मीना शर्मा
बुधवार, 27 सितंबर 2023
स्त्री-चेतना: स्वानुभूति बनाम सहानुभूति
गुरुवार, 21 सितंबर 2023
संघ की दृष्टि में सनातन एक आध्यात्मिक लोकतंत्र
लोग देश की उन्नति के लिए एक काम करें इसका चलेगा अभियान
अवधेश कुमार
पुणे में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के संगठनों की अखिल भारतीय समन्वय बैठक पर स्वाभाविक ही पूरे देश की दृष्टि थी। वर्ष में एक बार आयोजित इस बैठक में संघ से जुड़े सारे संगठन के नेता उपस्थित होकर वर्ष भर के अपने कार्य वृत्त के साथ भविष्य की योजनाओं की रूपरेखा रखते हैं। एक वर्ष की दृष्टि से कुछ सामूहिक निश्चित कार्य योजनाएं निर्धारित होती हैं। इस नाते यह बैठक अत्यंत महत्वपूर्ण थी। विरोधी वैसे भी अपने आरोपों औरक् विरोधों सेशन को चर्चा में बने ही रखते हैं। भारत सहित विश्व भर में घटी घटनाओं पर संघ का मत जानने की उत्सुकता एक बड़े वर्ग में रहती है। बैठक के पूर्व कुछ ऐसी घटनाएं घटीं जिस कारण वहां से आने वाले समाचारों को गहरी दिलचस्पी से देखा गया।
•संघ की पूरी वैचारिक आधारभूमि हिंदुत्व और सनातन है। तमिलनाडु सरकार में मंत्री और मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे उदय निधि स्टालिन ने सनातन को बीमारी की संज्ञा देते हुए इसके उन्मूलन का बयान दिया और विवाद उभरने पर कहा कि हम अपने बयान पर कायम है। भाजपा की प्रतिक्रिया लोग पहले दिन से सुन रहे हैं लेकिन संघ ने स्पार्क कोई औपचारिक बयान नहीं दिया।
• संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपील की थी कि देश का नाम भारत है और इसका ही प्रयोग किया जाए। उसके कुछ दिनों बाद जी 20 नेताओं के सम्मान में आयोजित भोज के निमंत्रण पत्र में प्रेसिडेंट ऑफ भारत लिखा गया। कांग्रेस ने आरोप लगाया के संघ प्रमुख के कहने के कारण ही देश का नाम बदल जा रहा है। जी 20 सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने लकड़ी की पट्टिका पर भी भारत लिखा था। भारत और इंडिया के विवाद मैं संघ क्या बोलता है यह जानने में भी लोगों की रुचि थी।
•आईएनडीआईए गठबंधन लगातार संघ की विचारधारा के विरुद्ध राजनीति करने की बात कर रहा है। राहुल गांधी ने विदेशों में संघ का नाम लेकर इसके हिंदुत्व को अल्पसंख्यकों के साथ दलित और पिछड़ा विरोधी बताया था।
संघ सामान्यत: आरोपी और विरोधों पर अन्य संगठनों की तरह प्रतिक्रिया नहीं देता। उसका चरित्र इन सबसे आप प्रभावित रहते हुए शांतिपूर्वक अपना काम करने का है। संघ को निकट से देखने वाले जानते हैं कि जो बैठक जिस उद्देश्य से आयोजित है उसी पर फोकस किया जाता है। समन्वय में बैठक के बाद पत्रकार वार्ता में जानकारी देते हुए संघ के सह सरकार्यवाह डॉक्टर मनमोहन वैद्य ने भी अपनी ओर से इन पर कुछ नहीं कहा।
सनातन संस्कृति को लेकर पूछे गए प्रश्न का उत्तर उन्होंने अवश्य दिया।
उन्होंने तीन बातें कहीं।
•एक, सनातन का अर्थ रिलिजन नहीं है। यानी या किसी मजहब की तरह मजहब का पर्याय नहीं है। तो फिर?
•दो, संघ की दृष्टि में सनातन सभ्यता एक आध्यात्मिक लोकतंत्र (स्पिरिचुअल डेमोक्रसी) है। वास्तव में इसे मान्य परिभाषा सनातन की कुछ हो नहीं सकती। •तीसरे,उन्होंने इतना ही कहा कि जो लोग सनातन को लेकर वक्तव्य देते हैं, उन्हें पहले इस शब्द का अर्थ समझ लेना चाहिए।
•इंडिया और भारत पर भी एक सामान्य प्रतिक्रिया थी। उदाहरण के लिए देश का नाम भारत है, वह भारत ही रहना चाहिए। प्राचीन काल से यही प्रचलित नाम है।भारत नाम सभ्यता का मूल है।
साफ है कि इसमें सनातन का विरोध या उन्मूलन करने की बात करने वालों करने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं। सरसंघचालक ने अपने एक भाषण में कहा था कि हमको विरोधियों का भी विरोधी नहीं होना है।
भारत के संदर्भ में भी संघ प्रमुख के भाषण के कारण ऐसा हुआ इसकी श्रेय लेने की कोई कोशिश नहीं।
आप चाहे संघ के विरोधी हो या समर्थन उनके कार्य और व्यवहार के इस तरीके से बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है।
हमारी घटनाओं पर राजनीति के वर्चस्व के कारण ऐसी सभी बैठकों को राजनीतिक दृष्टि से देखा जाता है। चूंकि समन्वय बैठक में भाजपा की ओर से अध्यक्ष जगत प्रसाद नड्डा और संगठन महासचिव बीएल संतोष उपस्थित थे इसलिए भी उसकी राजनीतिक रंग देना आसान है। पर किसी संगठन को उसके अनुसार विश्लेषित करने से ही सच्चाई के निकट पहुंचा जा सकता है। संघ के कार्य व्यवहार पर निकट से अध्ययन करने वाले देखने वाले जानते हैं कि हम जितनी चर्चा करते हैं उस तरह राजनीति पर उनकी बैठकों में बातचीत नहीं होती। समन्वय बैठक का मूल उद्देश्य ही होता है कि सारे संगठन एक दूसरे के क्रियाकलापों से अवगत रहे तथा जहां एक दूसरे का सहयोग कर सकते हैं करें। सब अपने -अपने क्षेत्र में स्वायत्ततापूर्वक कम करते हैं लेकिन इनके बीच सुसंगति बनाने की भूमिका संघ की है। संघ मातृ संगठन के रूप में सभी की सोच को ध्यान में रखते हुए भविष्य की दृष्टि से योजनाएं रखता है। इस बैठक में भी यही हुआ।
•समन्वय बैठक की समाप्ति के बाद संघ के सारे कार्यवाही डॉक्टर मनमोहन वैद्य ने पत्रकार वार्ता में जो कुछ कहा उसमें राजनीति का लेश मात्र भी नहीं था।
•बैठक में 36 विभिन्न संगठनों के कुल 246 प्रतिनिधि उपस्थित थे। भाजपा उन 36 संगठनों में ही एक है। तीन दिनों के कार्यक्रम में सभी को वर्ष भर और भविष्य की योजनाओं का वृत देना था। इसमें एक भाजपा और चुनाव पर तो बात नहीं हो सकती।
संघ अपने 97 वर्ष की आयु पूरी कर शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ रहा है।
इसमें संघ का आगामी फोकस हर क्षेत्र में महिलाओं की सहभागिता बढ़ाने पर होगा। हालांकि विरोधियों की महिलाओं को महत्व न देने के आरोप के विपरीत संघ यह कार्य कुटुंब प्रबोधन और परिवार परंपरा को सशक्त करने के कार्यक्रम में पहले से कर रहा है।
• डॉ. वैद्य ने कहा कि भारत के चिंतन में परिवार सबसे छोटी इकाई होती है। परिवार में महिलाओं की भूमिका सबसे प्रमुख होती है। संघ की शताब्दी योजना के अंतर्गत महिलाओं की सहभागिता बढ़ाने पर बैठक में चर्चा की गई।
•महिलाओं में आपसी संपर्क बढ़ाने के साथ देशभर में 411 सम्मेलन आयोजित करने की योजना बताता है कि इसे लेकर कितनी गंभीरता है। अभी तक 12 प्रांतों में इस तरह के 73 सम्मेलन आयोजित किए जा चुके हैं। इनमें 1 लाख 23 हजार से अधिक महिलाएं शामिल हुई। गैर राजनीतिक स्तर पर महिलाओं का सम्मेलन बुलाना आसान नहीं होता।
संघ के 97 वर्ष की यात्रा के मुख्य चार पड़ाव रहे हैं। संगठन, विस्तार, संपर्क व गतिविधि ये तीन पड़ावों पर लंबे समय तक फोकस रहा। सन् 2006 में संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी की जन्मशती के के साथ हर स्वयंसेवक द्वारा राष्ट्र की उन्नति के लिये कुछ न कुछ कार्य करने का प्रण लेने की बात आई और तीन के साथ यह चौथा तब से आगे बढ़ रहा है। स्वयंसेवक चाहे जिस संगठन में हो, वो भारत की उन्नति के लिए एक कार्य अपने हाथ में ले इसके लिए लगातार कोशिश हो रही है। जरा सोचिए , भारत में ऐसे कितने संगठन हैं जो अपने सदस्यों को देश की उन्नति के लिए कोई एक काम करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं? आप देखेंगे कि संपूर्ण देश में स्वयंसेवकों द्वारा ऐसे कार्य किया जा रहे हैं जिनकी अनजान लोगों को उम्मीद भी नहीं होती। कोई ऐसा क्षेत्र नहीं जहां संघ के लोग काम नहीं कर रहे हैं। कई बार आप उस कम की सराहना करते हैं यहां तक कि उसमें सहयोग भी करते हैं किंतु आपको पता भी नहीं चलता कि वह संघ के स्वयंसेवकों के द्वारा किया जा रहा है। संघ के हर बैठक में समाज में अच्छे लोगों जिन्हें संघ सज्जन शक्ति कहता है वो सामाजिक कार्यों में सक्रिय हो इसके प्रयास पर हमेशा चर्चा होती है। समन्वय बैठक का भी एक प्रमुख बिंदु यही था। यानी शाखा और संगठन विस्तार के अलावा समाज के अच्छे लोगों के पास जाकर उन्हें पेश की उन्नति के लिए कोई एक काम करने के लिए प्रेरित करने का अभियान संघ लगातार चलाएगा। ऐसे अभियानों से भी संघ के संगठन शक्ति बढ़ती है। इसके संगठन संबंधी कुछ आंकड़े देखिए।
•संघ की शाखाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। कोरोना से पूर्व सन् 2020 में देश में 38 हजार 913 स्थानों पर शाखाएं थीं, 2023 में यह बढ़कर 42 हजार 613 हो गया है। यानी 9.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
• संघ की दैनिक शाखाओं की संख्या 62 हजार 491 से बढ़कर 68 हजार 651 हो गई है। इनमें 60 प्रतिशत विद्यार्थी शाखाएं हैं।
• संघ की आधिकारिक वेबसाइट पर जॉइन आरएसएस के माध्यम से प्रति वर्ष एक से सवा लाख नए लोग जुड़ने की इच्छा जता रहे हैं। उनमें से अधिकतर 20 से 35 वर्ष तक की आयु के हैं।
विरोधी महिलाओं पर फोकस करने या फिर लोगों से देश की उन्नति के लिए एक काम करने के अभियान को भी संघ का छद्म व्यवहार कहेंगे, पर समाज वही धारणा बनाएगा जो प्रत्यक्ष देखता है। संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों का अगर लगातार विस्तार हो रहा है तो इसी कारण कि राजनीतिक और वैचारिक विरोध के विपरीत आम समाज इसके प्रति अच्छी धारणा रखता है। विरोधी शांत मन से इस पर विचार करें तो वह भी काफी कुछ सीख सकते हैं।
गुरुवार, 14 सितंबर 2023
जीएमएफ और अरिहंत हॉस्पिटल, देहरादून द्वारा सभी समुदायों और सभी धर्मों के लिए पैन इंडिया हेल्थकेयर लंगर सेवा
संवाददाता
नई दिल्ली। ग्लोबल मिडास फाउंडेशन (जीएमएफ), दिल्ली स्थित एक सामाजिक संगठन, पिछले 3 वर्षों से "सरबत दा भला" और "चरदी कला" के सिखी मूल्यों और विचारधारा के आधार पर पंथ और संगत सेवा कर रहा है। यह हेल्थकेयर लंगर के हिस्से के रूप में है सेवा ने धार्मिक और आध्यात्मिक संगठनों, निवासी कल्याण संघों, बाजार कल्याण संघों, शैक्षणिक संस्थानों और दिल्ली पुलिस के सहयोग से पिछले 3 वर्षों के संचालन में दिल्ली और पंजाब भर में कई मुफ्त स्वास्थ्य जांच शिविर, नेत्र जांच शिविर आयोजित किए हैं। इसके अलावा उन्होंने ग्लोबल मिडास फाउंडेशन (जीएमएफ) द्वारा अनुशंसित लोगों को रियायती दरों और समय पर परामर्श, परीक्षण, निदान, जांच, उपचार और सर्जरी प्रदान करने के लिए विभिन्न प्रयोगशाला परीक्षण सुविधाओं, डायग्नोस्टिक केंद्रों, नर्सिंग होम और अस्पतालों के साथ समझौता किया है।
बुधवार, 13 सितंबर 2023
भारत ने जी 20 को दिया नया कलेवर
अवधेश कुमार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जी-20 अध्यक्ष के नाते जब स्वस्तिअस्तु विश्व: यानी संपूर्ण विश्व सुखी हो के साथ शिखर सम्मेलन के समापन की घोषणा की तो ये कोरे शब्द नहीं थे। जी 20 का नई दिल्ली शिखर सम्मेलन अनेक दृष्टियों से ऐतिहासिक और सफल माना जाएगा। यूक्रेन युद्ध के बाद पहला सम्मेलन है जिसकी घोषणा पत्र से कोई सदस्य देश नाखुश या असंतुष्ट नहीं है। अमेरिका और पश्चिमी देश संतुष्ट हैं तथा रूस और चीन भी। इस कूटनीति को भारत ने कैसे साधा होगा इसकी कल्पना आसान नहीं है। 37 पृष्ठों के घोषणा पत्र में पृथ्वी, यहां के लोग, शांति व समृद्धि वाले खंड में चार बार यूक्रेन युद्ध की चर्चा है किंतु रुस का नाम नहीं है। इन पंक्तियों को देखिए, सभी देशों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों व सिद्धांतों के अनुरूप कार्य करना चाहिए। किसी भी दूसरे देश की अखंडता व संप्रभुता का उल्लंघन धमकी या बल के उपयोग से बचना चाहिए। नाभिकीय हथियारों के इस्तेमाल या इस्तेमाल की धमकी अस्वीकार्य है। यूक्रेन युद्ध के बीच में राष्ट्रपति पुतिन ने नाभिकीय हथियार के उपयोग तक की धमकी दे दी थी। इसमें प्रधानमंत्री की वह पंक्ति भी है जो उन्होंने पुतिन को कहा था कि यह समय युद्ध का नहीं है। अगर पिछले बाली घोषणा पत्र को देखें तो वह रूस के विरुद्ध था और रूस से यूक्रेन खाली करने की आवाज उठाई गई थी। तुलना करें तो इस प्रश्न का उत्तर सामान्यतः नहीं मिलेगा कि भारत ने अमेरिका को कैसे यह प्रस्ताव स्वीकार करने के लिए तैयार किया।
सम्मेलन के पहले दिन दूसरे सत्र में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली घोषणा पत्र स्वीकार करने की घंटी बजाई तभी साफ हो गया कि भारत की कूटनीति सफल रही है। सम्मेलन आरंभ होने के एक दिन पहले तक यूक्रेन से लेकर जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा, विकासशील और कमजोर देश को वित्तीय सहायता व सस्ते कर्ज उपलब्ध कराने ,साइबर सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सहमति नहीं बन रही थी। घोषणा पत्र में यूक्रेन युद्ध से जुड़ा पैराग्राफ खाली छोड़ना पड़ा था। भारतीय प्रयासों ने रंग लाया और घोषणा पत्र में यूक्रेन युद्ध, जलवायु परिवर्तन, लैंगिक असमानता ,आर्थिक चुनौतियां, हरित विकास, आतंकवाद, क्रिप्टो करेंसी, महिलाओं के उत्थान समेत वो सारे मुद्दे शामिल किए गए जिन्हें भारत ने तैयार किया था।
इस एक पहलू से साफ हो जाता है कि अपनी अध्यक्षता में भारत ने किस तरह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, देशों के संबंध, राजनय, व्यक्ति के जीवन आदि से संबंधित भारतीय विचारों को लेकर पिछले एक वर्ष तक काम किया होगा। भारत के लगभग 60 शहरों में 220 से ज्यादा बैठकें जी 20 की हुई है। इस कारण भी यह इतिहास का सबसे विस्तारित, महत्वाकांक्षी और सफल सम्मेलन साबित हुआ क्योंकि इनमें कुल 112 परिणाम दस्तावेज व अध्यक्षीय दक्षतावेज तैयार हुए। पिछले इंडोनेशिया की राजधानी बाली के सम्मेलन में कुल 50 परिणाम व अध्यक्षीय दस्तावेज स्वीकृत हुए थे। इनमें 73 परिणाम दस्तावेज यानी आउटकम डॉक्यूमेंट हैं जो देश के विभिन्न शहरों में सदस्य देशों के मंत्रियों और अधिकारियों के ओर से बैठकों में बनी सहमति पर तैयार हुए हैं। ऐसा कोई विषय नहीं जिन पर बैठक नहीं हुई। जब भारत ने इसका नारा ही एक पृथ्वी, एक परिवार और एक भविष्य दिया तथा इसके साथ वसुधैव कुटुंबकम जोड़ दिया तो फिर इसके परे कुछ हो ही नहीं सकता था। सच कहा जाए तो भारत ने जी 20 की न केवल कुछ बदली बल्कि इसे नया कलेवर दे दिया। निश्चय ही इसके सदस्य देशों के साथ अन्य देशों को भी इन शब्दों के भारतीय अर्थ समझाए गए होंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने इंडिया की जगह भारत लिखा हुआ था। भारत नाम के वैश्विक स्वीकृति की ठोस नींव पड़ चुकी है। भारत शब्द के साथ विश्व यह मानने को विवश होगा कि हम लाखों वर्ष पूर्व के प्राचीनतम राष्ट्र हैं। इस नाते भी जी 20 सम्मेलन को इतिहास के अध्याय में याद किया जाएगा।
भारत के लिए यह पहला अवसर था जब विश्व के सभी शक्तिशाली देशों के प्रतिनिधि तथा रूस, चीन और स्पेन को छोड़कर सारे राष्ट्र प्रमुख, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रमुख एवं सत्ता शीर्ष से जुड़े अधिकारी उपस्थित थे। भारत में स्वयं नौ देशों को विशेष तौर पर आमंत्रित किया था। भारत के लिए भविष्य की महाशक्ति संभावना का विश्वास दिलाने का अब तक का सबसे बड़ा अवसर था और यह मानने में कोई हिचक नहीं है कि इस उद्देश्य को कल्पना से भी श्रेष्ठ तरीके से भारत ने प्राप्त किया है। भारत मंडपम देखने से ही भारत की सांस्कृतिक ,आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत के साथ आधुनिक ज्ञान विज्ञान की उपलब्धियां ,आर्थिक व सैनिक क्षमता, विविधताओं, राष्ट्र की अवधारणा, राष्ट्र - राज्य के रूप में भविष्य के उद्देश्यों की समझ आने वाली लायक झलक मिल रही थी। स्वयं प्रधानमंत्री कोणार्क के जिस काल चक्र के सम्मुख खड़े होकर सभी नेताओं का स्वागत कर रहे थे उसके दर्शन में ही संपूर्ण सृष्टि के संचालन का ज्ञान निहित है। राष्ट्रपति के रात्रि भोज में स्वागत करने की पृष्ठभूमि नालंदा विश्वविद्यालय की तस्वीर यह बताने के लिए थी कि जब विश्व आधुनिक शिक्षा पद्धति से अनभिज्ञ था तब भी भारत में व्यवस्थित विश्वविद्यालय थे जहां हर विषयों की शिक्षा थी और अलग-अलग देशों से छात्र यहां पढ़ने आते थे।
भारत ने इस सम्मेलन को महिमामंडित कर जैसी भव्यता और सुव्यवस्थित आयोजन बनाया वह अगले अध्यक्ष ब्राजील के लिए एक मानक बन गया है। यह स्वीकार करना होगा कि भारत ने अपने नेतृत्व में जी 20 का एजेंडा, लक्ष्य, सदस्यों की सोच को काफी हद तक बदलने में सफलता पाई है। वसुधैव कुटुंबकम यानी संपूर्ण विश्व को एक परिवार मानकर विश्व व्यवस्था की रचना करने की दिशा में 55 सदस्यीय अफ्रीकन यूनियन को सदस्य बनाने में भारत क़ो सफलता मिली, 125 विकासशील व गरीब देशों का सम्मेलन बुलाकर ग्लोबल साउथ या वैश्विक दक्षिण के एजेंडा को इसमें रखा गया। इस तरह भारत ने संदेश दिया कि अंतरराष्ट्रीय समस्याओं का समाधान ज्यादा लोकतांत्रिक तरीके से संभव है और इसमें छोटे -बड़े, संपन्न विकासशील और गरीब सभी देशों को सहभागी बनाया जाए ताकि उन्हें आभास हो कि विश्व व्यवस्था की रचना में उनकी भूमिका है। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में मुख्य भूमिका निभाने वाले देशों से इनका संवाद एवं मिलन ही नहीं होगा तो असंतोष और गुस्सा पैदा होगा।
प्रधानमंत्री ने 15 द्विपक्षीय बैठकें भी कीं। चीन भारत की सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव के विरुद्ध भारत काम कर रहा है। इटली की प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि वह इससे बाहर निकल रहा है। भारत, पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच संपर्क गलियारे को जल्द लॉन्च करने की घोषणा हुई। भारत, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, फ्रांस, इटली, जर्मनी व यूरोपीय संघ के अन्य देशों तथा अमेरिका को शामिल करते हुए इस संपर्क गलियारे और बुनियादी ढांचे पर सहयोग की आधारभूमि बन गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेरिस जलवायु सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन की शुरुआत की। इस बार वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन की शुरुआत हुई। वैश्विक स्तर पर पेट्रोल के साथ एथेनॉल मिश्रण को बढ़ाकर 20% तक करने की अपील के साथ इसके सदस्य बनने की अपील की गई। बहुपक्षीय विकास बैंक से लेकर डिजिटल सार्वजनिक आधारभूत संरचना आदि अनेक ऐसे बिंदु हैं जिनको उपलब्धियां के रूप में उल्लेखित किया जा सकता है।
कुल मिलाकर विश्व के नेताओं ने एक वर्ष के सम्मेलनों और दिल्ली समापन के साथ भारत की प्राचीन सभ्यता - संस्कृति ,धर्म ,विरासत, राष्ट्र - राज्य की अवधारणा, वर्तमान ताकत, एकता, अखंडता के इसके सूत्र, वैश्विक सोच, आधुनिक प्रगति और भविष्य में विश्व का शीर्ष देश बनने के संकल्प को साक्षात्कार देखा और समझा। इस मनोविज्ञान का असर आने वाले समय में दिखाई देगा और भारत ज्यादा मुखर होकर अपनी सोच के अनुरूप भावी विश्व व्यवस्था को दिशा देने में सफल भूमिकाएं निभाएगा। जी 20 को इसके अनुकूल एक सशक्त आधार भारत के नेतृत्व में दे दिया गया है। उम्मीद की विश्व आर्थिक और तकनीकी विकास से लेकर संपूर्ण विश्व में खाद्यान्न व स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं उपलब्ध कराने आदि की दृष्टि से समावेशी होगा तथा सहयोग और सहकार की भूमिका निभाते हुए तनाव दूर करने में भी सफल होगा।
गुरुवार, 7 सितंबर 2023
उदयनिधि के सनातन धर्म विरोधी वक्तव्य के निहितार्थ
उदयनिधि स्टालिन तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे और युवा मामलों के मंत्री भी हैं। ऐसे शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वो ऐसा वक्तय न दें जिससे करोड़ लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हों। उदयनिधि ने सनातन धर्म की तुलना डेंगू, मलेरिया और कोरोना से करते हुए कहा कि ये कुछ ऐसी चीजें हैं, जिनका केवल विरोध नहीं किया जा सकता, बल्कि उन्हें खत्म करना जरूरी होता है। इस बयान के विरुद्ध संपूर्ण विश्व के हिंदू समाज के भीतर आक्रोश पैदा होना स्वाभाविक है। लेकिन तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति और उदयनिधि की पार्टी द्रमुक की विचारधारा तथा अतीत एवं वर्तमान को देखने पर यह निष्कर्ष सही नहीं लगेगा। उन्होंने जो कुछ बोला है वह उनकी राजनीतिक धारा की सोच है। उनके विरुद्ध मुकदमा दर्ज होने के बाद उनकी प्रतिक्रिया देखिए। उन्होंने कहा कि हम पेरियार और अन्ना के फॉलोवर हैं। मैं आज, कल और हमेशा यही कहूंगा कि द्रविड़ भूमि से सनातन धर्म को रोकने का हमारा संकल्प बिल्कुल भी कम नहीं होगा।
इसके बाद आप यह नहीं कह सकते कि वह उत्तेजना या भावावेश में बोल गए। वे जिस कार्यक्रम में बोल रहे थे उसका नाम ही था, सनातन उन्मूलन कार्यक्रम। उन्होंने इस नाम की भी प्रशंसा की और कहा- सनातन क्या है? यह समानता और सामाजिक न्याय के खिलाफ है। सनातन का अर्थ होता है- स्थायी यानी ऐसी चीज जिसे बदला नहीं जा सकता। सनातन उन्मूलन सम्मेलन में उदयनिधि स्टालिन के अलावा कई मंत्री और द्रमुक नेता शामिल हुए। सनातन के उन्मूलन नामक शीर्षक से कार्यक्रम का आयोजन ही बताता है कि तमिलनाडु में किस तरह की विचारधारा और राजनीति को प्रश्रय दिया जा रहा है। निश्चित रूप से इसकी निंदा की जाएगी और विरोध भी होगा। द्रमुक आईएनडीआईए गठबंधन का एक मुख्य घटक है इसलिए अन्य घटक दलों से पूछा जाएगा कि आपका इस पर क्या मत है? कांग्रेस सहित अन्य पार्टियों ने इस बयान से तो अपने को अलग किया लेकिन जितना प्रखर विरोध इसका होना चाहिए नहीं किया। यह राजनीतिक विवशता दुर्भाग्यपूर्ण है।
हालांकि उदयनिधि के बयान पर आश्चर्य का कोई कारण नहीं है। उदयनिधि के दादा करुणानिधि के ऐसे बयान आते रहते थे। अयोध्या में श्रीराम मंदिर के विरोध में उन्होंने कहा था कि राम का जन्म प्रमाण पत्र कहां है? राम सेतु के बारे में उन्होंने कहा कि उसको किस सिविल इंजीनियर ने बनाया था? भाजपा उसका नाम बताए। द्रमुक के नेताओं के ऐसे बयान आते हैं। 1960 दशक में द्रमुक नेता रामास्वामी नायककर ने तब मद्रास शहर में ट्रकों पर श्रीराम, सीता जी और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियों की झाड़ू और जूतों से पिटाई करने वाली झांकियां निकाली थी। इसके पीछे लक्ष्य था कि ब्राह्मणों व सनातनियों को भड़काओ और उनके विरुद्ध दूसरी जातियों को लामबंद करो। ब्राह्मण और शुद्र नाम लेकर द्रमुक बहुसंख्यक दलितों का समर्थन पाता है।
दरअसल, द्रमुक निकला ही हिन्दू धर्म विरोधी विचारधारा से। 1916 में टीएम नायर और पी त्यागराज चेट्टी ने द्रविड़ राजनीति की शुरुआत इस आधार पर की कि हम उत्तर भारतीय आर्यों से अलग हैं। उन्होंने जस्टिस पार्टी की स्थापना की जिसमें आई रामास्वामी पेरियार भी शामिल हुए। अंग्रेजों ने भारत में फूट डालो राज करो की नीति के तहत लोगों की सोच बदलने के लिए इतिहास, धर्म, संस्कृति ,समाजशास्त्र की पुस्तकें अपने अनुसार लिखवाईं जिसमें कहा गया कि आर्य बाहर से आए और उनका द्रविड़ों के साथ संघर्ष हुआ जो जारी है। आर्यों ने द्रविड़ों पर अपनी धर्म व्यवस्था लादने की कोशिश की। अंग्रेजों ने ही जस्टिस पार्टी की स्थापना के लिए प्रेरित किया और उसे मदद देते रहे। अन्नादुरई भी पेरियार के साथ आए लेकिन बाद में अलग होकर उन्होंने द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम या द्रमुक की स्थापना की। पूरा आंदोलन हिंदू धर्म की मान्यताओं पर चोट कर ऐसी सोच स्थापित करने वाला था जिसके कारण तमिलनाडु के निवासियों को लगे कि वे भारत और यहां की संस्कृति या धर्म के अंग है ही नहीं। इसी कारण तमिलनाडु में अलग देश का भी आंदोलन चला। हिंदी विरोध का सबसे तगड़ा आंदोलन तमिलनाडु में ही चला। यह बात अलग है कि तमिलनाडु के ही विवेकशील नेताओं ने इन सबका विरोध किया। उदाहरण के लिए सी राजगोपालाचारी ने भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी की वकालत की। उन्होंने गीता और उपनिषदों पर टीकायें लिखकर बताया कि आर्य द्रविड़ के नाम पर झूठ फैलाया जा रहा है। रामचरितमानस और रामायण के बारे में गलत बातें फैलाये जाने की काट के लिए उन्होंने गद्य में चक्रवर्ति तिरुमगन लिखा जो रामायण कथा है। उन्होंने स्वयं और उनकी प्रेरणा से काफी लोग ऐसे लेख लिखते रहे जिससे साबित होता था कि आर्य द्रविड़ भेद भारत में या हिंदू धर्म में नहीं है और तमिल भी सनातनी हिंदू हैं।
बाद के कालखंड में कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी कमजोर हुई और द्रविड़ राजनीति आगे बढ़ने लगी। हिंदी के विरुद्ध 60 और 70 के दशक के आंदोलन की उग्रता और उत्तेजना के कारण तमिलनाडु की सोच में व्यापक अंतर आया और द्रविड़ दल सशक्त हुये। 1977 से आज तक द्रमुक और अन्नाद्रमुक दो पार्टियों के इर्द-गिर्द तमिलनाडु की राजनीति चल रही है। भाजपा पहले वहां शक्तिशाली नहीं है लेकिन उसका समर्थन बढा है।दूसरे दलों को लगता है कि हिंदू धर्म पर जितना चोट करेंगे, उनकी राजनीति की धारा वहां सशक्त होगी। अन्नाद्रमुक के भाजपा के साथ होने कारण भी वे अपने इस हिंदू धर्म विरोधी, हिंदी विरोधी तेवर को आक्रामक बनाए रखती है।
जो कुछ उदयनिधि या दूसरे नेता अपनी राजनीति के लिए बोलते हैं वह सच नहीं है और उनकी अज्ञानता का भी द्योतक है। सनातन का अर्थ ठहराव या जड़ता नहीं है। नित्य नूतन सनातन: यानी जो नित्य नूतन है वही सनातन है। जैसे सूर्य सनातन है। सुबह सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक को क्या आप जड़ ,स्थिर या ठहरा हुआ कहेंगे ? यही तो सनातन है। दूसरे, तमिलनाडु हिंदू धर्म, सभ्यता- संस्कृति और अध्यात्म का महत्वपूर्ण केंद्र है। पूरे तमिल संगम साहित्य को उठा लीजिए हिंदू इतिहास, विचारों और कथाओं से भरे पड़े हैं। विविधता में एकता हमारी संस्कृति है लेकिन विरोधी इस एकता की बजाय विविधता को उठाकर तमिल संस्कृति को भारतीय संस्कृति से अलग साबित करते रहे हैं। तमिल संस्कृति भारतीय संस्कृति ही थी। संत तिरुवल्लुवर की रचना तिरुक्कुरल का अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। यह ग्रंथ लोगों को ईश्वर में आस्था की ही बात करता है और बताता है कि पूजा पाठ के लिए संन्यासी होने की आवश्यकता नहीं, गृहस्थ होकर भी आप ऐसा कर सकते हैं। यह तो हिन्दू धर्म की ही धारा है। हिंदू धर्म की दो प्रमुख शाखाएं शैव और वैष्णव तमिलनाडु में न केवल मजबूत रहे बल्कि वहां के संतो ने अपने मार्ग का प्रसार भारत के दूसरे क्षेत्रों में भी किया। नयनमार या नयनार संतों की लंबी परंपरा है जो भगवान शिव के भक्त थे। ऐसे 63 संतों के नाम हमारे ग्रंथो में उपलब्ध हैं। झूठ है कि सारे ब्राह्मण थे। ये समाज के सभी जातियों से आते थे। इनके रचित भजन व मंत्र संपूर्ण देश में गाये व पढ़े जाते हैं। विष्णु या नारायण की उपासना करने वाले 12 संतों, जिन्हें आलवार कहते हैं, सर्वत्र सम्मान है और इनमें निम्न जाति के भी थे। वैष्णव संप्रदाय के पंथ विशिष्टाद्वैतवाद , अद्वैतवाद, द्वैतवाद सबका स्रोत तमिलनाडु और आसपास ही है। विशिष्टाद्वैतवाद के संस्थापक संत रामानुजाचार्य के मानने वाले पूरे भारत में है। द्वैतवाद के संत माधवाचार्य ने जिन 37 ग्रंथों की रचना की वह संपूर्ण भारत में प्रचलित हैं। इसलिए आर्य और द्रविड़ भेद या तमिल संस्कृति भारतीय संस्कृति से अलग आदि विचार तथ्यों से बिल्कुल पड़े हैं।
कोई पार्टी इतनी हैसियत नहीं रखता कि हिंदू धर्म को खत्म कर दे। उदयनिधि की बातें इसलिए डराती हैं कि यह हिंदू समाज की एकता की कोशिशों के साथ भारत की एकता अखंडता पर वैचारिक चोट करने वाले हैं। लेकिन गुस्सैल प्रतिक्रिया देने की बजाय तथ्यात्मक प्रतिवाद करें। आईएनडीआईए के दलों को भी विचार करना पड़ेगा कि समाज और देश की एकता से बड़ी कोई राजनीति नहीं हो सकती।
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