शनिवार, 4 मई 2019

संकट में शीर्ष न्यायपालिका

 

अवधेश कुमार

आम चुनाव के शोर के बीच हमारी शीर्ष न्यायपालिका उच्चतम न्यायालय के समक्ष आए गंभीर संकट पर देश का ध्यान उतना नहीं है जितना होना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर जबसे उच्चतम न्यायालय की एक पूर्व महिला कर्मचारी ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए सभी न्यायाधीशों को पत्र लिखा तभी से हलचल मचा हुआ है। यह आरोप चल ही रहा था कि एक वकील उत्सव बैंस ने न्यायालय में एक याचिका दायर कर आरोप पर विचार कर रही पीठ के सामने अपनी राय रखने की मांग की। बैंस ने कहा है कि न्यायालय में पीठ फिक्सिंग का खेल चल रहा है तथा इसके पीछे बड़ी कॉरपोरेट शक्तियां हैं। अगर बैंस की बात मानी जाए तो महिला के माध्यम से इन शक्तियों ने मुख्य न्यायाधीश को फंसाने की साजिश रची है। आरोप लगने के बाद ही मुख्य न्यायाधीश गोगोई ने कहा था कि न्यायपालिका गंभीर खतरे में है। गोगोई ने कहा कि कुछ महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई से पहले यह उन्हें निशाना बनाने का एक बड़ा षडयंत्र है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि वह कार्यकाल के बाकी बचे सात महीनों में अपने पद पर बैठेंगे और सुनवाई के लिए आने वाले प्रत्येक मामले का बिना किसी डर या पक्षपात के फैसला करेंगे। किंतु आरोप लगने के बाद स्थितियां काफी बदल जातीं हैं। तो फिर?

वास्तव में प्रश्न केवल किसी मुख्य न्यायाधीश पर आरोप तक सीमित नहीं है। ये शीर्ष न्यायालय के सम्पूर्ण चरित्र , उसकी साख और विश्वसनीयता पर उठे प्रश्न हैं, जो उपयुक्त उत्तर के साथ ऐसी स्थितियां निर्मित करने की मांग करते हैं ताकि इसकी कार्यप्रणाली ज्यादा पारदर्शी हों तथा इसकी विश्वसनीयता और साख पर कोई संदेह न रहे। अगर मुख्य न्यायाधीश न्यायपालिका को गंभीर खतरे में मान रहे हैंं तथा महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई के पूर्व उनके सहित अन्य न्यायाधीशों को दबाव में लाने की साजिश की ओर संकेत कर रहे हैं तो इससे गंभीर स्थिति शीर्ष न्यायपालिका के लिए कुछ हो ही नहीं सकती। बैंस के आरोप से इसकी एक हद तक पुष्टि भी होती है। अगर निहित स्वार्थी तत्व न्यायालय में अपने मामले की सुनवाई के लिए अनुकूल पीठ तक गठित करवाने का खेल रच रहे हैं तो साफ है कि हमारी न्यायपालिका गंभीर बीमारी से ग्रस्त है। महिला के आरोपों के बाद न्यायमूर्ति गोगोई ने स्वयं को भी उसकी विशेष सुनवाई में शामिल किया। इस पर वकीलों के संगठनों सहित अन्य अनेक संस्थाओं ने प्रश्न भी उठाए लेकिन गोगोई का कहना था कि उन्होंने न्यायालय में बैठने का असामान्य और असाधारण कदम उठाया है क्योंकि चीजें बहुत आगे बढ़ चुकी हैं।...न्यायपालिका को बलि का बकरा नहीं बनाया जा सकता। वैसे पीठ ने जो फैसला किया उसमें मुख्य न्यायाधीश का नाम शामिल नहीं था। इस मामले की सुनवाई के लिए एक विशेष पीठ गठित करने का फैसला हुआ। तत्काल महिला के आरोपों की आंतरिक जांच के लिए न्यायमूर्ति गोगोई के बाद दूसरे वरिष्ठ न्यायाधीश एस. ए. बोबडे की अध्यक्षता में एक समिति गठित किया गया है। न्यायमूर्ति बोबडे ने समिति में वरिष्ठता क्रम में उनके बाद आने वाले न्यायमूर्ति एन. वी. रमन तथा महिला होने के कारण न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी को शामिल किया। आरोप लगाने वाली महिला ने बयान दे दिया कि न्यायमूर्ति रमन्ना  न्यायमूर्ति गोगोई के नजदीकी मित्र हैं। इसके बाद न्यायमूर्ति रमन ने स्वयं ही इस समिति से अपने को अलग कर लिया। इसकी आवश्यकता नहीं थी लेकिन जांच की विश्वसनीयता के लिए उन्होंने ऐसा कदम उठाया। इसी तरह पीठ फिक्सिंग मामले की जांच के लिए सेवानिवृत न्यायमूर्ति ए. के. पटनायक समिति का गठन किया गया है। तो हमें इन दोनों समितियों की जांच की अंतिम रिपोर्ट की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

उच्चतम न्यायालय द्वारा पुलिस से लेकर जांच एजेंसियों के प्रमुखों को बुलाकर समितियों को पूरा सहयोग का निर्देश देने के बाद यह समझना मुश्किल नहीं है कि इसका दायरा कितना विस्तृत हो गया है। बिना पुलिस एवं जांच एजेंसियों के ऐसे मामलों की तह तक पहुंचा भी नहीं जा सकता। संभव है आने वाले समय में अनेक लोग इसकी चपेट में आएं। इन दोनों मामलों को साथ मिलाकर देखने से तस्वीर यही बनती है कि उच्चतम न्यायालय को भी भ्रष्ट और बेईमान तत्व परोक्ष रुप से अपनी गिरफ्त में लेने में सफल हो रहे हैं और ज्यादातर न्यायाधीशों तक को इसका पता भी नहीं है। आप हालात का अंदाजा इसी से लगाइए कि न्यायाधीशों की बैठक में तय हुआ कि संवेदनशील मामलों के फैसले आदि की टाइपिंग भी स्वयं की जाए क्योंकि पता नहीं कौन सहयोगी उसे बाहर लीक कर दे या उसे गलत तरीके से मीडिया को दे दे। पिछले दिनों एक बड़े उद्योगपति के मामले में फैसले को गलत टाइप करके मीडिया को दे दिया गया था। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार कोई छिपा तथ्य नहीं है किंतु उच्चतम न्यायालय को इससे मुक्त माना जाता था। यह मिथक भी टूटा है। बेईमान पूंजीशाहों से लेकर अनेक प्रकार के लौबिस्ट, बिचौलिए, निहित स्वार्थी तत्वों का जाल इसके ईर्द-गिर्द भी फैल चुका है। जाहिर है, इसकी सम्पूर्ण सफाई अनिवार्य है।  यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर मुख्य न्यायाधीश किन महत्वपूर्ण मुकदमों की बात कर रहे थे? राहुल गांधी द्वारा राफेल फैसले की पुनर्विचार याचिका स्वीकार करने के बाद दिए गए बयान पर आधारित मानहानि, नरेन्द्र मोदी की बायोपिक को जारी करने या न करने, जमीन अधिग्रहण और सूचना का अधिकार उनके ऑफिस पर लागू होने या नहीं जैसे मामलों पर मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ को सुनवाई करनी थी। तो इनमें किनका स्वार्थ हो सकता है?  

यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला का चरित्र भी संदिग्ध है। उस पर आरोप है कि उसने मुख्य न्यायाधीश से निकटता की बात करते हुए उच्चतम न्यायालय के समूह-डी में भर्ती कराने के नाम पर घूस लिए। जब नौकरी नहीं मिली तो उसने पैसे मांगे। पैसे वापस करने की जगह उसे धमकाया गया। इसकी प्राथमिकी दर्ज हो चुकी है। पता नहीं जांच के साथ और क्या-क्या आरोप सामने आ जाएं। हो सकता है कई मामलों के फैसले के लिए धन का लेन-देन किया गया हो। हालांकि यह मांग सही नहीं है कि विशाखा गाइडलाइन के अनुसार कार्यक्षेत्र में महिलाओं के उत्पीड़न की जांच के लिए उच्चतम न्यायालय की जो 11 सदस्यीय आंतरिक जांच समिति है उसे जांच सौंपा जाए। वस्तुतः मुख्य न्यायाधीश उच्चतम न्यायालय के प्रशासनिक प्रमुख भी हैं इसलिए यह समिति उनकी जांच नहीं कर सकती। उच्चतम न्यायालय के वकीलों की असोसिएशन ने आरोप से निपटने के लिए मुख्य न्यायाधीश की ओर से अपनाई गई प्रक्रिया पर आपत्ति जताई है। असोसिएशन ने कहा है कि इस आरोप से कानून के तहत दी गई प्रक्रिया के अनुसार निपटना चाहिए। विमीन इन क्रिमिनल लॉ नाम की एक अन्य असोसिएशन ने तो जांच पूरी होने तक मुख्य न्यायाधीश के कार्य न करने की मांग की है। पता नहीं इन मांगों और सवालों के पीछे क्या सोच काम कर रहीं हैं। न्यायमूर्ति गोगोई उन चार न्यायाधीशों में शामिल थे जिन्होंने पिछले साल यह आरोप लगाया था कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा स्थापित न्याय प्रक्रिया का पालन नहीं कर रहे हैं। अगर यही सवाल उनके बारे में भी उठाया जा रहा है तो इसे एकबारगी गलत कहना कठिन है।

किंतु जैसा हमने पहले कहा पूरा मामला बहुत बड़ा है। अगर न्यायपालिका का शीर्ष स्तंभ ही भ्रष्टाचारियों, अपराधियों के विषैले सांपों के फनों से घिर रहा है तो देश का क्या होगा? हम उच्चतम न्यायालय की कार्यप्रणाली को लेकर अनेक प्रश्न उठा सकते हैं। आरोप के बाद मुख्य न्यायाधीश के रवैये या कई मामलों में उनकी टिप्पणियों की आलोचना कर सकते हैं, पर यह समय उसका नहीं है। यह संविधान का अभिभावक माने गए शीर्ष संस्था को संकटमुक्त करने तथा उसकी साख एवं विश्वसनीयता को संदेहों से बाहर निकालने का वृहत्तर मामला है। जिस तरह से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की बैठक में भय का माहौल व्याप्त था उससे स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। अगर स्वतंत्र न्यायपालिका को अस्थिर करने के लिए साजिश रची गई है तो इसका अंत ही होना चाहिए। इसलिए पूरे देश को संयम बरतने की आवश्यकता है। विशेष सुनवाई में न्यायपीठ ने मीडिया से अनुरोध किया था कि वह जिम्मेदारी और सूझबूझ के साथ काम करे,  सत्यता की पुष्टि किए बिना महिला की शिकायत को प्रकाशित न करे। उन्होंने कहा कि हम कोई न्यायिक आदेश पारित नहीं कर रहे हैं लेकिन यह मीडिया पर छोड़ रहे हैं कि वह न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदारी से काम करे। बावजूद मीडिया के उसी धरे ने इस पर आ रही खबरों को प्रमुखता से प्रकाशित किया जो पहले चार न्यायाधीशों की पत्रकार वार्ता के बाद न्यायपालिका में सुधार का झंडा उठाए हुए था या जो राफेल मामले पर उच्चतम न्यायालय के फैसले पर प्रश्न उठा रहा था। यह दुर्भाग्यपूर्ण और आपत्तिजनक रवैया है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मो.ः9811027208

शुक्रवार, 3 मई 2019

सर्वोदय बाल विद्यालय बुलन्द मस्जिद स्कूल ने भी दिए शानदार नतीजे

-पिछले वर्ष के मुकाबले 7 प्रतिशत अधिक छात्र हुए उत्तीर्ण, स्कूल का रिजल्ट रहा 100 प्रतिशत
-रिज़वान ने 500 में से 438 अंक के साथ प्रथम स्थान प्राप्त किया, मोहम्मद ज़ैद ने 500 में से 414 अंक के साथ द्वितीय और मोहम्मद आसिफ ने 500 में से 407 अंक के साथ तृतीय स्थान प्राप्त किया।
-सभी विषयों में बच्चों ने अच्छे अंक प्राप्त कर अध्यापकों का नाम रोशन किया

संवाददाता

नई दिल्ली। राजकीय सर्वोदय बाल विद्यालय बुलन्द मस्जिद शास्त्री पार्क का इस बार सीबीएसई की 12वीं का परीक्षा परिणाम 100 प्रतिशत रहा जो पिछले वर्ष से 7 प्रतिशत अधिक है। जहां स्कूल का रिजल्ट पिछले वर्ष 93 प्रतिशत था वहीं यह अब 100 प्रतिशत हो गया है। जिसका श्रेय यहां के प्रधानाचार्य चांद बाबू व उनके स्टाफ (अध्यापकों) को जाता है जिन्होंने कम सुविधा में भी स्कूल के रिजल्ट में काफी सुधार किया है, जो दूसरे वर्ष भी जारी है। 
जहां 2017 में स्कूल का रिजल्ट 41 प्रतिशत, 2018 में 93 प्रतिशत और 2019 में यह बढ़ कर 100 प्रतिशत हो गया है। 
इस परीक्षा में रिज़वान ने 500 में से 438 अंक के साथ प्रथम स्थान प्राप्त किया, मोहम्मद ज़ैद ने 500 में से 414 अंक के साथ द्वितीय और मोहम्मद आसिफ ने 500 में से 407 अंक के साथ तृतीय स्थान प्राप्त किया।
रिज़वान ने इस परीक्षा में 87.6 प्रतिशत अंक के साथ प्रथम स्थान प्राप्त किया, द्वितीय स्थान मोहम्मद ज़ैद 82.8 प्रतिशत तथा तृतीय स्थान मोहम्मद आसिफ 81.4 प्रतिशत प्राप्त किया।
इस परीक्षा परिणाम पर स्कूल के प्रधानाचार्य चांद बाबू का कहना है कि हमारा स्कूल लगातार अपना शानदार प्रदर्शन कर रहा है जिसमें अध्यापकों की मेहनत रंग ला रही है जिसका परिणाम आपके सामने है। मैं अध्यापकों, छात्रों व उनके अभिभावकों को धन्यवाद देना चाहता हूं जिन्होंने कम सुविधा होने पर मुझ पर विश्वास किया और मेरा साथ नहीं छोड़ा। मैं आशा करता हूं कि आने वाले वर्ष में भी ऐसा रिजल्ट आएगा।


मंगलवार, 30 अप्रैल 2019

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2019

हेमंत करकरे का सच वही नहीं जो हमें बताया गया

 अवधेश कुमार

हेमंत करकरे का नाम अचानक सुर्खियों में आ गया है। भोपाल से भाजपा उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा ठाकुर अपनी उत्पीड़न की व्यथा बताते हुए कह गईं कि हेमंत करकरे को मैने शाप दिया था। साध्वी की उम्मीदवारी के बाद से ही मौन धारण कर चुकी कांग्रेस बाहर आई और इसे शहीदों का अपमान बताया एवं भाजपा ने त्वरित प्रतिक्रिया दे दी कि हेमंत करकरे हमारे लिए शहीद हैं। साध्वी ने भी कह दिया कि इससे राष्ट्र विरोधियों को लाभ होगा मैं अपना बयान वापस लेती हूँ। किंतु, इससे अध्याय खत्म नहीं, बल्कि दोबारा आरंभ हुआ है। सोशल मीडिया पर सघन बहस चल रही है। अंतर्धारा में यह इस चुनाव का एक प्रमुख मुद्दा बन गया है। हेमंत करकरे की जान 26 नवंबर 2008 को मुंबई आतंकवादी हमले में गई और साध्वी को मालेगांव द्वितीय धमाकों में हिन्दू आतंकवाद का खतरनाक चेहरा साबित करने का आधार उन्हीं के नेतृत्व में बना। इस तरह पूरे विवाद के दो पहलू हमारे सामने विचार के लिए हैं। क्या मुंबई आतंकवादी हमले में आतंकवाद निरोधक दस्ता या एटीएस प्रमुख के रूप में उनकी भूमिका वाकई गौरवशाली थी? दो, क्या मालेगांव विस्फोट के मामले में साध्वी प्रज्ञा सहित अन्य हिन्दुओं को संलिप्त साबित करने में उन्होंने निष्पक्ष पुलिस अधिकारी की भूमिका निभाई?

इतिहास भावनाओं के आधार पर नहीं, उपलब्ध तथ्यों के आधार पर किसी की भूमिका का मूल्यांकन करता है। छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर आतंकवादी हमले के समय वो वहां दिख रहे थे। इसका मतलब वे साहस के साथ मोर्चा पर आए। किन्तु जितने इत्मीनान से वे बुलेट प्रूफ जैकेट पहन रहे थे उससे लग नहीं रहा था कि वे आतंकवादी हमले के विरूद्ध युद्ध के मोर्चे पर हैं। एटीएस सहित मुंबई पुलिस की आतंकवादी हमले के संदर्भ में आत्मघाती दयनीय समझ, संघर्ष के लिए सामान्य व्यूह रचना का अभाव तथा आतंकवादियों के समक्ष बिल्कुल विफल हो जाने का आकलन उस जांच समिति ने किया जिसे तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार ने अत्यंत सीमित दायरे में जांच का जिम्मा दिया था। सरकार ने मांग के बावजूद अधिकार प्राप्त आयोग गठित नहीं किया। हालांकि अपनी सीमाओं में रहते हुए और भाषा मृदु रखते हुए भी आर डी प्रधान और वी बालाचन्द्रण समिति ने इनकी विफलताओं को उजागर किया। इसमें अनेक पुलिस अधिकारियों, सिपाहियों का नाम लेकर उनकी बहादूरी की प्रशंसा की गई है। किंतु मुंबई पुलिस आयुक्त तथा एटीएस प्रमुख करकरे की बिल्कुल प्रशंसा नहीं। क्विक रिस्पौंस टीम या क्यूआरटी तथा अस्सॉल्ट टीमें एटीएस की मुंबई शाखा के अंदर आती है। क्यूआरटी को जगह-जगह भेजा गया लेकिन समिति को उन्होंने कहा कि कोई अधिकारी नहीं था जो बताए कि करना क्या है। समिति ने लिखा है कि पूरा एटीएस अस्त-व्यस्त था। हेमंत करकरे प्रदेश एटीएस के प्रमुख थे। उनको योग्य एवं सक्षम तब माना जाता जब वे हमले के बाद क्विक रिस्पॉंस टीम को कमान के साथ दायित्वों का बंटवारा करते तथा स्वयं उनका मौनिटर करते। रिपोर्ट में अन्य पुलिस अधिकारियों के बारे में तो लिखा है लेकिन करकरे के पास हमले का सामना करने की योजना भी थी इसका जिक्र नहीं है।

इसमें 7 अगस्त 2006 से 11 अगस्त 2008 तक के आठ खुफिया सुचनाओं की चर्चा है। ये सारे एकदम सुस्पष्ट और सटीक नहीं है़ किंतु इसमें लश्कर-ए-तैयबा द्वारा समुद्र मार्ग से आकर हमला करने की साजिशों की बात है। उदाहरण के लिए 9 अगस्त 2008 के खुफिया रिपोर्ट में दक्षिण मुंबई के ताज होटल, ओबेराय होटल, वर्ल्ड ट्रेड सेंटर आदि पर हमले का अलर्ट है। सूचनाओं के आधार पर कई पुलिस अधिकारियों ने उन जगहो का दौरा किया, होटल के प्रबंधन से बात की, कुछ व्यवस्थायें भी कीं किंतु एटीएस की इसमें कोई भूमिका नहीं थी। जो खुफिया सूचना मिलती वो गृहमंत्रालय से होकर पुलिस महानिदेशक, पुलिस आयुक्त कार्यालय के साथ एटीएस के डीआईजी के पास भी आती थी। करकरे की जिम्मेवारी थी कि वे इसके आधार पर पहल कर एक समन्वय बनाते। किसी भी इंसान के मरने का तो दुख होता ही है। किंतु करकरे आतंकवादी हमले की शक्ति क्या है इसका मोटा-मोटी आकलन किए बगैर व बिना किसी योजना के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस से कामा अस्पताल की ओर चल पड़े। उस हमले में बच गए जवान का बयान है कि पांच मिनट चले होंगे कि अचानक एक पेड़ के पीछे से एके 47 राइफल लिए दो आतंकवादी निकले और अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दी। उसमें करकरे, के साथ अतिरिक्त आयुक्त अशोक काम्टे, मुठभेड़ विशेषज्ञ विजय सालस्कर और तीन पुलिसकर्मी जान गंवा बैठे। यह अत्यंत दुखद था। इन सबके पास हथियार थे, लेकिन ये यह नहीं सोच सके कि जो आतंकवादी आत्मघाती बनकर आया है वह कहीं भी हमला कर सकता था। इसलिए हाथों में हथियार लिए युद्ध की अवस्था में इन सबको होना चाहिए था। इन्होंने हाथों में हथियार तक नहीं लिया था। यह अगर करकरे की योग्यता और शूरवीरता थी तो फिर कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। ऐसी घटनाओं में पुलिस नियंत्रण कक्ष की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। नियंत्रण कक्ष में कॉल की भरमार थी। इसमें नियंत्रण कक्ष की आलोचना नहीं है लेकिन लिखा है कि मुंबई का पुलिस नियंत्रण कक्ष न तो आतंकवादियों की गतिविधियों को ट्रैक कर सका न ही उनका पीछा करन वाले पुलिस टीम को। घटनाएं क्षेत्र में घट रहीं थीं एवं वहा ंउपस्थित वरिष्ठ अधिकारी नियंत्रण कक्ष को अपनी रणनीतिक योजना की जानकारी नहीं दे रहे थे। हेमंत करकरे ने नियंत्रण कक्ष को कामा अस्पताल की ओर जाने की सूचना दी इसका कोई रिकॉर्ड वहां नहीं है।

ध्यान रखिए, हेमंत करकरे की जांच समिति ने चर्चा करने लायक तक नहीं समझा। रिपोर्ट से सरकार की कलई खुल रही थी। पुलिस महानिदेशक ने साफ कहा कि खतरे की सारी सूचनाएं सरकार के पास थी लेकिन उसने पुलिस को उसके अनुरुप आधुनिक शस्त्रास्त्रों तथा उपकरणों से लैश करने, उनका विशेष प्रशिक्षण कराकर लगतार अभ्यास कराते रहने तथा समुद्र किनारे उपयुक्त सुरक्षा व्यवस्था के लिए कदम उठाया ही नहीं। सरकार के सामने अपने को बचाने की समस्या थी। इसलिए केन्द्र एवं प्रदेश दोनों सरकारों ने दूसरा मोड़ देने की रणनीति अपनाई। पाकिस्तान की इसमें भूमिका थी और कसाब पकड़ा गया था। इसलिए पूरा फोकस वहां हो गया। पुलिस की विफलता के लिए आयुक्त हसन गफूर को हटा दिया गया। साफ है करकरे जिंदा होते तो रिपोर्ट में उनकी भूमिका की भी नाम लेकर चर्चा होती और उनको जाना ही पड़ता। सरकार किसी तरह संदेश देना चाहती थी कि उसकी पुलिस ने वीरतापूर्वक संघर्ष किया इसलिए उसने करकरे को मरणोपरांत अशोक चक्र जैसा वीरता पुरस्कार दे दिया। जगह-जगह करकरे की श्रद्धांजलि सभायें योजनापूर्वक कराईं गईं। उसके बाद से एक वातावरण बना हुआ है कि हेमंत करकरे तो आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हुए। कोई सच देखने की जहमत उठाता ही नहीं। आखिर उन्होंने कहां मोर्चाबंदी की, कहां मोर्चाबंदी के लिए व्यूह रचना की और कहां एक भी गोली चलाई?

 सच यह है कि करकरे का पूरा समय करीब दो महीने से मालेगांव एवं नासिक विस्फोटों में हिन्दू आतंकवाद प्रमाणित करने में लगा हुआ था। एटीएस की दूसरी और मुख्य भूमिका हाशिए पर चली गई। हिन्दू आतंकवाद की आज परिणति क्या है? साध्वी प्रज्ञा का नाम न अजमेर शरीफ विस्फोट में आया, न समझौता विस्फोट में और न हैदराबाद मक्का मस्जिद विस्फोट में। इन सारे मामलों का फैसला आ गया है। 29 सितंबर 2008 को मालेगांव में हुए दो विस्फोटों में 6 लोग मारे गए तथा 101 घायल हुए थे। उस मामले में जिस तरह की यातना साध्वी प्रज्ञा को करकरे ने दिलवाई उससे लगता ही नहीं कि भारत में सभ्य पुलिस भी है। आज वो होते तो मुकदमा झेल रहे होते या जेल में होते। किसी महिला को अपनी बनाई कथा को स्वीकार करवाने के लिए नंगा करना, उल्टा लटकाना, बेरहमी से पीटना, गंदी गालियां देना, उसके शिष्य से पिटवाना.....पुलिस की किस व्यवहार संहिता में लिखा है? प्रज्ञा के आधे अंग को लगवा मार गया था। उसकी किडनी में समस्या हो गई। अब तक की स्थिति यही है कि एनआईए ने जांच के बाद 13 मई 2016 को दूसरे पूरक आरोप पत्र में कहा कि मामले में न मकोका लगाने का आधार है और न साध्वी प्रज्ञा ठाकुर सहित 6 लोगों के खिलाफ मुकदमा चलने लायक सबूत ही। हालांकि न्यायालय ने मुकदमा बंद करने को नकार दिया। साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल पुरोहित ने बॉम्बे उच्च न्यायालय में जमानत अर्जी दी। 25 अप्रैल 2017 को उच्च न्यायालय ने साध्वी को जमानत दे दी। उच्चतम न्यायालय ने पुरोहित को भी  21 अगस्त 2017 को जमानत दे दिया।  आज की स्थिति यह है कि अन्य तीन मामलों की तरह ज्यादातर गवाहों ने न्यायालय में कह दिया है कि पहले उन्हें डराकर बयान दिलवाया गया था। क्या इससे साबित नहीं होता कि हेमंत करकरे ने एक बड़ी कथा गढ़ी तथा उसके अनुसार पुलिसिया ताकत का उपयोग कर गवाह बनाए? पूरी योजना संघ और उससे जुड़े संगठनों को संगठित आतंकवाद को संचालित करने वाला संगठन परिवार साबित करने की थी। अगर ऐसा व्यक्ति शहीद है तो फिर शहीद की परिभाषा बदलनी होगी।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

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शनिवार, 20 अप्रैल 2019

यह चिट्ठी ही सेना का राजनीतिक दुरुपयोग है

 अवधेश कुमार

घटनाक्रम पर ध्यान दीजिए। कांग्रेस मुख्यालय पर पार्टी प्रवक्ता ने पत्रकार वार्ता बुलाकर बताया कि 156 पूर्व सैन्य अधिकारियों ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर अपील की है कि सेना के राजनीतिकरण को रोका जाए। कांग्रेस के नेता उस पत्र की कॉपी लेकर चुनाव आयोग के पास पहुच गए। बाहर आकर बयान दिया कि भाजपा सेना का वोट के लिए राजनीतिक इस्तेमाल कर रही है जिससे पूर्व सैन्य अधिकारी नाराज हैं। अगर वाकई सेना के पूर्व अधिकारियों ने मिल-बैठकर ऐसा पत्र लिखने का निर्णय किया तो वे खुद राष्ट्रपति से समय मांग कर मिल सकते थे। ये स्वयं चुनाव आयोग के पास जा सकते थे। इसका अर्थ हुआ कि इसकी योजना कहीं और से बनी। योजना बनाने वालों ने पत्र लिखा। उसके बाद सेवानिवृत अधिकारियों को मेल और व्हाट्सऐप पर भेजकर पूछा गया कि क्या आप इससे सहमत हैं? कुछ लोगों ने सहमति व्यक्त की। हालांकि उन्हें भी इसके राजनीतिक उपयोग का अनुमान था या नहीं कहना कठिन है। योजनाकारों की सोच यही थी कि कि एक बार पूर्व सैन्याधिकारियों के नाम से पत्र जारी करके इसका अपने अनुसार राजनीतिक दुरुपयोग किया जाए। यही हुआ है।

उस पत्र पर जिनके नाम हैं उनमें से किसी ने नहीं कहा कि हमने आपस में बैठकर यह फैसला किया।  राष्ट्रपति भवन ने पत्र मिलने से ही इन्कार कर दिया। हो सकता है आगे उनके पास पत्र पहुंच जाए। कांग्रेस की पत्रकार वार्ता के बाद क्षण भर में यह खबर फैल गई कि सेना के सेवानिवृत्त बड़े अधिकारियों ने भाजपा और सरकार का विरोध किया है। यदि सेना के कुछ पूर्व अधिकारियों को लगे कि सही नहीं हो रहा है तो राष्ट्रगति को पत्र लिखने में कोई समस्या नहीं हैं। किंतु यहां स्थिति दूसरी है। जब इनकी कोई बैठक नहीं हुई तो फिर फैसला कहां हुआ? साफ है कि पूरा प्रकरण कांग्रेस ने पैदा किया। तूफान खड़ा हो ही रहा था कि कुछ लोग यह कहते हुए सामने आ गए कि मेरा नाम बिना मेरे से पूछा लिखा गया है। पत्र में पूर्व सेना प्रमुख जनरल एसएफ रॉड्रिग्ज का नाम है। उन्होंने इसे फेक न्यूज का सबसे घटिया उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि मैं कभी ऐसा पत्र लिख ही नहीं सकता हूं। 42 साल सेना में सेवा देने के बाद मैं ऐसा पत्र कैस लिख सकता हूं। एक पत्रकार ने जब उनसे पूछा कि फिर ऐसा पत्र क्यों लिखा गया? उनका जवाब था कि आप अच्छी तरह जानते हैं कि दुनिया में क्या चल रहा है। इस तरह पूर्व थलसेना प्रमुख ने संकेतों में बता दिया कि एक व्यक्ति और पार्टी को हराने के लिए बहुत सारी कोशिशें चल रहीं हैं। इसमें पूर्व वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एनसी सूरी का भी नाम है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि चिट्ठी में जो कुछ भी लिखा है, मैं उससे सहमत ही नहीं हूं। यह खबर उड़ी कि नोसेना के पूर्व प्रमुख एडमिरल रामदास ने पत्र लिखा है। एअर मार्शल सूरी ने साफ कर दिया कि एडमिरल रामदास ने पत्र लिखा ही नहीं। उनके अनुसार यह पत्र ईमेल और ह्वाट्सएप पर घूम रहा है। पूर्व उप सेना उपप्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल एमएल नायडु का नाम भी 20 वें नंबर पर है। उन्होंने पहले आश्चर्य व्यक्त किया कि ऐसे पत्र में उनका नाम शामिल हैं। उन्होंने कहा कि न  पत्र के लिए मेरी सहमति ली गई और न मैंने कोई पत्र लिखा है। उनके तेवर काफी तल्ख थे।

 इन तीनों पूर्व शीर्ष सेनाधिकारियों के चेहरे को पढ़ें तो साफ दिख रहा था कि अगर राजनीतिक बयान देने से इन्होंने स्वयं को अलग नहीं रखा होता तो निंदा करते तथा कुछ और बात कहते। इसमें 31 वें नबर पर एक नाम मेजर जनरल हर्ष कक्कड़ का है। उन्होंने कहा कि मेरे से ईमेल पर पूछा गया था कि क्या आप इससे सहमत हैं तो मैंने कहा, हां। किंतु उन्होंने यह साफ किया कि सरकार ने पाकिस्तान की वायुसीमा में घुसकर एअरस्ट्राइक का निर्णय किया यह बहुत साहसी कदम है। किसी सरकार ने यह साहस नहीं दिखाया था। इसने जो सर्जिकल स्ट्राइक की अनुमति दी वह भी बहुत बड़ा निर्णय था। पहले की सरकारें ऐसा करने से बचतीं थीं। इसलिए सरकार को इसके नाम पर वोट मांगने का अधिकार है। यह निर्णय उसका है और ऐसा बोलने में कोई समस्या नहीं है। मेजर जनरल कक्कड़ ने कहा कि हम केवल सेना के नाम का दुरुपयोग करने को उचित नहीं मानते। इस मामले में भी उनका मत देखिए- आदित्यनाथ योगी जी ने कह दिया मोदी जी की सेना, कांग्रेस के नेता दीक्षित ने कैसी बात बोल दी, कुमारस्वामी ने क्या बोल दिया...हम चाहते हैं कि ऐसा न हो। हम जानते हैं संदीप दीक्षित ने थल सेना प्रमुख जनरल विपीन रावत के बारे में कहा था कि सेना प्रमुख गली के गुंडों की भाषा बोलते हैं। कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने कह दिया कि जिसके पास खाना नहीं, जो गरीब है वो ही सेना में जाता है। ये दोनों बयान सेना का अपमान है। आदित्यनाथ योगी ने अपमान नहीं किया लेकिन मोदी जी की सेना कहना अनुचित था। विवाद होने पर उन्होंने बोलना बंद कर दिया। पूर्व सेना प्रमुख जनरल शंकर राय चौधरी ने कहा कि मैंने पत्र पर हस्ताक्षर किया है। हालांकि उन्होंने भी नहीं कहा कि पाकिस्तान में वायुसेना की कार्रवाई तथा सर्जिकल स्ट्राइक पर राजनीति में बात किया जाना आपत्तिजनक है।

तो इसका अर्थ हुआ कि यह राजनीतिक प्रयोजन से चलाया गया पत्र अभियान था जिसके साथ बड़े सैन्य अधिकारियों का नाम जोड़कर देश में अलग प्रकार का संदेश देने की रणनीति अपनाई गई। इसमें जिनने हस्ताक्षर किया उनमें से भी ज्यादातर का मत वही नहीं था जो कांग्रेस ने बताया। ध्यान रखिए, मेजर हर्ष कक्कर कह रहे हैं कि सरकार को वायुसेना की कार्रवाई तथा सर्जिकल स्ट्राइक का फैसला करने पर वोट मांगने का अधिकार है, पर पत्र में इसे गलत बताया गया है। पत्र का वह अंश देखिए-‘ ‘महोदय हम नेताओं की असामान्य और पूरी तरह से अस्वीकृत प्रक्रिया का जिक्र कर रहे हैं जिसमें वह सीमा पार हमलों जैसे सैन्य अभियानों का श्रेय ले रहे हैं और यहां तक कि सशस्त्र सेनाओं को मोदी जी की सेना बताने का दावा तक कर रहे हैं।’इसमें कहा गया है कि सेवारत तथा सेवानिवृत्त सैनिकों के बीच यह चिंता और असंतोष का मामला है कि सशस्त्र सेनाओं का इस्तेमाल राजनीतिक एजेंडा चलाने के लिए किया जा रहा है। पत्र में चुनाव प्रचार अभियानों में भारतीय वायु सेना के पायलट अभिनंदन वर्धमान और अन्य सैनिकों की तस्वीरों के इस्तेमाल पर भी नाखुशी जताई गई है। तो क्या सहमति लेने के बाद इसका मजमून बदला गया? हर्ष कक्कड़ अगर मानते हैं कि सरकार ने साहसी फैसले किए और उसे पूरा अधिकार है कि जनता के सामने इसे रखकर वोट मांगे तो पत्र में इस पर चिंता क्यों प्रकट की गई है? जाहिर है, कांग्रेस की जो भी रणनीति रही हो, इससे पूरा मामला संदेहास्पद हो जाता है। पूरे प्रकरण को देखते हुए सेवानिवृत्त विंग कमांडर प्रफुल्ल बख्सी का बयान सही लगता है कि असल में यह पत्र लिखना ही सेना पर राजनीति है। हजारों की संख्या में ऐसे सेवानिवृत्त सेनाधिकारी हैं जो इस पत्र को बिल्कुल गलत मानते हैं।

यह प्रश्न भी उठता है कि सेना का राजनीतिक दुरूपयोग किसे कहेंगे? सेना का राजनीतिक दुरुपयोग तब होता जब कार्यरत जवानों को साथ लेकर वोट मांगा जाता या सेना के जवान किसी पार्टी के लिए वोट मांगते। जिस दिन भारत में ऐसा हुआ वह लोकतंत्र के लिए दुर्दिन होगा। पर यदि सरकार ने इतना बड़ा फैसला किया और जवानों ने उसे सफलतापूर्वक अंजाम दिया तो इसका श्रेय लेगी। 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के बारे आज तक कांग्रेस कहती है कि इंदिरा जी ने पाकिस्तान को तोड़कर बांग्लादेश बनाया। वास्तव में ऐसा निर्णय प्रधानमंत्री के स्तर पर ही होता है। उसके एक वर्ष बाद विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के लिए यह सबसे बड़ा मुद्दा था और उसे भारी सफलता मिली। कोई भी सरकार होगी वह अपने ऐसे फैसले की चर्चा करके वोट पाने की कोशिश करेगी। यह सेना का दुरूपयोग कैसे हो गया? ऐसा माहौल बनाया जा रहा है मानो सेना के शौर्य की चर्चा करना या चुनावी मंचों पर शहीद या वीरता प्रदर्शित करने वाले जवानों की तस्वीरे लगाना राजनीतिक अपराध है। यह गलत सोच है। बलिदान हुए जवान या वीरता प्रदर्शित करने वाले जवानों से देश के लिए मरने-मिटने की, अनुशासनबद्ध, संकल्पबद्ध रहने या होने की प्रेरणा मिलेगी। इससे भ्रष्टाचार करने, देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने, कायर बनने की प्रेरणा तो नहीं मिलेगी। वीरता और शौर्य राजनीति का मुद्दा बने इससे बढ़िया कुछ हो ही नहीं सकता। इससे जो माहौल बनेगा उससे देश के लिए काम करने, मरने मिटने के लिए हजारों तैयार हो सकते हैं। भाजपा भी ऐसा करे, कांग्रेस भी करे, दूसरी पार्टियां भी करें। लेकिन भारत की नासमझ पार्टियां इसके उलट सोच रही है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092,01122483408, 9811027208

 

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