शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

सेना के जवानों पर मुकदमा उचित नहीं

 

अवधेश कुमार

यह खबर निश्चय ही हर भारतवासी को चिंतित करेगा कि जम्मू कश्मीर पुलिस ने वहां कार्रवाई कर रहे सेना के जवानों पर मुकदमा दर्ज किया है। जिनके खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ है वे जवान 10 गढ़वाल यूनिट के हैं और इनमें एक मेजर स्तर का अधिकारी भी शामिल है। मुकदमा 302 यानी हत्या और 307 यानी हत्या के प्रयास के तथा 336 यानी जिन्दगी को खतरे में डालने वाले के तहत दर्ज हुआ है। पिछले काफी समय से जम्मू कश्मीर पुलिस, सेना, केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल और सीमा सुरक्षा बल के बीच गजब किस्म का समन्वय देखा जा रहा था। कश्मीर में शांति की कामना करने वाले हर व्यक्ति की चाहत है कि यह समन्वय बना रहे और राज्य के अंदर के आतंकवादी तथा सीमा पार से आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले परास्त हों। आपसी समन्वय के कारण ही 2017 में सुरक्षा बलों को बड़ी कामयाबी मिली और 200 से ज्यादा आतंकवादी मारे गए। कई आतंकवादी बने नवजवान वापस आम जिन्दगी में लौटे हैं। इस एक घटना ने समन्वय की स्थिति पर गहरा प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया है। यह प्रश्न उठने लगा है कि सुरक्षा एजेंसियां आपसी तालमेल से जो ऑपरेशन ऑल आउट चला रहीं हैं उनका क्या होगा? क्या पुलिस और सेना के बीच फिर से किसी प्रकार के टकराव के दौर की शुरुआत होगी और आतंकवादी एवं अलगाववादी इसका लाभ उठाएंगे?

ऐसा होता है तो निश्चय ही जम्मू कश्मीर के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा। आखिर सेना के जवानों पर मुकदमा दर्ज की नौबत क्यों आई और क्या यह सही कदम है? आरोप लगाया गया है कि सेना की गोलीबारी में दो लोगों की मौत हो गई। इसके अनुसार सेना की कार्रवाई से कुछ और लोगों की मौत हो सकती थी लेकिन वे संयोग से बच गए। वैसे इस घटना की न्यायिक जांच के आदेश भी दे दिए गए हैं। घटना शोपियां जिले के गावं गनोवपोरा का है। सेना का काफिला वहां से गुजर रहा था। दरअसल काफिला बड़ा था जिसमें से पांच गाड़ियां पीछे छूट गईं थीं। उस पर लोगों ने पत्थर फेंकने शुरु कर दिए। आरंभ में संख्या कम थी लेकिन धीरे-धीरे उनकी संख्या बढ़ने लगी। सेना की ओर से जवाबी कार्रवाई न देख वे पूरी तरह हमलावर हो गए थे। एक जवान को उन्होंने खींच लिया और उस पर हमला कर दिया। जो कुछ दृश्य दिख रहा है उसमेें साफ है कि सेना ने कार्रवाई न की होती तो पत्थरबाज उन्हें पीट-पीटकर मार डालते। अब सेना के पास दो ही विकल्प था, या तो अपने साथी को उन पत्थरबाजों के हाथों मरता छोड़कर भाग जाती या उसे बचाने के लिए कार्रवाई करती। इनके लिए भागना भी आसान नहीं था। कारण, हमलावरों की संख्या ज्यादा हो गई थी, गाड़ियों पर पत्थर बरस रहे थे, लोग डंडों से भी प्रहार कर रहे थे। पूरे घटनाक्रम का निष्पक्ष विश्लेषण करने वाला कोई भी यह स्वीकार करेगा कि एक विकट स्थिति पैदा हो गई थी जिसमें सेना को कार्रवाई करनी पड़ी।

 जो कोई भी सेना के जवानों को दोष देता है उनसे पूछा जाना चाहिए कि उनकी जगह आप होते तो क्या करते?  सेना के खिलाफ इनका गुस्सा किस कारण था? कुछ दिन पहले उसी गांव में एक आतंकवादी छिपा हुआ था जिसे सेना ने मुठभेड़ में मार दिया था। अगर आतंकवादियों के पक्ष में किसी की हमदर्दी है और वह पत्थरों और डंडों से सेना के काफिले पर हमले के रुप में निकालेगा तो फिर उसका जवाब देना पड़ेगा। जितना फुटेज सामने आया है उसमें देखा जा सकता है कि सेना आरंभ में बल प्रयोग से बच रही है। इसका परिणाम है कि उनकी गाड़ियों के शीशे तक चनक रहे हैं। मौत किसी का हो दुख तो होगा किंतु लोगों को सोचना चाहिए कि आप सेना पर हमला करने आएंगे तो जवाब में आपको फुल नहीं मिलेगा। हमला का मतलब आप अपराध कर रहे हैं, आप हमलावर हैं।  दुर्भाग्य देखिए, प्रदेश की मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती तक ने सेना की कार्रवाई की तीखी आलोचना कर दी। जो खबरें आईं हैं उनके अनुसार उन्होंने तो रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण को फोन करके अपनी नाराजगी व्यक्त की। उनके बयान में पत्थरबाजों के खिलाफ एक भी शब्द नहीं सुना गया। ऐसा ही आचरण उमर अब्दुल्ला का है। ऐसा भी नहीं है कि लोगों के हमले में सेना को क्षति नहीं पहुंची। हिंसक भीड़ के हमले में एक जेसीओ (जूनियर कमीशंड ऑफिसर) समेत सात सैन्यकर्मी घायल हो गए थे। सेना के जवान मर जाएं तो कोई बात नहीं लेकिन आतंकवादियों की समर्थक हिंसक भीड़ के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए!

अलगाववादियों को तो बहाना चाहिए। उन्होंने बंद का आह्वान कर दिया। किंतु मेहबूबा मुफ्ती प्रदेश की मुख्यमंत्री है। प्रदेश की कानून व्यवस्था उनकी जिम्मेवारी है। क्या उन्हें नहीं पता कि 2017 में आतंकवादियों से जूझते हुए 88 जवानों ने अपनी बलि दे दी है? इस वर्ष ही 11 जवान शहीद हो चुके हैं। सेना के जवानों के बलिदान को कोई भूल सकता है क्या?  मेहबूबा मुफ्ती और उनकी पार्टी पीडीपी सरकार में होते हुए भी प्रदेश से सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून यानी अफस्पा हटाने की पक्षधर हैं। नेशनल कॉन्फ्रंेस भी इसकी मांग कर रही है। ये पार्टियां चाहती हैं कि ऐसे आधार बन जाए जिनसे वे केन्द्र पर इसके लिए दबाव बना सकें। इस कानून में सैन्य बलों को कुछ विशेष अधिकार एवं कानूनी सुरक्षा कवच मिले हुए हैं। अगर ऐसा नहीं होगा तो आतंकवाद से लड़ना कठिन हो जाएगा। हम यहां अफस्पा के बहस में नहीं पड़ना चाहते। लेकिन हाल में ऐसी खबर आई है जिसमें कहा गया कि सरकार अफस्पा को थोड़ा सरल और नरम बनाने पर विचार कर रही है। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और केन्द्र सरकार के रवैये को देखते हुए इस पर विश्वास करना संभव भी नहीं कि इस समय वे अफस्पा पर पुनर्विचार करेंगे। थलसेनाध्यक्ष जनरल विपीन रावत ने भी इसकी संभावना से इन्कार किया है। किंतु ऐसी खबरों के पीछे कोई लोग तो हैं।

हमें यह समझना होगा कि सुरक्षा बलों को आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष के स्थलों पर बड़ी कठिनाई में काम करना पड़ता है। बाहर रहकर सेना की आलोचना करना आसान है, लेकिन उनकी जगह स्वयं को रखकर विचार करिए तो  सब कुछ आसानी से समझ में आ जाता है। एक ओर आतंकवादी हैं जिनसे आपको मुठभेड़ करना है, जिनके हमलों से जनता को बचाना है और दूसरी ओर उनके समर्थन में उनका ढाल बने पत्थर उठाए या किसी तरह से खड़े लोग हैं। आपको लोगों को बचाना है और आतंकवादी या आतंकवादियों को पकड़ना या मारना है। इसमें कई बार लोग भी मारे जाते हैं। सेना के जवानों के जो बयान हम टीवी पर देखते हैं उसमें वे कहते हैं कि हम एक भी आम आदमी को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते लेकिन कई बार जब बिल्कुल जान पर बन आती है तो बल प्रयोग करना पड़ता है। आज सेना की कार्रवाइयों का ही प्रतिफल है कि घाटी में पत्थरबाजी में भारी कमी आई है। जम्मू-कश्मीर के पुलिस महानिदेशक ने ही सेना की प्रशंसा करते हुए कुछ दिनों पहले बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि 2017 में पत्थरबाजी में 90 प्रतिशत की कमी आई उसमें सेना के ऑल आउट ऑपरेशन तथा एनआइए द्वारा आतंकी फंडिग के मामले में अलगाववादियों के खिलाफ हुई कार्रवाई की भूमिका है। उन्होंने साफ कहा था कि ऑपरेशन ऑल आउट में बड़े आतंकवादियों के मारे जाने से पत्थरबाजी में कमी आई। अगर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक ऐसी धारणा रखते हैं तो वे सेना के किसी टुकड़ी के खिलाफ आसानी से मुकदमा दर्ज करने के लिए तैयार नहीं होंगे। निश्चय ही इसके पीछे राजनीतिक दबाव होगा। यह दबाव किसका हो सकता है बताने की आवश्यकता नहीं। किंतु देश ऐसे मुकदमे के पक्ष में नहीं हो सकता। इस तरह सेना के जवानों के खिलाफ मुदकमे होंगे तो फिर ऑपरेशन ऑल आउट में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई जो अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच रही है उसमें बाधा उत्पन्न हो जाएगी। यह उनका मनोबल तोड़ने का काम करेगा। हालांकि कोई चारा न देख सेना की ओर से भी प्राथमिकी दर्ज करा दी गई है। इससे एकपक्षीय कार्रवाई संभव नहीं होगा। वैसे भी देश इस मामले में सेना के जवानों के साथ है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

अपेक्षाओं के अनुरुप बजट

 

अवधेश कुमार

वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा प्रस्तुत पांचवे और इस सरकार के अंतिम पूर्ण बजट को कुछ शब्दों में कहना हो तो यही कहा जाएगा कि यह निवेश को प्रोत्साहन देने के साथ रोजगार, शिक्षा, कृषि, गांव एवं स्वास्थ्य पर केन्द्रित है। जीएसटी लागू होने के बाद का यह पहला बजट है। इसलिए इसमें राजकोष के लिए उनके पास परोक्ष करों में ज्यादा परिवर्तन के लिए जगह नहीं थी। जीएसटी से कर देने वालों का दायरा अवश्य बढ़ा है लेकिन करों में बढ़ोत्तरी की जगह कमी आई है। इसलिए सरकार को राजस्व के लिए अन्य रास्ते तलाशने थे। सरकार के पास सीमा शुल्क में परिवर्तन तथा अतिरिक्त आय के लिए अधिभार बढ़ाने का ही विकल्प था। इसके साथ विनिवेश का रास्ता बचता था। दोनों स्तरों पर काम किया गया है। वैसे बजट से तीन दिनों पूर्व पेश आर्थिक सर्वेक्षण मंें ही साफ हो गया था कि सरकार की प्राथमिकताएं क्या रहने वाली हैं। कृषि क्षेत्र की विकास दर 2.1 प्रतिशत तक सीमित रहने की बात की गई थी। यही नहीं निवेश में कमी की वजह से कई क्षेत्रों के एक साथ प्रभावित होने का संदेश भी दिया गया था। आप बजट में इनको मूर्त रुप देने की कोशिश देखेंगे।

सबसे पहले किसान और गांव। इसमें सबसे बड़ी घोषणा खरीद की फसलों को लागत से कम-से-कम डेढ़ गुना कीमत देने का फैसला है। जेटली ने कहा कि किसानों को लागत से डेढ़ गुना कीमत मिले इसे सुनिश्चित करने के लिए बाजार मूल्य और न्यूनतम समर्थन मूल्य में अंतर की रकम सरकार वहन करेगी। बाजार के दाम अगर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम हो तो सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि बाकी पैसे किसानों को दिए जाएं। इसके लिए नीति आयोग व्यवस्था का निर्माण करेगा। इसके साथ ही कृषि कर्ज के लिए 11 लाख करोड़ आवंटित किया गया है।  हमारे देश में 86 प्रतिशत से ज्यादा किसान छोटे या सीमांत किसान हैं। इनके लिए बाजार तक पहुंचना आसान नहीं है। इसलिए सरकार इन्हें ध्यान -रखकर आधारभूत संरचना का निर्माण करेगी। जितने गांव हैं उनको कृषि के बाजारों के साथ बढ़िया सड़क मार्गों से जोड़ने की भी योजना है। टमाटर, आलू, प्याज का इस्तेमाल मौसम के आधार पर होता है। इसे साल भर उपयोग के लिए ऑपरेशन फ्लड की तर्ज पर ऑपरेश ग्रीन लॉन्च की जाएग। 500 करोड़ रुपये इसके लिए रखे जाएंगे। बटाईदारों को बैंकांे से कर्ज नहीं मिला। नीति आयोग ऐसी व्यवस्था बना रहा है कि ऐसे किसानों को कर्ज लेने में सुविधा मिले। कृषि उत्पादों को तैयार करने वाली 100 करोड़ के टर्नओवर वाली कंपनियों को कर में पूरी तरह छूट मिलेगी।

अब आएं रोजगार की ओर। कृषि और गांवों के लिए जो योजनाएं हैं उनमें तो रोजगार सृजन होगा ही। वित्त मंत्री ने बजट में 70 लाख औपचारिक नौकरियों के सृजन की घोषणा की है। कपड़ा और फुटवियर क्षेत्र में 50 लाख युवाओं को 2020 तक प्रशिक्षण दिए जाने की योजना है। कपड़ा क्षेत्र के लिए सरकार ने 6 हजार करोड़ का प्रावधान किया। जेटली ने औपचारिक नौकरियों की जगह स्वरोजगार को सरकार मुख्य लक्ष्य बताया। व्यापार शुरू करने के लिए मुद्रा योजना में 3 लाख करोड़ दिया गया है। 2022 तक हर गरीब को घर देने का लक्ष्य के तहत 1 करोड़ मकान केवल मकान ही नहीं देंगे इसमें व्यापक पैमाने पर रोजगार सृजन होगा। इसी तरह  शहरी क्षेत्रों में 37 लाख मकान बनाने को मंजूरी दी गई है।

इस बजट की सबसे महात्वाकांक्षी और अनूठी घोषणा स्वास्थ्य क्षेत्र की है। नेशनल हेल्थ प्रोटेक्शन योजना के तहत देश के 10 करोड़ परिवार को इलाज के लिए हर साल 5 लाख रुपए का हेल्थ इंश्योरेंस किया जाएगा। माना जा रहा है इससे कुल 50 करोड़ लोगों को फायदा होगा। यह दुनिया का सबसे बड़ा स्वास्थ्य बीमा योजना है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ओबामा की स्वास्थ्य योजना हो ओबामा केयर कहा गया उसी तरह इसे मोदी केयर कहा जाएगा। इसके लिए 12000 करोड़ रुपए की जो मंजूरी दी गई है वह दुनियाभर में अपनी तरह का पहला फंड होगा। अब गरीब परिवारों को हर साल 5 लाख रुपए तक के इलाज पर अपने पैसे खर्च नहीं करने होंगे। बजट में नए 24 मेडिकल कॉलेज एवं अस्पातल खोलने का एलान किया गया है। जेटली ने कहा है कि सरकार का लक्ष्य हर 3 संसदीय क्षेत्र में एक मेडिकल कॉलेज अस्पताल की सुविधा मुहैया कराने पर है।  बजट में सरकार ने टीबी के मरीजों के लिए पोषण के लिए 600 करोड़ के फंड को मंजूरी दी है। इसमें से प्रति मरीज को इलाज तक 500 रुपया प्रति महीना पोषक आहार के लिए मिलेगा। देशभर में 1.50 लाख स्वास्थ्य केन्द्रों में दवा और जांच की मुफ्त सुविधा दी जाएगी।

बजट में शिक्षा के स्तर पर भी चिंता जताते हुए कई बड़े ऐलान किए। सरकार का जोर शिक्षा के विस्तार के साथ गुणवत्ता सुधारने पर है। सरकार प्री नर्सरी से लेकर 12वीं क्लास तक को समग्र रूप से देखना चाहती हैं, जिससे शिक्षा के क्षेत्र में विकास हो सके। 13 लाख से ज्यादा शिक्षकों को ट्रेनिंग दिए जाने का लक्ष्य है। इस लक्ष्य की राह में तकनीकी डिजिटल पोर्टल दीक्षा से मदद मिलेगी इंस्टिट्यूट्स ऑफ एमिनेंस स्थापित करने की योजना। डिजिटल इंटेसिटीसिटी को बढ़ावा दिया जाएगा। एकीकृत बीएड कार्यक्रम भी शुरू होगा। ऐसे प्रखंड जहां आदिवासियों की आबादी 50 प्रतिशत से ज्यादा होगी एकलव्य स्कूलों की स्थापना की जाएगी। ये स्कूल नवोदय की तर्ज पर आवासीय होंगे। इसके अलावा सरकार जिला स्तर के मेडिकल कॉलेज और अस्पतालों को अपग्रेड कर 24 नए मेडिकल कॉलेज और अस्पताल बनाएगी। सरकार प्रधानमंत्री रिसर्च फेलो योजना शुरू करेगी जिसमें 1000 बीटेक छात्र चुने जाएंगे और उन्हें आईआईटी से पीएचडी करने का अवसर दिया जाएगा। इसके अलावा प्लानिंग और आर्किटेक्चर के संस्थान शुरू किए जाएंगे। 18 नई आईआईटी और एनआईआईटी की स्थापना की जाएगी। वडोदरा में रेलवे यूनिवर्सिटी स्थापित करने का प्रस्ताव है।

मध्यम वर्ग के लिए इस मायने में इसे निराशाजनक कहा जा रहा है क्योंकि आयकर में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। हालांकि स्डैंडर्ड डिडक्शन के तहत 40 हजार रुपये की छूट मिलेगी। इसके अलावा 40 हजार रुपये तक का मेडिकल बिल कर मुक्त होगा। कौरपोरेट दुनिया की भी उम्मीद थी कि कॉरपोरेट कर को सबके लिए 30 प्रतिशत की जगह 25 प्रतिशत किया जा सकता है। इससे उनके पास निवेश के लिए और राशि बचेगी। किंतु ऐसा नहीं हुआ तो इसका कारण यही है कि सरकार का खजाना तंगी में है। साथ ही सरकार ने स्वास्थ्य, शिक्षा में अधिभार 1 प्रतिशत बढ़ाकर 3 प्रतिशत से 4 प्रतिशत कर दिया है। इस बढ़ोतरी का असर स्वास्थ्य, शिक्षा से लेकर सभी क्षेत्रों पर पड़ने वाला है। आयकर पर भी 1 प्रतिशत अधिभार लगेगा।

अगर देश चलाना है तो सरकार को धन चाहिए। सीमा शुल्क बढ़ाने की घोषणा की गई है। वित्त मंत्री ने मोबाइल फोन पर सीमा शुल्क 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 20 प्रतिशत और मोबाइल व टीवी पुर्जों पर 15 प्रतिशत तक सीमा शुल्क बढ़ाने की घोषणा की है। इस फैसले से भारत में बिकने वाले सभी कंपनियों के स्मार्टफोन तथा टीवी महंगे होंगे। भले ही कंपनियां भारत में अपने फोन असेंबल कर रही हों, लेकिन इनमें ज्यादातर के कलपूर्जे चीन से ही आते हैं। कुछ ऐसा ही मामला टीवी का भी है। हालांकि वित्त मंत्री ने कहा कि इस कदम से देश में और ज्यादा रोजगारों के सृजन को बढ़ावा मिलेगा। दरअसल इस कदम से आयातित उत्पादों के तुलना में घरेलू उत्पाद सस्ते हो जाएंगे और इसके परिणामस्वरूप मांग काफी बढ़ जाएगी, जिससे आम जनता के लिए और ज्यादा रोजगार अवसर आएंगे। इन क्षेत्रों में घरेलू उद्योगों को बढ़ावा मिले तो अच्छी बात होगी। वित्त मंत्री को पता था कि देश को निवेश प्रोत्साहन की जरुरत है,क्योंकि अर्थव्यवस्था में निवेश का स्तर पिछले डेढ़ वर्षों में न्यूनतम आ चुका है। पिछले बजट में 50 करोड़ तक का व्यापार करने वाली कंपनियों के लिए कॉरपोरेट कर को 30 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत किया गया था। इस बार इसे बढ़ाकर 250 करोड़ कर दिया गया है तो जाहिर है सरकार मध्यम एवं लघु उद्योगों को प्रोत्साहन देना चाह रही है। इससे देश की 99 प्रतिशत बहुत छोटे, छोटे मध्यम उद्योगों को फायदा होगा। जेटली ने कहा कि तीन साल पहले स्टार्ट-अप इंडिया की शुरूआत हुई थी जिसके परिणाम काफी अच्छे निकले। उनके अनुसार छोटे उद्योगों के लिए 3794 करोड़ खर्च करने की योजना है।

इस तरह कुल मिलाकर बजट को हम संतुलित और समय के हिंसाब से अपेक्षाओं के अनुरुप कह सकते हैं। गांवों और कृषि पर जोर देने का अर्थ है कि गांवों के लोगों की क्रय शक्ति बढ़ेगी। कृषि से निराशा को लो आलम है उसे दूर करने में मदद मिलेगी। किसानों की लागत कम हो एवं उचित दाम मिले तथा सही समय पर उनको कर्ज मिल जाए यही तो मुख्य मांग थी। भारत में स्वास्थ्य पर खर्च से लोगों को गरीब होते देखा गया है। इससे मुक्ति मिल जाना बहुत बड़ी बात है। देश को गांव और कृषि केन्द्रित, रोजगारोन्मुखी तथा उद्योग एवं कारोबार को नजरअंदाज न करने वाला बजट चाहिए था। इस पर यह खड़ा उतरता है। इससे विकास दर को भी बढ़ावा मिलेगा जिसकी भारत को बहुत आवश्यकता है।

अवधेश कुमार, इः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

 

 

 

शनिवार, 27 जनवरी 2018

मेहबूबा की इस अपील का मतलब क्या है

 

अवधेश कुमार

जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती एक ही साथ भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पाकिस्तान से अपील की है कि जम्मू-कश्मीर को जंग का अखाड़ा मत बनाइए। उन्होंने कहा है कि सीमा पर खून की होली चल रही है। महबूबा ने नए पुलिस कॉन्स्टेबलों की पासिंग आउट परेड में शिरकत करते हुए ये बातें कहीं। महबूबा ने कहा कि प्रधानमंत्री कहते हैं कि देश को विकास के रास्ते पर चलना चाहिए, लेकिन हमारे राज्य में इसका ठीक उल्टा हो रहा है। उन्हांेने कहा कि मैं प्रधानमंत्री और पाकिस्तान से अपील करती हूं कि जम्मू और कश्मीर को जंग का अखाड़ा मत बनाइए, दोस्ती का पुल बनाइए। पहली नजर में ऐसा लगता है कि मेहबूबा मुफ्ती भावुक होकर ऐसी अपील कर रही हैं जिनके पीछे खून-खराबा का अंत और शांति स्थापित करने की मानवीय कामना है। देश का एक-एक व्यक्ति चाहेगा कि जम्मू कश्मीर के अंदर एवं उससे लगी नियंत्रण रेखा एवं अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर शांति स्थापित हो। लेकिन क्या यह एकपक्षीय तरीक से संभव है? अगर भारत के चाहने से यह संभव होता तो कब का हो चुका होता। जम्मू कश्मीर के लोग आज शांति और अमन की जिन्दगी जी रहे होते तथा भारत और पाकिस्तान दोस्ती कि मिसाल होते। ऐसा नहीं हुआ तो उसमें भारत कहीं भी कारण नहीं है। यहीं पर मेहबूबा की अपील पर प्रश्न खड़ा हो जाता है।

वो जम्मू कश्मीर प्रदेश की मुख्यमंत्री हैं। इस नाते उनको प्रदेश के अंदर तथा सीमा पर जो कुछ हो रहा है उसका और उसके पीछे की ताकतों के बारे में पूरा सच पता है। बावजूद इसके यदि वो एक ही सांस में भारत के प्रधानमंत्री और पाकिस्तान का नाम लेतीं हैं तो इसे क्या कहा जा सकता है? क्या अंतर्राष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा पर युद्धविराम का उल्लंघन भारत कर रहा है? अगर नहीं तो फिर भारतीय प्रधानमंत्री से अपील  क्यों? यह प्रश्न इसलिए बनता है क्योंकि 19 जनवरी से बिना किसी उकसावे के जिस तरह पाकिस्तान की ओर से गोलीबारी हुई है और वह भी रिहायशी इलाके में वर्तमान समस्या उससे पैदा हुई है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगने वाले पांच जिलों जम्मू, कठुआ, सांबा, पूंछ और राजौरी में पाकिस्तान की गोलीबारी से 11 जानें जा चुकी हैं। इनमें छह नागरिक, तीन सेना के और दो बीएसएफ जवान शामिल हैं। स्वयं जम्मू कश्मीर पुलिस जो मेहबूबा के अंदर काम करती है उसका बयान है कि अखनूर से लेकर आरएस पुरा तक पाकिस्तानी रेंजर्स ने बिना किसी कारण के अंधाधुंध गोलाबारी कर भारतीय नागरिकों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। रिहायशी इलाकों में की गई अंधाधुंध गोलाबारी में कई मवेशी भी मारे गए हैं। आज हालत यह है कि जम्मू कश्मीर पुलिस स्वयं लाउडस्पीकर से लोगों को अपना इलाका छोड़ने की अपील कर रही है। वास्तव में पाकिस्तान की ओर से लगातार गोलाबारी से हालात बिगड़ने के बाद जम्मू कश्मीर पुलिस ने रेड अलर्ट जारी किया है और सीमावर्ती इलाकों के बाशिंदों से अपने-अपने इलाकों से जाने को कहा है। जम्मू कश्मीर पुलिस ने एक परामर्श में कहा कि प्रशासन ने समूचे इलाके (जम्मू क्षेत्र) में रेड अलर्ट जारी किया है और लोगों को वहां से जाने को कहा है।

आज का सच यह है कि जम्मू के सीमावर्ती इलाकों में अनेक गांव सुनसान हो गए हैं। इलाके में लगातार गोलाबारी से बुरी तरह परेशान लोग सुरक्षा के लिए पलायन कर रहे हैं। संघर्ष विराम उल्लंघन के चलते सीमावर्ती बस्तियों से करीब 50,000 से अधिक लोगों को पलायन करना पड़ा है। लोगों को उनकी बस्तियों से निकालकर सुरक्षित जगह पहुंचाना भी इस समय एक चुनौती बन गया है। जब रिहायशी इलाकों पर अंधाधुंध गोलीबारी होगी तो फिर लोगों को निकालना स्वाभाविक ही कठिन हो जाता है। पता नहीं किसे कब गोली लग जाए, कहां गोला गिर जाए.....। ऐसा हो भी रहा है। लोग निकलेंगे तो अपना कुछ सामान तथा अपने मवेशियों को लेकर ही जाएंगे। अपने स्थायी वास से किसी के लिए अचानक पलायन करना कितना कठिन हो सकता है इसका अनुमान आप स्वतः लगा सकते हैं वह भी सीमा पार से हो रही अंधाधुंध गोलीबारी के बीच। प्रशासन ने जम्मू क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा से लगे इलाकों में 300 से अधिक शैक्षणिक संस्थानों को बंद कर दिया है। यह नौबत क्यों आई है? साफ है कि समस्या हमारी ओर से है ही नहीं। जो कुछ है वह पाकिस्तान की ओर से है।

इसमें यदि मेहबूबा मुफ्ती एक साथ भारत के प्रधानमंत्री एवं पाकिस्तान का नाम लेती हैं तो उनके इरादे पर संदेह होना स्वाभाविक है। अगर इसकी जगह वो पाकिस्तान को दुत्कारतीं तो देश को अच्छा लगता एवं यह व्यावहारिक भी होता। यदि वो पाकिस्तान को ललकारते हुए कहतीं कि आप इस तरह बिना उकसावे के हमारी ओर गोलीबारी करेंगे तो फिर हमें भी आपको आपकी भाषा में जवाब देने को मजबूर होना पड़ेगा तो उनको पूरे भारत का समर्थन मिलता। इसके विपरीत मेहबूबा के बयान से ऐसी ध्वनि निकलती है मानो इसमें भारत भी पाकिस्तान की तरह बराबर का हिस्सेदार है। मोदी विकास की बात अवश्य करते हैं, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि कोई हम पर गोलीबारी करे और हम उसको जवाब में केवल फूल भेजें। भारत ने दोस्ती की भी कोशिश की लेकिन अपने नागरिकों और जवानों की कीमत पर नहीं। क्या मेहबूबा यह नहीं जानतीं कि पाकिस्तान ने पिछले वर्ष 860 बार युद्धविराम का उल्लंघन कियां? यह अपने-आपमें एक रिकॉर्ड है। कोई देश इतनी बड़ी संख्या में युद्धविराम का उल्लंघन करें यानी बिना उकसावे के गोलीबारी करे तो फिर उसके साथ दोस्ती का पुल कैसे बन सकता है जिसकी अपील मेहबूबा कर रहीं हैं। हमारे प्रधानमंत्री ने तो अपने शपथग्रहण समारोह मेें ही दक्षिण एशिया के सारे नेताओं को आमंत्रित कर शुरुआत ही दोस्ती के पैगाम से किया था। क्या हुआ उसका परिणाम? बिना पूर्व कार्यक्रम के केवल तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के जन्म दिवस पर लाहौर चले गए और उनके घर पर बैठकर बातचीत की, उनकी मां के चरण छुए। इससे ज्यादा दोस्ती का पुल बनाने के लिए कोई कर सकता है? लेकिन जवाब में जब उड़ी होगा, पठानकोट होगा, गुरुदासपुर होगा तो दोस्ती की पुल नहीं बन सकती। इससे तो बने बनाए पुल ढह जाएंगे। वही हुआ है।

वास्तव में मेहबूबा को समझना होगा कि भारत पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद और हिंसावाद से पीड़ित होकर मजबूरी में हिंसक जवाब देता है। हमें सर्जिकल स्ट्राइक क्यों करना पड़ा? आप यदि आतंकवादियों को बाजाब्ता प्रशिक्षण देेने के लिए शिविर सहित सारी सुविधाएं देंगे..उनको घुसपैठ कराने के लिए गोलीबारी करेंगे और जब तक उनकी घुसपैठ न हो जाए उन्हें आश्रय भी देंगे तो ऐसी कार्रवाई करनी होगी। यह अपनी रक्षा के लिए हिंसक होना है। पाकिस्तान ने भारत के पास तीन ही विकल्प छोड़ा है, या तो आप आतंकवादियों एवं उनकी सेना, रेंजर की मार झेलिए या फिर इनका हिंसक प्रतिकार करिए या उनके होने वाले हमले का पूर्वानुमान कर उसे रोकने के लिए कार्रवाई कर दीजिए। इसमें दोस्ती का विकल्प है ही नही। यही भारत कर रहा है। अभी ही भारत ने पाकिस्तानी गोलीबारी का माकूल जवाब दिया है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक भारत द्वारा पाकिस्तान के सात जवानों को मार गिराने, अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे पाकिस्तान की चार सीमा चौकियों को तबाह करने तथा वहां की सेना का एक पेट्रोलियम डिपो नष्ट करने की सूचना है। पाकिस्तान मीडिया में कहा जा रहा है कि भारत की गोलीबारी में अनेक आम नागरिक मारे गए और काफी बड़े इलाके में तबाही हुई। अगर पाकिस्तान अपनी हरकत से बाज नहीं आता तो ऐसी कार्रवाई हमें और करनी पड़ेगी। बीएसएफ के महानिदेशक केके शर्मा ने साफ कहा है कि बीएसएफ कभी शुरुआत नहीं करती लेकिन हमला हो तो जवाब देना हमें आता है। ऐसी स्थिति में मेहबूबा की यह अपील हर दृष्टि से केवल अस्वीकार्य नहीं है आपत्तिजनक भी है। हिसंा और अशांति पैदा करने के मामले में पाकिस्तान एक विकृत मानसिकता वाले खलनायक की तरह है जिससे आज की स्थिति में दोस्ती की पुल संभव नहीं। जब तक वह कश्मीर में हिंसा पैदा करके उसे भारत से अलग करने की अपनी खतरनाक सोच से बाहर नहीं आता उसके रवैये में परिवर्तन मुश्किल है। मेहबूबा यह बात अच्छी तरह जानतीं हैं। बावजूद इसके यदि वो इस तरह दोनों देशों को एक ही पलड़े में रखकर अपील कर रही है तो फिर उनके पूछना ही होगा कि मैडम, आपका इरादा क्या है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

शनिवार, 20 जनवरी 2018

हज सब्सिडी खत्म करने का औचित्य

 

अवधेश कुमार

सरकार द्वारा हज यात्रा पर वर्षों से दी जाने वाली सब्सिडी खत्म करने को लेकर देश में स्वाभाविक ही दो राय बन गए हैं। एक राय है कि यह कदम उचित है। किसी समुदाय के व्यक्तियों के धार्मिक कर्मकांड पर सरकार धन क्यों खर्च करे। इसके समानांतर दूसरा तर्क यह है कि जो संपन्न हैं वो तो आराम से हज यात्रा पर चले जाते है। उनका इससे कुछ नहीं बिगड़ेगा जो कुछ असर होगा वो गरीबों पर होगा जो सब्सिडी के कारण हज की अपनी चाहत को पूरी कर लेते थे। इस फैसले के बावजूद इस बाद सबसे ज्यादा करीब 1 लाख 75 हजार लोग हज यात्रा पर बिना सब्सिडी के जाएंगे। आजादी के बाद ऐसा पहली बार होगा। इस नाते यह कदम बहुत बड़ा है। हज के लिए सब्सिडी दिया जाना सही था या नहीं और इसे समाप्त करने के कदम को सही माना जाए या गलत इस पर विचार करने के पहले कुछ अन्य पहलुओं पर विचार करना जरुरी है।

वास्तव में हज सब्सिडी हटाना मोदी सरकार की समग्र हज नीति का एक अंग है। सरकार पिछले वर्ष से हज नीति में बदलाव और उसे व्यावहारिक एवं सबके लिए अनुकूल बनाने पर काम कर रही थी। इस बात का संकेत उसके विचार-विमर्श में ही मिल गया था कि सब्सिडी खत्म की जाएगी। अल्पसंकख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने हज नीति के लिए होने वाली बैठकों में इसका साफ संकेत दे दिया था। दरअसल, 2012 में ही उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने फैसला दिया था कि हज सब्सिदी को अगले दस वर्षों के अंदर खत्म कर दिया जाए। उसने यह भी कहा था कि हज के लिए सब्स्डिी देना वास्तव में मुसलमानों को लालच देने के समान है। इसलिए इसे जारी नहीं रखना चाहिए। तो उच्चतम न्यायालय के आदेश के अनुसार इसे खत्म होना ही था। पूर्व सरकार ने इस दिशा में कुछ नहीं किया। कहा जा सकता है कि 10 वर्ष पूरा होने में अभी चार वर्ष बाकी था। किंतु 10 वर्ष अंतिम समय सीमा थी। जो लोग यह तर्क दे रहे हैं कि इसे 10 वर्ष में खत्म करना था, सरकार ने चार वर्ष पहले ही खत्म कर दिया वो उच्चतम न्यायालय की पूरी टिप्पणी को ध्यान में नहीं ला रहे।

अक्टूबर 2017 मे केन्द्र सरकार ने जो नई हज नीति पेश की उसमें हज सब्सिडी खत्म करने तथा और 45 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को बिना मेहरम के हज पर जाने की इजाजत देने का प्रस्ताव साफ तौर पर उल्लिखित था। 45 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के बिना मेहरम के हज पर जाने की घोषणा हो चुकी है। मेहरम उसे कहते हैं जिससे महिला का निकाह नहीं हो सकता। मसलन, पिता, सगा भाई, बेटा और पौत्र-नवासा मेहरम हो सकते हैं। यह अकेली या अकेली जाने की इच्छा रखने वाली महिलाओं के मार्ग की बड़ी बाधा थी जो खत्म हो गई है। भारत से करीब 1300 महिलाएं इस बार बिना मेहरम के हज यात्रा करेंगी। इसी में हवाई मार्ग के साथ समुद्री मार्ग से भी यात्रा के विकल्प पर काम करने की बात थी। 1995 से समुदी्र रास्ते का विकल्प बंद हो गया था। अब सऊदी अरब सरकार से समझौते के बाद यह फिर से आरंभ हो रहा है। हज नीति में कहा गया था कि पोत कंपनियों की रुचि और सेवा की थाह लेने के लिए विज्ञापन दिया जाएगा। समुद्री मार्ग से यात्रा वैसे भी कम खर्चीला होगा। पहले समुद्र के रास्ते हज यात्रा में 12 से 15 दिनों का समय लगता था, लेकिन अब तीन से चार दिन में यात्रा पूरी हो जाएगी। एक तरफ का रास्ता 23 सौ नाटिकल मील का है। 1995 में मुंबई के यलो गेट से सऊदी अरब के जेद्दाह तक जल मार्ग पर यात्रा होती थी। नई हज नीति में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए हज कोटे का प्रावधान उनके यहां की मुस्लिम आबादी के अनुपात में किए जाने का प्रावधान है जो उचित ही है। नई हज नीति में हज समिति और निजी टूर ऑपरेटरों के जरिये जाने वाले हज यात्रियों के अनुपात को भी स्पष्ट किया गया है। अब कुल कोटे के 70 प्रतिशत हज यात्री हज समिति के जरिये जाएंगे तो 30 प्रतिशत निजी टूर ऑपरेटरों के जरिये हज पर जाएंगे। नई हज नीति पर वक्तव्य देते हुए मुख्तार अब्बास नकवी ने इसे एक बेहतर नीति बताया है। उनके अनुसार यह पारदर्शी और जनता के अनुकूल नीति होगी। यह हज यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी।

हालांकि भारतीय हज समिति ने नई हज नीति के मसौदे का विरोध किया था। उसने अपनी आपत्ति मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी को भी सौंपी थी। सरकार का कहना है कि उन आपत्तियों पर भी विचार किया गया एवं जो सुझाव मान्य थे उन्हें स्वीकार किया गया। बावजूद इसके इस पर एक राय बनाना मुश्किल है। वास्तव में हज सब्सिडी खत्म करना ऐसा निर्णय है जिससे पूर्व की सभी सरकारें बचतीं रहीं हैं। जिस तरहे से इसका अब भी विरोध हो रहा है उसे देखते हुए इसके कारण को समझना आसान है। कोई मुसलमानों के एक वर्ग को नाराज नहीं करना चाहता था। यह बात अलग है कि इससे गरीब मुसलमानों को शायद ही कोई लाभ था। ऐसे गरीब कम ही होंगे जिन्होंने इस सब्सिडी का लाभ उठाते हुए जबसे समुद्री जहाज बंद हुआ था हज किया होगा। वैसे कुछ मुस्लिम संगठन खुद भी सब्सिडी का विरोध करते रहे हैं। उनका तर्क था कि किसी की मदद से हज करने का कोई प्रावधान शरीया में नहीं है। हालांकि यह मजहबी विषय है, इसलिए हम इसमें यहां नहीं पड़ना चाहते। ध्यान रखिए, सब्सिडी हज यात्रियों को सीधे नहीं मिलती थी। सऊदी अरब तक आने-जाने के लिए हवाई यात्रा खर्च 55 से 60 हजार रुपए आता है। इसमें से केवल 12 हजार रुपये हज जाने वाले को देने होते हैं शेष राशि सरकार सब्सिडी के रूप में भुगतान करती थी। सरकारी एयरलाइन कंपनी एयर इंडिया को इसका जिम्मा सौंपा जाता रहा है, लेकिन कई संगठनों ने इसका विरोध करते हुए कहा था कि निजी एयरलाइन कंपनी यह काम 15 से 20 हजार रुपए में ही कर रही हैं। सरकार ने हाजियों की दो श्रेणी (ग्रीन और अजीजिया) निर्धारित कर रखी हैं। पिछली बार सरकार ने ग्रीन श्रेणी के लिए अधिकतम 2,39,600 रुपये तय किए, वहीं अजीजिया श्रेणी के लिए ये रकम 2,06,200 रुपये थी। खाने-पीने पर हाजियों को खुद ही खर्च करना पड़ता है।

विरोधियों का कहना है कि सरकार ने हज सब्सिडी खत्म करके मुसलमान विरोधी भावना का परिचय दिया है। वैसे भी भाजपा एवं संघ परिवार लंबे समय से हज सब्सिडी का विरोध करती रही है। यह बात अलग है कि जब 1998 में अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनी तो इसके बारे में कोई फैसला नहीं किया गया। क्या यह वाकई मुस्लिम विरोधी कदम है? ऐसा होता तो उच्चतम न्यायालय इसके लिए आदेश नहीं देता। जो कुछ हुआ है उच्चतम न्यायालय के आदेश के अनुरुप। उच्चतम न्यायालय में इससे जुड़े सारे पहलुओं पर बहस हुई थी। न्यायालय यूं ही कोई फैसला नहीं देता। किसी मजहब विशेष के लोगों को उनकी धार्मिक यात्रा के लिए इतने व्यापक पैमाने पर सब्सिडी देना एक असाधारण स्थिति थी। ऐसा किसी सेक्यूलर देश में शायद ही कही हो। इसमें विपन्न और संपन्न के बीच कोई अंतर भी नहीं रखा गया था। विपन्न और अक्षम लोगों की धार्मिक भावना को पूरा करने के लिए सरकार छोटे स्तर पर कुछ सहयोग करती है तो उसमंें कोई हर्ज नहीं है। हालांकि सरकार इसके लिए भी निजी दानदाताओं को प्रोत्साहित करे तो यह ज्यादा बेहतर रास्ता होगा। नकवी ने कहा भी है कि गरीबों के लिए अलग से कुछ व्यवस्थाएं की जाएंगी। तो देखते हैं क्या होता है। किंतु इतने व्यापक पैमाने पर सब्सिडी को खत्म करना ही उचित था। करीब 700 करोड़ रुपया सरकार का इस पर खर्च होता था। हाजियों की संख्या बढ़ने एवं हवाई किराए में बढ़ोत्तरी के साथ इसमें और वृद्धि ही होनी थी। इस नाते यह एक उचित निर्णय है।

अब सवाल है कि सरकार इससे जो धन बचाएगी उसे कहां खर्च करना चाहिए? उच्चतम न्यायालय ने ही अपने फैसले में सुझाव दिया था कि इसे मुसलमानों की शिक्षा पर खर्च करना चाहिए।  अक्टूबर 2017 में हज नीति का जो मसौदा सामने आया था उसमें गया था कि सब्सिडी से बचने वाला पैसा मुस्लिमों की शिक्षा, सशक्तिकरण, कल्याण पर खर्च होगा। हज सब्सिडी खत्म करने की घोषणा करते समय मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा भी कि हमारी नीति अल्पसंख्यकों को सम्मान के साथ सशक्त करना है, ना कि तुष्टीकरण। अगर वाकई यही सोच है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। हज सब्सिडी फंड का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों की बच्चियों और महिलाओं की क्षिक्षा के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। अगर सरकार ऐसा करती है जिसकी पूरी संभावना है तो यह एक बेहतर शुरुआत होगी।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

 

 

 

शनिवार, 13 जनवरी 2018

मन्नान बशीर के आतंकवादी बनने पर आश्चर्य कैसा

 

अवधेश कुमार

इस खबर से किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि एक प्रतिभावान कश्मीरी छात्र मन्नान बशीर वानी आतंकवादी संगठन हिज्बुल मुजाहीद्दीन में शामिल हो गया है। हालांकि यह चिंता करने वाला प्रसंग अवश्य है। वह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पीएचडी का छात्र रहा है। बचपन से यहां तक वह मेधावी छात्र होने के कारण ही पहुंचा है। पीएचडी करने के पहले उसने एमफिल किया और उसमें भी उसके अच्छे अंक आए थे। उसका पूरा छात्र जीवन उज्जवल भविष्य की ओर ले जाने वाला है। उसके बारे में जानकारी यह भी है कि 2016 में भोपाल के आइसेक्ट विश्वविद्यालय में जल, पर्यावरण, उर्जा एवं समाज अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में उसे सर्वश्रेष्ठ शोध पत्र का सम्मान मिल चुका है। ऐसा युवक यदि अपनी पढ़ाई के अंतिम पायदान में आतंकवादी बन जाए और खुशी-खुशी ए.के. 47 लिए अपनी तस्वीर वायरल कराए तो निश्चय ही एक-एक भारतीय को दुख पहुंचेगा। वही हुआ है। उसका परिवार भी देख लीजिए। उसके पिता जम्मू कश्मीर राज्य स्कूल शिक्षा विभाग में लेक्चरर हैं।  उसका एक भाई कनिष्ठ अभियंता है। यानी एक शिक्षित संभ्रांत परिवार से निकला हुआ नवजवान आज हाथों में हथियार थामे अपने ही लोगों का कत्ल करने और हिंसा फैलाने के लिए मैदान में कूद गया है।

अब वह मन्नान बशीर वानी न होकर हमजा भाई है। जब तक आतंकवादी के रुप में वह जीवित रहेगा हमजा भाई के नाम से ही जाना जाएगा। हालांकिकोई पढ़ा-लिखा व्यक्ति आतंकवादी बनता है तो इसमें आश्चर्य करने का कोई कारण नहीं होना चाहिए। दुनिया में जितने बड़े आतंकवादी हुए हैं सब एक से एक अच्छी डिग्री वाले। ओसामा बिना लादेन से अयमान अल जवाहिरी तक की डिग्री देख लीजिए। 11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर हमला करने की साजिश में जितने शामिल थे सब अलग-अलग क्षेत्रों के बेहतर डिग्रीधारी। भारत में आईएसआईएस के कई प्रच्छन्न एजेंट पकड़े गए सब उतने ही पढ़े-लिखे और प्रोफेशनल। अपने साथ ये कम पढ़े-लिखों की भी भर्ती आतंकवादी कार्रवाई के लिए करते हैं, लेकिन ज्यादातर नेतृत्व या कमान उच्च डिग्रीधारियों के हाथों ही रहा है। मुंबई हमले में जिंदा पकड़ा गया अजमल कसाब अवश्य गंवार था, लेकिन उसको प्रेरित करने वाले, प्रशिक्षण देने वालों की सूची देख लीजिए आपको पता चल जाएगा कि उनमंे ज्यादातर अच्छे पढ़े लिखे थे। यहां तक की फौज में मेजर से सेवानिवृत्त व्यक्ति भी थे। इसलिए इस विषय पर ज्यादा बहस की आवश्यकता नहीं कि इतना पढ़ा-लिखा होने के बावजूद मन्नान आतंकवादी क्यों बना? मूल प्रश्न यह हो सकता है कि आखिर जम्मू कश्मीर में ऐसे नवजवान आतंकवादी क्यों बन रहे हैं?

मन्नान या उसके जैसे युवाओं को आतंकवादी बनने के बाद अपने जीवन का हस्र पता है। एक समय था जब आतंकवादियों की उम्र कुछ वर्ष की होती थी। अब तो आतंकवादी बनने के बाद कुछ महीने से ज्यादा उनकी उम्र नहीं होती। कई तो कुछ सप्ताह के अंदर ही मार डाले गए। जबसे कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ ऑल आउट के नाम से बहुपक्षीय सैन्य अभियान चला है आतंकवादियों की उम्र घट गई है। मन्नान बशीर इसका अपवाद हो जाएगा कम से कम इस समय ऐसा कहना कठिन है। दूसरे, इस समय सुरक्षा बल जहां आतंकवादियों के सफाये के लिए अभियान चला रहे हैं वहीं वे उनके माता-पिता और रिश्तेदारों से अपील करवाकर उनको मुख्य धारा में वापसी के लिए भी काम कर रहे हैं। इसका असर भी हुआ है। पिछले कुछ महीनों में ऐसी अपीलों का असर हुआ है और करीब एक दर्जन आतंकवादी आतंकवाद का रास्ता छोड़कर समाज में वापस आए हैं। जम्मू कश्मीर पुलिस एवं प्रशासन की घोषणा है कि जो वापस आएंगे उनको मुख्यधारा में बने रहने मेें हरसंभव मदद की जाएगी। ऐसा हो भी रहा है। इसके साथ नए युवक आतंकवादी न बनें इसके लिए भी कई प्रकार के अभियान चल रहे हैं। इनसे काफी युवक जो आतंकवादियों के संपर्क में आ गए थे एवं आतंकवादी बनने के एकदम कगार थे उनको रोका जा सका है। ऐसी सफलताओं और ऐसे वातावरण के बीच किसी ऐसे व्यक्ति का आतंकवादी बनना निश्चय ही बार-बार यह सोचने के लिए जरुर मजबूर करता है कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है?

यह तो साफ है कि आतंकवादी समूह कई तरीकों से युवाओं को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। कौन कहां किस वेष में आतंकवादी बना रहा है यह पता करना मुश्किल है। मन्नान बशीर के बारे मेें अब जानकारी मिली है, लेकिन उसकी छानबीन में सामने आया है कि उसके ही कमरे में रहने वाले यानी रुम पार्टनर मुजम्मिल पिछले वर्ष जुलाई से ही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कैम्पस नहीं आया है। ध्यान रखिए, वह भी पीएचडी का ही छात्र है और दोनों एक ही प्रोफेसर के अधीन शोध कर रहे थे। संयोग देखिए, दोनों कुपवाड़ा जिले के ही रहने वाले हैं। तो कहां गया वह? अगर वह पुलिस को नहीं मिलता तो यह मान लेना चाहिए कि आतंकवादी समूह मेें उसका प्रत्यक्ष प्रवेश पहले हो गया था और मन्नान बशीर उसके बाद गया है। छानबीन से ही पता चलेगा कि ये दोनों किसके संपर्क में थे। यह भी समाने आया था कि आतंकवादी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद मन्नान बशीर ने अभियान चलाया था। बुरहान वानी को शहीद बताते हुए पोस्टर आदि लगाए थे। उस समय भी पुलिस उसके नजदीक पहुंच रही थी, लेकिन अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने उसे क्लीन चीट दे दी। कहा गया कि वह एक मेधावी छात्र है तथा आतंकवादी या अलगाववादी गतिविधियों से उसका कोई रिश्ता नहीं। यह कहना मुश्किल है कि उस समय आतंकवादी समूहों से किसी प्रकार का उसका रिश्ता बना था या नहीं। किंतु यह कहा जा सकता है कि अगर उस पर कड़ी नजर रखी जाती तो वह पकड़ में आ जाता।

इसे जम्मू कश्मीर का दुर्भाग्य कहिए कि जब भी वहां शांति और स्थिरता की स्थिति बनने की संभावना पैदा होती है उसके समानांतर ऐसी घटनाएं घटने लगतीं हैं कि पूरा माहौल उलट हो जाता है। पाकिस्तान ने पिछले चार सालों में पूरी कोशिश की है कि जम्मू कश्मीर में 1990 के दशक की स्थिति कायम की जाए। इसके लिए अपने यहां से आतंकवादियों को तो भेजो ही, घाटी के अंदर से आतंकवादी पैदा करो। इसमें उसे सफलता भी मिल रही है। 2017 में सुरक्षा बलोें का मानना है कि 120 के आसपास आतंकवादी घाटी से बने हैं। उसके पूर्व 2016 में भी करीब 90 आतंकवादी वहां से बने थे। इसके पूर्व कश्मीर से आतंकवादी बनने की घटनाएं कम हो रहीं थीं। किंतु वहां योजनाबद्ध तरीके से कश्मीर के अलगाववाद का अति इस्लामीकरण किया जा चुका है। अब आतंकवादी वहां केवल कश्मीर को भारत से अलग करने के लिए संघर्ष नहीं करते। उनकी घोषणा है कि इसे इस्लामिक राज में बदलना है। यानी वहां के संघर्ष को इस्लाम का संघर्ष बना दिया गया है। आखिर जाकिर मूसा के जितने वक्तव्य हमारे सामने आए हैं उनमें यही कहा गया है कि कश्मीर को इस्लामी राज के लिए हम संघर्ष कर रहे हैं। उसने तो यहां तक कहा है कि कश्मीर की आजादी की मांग करने वाले अलगाववादी यदि इसका विरोध करते हैं तो उनका भी काम तमाम किया जाएगा। इस्लाम के जुड़ जाने से आतंकवाद को नई धार मिली है। अलगाववाद का सामान्य नारे का असर कमजोर पड़ने लगा था। आतंकवादी समूहों ने इसमें बदलाव करके इस्लाम की लड़ाई का नारा दिया और इसमें इतना आकर्षण है कि युवा खींच रहे हैं। पिछले ही दिनों हमने देखा कि एक मुठभेड़ में मारे गए तीन आतंकवादियों में से एक जम्मू कश्मीर पुलिस अधिकारी का 17 वर्षीय बेटा था जो तीन महीने पहले ही आतंकवादी बना था। जाहिर है, मन्नान बशीर जैसे के आतंकवादी बनने के पीछे मजहब मुख्य कारक होगा। मजहब के लिए मरने का विचार इतना भाव-विभोर कर देता है कि फिर उसके सामने आदमी को कुछ सूझता ही नहीं। अगर जीते तो इस्लाम की जीत और अगर मारे गए तो इस्लाम के लिए जिसमें जन्नत मिलनी है। तो अब विचार करने की आवश्यकता यह है कि आखिर इस मजहबी आकर्षण को वहां कैसे खत्म किया जाए। जब तक इस्लामीकरण का खतरनाक विचार कायम रहेगा ऐसे आतंकवादी बनते रहेंगे।

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