शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2021

पंजाब में कांग्रेस के इस हस्र का जिम्मेवार कौन

अवधेश कुमार

कांग्रेस इस समय यह तर्क दे रही है कि  हमने विधायकों से बातचीत करने के बाद पंजाब के मुख्यमंत्री पद से कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाने का फैसला किया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला का बयान है कि 78 विधायकों ने उनका विरोध किया उसके बाद ही केंद्रीय नेतृत्व को फैसला करना पड़ा। यह बात भी साफ है कि नवजोत सिंह सिद्धू जब अपने साथ ज्यादा से ज्यादा विधायकों के होने का दावा कर रहे थे तो वह निराधार नहीं था।  उन्होंने विधायकों की बैठक बुलाई तो उसमें कैप्टन कैबिनेट के मंत्री तक शामिल हुए थे। किसी भी प्रदेश में मुख्यमंत्री के विरुद्ध  पार्टी के अंदर माहौल बन जाए और बड़ी संख्या में नेता विधायक खुलकर सामने आने लगे तो केंद्रीय नेतृत्व को इस तरह का फैसला करना पड़ता है। कांग्रेस की जगह दूसरी पार्टी भी होतीऔर परिस्थितियां वैसे ही हो जैसे बताई जा रही है तो ऐसा ही फैसला करती। किंतु क्या वाकई जो कुछ इस समय कहां जा रहा है वही सच है? राजनीति की सामान्य समझ रखने वाले भी जानते हैं कि अगर केंद्रीय नेतृत्व सख्त रुख अपना ले तो किसी मुख्यमंत्री के खिलाफ इतनी संख्या में विधायक खुलकर सामने नहीं आ सकते। सच यही है कि सिद्धू ने जबसे कैप्टन के विरुद्ध झंडा उठाया उन्हें रोकने, मनाने, समझाने, चेतावनी देने की कोशिश ही नहीं की गई। वे दिल्ली आते राहुल गांधी, प्रियंका वाड्रा, से भेंट होती और सोशल मीडिया पर फोटो जाता। यह सिलसिला चलता रहा और इसका संदेश पूरे पंजाब के कांग्रेस में जो गया होगा उसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है।

  प्रदेश प्रभारी हरीश रावत परिपक्व और सूझबूझ वाले नेता हैं। उन्हें भी सच पता होगा। भारतीय राजनीति में इस तरह के सच को कोई नेता सार्वजनिक रूप से बाहर नहीं करता। एक तर्क यह भी है कि मलिकार्जुन खड्गे ,हरीश रावत और जेपी अग्रवाल तीनों के समूह ने जो रिपोर्ट दी उसके आधार पर फैसला हुआ। रिपोर्ट पूरी तरह सार्वजनिक नहीं है। कई बार नेताओं का समूह  रिपोर्ट भी केंद्रीय नेतृत्व की मंशा के अनुरूप देता है। राहुल गांधी यह चाहें कि कैप्टन अमरिंदर मुख्यमंत्री से हट जाएं तो कोई समूह उनके सामने आकर ऐसी रिपोर्ट कैसे दे सकता है कि उनका रहना आवश्यक है? पूरी स्थिति को देखने के बाद किसी का भी निष्कर्ष यही आएगा का वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व अपनी पार्टी को बचाने की बजाय उसके पतन के लिए जो कुछ संभव है वह कर रहा है। जो करना चाहिए वह कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व नहीं कर रहा है। अगर कैप्टन अमरिंदर सिंह आज नई पार्टी बनाकर कांग्रेस के विरुद्ध मोर्चा खड़ी करने जा रहे हैं तो इसके लिए किसे दोष दिया जाएगा? उन्होंने कहा भी है कि सिद्धू  इसके लिए जिम्मेदार नहीं है? वे कह रहे हैं कि हमने केंद्रीय नेतृत्व को स्पष्ट बता दिया था कि सिद्धू अस्थिर मस्तिष्क का व्यक्ति है ,उस पर भरोसा नहीं करना चाहिए, वह पंजाब के लिए अनुकूल नहीं है लेकिन मेरी बात नहीं मानी गई। कैप्टन प्रश्न कर रहे हैं कि मेरे पास चारा क्या है? उनकी यह शिकायत भी वाजिब है कि मुख्यमंत्री मैं हूं और मुझे बिना सूचना के विधायक दल की बैठक बुला ली गई। जो नेता केंद्रीय नेतृत्व की केवल कृपा से मुख्यमंत्री बना हो वह बहुत कुछ सहन करता है ,कर सकता है। कैप्टन ऐसे नेता हैं, जिन्होंने 2017 में अपनी बदौलत कांग्रेस को जीत दिलाई थी। यह बात सही है कि कैप्टन को भी संगठन के रूप में कांग्रेस का एक मजबूत ढांचा पंजाब में मिला। लेकिन वह ढांचा भी एकजुट होकर कैप्टन के नेतृत्व में ही लड़ने को तैयार हुआ। सोनिया गांधी, प्रियंका वाड्रा या राहुल गांधी पंजाब में कांग्रेस को कितना वोट दिला सकते हैं यह बताने की आवश्यकता नहीं है।

 अगर उम्र ही तकाजा हो और नई पीढ़ी को जिम्मेवारी देनी हो तो फिर उसका तरीका यह नहीं हो सकता जैसा पंजाब में किया गया। कैप्टन जैसे नेता को विश्वास में लेकर सही तरीके से रास्ता आसानी से निकल सकता था। कैप्टन के अनुसार उन्होंने स्वयं सोनिया गांधी को कहा कि मैं चुनाव में भूमिका निभाकर अपने आप हट जाऊंगा। बाद में उन्होंने सोनिया गांधी को यह भी कहा कि अगर मेरे से दिक्कत है ,मेरे पर विश्वास नहीं है तो मैं त्यागपत्र देना चाहता हूं? कैप्टन का कहना है कि उस समय उन्हें त्यागपत्र देने से रोक दिया गया। दुर्भाग्य देखिए कि सोनिया, राहुल, प्रियंका तथा उनके समर्थक, सलाहकार और रणनीतिकार अभी भी पंजाब को संभालने की कोशिश करते नहीं दिखते। कांग्रेस भूल रही है कि उसकी दुर्दशा का एक कारण केंद्रीय नेतृत्व द्वारा स्थानीय नेताओं का अपमान या उनकी अनदेखी रही है। चाहे आंध्र में टी अंजैया का मामला हो या कर्नाटक में वीरेंद्र पाटिल। पुराने लोग जानते हैं कि राजीव गांधी के जमाने में कैसे अंजैया का अपमान हुआ और यह तेलुगु स्वाभिमान का प्रतीक बना। उसी से तेलुगू देशम पार्टी खड़ी हुई। कर्नाटक में कांग्रेस किस तरह पराजित हुई इतिहास के अध्याय में वर्णित है। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में गलत नेताओं को प्रश्रय और अच्छे नेताओं को अपमानित करने, हाशिए में धकेलने का परिणाम यह है कि इन दोनों जगह कांग्रेस का अस्तित्व समाप्तप्राय है। शायद पंजाब में इतनी बुरी स्थिति अभी न हो।  किंतु कैप्टन के अंदर नवजोत सिंह सिद्धू के साथ-साथ केंद्रीय नेतृत्व के विरुद्ध भी प्रतिशोध की अग्नि धधक रही है। ऐसा व्यक्ति अपना भला करे न करे हरसंभव नुकसान पहुंचा सकता है। 

विडंबना देखिए  कि जिस सिद्धू पर राहुल गांधी ने दांव लगाया उसी ने मिट्टी पलीद कर दी। राजनीति में अपरिपक्व व्यक्ति को ज्यादा महत्व देने का परिणाम हमेशा ऐसे ही आता है। जब वह कैप्टन मंत्रिमंडल में थे तब भी उनकी कल्पना थी कि हर कुछ जैसा वह चाहते हैं वैसा ही हो और जब अध्यक्ष बने तो उसी तरह व्यवहार करना चाहते थे। चरणजीत सिंह चन्नी के नेतृत्व में सरकार बनी तो मंत्री से लेकर उच्चाधिकारी भी उनकी पसंद का होना चाहिए। कोई भी परिपक्व व्यक्ति इस प्रकार की सोच से राजनीति में व्यवहार नहीं कर सकता। किंतु केंद्रीय नेतृत्व को इतनी समझ होनी चाहिए कि वह किस व्यक्ति को आगे बढ़ा रहा है। सिद्धू जो हैं वही कर रहे हैं और वही करेंगे। मूल बात यह है कि उन्हें इतना महत्व दिया किसने? किसने उन्हें अध्यक्ष बनाया? किसने उनको प्रोत्साहित किया ताकि वह कैप्टन के विरुद्ध हर सीमा का उल्लंघन करते जाएं? अब सिद्धू अध्यक्ष रहें या जाएं कांग्रेस की स्थिति पंजाब में क्या होगी और इन सबका असर दूसरे राज्यों में कैसा होगा? दुर्भाग्य यह भी है कि इस समय राहुल , सोनिया  या प्रियंका के निर्णय पर प्रश्न उठाने वालों को कांग्रेस विरोधी करार दे दिया जाता है। ऐसे चापलूस और जी हुजूरी करने वाले भी परिवार के इर्द-गिर्द हैं और उनके समर्थक बाहर फैले हैं। ये लोग सोशल मीडिया से लेकर सड़कों पर भी ऐसे नेताओं व पत्रकारों के विरुद्ध मोर्चाबंदी कर देते हैं। इसमें कोई दुस्साहसी ही परिवार के तीनों सदस्यों के सामने जाकर सच बोल सकता है। सच बोल दिया जाए  तो भी पंजाब के पूरे घटनाक्रम को पीछे नहीं ले जाया जा सकता।  जिस तरह नेताओं का एक समूह पंजाब के निर्णय को सही ठहराने पर तुला है उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कांग्रेस सोच और व्यवहार के स्तर पर किस दिशा में जा रही है। 

अवधेश कुमार, ई-10, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली-110092, मोबाइल- 98910 27208

गुरुवार, 30 सितंबर 2021

भारत अमेरिकी संबंधों की नियति की झलक

अवधेश कुमार

यह बताने की आवश्यकता नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा  पर संपूर्ण दुनिया की नजर लगी हुई थी । हालांकि वे संयुक्त राष्ट्र के वार्षिक सम्मेलन में भाग लेने वहां गए लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति जो बिडेन तथा उपराष्ट्रपति कमला हैरिस के साथ द्विपक्षीय मुलाकात का कार्यक्रम निर्धारित था। इसके साथ  क्वाड का भी पहला आमने सामने का शिखर सम्मेलन जुड़ गया एवं ऑस्ट्रेलिया तथा जापान के प्रधानमंत्री के साथ बातचीत भी।  ये मुलाकातें तथा क्वाड से निकले संदेश की ओर भी दुनिया की दृष्टि थी। चार महत्वपूर्ण देशों के नेताओं द्वारा एक संगठन के बैनर के तहत किए निर्णयों का व्यापक अंतरराष्ट्रीय प्रभाव होना है। लेकिन दुनिया की  मुख्य अभिरुचि बिडेन तथा कमला हैरिस से मोदी की मुलाकात पर  केंद्रित थी। बिडेन के राष्ट्रपति पद पर आसीन होने के बाद मोदी की उनसे  आमने सामने की पहली मुलाकात थी। वर्चुअल रूप से  क्वाड सम्मेलन, जलवायु परिवर्तन पर आयोजित सम्मेलन तथा समूह 7 के शिखर सम्मेलन में आमने-सामने थे। इस बीच कोविड सहित ऐसी कई घटनाएं हो गई जिसने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को पूरी तरह प्रभावित किया है। अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के फैसले ने नई विश्व व्यवस्था की एक भयावह तस्वीर दुनिया के सामने रखी है। इसमें बिडेन के साथ मोदी की मुलाकात  का महत्व ज्यादा बढ़ गया था। 

भारत अमेरिकी संबंध केवल दो सामान्य देशों के राजनयिक स्तर तक सीमित नहीं है और न केवल दोनों सामरिक साझेदार हैं, बल्कि 2016 में रक्षा साझीदार बनने के बाद कई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को लेकर इनकी सम्मिलित भूमिका हो चुकी है। इसमें अफगानिस्तान से अमेरिकी वापसी और तालिबान के आधिपत्य के बाद भारतीय उपमहाद्वीप की सामरिक स्थिति अस्त-व्यस्त हो गई है। अमेरिका ने ब्रिटेन के साथ मिलकर ऑस्ट्रेलिया  से आकुस समझौता किया है जिसके तहत ऑस्ट्रेलिया में परमाणु पनडुब्बियों का निर्माण होगा तथा एशिया प्रशांत के लिए विशेष व्यवस्था में तीनों मिलकर काम करेंगे। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर की पिछली तीन अमेरिकी यात्राओं तथा भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एवं विदेश सचिव  आदि की अपने अमेरिकी समकक्षों से बातचीत  के बाद भावी संबंधों की तस्वीर को लेकर कुछ निष्कर्ष अवश्य आया होगा। जाहिर है, मोदी _बिडेन और उसके पहले मोदी _हैरिस की बातचीत में निश्चित रूप से ये सारे मुद्दे रहे होंगे । 

बिडेन और मोदी की बैठक 1 घंटे के लिए निर्धारित थी लेकिन यह डेढ़ घंटे तक चली। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि बातचीत में कितने विषय और बिंदु शामिल रहे होंगे। स्वयं अमेरिकी राष्ट्रपति की भारत के संदर्भ में भावना और भविष्य को लेकर इसके महत्व का भी द्योतक है। बिडेन ने कहा भी कि अगली बार जब हम मिलेंगे तो इसे 2 दिनों से अधिक के लिए निर्धारित किया जाना चाहिए। यानी हमारे बीच परस्पर सहमति और साझेदारी के इतने मुद्दे हैं कि घंटे -दो घंटे में हम उन्हें निपटा नहीं सकते । हमने देखा भी कि मोदी का व्हाइट हाउस में उन्होंने किस गर्मजोशी से स्वागत किया। उन्होंने ट्वीट भी किया कि आज मैं व्हाइट हाउस में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत कर रहा हूं। उन्होंने कहा कि आप जिस कुर्सी पर बैठ रहे हैं इस पर हमारी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस बैठती हैं और क्या संयोग है कि वह भी भारतीय मूल की हैं। राजनय में इनका महत्व होता है। इससे पता चलता है कि मेजबान देश आपके प्रति क्या भाव रखता है। वास्तव में बिडेन से बातचीत के पहले उपराष्ट्रपति कमला हैरिस से मुलाकात एवं बातचीत में आधारभूमि तैयार हो गई थी।  हैरिस ने आतंकवाद को लेकर मोदी की बातों का सार्वजनिक समर्थन किया और कहा कि पाकिस्तान में आतंकवादी हैं और उसे रोकने का कदम उठाना चाहिए ताकि भारत और अमेरिका दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। तो यह अमेरिकी प्रशासन की नीति है। इसमें भारत और अमेरिका दोनों की सुरक्षा को समान स्तर पर रख कर बात करना महत्वपूर्ण है। जैसा विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंखला ने बताया कि दोनों मुलाकातों में हिंद प्रशांत क्षेत्र ही नहीं पूरे विश्व में चीन के उभरते खतरे, अफगानिस्तान में तालिबान के बाद आतंकवाद की चुनौतियां, जलवायु परिवर्तन, उभरती तथा उत्कृष्ट प्रौद्योगिकी में परस्पर सहयोग आदि को लेकर विस्तृत बातचीत हुई। प्रधानमंत्री मोदी ने यात्रा आरंभ करते समय ट्विट करके बताया था कि हम द्विपक्षीय वैश्विक साझेदारी की समीक्षा करेंगे। जो कुछ जानकारी है उसके अनुसार द्विपक्षीय एवं वैश्विक साझेदारी, रक्षा और सुरक्षा सहयोग मजबूत करना,  आतंकवाद व कट्टरपंथ के खिलाफ साझा रणनीति, सीमा पार आतंकवाद रोकने के तरीकों पर विचार, अफगानिस्तान संकट से निपटने की रणनीति, चीन के विस्तारवाद पर लगाम कसना, द्विपक्षीय व्यापार और निवेश संबंधों को मजबूत करना, जलवायु परिवर्तन, संयुक्त राष्ट्र संघ में सुधार, स्वच्छ ऊर्जा साझेदारी को बढ़ावा देना आदि विषय बातचीत में समाहित थे।

भारत में मीडिया और बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने माहौल ऐसा बनाया था किअमेरिका में कमला हैरिस मोदी के समक्ष कश्मीर सहित मानवाधिकार के मुद्दे, धार्मिक स्वतंत्रता आदि पर घेरेंगी तथा बिडेन से मुलाकात में भी ये विषय आएंगे। ऐसा कुछ हुआ नहीं, न होना था। कमला हैरिस उपराष्ट्रपति हैं और अमेरिकी हितों का संरक्षण उनका मुख्य लक्ष्य। भारत जैसे वैश्विक स्तर के मजबूत साझेदार के प्रति एक भी नकारात्मक शब्द से उल्टा संदेश निकल सकता है और परिणाम भी विपरीत आ सकते हैं। यह मोदी बिडेन की मुलाकात का ही परिणाम था कि क्वाड में जब मोदी ने आतंकवाद और अफगानिस्तान का मुद्दा उठाया तो बिडेन का इसमें समर्थन मिला। ऑस्ट्रेलिया और जापान का समर्थन तो मिलना ही था। तो हम परिणतियों को किस रूप में देखें?  दरअसल, बिडेन के नेतृत्व में अमेरिका ने अभी तक अपनी सुरक्षा सहित संपूर्ण सामरिक-अंतरराष्ट्रीय नीति के जो संदेश दिए हैं उन पर गहराई से विचार कर भारत जैसे देश को भविष्य के लिए अपनी रणनीति बनानी होगी। मोदी से मुलाकात के आरंभ में ही बिडेन ने कहा कि हमें गांधीजी को नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने अहिंसा और सहनशीलता की बात की थी। बिडेन लगातार अहिंसा और सहनशीलता की बात कर रहे हैं। पिछले दिनों चीन के संबंध  में भी उन्होंने सहनशीलता तथा बातचीत का बयान दिया है।इसके मायने क्या हो सकते हैं ? अगर अफगानिस्तान का कदम यह संदेश है कि अमेरिका विश्व भर से रक्षा ऑपरेशन या उपस्थिति को खत्म करना चाहता है तथा चीन से निश्चित टकराव देखते हुए भी उससे बचने की नीति होगी  तो इससे पूरे विश्व की सामरिक स्थिति में अकल्पनीय बदलाव आ सकता है। हालांकि मोदी ने बिडेन को कहा कि गांधीजी ने  ट्रस्टीशिप की बात की थी  जिसे द्विपक्षीय एवं अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भी ध्यान रखना पड़ेगा । वास्तव में हमें यह ध्यान रखना होगा कि अमेरिका आतंकवाद पर भारत का समर्थन भले करे लेकिन पाकिस्तान को लेकर न उसने निर्णायक कार्रवाई की है और न इसका कोई संदेश दिया है। अमेरिका को जहां - जहां परेशानी महसूस हुई, इराक, लीबिया , सीरिया आदि उसने कार्रवाई की , अफगानिस्तान में 20 वर्ष रहा लेकिन पाकिस्तान को लेकर पता नहीं क्यों हमेशा आगा-पाछा की नीति रही है। इसलिए वे क्या कहते हैं इस पर हमें नहीं जाना है। 

निस्संदेह, मोदी की अमेरिकी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति से बातचीत सफल रही। इसमें एक शब्द ऐसा नहीं आया जो भारत की सोच, नीति और भविष्य में दोनों की साझेदारी के विरुद्ध संकेत देने वाला हों। भारतीय मत का इसमें व्यापक समर्थन तथा भविष्य में द्विपक्षीय संबंधों  के बहुआयामी चरित्र को और सुदृढ़ करने का ही संदेश आया। लेकिन यह भी साफ है कि भारत को  कई मोर्चों पर स्वयं ही लड़ाई लड़नी होगी। आकुस समझौते में भी भारत जापान को बाहर रखा गया जबकि क्वाड में  चारों देश शामिल हैं। पनडुब्बी भारत में क्यों नहीं निर्मित हो सकती?  फ्रांस अमेरिका का पुराना साझेदार है लेकिन अमेरिका ने समझौता करते हुए उसका भी ध्यान नहीं रखा। फ्रांस ने पांच वर्ष पूर्व ऑस्ट्रेलिया को पनडुब्बी देने  का समझौता किया था। आज फ्रांस ने ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका से राजदूत तक वापस बुला लिए हैं। इस तरह की नीति अकल्पनीय थी। है तो इसको स्वीकार कर ही आगे आना पड़ेगा। बिडेन कई कारणों से इस समय परेशानी का सामना कर रहे हैं। अफगानिस्तान से वापसी को लेकर दुनिया ही नहीं अमेरिका में भी आलोचना और विरोध का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिकी साख और इकबाल कमजोर हुआ है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती फिर से साख और प्रभाव को पुनर्स्थापित करने की है। अभी तक इस दिशा में उन्होंने कोई संकेत दिया नहीं। मोदी के साथ दोनों नेताओं की बातचीत में भी इसके कोई संकेत नहीं मिले। अमेरिका भारी कर्ज में भी है। उससे बाहर निकलना भी उसकी समस्या है। जब जो बिडेन सत्ता में आए थे उस समय कोरना का भयानक प्रकोप तेजी से बढ़ा, बीच में थोड़ी कमी आई और इस समय फिर अमेरिका उससे जूझ रहा है। फ्रांस  की नाराजगी को स्वभाविक मानते हुए नाटो के साझेदार भी शंका की दृष्टि से अमेरिका को देख रहे हैं। अमेरिका से जुड़े तथा जहां उसके सैन्य अड्डे हैं, उन देशों के  अंदर यह भय पैदा हो गया है कि जब तक उसका स्वार्थ होगा तब तक वह ठहरेगा और वापस चला जाएगा। चीन इसका लाभ उठाने के लिए आतुर है।  ये सब ऐसे मामले हैं जिनको लेकर अमेरिकी प्रशासन के साथ लगातार बातचीत, नेताओं के शीर्ष स्तर पर मुलाकात और उसमें आए निष्कर्षों के अनुरूप साझेदारी को नए सिरे से विकसित करने की आवश्यकता दिखाई पड़ रही है।

 अवधेश कुमार, ई- 30, गणेश नगर , पांडव नगर कौम्प्लेक्स,  दिल्ली 110092, मोबाइल- 9811027208 

http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/