गुरुवार, 1 जून 2023

नई संसद भवन के साथ इतिहास का निर्माण

अवधेश कुमार

नए संसद भवन के उद्घाटन के समय लगभग राजनीतिक परिदृश्य वही था जो हमने इसके शिलान्यास- भूमि पूजन और योजना के संदर्भ में देखी। विपक्षी दलों का बड़ा समूह इसका बहिष्कार कर रहा है।  नरेंद्र मोदी और भाजपा का हर हाल में विरोध करना ही है यह व्यवहार अनुचित है। क्या करीब 100 वर्ष पहले अंग्रेजों द्वारा अपने शासन की मानसिकता से बनाया गया संसद भवन और उसके आसपास की पूरी रचना अनंतकाल तक रहनी चाहिए थी? यह बताने के लिए कि हमने भारत में भी संसदीय प्रणाली अपना लिया है अंग्रेजों ने संसद भवन का निर्माण किया। आजादी के समय न हमारे पास इतना समय था और न संसाधन कि उसका परित्याग कर नए भवन में संविधान सभा चले या निर्वाचित सांसद संसदीय गतिविधियों में हिस्सा ले सकें।   कहा जा रहा है कि इसी भवन में हमारी आजादी की घोषणा हुई , संविधान सभा वहीं बैठी आदि आदि।  क्या इसके आधार पर उसी संसद भवन को बनाए रखा जाएगा?

इसमें लगातार फेरबदल और निर्माण होते भी रहे हैं।1956 में और मंजिलें जोड़ीं गईं थो 1975 में संसद एनेक्सी का निर्माण हुआ। 2002 में अपग्रेडेशन हुआ, पुस्तकालय भवन बना जिसमें कमिटी कक्ष के अलावा सम्मेलन कक्ष और एक सभागार तैयार करना पड़ा। यह भी कम पड़ा तो 2016 में संसद एनेक्सी का और विस्तार किया गया। संसद भवन परिसर की केवल मुख्य संरचना ही एक हद तक पुरानी है, शेष बहुत कुछ लगातार निर्मित हुआ है।

संसद भवन में अब वर्तमान एवं भविष्य के आवश्यकताओं को देखते हुए बहुत ज्यादा परिवर्तन की गुंजाइश नहीं रह गई थी। कई पीठासीन अधिकारियों ने सांसद भवन के अंदर की समस्याओं पर चिंता व्यक्त करते हुए इसके समाधान करने की बात की। 2012 में तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने संसद भवन को रोते हुए तक कह दिया। तब वर्तमान संसद भवन परिसर के विकल्प या नए संसद भवन के लिए एक अधिकार प्राप्त समिति के गठन को स्वीकृति मिली।  2015 में तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने  संसद भवन के निर्माण का प्रस्ताव दिया, जो  आधुनिक तकनीकों से लैस होने के साथ सांसदों की संख्या बढ़ने पर उन्हें समायोजित करने वाला हो।  सन् 2026 में परिसीमन के बाद सांसदों की संख्या बढ़ने की संभावना है। नये संसद भवन के बारे में जितनी जानकारी है उसके अनुसार अनेक सॉलियाथू और सुविधाओं से युक्त हर तरह की आवश्यकता को पूरी करने वाली है। न केवल सांसदों की बढ़ी हुई संख्या अगले 100 वर्षों तक इसमें समायोजित हो सकेंगी बल्कि आधुनिक तकनीकों में भी अद्यतन है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों बाद अंग्रेजों का भवन ही हमारे लोकतंत्र की शीर्ष इकाई का स्थान हो यह समझ नहीं आता। अंग्रेजों ने संसद से लेकर आसपास के इलाकों को, जिसे सेंट्रल विस्टा कहा जाता है ,अपने अनुसार विकसित किया। उनमें पिछले 75 वर्षों में हुए परिवर्तन भी नाकाफी हैं। आवश्यक हो गया था कि कोई सरकार साहस कर भविष्य की चुनौतियों और आवश्यकताओं का आकलन करते हुए पूरे क्षेत्र का पुनर्निर्माण करे। विरोधी पार्टियां भले राष्ट्रपति से उद्घाटन न कराए जाने को मुद्दा बनाएं, सच यही है कि वे पूरी परियोजना के विरुद्ध थे। न्यायालय से लेकर हर स्तर पर इसे बाधित करने की कोशिश हुई।  राष्ट्रपति उद्घाटन करें इसमें समस्या नहीं है पर प्रधानमंत्री करें इसमें भी समस्या नहीं होनी चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोध करना है तो अवश्य करिये, किंतु यह पूरे देश के लिए आत्मसंतोष का विषय होना चाहिए कि हम इस स्थिति में है कि विश्व के श्रेष्ठ संसद भवन निर्मित करा सकते हैं और उसके अनुरूप आसपास के सरकारी भवनों और स्थलों को भी उत्कृष्ट ढांचे में नए सिरे से खड़ा कर सकते हैं।

हालांकि विरोध करने वाली पार्टियों का 540 लोकसभा में 143 तथा 238 की राज्यसभा में 91 सदस्य हैं। इस तरह लोकसभा में 26.38% एवं राज्यसभा में 38.23% पार्टियां विरोध में है। जो पार्टियां  भाग ले रही हैं लोकसभा में उनकी सदस्य संख्या 338 यानी 60.82% और राज्यसभा में 102 यानी 42.86% है। सत्तापक्ष की ताकत हमेशा ज्यादा होती है क्योंकि उसे बहुमत प्राप्त होता है। इसलिए इस आधार पर मूल्यांकन करना उचित नहीं होगा कि कितनी संख्या साथ है कितनी दूर। मुख्य बात यह है कि क्या विरोध करने वाली पार्टियों का देश, लोकतंत्र और उससे संबंधित ढांचे आदि को लेकर कोई विशेष विजन यानी कल्पना है या नहीं? नरेंद्र मोदी से सहमत हों,  असहमत हों,  एक विजन के तहत उन्होंने समस्त परिवर्तन किए हैं। 1967 से इंडिया गेट के पास मूर्ति की खाली जगह पर सुभाषचंद्र बोस की मूर्ति लगी। जॉर्ज पंचम की मूर्ति हटाने के बाद किसी को शायद आज तक समझ नहीं आया कि वहां किसकी मूर्ति लगानी चाहिए। यह भी प्रश्न है कि 1947 के बाद 20 वर्षों तक वहां जॉर्ज पंचम की मूर्ति क्यों थी? उसके साथ वहां युद्ध स्मारक बनाया गया। इंडिया गेट तक का राजपथ कर्तव्य पथ बना। तो इन सबके पीछे निश्चित रूप से देश के संदर्भ में यह सोच है कि इन स्थानों से क्या संदेश जाए और लोगों के अंदर कैसी मानसिकता पैदा हो।

सुभाषचंद्र बोस स्वतंत्रता और राष्ट्र के लिए लोगों के अंदर दासतां से मुक्ति के लिए सैन्य- वीरत्व- आत्मोसर्ग भाव की प्रेरणा हैं। आधुनिक भारत में उनसे बड़ी प्रेरणा का स्रोत कोई नहीं हो सकता। इसके पहले प्रधानमंत्री मोदी ने 2018 में लालकिले से 22 अक्टूबर को तिरंगा फहराया जो, सुभाष बाबू द्वारा संपूर्ण स्वराज्य की घोषणा का 75वां वार्षिक दिवस था। भारत के पास कभी अपना युद्ध स्मारक नहीं रहा जबकि हमें अनेक युद्ध लड़े, जिनमें हमारे जवानों ने अद्भुत वीरता का प्रदर्शन किया और अनेक वीरगति को प्राप्त हुए। इन सबको मिलाकर संसद और आसपास की सेंट्रल विस्टा परियोजना को देखना होगा। जीवन में स्थलों और प्रतीकों का व्यापक महत्व होता है क्योंकि वहां से आपकी मानसिकता बनती है और संदेश निकलता है। अनेक स्थलों का मोदी काल में इसी तरह या तो पुनर्निर्माण हुआ है , जीर्णोद्धार हुआ है या उन स्थानों पर मूर्तियां लगी हैं।

 वीर सावरकर यानी विधायक दामोदर सावरकर के जन्मदिवस पर संसद भवन के उद्घाटन से भी निःसंदेह विपक्ष को समस्या हो सकती है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने अपने ट्वीट में इसे राष्ट्र निर्माताओं का अपमान तक बता दिया है। मोदी एकाएक वीर सावरकर तक नहीं पहुंचे हैं। वे महात्मा गांधी से आरंभ करते हुए सरदार बल्लभ भाई पटेल, बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ,लोकनायक जयप्रकाश नारायण, डॉ राम मनोहर लोहिया, बिरसा मुंडा, ज्योतिबा फूले, सुभाष चंद्र बोस जैसे महापुरुषों को महत्व देते यहां तक आए हैं । संत रामानुजम से लेकर आदि शंकराचार्य की मूर्तियों का भी उन्होंने अनावरण किया है। तो यह देश के तस्वीर की दृष्टि है जिसमें व्यापकता है। भारत यदि विश्व के प्रमुख देशों की कतार में खड़ा है तो उसके अनुसार उसके सरकारी भवनों में भी भव्यता होनी चाहिए। दिल्ली आने वाले या रहने वाले लोगों को संसद के आसपास पूरे सेंट्रल विस्टा में निर्मित या निर्माणाधीन स्थलों को देखकर भव्यता का अहसास होता है। आज भारत जैसे देश के लिए स्वयं को हर स्तर पर एक बड़े ब्रांड के रूप में पेश करने पर किया गया यह खर्च किसी दृष्टि से अनावश्यक नहीं कहा जाएगा। यह दृष्टि का ही अभाव था कि 14 अगस्त, 1947 को प्राप्त सेंगोल यानी राजदंड को पंडित नेहरू ने वह स्थान नहीं दिया जो उसे मिलना चाहिए था। इसे 1960 से पहले आनंद भवन और 1978 से इलाहाबाद संग्रहालय में रखा गया। जब भारत के सत्ता हस्तांतरण में तमिल विद्वान पंडितों के मंत्रों द्वारा सिद्ध किया गया राजदंड पंडित  जवाहरलाल नेहरू ने प्राप्त किया तो उसे संसद भवन के केंद्र में होना चाहिए था।  भारतीय संस्कृति में इनका केवल प्रतीकात्मक नहीं सूक्ष्म प्रभावकारी महत्त्व  है। देश में किसे याद था कि अंग्रेजों से सत्ता हस्तांतरण के समय भारतीय परंपरा के अनुसार राजदंड स्वयं नेहरु जी ने ग्रहण किया जिसे बाद में शायद विचारधारा के अनुकूल न मानते हुए दिल्ली से बाहर भेज दिया गया। क्या राजदंड आनंद भवन और संग्रहालय के लिए दिया गया था? मोदी सरकार राजदंड को लोकसभा स्पीकर की कुर्सी के बगल में स्थापित कर रही है।  संयोग देखिए कि 14 अगस्त , 1947-राजदंड प्रदानगी समारोह में शामिल पंडितों में से एक आज भी जीवित हैं और वह उन 20 पंडितों में शामिल होंगे जो राजदंड प्रधानमंत्री मोदी को सौंपेंगे। मोदी सरकार नहीं होती तो उस राजदंड को पुनर्स्थापित करने का कार्यक्रम तो छोड़िए कल्पना भी कोई नहीं करता।

स्पष्ट है कि विरोधी इस महत्वपूर्ण अवसर का महत्व नहीं समझ रहे। वे यह भी नहीं सोच रहे कि बरसों बाद जब संसद के उद्घाटन की तस्वीरें देखी जाएंगी या फिर कौन - कौन शामिल थे इसका उल्लेख होगा तो उनमें इस समय के बहिष्कार करने वाले विपक्षी नेता और सांसद नहीं दिखेंगे। इतिहास के अध्याय से स्वयं को वंचित रख ये नेता क्या पाना चाहते हैं? कार्यक्रम में शामिल होकर भी आगे अपना विरोध कायम रख सकते हैं।  इतिहास किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। जो अध्याय लिखे जाने हैं वे लिखे जाते हैं और नया संसद भवन, सेंट्रल विस्टा और सिंगोल के साथ स्वतंत्र भारत में इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय लिखा गया है।

अवधेश कुमार, ई-30,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 110092, मोबाइल- 98910 27208

बुधवार, 31 मई 2023

क्या संयुक्त राष्ट्रसंघ से अलग हो सकता है भारत

अशोक मधुप

 भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र संघ में अपने  लिए विटो पावर देने की मांग करता आ रहा है। वह मानता है  कि विटो पावर धारक पांच राष्ट्र संयुक्त राष्ट्र संघ को अपनी बपौती समझे  बैठे हैं। वह अपनी मर्जी के हिसाब से इसे  चला रहे हैं। चाहे आतंकवाद का मसला हो, या रूस और यूक्रेन युद्ध का। सूडान के आंतरिक विद्रोह और म्यामार के  मामले में  भी तमाशबीन के अलावा संयुक्त राष्ट्र संघ कोई महत्वपूर्ण भूमिका  नही निभा  पा रहा। मनमर्जी का प्रस्ताव न होने पर विटो पावर धारक कोई भी देश अपनी विटो पावर का इस्तमाल कर प्रस्ताव को रोक देता  है। भारत इस सब हालात को लेकर वह चिंतित है। वह इस व्यवस्था में सुधार की मांग कर रहा है। उसकी लंबे समय ये मांग  है कि भारत को विटो पावर दी जाए। किंतु संयुक्त राष्ट्र संघ में यदि भारत को विटो की पावर न मिली तो हाे सकता  है कि आगे चलकर भारत इससे अलग हो जाए। ये बात विटो पावर देश भी धीरे–धीरे समझने लगे हैं।

हिरोशिमा में बीते रविवार को जी-7 के सत्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में सुधार की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि पिछली सदी में बनाई गईं वैश्विक संस्थाएं 21वीं सदी की व्यवस्था के अनुरूप नहीं हैं। जब तक इसमें मौजूदा विश्व की वास्तविकता प्रतिबिंबित नहीं होती, तब तक यह मंच महज चर्चा की एक जगह (टॉक शॉप) बना रहेगा। उन्होंने सवाल उठाया, शांति बहाली के विचार के साथ शुरू हुआ संयुक्त राष्ट्र (यूएन) आज संघर्षों को रोकने में सफल क्यों नहीं हो रहा? संयुक्त राष्ट्र में आतंकवाद की परिभाषा तक क्यों नहीं स्वीकार की गई है?

मोदी ने आश्चर्य जताया कि जब शांति और स्थिरता से जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए बना संयुक्त राष्ट्र अस्तित्व में है, तो इन पर चर्चा के लिए अलग-अलग मंचों की जरूरत क्यों पड़ती है। इसका विश्लेषण किया जाना चाहिए। यह जरूरी है कि संयुक्त राष्ट्र में सुधारों को लागू किया जाए। इस मंच को कमजोर देशों की आवाज भी बनना होगा।

पीएम मोदी ने चीन का नाम लिए बिना कहा, सभी देश यूएन चार्टर, अंतरराष्ट्रीय कानून और सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करें। यथास्थिति को बदलने की एकतरफा कोशिशों के खिलाफ मिलकर आवाज उठाएं। भारत का हमेशा यह मत रहा है कि किसी भी तनाव, किसी भी विवाद का समाधान शांतिपूर्ण तरीके से, बातचीत के जरिये किया जाना चाहिए।

इस कार्यक्रम में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने संयुक्त राष्ट्र में सुधार की मोदी की मांग से सहमति जताई। उन्होंने हिरोशिमा में पत्रकारों से कहा, यह मौजूदा विश्व के अनुरूप सुरक्षा परिषद तथा व्यापार संगठन में बदलाव का वक्त है। दोनों ही संगठन 1945 के शक्ति संबंधों को प्रतिबिंबित करते हैं। वैश्विक वित्तीय संगठन पुराना, निष्क्रिय व अनुपयोगी हो चुका है। यह कोविड व यूक्रेन हमले के बीच वैश्विक सुरक्षा की अपनी मूल जिम्मेदारी को निभाने में विफल रहा है।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर 29 दिसंबर से तीन  जनवरी तक साइप्रस और ऑस्ट्रिया के दो देशों की यात्रा पर थे। उनकी ऑस्ट्रिया की यात्रा तीन जनवरी को खत्म हुई। जयशंकर ने सोमवार को ऑस्ट्रिया के राष्ट्रीय प्रसारक ओआरएफ को एक इंटरव्यू दिया। इस इंटरव्यू में विदेश मंत्री से पूछा गया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के इस सुधार में कितना समय लगेगा। इसके जवाब में उन्होंने कहा, "...जो लोग आज स्थायी सदस्यता के लाभों का आनंद ले रहे हैं, वे स्पष्ट रूप से सुधार देखने की जल्दी में नहीं हैं। मुझे लगता है कि यह एक बहुत ही अदूरदर्शी दृष्टिकोण है... क्योंकि अंततः संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता और उनके अपने हित और प्रभावशीलता दांव पर हैं।" उन्होंने आगे कहा, “मेरी समझ में, इसमें कुछ समय लगेगा, उम्मीद है कि बहुत अधिक समय नहीं होगा। मैं संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों के बीच बढ़ती राय देख सकता हूं जो मानते हैं कि इसमें बदलाव होना चाहिए। यह सिर्फ हमारी बात नहीं हैं।" साइप्रस आदि देशों की यात्रा के बाद उनका ये अभियान और विदेशों के दौरे जारी हैं।

दरअस्ल भारत पिछले काफी समय से अपने लिए विटोपावर की मांग तो कर ही रहा है। साथ ही विश्व के अन्य देशों को संयुक्त राष्ट्र संघ की सच्चाई  बताने में लगा है। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर काफी समय से दूसरे देशों की यात्रा कर संयुक्त राष्ट्र संघ की सच्चाई बताने में लगे हैं। वह बता रहे है कि संयुक्त राष्ट्र संघ की आज कोई उपयोगिता नही रह गई है। यह कोई निर्णय करने में भी सक्षम नही हैं।अकेले भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर  ही नही बल्कि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत कुमार डोभाल भी  लंबे समय से विदेशी दौरों पर हैं। ये दोनों घूम−घूमकर भारत के पक्ष में माहौल बनाने में लगे हैं। अन्य देशों को सुरक्षा परिषद की सच्चाई भी बता रहे हैं। यह भी समझाने में लगे हैं कि कैसे पांच विटो पावर देश गैर विटो पावर देशों के हितों को नुकसान पंहुचा रहे हैं।

भारत अभी तक संयुक्त राष्ट्र के मंच पर अपनी बात कहता आया था। अब दूसरे मंच पर संयुक्त राष्ट्र संघ की गलती निकालना इस बात की और संकेत करता है कि अब वह दिन दूर नहीं जब भारत खुलकर इसका  विरोध करेगा। भारत के इरादे संयुक्त राष्ट्र संघ के विटो पावर धारक देश भी समझने लगे हैं। आगे भी ऐसा ही रहा और सुधार न हुआ तो हो सकता है कि भारत संयुक्त राष्ट्र संघ से अलग हो जाए। ये भी हो सकता है कि भारत के साथ कुछ अन्य देश भी इससे नाता तोड़ लें।

सोमवार, 29 मई 2023

गुरुवार, 25 मई 2023

सिविल सेवा में चयनित युवाओं को जाति और धर्म में मत बांटिए

अशोक मधुप
संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा का कल रिजल्ट आया। भारतीय विदेश  सेवा, भारतीय पुलिस सेवा, भारतीय प्रशासनिक सेवा  और केंद्रीय सेवा समूह ‘ए’ और समूह ‘बी’ में नियुक्ति के लिए कुल 933 उम्मीदवारों की अनुशंसा की गई है। अनुशंसित 933 उम्मीदवारों में से 345 सामान्य, 99 ईडब्ल्यूएस, 263 ओबीसी के हैं, 154 एससी, 72 एसटी के हैं। 178 उम्मीदवारों को वेटिंग लिस्ट में रखा गया है। परीक्षा में इशिता किशोर ने एयर एक रैंक हासिल की है। उसके बाद गरिमा लोहिया, उमा हरथी एन और स्मृति मिश्रा रहीं। इस बार खास बात यह की लड़कियों ने परीक्षा में दबदबा कायम किया है।
रिजल्ट आते के साथ ही जाति और धर्म के लंबरदारों ने विजयी होने अपनी जाति और धर्म के युवाओं को खोजकर उन्हें बधाई देना शुरू कर दिया। कोई विजयी को ब्राह्मण बता रहा है कोई जाट। कोई चयनित को ठाकुर बताकर बधाई दे रहा है तो कोई सैनी बताकर। प्रदेश के और जनपद के चयनित युवाओं को भी बधाई दी जा रही है। कोई गांव के लोगों को अपने गांव का बताकर बधाई दे रहा है, तो कोई जिले का बताकर। कहीं अपनी जाति वे विजयी आईएएस को समाज की ओर से सम्मानित करने की बात की जा रही है तो कहीं गांव और जनपद की ओर से। कोई ब्राह्मण समाज की और से बिरादरी के चयनित को सम्मानित करने की बात कर रहा है। तो कोई जाट युवाओं का जाट बिरादरी की ओर से सम्मानित करने के दावे कर रहा है। जाति में भी गोत्र तक की खोज होने लगी। इन चयनित युवाओं में सब अपनी-अपनी बिरादरी के युवा खोजने में लगे हैं। सब अपनी ढपली लिए हैं, अपनी जाति, धर्म और संप्रदाय की माला जपने में लगे हैं। कहीं किसी को बिहार का बताया जा रहा है तो कहीं झारखंड का।
देश के विकास की गाथा लिखने निकले इन युवाओं का जाति और धर्म में बांटा जा रहा है। इन युवाओं को जातियों, धर्म और संप्रदाय में बांटने का जाने.अनजाने किया जा रहा प्रयास बहुत गलत गलत कार्य है। ये समाज को जाति, वर्ग और धर्म में बांटने के षड्यंत्र का एक भाग है। हम पहले ही बहुत विभाजित हैं। इस सामज के पहले से ही चले आ रहे विखंडन को ही एकत्र करने के प्रयास के बाद भी ज्यादा कामयाबी नहीं मिल रही। अब ये नई खिंच रही विभाजन की रेखा समाज में और बड़ी खाई पैदा करेगी। इससे बचने और दूर रहने की जरूरत है। ऐसे लोगों को समझाने की जरूरत है।
संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा के चयनित युवा देश के विकास की गाथा लिखने के लिए आए हैं। सिविल सेवा में वे सभी मैरिट से चुने गए। इनका कार्य देशवासियों को समान रूप से सामाजिक योजनाओं का लाभ दिलाना, बिना भेदभाव के लिए न्याय करना है। नागरिकों के लिए न्याय कर समान रूप से सामाजिक सुविधाएं उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी इन्ही पर आती है। गरीबों को आगे लाकर उन्हें विकास की धारा में शामिल कराने का दायित्व भी इनका ही बनता है। कोई कितना भी सम्मानित कर ले, बधाई दे ले, ये पद पर आकर वहीं करेंगे, जो इन्हें आदेश होंगे। जो कानून कहेगा, जो सरकार की गाईड लाइन बताएगी। ये न जाति के प्रभाव में आएंगे, न समुदाए के न धर्म की रेखा इनके निर्णय में बाधा बनेगी।ऐसे में इन्हें जाति, वर्ग और धर्म में बांटना गलत है।ये देश और समाज के हैं। इन्हें उसी का रहने दीजिए। काफी समय से एक बात अैर तेजी से बढ़ी है। दलित की लड़की से से बलात्कार। बलात्कार के बाद दलित युवती की हत्या। इस तरह की बात करने वाले, नारे लगाने वाले अैर खबर लिखने वालों के लिए बताते चलें कि बेटी गांव की होती है, समाज की होती है। वह न दलित की होती है, न सर्वण की। इस तरह की बात करना भी इसी विखंडन का हिस्सा है। इसे जितनी जल्दी समझ लिया जाए, उतना ही बेहतर है।
ऐसा ही पिछले कुछ समय से देश के शहीद और क्रांतिकारियों के साथ हो रहा है। महात्मा गांधी को बनिया, लाल बहादुर शास्त्री को कायस्थ, कांतिकारी चंद्रशेखर आजाद को ब्राह्मण बताया जा रहा है तो महाराणा प्रताप को राजपूत। महापुरूष, शहीद और क्रांतिकारी देश और समाज के होते हैं। जाति और धर्म के नही। शहीद स्थनों पर सभी धर्म और जाति के लोग जाते तथा श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के नूरपुर में आजादी की लड़ाई में थाने पर ध्वजारोहण करने का प्रयास करते दो युवक प्रवीण सिंह और रिखी सिंह शहीद हुए। ये पूरे समाज के लिए पूज्य हैं, आदरणीय हैं। इन्के शहीद स्थल पर हर साल शहीद मेला लगता है। सभी जाति धर्म के स्त्री-पुरूष इस शहीद स्थल पर आते दीप जलाते और श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं , अब इन्हें ठाकुर और चौहान बताकर समाज से दूर किया जा रहा है। इन पर ठाकुर और चौहान अपना हक बताने लगे।ये गलत है। ऐसा करने वालों को समझाना चाहिए। बताया जाना चाहिए कि इससे दूर रहें।
हिंदू धर्म के मानने वाले सभी धर्म स्थलों पर जाते हैं, चाहे वह किसी भी समाज के हों। मंदिर की तरह उन्हें बौद्ध मठ, गुरूद्वारे चर्च और पीर. पैंगम्बर के स्थान भी पूजनीय हैं, सभी जगह जाते हैं।सभी को मानतें हैं और सजदा करते है। अगर इन स्थानों को अपने धर्म के लिए ही निर्धारित किया जाएगा, तो गलत ही होगा।
देश के युवाओं, प्रतिभाओं सैनिको , सैनानियों क्रांतिकारियों, शहीदों और समाज के महापुरूषों को जातियों और धर्म में बांटना समाज के विखंडन की प्रक्रिया का हिस्सा है,ऐसे में इसे रोकिए। समाज का जोड़ने आगे बढ़ाने के लिए आगे आईए। बांटने के लिए नहीं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

अमेरिकी धार्मिक रिपोर्ट भारत के लिए अस्वीकार्य

अवधेश कुमार

अमेरिका ने फिर अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी वार्षिक रिपोर्ट में भारत को अल्पसंख्यक विरोधी देश साबित करने की कोशिश की है। अमेरिका इसे विश्व भर के देशों में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति का तथ्यात्मक एवं प्रामाणिक दस्तावेज घोषित करता है। अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता कार्यालय के विशेष राजदूत राशद हुसैन ने कहा कि रिपोर्ट विश्व भर के लगभग 200 देशों और क्षेत्रों में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति के बारे में एक तथ्य आधारित व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करती है। अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने इसे जारी करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य उन क्षेत्रों को उजागर करना है जहां धर्म या विश्वास की स्वतंत्रता का दमन किया जा रहा है और अंततः प्रगति को ऐसे विश्व की ओर ले जाना है जहां धर्म या विश्वास की स्वतंत्रता हर जगह हर किसी के लिए एक वास्तविकता हो। ब्लिंकन ने भारत का उल्लेख नहीं किया, पर रिपोर्ट में भारत का संदर्भ भयानक तस्वीरों से भरी है। राशद हुसैन के बयान में भारत का जिक्र है। उन्होंने कहा कि कई सरकारों ने अपनी सीमाओं के भीतर धार्मिक समुदाय के सदस्यों को खुले तौर पर निशाना बनाना जारी रखा है। इन सरकारों के संदर्भ में रिपोर्ट के महत्वपूर्ण निष्कर्षों का उल्लेख करते हुए उन्होंने भारत का नाम स्पष्ट तौर पर लिया। उसके बाद चीन और अफगानिस्तान समेत कई देशों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में विविध धार्मिक समुदाय से जुड़े कानून के हिमायती और धार्मिक नेताओं ने हरिद्वार शहर में मुस्लिमों के खिलाफ घोर नफरत भाषा का इस्तेमाल किया जो निंदनीय है। 

इसमें 20 से अधिक ऐसी घटनाओं का जिक्र है जिससे आभास होता है कि भारत की वर्तमान सरकार के अंदर बहुसंख्यक समुदाय यानी हिंदू अल्पसंख्यक समुदायों पर हमले कर रहा है, उनके भवनों को तोड़ रहा है , जला रहा है , उनके धार्मिक अधिकारों के पालन में बाधाएं खड़ी कर रहा है। उदाहरण के लिए कहा गया है कि इस वर्ष कई राज्यों में धार्मिक अल्पसंख्यक सदस्यों के खिलाफ कानूनी एजेंसी अधिकारियों द्वारा हिंसा की रिपोर्ट सामने आई। गुजरात में सादी वर्दी में पुलिस द्वारा अक्टूबर में एक त्यौहार के दौरान हिंदुओं को घायल करने के आरोपी चार मुस्लिम पुरुषों को सार्वजनिक रूप से पीटने और मध्यप्रदेश सरकार द्वारा अप्रैल में खरगोन में सांप्रदायिक हिंसा के बाद मुस्लिमों के घरों और दुकानों पर बुलडोजर चलाने की बात कही गई है। इसे मुस्लिमों पर अत्याचार के रूप में पेश किया गया है। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा बुलडोजर से घर और संपत्तियां ध्वस्त करने का भी इसी रूप में उल्लेख है। कोई निष्पक्ष और विवेकशील व्यक्ति इस रिपोर्ट को स्वीकार नहीं कर सकता। भारत जैसे विविधताओं के देश में समुदायों के बीच कभी-कभार विवाद, टकराव आदि होते हैं, किंतु यह कहना कि केंद्र व राज्य सरकारों की भूमिका से इसे प्रोत्साहन या संरक्षण मिलता है गलत है। न्यायपालिका के हाथों ही ऐसे मामलों में अंतिम कानूनी फैसले का अधिकार है। अमेरिकी रिपोर्ट में भारत की स्वतंत्र न्यायपालिका की भूमिका को नजरअंदाज किया गया है। इसमें तथ्यात्मक गलतियां भी हैं। उदाहरण के लिए हरिद्वार की जिस सभा का जिक्र है उसके कई लोगों पर न केवल मुकदमे हुए बल्कि उन्हें जेलों में भी डाला गया। भारत को पाकिस्तान, चीन,अफगानिस्तान आदि की श्रेणी में रखना साफ करता है कि रिपोर्ट तैयार करने वालों का उद्देश्य क्या हो सकता है।

हालांकि इसमें हैरत की कोई बात नहीं है। अमेरिका की धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी रिपोर्ट में न जाने कितने वर्ष ऐसी बातें अलग - अलग तरीके से कही गई हैं। पिछले 2 मई को ही अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग यानी यूएससीआईआरएफ ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि भारत को उन देशों की सूची में शामिल किया जाए जो धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर चिंताजनक माने जाते हैं। यह अमेरिका की काली सूची यानी ब्लैक लिस्ट  है। इसमें चीन, रूस, सऊदी अरब, ईरान, पाकिस्तान और अफगानिस्तान आदि शामिल है। इस वर्ष निकारागुआ, वियतनाम और भारत को शामिल करने की सिफारिश की गई है। यह आयोग पिछले 4 वर्षों से ऐसी सिफारिश कर रहा है। हां,अमेरिकी विदेश विभाग इसे स्वीकार नहीं करता। कल्पना कर सकते हैं कि रिपोर्ट बनाने वालों की मानसिकता कैसी होगी? भारत को निकारागुआ ,अफगानिस्तान ,पाकिस्तान की श्रेणी में रखने वाले लोगों की सोच पर तरस आना चाहिए। किंतु दूसरी ओर यह बताता है कि भारत और यहां के हिंदू समाज को लेकर विश्व भर में कैसी मानसिकता बनाई गई है खासकर मोदी सरकार आने के बाद। 

 वर्तमान धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी रिपोर्ट मीडिया एडवोकेसी रिसर्च ग्रुप्स के द्वारा तैयार किया गया है। इस समूह में कौन-कौन संस्थाएं और लोग शामिल हैं इनकी जानकारी सामने आनी चाहिए । राशद हुसैन पाकिस्तानी मूल के हैं। रिपोर्ट जारी होने के बाद वैश्विक स्तर पर एएफपी न्यूज़ एजेंसी द्वारा एक शीर्ष अमेरिकी अधिकारी से बातचीत प्रकाशित हुई जिनका नाम नहीं लिया गया। उसने कहा कि हम भारत में सिविल सोसायटी और संगठनों तथा अपने समर्थक पत्रकारों के साथ इसके लिए काम करना जारी रखेंगे जो हर दिन इनमें से कुछ दुर्व्यवहारों का दस्तावेजीकरण करने के लिए काम कर रहे हैं। इसका अर्थ क्या है? 

हम यह कह सकते हैं कि हिंदुओं के संस्कार, चरित्र और  हिंदू धर्म को अपने रीलीजन के अनुसार देखने के कारण भी पश्चिमी एवं अन्य देशों में समस्याएं पैदा होती हैं। किंतु इस बयान से साफ है कि भारत के ही संगठन और पत्रकार इस तरह की रिपोर्ट देते हैं। तो जब हमारे यहां ही आपकसरकार और उससे जुड़े संगठनों को अल्पसंख्यकों का खलनायक साबित करेंगे और उसके अनुसार रिपोर्ट देंगे तो दुनिया की संस्थाएं उन्हें हाथों-हाथ लेंगी। कई बार भारत में इस सच को स्वीकार करने में बहुत लोग बचते हैं कि यहां के बारे में दुष्प्रचार में अपने ही लोगों की भूमिका सबसे ज्यादा होती है। इसके पहले भी अनेक घटनाएं आईं हैं। कोई छोटी सामान्य घटना देखते देखते-देखते दुनिया भर में सोशल मीडिया से लेकर  मुख्य मीडिया तक बड़ी घटना के रूप में प्रचारित हो जाती है और उसका उत्तर देना या खंडन करना कठिन हो जाता है। रिपोर्ट में जिन घटनाओं का उल्लेख है वह हमारे यहां के लोगों और संगठनों ने ही तैयार किया और बनाया है। विडंबना देखिए कि इसमें संघ प्रमुख डॉक्टर मोहन भागवत के कई बयानों को अल्पसंख्यकों पर जुल्म के प्रमाण के रूप में पेश किया गया है। संघ प्रमुख डॉक्टर मोहन भागवत के कई बयानों को प्रमाण के रूप में पेश किया गया है। एक उदाहरण देखिए– 2021 में भागवत ने कहा था कि देश में हिंदुओं और मुसलमानों के साथ धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यवहार नहीं करना चाहिए और गोकशी के लिए गैर हिंदुओं की हत्या हिंदुत्व के विरुद्ध है। जरा सोचिए, जो संगठन वर्तमान शासन वाली पार्टी का भी उद्गम है ,उसके प्रमुख अगर ऐसी बातें कर रहे हैं तो सरकार और संगठन को किस तरह हिंसा को प्रोत्साहित प्रायोजित और संरक्षित करने वाला माना जाए? डॉक्टर भागवत ने भी यह नहीं कहा कि भारत में ऐसी घटनाएं आम हैं। भारत में ऐसी रिपोर्ट का समर्थन करने वाले इस बात का ध्यान रखें कि जब आप भाजपा, संघ और उससे जुड़े संगठनों पर अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा करने के आरोप को प्रचारित करते हैं तो चूंकि ये हिंदुओं के संगठन हैं इसलिए इससे विश्व भर में हिंदुओं की छवि विकृत होती है। इस कारण अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा ऑस्ट्रेलिया सहित कई यूरोपीय देशों में हिंदू नफरती अपराध तथा हिंसा के शिकार हो रहे हैं। अपनी उत्साहित प्रतिक्रिया देने से पहले इस पहलू पर अवश्य विचार करना चाहिए। दूसरे, अमेरिका के यहां अन्य धार्मिक समुदायों तथा अमेरिकी समाज के क्षेत्रों के साथ क्या कुछ हुआ हो रहा है इसे भी उजागर करना चाहिए। अनेक देशों के मुसलमानों को अमेरीकी भूमि पर उतरने के साथ हवाई अड्डों पर जिस तरह की सुरक्षा जांच का सामना करना पड़ता है उससे बड़ा भेदभाव कुछ हो नहीं सकता।  दूसरे धर्म के लोगों पर वहां नफरत से भरी हिंसा हो रही है। हिंदुओं के बारे में एक रिपोर्ट कहता है कि पिछले कुछ समय से उनके विरुद्ध घृणा, दुष्प्रचार और हिंसा में 1000 गुना की वृद्धि हुई है। भारत सदियों से अनेक पंथो, संप्रदायों का देश है। विविधता और सहिष्णुता इसकी संस्कृति थी है और रहेगी। इसके लिए हमें किसी बाहरी से सीख लेने की आवश्यकता नहीं है। जो समस्याएं उभरतीं हैं उनको निपटाने में भारत के लोग और संस्थाएं सक्षम हैं। ये बातें मुखरता से अमेरिकी कानों तक पहुंचाना आवश्यक हो गया है।

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