शुक्रवार, 23 मार्च 2018

तेदेपा के अलग होने के बाद राजग का भविष्य

 

अवधेश कुमार

तेलगुदेशम पार्टी (तेदेपा) का राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी राजग या एनडीए से बाहर जाना कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है। हां, केन्द्र सरकार में शामिल अपने दोनों मंत्रियों से पिछले 8 मार्च को इस्तीफा कराने के बावजूद यदि चन्द्रबाबू नायडू ऐसा फैसला नहीं करते तो आश्चर्य अवश्य होता। हालांकि इसका निर्णय करने में वे समय लगाते किंतु आंध्रप्रदेश की ही दूसरी पार्टी वाईएसआर कांग्रेस ने प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा न दिए जाने को लेकर संसद में जो अविश्वास प्रस्ताव पेश करने का ऐलान कर दिया उसमें चन्द्रबाबू को आनन-फानन में वीडियो कॉन्फ्रेसिंग के जरिए नेताओं की बैठक बुलाकर यह निर्णय करना पड़ा। तेदेपा ने केवल राजग से ही अलग होने की घोषणा नहीं की है उसने भी लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया है। हालांकि 16 सांसदों वाले तेदेपा के अलग होने या अविश्वास प्रस्ताव से नरेन्द्र मोदी सरकार को तत्काल खतरा नहीं है, क्योंकि उसके पास अपनी ही पार्टी का बहुमत है। वैसे भी लोकसभा में अभी 536 सांसद ही है, इसलिए सरकार बचाने के लिए 269 का आंकड़ा चाहिए। भाजपा आराम से केवल अपनी बदौलत इसे पार कर जाएगी। किंतु यह देखना होगा कि इस अविश्वास प्रस्ताव में राजग में शामिल और कौन से घटक सरकार के खिलाफ आते हैं।

वास्तव में अविश्वास प्रस्ताव कोई महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम नहीं है, क्योंकि आंध्रप्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देना केन्द्र सरकार के लिए संभव ही नहीं। संवैधानिक रुप से तो यह असंभव है ही, व्यावाहरिक तौर भी इससे परेशानियां बढ़ जाएंगी, क्यांेकि कई राज्य यही मांग कर रहे हैं। वाईएसआर कांग्रेस ने केवल तेदेपा को दबाव में लाने के लिए यह कदम उठाया जिसका असर पड़ा है। किंतु इससे मूल प्रश्न राजग के भविष्य को लेकर पैदा हुआ है। जब तेदेपा ने मंत्रियों से इस्तीफे के बाद यह घोषणा किया था कि वे फिलहाल राजग में बने रहेंगे तो निश्चय ही भाजपा ने राहत की सांस ली थी। अब उसके लिए स्थिति बदल गई है। तेदेपा का अलग होना किसी एक दल का अलग होना मात्र नहीं है। इसका तात्कालिक एवं दूरगामी असर कई तरीकों से हो सकता है। सबसे पहले तो भाजपा से असंतुष्ट राजग के अंदर या सरकार को समय-समय पर समर्थन दे रहे दूसरे दलांे के अंदर भी फैसला करने का मनोविज्ञान पैदा होगा। दूसरे, जो दल अलग जाएंगे वे अन्य दलों के साथ गठबंधन कर सकते हैं तो इससे 2019 का लोकसभा चुनाव परिणाम प्रभावित होगा। तेदेपा अगर बाहर गई है तो निश्चय ही भविष्य की राष्ट्रीय राजनीति में वह कुछ दलों के साथ जुड़ेगी। अगर चुनाव पूर्व उसका गठबंधन नहीं हुआ तो चुनाव बाद अवश्य हो सकता है। कम से कम एक बार विशेष राज्य के दर्जे पर अलग होने के बाद दोबारा बगैर इसके वह भाजपा के साथ तो नहीं आ सकती। यह पहलू भाजपा के लिए ज्यादा चिंताजनक होना चाहिए।

वस्तुतः तेदेपा का राजग से बाहर आना भविष्य की केन्द्रीय राजनीति में नए गठबंधन का संकेत हो सकता है। उसके अलग होने का जिस तरह विपक्षी नेताओं में ममता बनर्जी ने स्वागत किया, सीताराम येचुरी ने उसके अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन किया उसमें नए समीकरण के संकेत साफ निहित हैं। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में अभी 330 सांसद हैं। तेदेपा के अलग होने के बाद 314 सांसद बच जाते हैं। इसके अलावा राजग में अभी शिवसेना के 18, लोजपा के 6, अकाली दल के 4, राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी के 3, जद यू के 2, अपना दल के 2 एवं अन्य दलों 4 सांसद शामिल हैं। इसमें शिवसेना लगातार मोदी सरकार के खिलाफ उसी तरह बयान देती है जिस तरह विपक्षी दल। पिछले 23 जनवरी को उसने यह घोषणा कर दिया था कि 2019 का आम चुनाव वह भाजपा से अलग लड़ेगा। हालांकि इसमें भाजपा का कोई दोष नहीं है किंतु यदि शिवसेना अपनी घोषणा पर कायम रहता है तो फिर राजग में यह दूसरा बड़ा बिखराव होगा। शिवसेना भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी है। 2014 लोकसभा चुनाव में साथ लड़कर दोनों ने कांग्रेस एवं राकांपा को प्रदेश से लगभग खत्म कर दिया था। उसके अलग होने का आगामी लोकसभा चुनाव परिणामों पर असर होना निश्चित है। हालांकि अगर शिवसेना को कोई दूसरा साथी नहीं मिलता तो क्षति उसे भी होगी लेकिन कुल मिलाकर भाजपा एवं राजग के लिए तो यह बड़ी क्षति होगी ही। बिहार में जद यू से हाथ मिलाने के बाद रालोसपा को भी लगता है कि उसके लिए अब राजग में बने रहना मुश्किल होगा। हालांकि इस मामले पर पार्टी में विभाजन है, पर संभव है लोकसभा चुनाव आते-आते वह भी अलग राह पकड़कर बिहार में राजद और कांग्रेस के साथ गठबंधन कर ले। वैसे इससे राजग को बहुत ज्यादा क्षति होने की संभावना नहीं है।

तो फिलहाल अभी प्रतीक्षा करनी होगी कि राजग से कौन-कौन से दल कब नाता तोड़ते या फिर नहीं तोड़ते हैं। तेदेपा ने शुरुआत की है तो यही तक रुकेगा इसकी भविष्यवाणी भी नहीं की जा सकती। पहले का वातावरण यह था कि आंध्रप्रदेश में यदि तेदेपा अलग होती है तो तत्काल 9 सांसदों वाली जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस भाजपा के साथ आ जाएगी। किंतु विशेष राज्य का दर्जा ऐसा मामला है जिसमें आंध्र की सभी पार्टियों ने मोदी सरकार को खलनायक बना दिया है। उसमंें जगनमोहन के लिए भाजपा के साथ आना जरा कठिन होगा। प्रदेश मंेे विशेष राज्य का दर्जा न दिला पाने के लिए इस पार्टी ने लगातार प्रदर्शन कर तेदेपा की नाकों मंें दम कर दिया था। अगर वह अब भाजपा के साथ जाती है तो फिर मतदाताओं को क्या जवाब देगी? लेकिन जन सेना के पवन कल्याण भाजपा के साथ आ सकते हैं। वे कितना प्रभावी होंगे यह अलग बात है। किंतु तेदेपा या वाईएसआर जैसी इस समय उसकी स्थिति नहीं है। महाराष्ट्र में भी शिवसेना के अलग होने के बाद रिपब्लिकन पार्टी के अलावा कोई उसके साथ आएगा इसकी संभावना न के बराबर है। इन दो राज्यों में भाजपा को अपनी बदौलत चुनाव लड़ने की तैयारी अभी से करनी होगी। पता नहीं पार्टी इस बारे में क्या सोचती है। 

इस तरह तेदेपा के बाहर जाने के प्रभाव बहुआयामी हैं। आसानी से इसका राजनीतिक मायने और प्रभाव कुछ लोगों की समझ में नहीं आए लेकिन जब आप भविष्य की तस्वीर बनाते हैं तो बहुत कुछ आपके सामने स्पष्ट हो जाता है। तेदेपा का अलग होना भारतीय राजनीति में इस समय चल रहे एक नए हलचल और उससे उभर रहीं नई प्रवृत्तियों का संकेतक है। विपक्षी दलों में इस बात को लेकर एक राय बन ही रही है कि भाजपा एवं नरेन्द्र मोदी को पराजित करना है तो साथ आना होगा। उत्तर प्रदेश के दो लोकसभा उपचुनावों में बसपा सपा मिलन ने भाजपा को पराजित कर इस सोच को बल ही नहीं दिया है इस प्रवृत्ति को तेज कर दिया है। वैसे इसका हस्र अभी देखना बाकी है, फिर भी भाजपा के लिए 2019 की दृष्टि से यह चिंताजनक तो है ही। तेदेपा के बाहर आने से कांग्रेस को छोड़कर विपक्षी दलों के एक बड़े खेमे में उत्साह बढ़ा है। राजनीति में माहौल काफी मायने रखता है और वह चुनाव पर प्रभाव भी डालता है। न भूलें कि इस साथ आने में राजग के कुछ दलों को भाजपा से अलग कर उनको अपने खेमे में लाने की कोशिश भी शामिल है। इसकी कोशिश वे कर रहे हैं। 

ध्यान रखने की बात है कि भाजपा की रणनीति 2019 के लिए राजग के विस्तार करने की रही है। तमिलनाडु को एक उदाहरण के रुप में लिया जा सकता है। वहां राजग के विस्तार की वह लगातार कोशिश कर रही है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी करुणानिधि से मिलने पहुुंच गए थे। अन्नाद्रमुक के साथ वे लगातार संपर्क बनाए हुए हैं। जो तीन नए समूह दिनाकरण, राजनीकांत एवं कमल हासन के बन रहे हैं उनके भाजपा के साथ आने की संभावना इस समय नहीं दिख रही है। अगर राजग में कुछ और टूट हुई तो तमिलनाडु ही नहीं कई राज्यों में उसके प्रयासों को धक्का लग सकता है। फिर उसे इन राज्यों में या तो अकेले लोकसभा चुनाव लड़ना होगा या फिर कुछ वैसे दल साथ रहेंगे जिनका मतदाता पर प्रभाव ही नहीं हो। निश्चय ही भाजपा नेतृत्व इन सारी संभावनाओं का आकलन कर रहा होगा, उस अनुसार रणनीतियां भी बनाने की कोशिश होगी, तेदेपा के बाहर जाने एवं बनते वातावरण में उसके लिए चुनौतियां काफी बढ़ गईं हैं। हम नहीं कहते कि भाजपा के लिए 2019 का भविष्य धूमिल हो चुका है, पर उसे साथी दलों को साथ बनाए रखने की पहले से कई गुणा ज्यादा कोशिश करनी होगी। भाजपा की ओर से तेदेपा से जल्दबाजी न करने की अपील की गई थी, जिसका असर नहीं हुआ। बेशक, तेदेपा ने किसी वाजिब कारण से तलाक नहीं दिया है, लेकिन इसकी सीख है कि कोई साथी दल या नेता असंतोष प्रकट कर रहे हैं तो उसे केवल शब्दिक गीदड़भभकी नहीं मानना चाहिए। बदलते माहौल में वे साथ छोड़कर जा सकते हैं। भाजपा को यह साफ समझना होगा कि जितने दल उसे छोड़कर जाएंगे उससे माहौल विपरीत बनेगा और कम से कम अभी उतने एवं उसी तरह जनाधार रखने वाले दलों के साथ आने की संभावना नहीं है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

शुक्रवार, 16 मार्च 2018

श्रीलंका में बौद्ध मुस्लिम दंगा चिंताजनक

 

अवधेश कुमार

हमारा पड़ोसी देश श्रीलंका फिर एक बार सांप्रदायिक दंगों की चपेट में आया है और स्थिति को संभालने के लिए सरकार को आपातकाल लागू करना पड़ा है। आपातकाल लगाना ही यह साबित करता है कि स्थिति को सरकार कितना गंभीर मान रही है। हालांकि बौद्ध और मुस्लिम समुदाय के बीच हिंसक घटनाएं केवल कैंडी तथा उसके पड़ोस मंें ही घटी है लेकिन पूर्व के अनुभवों को देखते हुए सरकार ने एहतियातन पूरे देश में आपातकाल लगा दिया है ताकि इसका विस्तार न हो सके।  2014 में श्रीलंका में बड़े पैमाने दोनों समुदायों के बीच दंगे हुए थे। उसे संभालने में सरकार को नाकों चने चबाने पड़े थे। उस हिंसा में काफी संख्या में मुस्लिम और सिंहली विस्थापित हुए थे। उस घटना ने बता दिया था कि किस तरह दोनों समुदायों के बीच तनाव की खाई चौड़ी हो चुकी है। वास्तव में पिछले कुछ वर्षों में सिंहली बौद्धों तथा मुस्लिमों के बीच जिस तरह रिश्ते बिगड़े हैं उनको देखते हुए सरकार का यह कदम उचित ही है। वैसे आज से एक वर्ष पूर्व 26-27 फरवरी, 2017 को भी श्रीलंका के पूर्वी प्रांत के अंपारा कस्बे में भी सांप्रदायिक हिंसा हुई थी। उसे किसी तरह प्रशासन ने रोक तो दिया लेकिन तनाव खत्म नहीं हुआ। कहा जा जा रहा है कि वर्तमान हिंसा की जड़ भी उन्हीं घटनाओं में निहित हैं।

जो सूचनाएं आईं हैं उनके अनुसार कैंडी में सिंहली बौद्ध समुदाय के एक ट्रक चालक की मौत हो गई। उसका कुछ दिन पूर्व चार मुसलमानों से झगड़ा हुआ था। कहा जाता है कि उसमें वह बुरी तरह घायल हो गया। उसकी अंत्येष्टि में काफी संख्या में लोग जुटे। उनमें उत्तेजना थी, उत्तेजक नारे लगे। इसके बाद कुछ मुसलमानों के घरों एवं दूकानों पर हमले हुए। हालांकि प्रतिकार उधर से भी हुआ लेकिन इसमें एक मुसलमान अपने जले घर में मृत पाया गया। इसके बाद हिंसा तेजी से फैली। इस घटना का पहला निष्कर्ष तो यही निकलता है कि स्थानीय प्रशासन इसे रोकने में नाकामयाब रहा। तनाव पहले से था और किसी की शवयात्रा में भारी संख्या में एक समुदाय के लोग शामिल हैं, नारे लग रहे हैं तो फिर प्रशासन को चौकन्ना हो जाना चाहिए था। यहां तक तो बात समझ में आती है। किंतु यह केवल प्रशासन का मामला नहीं है। मुसलमानों और बौद्धों का संबंध केवल कानून व्यवस्था से संबंद्ध नहीं है। हालांकि सरकार ने वहां सेना भेजी, विशेष पुलिस बल रवाना कर दिया, कफर््यू लगा दिया गया। काफी संख्या में लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इसका तात्कालिक असर तो यह हुआ है कि उसके बाद वहां हिंसा नहीं हो रही है। लेकिन दोनों समुदायों के संबंधों तथा पूरे माहौल को देखते हुए आप गारंटी नहीं दे सकते कि आगे फिर हिंसा नहीं होगी।

श्रीलंका में मुस्लिम आबादी केवल दस प्रतिशत है। इसके समानांतर सिंहली बौद्धों की संख्या 75 प्रतिशत के आसपास है। इसलिए दोनों के बीच कोई मुकाबला नहीं। किंतु बौद्धों के अंदर मुस्लिमों को लेकर कई प्रकार की आशंकाएं हैं। वे उन पर धर्म परिवर्तन से लेकर पुरातात्विक महत्व की चीजों को नष्ट करने जैसे कई प्रकार के आरोप लगाते हैं। इस कारण बौद्धों के कई संगठन तक खड़े हो गए हैं जो मुस्लिमों के खिलाफ बयान देते तथा मोर्चा निकालते रहते हैं। बौद्ध संगठन बोदु बाला सेना उन्हीं में सबसे बड़ा और सर्वाधिक सक्रिय है। इस संगठन के महासचिव गालागोदा ऐथे गनानसारा के बयान अक्सर श्रीलंकाई मीडिया में आते रहते हैं। वे कहते हैं कि मुस्लिमों की बढ़ती आबादी देश के मूल सिंहली बौद्धों के लिए खतरा है। 2014 में जब दोनों समुदायों के बीच तनाव चरम पर था उन्होंने कहा था कि मुस्लिम समुदाय का अतिवाद खतरा है और इन्हें मध्यपूर्व के देशों से मदद मिलती है। यह तो एक उदाहरण मात्र है जिससे यह समझा जा सकता है कि श्रीलंका की अंदरुनी सामाजिक स्थिति किस तरह के तनाव से गुजर रही है। वास्तव में ऐसे अनेक नेता और संगठन हैं जो गनानसारा की भाषा बोलते हैं।

म्यान्मार में बौद्धों और रोहिंग्या मुसलमानों के बीच भीषण दंगों की प्रतिध्वनि यहां भी सुनाई पड़ रही है। सिंहली बौद्ध संगठन उस विषय को बराबर उठाते हैं। वे कहते हैं कि म्यान्मार में हमारे बौद्ध भाइयों के खिलाफ इन्होंने जुल्म किया है। यह प्रचार वहां काफी हुआ है और जाहिर है इसका असर भी है।  जिस तरह हमारे देश में और अन्यत्र रोहिंग्या शरणार्थी हैं, वैसे ही कुछ श्रीलंका भी पहुंचे हैं। ये इसका भी विरोध करते हैं। इन्हें देश के लिए खतरा बताते हुए इनको वापस भेजने की मांग करते हैं। इसके विपरीत श्रीलंकाई मुसलमान उनका समर्थन करते हैं, उनके प्रति सहानुभूति जताते हैं। इस कारण भी दोनों के बीच तनाव बना हुआ है।

हम तनाव और हिंसा की आलोचना कर सकते हैं। लेकिन केवल आलोचना ऐसी किसी समस्या का समाधान नहीं है। अगर श्रीलंका में दोनों समुदायों के बीच शांति स्थापित नहीं हुई तो वह एक नई समस्या से घिर जाएगा जिसका खतरा साफ मंडराता दिख रहा है। ऐसा नहीं है कि दोनों समुदाय के बीच तनाव की चिन्गारी केवल उस देश तक ही सीमित रहेगी। सच कहा जाए तो यह स्थिति केवल श्रीलंका के लिए ही चिंताजनक नहीं है। यह हमारे लिए भी चिंता का कारण है। पूरे दक्षिण एशिया में इसकी प्रतिक्रिया हो सकती है। म्यान्मार दंगा के बाद हमारे देश में ही उसकी प्रतिक्रिया में कई स्थानों पर ंिहसंा की घटनाएं र्हुइं। चाहे वह मुबई के आजाद मैदान की घटना हो या लखनउ का दंगा आज भी उसकी यादें सिहरन पैदा करतीं हैं। हमारे यहां भी रोहिंग्या मुसलमानों को शरण दिए जाने का मुद्दा बहुत बड़ा है तथा कई जगह तनाव का कारण बना हुआ है। इसलिए श्रीलंका में जो कुछ हो रहा है उसे उस देश तक सीमित मान लेना हमारे लिए उचित नहीं होगा। अगर वहां बौद्धों एवं मुसलमानों के बीच हिसंा फैलती है तो फिर इसकी लपटें दूर तक जाएगी। इसलिए भारत भी वहां की घटनाओं से आंखें मूंद नहीं सकता। किंतु हम इसमें कर क्या सकते हैं? समस्या का समाधान तो श्रीलंका को ही करना है।

श्रीलंका के विवेकशील लोग इस बात को अच्छी प्रकार समझते होंगे कि किसी देश की शांति और एकता इस बात पर निर्भर करती है कि वहां के रहने वाले विभन्न समुदायों के बीच किस तरह का संबंध है। अगर संबंधों में सद्भाव है तो वह देश शांतिपूर्वक विकास के रास्ते पर दौड़ लगाता है। यदि संबंधों में तनाव है, एक दूसरे के प्रति आशंकाएं हैं तो फिर यह देश में हिंसा का कारण भी बनता है तथा इससे प्रगति तो प्रभावित होती ही है। श्रीलंका की समस्या रही है कि वहां तमिलों को सामान्य नागरिक अधिकारों से वंचित रखा गया और इस कारण वहां लंबे समय तक गृहयुद्ध चला। हिंसक तमिल संगठन खड़े हो गए। रक्त और लौह की नीति से श्रीलंका ने तमिल उग्रवादियों को तो खत्म कर दिया लेकिन अभी तक मूल सिंहलियों और तमिलों के बीच जैसा भाईचारे का संबंध होना चाहिए था नहीं हुआ। अब मुस्लिमों की समस्या उनके सिर अलग से आ गई है। यह ऐसी समस्या है जिसे श्रीलंका को पार पाना ही होगा। श्रीलंका की सरकारों ने आरंभ से ऐसी नीतियां नहीं अपनाई जिससे सभी समुदायों के बीच परस्पर सद्भाव व सहकार कायम हो सके। उसे अपने पड़ोसी देश भारत से सीखना चाहिए था। आजादी के बाद हमने इतनी विविधताओं के रहते हुए किस तरह एकता के सूत्रों को मजबूत करने का प्रयास किया है। इतने पंथ-संप्रदाय, जातियां सब एक साथ किस तरह रहतीं हैं। ऐसा नहीं है कि हमारे यहां तनाव नहीं होते, दंगे नहीं होते, लेकिन उसके समाधान का रास्ता भी समाज के अंदर से निकल जाता है। श्रीलंका ने अभी तक यह गुर सीेखा नहीं है। उसे अपने देश के बचाना है तो यह कला भारत से सीखनी ही होगी। हम तो यही कामना करेंगे कि हमारा पड़ोसी देश शीघ्र तनाव से मुक्त हो तथा शांतिपूर्ण तरीके से प्रगति और खुशहाली के रास्ते पर बढ़े, पर करना तो उसे ही पड़ेगा।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

  

 

 

 

 

शुक्रवार, 9 मार्च 2018

कांग्रेस पराजय से सबक लेने को तैयार ही नहीं

 

अवधेश कुमार

इस बात से कोई तटस्थ व्यक्ति इन्कार नहीं कर सकता कि कांग्रेस इस समय अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर गहरे निराशा में होगी। जिस तरह त्रिपुरा एवं नागालैंड से वह खत्म हो गई है तथा मेघालय में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद वह सरकार बनाने में सफल नहीं हई उससे बड़ा राजनीतिक आघात किसी पार्टी के लिए कुछ नहीं हो सकता। मेघालय में जनता ने उसको बहुमत नहीं दिया तथा उसकी विरोधी पार्टियों को ज्यादा सीटें दे दीं। तो उसके खिलाफ एकत्रीकरण होना ही था। जाहिर है, पिछले वर्ष गुजरात चुनाव में थोड़ा बेहतर प्रदर्शन करने तथा भाजपा को कड़ी चुनौती देने से जो एक संभावना नजर आई थी वह पूर्वोत्तर पहुंचते-पहुंचते ध्वस्त होती दिख रही है। हाल में राजस्थान एवं मध्यप्रदेश के उपचुनावों में मिली विजय का उत्साह भी काफूर है। कांग्रेस सहित भाजपा विरोधी दलों का मुख्य लक्ष्य 2019 हो चुका है। 2019 को कैसे साधा जाए यह कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती है। हालांकि उसके पहले उसे करीब दो महीने बाद कर्नाटक विधानसभा चुनाव का सामना करना है जहां उसकी सरकार है। उसके बाद वर्ष के उत्तरार्ध में उससे मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं राजस्थान विधानसभा चुनाव में उतरना है। स्वाभाविक है कि कांग्रेस 2019 को ध्यान में रखते हुए इन विधानसभा चुनावों में बेहतर करने की कोशिश करे। लेकिन क्या इसकी संभावना दिख रही है?

पूर्वोत्तर का परिणाम उसके लिए ऐसा झटका है जिसके मनोवैज्ञानिक असर से उबरना उसके लिए आसान नहीं होगा। आखिर गुजरात विधानसभा चुनाव तथा उसके बाद राजस्थान एवं मध्यप्रदेश के उपचुनावों में प्रदर्शन के बाद वह जिस मानसिकता से पूर्वोत्तर में चुनाव लड़ रही थी वह मानसिकता तो हो नहीं सकती। इस समय तो एक पराजित पार्टी की मानसिकता के दौर से वह गुजर रही है। भाजपा ने कर्नाटक चुनाव की तैयारी एक वर्ष पहले आरंभ कर दिया था। जिस रणनीति, तौर तरीकों तथा प्रबंधन को भाजपा ने पूर्वोत्तर में अपनाया लगभग वही वह राज्य के चरित्र के अनुरुप कर्नाटक में अपना रही है। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने भाजपा के लिए हर चुनाव को करो या मरो का चरित्र दे दिया है। कांग्रेस अभी इस स्वरुप को प्राप्त करने से वंचित है। अगर उसने पूर्वोत्तर में अच्छा प्रदर्शन किया होता तो इस समय उसके संदर्भ में पूरा माहौल ही बदला होता। दूसरी पार्टियां भी कांग्रेस की ओर 2019 के लिए उम्मीद भरी नजर से देखती। वह स्वयं भी कर्नाटक विधानसभा चुनावों में विजय पाने की मानसिकता से उतरती।

किसी पार्टी के लिए चुनाव परिणामों के पूर्व भविष्यवाणी कर देना जोखिम भरा है। लेकिन आगामी विधानसभा चुनावों तथा उसके बाद लोकसभा चुनाव की दृष्टि से कांग्रेस के अंदर जो परिवर्तन कई स्तरों पर दिखना चाहिए था वह नहीं दिख रहा है। राहुल गांधी अध्यक्ष बन गए हैं, सोशल मीडिया का प्रबंधन बेहतर हुआ है लेकिन इसके अलावा क्या? यह प्रश्न ऐसा है जिसका उत्तर किसी के पास नहीं है। कांग्रेस की समस्या है कि वह चुनावी प्रदर्शनों पर कभी ईमानदारी और गहराई से सामूहिक आत्ममंथन नहीं करती। जब आत्ममंथन ही नही होगा तो फिर कहां-कहां चूकें हुईं वह भी पकड़ में नहीं आ सकता। जब चूकें ही पकड़ में नहीं आएंगी तो फिर सुधार कहां से होगा। आप देख लीजिए पूर्वाेत्तर की विफलता के बावजूद किसी तरह के मंथन की कोई आवश्यकता पार्टी महसूस नहीं कर रही है। हां, सोनिया गांधी अवश्य विपक्षी नेताओं को रात्रि भोज पर आमंत्रित कर रहीं हैं। इससे क्या होगा? सोनिया ने पहले भी विपक्षी नेताओं की बैठकें की हैं। एक भाजपा विरोधी समूह बनाने की उनकी कोशिश पहले से है। विपक्षी दल उनके भोज में शामिल होंगे, भाजपा के खिलाफ एकजुट होने की बात भी करेंगे, लेकिन जब तक उन्हें नहीं लगेगा कि कांग्रेस वाकई भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में है तब तक वे उसके छाते के नीचे आने को तैयार नहीं होंगे।

एक दो उपचुनावों में मिली विजय से यह लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता है। आप उपचुनाव में जीत जाएं और जहां भी मुख्य चुनाव हो वहां भू-लुंठित हो जाएं तो फिर क्या होगा? यही हो रहा है। कांग्रेस को यह बात समझनी होगी कि विपक्षी दलांें को एक साथ लाने के प्रयास से ज्यादा जरुरी है अपने घर को संभालना, लगातार पराजय की स्थिति से बाहर निकलने का प्रयास करना। कांग्रेस यही नहीं कर रही है। आखिर 2014 के पराजय के बाद उसने अपने खोए जनाधार को पाने के लिए क्या किया है? उत्तर है, कुछ भी नहीं। एकाध सफलताओं पर पार्टी इतरा गई और मान लिया कि उसकी वापसी हो रही है। मसलन, 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन थोड़ा बेहतर रहा। इसकी पार्टी ने गलत व्याख्या की। यह उसकी सफलता नहीं थी। नीतिश कुमार और लालू प्रसाद यादव के साथ गठबंधन की सफलता थी। न तो बिहार में कांग्रेस के संगठन का विस्तार हुआ न सामाजिक समीकरण ही इसके पक्ष में बने। तो फिर वापसी का संदेश इसे कैसे मान लिया गया? उसके बाद हमने देखा पंजाब छोड़कर ज्यादातर चुनावों में वह पराजित होती रहीं। उत्तर प्रदेश से वह साफ हो गई, जबकि अपने को बचाने के लिए उसने बिहार की तर्ज पर समाजवादी पार्टी के साथ गठजोड़ किया। उत्तर प्रदेश में केवल नाम के लिए उसके विधायक बचे हुए है।

वास्तव में पूर्वोत्तर के धक्के को वह अपने भविष्य के संकेत के रुप में ले यही सबक है। आखिर जिस पूर्वोत्तर में उसकी तूती बोलती थी वहां से लगभग वह साफ हो चुकी है। देश में भी आज कुल मिलाकर उसका शासन केवल तीन राज्यों और एक केन्द्रशासित प्रदेश में बचा हुआ है। इससे दुर्दिन वैसी पार्टी के लिए क्या हो सकता है जिसका कभी देश पर एकच्छत्र राज रहा हो? अगर कांग्रेस को फिर भी नहीं लगता कि उसे गहरे आत्ममंथन एवं उसके अनुरुप संगठन, नीति एवं रणनीति में व्यापक बदलाव की आवश्यकता है तो फिर कुछ नहीं कहा जा सकता। कमजोर के साथ कोई जाना नहीं चाहता। आप चाहे विपक्षी दलों की जितनी बैठकें बुला लें,संसद के अंदर सरकार को घेरने में तो विपक्ष का साथ मिल सकता है लेकिन कोई आपके नेतृत्व में गठबंधन को तैयार नहीं होगा। इसके लिए आपको अपने को आमूल रुप से बदलना होगा, कुछ बेहतर चुनावी प्रदर्शन करना होगा जिससे यह संदेश फैले कि वाकई कांग्रेस भाजपा एवं मोदी को चुनौती देने की स्थिति में आ रही है। केवल नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार की आलोचना करने से तो जनाधार वापस नहीं आएगा। आलोचना करते रहिए। पूर्वोत्तर के तीनों राज्यों मंें आपने नरेन्द्र मोदी सरकार पर हमला किया। इसके पूर्व उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड तक में किया। परिणाम क्या आया? जिस गुजरात में नोटबंदी एवं जीएसटी का व्यापक असर था। व्यापारी से लेकर पटेल और मध्यम वर्ग तक भाजपा से नाराज था वहां आप उसे पटखनी देने में सफल नहीं हुए तो कहां होंगे?

कल्पना करिए जो धक्का कांग्रेस को चुनावों में लगा है वैसा ही अगर मोदी और शाह के नेतृत्व में भाजपा को लगा होता तो क्या होता? क्या कांग्रेस की तरह भाजपा भी चुप्पी मारकर बैठी होती या फिर आत्ममंथन करके भविष्य के चुनावों में जोर लगाने का वातावरण बना रही होती? बिहार पराजय को भाजपा ने एक सबक के तौर पर लिया। जो गलतियां हुईं उनको पकड़ने की कोशिश की, उनमें काफी सुधार किए, कुछ तौर-तरीके बदले.....और उसके बाद के परिणाम हमारे सामने है। कांग्रेस कम से कम भाजपा से तो सीख ले ही सकती है। लगता ही नहीं कि पार्टी का इसकी ओर कोई ध्यान है। राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी की रीति-नीति में व्यापक बदलाव दिखना चाहिए था। अभी तक न चेहरों में व्यापक परिवर्तन हुआ है, न नीति और न रणनीति में ही आवश्यक बदलाव दिख रहा है। और आत्ममंथन या चुनावी पराजय की व्यापक समीक्षा की तो चर्चा तक नहीं है। इसमें उसके भविष्य के बारे में कोई सकारात्मक या आशाजनक आकलन करना जरा कठिन है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

सेना के जवानों पर मुकदमा उचित नहीं

 

अवधेश कुमार

यह खबर निश्चय ही हर भारतवासी को चिंतित करेगा कि जम्मू कश्मीर पुलिस ने वहां कार्रवाई कर रहे सेना के जवानों पर मुकदमा दर्ज किया है। जिनके खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ है वे जवान 10 गढ़वाल यूनिट के हैं और इनमें एक मेजर स्तर का अधिकारी भी शामिल है। मुकदमा 302 यानी हत्या और 307 यानी हत्या के प्रयास के तथा 336 यानी जिन्दगी को खतरे में डालने वाले के तहत दर्ज हुआ है। पिछले काफी समय से जम्मू कश्मीर पुलिस, सेना, केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल और सीमा सुरक्षा बल के बीच गजब किस्म का समन्वय देखा जा रहा था। कश्मीर में शांति की कामना करने वाले हर व्यक्ति की चाहत है कि यह समन्वय बना रहे और राज्य के अंदर के आतंकवादी तथा सीमा पार से आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले परास्त हों। आपसी समन्वय के कारण ही 2017 में सुरक्षा बलों को बड़ी कामयाबी मिली और 200 से ज्यादा आतंकवादी मारे गए। कई आतंकवादी बने नवजवान वापस आम जिन्दगी में लौटे हैं। इस एक घटना ने समन्वय की स्थिति पर गहरा प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया है। यह प्रश्न उठने लगा है कि सुरक्षा एजेंसियां आपसी तालमेल से जो ऑपरेशन ऑल आउट चला रहीं हैं उनका क्या होगा? क्या पुलिस और सेना के बीच फिर से किसी प्रकार के टकराव के दौर की शुरुआत होगी और आतंकवादी एवं अलगाववादी इसका लाभ उठाएंगे?

ऐसा होता है तो निश्चय ही जम्मू कश्मीर के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा। आखिर सेना के जवानों पर मुकदमा दर्ज की नौबत क्यों आई और क्या यह सही कदम है? आरोप लगाया गया है कि सेना की गोलीबारी में दो लोगों की मौत हो गई। इसके अनुसार सेना की कार्रवाई से कुछ और लोगों की मौत हो सकती थी लेकिन वे संयोग से बच गए। वैसे इस घटना की न्यायिक जांच के आदेश भी दे दिए गए हैं। घटना शोपियां जिले के गावं गनोवपोरा का है। सेना का काफिला वहां से गुजर रहा था। दरअसल काफिला बड़ा था जिसमें से पांच गाड़ियां पीछे छूट गईं थीं। उस पर लोगों ने पत्थर फेंकने शुरु कर दिए। आरंभ में संख्या कम थी लेकिन धीरे-धीरे उनकी संख्या बढ़ने लगी। सेना की ओर से जवाबी कार्रवाई न देख वे पूरी तरह हमलावर हो गए थे। एक जवान को उन्होंने खींच लिया और उस पर हमला कर दिया। जो कुछ दृश्य दिख रहा है उसमेें साफ है कि सेना ने कार्रवाई न की होती तो पत्थरबाज उन्हें पीट-पीटकर मार डालते। अब सेना के पास दो ही विकल्प था, या तो अपने साथी को उन पत्थरबाजों के हाथों मरता छोड़कर भाग जाती या उसे बचाने के लिए कार्रवाई करती। इनके लिए भागना भी आसान नहीं था। कारण, हमलावरों की संख्या ज्यादा हो गई थी, गाड़ियों पर पत्थर बरस रहे थे, लोग डंडों से भी प्रहार कर रहे थे। पूरे घटनाक्रम का निष्पक्ष विश्लेषण करने वाला कोई भी यह स्वीकार करेगा कि एक विकट स्थिति पैदा हो गई थी जिसमें सेना को कार्रवाई करनी पड़ी।

 जो कोई भी सेना के जवानों को दोष देता है उनसे पूछा जाना चाहिए कि उनकी जगह आप होते तो क्या करते?  सेना के खिलाफ इनका गुस्सा किस कारण था? कुछ दिन पहले उसी गांव में एक आतंकवादी छिपा हुआ था जिसे सेना ने मुठभेड़ में मार दिया था। अगर आतंकवादियों के पक्ष में किसी की हमदर्दी है और वह पत्थरों और डंडों से सेना के काफिले पर हमले के रुप में निकालेगा तो फिर उसका जवाब देना पड़ेगा। जितना फुटेज सामने आया है उसमें देखा जा सकता है कि सेना आरंभ में बल प्रयोग से बच रही है। इसका परिणाम है कि उनकी गाड़ियों के शीशे तक चनक रहे हैं। मौत किसी का हो दुख तो होगा किंतु लोगों को सोचना चाहिए कि आप सेना पर हमला करने आएंगे तो जवाब में आपको फुल नहीं मिलेगा। हमला का मतलब आप अपराध कर रहे हैं, आप हमलावर हैं।  दुर्भाग्य देखिए, प्रदेश की मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती तक ने सेना की कार्रवाई की तीखी आलोचना कर दी। जो खबरें आईं हैं उनके अनुसार उन्होंने तो रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण को फोन करके अपनी नाराजगी व्यक्त की। उनके बयान में पत्थरबाजों के खिलाफ एक भी शब्द नहीं सुना गया। ऐसा ही आचरण उमर अब्दुल्ला का है। ऐसा भी नहीं है कि लोगों के हमले में सेना को क्षति नहीं पहुंची। हिंसक भीड़ के हमले में एक जेसीओ (जूनियर कमीशंड ऑफिसर) समेत सात सैन्यकर्मी घायल हो गए थे। सेना के जवान मर जाएं तो कोई बात नहीं लेकिन आतंकवादियों की समर्थक हिंसक भीड़ के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए!

अलगाववादियों को तो बहाना चाहिए। उन्होंने बंद का आह्वान कर दिया। किंतु मेहबूबा मुफ्ती प्रदेश की मुख्यमंत्री है। प्रदेश की कानून व्यवस्था उनकी जिम्मेवारी है। क्या उन्हें नहीं पता कि 2017 में आतंकवादियों से जूझते हुए 88 जवानों ने अपनी बलि दे दी है? इस वर्ष ही 11 जवान शहीद हो चुके हैं। सेना के जवानों के बलिदान को कोई भूल सकता है क्या?  मेहबूबा मुफ्ती और उनकी पार्टी पीडीपी सरकार में होते हुए भी प्रदेश से सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून यानी अफस्पा हटाने की पक्षधर हैं। नेशनल कॉन्फ्रंेस भी इसकी मांग कर रही है। ये पार्टियां चाहती हैं कि ऐसे आधार बन जाए जिनसे वे केन्द्र पर इसके लिए दबाव बना सकें। इस कानून में सैन्य बलों को कुछ विशेष अधिकार एवं कानूनी सुरक्षा कवच मिले हुए हैं। अगर ऐसा नहीं होगा तो आतंकवाद से लड़ना कठिन हो जाएगा। हम यहां अफस्पा के बहस में नहीं पड़ना चाहते। लेकिन हाल में ऐसी खबर आई है जिसमें कहा गया कि सरकार अफस्पा को थोड़ा सरल और नरम बनाने पर विचार कर रही है। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और केन्द्र सरकार के रवैये को देखते हुए इस पर विश्वास करना संभव भी नहीं कि इस समय वे अफस्पा पर पुनर्विचार करेंगे। थलसेनाध्यक्ष जनरल विपीन रावत ने भी इसकी संभावना से इन्कार किया है। किंतु ऐसी खबरों के पीछे कोई लोग तो हैं।

हमें यह समझना होगा कि सुरक्षा बलों को आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष के स्थलों पर बड़ी कठिनाई में काम करना पड़ता है। बाहर रहकर सेना की आलोचना करना आसान है, लेकिन उनकी जगह स्वयं को रखकर विचार करिए तो  सब कुछ आसानी से समझ में आ जाता है। एक ओर आतंकवादी हैं जिनसे आपको मुठभेड़ करना है, जिनके हमलों से जनता को बचाना है और दूसरी ओर उनके समर्थन में उनका ढाल बने पत्थर उठाए या किसी तरह से खड़े लोग हैं। आपको लोगों को बचाना है और आतंकवादी या आतंकवादियों को पकड़ना या मारना है। इसमें कई बार लोग भी मारे जाते हैं। सेना के जवानों के जो बयान हम टीवी पर देखते हैं उसमें वे कहते हैं कि हम एक भी आम आदमी को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते लेकिन कई बार जब बिल्कुल जान पर बन आती है तो बल प्रयोग करना पड़ता है। आज सेना की कार्रवाइयों का ही प्रतिफल है कि घाटी में पत्थरबाजी में भारी कमी आई है। जम्मू-कश्मीर के पुलिस महानिदेशक ने ही सेना की प्रशंसा करते हुए कुछ दिनों पहले बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि 2017 में पत्थरबाजी में 90 प्रतिशत की कमी आई उसमें सेना के ऑल आउट ऑपरेशन तथा एनआइए द्वारा आतंकी फंडिग के मामले में अलगाववादियों के खिलाफ हुई कार्रवाई की भूमिका है। उन्होंने साफ कहा था कि ऑपरेशन ऑल आउट में बड़े आतंकवादियों के मारे जाने से पत्थरबाजी में कमी आई। अगर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक ऐसी धारणा रखते हैं तो वे सेना के किसी टुकड़ी के खिलाफ आसानी से मुकदमा दर्ज करने के लिए तैयार नहीं होंगे। निश्चय ही इसके पीछे राजनीतिक दबाव होगा। यह दबाव किसका हो सकता है बताने की आवश्यकता नहीं। किंतु देश ऐसे मुकदमे के पक्ष में नहीं हो सकता। इस तरह सेना के जवानों के खिलाफ मुदकमे होंगे तो फिर ऑपरेशन ऑल आउट में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई जो अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच रही है उसमें बाधा उत्पन्न हो जाएगी। यह उनका मनोबल तोड़ने का काम करेगा। हालांकि कोई चारा न देख सेना की ओर से भी प्राथमिकी दर्ज करा दी गई है। इससे एकपक्षीय कार्रवाई संभव नहीं होगा। वैसे भी देश इस मामले में सेना के जवानों के साथ है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

अपेक्षाओं के अनुरुप बजट

 

अवधेश कुमार

वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा प्रस्तुत पांचवे और इस सरकार के अंतिम पूर्ण बजट को कुछ शब्दों में कहना हो तो यही कहा जाएगा कि यह निवेश को प्रोत्साहन देने के साथ रोजगार, शिक्षा, कृषि, गांव एवं स्वास्थ्य पर केन्द्रित है। जीएसटी लागू होने के बाद का यह पहला बजट है। इसलिए इसमें राजकोष के लिए उनके पास परोक्ष करों में ज्यादा परिवर्तन के लिए जगह नहीं थी। जीएसटी से कर देने वालों का दायरा अवश्य बढ़ा है लेकिन करों में बढ़ोत्तरी की जगह कमी आई है। इसलिए सरकार को राजस्व के लिए अन्य रास्ते तलाशने थे। सरकार के पास सीमा शुल्क में परिवर्तन तथा अतिरिक्त आय के लिए अधिभार बढ़ाने का ही विकल्प था। इसके साथ विनिवेश का रास्ता बचता था। दोनों स्तरों पर काम किया गया है। वैसे बजट से तीन दिनों पूर्व पेश आर्थिक सर्वेक्षण मंें ही साफ हो गया था कि सरकार की प्राथमिकताएं क्या रहने वाली हैं। कृषि क्षेत्र की विकास दर 2.1 प्रतिशत तक सीमित रहने की बात की गई थी। यही नहीं निवेश में कमी की वजह से कई क्षेत्रों के एक साथ प्रभावित होने का संदेश भी दिया गया था। आप बजट में इनको मूर्त रुप देने की कोशिश देखेंगे।

सबसे पहले किसान और गांव। इसमें सबसे बड़ी घोषणा खरीद की फसलों को लागत से कम-से-कम डेढ़ गुना कीमत देने का फैसला है। जेटली ने कहा कि किसानों को लागत से डेढ़ गुना कीमत मिले इसे सुनिश्चित करने के लिए बाजार मूल्य और न्यूनतम समर्थन मूल्य में अंतर की रकम सरकार वहन करेगी। बाजार के दाम अगर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम हो तो सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि बाकी पैसे किसानों को दिए जाएं। इसके लिए नीति आयोग व्यवस्था का निर्माण करेगा। इसके साथ ही कृषि कर्ज के लिए 11 लाख करोड़ आवंटित किया गया है।  हमारे देश में 86 प्रतिशत से ज्यादा किसान छोटे या सीमांत किसान हैं। इनके लिए बाजार तक पहुंचना आसान नहीं है। इसलिए सरकार इन्हें ध्यान -रखकर आधारभूत संरचना का निर्माण करेगी। जितने गांव हैं उनको कृषि के बाजारों के साथ बढ़िया सड़क मार्गों से जोड़ने की भी योजना है। टमाटर, आलू, प्याज का इस्तेमाल मौसम के आधार पर होता है। इसे साल भर उपयोग के लिए ऑपरेशन फ्लड की तर्ज पर ऑपरेश ग्रीन लॉन्च की जाएग। 500 करोड़ रुपये इसके लिए रखे जाएंगे। बटाईदारों को बैंकांे से कर्ज नहीं मिला। नीति आयोग ऐसी व्यवस्था बना रहा है कि ऐसे किसानों को कर्ज लेने में सुविधा मिले। कृषि उत्पादों को तैयार करने वाली 100 करोड़ के टर्नओवर वाली कंपनियों को कर में पूरी तरह छूट मिलेगी।

अब आएं रोजगार की ओर। कृषि और गांवों के लिए जो योजनाएं हैं उनमें तो रोजगार सृजन होगा ही। वित्त मंत्री ने बजट में 70 लाख औपचारिक नौकरियों के सृजन की घोषणा की है। कपड़ा और फुटवियर क्षेत्र में 50 लाख युवाओं को 2020 तक प्रशिक्षण दिए जाने की योजना है। कपड़ा क्षेत्र के लिए सरकार ने 6 हजार करोड़ का प्रावधान किया। जेटली ने औपचारिक नौकरियों की जगह स्वरोजगार को सरकार मुख्य लक्ष्य बताया। व्यापार शुरू करने के लिए मुद्रा योजना में 3 लाख करोड़ दिया गया है। 2022 तक हर गरीब को घर देने का लक्ष्य के तहत 1 करोड़ मकान केवल मकान ही नहीं देंगे इसमें व्यापक पैमाने पर रोजगार सृजन होगा। इसी तरह  शहरी क्षेत्रों में 37 लाख मकान बनाने को मंजूरी दी गई है।

इस बजट की सबसे महात्वाकांक्षी और अनूठी घोषणा स्वास्थ्य क्षेत्र की है। नेशनल हेल्थ प्रोटेक्शन योजना के तहत देश के 10 करोड़ परिवार को इलाज के लिए हर साल 5 लाख रुपए का हेल्थ इंश्योरेंस किया जाएगा। माना जा रहा है इससे कुल 50 करोड़ लोगों को फायदा होगा। यह दुनिया का सबसे बड़ा स्वास्थ्य बीमा योजना है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ओबामा की स्वास्थ्य योजना हो ओबामा केयर कहा गया उसी तरह इसे मोदी केयर कहा जाएगा। इसके लिए 12000 करोड़ रुपए की जो मंजूरी दी गई है वह दुनियाभर में अपनी तरह का पहला फंड होगा। अब गरीब परिवारों को हर साल 5 लाख रुपए तक के इलाज पर अपने पैसे खर्च नहीं करने होंगे। बजट में नए 24 मेडिकल कॉलेज एवं अस्पातल खोलने का एलान किया गया है। जेटली ने कहा है कि सरकार का लक्ष्य हर 3 संसदीय क्षेत्र में एक मेडिकल कॉलेज अस्पताल की सुविधा मुहैया कराने पर है।  बजट में सरकार ने टीबी के मरीजों के लिए पोषण के लिए 600 करोड़ के फंड को मंजूरी दी है। इसमें से प्रति मरीज को इलाज तक 500 रुपया प्रति महीना पोषक आहार के लिए मिलेगा। देशभर में 1.50 लाख स्वास्थ्य केन्द्रों में दवा और जांच की मुफ्त सुविधा दी जाएगी।

बजट में शिक्षा के स्तर पर भी चिंता जताते हुए कई बड़े ऐलान किए। सरकार का जोर शिक्षा के विस्तार के साथ गुणवत्ता सुधारने पर है। सरकार प्री नर्सरी से लेकर 12वीं क्लास तक को समग्र रूप से देखना चाहती हैं, जिससे शिक्षा के क्षेत्र में विकास हो सके। 13 लाख से ज्यादा शिक्षकों को ट्रेनिंग दिए जाने का लक्ष्य है। इस लक्ष्य की राह में तकनीकी डिजिटल पोर्टल दीक्षा से मदद मिलेगी इंस्टिट्यूट्स ऑफ एमिनेंस स्थापित करने की योजना। डिजिटल इंटेसिटीसिटी को बढ़ावा दिया जाएगा। एकीकृत बीएड कार्यक्रम भी शुरू होगा। ऐसे प्रखंड जहां आदिवासियों की आबादी 50 प्रतिशत से ज्यादा होगी एकलव्य स्कूलों की स्थापना की जाएगी। ये स्कूल नवोदय की तर्ज पर आवासीय होंगे। इसके अलावा सरकार जिला स्तर के मेडिकल कॉलेज और अस्पतालों को अपग्रेड कर 24 नए मेडिकल कॉलेज और अस्पताल बनाएगी। सरकार प्रधानमंत्री रिसर्च फेलो योजना शुरू करेगी जिसमें 1000 बीटेक छात्र चुने जाएंगे और उन्हें आईआईटी से पीएचडी करने का अवसर दिया जाएगा। इसके अलावा प्लानिंग और आर्किटेक्चर के संस्थान शुरू किए जाएंगे। 18 नई आईआईटी और एनआईआईटी की स्थापना की जाएगी। वडोदरा में रेलवे यूनिवर्सिटी स्थापित करने का प्रस्ताव है।

मध्यम वर्ग के लिए इस मायने में इसे निराशाजनक कहा जा रहा है क्योंकि आयकर में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। हालांकि स्डैंडर्ड डिडक्शन के तहत 40 हजार रुपये की छूट मिलेगी। इसके अलावा 40 हजार रुपये तक का मेडिकल बिल कर मुक्त होगा। कौरपोरेट दुनिया की भी उम्मीद थी कि कॉरपोरेट कर को सबके लिए 30 प्रतिशत की जगह 25 प्रतिशत किया जा सकता है। इससे उनके पास निवेश के लिए और राशि बचेगी। किंतु ऐसा नहीं हुआ तो इसका कारण यही है कि सरकार का खजाना तंगी में है। साथ ही सरकार ने स्वास्थ्य, शिक्षा में अधिभार 1 प्रतिशत बढ़ाकर 3 प्रतिशत से 4 प्रतिशत कर दिया है। इस बढ़ोतरी का असर स्वास्थ्य, शिक्षा से लेकर सभी क्षेत्रों पर पड़ने वाला है। आयकर पर भी 1 प्रतिशत अधिभार लगेगा।

अगर देश चलाना है तो सरकार को धन चाहिए। सीमा शुल्क बढ़ाने की घोषणा की गई है। वित्त मंत्री ने मोबाइल फोन पर सीमा शुल्क 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 20 प्रतिशत और मोबाइल व टीवी पुर्जों पर 15 प्रतिशत तक सीमा शुल्क बढ़ाने की घोषणा की है। इस फैसले से भारत में बिकने वाले सभी कंपनियों के स्मार्टफोन तथा टीवी महंगे होंगे। भले ही कंपनियां भारत में अपने फोन असेंबल कर रही हों, लेकिन इनमें ज्यादातर के कलपूर्जे चीन से ही आते हैं। कुछ ऐसा ही मामला टीवी का भी है। हालांकि वित्त मंत्री ने कहा कि इस कदम से देश में और ज्यादा रोजगारों के सृजन को बढ़ावा मिलेगा। दरअसल इस कदम से आयातित उत्पादों के तुलना में घरेलू उत्पाद सस्ते हो जाएंगे और इसके परिणामस्वरूप मांग काफी बढ़ जाएगी, जिससे आम जनता के लिए और ज्यादा रोजगार अवसर आएंगे। इन क्षेत्रों में घरेलू उद्योगों को बढ़ावा मिले तो अच्छी बात होगी। वित्त मंत्री को पता था कि देश को निवेश प्रोत्साहन की जरुरत है,क्योंकि अर्थव्यवस्था में निवेश का स्तर पिछले डेढ़ वर्षों में न्यूनतम आ चुका है। पिछले बजट में 50 करोड़ तक का व्यापार करने वाली कंपनियों के लिए कॉरपोरेट कर को 30 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत किया गया था। इस बार इसे बढ़ाकर 250 करोड़ कर दिया गया है तो जाहिर है सरकार मध्यम एवं लघु उद्योगों को प्रोत्साहन देना चाह रही है। इससे देश की 99 प्रतिशत बहुत छोटे, छोटे मध्यम उद्योगों को फायदा होगा। जेटली ने कहा कि तीन साल पहले स्टार्ट-अप इंडिया की शुरूआत हुई थी जिसके परिणाम काफी अच्छे निकले। उनके अनुसार छोटे उद्योगों के लिए 3794 करोड़ खर्च करने की योजना है।

इस तरह कुल मिलाकर बजट को हम संतुलित और समय के हिंसाब से अपेक्षाओं के अनुरुप कह सकते हैं। गांवों और कृषि पर जोर देने का अर्थ है कि गांवों के लोगों की क्रय शक्ति बढ़ेगी। कृषि से निराशा को लो आलम है उसे दूर करने में मदद मिलेगी। किसानों की लागत कम हो एवं उचित दाम मिले तथा सही समय पर उनको कर्ज मिल जाए यही तो मुख्य मांग थी। भारत में स्वास्थ्य पर खर्च से लोगों को गरीब होते देखा गया है। इससे मुक्ति मिल जाना बहुत बड़ी बात है। देश को गांव और कृषि केन्द्रित, रोजगारोन्मुखी तथा उद्योग एवं कारोबार को नजरअंदाज न करने वाला बजट चाहिए था। इस पर यह खड़ा उतरता है। इससे विकास दर को भी बढ़ावा मिलेगा जिसकी भारत को बहुत आवश्यकता है।

अवधेश कुमार, इः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

 

 

 

http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/