रविवार, 17 जुलाई 2022

जो उनके लिये 'वंशवाद' वह इनके लिये 'राष्ट्रवाद' कैसे?


तनवीर जाफ़री

ख़बर है कि 2024 में भारतीय जनता पार्टी 'वंशवाद की राजनीति' के विरुद्ध बिगुल फूंकने की तैयारी में है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 'वंशवाद की राजनीति' के विरुद्ध काफ़ी मुखर होकर बोलते रहे हैं। चाहे वह कानपुर में राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद के पैतृक गांव परौंख में दिया गया उनका भाषण हो या पिछले दिनों हैदराबाद में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक या अत्र तत्र कहीं भी, हर जगह उनका मुख्य फ़ोकस 'वंशवाद की राजनीति' के विरोध पर आधारित ही रहा। सूत्रों के अनुसार जिसतरह बीजेपी ने पिछले चुनावों में कांग्रेस और भ्रष्टाचार मुक्त भारत के नारे दिए थे उसी तरह अगले चुनावों में पार्टी  'वंश-मुक्त भारत' के नारे को अपने चुनाव अभियान में शामिल कर सकती है। परन्तु सवाल यह है कि भारतीय जनता पार्टी व उसके नेताओं की नज़रों में 'वंशवाद ' की व्यापक परिभाषा है क्या ? क्या वास्तव में राजनीति की 'वंशवादी' व्यवस्था ही देश के विकास में सबसे बड़ी बाधा है ? क्या कांग्रेस या कई अन्य क्षेत्रीय राजनैतिक दल ही 'वंशवादी राजनीति ' का शिकार हैं और भाजपा इससे पूरी तरह अछूती है ? या फिर भाजपा अपने दल के वंशवादी नेताओं या अपने समर्थक 'वंशवादियों ' के अतिरिक्त केवल अपने विरोधी 'वंशवादियों ' को ही 'वंशवादी राजनीति ' करने वालों की श्रेणी में डालती है ?

सबसे ताज़ातरीन उदाहरण तो महाराष्ट्र का ही है। जब शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने भाजपा से नाता तोड़ने के बाद एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिलकर महा विकास अघाड़ी का गठन किया और मंत्रिमंडल में अपने पुत्र आदित्य ठाकरे को शामिल किया उस समय से लेकर अब तक यही शोर-शराबा होता रहा कि शिवसेना वंशवादी राजनीति का प्रतीक है। अब उसी राज्य से प्राप्त ख़बरों के अनुसार भाजपा ने राज ठाकरे के सुपुत्र अमित ठाकरे को विभाजित शिवसेना के शिंदे गुट व भाजपा द्वारा नव गठित सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल कर उद्धव ठाकरे की कथित  'वंशवादी राजनीति ' को ' वंशवाद' के ही शस्त्र से ही हमलावर होने की योजना बनाई है।  इससे राज ठाकरे व उनके मनसे समर्थक ख़ुश होंगे और उद्धव ख़ेमा आहत होगा और इन दोनों ही ख़ेमों की खाई और गहरी भी होगी। गोया बाल ठाकरे के एक पौत्र आदित्य ठाकरे को बढ़ावा दिया जाना 'वंशवादी राजनीति ' का हिस्सा था और बाल ठाकरे के ही दूसरे पौत्र अमित ठाकरे को मंत्री बनाना 'राष्ट्रवादी राजनीति ' कहलायेगी ?

कुछ दिनों पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के 26 वर्षीय सुपुत्र आर्यमन सिंधिया को किसी भी संस्था या संगठन के पहले पद की ज़िम्मेदारी सौंपते हुए ग्वालियर डिवीज़न क्रिकेट एसोसिएशन GDCA  का उपाध्यक्ष बनाया गया। ज्योतिरादित्य सिंधिया का चश्म-ए-चिराग़ होने के अतिरिक्त आख़िर उनमें और क्या विशेषता है ? यह सिंधिया घराने की अगली पीढ़ी के राजनैतिक प्रवेश की तैयारी नहीं तो और क्या है? विजय राजे सिंधिया से लेकर वसुंधरा राजे उनके पुत्र दुष्यंत सिंह,स्वयं ज्योतिरादित्य सिंधिया आदि सब वंशवाद की ही बेल तो है? इसी प्रकार गृह मंत्री अमित शाह के पुत्र जय शाह को 2019 में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का सेक्रेटरी बनाया गया। आज वे एशियन क्रिकेट काउंसिल के अध्यक्ष भी हैं। अमित शाह का कुलदीपक होने के अतिरिक्त भी क्या उनकी कोई योग्यता या विशेषता है ? परन्तु इसे भी वंशवाद नहीं बल्कि राष्ट्रवाद कहिये। भाजपा में शीर्ष में अनेक नेताओं ने वंशवादी बेल को बख़ूबी सींचा है और अब भी सींच रहे हैं। उदाहरणार्थ रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के विधायक पुत्र पंकज सिंह, हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के फ़ायर ब्रांड सुपुत्र व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर,दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे स्वर्गीय साहब सिंह वर्मा के सांसद पुत्र प्रवेश सिंह वर्मा, उत्तर प्रदेश के 3 बार मुख्यमंत्री व राज्यपाल रहे स्व कल्याण सिंह के सांसद पुत्र राजवीर सिंह और राजवीर सिंह के भी विधायक पुत्र संदीप सिंह जोकि वर्तमान में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में शिक्षा राज्य मंत्री भी हैं। इसी तरह स्वर्गीय प्रमोद महाजन की पुत्री पुनम महाजन,गोपीनाथ मुंडे की प्रीतम मुंडे व पंकजा मुंडे,भाजपा नेता वेद प्रकाश गोयल के पुत्र केंद्रीय मंत्री पीयुष गोयल, लालजी टंडन के सुपुत्र आशुतोष टंडन, ठाकुर प्रसाद के सुपुत्र रविशंकर प्रसाद, यशवंत सिन्हा के पुत्र जयंत सिन्हा, देवेंद्र प्रधान के पुत्र धर्मेंद्र प्रधान,बीएस येदियुरप्पा के पुत्र बी. वाई राघवेंद्र,कैलाश विजयवर्गीय के 'बैट दनादन फ़ेम सुपुत्र 'आकाश विजय वर्गीय विधायक,गंगाधर फ़नवीस के नूर-ए- नज़र देवेंद्र फ़डनवीस, सांसद दीया कुमारी, किरण रिजिजू, रीता बहुगुणा जोशी,आदि जैसी दर्जनों और राज्य स्तर पर सैकड़ों मिसालें ऐसी मिलेंगी जिनमें भाजपाइयों द्वारा वंशवाद की बेल को बख़ूबी खाद पानी दिया जा रहा है।

इसी प्रकार जब जम्मू कश्मीर में सरकार बनानी थी तो राज्य में महबूबा मुफ़्ती भी वंशवादी नहीं थी और उनकी पी डी पी भी पक्की राष्ट्रवादी थी। अब साथ छूटते ही वह वंशवादी भी हैं और पी डी पी राष्ट्रविरोधी भी। पंजाब में दो दशक से भी लंबे समय तक बादल परिवार के अकाली दल से गठबंधन रहा,वंशवाद की कोई चर्चा नहीं हुई,आज भी हरियाणा में देवी लाल के पौत्र दुष्यंत चौटाला को उनकी इसी योग्यता के आधार पर मुख्यमंत्री बनाया गया है कि वे स्व देवी लाल जी के वंश के ध्वजवाहक हैं अन्यथा पहली बार में ही विधायक बनने पर उपमुख्यमंत्री बनना भला किसी साधारण जे जे पी कार्यकर्त्ता के भाग्य में कहाँ ? परन्तु जब जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या उनकी पार्टी के अन्य शीर्ष नेता जनसभाओं में वंशवाद पर निशाना साधते हैं तो उन्हें अपने निशाने पर देश का प्रथम वंशवादी राजनैतिक परिवार नेहरू गांधी परिवार नज़र आता है परन्तु इसी परिवार के मेनका गाँधी व वरुण गांधी मां-बेटे राष्ट्रवादी नज़र आते हैं ,वंशवादी नहीं ? भाजपा को समाजवादी पार्टी,राष्ट्रीय जनता दल,बीजू जनता दल,तथा दक्षिण भारत की अनेक पार्टियां जो भाजपा  विरोधी हैं उन सबमें इनको वह 'वंशवाद ' दिखाई देता है जो इनके अनुसार देश की राजनीति व लोकतंत्र के लिये घातक है।

यदि भाजपा की यही धारणा है तो इस पैमाने पर तो केवल देश की वामपंथी पार्टियां ही सबसे उपयुक्त नज़र आती हैं। परन्तु भाजपाई व संघ विचारधारा व सिद्धांतों के मुताबिक़ तो कम्युनिस्टों से भी देश को उतना ही ख़तरा है जितना ईसाईयों व मुसलमानों से ? ऐसे में वंशवाद से निपटने का आख़िर उपाय क्या रह जाता है। क्या यही कि जो भाजपाई वंशवादी नेता हैं उन्हें वंशवादी नहीं बल्कि राष्ट्रवादी और यदि हो सके तो उन्हें  'महा राष्ट्रवादी ' मान लिया जाये और जो भाजपा विरोधी ख़ेमे से संबद्ध हैं उनपर वंशवादी होने का टैग लगाकर उन्हें लोकतंत्र व राजनीति के लिये ख़तरा घोषित कर दिया जाये।    

तनवीर जाफ़री 

गुरुवार, 14 जुलाई 2022

शिंजो आबे की मृत्यु संपूर्ण विश्व के लिए क्षति

अवधेश कुमार

जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे की हत्या से विश्व स्तब्ध है। भारतीय समय के अनुसार सुबह 8 बजे के आसपास जब वह नारा शहर में एक चुनावी सभा को संबोधित कर रहे थे तभी हमलावर ने नजदीक आकर पीछे से गोली मार दी। नारा पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय है और प्रसिद्ध ओसाका शहर से सड़क मार्ग से 1 घंटे की दूरी पर स्थित है। हमलावर ने 2 गोलियां मारी थी। इसमें एक गोली पीछे से सीने तक आ गई और उसी समय लग गया था कि उनका बचना मुश्किल है। बताने की आवश्यकता नहीं कि जापान जैसे विकसित देश में चिकित्सा की प्रणाली उन्नत है और पूरी कोशिश उनको बचाने की की गई। हालांकि जापान में कोई यह कल्पना नहीं कर सकता कि ऐसी घटना भी हो सकती है। जो दृश्य हमने देखा और जितनी खबरें हैं उनके अनुसार एक छोटी सी जगह पर सड़क पर लगे रैलिंगों के बीच में रविवार को होने वाले उच्च सदन के चुनाव के लिए भाषण दे रहे थे और करीब एक सौ लोग उनके आसपास धा। उनकी सुरक्षा में केवल चार सुरक्षा गार्ड थे। जाहिर है, सुरक्षा गार्ड भी निश्चिंत रहे होंगे क्योंकि इस तरह की घटना जापान में जो मौत हुई ही नहीं तो ज्यादा सतर्क और चौकन्ना होने की आवश्यकता है कोई महसूस भी नहीं करता। हमलावर ने इसी का लाभ उठाया और जापान के इस समय के सर्वाधिक लोकप्रिय तथा पूरे इतिहास के सफलतम प्रधानमंत्रियों में से एक को मौत की नींद सुला दिया।

जापान के वर्तमान प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा ने इसे बर्बर बताते हुए कहा है कि सहन नहीं किया जाएगा। दुनिया में जिन नेताओं के जीवन पर गंभीर खतरे की आशंका थी उनमें शिंजो आबे शामिल नहीं थे।  गोली मारने वाला 41 साल का यामागामी तेत्सुया पूर्व नौसैनिक है। वह मैरिटाइम सेल्फ डिफेंस फोर्स का सदस्य था। हमलावर के हाथ का बंदूक कैमरे की तरह लग रहा था क्योंकि उसने उस काले कपड़े में लपेट रखा था। इस कारण लोगों ने उसे पत्रकार समझा और उसने नृशंसता कर दी । जापान में हथियार खरीदने या रखने के इतने कड़े नियम हैं कि सामान्य आदमी उसे नहीं ले सकता। हमलावर ने घर में बनाए हुए हथियार का उपयोग किया। साफ है कि उसने काफी पहले से इसकी तैयारी की होगी। कहा जाता है कि वह उनकी सुरक्षा संबंधी नीतियों के विरुद्ध था। लेकिन कोई नीतियों से इतना विरोधी हो जाए और गोली मार दे यह सामान्यतः गले के नीचे नहीं उतरता। लेकिन अभी तक की सूचना इतनी है तो तत्काल यही मानकर चलना होगा।

वास्तव में शिंजो आबे की मृत्यु केवल जापान ही नहीं संपूर्ण विश्व के लिए क्षति है और भारत के लिए तो यह बहुत बड़ी क्षति है। भारत ने शिंजो आबे के निधन पर एक दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया। अपना सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्म विभूषण प्रदान कर भारत ने शिंजो आबे के दोनों देशों के द्विपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय रिश्तो में योगदान को स्वीकार किया था। शिंजो आबे ने अगर जापान में सबसे लंबे समय यानी 9 साल तक प्रधानमंत्री पर रहने का रिकॉर्ड बनाया तो साफ सै कि वे कोई सामान्य व्यक्ति नहीं थे। 67 साल के शिंजो आबे ने अपनी पार्टी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी को विखंडन से उबारते हुए जापान की सबसे शक्तिशाली और प्रमुख पार्टी के रूप में परिणित किया। 1993 में पहली बार सांसद बनने से लेकर वे लगातार राजनीति में सक्रिय रहे। 2006 में 52 साल की उम्र में वह देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने लेकिन उनका कार्यकाल लंबा नहीं रहा और 2007 में इस्तीफा देना पड़ा। 2012 में पार्टी का अध्यक्ष चुने जाने के बाद वे उसी वर्ष दोबारा प्रधानमंत्री बने और फिर लगातार बने रहे। अपने पेट की बीमारी, जिसे उन्होंने अल्सरेटिव कोलाइटिस बताया था, के कारण पद से इस्तीफा दिया। उस समय उन्होंने लिखा कि इस बीमारी के कारण उनके लिए अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कठिन हो गया है। इस तरह 23 अगस्त 2020 को उन्होंने प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया था। इधर उनके स्वास्थ्य में सुधार हुआ और फिर से सक्रिय थे।

हालांकि प्रधानमंत्री पद से हटने के बावजूद वे कभी पूरी तरह निष्क्रिय नहीं रहे। शिंजो आबे जापान के सफलतम प्रधानमंत्रियों में से एक माने जाते हैं। उन्होंने जापान को राजनीतिक अस्थिरता से उबारकर स्थिरता प्रदान किया, अर्थव्यवस्था को सुधारा और इन सब के साथ वैश्विक स्तर पर एक सक्रिय राष्ट्र की भूमिका निभाते हुए अंतरराष्ट्रीय राजनीति को नई दिशा देने की पहल की। चीन की आक्रामकता का उन्होंने न सिर्फ मुखर विरोध किया बल्कि उसकी विस्तारवादी नीति का सामना करने के लिए अपनी रक्षा नीति में बदलाव किया और उसके अनुसार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामान्य एवं रक्षा संबंध विकसित किया। जापान के संविधान की धारा 19 उसे अन्य देशों की तरह सैनिक बनाने और दूसरे देशों के साथ युद्धाभ्यास करने पर निषेध लगाता था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान प्रतिबंधित था और इसलिए उसे अपनी सेना बनाने की इजाजत नहीं मिली। बाद में सेल्फ डिफेंस फोर्स जरूर गठित हुआ लेकिन वह अत्यंत ही छोटे स्तर पर तथा उसकी भूमिका केवल आंतरिक सुरक्षा तक ही सीमित हो सकती थी। उन्होंने इस धारा में संशोधन किया और जापान की सेना दूसरे देशों के साथ युद्धाभ्यास कर सकती है। इसी के साथ जापान के भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया आदि के युद्धाभ्यास आरंभ हुए। मालाबार युद्धाभ्यास उन्हीं में से एक है। आबे ने आर्थिक सुधार से लेकर निवेश आदि से संबंधित अपने देश के वर्ण क्रम में काफी बदलाव किया । वर्तमान सरकार उसी नीति को आगे बढ़ाया रहे हैं।  हालांकि उनकी सुरक्षा नीति को लेकर जापान में मतभेद थे और इस पर बहस हो रही थी। लेकिन अगर देश में उनकी  लोकप्रियता सर्वाधिक थी तो इसका अर्थ यही है कि उनकी नीतियों से बहुसंख्यक जापानी सहमत हैं। वास्तव में उन्होंने लोगों के बीच, सभाओं में, संसद में, मीडिया में बार-बार जापान के समक्ष उत्पन्न खतरे, वैश्विक स्थिति तथा भविष्य के जापान को रक्षा दृष्टि से सशक्त बनाने कि अपने अवधारणा को लगातार इस तरह प्रस्तुत किया के लोगों ने उसे सही माना। जापान के लिए सामान्य बात नहीं थी पुलिस टॉप कारण जापान अपने में सिमटे हुए देश के रूप में ही द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से विकसित हुआ था और यही मानसिकता वहां हावी थी। उनके कार्यकाल की शुरुआत और आज के जापान आज का जापान आरक्षा हुआ अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दृष्टि से व्यापक रूप से बदल चुका है। जापान ने एक दिशा पकड़ ली है।

क्वाड पूरी तरह शिंजो आबे के मस्तिष्क की ही उपज है। 2007 में वे उसे मूर्त रूप नहीं दे सके लेकिन आज क्वाड अमेरिका, जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच एक महत्वपूर्ण गठबंधन बना है तो इसके पीछे उनकी ही भूमिका है। चीन आबे को लेकर कितना चौकन्ना रहता यह बताने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने यह निर्णय कर लिया था कि पूरा एशिया प्रशांत क्षेत्र में उसको वृहत्तर भूमिका निभानी है और इसके लिए उसे अपने रक्षा क्षेत्र का विस्तार करना होगा। उन्होंने इसी कारण दूरगामी दृष्टि से भारत की सक्रिय भागीदारी को महसूस किया तथा उसे धरातल पर लाने की शुरुआत कर दी। यह उन्हीं की अवधारणा थी कि हिंद महासागर और प्रशांत महासागर दोनों को मिलाकर सामरिक नीति बनाई जानी चाहिए। 2006 में जब भारत आए थे तो उन्होंने संसद में दो समुद्रों के संगम से शख्स एक भाषण दिया था। वह एक ऐतिहासिक भाषण था जिसमें हिंद महासागर और प्रशांत महासागर को एक साथ मिलाकर सामरिक व्यापारिक नीति की विस्तृत अवधारणा थी। आज अगर हिंद प्रशांत की सम्मिलित नीतियां हमारे सामने है तो इसके पीछे शिंजो आबे की ही प्रबल भूमिका थी। वास्तव में हिंद प्रशांत की पूरी अवधारणा उनकी है जिसे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया,भारत, ब्रिटेन सहित अनेक देशों नेस्वीकार किया। उस पर आज उस पर उस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। चीन को उन्होंने हमेशा एशिया ही नहीं संपूर्ण विश्व के खतरे के रूप में देखा और उनकी सोच से ज्यादातर देश धीरे-धीरे सहमत हुए।

इससे माना जा सकता है कि जापान के इतिहास में खासकर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय सोच और उसे क्रियान्वित कर देने वाले वे पहले प्रधानमंत्री हुए। भारत के साथ द्विपक्षीय ही नहीं वैश्विक सामरिक साझेदारी की शुरुआत शिंजो आबे के कारण हुई। शिंजो आबे ने जापान भारत के वैश्विक स्तर पर साथ मिलकर काम करने के ढांचा विकसित की । दोनों ने मिलकर अफ्रीका के ऐसे 20 देशों की पहचान की जहां अनेक क्षेत्रों में निवेश किया जा सकता है। वेब पांच बार भारत आए जिनमें एक बार यूपीए कार्यकाल में और चार बार नरेंद्र मोदी के शासनकाल में। नरेंद्र मोदी के साथ उनकी व्यक्तिगत संबंध भी काफी अच्छे थे और इसका प्रभाव दोनों देशों के संबंधों पर पड़ा। नरेंद्र मोदी ने उनकी मृत्यु पर जो व्यथा व्यक्त की है वह इसका प्रमाण है। शिंजो अबे के रूप में भारत ने केवल निवेश और तकनीकी सहयोग की दृष्टि से ही नहीं अंतरराष्ट्रीय राजनीति और समर नीति क्या स्तर पर भी एक गहरा मित्र खो दिया है।

अवधेश कुमार,ई- 30,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल- 98110 27208

शुक्रवार, 8 जुलाई 2022

गुजरात दंगे पर उच्चतम न्यायालय का फैसला, मोदी के विरुद्ध चलता रहा झूठा अभियान

अवधेश कुमार 


गुजरात दंगों पर उच्चतम न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ का फैसला इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इसमें तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार को  दंगों की साजिश रचने के आरोपों से बरी किए जाने पर मुहर लगी है तथा इसके विरुद्ध अभियान चलाने वाले को झूठा कहा गया है। न्यायालय के फैसले में स्पष्ट लिखा है कि विशेष जांच दल यानी एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट के विरुद्ध दायर याचिका आधारहीन ही नहीं, गलत बयानों और तथ्यों से भरी थी। याचिका में कहा गया था कि गोधरा घटना के बाद राज्य में हुई हिंसा के पीछे उच्चस्तरीय साजिश थी और यह पूर्व नियोजित थी। जैसा हम जानते हैं लंबे समय तक नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगा का खलनायक साबित करने के लिए अनेक एनजीओ, राजनीतिक पार्टियां, नेता, एक्टिविस्ट, पत्रकार, कानूनविद, कुछ सेवानिवृत्त न्यायाधीश अभियान चलाए हुए थे। सबका लक्ष्य एक ही था कि किसी तरह साबित करो कि  मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने साजिश रच कर मुसलमानों के विरुद्ध दंगे कराए और मंत्री ,नेता ,कार्यकर्ता, पुलिस, प्रशासन सब उनके निर्देश पर काम कर रहे थे । 451 पृष्ठों के विस्तृत फैसले में न्यायालय ने स्पष्ट कहा है इस तरह के आरोपों को प्रमाणित करने के लिए एक भी साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। न्यायालय ने इससे आगे बढ़कर कहा है कि मामले को गर्म बनाए रखने के लिए याचिकाकर्ताओं ने कानून का दुरुपयोग किया। इसी आधार पर न्यायालय ने मामले को सनसनीखेज बनाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कानून सम्मत कार्रवाई की अनुशंसा की है। क्या इसके बाद अलग से कुछ कहने की आवश्यकता रह जाती है कि गुजरात दंगों को लेकर किस तरह के झूठे और एकपक्षीय अभियान चलाए गए?

तीस्ता सीतलवाड़ से लेकर गुजरात के पूर्व डीजीपी श्री कुमार आदि की गिरफ्तारी तथा आगे अन्यों की संभावित गिरफ्तारी पर भी छाती पीटने वाले लोग हैं। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने यूं ही तो नहीं उन सबके विरुद्ध कानून सम्मत कार्रवाई की बात कही है। उच्चतम न्यायालय के फैसले को इस रूप में लिया गया है कि दंगा कराने के आरोपों से वर्तमान प्रधानमंत्री एवं तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी बेदाग और निर्दोष साबित हुए हैं। सच यह है कि विशेष जांच दल यानी सीट ने उन्हें बरी किया था और इस पर न्यायालयों की मुहर भी लग गई थी। जिनका एजेंडा दंगों की सिहरन भरी यादों को बार-बार कुरेद कर जिंदा रखने में था, जिन्होंने देश और दुनिया में पूरा झूठ फैलाया और उसके आधार पर काफी कुछ प्राप्त किया वे कैसे इसे स्वीकार कर चुप बैठ सकते थे। तीस्ता सीतलवाड़ ने जाकिया जाफरी को हथियार बनाया और उनके माध्यम से बार-बार अपील दायर करवाई। न्यायालय ने इसका विवरण देते हुए कहा है की 8 जून, 2006 को 67 पृष्ठ की शिकायत दी गई थी। इसके बाद 15 अप्रैल, 2013 को 514 पृष्ठों की प्रोटेस्ट पिटिशन दाखिल की गई। इसमें उन सभी लोगों की निष्ठा पर सवाल उठाया गया था, सबको झूठा बेईमान बताया गया जो प्रक्रिया में शामिल थे।

जरा सोचिए , 2002 के फरवरी-मार्च में दंगे हुए और हफ्ते भर के अंदर शांत भी हो गए।  जिनका एजेंडा हर हाल में मुसलमानों के अंदर भय पैदा करना, हिंदू मुसलमानों के बीच विभाजन की खाई पैदा कर नरेंद्र मोदी, भाजपा, संघ आदि को मुसलमानों का खलनायक साबित कर अपना स्वार्थ साधना था वे हर प्रकार के सनसनी के झूठे तथ्य सामने लाकर अभियान चलाते रहे। उस समय की कानूनी स्थितियों पर को याद करिए। मानवाधिकार आयोग, उच्चतम न्यायालय ,निचले न्यायालय, उच्च न्यायालय और अंततः दंगों से जुड़े मामलों को गुजरात से बाहर महाराष्ट्र में स्थानांतरित करवाना….क्या क्या नहीं हुआ। प्रचारित यही होता था कि चुके मोदी ने दंगे करवाए इसलिए वह हर प्रकार की कानूनी कार्रवाई व न्यायिक प्रक्रिया को बाधित  कर रहे हैं। एसआईटी ने क्लीन चिट दे दी तो उस पर भी प्रश्न इन लोगों ने उठाना शुरू कर दिया। न्यायालय ने सीट के रिपोर्ट के बारे में जो कहा है उस पर नजर डालिए—एसआईटी की फाइनल रिपोर्ट जैसी है वैसी ही स्वीकार होनी चाहिए। न्यायालय ने इसकी रिपोर्ट को तथ्यों और ठोस तर्को पर आधारित कहा है,जिसमें और कुछ करने की जरूरत नहीं है।

दंगे हुए यह सच है और उसमें दिल दहलाने वाली घटनाएं हुई। समस्या यह है कि विरोधियों ने दंगों की एकपक्षीय ऐसी तस्वीर बनाई जिससे लगता था कि 27 फरवरी, 2002 को अयोध्या से साबरमती एक्सप्रेस से लौट रहे 59 कारसेवकों को गोधरा स्टेशन पर दो कोच में आग लगा कर जिंदा जलाने की घटना से इनका कोई लेना-देना नहीं हो। ये ऐसे वक्तव्य देते थे मानो ट्रेन में जिंदा जलाए जाने वाले लोग मनुष्य थे ही नहीं। गोधरा कांड को अलग कर देंगे तो गुजरात दंगा समझ ही नहीं आएगा। रेल दहन के विरुद्ध आक्रोश पैदा हुआ और लोगों ने मुसलमानों पर हमला शुरू कर दिया। 26 मार्च ,2018 को उच्चतम न्यायालय ने सीबीआई के पूर्व निदेशक आरके राघवन की अध्यक्षता में विशेष जांच दल का गठन किया था। 8 मार्च, 2012 को क्लोज रिपोर्ट में मोदी और 63 लोगों को बरी किया गया। इसे न्यायालय में चुनौती दी गई।  

उच्चतम न्यायालय की मॉनिटरिंग में दंगों से संबंधित सारे मामलों की छानबीन करने वाले विशेष जांच दल यानी सीट को पूरी बुद्धि लगाकर भी मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी तथा अन्य लोगों द्वारा मुसलमानों के विरुद्ध हिंसा कराने की साजिश नजर नहीं आई, मजिस्ट्रेट न्यायालय और फिर उच्च न्यायालय ने भी इसे सही माना लेकिन तीस्ता सीतलवाड को ये सब दोषी नजर आते रहे। इसका मतलब जानबूझकर गलत उद्देश्य से अभी तक मामले को खींचा गया था। ऐसा नहीं है कि उस दंगे के लिए कोई दोषी नहीं हो। अब तक कई नेताओं सहित अधिकारियों और पुलिस के लोगों को सजा मिल चुकी है। उच्चतम न्यायालय ने यही कहा है कि कुछ अधिकारियों की निष्क्रियता या विफलता को राज्य प्रशासन की पूर्व नियोजित आपराधिक साजिश नहीं कहना चाहिए। अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति इसे राज्य प्रायोजित अपराध भी नहीं कहा जा सकता है।

उच्चतम न्यायालय के फैसले का एक महत्वपूर्ण पक्ष गुजरात सरकार के कुछ अधिकारियों के खिलाफ कड़ी टिप्पणियां तथा कानूनी कार्रवाई की मुखर अनुशंसा है। पीठ ने लिखा है कि इनमें गलत उद्देश्य के लिए मामले को जारी रखने की बुरी मंशा नजर आती है। इसमें लिखा है कि जो प्रक्रिया का इस तरह से गलत इस्तेमाल करते हैं उन्हें कटघरे में खड़ा करके उनके खिलाफ कानून के दायरे में कार्रवाई की जानी चाहिए।  अगर ये नहीं होते तो गुजरात दंगों के घाव कब भर जाते। लेकिन कुछ राजनीतिक इरादे वाले एनजीओ, एक्टिविस्टों, पत्रकारों और नेताओं के लिए वह इस कारण भी मुख्य एजेंडा था क्योंकि इसके कारण उनको सम्मान के साथ धन भी प्राप्त हो रहा था। जाहिर है ,इनके खिलाफ व्यापक जांच की आवश्यकता है ताकि यह तलाश किया जा सके कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया और कहीं भारत विरोधी शक्तियां भी तो इनके साथ नहीं लगी हुई थी। इसमें कुछ अधिकारियों का नाम लिखा गया है जिसमें संजीव भट्ट, हरेन पांड्या, आरबी श्रीकुमार आदि शामिल है। इसमें लिखा है कि राज्य सरकार के इस तर्क में दम नजर आता है कि भारतीय पुलिस सेवा के तत्कालीन अधिकारी संजीव भट्ट, गुजरात के पूर्व गृह मंत्री हरेन पांड्या और भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी आरबी श्रीकुमार की गवाही केवल मुद्दे को सनसनीखेज और राजनीतिक बनाने के लिए थी। तो  न्यायालय ने अपना जो निष्कर्ष दिया है वह महत्वपूर्ण है। उसने लिखा है कि अंत में हमें ऐसा लगता है कि गुजरात के असंतुष्ट अधिकारियों के साथ-साथ अन्य लोगों का प्रयास गलत बयान देकर सनसनी पैदा करना था। विरोधी इसे राज्य प्रायोजित मुस्लिम हत्या की ही संज्ञा देते रहे हैं। 

दुनिया भर में इसे राज्य द्वारा मुस्लिम नरसंहार के रूप में प्रचारित किया गया और इस अभियान का कितना नकारात्मक असर हुआ यह बताने की आवश्यकता नहीं। लंबे समय तक विदेश यात्रा करने वाले भारत के नेताओं से इस पर प्रायोजित प्रश्न पूछे जाते रहे। कई देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने इसे उठाया। अमेरिका ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में घोषणा कर दी कि उन्हें वहां आने का वीजा नहीं दिया जाएगा। पूरी दुनिया में केवल नरेंद्र मोदी की बदनामी नहीं नहीं हुई बल्कि भारत की छवि कलंकित हुई। 2002 के बाद से भारत में पकड़े गए कई आतंकवादियों ने कहा कि गुजरात दंगों के बारे में जो बताया गया उससे वह आतंकवादी बना। कल्पना किया जा सकता है कि झूठे प्रचार से देश को कितनी हानि हुई होगी। तो इसके लिए किसे जिम्मेदार ,दोषी या अपराधी माना जाए ? कानूनी एजेंसियों की छानबीन से ही इस साजिश का पूरा सच सामने आएगा और हो सकता है ऐसे तथ्य भी हाथ लगे जिनसे हम आप वाकिफ नहीं है। इनको सजा मिलने के बाद ही गुजरात दंगों से संबंधित कानूनी कार्रवाई और प्रक्रियाएं पूर्ण होंगी। अभी तक यह अधूरी है। उच्चतम न्यायालय ने इसका रास्ता प्रशस्त कर दिया है। 

अवधेश कुमार,ई- 30 ,गणेश नगर ,पांडव नगर कंपलेक्स ,दिल्ली -110092, मोबाइल- 98110 27208



रविवार, 3 जुलाई 2022

मां की गुहार सुन हिंदू राव अस्पताल पहुंचे अमनदूत के अध्यक्ष संजीव जैन ने किया बच्चे के लिए रक्तदान

आज अमनदूत एनजीओ के अध्यक्ष संजीव जैन ने हिंदू राव हॉस्पिटल में इलाज करा रहे एक जरूरतमंद मरीज को ब्लड डोनेट किया। जानकारी के अनुसार, उन्हें हिंदू राव हॉस्पिटल से एक मां का फोन आया कि मेरे बच्चे की तबीयत खराब है और उसे खून की जरूरत है तो संजीव जैन तुरंत हिंदू राव हॉस्पिटल पहुंचे और बच्चे के लिए ब्लड डोनेड किया। 

महिला ने संजीव जैन से कहा कि मेरे बच्चे को खून की जरूरत है परंतु मुझे कोई भी ब्लड डोनर नहीं मिल रहा है। यह सुनने के बाद संजीव जैन ने स्वयं ही ब्लड डोनेट करने का फैसला किया। इस पर महिला ने ब्लड डोनेट कर ब्लड उपलब्ध कराने पर संजीव जैन को धन्यवाद दिया। इसके बाद संजीव जैन ने संवाददाताओं से कहा कि मैं पहले इंसान हूं। मैंने एक बच्चे की जान बचाने के लिए अपना कर्तव्य निभाया। संजीव जैन इससे पहले भी परोपकार के कार्य कर चुके हैं।

इस्लाम को कलंकित करती है कन्हैया की हत्या

तनवीर जाफ़री

मंहगाई, बेरोज़गारी, भय, भूख, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, जातिवाद, लोकतांत्रिक, आर्थिक व सीमावर्ती चुनौतियों जैसी अनेक समस्याओं से जूझ रहे हमारे देश में आये दिन कोई न कोई ऐसा  'भूचाल' आ जाता है या जानबूझकर लाया जाता है जिससे देश की यह वास्तविक समस्यायें नेपथ्य में चली जाती हैं। ऐसा ही एक विषय जिसे लेकर विगत एक महीने से भी अधिक समय से पूरा देश उद्वेलित हो रहा है वह है भारतीय जनता पार्टी की प्रवक्ता के रूप में एक भाजपाई नेत्री नूपुर शर्मा द्वारा गत 27 मई को ज्ञानवापी मस्जिद के मुद्दे पर एक टीवी चैनल पर डिबेट के दौरान पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद साहब पर की गई एक आपत्तिजनक टिप्पणी। नूपुर शर्मा द्वारा पैग़ंबर मोहम्मद साहब पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी के बाद मुस्लिम समुदाय के लोग देश के कई राज्यों में सड़कों पर प्रदर्शन करने उतर आए थे। इस दौरान कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों के उग्र हो जाने के चलते हिंसा भी भड़क उठी थी। कई इस्लामिक देशों ने भी इस टिप्पणी पर भारत सरकार से नाराज़गी दर्ज कराई थी। परिणाम स्वरूप भाजपा ने नूपुर शर्मा को प्रवक्ता पद व पार्टी से हटाते हुए यह भी कहा था कि नूपुर शर्मा का बयान भारत सरकार का मंतव्य नहीं है। परन्तु दो कट्टरपंथी लोगों ने इसी प्रकरण के चलते पिछले दिनों उदयपुर में नुपुर शर्मा समर्थक कन्हैया नामक एक दर्ज़ी की बेरहमी से गला रेत कर हत्या कर दी। बताया जा रहा है कि हत्यारों में से एक कुछ समय पूर्व पाकिस्तान भी गया था अतः इस हत्याकांड में पाकिस्तान की कथित साज़िश की भी पड़ताल की जा रही है।

इन सब के बीच इसी प्रकरण में पिछले दिनों देश के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायाधीश जेबी परदीवाला की अवकाशकालीन बेंच ने नुपुर शर्मा की एक अर्ज़ी पर सुनवाई करते हुए उसे कड़ी फटकार लगाई और कहा कि शर्मा के बयान ने पूरे देश में अशांति फैला दी है। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सुनवाई के दौरान नुपुर शर्मा की टिप्पणियों को "तकलीफ़देह" बताया और कहा कि "उनको ऐसा बयान देने की क्या ज़रूरत थी?" सर्वोच न्यायालय ने ये सवाल भी किया कि एक टीवी चैनल का एजेंडा चलाने के अलावा ऐसे मामले पर डिबेट करने का क्या मक़सद था, जो पहले ही न्यायालय के अधीन है? माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने शर्मा की बयानबाज़ी पर सवाल किया और कहा, "अगर आप एक पार्टी की प्रवक्ता हैं, तो आपके पास इस तरह के बयान देने का लाइसेंस नहीं है." सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि उन्हें टीवी पर जाकर पूरे देश से माफ़ी मांगनी चाहिए थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि "जिस तरह से नुपुर शर्मा ने देशभर में भावनाओं को उकसाया, ऐसे में देश में ये जो भी हो रहा है उसके लिए वह अकेली ज़िम्मेदार हैं। माननीय अदालत ने यह भी कहा, "जब आपके ख़िलाफ़ एफ़आईआर हो और आपको गिरफ़्तार नहीं किया जाए, तो ये आपकी पहुँच को दिखाता है। उन्हें लगता है उनके पीछे लोग हैं और वो ग़ैर-ज़िम्मेदार बयान देती रहती हैं"। अदालत ने इसके अतिरिक्त भी अनेक तल्ख़ टिप्पणियां कीं।

उपरोक्त अदालती टिप्पणियों से एक बार फिर यह ज़ाहिर हो गया कि देश में सत्ता अपने निजी एजेंडे पर चलने के लिये भले ही बेलगाम क्यों न हो परन्तु इसके बावजूद देश में क़ानून का राज है और देश की अदालतों के फ़ैसले ही सर्वमान्य हैं। परन्तु यदि कोई भी पक्ष भावनाओं को भड़काने के नाम पर हिंसा का सहारा ले या निर्मम हत्या का सहारा लेने लगे तो उसे किसी भी क़ीमत पर सही नहीं ठहराया जा सकता। वैसे भी यदि पूरे विश्व में 'भावनाओं को भड़काने' के नाम पर हत्याएं होने लगें और क़ानून के बजाये हिंसा का सहारा लिया जाने लगे फिर तो पूरा संसार ही सुलग उठेगा। आज इस दुनिया में जहां हज़रत इमाम हुसैन के मानने और उनपर अपनी जान तक न्योछावर करने वाले करोड़ों लोग हैं वहीं दुनिया में यज़ीद समर्थक भी मौजूद हैं। राम को आराध्य मानने वाले हैं तो रावण के समर्थक भी मिल जायेंगे। जहां हमारे ही देश में गाँधी को महात्मा कहने व उन्हें अपना आदर्श मानने वाले हैं वहीं उनके हत्यारे गोडसे के चाहने वालों की भी कमी नहीं। तो क्या वैचारिक मतभेद के चलते लोगों की 'भावना आहत' हो और लोग एक दूसरे की हत्या और हिंसा पर उतारू हो जायें ?

कोई भी व्यक्ति किसी के भी विचारों से सहमत या असहमत हो सकता है। अकेले कन्हैया लाल ही नुपुर शर्मा का समर्थक नहीं बल्कि लाखों लोग उसके साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। यदि उदयपुर जैसी घटना हर जगह घटित होने लगे फिर तो न क़ानून बचेगा न देश न ही इंसानियत। वैसे भी क्रूर हत्यारों ने जिस तरह कन्हैया की हत्या कर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक को धमकी दे डाली और हत्या की वीडीओ बनाकर सोशल मीडिया पर डालने जैसा दुस्साहस किया वह निश्चित रूप से न केवल अक्षम्य अपराध है बल्कि यह किसी बड़ी साज़िश का हिस्सा भी प्रतीत होता है। इस्लाम धर्म वैसे भी बदले से अधिक क्षमा करने की प्रेरणा देता है। अपने उद्भव काल से लेकर आज तक पूरे विश्व में इस्लाम की बदनामी व रुस्वाई का कारण ही कट्टरपंथी व अतिवादी मुसलमानों के हिंसक कारनामे रहे हैं। करबला से लेकर तालिबानी अफ़ग़ानिस्तान तक इसके अनेक उदाहरण नज़र आते हैं। नुपुर शर्मा के आपत्तिजनक बयान से दुनिया के मुसलमानों में जितना उबाल आया था वैसी ही स्थिति कन्हैया की बेरहमी से की गयी हत्या के बाद खड़ी हो गयी है। मुसलमानों के विरोध के मौक़े की तलाश में बैठे लोगों को एक बार फिर 'ऊर्जा ' मिल गयी है जिसके ज़िम्मेदार कन्हैया के हत्यारे तथा ' धार्मिक भावनाओं ' के नाम पर हिंसा भड़काने वाले अतिवादी प्रवृति के लोग हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस्लाम और इंसानियत दोनों को ही कलंकित करती है कन्हैय्या की नृशंस हत्या।

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