रविवार, 4 सितंबर 2022

पृथ्वी पर अशांति फैलाते ये 'कलयुगी धर्मगुरु'

तनवीर जाफ़री 

किसी भी धर्म व समुदाय के धर्मगुरु से वैसे तो प्रायः यही उम्मीद की जाती है कि वह अपने अनुयायियों को सद्मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित करे। उन्हें बुराइयों से दूर रहने व सत्कर्म करने के लिये प्रोत्साहित करे। उनमें मानवता का संचार करे। उन्हें दया, सहृदयता, मानवता, क्षमा, परोपकार, जनकल्याण व मानव प्रेम सिखाये। परन्तु आज के दौर में कभी कभी तो मौलवी और साधू संतों के वेश में ही ऐसी राक्षसी मानसिकता रखने वाले लोगों को देखा जाने लगा है जिससे कभी कभी तो ऐसा प्रतीत होने लगता है गोया यही 'कलयुग का उत्कर्ष काल' है। क्योंकि आम तौर पर समाज विशेषकर अपने अनुयायियों को सही राह दिखाने वाले यही कथित मौलवी-संत-साधू अब समाज में साम्प्रदायिकता फैलाने, विषवमन करने,एक दूसरे धर्म या समुदाय के लोगों के विरुद्ध नफ़रत फैलाने यहाँ तक कि अपने समर्थकों को हत्या,हिंसा,आगज़नी व तोड़फोड़ करने के लिये उकसाने जैसे काम कर रहे हैं। अफ़सोस की बात तो यह है कि धर्म की आड़ में और धर्म के नाम पर यह अधर्म प्रायः बहुसंख्य समाज के कथित मौलवियों व धर्म गुरुओं  द्वारा अल्पसंख्यक समाज के विरुद्ध किया जा रहा है। और अधर्म भी ऐसा जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। जिसे देख व सुनकर इंसानी रूह काँप उठे, राक्षसी कृत्य भी जिसके आगे फीके पड़ जायें। 

पाकिस्तान में गत 22 अगस्त को लाहौर से लगभग 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित फ़ैसलाबाद ज़िले के चक 203 आरबी मनावाला में अहमदिया समुदाय के एक क़ब्रिस्तान में अहमदिया समुदाय के लोगों की 16 क़ब्रों को स्वयं को मुसलमान बताने का दावा करने वाले साम्प्रदायिकतावादियों ने तोड़ फोड़ कर उन्हें क्षतिग्रस्त कर दिया तथा उन क़ब्रों पर पत्थर भी बरसाये । बताया जाता है कि यह क़ब्रिस्तान 75 वर्ष पुराना है। हमलावर चरमपंथियों को शिकायत है कि अहमदिया समुदाय के लोगों द्वारा अपने मृत परिजनों की क़ब्रों के पत्थरों पर इस्लामिक चिन्हों व क़ुरआनी आयतों आदि का इस्तेमाल क्यों किया गया? इन हमलावरों को इन क़ब्रों को क्षतिग्रस्त करने के लिये इस इलाक़े में सक्रिय उन मौलवियों ने प्रेरित किया जो आते तो हैं अपने प्रवचन अल्लाह,रसूल,क़ुरआन व हदीस के नाम पर देने के लिये परन्तु इसके बजाय वे दूसरे समुदाय के लोगों के विरुद्ध अपने समर्थकों व अनुयायियों को भड़काने का काम करते हैं। परिणाम स्वरूप ग़रीबी व बेरोज़गारी से जूझ रहे लोग ऐसे कलयुगी मोलवियों व धर्मगुरुओं के बहकावे में आकर क़ब्रों को खोदने व उन्हें क्षतिग्रस्त करने जैसे अधार्मिक व अमानवीय काम करने लगते हैं। ख़बरों के अनुसार पाकिस्तान में केवल इसी वर्ष अब तक  अहमदिया लोगों की 185 क़ब्रों को  क्षतिग्रस्त किया जा चुका है।

इसी तरह की क्रूर व अमानवीय मानसिकता के लोग कभी मानव बम बनकर मस्जिदों में नमाज़ पढ़ रहे लोगों के बीच विस्फ़ोट कर नमाज़ियों की हत्यायें कर देते हैं ,कभी किसी का सर क़लम करते दिखाई दे जाते हैं,कभी अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म ढहाते नज़र आते हैं तो कभी अल्पसंख्यकों की इबादतगाहों, मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों, दरगाहों व इमाम बारगाहों पर हमले करते व तोड़फोड़ व आगज़नी करते दिखाई दे जाते हैं। पिछले दिनों मालदीव के पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन एवं तकनीकी राज्यमंत्री अली सोलिह पर राजधानी माले के हुल्हुमाले में एक शख्स ने चाकू से हमला किया। हमलावर क़ुरान की आयतें पढ़ने के बाद हमलावर उनका गला रेतना चाहता था। कुरान की आयतें पढ़ने के बाद इस तरह की अमानवीयता व अधर्म की प्रेरणा केवल मौलवियों,मुल्लाओं व धर्मगुरुओं के उकसाने व भड़काने से ही मिल सकती है। 

तो क्या किसी धर्म या समुदाय विशेष व उनके धर्मग्रंथों में इस बात की शिक्षा दी गयी है कि जिनके सोच विचार आप के विचारों से मेल न खाते हों उनके पूर्वजों की क़ब्रें उधेड़ दी जायें ? उनके सर क़लम कर दिए जाएं ? उनकी इबादतगाहों को नुक़सान पहुँचाया जाये ? जिनके नमाज़ या पूजा अरदास आदि के तरीक़े आपकी इबादत पद्धति से मेल न खाते हों उनके धर्मस्थलों पर विस्फ़ोट कर बेगुनाह लोगों की जान ले ली जाये ? न तो मैं अहमदिया समुदाय से संबद्ध हूँ न ही उनका अनुयायी। परन्तु इस अति अल्पसंख्यक परन्तु शिक्षित मुस्लिम समुदाय के लोगों के साथ आये दिन होने वाले ज़ुल्म-ो-सितम की दास्ताँ सुनसुनकर मानवता के नाते इनके प्रति मेरी हमदर्दी ज़रूर बढ़ गयी है। और इनपर या इन जैसे दूसरे अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म ढहाने वालों के विरुद्ध नफ़रत और ग़ुस्सा। आश्चर्य है कि पाकिस्तान की संसद ने 1974 में अहमदिया समुदाय को ग़ैर -मुस्लिम घोषित कर दिया। इस समुदाय पर ख़ुद को मुस्लिम कहलवाने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। यहाँ तक कि अहमदिया मुसलमानों का धार्मिक उपदेश देना और हज के लिए सऊदी अरब जाना तक प्रतिबंधित कर दिया गया। जबकि अहमदिया स्वयं को मुसलमान भी कहते हैं,क़ुरआन व रसूल पर भी अक़ीदा रखते हैं। 

सवाल यह कि आज के पाकिस्तान में जहाँ बाढ़ व मंहगाई से देश के हालात अति दयनीय बने हुये हैं, इस दौर में ख़ुदा से डरने,लोगों के दिलों की दुआयें हासिल करने,अपने आमाल सुधारने, अपने किये गये गुनाहों के लिये अल्लाह से तौबा करने के बजाये, क़ब्रें खोदने,मस्जिदों,मंदिरों व गुरद्वारों पर हमले करने जैसी अमानवीय व राक्षसीय सोच आख़िर कहाँ से आती है ? यह समझने के लिये भी हमें इस्लामी इतिहास के अतीत में ही झांकना पड़ेगा। और फिर हम यही पायेंगे कि स्वयं को मुसलमान कहने वाली यही ज़ालिम व क्रूर शक्तियां जो आज भी क़ब्रें खोदने पर आमादा हैं यह उसी मानसिकता के मुसलमान हैं जिन्होंने करबला में इमाम हुसैन के छः महीने के बच्चे अली असग़र को पहले तो तीर मारकर क़त्ल किया फिर जब इमाम हुसैन ने शहीद अली असग़र की लाश करबला की तपती धरती में दफ़्न कर दी तो इन्हीं 'स्वयंभू मुसलमानों' ने इमाम हुसैन को क़त्ल करने के बाद अली असग़र की लाश को भी क़ब्र खोद कर बाहर निकाल कर उसकी गर्दन काटी और भाले की नोक पर बुलंद कर बाज़ारों में घुमाया। नमाज़ियों पर हमले की प्रेरणा भी इन्हें करबला से ही मिलती है। 

दस मुहर्रम की सुबह जब इमाम हुसैन के साथी अपनी आख़िरी नमाज़ अदा कर रहे थे उस समय यज़ीदी सेना ने तीरों की बौछार कर नमाज़ में विघ्न पैदा किया था। आगज़नी की प्रेरणा भी इन्हें करबला से ही मिलती है क्योंकि इमाम हुसैन की शहादत के बाद इसी यज़ीदी लश्कर ने उन तंबुओं में आग लगा दी थी जिनमें इमाम हुसैन के परिवार की महिलायें व बच्चे रह रहे थे। इसी विचारधारा के लोगों ने पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद की बेटी हज़रत फ़ातिमा के घर में आग लगा कर उनकी हत्या की थी। गोया जो लोग इस्लाम के नाम पर और मुसलमानों का चोग़ा पहनकर इस्लाम के उद्भवकाल में इस्लाम व मुसलमानों के दुश्मन थे आज भी उसी मानसिकता के कलयुगी धर्मगुरु पूरी पृथ्वी पर अशांति फैलाने में लगे हुये हैं। 

शुक्रवार, 2 सितंबर 2022

आजाद का जाना कांग्रेस का संकट नहीं लक्षण है

अवधेश कुमार

कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में से एक गुलाम नबी आजाद का इस्तीफा किसी एक नेता का पार्टी से अलग होना भर नहीं है। वास्तव में इस घटना ने फिर यह साबित किया है कि कांग्रेस के अंदर इसके पुनरुद्धार की उम्मीद खत्म हो गई है। आजाद ने कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी को लिखे अपने 5 पृष्ठों के पत्र में कहा भी है कि कांग्रेस में चीजें इतनी बिगड़ गई हैं कि उनमें अब सुधार नहीं हो सकता।  कोई यह कह सकता है कि आजाद को पार्टी छोड़ना था तो उन्हें कई तरह के तर्क देने ही थे। निष्पक्षता से विचार करने वाले स्वीकार करेंगे कि उनकी यह पंक्ति वर्तमान कांग्रेस पर शत प्रतिशत सही बैठती है। आजाद के इस्तीफे के पहले के दो दिनों में दो अन्य नेताओं ने प्रकारांतर से पार्टी के भविष्य को लेकर निराशा ही प्रकट की है। आजाद से एक दिन पहले कांग्रेस के युवा प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने भी पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। उनसे पहले आनंद शर्मा ने हिमाचल प्रदेश की संचालन समिति छोड़ दी थी। आप देखेंगे कि कांग्रेस छोड़ने वालों वरिष्ठ एवं ख्यातिप्राप्त नेताओं की इतनी लंबी सूची हो गई है कि उनका नामोल्लेख करना संभव ही नहीं। 2022 में  ही अश्विनी कुमार, हार्दिक पटेल, सुनील जाखड़ जैसे बड़े नाम शामिल हैं। इनमें हार्दिक पटेल और सुनील जाखड़ भाजपा का दामन थाम चुके हैं। अगर अलग-अलग राज्यों में नजर दौड़ाएं तो स्थानीय स्तर के बड़े नेताओं के पार्टी छोड़ने और दूसरी पार्टी में शामिल होने की प्रतिस्पर्धा दिखाई देगी। इन सब पर यह आरोप लगाना आसान है कि ये सारे लोग कांग्रेस और नेतृत्व के प्रति निष्ठा रखते ही नहीं। कांग्रेस छोड़ने वालों में ऐसे लोग शामिल हैं जिनकी पूर्व की दो-दो पीढ़ियां पार्टी में रही है। स्वयं गुलाम नबी आजाद जैसे ने पांच दशक कांग्रेस में बताया है। जाहिर है कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व मंडल भले इसका उपहास उड़ाई लेकिन भारतीय राजनीति के वर्तमान और भविष्य की दृष्टि से या गहरी चिंता का विषय है।

इसलिए कि भारत की दृष्टि से भाजपा के समानांतर कोई एक अखिल भारतीय दल होना चाहिए। कांग्रेस का अवसान ऐसी रिक्तता पैदा कर रहा है जिसकी भरपाई की संभावना निकट भविष्य में नहीं दिखती है । आजाद का बाहर जाना तो कांग्रेस में व्याप्त संकटों का एक लक्षण मात्र है । वर्तमान स्थिति में ऐसे लोगों का कांग्रेस में रहना मुश्किल है जो पार्टी के भविष्य की दृष्टि से आंतरिक सुधार और पुनर्रचना के लिए चिंतित हैं, आवाज उठा रहे हैं और उसमें यह भी शामिल है की नेतृत्व की बागडोर परिवार से बाहर किन्हीं और हाथों में जाए। ऐसे लोगों का पार्टी में रहना या बाहर रहना आज मायने नहीं रखता। वे होते हुए भी कुछ नहीं कर पा रहे। गुलाम नबी आजाद ही नहीं पार्टी में परिवर्तन की मांग करने वालों के लिए बने समूह जी 23 के ज्यादातर नेताओं की हालत पार्टी में रहते हुए भी न रहने जैसे ही हो गई थी। वरिष्ठ नेता मनीष तिवारी का बयान है कि हम पार्टी में किराएदार नहीं है कि निकाल देंगे और हम चुपचाप निकल जाएंगे। उनका यह बयान आजाद के इस्तीफे के बाद आया है। आप देखेंगे कि आजाद के प्रकरण पर इस समय पार्टी के अंदर सक्रिय नेताओं तथा बाहर जा चुके या अंदर रहते हुए भी बाहर होने की सदृश स्थिति में रहने वाले नेताओं के बयानों में जमीन आसमान का अंतर है।

वैसे आजाद के पत्रों में उठाए गए मुद्दे में ज्यादा मौलिकता नहीं है। बावजूद व्यवहार के स्तर पर कई बातें ऐसी हैं जिन पर चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने कांग्रेस के 14 साल के लिए राहुल गांधी को मुख्य दोषी बताया है। उन्होंने लिखा है कि यह सब इसलिये हुआ क्योंकि बीते आठ वर्षो में नेतृत्व ने एक ऐसे व्यक्ति को पार्टी पर थोपने का प्रयास किया जो गंभीर नहीं था।

उनके अनुसार 2019 लोकसभा चुनाव में पराजय के बाद राहुल गांधी ने झुंझलाहट में अध्यक्ष पद से इस्तीफा अवश्य दिया लेकिन उसके पहले सारे वरिष्ठ नेताओं को वे अपमानित कर चुके थे। उनके सहायक और सुरक्षाकर्मी तक पार्टी की रीति-नीति निर्धारित कर रहे हैं जैसा आजाद ने कहा है तो फिर समझा जा सकता है कि कांग्रेस इस समय किस दिशा में है। वास्तव में राहुल गांधी को पार्टी के नायक की जगह खलनायक मानने वाले आजाद अकेले नहीं हैं, ज्यादातर वरिष्ठ नेता, जो परिवार की कृपा से किसी पद पर नहीं है सबका यही मानना है। हालांकि पद पर रहने वाले भी यही मानते होंगे लेकिन कृपाप्राप्त होने के कारण वे मुखर नहीं हो सकते या खुलकर नहीं बोल सकते। कपिल सिब्बल ने ही सवाल उठाया था कि अगर पार्टी का कोई अध्यक्ष है ही नहीं तो फैसले कौन कर रहा है? उन्होंने कहा कि कोई तो कर रहा है। जाहिर है , उनका इशारा राहुल गांधी की ओर था। इस तरह के वक्तव्य अब दूसरे नेताओं ने भी दिए हैं। हार्दिक पटेल ने कांग्रेस छोड़ते समय राहुल गांधी पर ही आरोप लगाया था कि उनसे बात करना मुश्किल है और उन्हें राजनीति की समझ नहीं है। यह सच है कि राहुल गांधी ने यूपीए सरकार के समय से ही आवाज उठानी शुरू कर दी थी कि पार्टी में नई पीढ़ी को प्रमुखता मिलनी चाहिए। नई पीढ़ी की प्रमुखता की अपनी सोच में उन्होंने पुराने अनुभवी नेताओं की बातों को अनसुना करना आरंभ किया। इससे बड़ा अपमान किसी नेता के लिए कुछ हो ही नहीं सकता कि नेतृत्व उसकी अनसुनी करें। पूरा माहौल पार्टी में ऐसा बना दिया गया था मानो वरिष्ठ नेताओं में केवल दोष ही हैं और उनको सम्मान देने, उनकी बात सुनने तक का कोई कारण नहीं है।

आप देखेंगे कि पिछले वर्ष पांच विधानसभाओं के चुनाव हुए लेकिन जी 23 के नेताओं का नाम स्टार प्रचार को तक में शामिल नहीं था। इस वर्ष भी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर के चुनाव के दौरान भी इनमें से ज्यादातर नेताओं के नाम शामिल नहीं थे। तो इसका कारण क्या हो सकता है? क्या इसे किसी नेता का सम्मान कहेंगे? इनको चुनाव अभियान में भूमिका दिए बगैर अगर आप चुनाव जीत जाएं तो माना जाएगा कि आपकी रणनीति सही है। किंतु कांग्रेस केवल दो लोकसभा चुनाव ही नहीं पिछले 9 वर्षों में ज्यादातर विधानसभा चुनाव हारी है। आजाद ने ही बताया है कि 2014 से 2022 के बीच हुए 49 विधानसभा चुनावों में से हम 39 चुनाव हार गए। पार्टी ने केवल 4 राज्यों के चुनाव जीते और 6 मौकों पर उसे गठबंधन में शामिल होना पड़ा। अभी कांग्रेस केवल 2 राज्यों में शासन कर रही है और 2 राज्यों में गठबंधन में उसकी भागीदारी मामूली है। मध्यप्रदेश हाथ से जा चुका है, महाराष्ट्र सरकार गिर चुकी है, झारखंड में अस्थिरता कायम है और बिहार में नीतीश कुमार द्वारा पाला बदलने के कारण कांग्रेस के दो मंत्रियों को सरकार में शामिल होने का मौका मिल गया। जिस पार्टी का एक समय भारतीय राजनीति पर वर्चस्व था और जो देश की अभी भी मुख्य विपक्षी मान पार्टी मानी जाती है उसकी ऐसी दुर्दशा अंदर से हिला देती है।

इसमें दो राय नहीं कि राहुल गांधी ने अपने कार्यों से स्वयं साबित किया है कि वे अयोग्य अक्षम एवं गैर जिम्मेदार हैं। सोनिया गांधी ने व्यावहारिक रूप में 2013 में ही पार्टी उनके हाथों सौंपने की कुंडली 2014 चुनाव के लिए जितनी भी समितियां सबका नेतृत्व उन्हीं के हाथ में था। तो क्या कांग्रेस की इस दशा के लिए केवल राहुल गांधी को दोषी मान लिया जाये?  आजाद लिखते हैं कि राजनीति में राहुल गांधी का प्रवेश और खासतौर पर जब आपने जनवरी 2013 में उन्हें उपाध्यक्ष बनाया, तब राहुल ने पार्टी में चली आ रही सलाह के मैकेनिज्म को तबाह कर दिया। सभी वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं को साइड लाइन कर दिया गया और गैरअनुभवी चापलूसों का नया ग्रुप बन गया, जो पार्टी चलाने लगा। जाहिर है, इन सारी पंक्तियों में सोनिया गांधी भी निशाने पर हैं, क्योंकि राहुल गांधी को उपाध्यक्ष बनाने या फिर व्यावहारिक तौर पर पार्टी को सौंपने का कार्य उन्होंने ही किया। सच तो यही है कि कांग्रेस वर्षों से विचारधारा और लक्ष्यों से विलग होती गई और इसी कारण एक परिवार पर निर्भर होती गई हो गई। विचारधारा ना होने पर नीचे से ऊपर तक नेतृत्व का पनपना संभव नहीं था। राहुल गांधी इसीलिए सर्वे सर्वा हुए क्योंकि व्यवहारिक रुप से पार्टी में नेतृत्व के उभरने की गुंजाइश ही नहीं। सच यह है सत्ता ने सोनिया गांधी के नेतृत्व में पार्टी को एकजुट रखा और सत्ता से भी लोग होते ही धीरे-धीरे सच्चाई सामने आने लगी पूर्णब्रह्म अभी भी सत्ता होती तो ना जीत 23:00 समूह बनता ना इस प्रकार आजाद का इस्तीफा होता। थोड़े शब्दों में कहें तो पार्टी का संकट इतना गहरा है कि उसके भरने की कोई गुंजाइश नहीं। ऐसा तभी हो सकता है जब पार्टी परिवार मुंह से बाहर आकर ऐसा सामूहिक नेतृत्व विकसित करें जिसके अंदर कांग्रेस की पुनर्जीवित करने का ईमानदार संकल्प हो तथा वह भारत के अतीत वर्तमान और भविष्य के साथ वर्तमान राजनीति एवं आम लोगों के मनोविज्ञान की समझता हो। क्योंकि अभी दूर-दूर तक इसकी संभावना नहीं दिखती इसलिए या मानने में कोई समस्या नहीं कि सोनिया गांधी परिवार के नेतृत्व वाली कांग्रेस इतिहास का अध्याय बनने की ओर अग्रसर हो चुकी है।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -1100 92 ,मोबाइल- 981102 7208

मंगलवार, 30 अगस्त 2022

शुक्रवार, 26 अगस्त 2022

कश्मीरी हिंदुओं की हत्या आतंकवादियों की रणनीति

 अवधेश कुमार

स्वतंत्रता दिवस के ठीक अगले दिन दक्षिण कश्मीर के शोपियां में आतंकवादियों द्वारा दो कश्मीरी हिंदू भाइयों पर अंधाधुंध गोलीबारी ने फिर वहां गैर मुस्लिमों के वर्तमान और भविष्य को लेकर कई प्रश्नों को खड़ा किया है। दोनों भाई अपने बाग में काम कर रहे थे कि आतंकवादियों ने उन पर हमला कर दिया जिसमें सुनील कुमार चल बसे और पितांबर नाथ का शोपियां के जिला अस्पताल में इलाज चल रहा है। ऐसा नहीं है कि इस बात की आशंका पहले नहीं थी। ध्यान रखने की बात है कि 1990 के दशक में पलायन की पूरी परिस्थिति होते हुए भी इन हिंदू परिवारों ने वहीं रहने का निर्णय किया था। चोटीगाम गांव के वे आज तक वहीं रह रहे हैं। उनकी संख्या भी ज्यादा नहीं है। केवल तीन परिवार हैं । यानी वे पलायन करने के बाद वापस आकर बसे नहीं है। जाहिर है, इन तीन दशकों से ज्यादा समय में इन परिवारों ने वहां बहुत कुछ झेला होगा। सबको झेलते हुए वहां रहना सामान्य जिजीविषा  की बात नहीं है। लेकिन जब कश्मीर धीरे-धीरे गैर कश्मीरियों के भी रहने के अनुकूल बन रहा है तो वहां के निवासी होने के नाते गैर मुस्लिमों या कश्मीरी हिंदुओं की हत्या उद्वेलित करती है। जिस कश्मीरी फ्रीडम फाइटर्स नामक आतंकवादी संगठन ने बयान जारी कर हमले की जिम्मेदारी ली है उसके बारे में विस्तृत जानकारी नहीं है।  माना जा रहा है कि यह अन्य कई संगठनों के ही छद्म नाम हैं जिनका उद्देश्य कश्मीर का संपूर्ण इस्लामीकरण तथा भारत से अलगाव है।

जिस तरह कश्मीर में घर-घर तिरंगा अभियान गांव -गांव तक पहुंचा जगह-जगह तिरंगा यात्रा निकली उनको अलगाववादी आतंकवादी सहित सीमा पार के उनके प्रायोजकों के लिए सहन करना संभव नहीं है। तिरंगे का अर्थ भारत के प्रति लगाव और राष्ट्रवाद की भावना का संचार है। जम्मू कश्मीर को हर हाल में भारत से अलग करने के लिए षड्यंत्रों में लगी शक्तियों के लिए पहला सबसे बड़ा आघात 5 अगस्त, 2019 को लगा था जब जम्मू कश्मीर से धारा 370 को निष्प्रभावी कर दिया गया। तब आतंकवादी संगठनों और पाकिस्तान की बौखलाहट स्पष्ट रूप से सामने आई थी। ऐसा लगा था जैसे पाकिस्तान के सामने अपने अस्तित्व का संकट पैदा हो गया है। अंदर से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के लिए लंबे समय तक धारा 370 और कश्मीर सबसे बड़ा मुद्दा बना रहा। किंतु वे कुछ कर न सके। धीरे-धीरे जिस तरह वहां पुराने हिंदू धर्म स्थलों का उद्धार हो रहा है, लोग विधिपूर्वक अनुष्ठान कर रहे हैं ,उनकी लाइव तस्वीरें सामने आ रही हैं तथा लाल चौक से लेकर एक समय आतंकवादियों और अलगाववादियों के प्रभाव वाले क्षेत्रों में स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस सहित तिरंगे संबंधी उत्सवों तथा इसके नाम पर होने वाले अन्य आयोजनों में लोगों के उमड़ते समूह ने पाकिस्तानपरस्तों सहित सभी अलगाववादी- आतंकवादियों को अंदर से हिला दिया है। जाहिर है ,उन्हें इसका विरोध करना ही था।

कश्मीर में आज यह स्थिति तो है नहीं कि पहले की तरह हुर्रियत नेता आह्वान करें और लोग सड़कों पर उतर जाएं या पत्थरबाजी हो। तो आतंकवादी इसके लिए आसान निशाना ढूंढते हैं। लंबे समय से वहां रहने वाले हिन्दू परिवार जीवन रक्षा को लेकर अवश्य ही थोड़ा निश्चिंत मानसिकता में जी रहे होंगे। उसमें उन पर गोलियां चलाना इनके लिए आसान था। वास्तव में आतंकवादियों ने रणनीति के तहत कश्मीर में बाहर से आकर काम करने वालों या फिर गैर मुस्लिमों को अपना लक्ष्य बनाया है। इसी वर्ष देखें तो यह गैर मुस्लिमों यानी कश्मीरी हिंदुओं पर सातवां हमला था। 13 अप्रैल को कुलगाम में सतीश कुमार सिंह नामक डोगरा राजपूत की हत्या कर दी गई थी। इसके करीब 1 महीने बाद यानी 12 मई को चाडूरा में तहसीलदार कार्यालय में कश्मीरी हिंदू कर्मी राहुल भट्ट की हत्या हुई थी। उसने पूरे देश को उद्वेलित किया था। कश्मीरी पंडित सड़कों पर उतर कर वहां से पलायन की आवाज उठाने लगे थे। कुछ  चले भी गए। 15 मई को बारामुला में शराब की दुकान पर काम करने वाले रंजीत सिंह की हत्या की गई। 31 मई को कुलगाम  के एक विद्यालय में दलित अध्यापिका रजनी बाला की हत्या ने फिर सनसनी पैदा की और यह भी पूरे देश में गुस्से का कारण बना था। ठीक इसके 2 दिन बाद यानी 2 जून को कुलगाम में ही राजस्थान निवासी एक बैंक मैनेजर विजय कुमार की हत्या कर दी गई। इस तरह देखेंगे तो आतंकवादियों ने लक्ष्य बनाकर कश्मीरी हिंदुओं या गैर मुसलमानों पर हमले और उनकी हत्या की रणनीति बनाई और उस पर काम कर रहे हैं। जब भी ऐसी हत्याएं होंगी तो कश्मीरी हिंदुओं विशेषकर पंडितों की सुरक्षा का मामला सतह पर आएगा। कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति केपीएसएस ने फिर पहले के जैसा ही बयान दिया है कि कश्मीर ऐसी जगह है जहां पर्यटक सुरक्षित है पर कश्मीरी हिंदुओं पर हमले हो रहे हैं। इसलिए कश्मीरी हिंदुओं को यहां से पलायन करना चाहिए। यह बात सही है कि केपीएसएस उन कश्मीरी हिंदुओं का संगठन है जिन्होंने वहां आतंकवादी हिंसा के समय में भी पलायन नहीं किया था। तो क्या यही एकमात्र चारा है? क्या कश्मीरी हिंदुओं का पलायन उनकी सुरक्षा और कश्मीर सुरक्षा की गारंटी है? क्या कोई भारतीय चाहेगा कि वहां से दूसरे मजहब के सारे लोग चले जाएं एवं कश्मीर के इस्लामीकरण का एजेंडा पूरा करने में सहभागी बनें?

ध्यान रखिए, कि चोटीगाम मे पिछले 4 अप्रैल को दवा विक्रेता बालकृष्ण पर उसके घर के बाहर ही गोलियां बरसाई गई थी जिसमें गंभीर रूप से घायल हो गए थे। स्पष्ट है कि उसके बाद में सुरक्षा की व्यवस्था हुई होगी। यह परिवार अर्जुन नाथ और श्रीजी भट्ट भाइयों का है। मृतक सुनील श्रीजी भट्ट का बेटा है और अर्जुन नाथ का बेटा जख्मी है। कहने की आवश्यकता नहीं की आतंकवादियों ने इनको भी गांव से निकालने के लिए ही हमला किया है। तो वहां से भागने का मतलब इन आतंकवादियों के एजेंडे को ही पूरा करना होगा। यह बात ठीक है कि किसी के परिवार पर जब हमले होते हैं तो उसके लिए डट कर खड़ा रहना मुश्किल होता है। त्रासदी की पीड़ा वही समझता है जिसे भुगतना पड़ता है। किंतु सब जानते हैं कि समय बदल रहा है। आतंकवादियों के लिए अब पहले की तरह बड़ी वारदात करना संभव नहीं रहा। अलगाववादियों के लिए पहले की तरह भारत विरोधी जुलूस निकालना असंभव है। पत्थरबाजी लगभग खत्म है। 

आतंकी हमलों की संख्या घटी है। बड़े हथियार और बारूदी सुरंगों के बड़े जाल कश्मीर में नहीं दिखते। तो यह सब बहुत बड़े बदलाव हैं। यही नहीं एक समय के दुर्दांत आतंकवादियों और अलगाववादियों बिट्टा कराटे, यासीन मलिक,  मसर्रत आलम आदि को जेल  में डाला जा चुका है। उन्हें  अपने अपराधों की सजा मिलनी सुनिश्चित हो रही हैं। इस बदलाव को स्वीकार करते हैं कोई फैसला करना चाहिए।  निस्संदेह, ऐसे समय परिवारों को हिम्मत देने, उनकी यथासंभव आर्थिक मदद करने ,उनके साथ खड़े होने, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का समय है। यह धारणा आम होनी चाहिए कि किसी की हत्या हो या हमला हो तो न केवल जम्मू कश्मीर प्रशासन बल्कि पूरा देश उसके साथ खड़ा है। इससे ही वहां भय और निराशा का माहौल कमजोर होगा तथा लोगों के अंदर विपरीत परिस्थिति में भी रुके रहने का साहस पैदा होगा। 

वैसे भी सरकार ने कश्मीरी हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए काफी कदम उठाए हैं। वहां कार्यरत कर्मचारियों को जिला केंद्रों पर स्थानांतरित करने से लेकर उनके निवास आदि को भी एक जगह करने की व्यवस्थाएं की गई हैं, की जा रही हैं। इसमें कश्मीरी पंडितों या अन्य संगठनों का भी दायित्व बनता है कि सरकार पर दबाव बनाते हुए भी साथ दें एवं कश्मीर को आतंकवाद एवं अलगाववाद से मुक्ति का सहयोगी बने रहें। जो समूह आतंक के भय से पलायन करेगा उसे आतंकवादी हमेशा डर आएंगे। यह न भूलिए कि आतंकवादी जम्मू कश्मीर में मुसलमानों की भी हत्या कर रहे हैं लेकिन वे कभी वहां से बाहर पलायन करने की आवाज नहीं उठाते। सभी गैर मुस्लिमों की सुरक्षा जितना संभव है सुनिश्चित हो इसकी मांग जायज है किंतु आतंकवादी और सीमा पार उनके प्रायोजकों के हौसलों को पस्त करना है, उन्हें अंतिम रूप से पराजित करना है तो तो वहां से भागने या इसकी आवाज उठाने से बचना ही होगा।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स,  दिल्ली -1100 92, मोबाइल -98110 27208

शुक्रवार, 19 अगस्त 2022

देश को शिखर पर ले जाने का रास्ता

अवधेश कुमार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का लालकिला से स्वतंत्रता दिवस का हर संबोधन व्यापक आकर्षण और बहस का विषय रहा है। जाहिर है, अमृत महोत्सव यानी अंग्रेजों से मुक्ति के 75 वर्ष पूरा होने के अवसर के भाषण को विशिष्ट होना चाहिए था। स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री का दायित्व है कि वे अंग्रेजों के विरुद्ध मुक्ति के संघर्षों, बलिदानों की याद दिलाते हुए लोगों के अंदर यह भाव पैदा करें कि हमारे पूर्वजों ने अपनी बलि चढ़ा कर हमें आजादी दिलाई है ताकि हमें स्वतंत्रता के मूल्यों का आभास रहे। दूसरे, भारत राष्ट्र के लक्ष्य की दृष्टि से प्रधानमंत्री स्पष्ट रूपरेखा सामने रखें। तीसरे, स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाए रखने एवं राष्ट्र के सर्वोपरि लक्ष्य को पाने की दृष्टि से हमारी चुनौतियां क्या है उन दिशाओं में देश कहां-कहां क्या कर रहा है तथा आम भारतीय का दायित्व क्या हैं आदि पर भी प्रभावी शैली से प्रकाश डालें। इन सारे पहलुओं की दृष्टि से विचार करें तो निष्पक्ष निष्कर्ष यही होगा कि अपने करीब 83 मिनट के भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने उन हरसंभव प्रश्नों का उत्तर दिया जो लाल किला से दिया जाना आवश्यक था।

वास्तव में प्रधानमंत्री ने अगर हमारे स्वतंत्रता सेनानियों व मनीषियों का स्मरण करते हुए राष्ट्र के प्रति उनका योगदान ,उनके लक्ष्यों का आभास कराया तो यह भी विश्वास दिलाने की कोशिश की कि भारत की अंतःशक्ति इतनी मजबूत है, इसमें वह क्षमता है कि आने वाले समय में यह विश्व का श्रेष्ठतम देश बन सकेगा। हां, इसके लिए आवश्यक है कि भारतीय के नाते हम अपने दायित्वों के प्रति सचेत रहें उनका पालन करते रहें।

प्रधानमंत्री द्वारा भ्रष्टाचार व वंशवाद के विरुद्ध आक्रामक प्रहार की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है। यह आवश्यक भी है। भ्रष्टाचार ने पूरी व्यवस्था के प्रति लोगों के अंदर वितृष्णा भाव पैदा किया है। लोगों में यह धारणा व्याप्त हो चुकी है कि राजनीति और शासन का चरित्र ही भ्रष्ट होता है और इससे मुक्ति नहीं हो सकती। देखा जाए तो वंशवाद यानी भाई भतीजावाद और भ्रष्टाचार काफी हद तक एक दूसरे से अंतर्संबद्ध हैं।  उनका यह कहना देश के लिए चेतावनी थी कि अगले 25 साल में ये दोनों चुनौतियां विकराल रूप ले सकती हैं अगर समय रहते न चेता गया। प्रधानमंत्री ने इस संदर्भ में वही कहा जो सच है। यानी भ्रष्टाचार के प्रति नफरत तो दिखती है लेकिन कभी-कभी भ्रष्टाचारियों के प्रति उदारता बढ़ती जाती है। यह सच है कि लोग इतनी बेशर्मी तक चले जाते हैं कि दोषी साबित होने व सजा के बावजूद उनका महिमामंडित करते हैं। वास्तव में हम भारतीयों के एक वर्ग में भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी के प्रति संपूर्ण नफरत का भाव नहीं होता है। हम कई बार अपनी जाति, अपने व्यक्तिगत संबंध, अपनी पार्टी, विचारधारा आदि के आधार पर मूल्यांकन करने लगते हैं। इस नाते उनका यह कहना सही है कि जब तक भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी के प्रति नफरत का भाव पैदा नहीं होता सामाजिक रूप से उसको नीचा देखने के लिए मजबूर नहीं करते तब तक यह मानसिकता खत्म होने वाली नहीं है।

प्रकारांतर से यह भ्रष्टाचार के विरुद्ध सामाजिक क्रांति का आह्वान है। यानी हर भारतवासी भ्रष्टाचार के प्रति अपने अंदर शून्य सहिष्णुता का संस्कार पैदा करें और कोई भी हो उसके प्रति समाज में नफरत का भाव, उसके विरोध का मानस तथा उसको समाज से अलग-थलग करने का प्रयास होना ही चाहिए। परिवारवाद ने हमारी पूरी व्यवस्था को जकड़ लिया है। परिवारवाद का यह अर्थ नहीं है कि किसी परिवार से निकला हुआ कोई प्रतिभावान व्यक्ति भी आगे न आए। लेकिन परिवार का है इसी कारण उसे राजनीति में, सत्ता में या जहां जो है वह अपने परिवार को महत्व दे, उनको स्थान दे तो इससे प्रतिभाओं का दमन होता है एवं यह देश को खोखला करता चला जाता है। प्रधानमंत्री का यह कहना बिल्कुल सही है कि हमें हर क्षेत्र और संस्था में परिवारवाद और भाई भतीजावाद को लेकर नफरत और जागरूकता पैदा करनी होगी तभी हम अपनी संस्थाओं को बचा पाएंगे। एक भारतीय के नाते हमें आपको प्रधानमंत्री की इस अपील के आधार पर अपना व्यवहार निर्धारित करना है जिसमें उन्होंने कहा कि लाल किले की प्राचीर से संविधान का स्मरण करते हुए देशवासियों से खुले मन से कहना चाहते हैं कि राजनीति की सभी संस्थाओं के शुद्धिकरण के लिए इस परिवारवादी मानसिकता से मुक्ति दिलाकर योग्यता के आधार पर देश को आगे ले जाना होगा। इसे एक लड़ाई बताते हुए अगर प्रधानमंत्री देश के युवाओं से इसमें आगे आने की अपील करते हैं तो यह समझना चाहिए कि वे क्या चाहते हैं।

वास्तव में परिवारवाद एवं भ्रष्टाचार के विरुद्ध जब तक सामाजिक दृष्टि से क्रांति नहीं होगी, इसके विरूद्ध संघर्ष नहीं होगा  इसका अंत नहीं हो सकता है।प्रश्न है कि क्या हम सब इस क्रांति में इस लड़ाई में अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं?

अगर अपने देश को दुनिया के शिखर पर ले जाना है जैसा प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में घोषित 5 प्रणों में कहा कि अगले 25 साल यानी 2047 आने तक देश को विश्व के शिखर पर ले जाने के लक्ष्य से काम करना है तो हमें भूमिका निभानी ही होगी। पहले  प्रण के रूप में उन्होंने कहा कि देश बड़े संकल्प लेकर चलेगा और वह बड़ा संकल्प है विकसित भारत।  उन्होंने दूसरे प्रण के रूप में कहा कि गुलामी की छोटी से छोटी चीज भी कहीं नजर आए तो उससे मुक्ति पानी होगे।  व्यक्ति व्यवस्था का गुलाम होने के साथ मन को भी गुलामी की जंजीरों में बांध देता है। हमारे विचार गुलामी को प्रतिबिंबित करने लगते हैं।  गुलामी से मुक्ति का अर्थ हर तरह की गुलाम विचारधारा से मुक्ति है। इसके साथ तीसरा प्रण अपनी विरासत के प्रति गर्व का भाव होना चाहिए। हमें यही पढ़ाया गया कि हम तो हमेशा गुलाम थे, हमारे में कोई अच्छाई थी नहीं जबकि हमारी विरासत ने हमें स्वर्णिम काल दिया था। अपने विरासत पर जब गर्व का भाव होगा तो पता चलेगा कि इस भारत नामक राष्ट्र के मायने क्या हैं इनके लक्ष्य क्या हैं। यहीं से भारत के विश्व की प्रमुख शक्ति होने की संपूर्ण रूपरेखा स्पष्ट होगी। इस दृष्टि से चौथा प्रण एकता और एकजुटता का है। 130 करोड़ आबादी वाले विविधताओं के इस देश की एकता और अखंडता को तोड़ने की शक्तियां लगातार सक्रिय रहती हैं। 

भारत की एकता का सूत्र यहां की संस्कृति, विरासत और जीवन शैली में है। अगर यह भाव पैदा है कि हम सब एक भारत की संतान हैं, हमारी विरासत संपूर्ण ब्रह्मांड को एक ही परम तत्व का मानती है है जहां न कोई अपना है न पराया, हम कण-कण में एक ही तत्व को देखते हैं तो न केवल अंतरिक एकता मजबूत होगी बल्कि इसी से भौगोलिक अखंडता भी सुनिश्चित होगी। इसी से जुड़ा हमारा पांचवा प्रण है अपने कर्तव्य के पालन का। अधिकारों की बहुत बात होती है पर कर्तव्यों की याद शायद ही कोई दिलाता है। हमारा हर अधिकार कर्तव्यों के साथ आबद्ध है। भारत की बड़ी समस्या यह है कि हममें से ज्यादातर अपने दायित्वों के प्रति न सतर्क रहते हैं न सचेष्ट। तो हर व्यक्ति अपने दायित्व को समझें। हमारा अपने परिवार और बच्चे के प्रति दायित्व है तो यह भी ध्यान रखें कि पड़ोसी को कष्ट पहुंचेगा तो हम सुखी नहीं रह सकते हैं। इसी को विस्तारित करें तो देश सुखी रहेगा तभी हम सुखी रहेंगे। बगैर कर्तव्यों के न व्यक्तिगत स्तर पर हमारा उत्थान हो सकता है न परिवार न समाज और देश का।

इस तरह देखें तो प्रधानमंत्री का पूरा भाषण भारतीयों के अंदर भारत बोध कराते हुए सभी प्रकार के गुलामी के अवशेषों और समाज एवं राष्ट्र में व्याप्त विद्रूपताओं से मुक्ति और उनके प्रति अपने दायित्व के पालन का भाव पैदा करना रहा है। पूरे भाषण का एक प्रमुख पहलू महिलाओं के प्रति समाज की दृष्टिकोण में बदलाव संबंधी उनकी अपील भी है। प्रधानमंत्री ने कहा कि महिलाओं को लेकर हमारे अंदर जो अपमान का भाव है वह हर हाल में दूर होना चाहिए। हमारे यहां जितनी गालियां, मजाक, एक दूसरे का उपहास उड़ाने आदि के लिए शब्दावली, लोकोक्तियां ,कहावतें, मुहावरे हैं उनमें ज्यादातर महिला केंद्रित ही हैं। यह किसी भी समाज के लिए शर्म का विषय है। महिलाओं के सम्मान के बिना कोई भी परिवार सुखी नहीं रह सकता। जब परिवार सुखी संपन्न नहीं होगा तो देश अपने वास्तविक क्षमता के अनुरूप प्रगति नहीं कर सकता। नारी शक्ति और पुरुष शक्ति मिलकर ही देश को शक्तिशाली बना सकते हैं। तो प्रधानमंत्री की इस अपील का असर हो यही कामना सब करेंगे ताकि महिलाओं  और पुरुषों के बीच भारतीय दृष्टि में समानता का भाव साकार हो एवं नर नारी सब मिलकर स्वयं को सुखी करें, देश को सुखी करें और विश्व के कल्याण के लिए काम कर सकें।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली 110092, मोबाइल 9811027208



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