शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

रामदेव के बयान पर मचे बावेला का दूसरा पहलू

 

अवधेश कुमार

स्वामी रामदेव काफी दिनों बाद मीडिया की सुर्खियां बने हैं। कई मीडिया खासकर अंग्रेजी समाचार चैनलों में यह खबर चली है कि रामदेव उनका सिर काटेंगे जो भारत माता की जय नहीं बोलेगा या भारत माता की जय का विरोध करेगा। क्या स्वामी रामदेव के पास इतनी अक्ल नहीं है कि ऐसे बयान का क्या असर हो सकता है? किसी भी मामले में हिंसा का समर्थन नहीं किया जा सकता है। जो कोई भी हिंसा की बात करता है उसका विरोध होना चाहिए ताकि दूसरा कोई उससे प्रेरणा लेकर वैसा ही न करने लगे। किंतु स्वामी रामदेव ने यह नहीं कहा है कि वो सिर काट लेंगे। भारत माता की जय का विरोध करने वालों के बारे में उनका बयान यह है कि हम कानून का सम्मान करते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो कितनों का सिर काट देते। साफ है कि जानबूझकर बात का बतंगड़ बनाया जा रहा है। बतंगड़ बनाने वालों की सोच क्या है वे क्या चाहते हैं यह शायद अब बताने की आवश्यकता भी नहीं। देश इन लोगों का अच्छी तरह पहचानने लगा है। वास्तव में स्वामी रामदेव के बयान का मतलब चह है कि गुस्सा तो हमारे मन में है, पर कानून का पालन करने के कारण हम शांत हैं। इसका दूसरा अर्थ यह हुआ कि हम अपना गुस्सा दूसरे ढंग से प्रकट करें जिसमें हिंसा न हो।

यह मानना भी गलत होगा कि केवल स्वामी रामदेव अकेले ऐसा कहने या सोचने वाले हैं। आप भारत माता की जय मामले पर आम लोगों को यह कहते हुए सुन सकते हैं कि इतना गुस्सा आता है कि मन करता है गोली मार देते.... कुछ यह कहेंगे कि ऐेसे लोगों के लिए तो कानून बनना चाहिए ताकि सजा मिले, उऩको सीधे फांसी पर चढ़ा दिया जाए या उनको देश निकाला दिया जाए। तो गुस्से का आम माहौल ऐसे लोगों के विरुद्ध है। वास्तव में समाज की सामूहिक भावना का यही सच है। स्वामी रामदेव ने भी अपने भाषण में इसी भाव को प्रकट कर दिया है। वे बड़े व्यक्तित्व हैं, इसलिए कुछ लोगों को उनके मुंह से वह भी सार्वजनिक स्तर पर सुनना थोड़ा अजीब लगता है, परंतु भारत माता जय के मामले पर यही सच है। देश का बहुमत भारत माता की जय के पक्ष में है और इसका किसी तरह से विरोध करने वाले...या किंतु परंतु लगाने वाले या फिर यह कहने वाले कि आप हमसे जबरन नहीं कहलवा सकते....के खिलाफ आम गुस्सा है। इसमें आम प्रतिक्रिया है कि ओह देश का कानून रोकता है नहीं तो ऐसे लोगों को तो बीच चौराहे पर खड़ा करके गोली मार देना चाहिए। क्या यह भावना लोग व्यक्त करते हैं या नहीं? अगर प्रकट करते हैं तो फिर रामदेव के बयान को अकेले किसी एक व्यक्ति का बयान क्यों मान लिया जाए?

वैसे भी यह अच्छी बात है कि देशभक्ति, भारतभक्ति, भारतनिष्ठा को लेकर इस तरह के खुलकर बयान आ रहे हैं। मीडिया में आलोचना करने से इस भावना को रोका नहीं जा सकता। उल्टे इसकी प्रतिक्रिया में लोगों का गुस्सा और बढ़ता है। लोग पूछते हैं कि रामदेव ने गलत क्या कहा? फिर आप रामदेव की आलोचना करिए और जो लोग भारत माता की जय को आरएसस और भाजपा का सांप्रदायिक एजेंडा घोषित करते हैं उनको यूं ही छोड़ दीजिए। उनकी आलोचना नहीं हो, उनका विरोध न हो तो समाज अपने तरीके से इसका रास्ता निकालेगा। सवाल है कि भारत माता की जय से आपत्ति क्यों प्रकट की जानी चाहिए? किसी को भारत माता की जय बोलने में समस्या क्यों होनी चाहिए? जो भारत माता की जय नहीं बोलते उनको किस श्रेणी का भारतीय मानना चाहिए? कैसे मान लें कि भारत के प्रति उनकी निष्ठा है? ये ऐसे प्रश्न हैं जो समाज को मथ रहे हैं और दुर्भाग्य यह है कि मीडिया इन प्रश्नों का गंभीरता पूर्वक और यथोचित उत्तर ढूढने और सामने रखने की जगह जो कोई इसके पक्ष में आक्रामक बयान दे देता है उसी को कठघरे में खड़ा करने लगता है। इसकी समाज में विरोधी प्रतिक्रियाएं होती हैं। इस कारण मीडिया की अपनी साख गिर ही है भले ये इसे स्वीकार न करें।

आप महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस का बयान देख लीजिए। अगर वो भारत माता की जय के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी कुर्बान करने की बात कर रहे हैं भले इसकी नौबत न आए या वे न करें लेकिन इसकी तो प्रशंसा होनी चाहिए। देवेन्द्र फडणवीस ने वही कहा है जो एक देशभक्त को ऐसे मामले पर कहना चाहिए। आखिर कोई भी पद भारत भक्ति, देशभक्ति के सामने तुच्छ लगे यह भावना अगर नेताओं में पैदा हो तो इससे बेहतर बात क्या हो सकती है। आखिर सबसे पहले हमारा देश भारत है। भारत है तभी हम हैं, तभी हमारी अस्मिता है, तभी हमारा कोई पद है। इसलिए भारत सर्वोपरि है। भारत भक्ति हमारी प्राथमिकता होनी ही चाहिए। इसी भारत माता की जय कहते हुए, वंदे मातरम कहते हुए हजारों देशभक्त दीवानों ने इसकी स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व बलि चढ़ा दिया। देशभक्ति की वो दीवानगी हर हाल में कायम रहनी चाहिए। भारत माता की जय और वंदे मातरम जैसे नारे हमारी अंतश्चेतना में कुछ क्षण के लिए वही दीवनगी पैदा करती है। हिन्दुस्तान की जय और जय हिन्द नारा भी समानार्थी है। किंतु कोई यह कहे कि हम हिन्दुस्तान की जय बोलेंगे, जय हिन्द बोलेंगे लेकिन भारत माता की जय नहीं बोलेंगे तो यह न तार्किक है और न स्वीकार करने योग्य। यह केवल कुत्सित राजनीति है। भारत माता की जय को आरएसएस और भाजपा का एजेंडा बताना कुछ लोगों की कोरी नासमझी है तो कुछ लोगों की कुटिल राजनीति। इस पर सबका समान अधिकार है।

विडम्बना देखिए कि जब दारुल उलुम देवबंद ने बाजाब्ता जलसा बुलाकर भारत माता की जय के खिलाफ फतवा जारी किया तो इसकी उतनी लानत मलानत नहीं हुई जितनी स्वाम रामदेव या देवेन्द्र फडणवीस के बयानों की हो रही है। क्यों? यही तो एकपक्षीयता है। अनेक मुस्लिम विद्वानों और मौलवियों ने पहले कहा कि भारत माता की जय बोलना कहीं से इस्लाम विरुद्ध नहीं है। फिर देवबंद के सामने ऐसी क्या आपात स्थिति पैदा हो गई कि उसने बाजाब्ता बैठक बुलाकर इसे इस्लाम के खिलाफ घोषित कर दिया? तब तो पीर अली से लेकर अश्फाक उल्लाह खान और मौलाना अबुल कलाम आजाद .....जैसों को इस्लाम विरोधी मान लेना होगा। आप भारत माता की मूर्ति या तस्वीर की बात क्यों करते हो? आवश्यक नहीं कि हर कोई भारत माता की जो तस्वीरें हमें मिलतीं है उनको स्वीकारें। अमूर्त और निर्गुण रुप में भी अपने वतन को माता माना जा सकता है और उसकी जय बोली जा सकती है। इसके लिए कुरान, हदीस या शरीया कहीं से बाधा नहीं है।  जाहिर है, यह भारत माता की जय के नाम पर गंदी और सांप्रदायिक राजनीति को खड़ा करने का दुष्प्रयास है। आखिर असदुद्दीन ओवैसी को किसने कहा था कि आप भारत माता की जय बोलो ही? संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने तो यही कहा था आज की पीढ़ी को भारत माता की जय बोलना सिखाने की आवश्यकता है क्योंकि वह ऐसा करता नहीं। उन्होंने तो ओवैसी का नाम भी नहीं लिया था। इसके बाद एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि हमे जबरदस्ती किसी से भारत माता की जय नहीं बोलवाना है। हम अपने व्यवहार से उनका दिल जीते ताकि वे स्वयं ऐसा बोलने लगे। लेकिन ओवैसी को अपनी सांप्रदायिक राजनीति करनी है इसलिए उन्होंने मोहन भागवत का नाम लेकर लातूर की सभा में चीखना आरंभ कर दिया कि मेरे गले पर छूड़ा रख दो तो भी मैं भारत माता की जय नहीं बोलूंगा।

जितना विरोध स्वामी रामदेव और देवेन्द्र फडणवीस के बयान का हो रहा है उसका शतांश भी ओवैसी का नहीं हुआ। जितना बड़ा मुद्दा रामदेव और फडणवीस के बयानों को बनाया गया है उतना बड़ा ओवैसी का नहीं बना? क्यों? इसके खिलाफ समाज के बड़े वर्ग के ंअंदर गुस्सा पैदा होता है। यह तो भारत की सहिष्णु संस्कार है कि कुछ अनहोनी नहीं होती अन्यथा इन भंगिमाओं से आम आदमी के अंदर खीझ और क्रोध पैदा हो रहा है। इसे समझने की आवश्यकता है। आज रामदेव ने बोला है। हो सकता है कल आपको हजारों रामदेव ऐसा बोलने वाले दिख जाएं। वस्तुतः ऐसा न हो इसका उपाय करना आवश्यक है। इसका एक उपाय यह है कि जो लोग अपनी राजनीति या सांप्रदायिक सोच के लिए भारत माता की जय का विरोध कर रहे हैं, इसे अनर्गल तरीके से किसी मजहब के खिलाफ साबित कर रहे हैं या फिर इसे भाजपा एवं आरएसएस के सांप्रदायिक एजेंडा का अंग मानकर इसको महत्वहीन बनाने पर तुले हैं उनका पुरजोर विरोध हो, उनकी लानत मलानत की जाए। जावेद अख्तर भी मुसलमान हैं और वो कहते हैं मैं बार-बार भारत माता की जय कहूंगा क्योंकि ये हमारा कर्तव्य नहीं अधिकार है। ऐसे लाखों मुसलमानों को खड़ा किया जा सकता है। इसका अभियान क्यों न चलाया जाए। अभी प्रधानमंत्री की सउदी अरब यात्रा के दौरान मुसलमान पुरुष और महिलाआंे ने खुलकर भारत माता की जय के नारे लगाए। तो क्या देवबंदी उलेमा उनको इस्लाम से बाहर कर देंगे? ऐसा नहीं हो सकता। आखिर मुसलमानों का सबसे पवित्र स्थान मक्का और मदीना सउदी अरब में ही है। वहां से भारत माता की जय की आवाज निकलने का महत्व आसानी से समझा जा सकता है।  वास्तव में इस भाव को विस्तारित करने और ताकत देने की जरुरत है। अब यह कैसे हो इस पर जरुर विचार होना चाहिए। मीडिया भी संभलकर ऐसे मामले में अपनी भूमिका निभाए।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208  

 

शनिवार, 2 अप्रैल 2016

नवाज शरीफ ने यूं ही रद्द नहीं की अमेरिका यात्रा

 

अवधेश कुमार

तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने अपनी अमेरिका यात्रा रद्द कर दिया। पाकिस्तान में जब भी कोई आतंकवादी हमला होता है लोगों की सामान्य प्रतिक्रिया यही होती है कि अरे वहां तो ऐसा होता रहता है। लेकिन लाहौर में हुए विस्फोट को आप इस श्रेणी का नहीं मान सकते। स्वयं पाकिस्तान ने इसे किस तरह लिया है इसका प्रमाण है, प्रधानमंत्री शरीफ द्वारा अपनी अमेरिका यात्रा को रद्द करना। ध्यान रखिए वाशिंगटन में परमाणु सुरक्षा सम्मेलन में भाग लेने के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने स्वयं शरीफ को आमंत्रित किया था। इसमें 72 लोगों के मरने की पुष्टि हो चुकी है तथा 200 से ज्यादा लोगों के घायल होने की। एक तो इतनी संख्या में लोगों का हताहत होना ही इसे बड़ा आतंकवादी विस्फोट साबित कर देता है।  16 दिसंबर 2014 को तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने पेशावर के सैनिक स्कूल पर हमला किया था। इसमें 126 बच्चों की मौत हो गई थी। इस हमले के बाद पाकिस्तान ने जिस तरह आतंकवादियों के खिलाफ अभियान चलाया है उसमें यह हमला साबित करता है कि उस देश के लिए आतंकवाद से निकलना लगभग नामुमकिन जैसा हो गया है। सैनिक स्कूल पर हमले के 13 महीने बाद 20 जनवरी 2016 को पेशावर के पास चरसद्दा की बाचा खान यूनिवर्सिटी में तहरीक-ए-तालिबान ने हमला किया। इस हमले में 21 छात्रोें-शिक्षकों की जान चली गई। वास्तव में बाचा खान विश्वविद्यालय में हमला करके भी आतंकवादियों ने यही संदेश दिया था कि हमारे खिलाफ आपके ऑपरेशन से हमारा अंत नहीं हो सकता। हम ताकतवर थे, हैं और रहेंगे। हालांकि यह सच है जर्ब ए अज्म नामक औपरेशन से वजीरीस्तान में तहरीक ए तालिबान को काफी क्षति पहुंची है। उसके लड़ाके भारी संख्या में मारे गए हैं एवं उसकी आधारभूत संरचनाएं भी नष्ट हुईं हैं, पर वह शक्तिहीन नहीं हुआ है।

 लाहौर का हमला इसलिए ज्यादा चिंता का विषय है कि सामान्यतः पंजाब को तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान के खूनी पंजे से मुक्त माना जाता रहा है। इस हमले की जिम्मेवारी तहरीक ए तालिबान के ही एक उप समूह जमातुल अहरार ने ही लिया है। तालिबान ने पाकिस्तान सरकार को चेतावनी देते हुए जिस तरह प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का मजाक उड़ाया है वह उनके लिए सीधी चुनौती है। पंजाब उनका गृह प्रदेश है तथा वहां उनके भाई मुख्यमंत्री हैं। जमातुल अहरार ने कहा है कि लाहौर में हमला कर उसने सरकार को पंजाब पहुंचने का संदेश दे दिया है। अहरार के प्रवक्ता ने ट्वीट कर कहा है कि नवाज शरीफ को जानना चाहिए कि लड़ाई उनके दरवाजे तक पहुंच चुकी है। अल्लाह की इच्छा है कि इस युद्ध में मुजाहिदीन की जीत हो। इस प्रकार की चुनौती अगर आतंकवादी संगठन ने दिया है तो फिर प्रधानमंत्री और पूरे सत्ता प्रतिष्ठान को इसे गंभीरता से लेना ही चाहिए। अगर नहीं लेंगे तो माना जाएगा उन्होंने आतंकवाद के सामने घुटने टेक दिए। उसने फेसबुक पर उर्दू में एक पोस्ट करते हुए आत्मघाती हमलावर की तस्वीर भी जारी की है। उसकी पहचान सलाहुद्दीन खोरसानी के तौर पर की गई है। वास्तव में जमातुल अहरार ने साफ तौर शरीफ को संदेश दिया कि हम आपके दरवाजे पर पहुंच गए हैं। इस तरह पूरी सरकार को चुनौती है कि हम पंजाब में खून खराबा करने आ गए हैं आप रोक सकें तो रोक लीजिए।

हालांकि यह हमला ईस्टर का त्योहार मनाने जुटे ईसाइयों पर हुआ। लाहौर शहर के बीचों-बीच गुलशन-ए-इकबाल पार्क के अंदर झूले के पास 20 वर्षीय खोरसानी ने खुद को उड़ा लिया था। इस धमाके में कम से कम 10 से 15 किलोग्राम विस्फोटक का इस्तेमाल हुआ है। मरने वालों में इन्हीं की तादाद अधिक है। गुलशन-ए-इकबाल लाहौर का सबसे बड़ा पार्क है। इसमें बोटिंग भी होती है। पार्क के पांच गेट हैं। आतंकी गेट नंबर 2 से घुसा। इस गेट के पास ज्यादातर झूले हैं, इसलिए महिलाएं और बच्चे काफी तादाद में मौजूद थे। ईस्टर का मौका होने के कारण पार्क में सामान्य से ज्यादा लोग जमा हुए थे। हमले के वक्त 3 से 5 हजार लोग मौजूद थे। इनमें से अधिकतर ईसाई समुदाय के लोग थे। पार्क के अंदर और आसपास कोई सुरक्षाकर्मी मौजूद नहीं था। हमले के बाद बचाव अधिकारी और पुलिसकर्मी घटनास्थल पर पहुंचे। देखा जाए तो इस हमले को पाकिस्तान में ईस्टर मनाने के विरुद्ध माना जा सकता है। दूसरे शब्दों में यह ईसाइयों पर हमला कहा जा सकता है। वहां के आतंकवादी संगठन अल्पसंख्यकों को कई प्रकार से उत्पीड़ित करते हैं। इनमें ईसाई, हिन्दू और सिख ही नहीं मुसलमानों मंे भी अहमदिया, शिया आदि शामिल हैं।

ये जिस तरह के जेहाद की कल्पना करते हैं उनमें इस्लाम का केवल एक ही स्वरुप सब पर लागू होता है। उसके अलावा कोई भी विचार, उपासना पद्धत्ति......ही नहीं, रहन-सहन, बोलचाल, खानपान तक इन्हें स्वीकार नहीं। इन सबको वो इस्लाम विरोधी मानते हैं। इसलिए ईसाइयों के पवित्र त्यौहार के अवसर पर उनका हमला हमें चौंकाता नहीं हैं। वे शत-प्रतिशत शरिया के अनुसार शासन चाहते हैं। नवाज शरीफ की चिंता इसलिए है, क्योंकि कुछ दूसरे संगठन तो यहां सक्रिय थे जिनमें से अधिकांश का निशाना पाकिस्तान नहीं था। पाकिस्तान में दो तरह के आतंकवादी गुट हैं। एक वो हैं जो भारत में हमले करते हैं और उनकी पूरी तैयारी भारत केन्द्रित हैं। इनमें लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और ऐसे दूसरे संगठन है। लेकिन तहरीके ए तालिबान पाकिस्तान और उसके बनाए गए दूसरे समूह पाकिस्तान में ही हमला करते हैं और वहां की पुलिस, सेना और अन्य सरकारी संस्थाओं को ज्यादा निशाना बनाते हैं।हालांकि राजनीतिक हत्याएं वहां हुईं हैं जिनकी जिम्मेवारी लश्कर ए झांगवी जैसे संगठन ने लिया। कुछ हमले भी हुए। खासकर 2 नवंबर 2014 को बाघा सीमा पर बहुत बड़ा आत्मघाती हमला हुआ जिसमें 50 से ज्यादा लोग मारे गए थे। यह उस समय तक का सबसे बड़ा हमला था। इसकी जिम्मेवारी जुनदुल्लाह और जमातुल अहरार नामक संगठन ने लिया था।  तो जमातुल अहरार पहले से वहां सक्रिय है। शायद उस समय यह साफ नहीं था कि वह तहरीक ए तालिबान से जुड़ा हुआ है। जो भी हो लगातार हमलों से शरीफ पंजाब को बनाए रखने में सफल रहे थे।

अगर तहरीक ए तालिबान पंजाब में प्रवेश कर गया है और यहां सीधे सुरक्षा बलों से लड़ने की जगह वह इस तरह आत्मघाती हमलावरांे से हमले करवाएगा तो फिर पाकिस्तान नष्ट हो जाएगा। केवल लोग ही हताहत नहीं होंगे, इससे पाकिस्तान की पूरी अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। जो कुछ आर्थिक गतिविधयां पाकिस्तान को बचाए हुए है उसका बड़ा अंश पंजाब में ही सीमित है। वजीरिस्तान क्षेत्र में कोई आर्थिक गतिविधि नहीं। बलूचिस्तान में विद्रोह चल रहा है। सिंध जल रहा है। तो कुल मिलाकर पंजाब ही वह क्षेत्र है जो पाकिस्तान की आर्थिक गतिविधियों का आधार है। अगर यहां तहरीके को आतंकवादी हमलों से रोका नहीं गया तो फिर पाकिस्तान को बचाना मुश्किल होगा। इसलिए तीन दिनों की शोक के साथ नवाज शरीफ ने अपनी अमेरिका यात्रा रद्द कर पाकिस्तान में ही रहना मुनासिब समझा ताकि वो स्वयं सुरक्षा कार्रवाई की मौनिटरिंग कर सकें।

निस्संदेह, यह कहना गलत नहीं है कि पाकिस्तान तो अपने बनाए जाल में फंस गया है। यह सच है कि उसने एक ओर कश्मीर में आग लगाने तथा दूसरी ओर अफगानिस्तान पर अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए मुजाहिद्दीन तैयार किए, उनको हर संभव मदद की, उन्हें हीरो बनाया .....आज वही ंउसके लिए भस्मासुर बन गए हैं। लेकिन अगर पाकिस्तान को आतंकवादियों ने पराजित कर दिया तो कल्पना करिए हमारे आपके लिए क्या स्थिति होगी। हमारे पड़ोस का एक देश जहां भारत विरोधी जेहाद के बीच ही नहीं पेड़ पौधे तक मौजूद हैं, अगर पूरी तरह आतंकवाद के शिकंजे में आ गया तो हमारे लिए भी सामान्य सिरदर्द नहीं होगा। पंजाब वैसे भी हमारी सीमा से सीधे लगता है। इसलिए पाकिस्तान में आतंकवाद की पराजय हमारे लिए, पूरे क्षेत्र और फिर पूरी दुनिया के लिए आवश्यक है। यह देखना है शरीफ वहां रुककर क्या रणनीति अपनाते हैं। अमेरिका भी पाकिस्तान की स्थिति को समझता है और आतंकवाद का शमन उसके हित में भी है। इसलिए नवाज शरीफ के वहां न जाने को अन्यथा नहीं ले सकता।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027028

 

 

शनिवार, 26 मार्च 2016

भगत सिंह का आजादी के बाद सबसे बड़ा अपमान

 

अवधेश कुमार

क्या संयोग है! भगत सिंह की शहीदी दिवस के ठीक दो दिनों पूर्व हमारे देश की सबसे पुरानी पार्टी की उत्तराधिकारी कांग्रेस के एक बड़े नेता ने उन्हें ऐसी श्रद्धांजलि दी जिससे उनकी आत्मा तृप्त हो गई होगी। शशि थरुर जैसा गहराई से पढ़ा-लिखा व्यक्ति यदि कन्हैया कुमार जैसे एक छात्र नेता को आज का भगत सिंह कहते हैं तो इससे हमारे चिंतन की सामूहिक विकृति का पता चलता है। हालांकि कांग्रेस ने शशि थरुर के बयान से अपने को अलग कर लिया है, लेकिन यह एक ऐसे देशभक्त शहीद का अपमान है जिसकी स्मृतियां आज भी भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के करोड़ों लोगों को रोमांचित करतीं हैं। जिस व्यक्ति ने आजादी के संघर्ष में अपने विचारों और कर्तृत्व से न जाने कितनों को आत्मबलिदान की प्रेरणा दी, जिसकी लोकप्रियता को देखते हुए अंग्रेजों ने समय के पूर्व ही फांसी पर चढ़ा दिया और जिसके लिए पूरा देश रोता-बिलखता रहा...जिसने उतनी कम उम्र में इन्कलाब और क्रांति की अपनी व्यावहारिक परिभाषा दी, जिसने आजादी के संघर्ष के साथ आजाद भारत के लक्ष्य पर विस्तृत ंिचंतन देश को दिया.... उसकी तुलना कांग्रेस पार्टी का एक बड़ा नेता ऐसे नवजवान से करता है जिसके जीवन की कुल उपलब्धि इतनी है कि सारे वामपंथी संगठनों के समर्थन से जेएनयू छात्र संघ का अध्यक्ष बन गया। जो चर्चा में इसलिए आया कि उसने जिस कार्यक्रम के रद्द होने का विरोध किया उसमें देशद्रोही नारे लगे...नारा लगाने में यह शामिल था या नहीं इसमें संदेह है, पर उसने नारा को रोका हो इसके प्रमाण नहीं है। जिसने जेल से छूटने के बाद अभी तक अफजल गुरु को आंतकवादी और दोषी मानने का एक बार भी बयान नहीं दिया उसे यदि शशि थरुर आज का भगत सिंह कहते हैं तो इसके विरुद्व देश मे उबाल पैदा होना स्वाभाविक है। थरुर अकले नहीं, एक सोच के प्रतिनिधि हैं जिनके मुंह से ऐसी शर्मनाक तुलना हुई है।

शशि थरुर जवाहर लाल नेहरु की सोच का वाहक होने का दावा करते हैं। क्या पंडित नेहरु कन्हैया जैसे छात्र को कभी आदर्श बनाकर पेश कर सकते थे?

जवाहरलाल नेहरू तो भगत सिंह के तरीकों और सोच के समर्थक नहीं थे, फिर भी उन्होंनेे अपनी आत्मकथा में लिखा है कि साण्डर्स की हत्या का कार्य तो भुला दिया गया लेकिन चिह्न शेष बना रहा और कुछ ही माह में पंजाब का प्रत्येक गांव और नगर तथा बहुत कुछ उत्तरी भारत उसके नाम से गूँज उठा । उसके बारे में बहुत से गीतों की रचना हुई और इस प्रकार उसे जो लोकप्रियता प्राप्त हुई वह आश्चर्यचकित कर देने वाली थी। क्या कन्हैया ने ऐसा कुछ कर दिया है जिससे उसके बारे में ऐसी बातें लिखीं जा सकें? इसके उलट उसने तो भगत सिंह के विपरीत काम किया। भगत सिंह का समाजवाद पूरी तरह मार्क्सवाद नहीं था जिसकी चर्चा शशि कर रहे थे। भगत सिंह तो शहीद रामप्रसाद बिस्मिल की यह पंक्तियां- मेरा रंग दे बसंती चोला, इसी रंग में रंग के शिवा ने माँ का बंधन खोला, मेरा रंग दे बसंती चोला, यही रंग हल्दीघाटी में खुलकर था खेला, नव बसंत में भारत के हित वीरों का यह मेला, मेरा रंग दे बसन्ती चोला.....गाते थे। आज के वामपंथियों के लिए चाहे वे किसी कम्युनिस्ट पार्टियों में हों या कांग्रेस में या कहीं यह भगवाकरण का प्रतीक हो जाएगा, सांप्रदायिकता का प्रतीक हो जाएगा, क्योंकि शिवाजी और महाराणाप्रताप तो इनके लिए देशभक्ति के परिचायक है ही नहीं।

जेल की कालकोठरी में उनकी लिखी पुस्तकें- आत्मकथा, दि डोर टू डेथ (मौत के दरवाज़े पर), आइडियल ऑफ़ सोशलिज़्म (समाजवाद का आदर्श), स्वाधीनता की लड़ाई में पंजाब का पहला उभार... को पढ़िए तो कन्हैया जैसे चरित्र से आपको घृणा जाएगी। डॉ. पट्टाभिसीतारमैया ने तो लिख दिया कि यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि भगतसिंह का नाम भारत में उतना ही लोकप्रिय था, जितना कि गाँधीजी का। 1927 में लाहौर में अपनी गिरफ्तारी की चर्चा करते हुए भगत सिंह मैंं नास्तिक क्यों हूं में लिखते हैं-एक दिन सुबह सी.आई.डी. के वरिष्ठ अधीक्षक श्री न्यूमन मेरे पास आए। लंबी-चौड़ी सहानुभूतिपूर्ण बातों के बाद उन्होंने मुझे, अपनी समझ में यह अत्यंत दुखद समाचार दिया कि यदि मैंने उनके द्वारा मांगा गया वक्तव्य नहीं दिया तो वे मुझ पर काकोरी केस से संबंधित विद्रोह छेड़ने के षड्यंत्र तथा दशहरा बम उपद्रव में क्रूर हत्याओं के लिए मुकदमा चलाने पर बाध्य होंगे। आगे उन्होंने मुझे यह भी बताया कि उनके पास मुझे सजा दिलाने व फाँसी पर लटकाने के लिए उचित प्रमाण मौजूद हैं। उन दिनों मुझे यह विश्वास था, यद्यपि मैं बिल्कुल निर्दाेष था, कि पुलिस यदि चाहे तो ऐसा कर सकती है। .... एक क्षण को भी अन्य बातों की कीमत पर अपनी गर्दन बचाने की मेरी इच्छा नहीं हुई। ... पहले ही अच्छी तरह पता है कि मुकदमें का, क्या फैसला होगा। एक सप्ताह में ही फैसला सुना दिया जाएगा। मैं अपना जीवन एक ध्येय के लिए कुर्बान करने जा रहा हूँ, इस विचार के अतिरिक्त और क्या सांत्वना हो सकती है?

जरा सोचिए, देश के लिए सर्वस्व अर्पण करने के इस भाव के कारण सभी प्रकार के मोहपाश से मुक्त व्यक्तित्व, जिसमें मृत्यु के भय से मुक्ति भी शामिल है, से आज हम किसकी तुलना कर सकते हैं? वो एक अनोखी दीवानगी थी, जिसमें देश की आजादी और आजादी के बाद की व्यवस्था के अलावा कुछ समा ही नहीं सकता था। वो ऐसी आसक्ति थी, जिसमें रिश्ते, नाते ही नहीं अपने शरीर तक की कोई चिंता नहीं। वो लिखते हैं कि मैं जानता हूँ कि जिस क्षण रस्सी का फंदा मेरी गर्दन पर लगेगा और मेरे पैरों के नीचे से तख्ता हटेगा, वही पूर्ण विराम होगा - वही अंतिम क्षण होगा। .... एक छोटी सी जूझती हुई जिंदगी, जिसकी कोई ऐसी गौरवशाली परिणति नहीं है, अपने में स्वयं एक पुरस्कार होगी, यदि मुझमें उसे इस दृष्टि से देखने का साहस हो। यही सब कुछ है। बिना किसी स्वार्थ के, यहाँ या यहाँ के बाद पुरस्कार की इच्छा के बिना, मैंने आसक्त भाव से अपने जीवन को स्वतंत्रता के ध्येय पर समर्पित कर दिया है, क्योंकि मैं और कुछ कर ही नहीं सकता था। भगत सिंह ने केवल ऐसा लिखा नहीं। फांसी से दो घंटे पहले भगत सिंह के वकील प्राणनाथ मेहता मिलने आए थे। उन्होंने पूछा कि तुम कैसे हो? भगत सिंह ने कहा कि हमेशा की तरह प्रसन्न हूं। उन्होंने जब पूछा कि तुम्हारी कोई इच्छा है तो भगत बोले कि हां मैं फिर इस देश में पैदा होना चाहता हूं ताकि इसकी सेवा कर सकूं। तो जो कुछ उन्होंने लिखा वाकई उनका व्यवहार एकदम मृत्यु के सामने वैसा ही था।

...’ शशि थरुर को क्या भगत सिंह के ये पंक्तियां याद नहीं हैं? शशि थरुर और उनके जैसे लोगों को जो जेएनयू में प्रतिदिन राष्ट्रवाद की ऐसी परिभाषा गढ़ रहे थे जिसमें उन सारे शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों तथा स्वतंत्रता के बाद भारत के पुनर्गठन और पुनर्निर्माण में अपना जीवन लगाने वालों का अपमान हो रहा था भगत सिंह की इन्कलाब की सोच भी याद दिलाना आवश्यक है। माईन रिव्यू के संपादक रामानंद चटर्जी को लिखे पत्र में भगत सिंह कहते हैं कि इस नारा का मतलब यह नहीं कि सशस्त्र संघर्ष सदा चलता रहेगा। इन्कलाब जिन्दाबाद से हमारा मतलब है कभी पराजय स्वीकार न करने वाली वह भावना जिसने जतिन दास जैसे शहीद पैदा किए। हमारी इच्छा है कि हम यह नारा बुलंद करते समय अपने आदर्शों की भावना को जिंदा रखें। इन्कलाब सिर्फ बम और पिस्तौल के साथ ही नहीं जुड़ा होगा। बम और पिस्तौल तो कभी-कभी इन्कलाब के भिन्न-भिन्न रुपों की पुष्टि के लिए साधन मात्र हैं। हम यह स्वीकार करते हैं कि केवल बगावत को इन्कलाब कहना ठीक नहीं है। इसी में भगत सिंह ने लिखा कि हम देश में बेहतर बदलाव के लिए इस शब्द का प्रयोग कर रहे हैं।

 इन सारे तथ्यों के आलोक में यह कहना बिल्कुल सही होगा कि आजाद भारत में भगत सिंह का, उनके विचारों का, सपनों का, बलिदान का.... सबसे बड़ा कोई अपमान हुआ है तो वह जेएनयू मंे शशि थरुर जैसों के द्वारा। शशि थरुर तो बोल गए, लेकिन वहां जाने वाले दर्जनों महानाम बिना बोले ही भगत सिंह सहित अन्य शहीदों का अपने शर्मनाक वक्तव्यों से लांछित करते रहे। ऐसे लोगों के लिए क्या शब्द प्रयोग किया जाए? इनके साथ कैसा व्यवहार किया जाए यह देश के लोग तय करें। कारण, शहीदों और मनीषियों का प्रत्यक्ष-परोक्ष अपमान सहन करना भी देशविरोधी व्यवहार ही होगा।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092,दूर.ः01122483408, 09811027208

शनिवार, 19 मार्च 2016

मुजीब खान बने हिन्दू मुस्लिम एकता सेवा समिति के मटिया महल विधान सभा अध्यक्ष

संवाददाता

नई दिल्ली। दिल्ली की मटिया महल विधान सभा के इलाके में हिन्दू मुस्लिम एकता सेवा समिति ने एक नुक्कड़ सभा का आयोजन किया। इस सभा में मुख्य अतिथि के रूप में हिन्दू मुस्लिम एकता सेवा समिति के अध्यक्ष मेहरुद्दीन उस्मानी उपस्थित रहे। इस सभा में इलाके के सीनियर लोगो ने शिरकत की। सभा को संबोधित करते हुये मेहरुद्दीन उस्मानी ने कहा कि इस समय देश बड़े नाजुक दौर से गुजर रहा है कुछ नेता उल्टे सीधे बयान देकर हिन्दू-मुस्लिम के बीच में नफरत की दीवार खड़ी करना चाहते हैं, जिससे देश दो हिस्से में बंट जाए। 

उन्होंने सरकार से मांग करते हुए कहा कि ऐसे नेताओ के खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही की जाए। हमारी संस्था हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए पूरे देश में मुहिम
चलायेगी, जिससे देश में हिन्दू-मुस्लिम एकता को बल मिले। हिन्दू-मुस्लिम में भाईचारा होगा तो देश अपने आप तरक्की करेगा। इस मौके पर मेहरुद्दीन उस्मानी ने युवा नेता मुजीब खान को मटिया महल विधान सभा का अध्यक्ष मनोनीत किया। समिति का अध्यक्ष मनोनीत होने के बाद मुजीब खान ने समिति को यकीन दिलाते हुये कहा कि मै ईमानदारी से हिन्दू-मुस्लिम एकता सेवा समिति और इलाके की सेवा करूँगा और इलाके के लोगों के लिए मैं हर मुश्किल को हल करने के लिए काम करता रहूंगा। समिति के जिला अध्यक्ष मो. जावेद ने कहा कि हमारी समिति गरीबों, मजलूमों, दबे-कुचलों के लिये काम करती है और समाज में फैल रही बुराइयों को रोकने के लिए भी काम करती है। इस मौके पर सोनू ने भी विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर प्रमुख रूप से एजाज, अहमद, सकलैन, आरिफ, जीशान, असलम आदि ने शिरकत की।





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