शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

सर्वोदय बाल विद्यालय बुलन्द मस्जिद स्कूल ने 10वीं में भी दिए शानदार नतीजे

  • पिछले वर्ष के मुकाबले 7 प्रतिशत अधिक छात्र हुए उत्तीर्ण,
  • स्कूल का रिजल्ट रहा 70.5 प्रतिशत
  • मुजाहिद ने 90.2 प्रतिशत के साथ प्रथम स्थान प्राप्त किया, दीपक कुमार ने 73.4 प्रतिशत के साथ द्वितीय और मौ. जैद 67.4 प्रतिशत के साथ तृतीय स्थान प्राप्त किया।
  • सभी विषयों में बच्चों ने अच्छे अंक प्राप्त कर अध्यापकों का नाम रोशन किया

संवाददाता

नई दिल्ली। राजकीय सर्वोदय बाल विद्यालय बुलन्द मस्जिद शास्त्री पार्क का इस बार सीबीएसई की 10वीं का परीक्षा परिणाम 70.5 प्रतिशत रहा जो पिछले वर्ष से 7 प्रतिशत अधिक है। जहां स्कूल का रिजल्ट पिछले वर्ष 63.5 प्रतिशत था वहीं यह अब 70.5 प्रतिशत हो गया है। जिसका श्रेय यहां के प्रधानाचार्य चांद बाबू व उनके स्टाफ (अध्यापकों) को जाता है जिन्होंने कम सुविधा में भी स्कूल के रिजल्ट में काफी सुधार किया है, जो लगातार जारी है। जहां 2019 में स्कूल का रिजल्ट 63.5 प्रतिशत था वहीं यह इस वर्ष बढ़कर 70.5 प्रतिशत हो गया है। इस परीक्षा में मुजाहिद ने 90.2 प्रतिशत के साथ प्रथम स्थान प्राप्त किया, दीपक कुमार ने 73.4 प्रतिशत के साथ द्वितीय और मौ. जैद 67.4 प्रतिशत के साथ तृतीय स्थान प्राप्त किया।
इस परीक्षा परिणाम पर स्कूल के प्रधानाचार्य चांद बाबू का कहना है कि हमारा स्कूल लगातार अपना शानदार प्रदर्शन कर रहा है जिसमें अध्यापकों की मेहनत रंग ला रही है जिसका परिणाम आपके सामने है। मैं अध्यापकों, छात्रों व उनके अभिभावकों को धन्यवाद देना चाहता हूं जिन्होंने कम सुविधा होने पर मुझ पर विश्वास किया और मेरा साथ नहीं छोड़ा। मैं आशा करता हूं कि आने वाले वर्षों में इससे भी अच्छा रिजल्ट आएगा।



मंगलवार, 14 जुलाई 2020

सर्वोदय बाल विद्यालय बुलन्द मस्जिद स्कूल का रिजल्ट रहा 100 प्रतिशत

  •  दूसरे वर्ष भी स्कूल का रिजल्ट रहा 100 प्रतिशत
  • मो. सादिक (92.8%) ने प्रथम स्थान प्राप्त किया, मो. सितारे (89.4%) ने द्वितीय और मो. सलमान ने (79%) तृतीय स्थान प्राप्त किया।
  • सभी विषयों में बच्चों ने अच्छे अंक प्राप्त कर अध्यापकों का नाम रोशन किया

संवाददाता

नई दिल्ली। राजकीय सर्वोदय बाल विद्यालय बुलन्द मस्जिद शास्त्री पार्क का लगातार दूसरे वर्ष भी सीबीएसई का 12वीं का परीक्षा परिणाम 100 प्रतिशत रहा। जहां स्कूल का रिजल्ट पिछले वर्ष 100 प्रतिशत था वहीं इस बार भी यह 100 प्रतिशत हो गया है। जिसका श्रेय यहां के प्रधानाचार्य चांद बाबू व उनके स्टाफ (अध्यापकों) को जाता है जिन्होंने लगातार दूसरे वर्ष भी 12वीं का परीक्षा परिणाम 100 प्रतिशत रखा। जहां 2017 में स्कूल का रिजल्ट 41 प्रतिशत, 2018 में 93 प्रतिशत, 2019 में यह बढ़ कर 100 प्रतिशत हो गया और इस 
वर्ष भी 100 प्रतिशत है।
इस वर्ष मो. सादिक (92.8%) ने प्रथम स्थान प्राप्त किया, मो. सितारे (89.4%) ने द्वितीय और मो. सलमान ने (79%) तृतीय स्थान प्राप्त किया। वहीं पिछले वर्ष 2019 में रिज़वान ने 87.6 प्रतिशत अंक के साथ प्रथम स्थान, द्वितीय स्थान मोहम्मद ज़ैद 82.8 प्रतिशत तथा तृतीय स्थान मोहम्मद आसिफ 81.4 प्रतिशत नेे प्राप्त किया था।
इस परीक्षा परिणाम पर स्कूल के प्रधानाचार्य चांद बाबू का कहना है कि हमारा स्कूल लगातार अपना शानदार प्रदर्शन कर रहा है जिसमें अध्यापकों की मेहनत रंग ला रही है जिसका परिणाम आपके सामने है। मैं अध्यापकों, छात्रों व उनके अभिभावकों को धन्यवाद देना चाहता हूं जिन्होंने कम सुविधा होने पर मुझ पर विश्वास किया और मेरा साथ नहीं छोड़ा। मैं आशा करता हूं कि आने वाले वर्ष में भी ऐसा रिजल्ट आएगा और हमारा स्कूल भी दिल्ली के टॉप स्कूलों में गिना जाएगा।

रविवार, 28 जून 2020

डेसू मजदूर संघ ने चीनी सामान व चीनी राष्ट्रपति का पोस्टर जला विरोध किया

संवाददाता 

 नई दिल्ली। डेसू मजदूर संघ ने आईटीओ स्थित बीएसईएस के ऑफिस के बाहर डेसू मजदूर संघ के पदाधिकारियों व सदस्यों ने चीन के खिलाफ नारेबाजी करते हुए चीनी सामान व चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के पोस्टर जलाए का पुतला फूंका और चीनी सामान का पूरी तरह से बहिष्कार की मांग की। डेसू मजदूर संघ के अध्यक्ष किशन यादव की अगुवाई में एक रैली निकालकर गलवन घाटी में शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि के बाद चीन के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन किया। 

 डेसू मजदूर संघ के अध्यक्ष किशन यादव ने कहा कि भारत का हर नागरिक चीनी सामान का बहिष्कार कर एक सिपाही की ही भूमिका निभाएं। वहीं गलवान घाटी में शहीद हुए 20 सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के बाद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का फोटो जलाकर विरोध प्रदर्शन किया।

डेसू मजदूर संघ के अध्यक्ष किशन यादव ने मोदी सरकार से मांग किया कि चीनी वस्तुओं के आयात से संबंधित लाइसेंस को तुंरत तत्काल निरस्त किए जाए। उन्होंने कहा कि जिन कंपनियों को चीन से सामान आयात करने के लाइसेंस दिए गए हैं। उसे तुरंत प्रभाव से निरस्त किए जाएं ताकि भारत के नागरिकों द्वारा चलाए जा रहे चीनी वस्तुओं के बहिष्कार का आंदोलन पूर्ण रूप से सफल हो सके। उन्होंने आगे कहा कि हमें अपने देश में बने सामानों का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि चीन ने जो दुस्साहस किया है उसके लिए देश का हर व्यक्ति अब आर्थिक तौर पर उसका जवाब देगा।
इस मौके पर डेसू मजदूर संघ के अध्यक्ष श्री किशन यादव, महामंत्री सुभाष चन्द, ऋषि पाल,  अब्दुल रज्जाक, सभाजीत पाल, दिनेश,  सैन्तुल त्यागी, अशोक आदि मौजूद थे।



शुक्रवार, 26 जून 2020

इस तरह का विरोध और उपहास उचित नहीं

अवधेश कुमार

पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड द्वारा कोरोना संक्रमण को ठीक करने के दावे के साथ कोरेानिल नाम की औषधि सामने लाने के साथ देश में जिस तरह तूफान खड़ा किया गया है वह दुर्भाग्यपूर्ण है। कोई नहीं कहता कि उस दवा के बारे में स्वामी रामदेव या अन्य लोग जो दावा कर रहे हैं उसे आंख मूंदकर स्वीकार कर लीजिए, लेकिन इस तरह का उपहास उड़ाना, उसे एक धोखाधड़ी बताना तथा अभियान चलाकर बदनाम करने की कोशिश किसी दृष्टि से तार्किक, मानवीय और उचित नहीं माना जा सकता। स्वामी रामदेव के पूर्व तीन कंपनियों ने एलोपैथी औषधियां बाजार में उतारी तो कोई हंगामा नहीं हुआ। हालांकि उन औषधियों से कोराना का संक्रमण दूर हो जाएगा इसकी गारंटी न कंपनी दे रही और न उसका उपयोग करने वाले डॉक्टर। प्रश्न है कि अगर पंतजलि आयुर्वेद यह दावा कर रहा है उसने इसका क्लिनिकल ट्रायल किया है, जिसमें उसे सफलता मिली है तो उसका परीक्षण करने में हर्ज क्या है? उनका दावा है कि कोरोना संक्रमित मरीजों पर परीक्षण के दौरान आरंभिक3-4 दिनों में 69 प्रतिशत और सात दिनों में 100 प्रतिशत मरीजों को स्वस्थ करने में सफलता मिली है। बिना इसकी जांच परख किए एगाबरगी झूठ करार दे देने का औचित्य क्या है? उत्तराखंड सरकार ने उस दवा को बेचने की स्वीकृति भी प्रदान की है।  

आयुष मंत्रालय ने तत्काल उस दवा के प्रचार और बिक्री को रोक दिया है। यह उसके अधिकार क्षेत्र में आता है और उसे अपने मानकों पर संतुष्ट होना ही चाहिए। उसने कहा है कि दवा से जुड़े वैज्ञानिक दावे के अध्ययन और विवरण के बारे में मंत्रालय को कुछ जानकारी नहीं है। पतंजलि को अनुसंधान, कोरोनिल में डाले गए जड़ी-बुटियों सहित नमूने के आकार, स्थान आदि सारी जानकारियों के साथ उन अस्पतालों का ब्योरा देने को कहा गया है, जहां अनुसंधान अध्ययन किया गया। संस्थागत नैतिकता समिति की मंजूरी भी दिखाने को कहा गया है। मंत्रालय उत्तराखंड सरकार के सम्बंधित लाइसेंसिंग प्राधिकरण से इस दवा को स्वीकृति देने संबंधी आदेश की कॉपी मांगी गई है। यह बिल्कुल उचित कदम है। मंत्रालय के बयान के एक अंश पर नजर डालिए, ‘संबद्ध आयुर्वेदिक औषधि विनिर्माता कंपनी को सूचित किया गया है कि आयुर्वेदिक औषधि सहित दवाइयों का इस तरह का विज्ञापन औषधि एवं चमत्कारिक उपाय (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954 तथा उसके तहत आने वाले नियमों और कोविड-19 के प्रसार के मद्देनजर केंद्र सरकार की ओर से जारी निर्देशों से विनियमित होता है। ’ पतंजलि की ओर से भी आयुष मंत्रालय को पूरी जानकारी दे दी गई है। इसके अनुसार यह दवा पतंजलि रिसर्च इंस्टीट्यूट और नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस, जयपुर ने मिलकर बनाई है। उनका दावा है कि क्लििनिकल कंट्रोल ट्रायल के लिए उन्होंने सारी स्वीकृतिंया लीं तथा रैंडमाइज्ड प्लेसबो कंट्रोल्ड क्लीनिकल ट्रायल के जितने भी मानक परिमितियां हैं, उन सभी को शत-प्रतिशत पूरा किया गया है। पहले एथिकल स्वीकृति ली गई, फिर भारत की क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री से ट्रायल की अनुमति मिली और इसके बाद दवा का ट्रायल शुरू हुआ। इसके अनुसार इंदौर और जयपुर में 280 मरीजों पर इसका ट्रायल किया गया। 

हम इन सारी बातों को बिना जांच किए झूठ कैसे कह सकते हैं? आयुष मंत्रालय का बयान बिल्कुल स्पष्ट है। उससे साफ होता है कि मंत्रालय नियमों को लेकर कितना सतर्क और सख्त है। इससे कोरोना जैसी नई बीमारी के प्रति उसकी संवेदनशीलता और जिम्मेवारी भी झलकती है। जाहिर है, फैसला आयुष मंत्रालय को करने देना चाहिए। मंत्रालय जब तक सारे मापदंडों पर परख नहीं लेगा कोरोना दवा के रुप में इसकी स्वीकृति नहीं दे सकता। जैसा हम जानते हैं भारत में आयुर्वेदिक दवाओं को मंजूरी देने का जिम्मा आयुष मंत्रालय के पास है। केन्द्रीय आयुर्वेद विज्ञान अनुसंधान परिषद या सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन आयुर्वेदिक साइंसेज पूरी प्रक्रिया पर नजर रखती है।  एलोपैथिक दवाओं को स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशालय डायरेक्टरेट जनरल ऑफ हेल्थ सर्विसिज के तहत आने वाले केन्द्रीय औषधिक मानक नियंत्रण संगठन या सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन स्वीकृति प्रदान करती है। इसी ने तीन कंपनियों की तीन एलापैथी दवाओं की स्वीकृति दी है। किंतु यहां कुछ बातें समझने की आवश्यकता है। आयुर्वेद एवं एलौपैथ प्रणाली में अनुसंधान, दवाओं के निर्माण, रोगों के निर्धारण, उनका उपचार आदि में मौलिक अंतर है। आयुर्वेद हमारे यहां लंबी और गहन साधाना, प्रयोगों, अनुभावों से आगे बढ़ीं और सशक्त हुईं। इसके लिए किसी डिग्री आदि की अवश्यकता नहीं थी। आयुर्वेद के जितने प्राचीन मानक ग्रंथ हैं वे सब ऋषि-मुनियों द्वारा रचित हैं। हमने आधुनिक शिक्षा प्रणाली के अनुरुप आयुर्वेद के शिक्षालय अवश्य स्थापित किए, जो आवश्यक थे। अध्ययन, अनुसंधान और उपचार के लिए कुछ बड़े संस्थान भी खड़े किए गए हैं और किए जा रहे हैं। लेकिन आज भी हजारों ऐसे लोग हैं जो स्वयं जड़ी-बुटियों-वनस्पतियों से लेकर हमारे सामने उपलब्ध खाने-पीने की वस्तुओं से उपचार करते हैं और अनेक बार उसके चमत्कारिक परिणाम सामने आते हैं। काफी संख्या में ऐसे लोग हैं जो बताते हैं कि वे सारा इलाज करके हार गए थे, लेकिन फलां जगह के एक वैद्य ने या किसी गांव के बिना डिग्रीधारी व्यक्ति ने जड़ी-बुटियों, भस्मों से हमें ठीक कर दिया। कहने का तात्पर्य यह कि आयुर्वेद की किसी प्रक्रिया को समझने और जांचने का मानक वह नहीं हो सकता जो एलोपैथ का है। दोनों अलग-अलग स्वरुप की विधाएं हैं। इसका इस विधा के अनुरुप ही परीक्षण और अध्ययन करना होगा। आखिर जब एलोपैथ या दूसरी पैथियों की परख आयुर्वेद की कसौटियों के अनुसार नहीं हो सकती तो आयुर्वेद की दूसरी पैथियों के अनुसार क्यों होना चाहिए?

कोरोनिल कारगर दवा है या नहीं यह प्रश्न तो एक कंपनी से जुड़ा हुआ है और अब आयुष मंत्रालय को फैसला करना है। लेकिन इस पूरे प्रकरण में यह दुखद तथ्य फिर सामने आया है कि हम अपने यहां गहन साधना से विकसित विधाओं को लेकर आत्महीनता के शिकार हैं। उपार की हर पैथी की अपनी विशेषता है और उसे स्वीकार करना चाहिए। किंतु आयुर्वेद एलोपैथ की तरह कोई नया आविष्कार नहीं कर सकता ऐसी सोच हमारी आत्महीनता को दर्शाती है। दूसरे, एलोपैथी दवाओं का ऐसा ताकतवर समूह है जो दूसरी पैथी को आसानी से मैदान में उतरने नहीं देता। वे अपनी दृष्टि से तरह-तरह के प्रश्न उठाते हैं तथा सरकारी तंत्र एवं बुद्धिजीवी उन्हीं मानकों पर आयुर्वेद को खरा उतरते देखना चाहते हैं। हम यह क्यों मान लेते हैं कि आयुर्वेद में ऐसी बीमारी की दवा विकसित नहीं हो सकती जिसमें एलोपैथ विफल हो रहा हो? कोरोना काल में ही हम देख रहे हैं कि करोड़ों लोग आयुर्वेदिक पद्धति के काढ़े का इस्तेमाल करके स्वयं को बचाए हुए हैं। हमने कोराना संक्रमित ऐसे मरीजों के बयान देखे हैं जो बता रहे हैं कि जब उन्हें कोई उपाय नहीं सूझा तो उन्होंने वैद्यों की सलाह के अनुसार फलां-फलां जड़ी-बुटियों-वनस्पतियों का सेवन आरंभ किया और धीरे-धीरे बीमारी से मुक्त होते गए। जब कोई उसका आधुनिक विज्ञान की पद्धति से परीक्षण करेगा तो शायद परिणाम भी उसी तरह आएंगे जैसा ठीक होने वाले संक्रमित लोग बता रहे हैं। किंतु हम यह मानकर कि आयुर्वेद से कोरोना संक्रमण ठीक हो ही नहीं सकता इन सारे लोगों को झूठा करार देें यह तो किसी तरह तार्किक और नैतिक व्यवहार नहीं हुआ। हालांकि सरकार ने भी अब यही नीति बनाई है कि जिस भाषा में दुनिया समझती है उसी भाषा में उसे आयुर्वेद को समझाया जाए। पिछले दिनों केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि हम अपनी प्राचीन विद्या को बिल्कुल वैज्ञानिक तरीके से साबित करके दुनिया के सामने रखेंगे। दुनिया को जवाब देने के लिए यह नीति सही है और पतंजलि भी दावा कर रही है कि उसने इसीलिए उसका उसी तरीके से क्लिनिकल ट्रायल किया है। तो देखते हैं। किंतु ध्यान रखिए, आयुर्वेद में इस तरह के क्लििनिकल ट्रायल की न परंपरा रही है और न इसका ऐसा ढांचा विकसित हुआ। अब ऐसा करने की कोशिश हो रही है और यह सही है लेकिन आयुर्वेदिक या जड़ी-बुटियों से बने मिश्रणों के प्रभावों को परखने का एकमात्र तरीका यह नहीं हो सकता। वैसे भी कोरोनिल में जिन जड़ी-बुटियों मसलन, गिलोय, अश्वगंधा, तुलसी आदि के मिश्रण हैं उनसे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने की बात आयुष मंत्रालय भी मानता है। इनका काढ़ा तो लोग पी ही रहे हैं।  आयुष मंत्रालय ने इसके प्रचार और बिक्री पर रोक लगाई है तो उसे तीव्र गति से स्थापित मानकों पर इसकी पूरी जांच और परीक्षण करना चाहिए। 

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्पलेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208


शुक्रवार, 19 जून 2020

चीन से निपटने में हिचक का कोई कारण नहीं

 अवधेश कुमार

यह भारत और चीन के बीच कूटनीतिक संबंध स्थापित होने का 70 वां वर्ष है। इसे मनाने के लिए दोनों देशों के बीच 70 कार्यक्रम तय हुए थे। ऐसा नहीं है कि भारत चीन की दुर्नीतियों को नहीं समझता है, लेकिन पूरी तरह सतर्क एवं अपनी भूमि की सुरक्षा के प्रति गंभीर रहते हुए अपनी ओर से संबंधों में शांति और विश्वास कायम करना भारत का चरित्र है और यही हम हमेशा प्रदर्शित करते हैं। चीन ने गलवान में जिस तरह से असभ्य व गुण्डागर्दी सदृश खूनी जंग को अंजाम दिया उसका तात्कालिक निष्कर्ष तो यही है कि उसके साथ संबंधों में स्थायी शांति एवं स्थिरता की कल्पना व्यर्थ है। वास्तव में गलवान घाटी में जो कुछ चीन ने किया दो सभ्य देशों की सेनाओं के बीच उस तरह के झड़प की कल्पना तक नहीं की जा सकती। चीन से वास्तविक नियंत्रण रेखा और सीमा पर निपटते हुए भी भारतीय राजनीतिक नेतृत्व बयानों मे ंहमेशा संयत रुख अपनाता रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चीन के खिलाफ पहली बार इस तरह का सार्वजनिक वक्तव्य दिया है जिसका संदेश बिल्कुल साफ है। उन्होंने कहा कि जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। उन्होने भारत की नीति स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत शांति चाहता है, लेकिन भारत उकसाने पर हर हाल में यथोचित जवाब देने में सक्षम है। इस तरह प्रधानमंत्री ने चीन के सामने अपना विकल्प स्पष्ट कर दिया है कि शांति के प्रयास को हमारी कमजोरी न समझें, हम आपसे हर स्तर पर निपटने में सक्षम हैं और आप नहीं माने तो निपटेंगे। साथ ही इससे सेना को भी स्पष्ट संकेत मिल गया है कि नियंत्रण रेखा एवं सीमा पर परिस्थितियों के अनुरुप व्यवहार के लिए जो आप करेंगे सरकार को उसका पूरा समर्थन होगा। 

प्रधानमंत्री के इस स्पष्ट बयान के बाद अन्य किसी के बोलने की आवश्यकता नहीं रह जाती। चीन को भी समझ आ गया है कि उसने जो कुछ किया वह उसके लिए आगे ज्यादा महंगा पड़ सकता है। चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ फोन पर बातचीत के दौरान भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बिना किसी लाग-लपेट के कहा कि जो कुछ हुआ उसके लिए दोषी आप हैं। इसके बाद यह बताने की आवश्यकता नहीं कि भारत किस स्तर पर जाने को मानसिक रुप से तैयार हो चुका है। देश में संदेह प्रकट करने वाले महान विभुतियों को भी समझ लेना चाहिए कि यह बदला हुआ भारत है। वैसे भी मई से जारी विवाद के बीच चीन द्वारा सैन्य लामबंदी को देखते हुए भारत ने अरुणाचल से लेकर लद्दाख तक पूरे क्षेत्र में सैनिकों की संख्या बढ़ा दी  थी। वास्तव में अब तक जितनी जानकारी सामने आ चुकी है उसके अनुसार गलवान घाटी में चीनी सैनिकों ने कब्जे का षडयंत्र रचकर अंजाम देने की कोशिश की तथा धोखा से भारतीय सैनिकों पर हमला किया। हालांकि हमारे जवानों ने चीनी सैनिकों के साथ बिना किसी हथियार के  संघर्ष किया और वीरतापूर्वक लड़ते हुए उनको भी मारा तथा वीरगति को प्राप्त हुए। निस्संदेह, 20 जवानों का बलिदान सामान्य घटना  नहीं है। यह साफ है कि वार्ता मंे चीनी फौज पीछे हटने पर सहमत दिख रही थी लेकिन अंदर ही अंदर उन्होंने गलवन और श्योक नदी के संगम के पास प्वाइंट-14 चोटी पर कब्जे की साजिश रच रखी थी। चीनी सैनिक पहले से पत्थरों, हथौड़ियों , लोहे के रड, कंटीले तारों आदि के साथ तैयार थे। सोमवार यानी 15 जून को दोपहर से भारतीय सेना के कमांडिंग ऑफिसर के साथ 10 सैनिक पैट्रोल पॉइंट-14 के पास चीनी सैनिकों के लौटने की निगरानी कर रहे थे। चीनी सैनिकों को यहां से हटना था, लेकिन जब वे अपनी जगह से नहीं हटे तो झड़प शुरू हो गई। यह भी देखा गया कि चीनी सैनिक कब्जे के लिए तारबंदी कर रहे है। इसे रोकने की कोशिश स्वाभाविक थी। चीनी सैनिकों ने अचानक भारतीय कमांडिंग ऑफिसर कर्नल संतोष बाबू पर लोहे की रॉड से हमला बोल दिया। अगर आठ घंटे तक खूनी भीड़ंत चलती रही तो इसका मतलब साफ है कि चीनी सेना ने हर हाल में कब्जा करने की योजना बना रखी थी जिसे वे किसी कीमत पर साकार करना चाहते थे। यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि 14 हजार से ज्यादा फीट की उंचाई पर और शून्य से भी कम तापमान के बीच जहां ठीक से खड़ा होने की भी जगह नहीं, वहां पहले से योजना बनाकर तैयार चीनी सैनिकों ने बिना पूर्व तैयारी के किस तरह सामना किया होगा कि अपनी से दोगुनी संख्या में उनको मारा तथा घायल भी किया। विदेशी एजेंसियों की खबरे बता रहीं हैं कि 20 भारतीय जवानों के मुकाबले उनके चीन 43 सैनिकों को जान गंवानी पड़ी और कुछ घायल भी हुए। अब तो अमेरिका ने भी पुष्टि कर दी है कि चीन के कम से कम 35 सैनिक अवश्य मारे गए हैैं। अगर हताहतों की संख्या ज्यादा नहीं होती तो चीनी सैन्य हेलिकॉप्टरों को मृत जवानों के शवों व घायल जवानों को एअरलिफ्ट करने की नौबत नहीं आती। जो लोग बिना सोचे-समझे अपनी सरकार और देश को कोस रहे हैं उन्हें यह समझना चाहिए कि चीन ने हमारी करीब 45 किलोमीटर क्षेत्र को कब्जा करने की कोशिश की थी जिसे हमने नाकाम किया है। 1962 में हमने 38 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन गंवाई थीं। 

अपने जवानों के खोने का गम हमारे अंदर अवश्य है, पर सच कहा जाए तो 2017 में डोकलाम के बाद चीन को भारत की ओर से यह दूसरा करारा जवाब दिया गया है। जून, 2017 में जब चीन ने जबरन यहां सड़क निर्माण का काम शुरू किया तो भारतीय सैनिकों ने उसे रोक दिया था। चीन को कल्पना भी नहीं थी कि भारत इस सीमा तक अपने जवानों के साथ डट जाएगा। भारत ने उनकी एक न चलने दी। दोनों की सेनाएं 75 दिन से ज्यादा वक्त तक आमने-सामने डटी रहीं और चीन को पीछे हटना पड़ा। चीन को उसी समय समझ जाना चाहिए था कि यह बदला हुआ भारत है जो उसकी धौंस-पट्टी मे ंतो नहीं ही आएगा, आवश्यकता पड़ने पर सीध सैन्य मुकाबला भी कर सकता है। इसके बावजूद उसने गलवान में गलती कर दी। ऐसा करने चीन ने अपने ही समझौतों को तोड़ा है। जिस तरह की लिखित व्यवस्थाएं दोनों देशों की सहमति से बनी थी उनमें बार-बार घुसैपठ, कब्जा, झड़प आदि की कोई गुंजाइश ही नहीं है। किंतु जो देश वचन में कुछ और अंतर्मन में कुछ का चरित्र रखता हो वह कभी भी पलट सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता में आने के बाद से चीन के साथ संबंधों को बेहतर करने की जितनी कोशिश हो सकती थी की है। वे पांच बार चीन की यात्रा कर चुके हैं। अलग-अलग मौकों पर चीनी राष्ट्रपति शि जिनपिंग से उनकी 18 बार मुलाकात हो चुकी है। अपनी ओर से मोदी ने पूरी कोशिश की कि एशिया के दो सबसे बड़े देशों के बीच विश्वास कायम रहे ताकि हम शांति से विकास के रास्ते अग्रसर हों। मोदी के सार्वजनिक संबोधन में दिखी आक्रामकता इसी कारण है कि शि जिनपिंग अपने वायदे के अनुरुप व्यवहार नहीं कर रहे हैं। हालांकि ऐसा नहीं था कि मोदी उनके भुलावे में आ गए। मोदी को मालूम है कि चीन से एक-एक इंच जमीन लेने का संसद का संकल्प है और स्वयं भाजपा के घोषित सिद्धांतों में यह शामिल है। किंतु तत्काल विवादों पर बातचीत का एक मैकेनिज्म चलाते हुए अन्य अंतःक्रियाएं चलती रहें यह भारत की नीति थी जिसे थोड़े परिवर्तन के साथ मोदी ने आगे बढ़ाने की पहल की। इसका एक परिणाम यह तो है ही कि दुनिया के प्रमुख देश मान रहे हैं कि भारत ने चीन के साथ शांति, विश्वास एवं सहयोग की हरसंभव कोशिश की है लेकिन चीनी नेतृत्व हर हाल मंें भारत के उत्थान को बाधित करने तथा सीमा क्षेत्रों के सामरिक रुप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर धोखे से कब्जा कर अपनी स्थिति ज्यादा मजबूत करने की गंदी नीति पर चल रहा है। 

भारत का पक्ष अब साफ है- आप अगर शांति नहीं चाहते हैं तो आपकी भाषा में जवाब दिया जाएगा। चीन की सेना और हथियारों की संख्या पर मत जाइए। जब भारतीय जवानों ने बिना हथियार के उनकी साजिश को विफल कर दिया तो आगे उनको सफल होने दिया जाएगा ऐसी कल्पना मूर्ख ही कर सकते हैं। यह मत सोचिए कि चीन के साथ यदि संघर्ष हुआ तो भारत कमजोर पड़ जाएगा। 1962 की जंग हम अपनी गलतियों से हारे थे। अगर वायुसेना का उपयोग किया जाता तो संभव था युद्ध का परिणाम दूसरा होगा। किंतु उसके पांच वर्ष बाद 1967 में ही भारतीय जवानों ने चीन को बुरी तरह पराजित किया। सच कहा जाए तो चीन ने गलवान से अपने महिमा कमजोर होने तथा पतन की शुरुआत स्वयं कर दी है। 1962 के बाद हमने जितने युद्ध लड़े सबमें विजय पाई है जबकि चीन ने एक भी सीधा युद्ध लड़ा नहीं है। वास्तव में हमारे 20 सैनिकों ने जान देकर इतिहास का ऐसा अध्याय लिख दिया है जहां से चीन की विश्व शक्ति के उदय के दौर पर विराम लग सकता है। भारत आर्थिक, कूटनीतिक एवं सैन्य तीनों स्तरों पर चीन का सामना करने के लिए कमर कस चुका है। चीन को सबक सिखाने में हमारे सामने जितनी भी परेशानियां और चुनौतियां आएं उनको सहने तथा झेलने की तैयारी हर भारतीय की होनी चाहिए। चीन से सीमा विवाद वैसे भी बातचीत से सुलझने वाली नहीं यह साफ हो चुका है। तो भारत को भविष्य का ध्यान रखते हुए आक्रामकता के साथ तीनों मोर्चा पर आगे बढ़ना चाहिए। 

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208

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