टी इतनी हैसियत नहीं रखता कि हिंदू धर्म को खत्म कर दे। उदयनिधि की बातें इसलिए डराती हैं कि यह हिंदू समाज की एकता की कोशिशों के साथ भारत की एकता अखंडता पर वैचारिक चोट करने वाले हैं। लेकिन गुस्सैल प्रतिक्रिया देने की बजाय तथ्यात्मक प्रतिवाद करें। आईएनडीआईए के दलों को भी विचार करना पड़ेगा कि समाज और देश की एकता से बड़ी कोई राजनीति नहीं हो सकती। 

पता– अवधेश कुमार, ई-30,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -98110 27208



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