गुरुवार, 19 नवंबर 2015

कहां तक जाएगा भाजपा का ये बवण्डर

 

अवधेश कुमार

भाजपा एक बार फिर आंतरिक बवण्डर का शिकार हो रही है। 2004 के बाद से भाजपा में ऐसे बवण्डर कई बार उठे लेकिन इस समय यह अकल्पनीय था। कारण, बिहार में भले पार्टी को करारी पराजय मिली है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता अभी असंदिग्ध है। पार्टी में अभी उनकी तुलना मेें कोई ऐसा कोई नेता नहीं जो कि अपनी बदौलत कोई जीत  दिला सके। मोदी की लोकप्रियता की आभा में इतनी चमचमाहट दिखती थी कि उनके धूर विरोधी भी उसमें चौंधिया जाते थे। लेकिन इस समय लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार और यशवंत सिन्हा ने जो तेवर दिखाया है उसका अर्थ कई प्रकार से निकाला जा सकता है। इनके पूर्व बेगूसराय से सांसद एवं बिहार के वरिष्ठ नेता भोला सिंह ने तो नाम लेकर प्रधानमंत्री एवं अध्यक्ष अमित शाह को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। हो सकता है कुछ और बयान सामने आ जाए। प्रश्न है कि ये बवण्डर आखिर किसी सीमा तक जाएंगे? क्या इससे पार्टी में हम कुछ ईमानदार आत्मचिंतन की उम्मीद कर सकते हैं? क्या ये नेता इतनी हैसियत रखते हैं कि जो कुछ इनने अपने बयान में लिखा है उसे तार्किक परिणति तक ले जाने के लिए दृढ़ संकल्प के साथ खड़े हो सकें और इनको पार्टी के अंदर नेताओं-कार्यकर्ताओं का समर्थन मिले?

कांग्रेस से लेकर विरोधी पार्टियों का बयान इसकी गवाह है कि वो ऐसे अवसर की प्रतीक्षा में थे। पार्टी के बाहर से तो इनको समर्थन मिल रहा है लेकिन उसका कारण केवल इतना है कि ये भाजपा में आंतरिक संघर्ष को और तेज होने देखना चाहते हैं ताकि मोदी की आभा मलीन हो। मोदी इनके सत्ता तक जाने के मार्ग की अब भी बड़ा बाधा हैं। बहरहाल, पहले यह देखें कि इनने अपने लिखित बयान में जो कुछ कहा है कि उसका अर्थ क्या है? इन्होंने मुख्यतः चार बातें कहीं हैं। एक पार्टी ने दिल्ली में मिली हार से कुछ नहीं सीखा। दो, बिहार में जो हार हुई है उसकी  जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। तीन, हार के कारणों की पूरी समीक्षा हो। और चार, इस समीक्षा में वो लोग ना शामिल हों जो बिहार चुनाव प्रबंधन में शामिल थे। गहराई से देखें तो ये चारों बातें एक ही हैं। इसमें मुख्य बात यही है कि हार की ईमानदार समीक्षा हो ताकि जो जिम्मेवार हैं उनको चिन्हित किया जाए। जाहिर है, यदि समीक्षा वही लोग करेंगे जो कि चुनाव की व्यवस्था में शामिल थे तो उसमें ईमानदारी नहीं होगी इसलिए अलग के लोग करें? तो कौन करे? क्या किसी एजेंसी से इसे कराया जाएगा? या ये लोग स्वयं इसकी समीक्षा करना चाहते हैं ताकि अपने अनुसार उसका निष्कर्ष लाकर वर्तमान नेतृत्व को कठघरे में खड़ा कर दिया जाए। वैसे देखा जाए तो यशवंत सिन्हा के हस्ताक्षर से भेजे गए इस बयान में पूरे शीर्ष नेतृत्च यानी संसदीय बोर्ड की ईमानदारी पर प्रश्न खड़ा कर दिया गया है। जो लोग चुनाव पंबंधन में शामिल थे वे समीक्षा न करें, इसका अर्थ आखिर क्या है? फिर इसी बयान में आगे कहा गया है कि इस हार के लिए सब को जिम्मेदार बताना खुद को बचाना है। ध्यान रखिए 9 नवंबर को पार्टी की संसदीय बोर्ड की बैठक के बाद अरुण जेटली ने पत्रकार वार्ता में यही कहा कि जीत और हार दोनों सामूहिक होते हैं। निस्संदेह, ऐसे बयानों का कोई अर्थ नहीं है। यह पार्टी की दुर्दशा का आवश्यक निर्ममता से पोस्टमार्टम करने से बचना है। जब आप पूरी निर्ममता से पोस्टमार्टम ही नहीं करेंगे, समीक्षा ही नहीं करेंगे तो फिर न आप सही कारण तक पहुंच पाएंगे और जब कारण तक ही नहीं जाएंगे तो फिर सुधार एवं बदलाव कहां से हो सकेगा। इसलिए संसदीय बोर्ड के निष्कर्ष पर बिना नाम लिए इन बुजूर्ग नेताओं ने जो प्रश्न उठाए उसे एकबारगी खारिज नहीं किया जा सकता।

लेकिन ये लोग अपना निष्कर्ष भी दे रहे हैं। मसलन, इनने यह भी कह दिया कि पिछले एक साल में पार्टी को प्रभावहीन किया गया। लेकिन ये बयान बिल्कुल अस्पष्ट श्रेणी का है। इनके समानांतर भोला सिंह ने तो सीधा कह दिया कि भाजपा ने हार नहीं की आत्महत्या की है और उसके लिए नेतृत्व जिम्मेवार हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री भी उसमें शामिल हैं तो उन्होंने कहा बिल्कुल। क्या उनको त्यागपत्र देना चाहिए तो उनका उत्तर था उनकी नैतिक शक्ति पर निर्भर है। उनका कहना था कि प्रधानमंत्री किसी की बेटी-बेटा पर प्रश्न उठाएगा, तंत्र मंत्र की बात करेगा यह प्रधानमंत्री का स्तर है नेता बोल सकता है प्रधानमंत्री नहीं। यह बुजूर्ग नेताओं के  अस्पष्ट बयानों से परे एकदम सीधा-सपाट है। भोला सिंह पुरानी पीढ़ी के नेता है जब भाजपा के नेताआंे की पहचान उनके संयमित और संतुलित बयानों से होती थी और दूसरी पार्टियां भी उनके सामने निरुत्तर हो जाते थे। वे ऐसा बोल सकते है। उस तरह बोलने का साहस आसानी से आज के समय कोई नहीं करता। बुजूर्ग नेताओं में आडवाणी और जोशी मार्गदर्शक मंडल के सदस्य भी हैं।

इसे देखने का दो नजरिया हो सकता है। एक नजरिया यह है कि पार्टियों में खुलकर अपनी बात कहने की सामान्य लोकतांत्रिक प्रवृृत्ति का लोप हो गया है जो केवल पार्टी के लिए ही नहीं हमारे लोकतंत्र के लिए भी विनाशकारी परिणामों वाला साबित हो रहा है। उसमे ंयदि भोला सिंह जैसे लोग इस तरह स्पष्ट शब्दों में अपने नेतृत्व की जिन बातों को वे गलत मानते हैं उनको सुस्पष्ट ढंग से मुखर होकर रख रहे हैं तो इसे अच्छा संकेत मानना चाहिए। हम आप उनसे सहमत हो या नहीं, पर सभ्य भाषा में इस तरह की आंतरिक आलोचना को प्रोत्साहन मिलना चाहिए। इससे पार्टी में खुलापन आएगा, शीर्ष नेताआंे की निचले स्तर के नेताओं और कार्यकर्ताओं से दूरियां घटेंगी, पार्टी में खुलकर बहस की स्थिति पैदा होगी जो पार्टी एवं पार्टी आधारित हमारे लोकतंत्र को ज्यादा स्वस्थ व मजबूत बनाएगा। यह देखना होगा भाजपा नेतृत्व भोला सिंह के साथ क्या व्यवहार करता है। लेकिन बुजूर्ग नेताओं के बयानों को इसी श्रेणी का नहीं माना जा सकता। मुरली मनोहर जोशी के घर हुई बैठक में अरुण शौरी भी शामिल थे जिनने पिछले दिनों एक कार्यक्रम में मोदी की नीतियों की आलोचना करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को इशारा किया एवं कहा कि देश डॉ. साहब यानी इनकी प्रतीक्षा करने लगा है। उनका निशाना कहीं और है। शौरी कभी संगठन के आदमी रहे भी नहीं और भाजपा पार्टी के लिए कभी कोई काम नहीं किया। उस बैठक में के. एन. गोविन्दाचार्य भी उपस्थित थे। यह हैरत मेें डालने वाला है, क्योंकि वो सक्रिय राजनीति से अपने को दूर कर चूके हैं तथा जब वे भाजपा में थे जोशी से उनका रिश्ता छत्तीस का था।

बहरहाल, ये कहते हैं कि एक साल में पार्टी को प्रभावहीन कर दिया गया तो इसका यह अर्थ निकलता है कि एक साल पहले पार्टी बिल्कुल सही रास्ते पर चल रही थी एवं प्रभावहीन नहीं थी। तो फिर 2004 की बुरी पराजय क्यों हुई? 2009 में पराजय क्यों हुई? पार्टी में 2004 से लेकर 2009 तक लगातार विद्रोह क्यों होते रहे? अनके राज्यांे के चुनाव भाजपा क्यों हारी? एक समय तो आडवाणी और वाजपेयी ही पार्टी के मुख्य निर्णायक थे और उसी दौर में पार्टी सत्ता तक पहंुंची फिर ढलान पर भी आ गई और नेताओं ने विद्रोह किया, कई को पार्टी से निकालना पड़ा। वास्तव में यह सच है कि पार्टी का सांगठनिक ढांचा आम कार्यकर्ताओं के लिए अलोकतांत्रिक है,पर पार्टी की आंतरिक दुर्दशा पुरानी है जिसमें आडवाणी की भूमिका सर्वप्रमुख है, क्योंकि वाजपेयी और उनकी जोडी जो चाहती कर सकती थी। इन पर कोई प्रश्न उठाने वाला नहीं था। सच यह है कि 2014 में आकर मोदी ने अपने अभियानों से जो आलोड़न पैदा किया उसने भाजपा की आंतरिक जड़ता, निरपेक्ष हो चुके कार्यकर्ताओं-समर्थकों को आलोड़ित किया जा सका तथा फिर ऐतिहासिक जीत प्राप्त की। आडवाणी, जोशी, शांताकुमार एवं यशवंत सिन्हा सबको प्रश्न उठाने एवं नेतृत्व से कुछ मांग करने का अधिकार है, लेकिन छायावादी शैली में बात करने की जगह वो सीधे अपनी बात क्यों नहीं कहते कि पार्टी किस तरह और क्यों प्रभावहीन हुई, वे इसके लिए किसे जिम्मेवार मानते हैं, किस तरह की समीक्षा चाहते हैं, उनकी नजर में पराजय के क्या कारण हैं, इसके लिए क्या और कौन-कौन दोषी है....आदि पर खुलकर बात करते। जब ये खुलकर इतनी बात नहीं कर सकते तो फिर ये अपनी बातों को किसी तार्किक परिणति तक ले जाएंगे इसका कोई विशेष असर होगा ऐसा मानने का कोई कारण नहीं होगा। भविष्य का नहीं कह सकते लेकिन इस समय तो यही लगता है कि यह केवल मीडिया और आम लोगों के बीच चर्चा तक सीमित बवण्डर बनकर रह जाएगा। पार्टी की ओर से तीन पूर्व अध्यक्ष वेंकैया नायडू, राजनाथ सिंह एवं नितीन गडकरी ने बयान जारी कर साफ कर ही दिया है कि सामूहिक जिम्मेवारी अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की परंपरा है।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

गुरुवार, 12 नवंबर 2015

यह मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने का जनादेश नहीं है

 

अवधेश कुमार

चुनाव में जय और पराजय होती है और पराजित होने वाले की राजनीति, मनोदशा पर उसका बहुआयामी असर पड़ना स्वाभाविक है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार जिस अवस्था में है उसमें उनके लिए बिहार विजय बहुत जरुरी था। राज्य सभा में सरकार को आवश्यक विधेयकों को पारित कराने में जिस ढंग की समस्याओं का सामना करना पड़ा है, जिस तरह कांग्रेस ने कठोर रणनीति अपना ली है कि हमको सरकार के काम के रास्ते बस बाधा डालनी है उसमें यह बहुत बड़ा धक्का है। राज्य सभा में अगले दो वर्षों में बहुमत की संभावना का एक आधार बिहार हो सकता था जो नहीं हुआ। दूसरे, इसका मनोवैज्ञानिक असर कांग्रेस सहित राजनीतिक विरोधियों के हौंसला बढ़ने के रुप में आया है तथा मीडिया सहित अन्य क्षेत्रों में मोदी एवं भाजपा के प्रति वितृष्णा ग्रंथि से ग्रसित वर्ग को लग रहा है कि अगर संयुक्त होकर हमला बोला जाए तो मोदी को परास्त किया जा सकता है। तो वे सरकार के विपक्ष में ज्यादा आक्रामक एवं असहिष्णु होंगे। मोदी सरकार एवं भाजपा को इसका सामना करना पड़ेगा। ऐसी और भी समस्याएं और चुनौतियां मोदी सरकार एवं भाजपा के सामने है जिससे निपटने में उनको पहले से ज्यादा कठिनाइयां पेश आएंगी। किंतु कुल मिलाकर विरोधी इस चुनाव परिणाम को जरुरत से ज्यादा खींचकर उसका अर्थ ऐसे निकाल रहे हैं जैसे मोदी सरकार एवं भाजपा के लिए कायमत के दिन आ गए हैं एवं जनता ने उन्हें उसे कयामत तक पहुंचाने का जनादेश दे दिया है।

यह बिहार प्रदेश के विधानसभा चुनाव का परिणाम है जहां विरोधियों की एकजुटता और जातीय गोलबंदी के अनुरुप अपनी रणनीति बनाने में विफलता ने भाजपा को पराजित किया है। क्या बिहार की जनता ने नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव एवं कांग्रेस को केन्द्र मे मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने या उनको काम न करने देने का जनादेश दिया है? क्या इनने कहा था कि हमें आप इसलिए वोट दीजिए कि हम मोदी सरकार को केन्द्र से खत्म करना चाहते हैं, हम उसे किसी सूरत में काम नहीं करने देना चाहते? बहुत सामान्य सी बात है कि यह चुनाव समाजिक-सांप्रदायिक समीकरणों का चुनाव था। एक उदाहरण लीजिए। मोटा मोटी मुसलमान एवं यादव यानी एमवाई संयोग वाली करीब 70 सीटें हैं जिनमें से करीब 55 सीटंें जद यू, राजद एवं कांग्रेस के गठबंधन ने जीता। लालू यादव ने 48 यादवों को टिकट दिया जिसमें से तीन चौथाई से थोड़ा कम जीते हैं। भाजपा की पराजय एवं नीतीश के नेतृत्व वाले गठबंधन की जीत हुई है यह सच है लेकिन इसको इससे ज्यादा समझ लेना गलत होगा और राजनीतिक रुप से भी सही नहीं होगा। लालू यादव कह रहे हैं कि नीतीश अब यहां सरकार चलाएंगे और हम देश भर में मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए निकल पड़ेंगे। देश में लालू यादव का बिहार के अलावा और कहां जनाधार है? उत्तर प्रदेश में यदि मुलायम सिह आपके साथ होते तो भाषण और पत्रकार वार्ता का मंच मिल सकता था। पूर्वी उत्तर प्रदेश में दो चार सभाए हो सकतीं हैं....पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी अजीत सिंह, कांग्रेस के सहयोग से कुछ हो सकता है, लेकिन इससे मोदी सरकार के सेहत पर असर होगा ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है।

दूसरे, जो मोदी विरोधी पार्टियां हैं उनमें से कितने लालू यादव के नेतृत्व में ऐसे किसी अभियान का साथ देंगे? ममता बनर्जी मोदी सरकार के खिलाफ हो सकतीं हैं, पर उनके सामने चुनाव है वो चुनाव देखेंगी या लालू यादव के एजेंडा पर काम करेंगी? वैसे भी ममता का स्वभाव किसी के नेतृत्व को आसानी से स्वीकार करने का नहीं है। कांग्रेस और लालू यादव में वैसे भी रिश्ते तल्ख हैं। क्या जो राहुल गांधी लालू यादव के साथ मंच साझा करने से बच रहे थे वे उनके साथ मंच साझा करेंगे?क्या वे लालू का नेतृत्व स्वीकार करेंगे? लालू यादव अभी सजायाफ्ता हैं। जब तक उनको न्यायालय बरी नहीं कर देता, या फिर उनको सजा नहीं हो जाती, तब तक वे बैठकर चुपचाप रह नहीं सकते। संसद में उनके जाने का रास्ता बंद है तो वो कोई अभियान चलाने का विचार कर सकते हैं, केन्द्र में मोदी और भाजपा विरोधी एकजुटता होगी इसमें भी दो राय नहीं। कुछ पहले से ही है। लेकिन हम न भूलें कि भाजपा विरोधी ध्रुवीकरण सन 1990 के दशक से है और भारतीय राजनीति ने उसके सारे दौर देखें हैं। 1996 में सबसे बड़ी पार्टी होते हुए भी भाजपा को बाहर रखने के नाम पर डेढ़ वर्ष की संयंुक्त मोर्चा सरकार चली जिसमें दो प्रधानमंत्री हुए। संप्रग सरकार का 2004 में गठन ही भाजपा विरोधी ध्रुवीकरण के कारण संभव हुआ। अगला आम चुनाव 2019 में होना है। उस समय तक भारत की राजनीति की क्या परिस्थितियां होती हैं तब तक बिहार सरकार का प्रदर्शन कैसा रहता है, लालू और नीतीश कुमार के संबंध कैसे रहते हैं, सबसे ज्यादा सीटें पाने के बाद लालू यादव नीतीश को मुक्त हस्त से काम करने देते हैं या नहीं........इन सब पर बहुत कुछ निर्भर करेगा।

 इस बीच कई राज्यों के चुनाव हो चुके होंगे। अगले वर्ष तमिलनाडु, असम, पश्चिम बंगाल पुड्डुचेरी के चुनाव है। उसमें असम में कांग्रेस पार्टी टूट चुकी है। भारी संख्या में विधायक एवं नेता भाजपा में शामिल हो रहे हैं। असम के 14 लोकसभा में से 7 भाजपा ने जीती और उसका मत प्रतिशत कांग्रेस से 7 प्रतिशत ज्यादा रहा। तो वहां कांग्रेस के लिए बड़ा खतरा मंडरा रहा है। लगातार तीन बार का सत्ता विरोधी रुझाान है सो अलग। वहां लालू और नीतीश की बैसाखी कांग्रेस को मिल पाएगी क्या? लालू यादव वहां क्या कर पाएंगे? तमिलनाडु में कांग्रेस की सफलता की गुंजाइश शून्य है तथा लालू, नीतीश या मोदी के दूसरे विरोधी वहां ज्यादा कुछ कर नहीं सकते। पश्चिम बंगाल में भाजपा कमजोर है तो कांग्रेस भी मजबूत नहीं है। वाम मोर्चा मोदी विरोधी अभियान में केन्द्र में तो कांग्रेस या लालू का साथ दे सकता है, लेकिन वहां के चुनाव में वह इनके साथ गठबंधन नहीं कर सकता। बिहार में भी वाम मोर्चा ने अपना अलग वजूद बनाने की कोशिश की। केरल में स्थानीय निकाय के चुनाव में भाजपा ने पहली बार रेखांकित करने वाला प्रदर्शन किया है। विधानसभा चुनाव में वह कितना कर पाएगी कहना कठिन है, पर वहां लालू का तो कुछ नहीं है। कांग्रेस को वहां उनकी आवश्यकता भी नहीं है। वहां कांग्रेस सरकार के जाने की संभावना है। तो जरा इन चुनावों के बाद के माहौल की कल्पना करिए। क्या इस समय ये नेतागण जो माहौल बना रहे हैं वही माहौल इन राज्यों के चुनावों के बाद रह सकेगा? फिर 2017 में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश एवं गुजरात के चुनाव हैं। सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में कांग्रेस आज कहां है और जहां है वहां से आगे बढ़ने के लिए वह क्या कर रही है? मान लीजिए भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा, बसपा और सपा के बीच ही मुकाबला हुआ तो उससे कांग्रेस, लालू को क्या मिलने वाला है? उ. प्र. में कांग्रेस का संभावित कमजोर प्रदर्शन उसे उस मानसिक अवस्था में कुछ समय नहीं रहने देगा कि वह मोदी सरकार पर आज की तरह हमला कर सके। हां, अगर उसने पंजाब में सरकार बना ली तो कुछ कहने की हालत में होगी। हिमाचल में हर बार सत्ता बदलती है। अगर यह परंपरा नहीं टूटी तो 2017 में बारी भाजपा की है। गुजरात में कांग्रेस अभी उस अवस्था में नहीं है कि भाजपा से सत्ता छीन सके। उसके बाद 2018 में राजस्थान, छत्तीसगढ़ एवं मध्यप्रदेश का चुनाव आएगा?

इन सबका जिक्र यहां इसलिए आवश्यक है कि एक प्रदेश के चुनाव से उत्साहित होने वालों को जरा भविष्य के दृश्य की याद आ जाए। भारत इतना छोटा देश नहीं है कि एक प्रदेश के चुनाव में विजय से आप केन्द्र सरकार के विरुद्ध एकदम ऐसा वातावरण बना देंगे कि उसका काम करना कठिन हो जाए या उसके अस्तित्व पर खतरा हो जाए। मोदी सरकार के पास लोकसभा में पूर्ण बहुमत है तो उसे कार्यकाल पूरा करना ही है। बिहार में नीतीश कुमार ने जनता से जो सात सूत्री वायदे किए, 2 लाख 70 हजार करोड़ की योजना रखी और जो दूसरे वायदे किए उनके पूरा करने के लिए जनादेश मिला है। बिहार सरकार को ठीक से चलाएं, वहां की आर्थिक-सामाजिक समस्या को दूर करने के लिए काम करें और लालू यादव उसमें साझेदार होने के नाते सहयोग करे। इस जनादेश को इससे ज्यादा समझना उनके लिए भी आत्मघाती साबित हो सकता है।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027207

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

केरला भवन विवाद का कोई औचित्य नहीं है

 

अवधेश कुमार

केरला भवन का मामला इतने बड़े विवाद का कारण बन जाएगा यह कल्पना किसी विवेकशील व्यक्ति ने नहीं की होगी। वास्तव में मामला ऐसा था ही नहीं जिस पर इतना बड़ा बावेला विरोधी पार्टियों की ओर से खड़ा किया जाना चाहिए। मामला इतना ही था कि एक व्यक्ति या संगठन को यह सूचना मिलती है कि केरला भवन के कैंटिन में बीफ बेचा जा रहा है, उसने पुलिस को सूचना दी और पुलिस वहां पहुंची। पुलिस ने केरला भवन के न किसी कर्मचारी को पकड़ा, न कैंटिन को बंद कराया। वह वापस आ गई। राजनीतिक और कानूनी तौर पर बात यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी। लेकिन यह भारत है और भारत की राजनीति की जो दशा है उसमेें जो मुद्दा नहीं होना चाहिए वही मुद्दा बनता है और जिसे मुद्दा बनना चाहिए वह हाशिए में पड़ा रहता है। केरल के सांसदों ने मार्च निकाल दिया। केरल के मुख्यमंत्री ओमन चांडी ने प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति को इसके खिलाफ पत्र लिख दिया। ऐसा माहौल बनाया गया मानो दिल्ली पुलिस का वहां जाना किसी दूसरे देश की सीमा में सेना के घुस जाने जैसा है। इसमें संघीय ढांचा का उल्लंघन हो गया, कोई क्या खाएगा नहीं खाएगा इसकी आजादी पर कुठाराघात हो गया और सबसे बढ़कर देश में फासीवाद आ गया....!!! वाहं रे भारत!

मजे की बात देखिए कि हिन्दू सेना के जिस नेता विष्णु गुप्ता के माध्यम से पुलिस को सूचना मिली उसे ही पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उससे घंटों पूछताछ हुई और उस पर मुकदमा चलेगा। यही नहीं स्वयं प्रधानमंत्री कार्यालय ने इसका संज्ञान लिया, दिल्ली पुलिस से इस बावत लिखित जानकारी मांगी। बावजूद इसके हमारे देश के मांस खाने को मानवाधिकार का मामला बनाने वालों को लगता है कि यह सब केन्द्र सरकार का किया धरा है। ये कह रहे हैं कि दिल्ली पुलिस गृहमंत्रालय के अधीन आता है तो बिना उसके आदेश के वह केरला भवन जा कैसे सकती है। कितना विचित्र तर्क है। किसी राज्य की पुलिस हर बार कहीं जाने या छापा मारने के लिए वहां के राजनीतिक नेतृत्व से आदेश लेती है क्या? क्या केरल की पुलिस किसी की शिकायत आने पर पहले वहां के गृहमंत्री से पूछती है और फिर आगे बढ़ती है या कानून के तहत कार्रवाई करती है? दिल्ली पुलिस के पास यदि फोन आएगा तो उसे जाना ही होगा। किसी प्रदेश का भवन हो वह दिल्ली प्रशासन के अंदर आता है और वहां पुलिस को जाने का पूरा अधिकार है। इसमें कोई कानूनी या प्रोटोकॉल की बाधा है ही नहीं। केरल हाउस या किसी प्रदेश का भवन किसी देश का दूतावास नहीं है कि किसी अपराध के बारे में सूचना मिलने पर पुलिस वहां नहीं जा सकती, क्योंकि वियना संधि के तहत वहं कानूनी कार्रवाई से आजाद है। मान लीजिए अपराध न हुआ, लेकिन पुलिस को सूचना मिली तो पहली ही नजर में बिना वहां गए पुलिस यह कैसे जान जाएगी कि अपराध हुआ या नहीं?

इसलिए यह तर्क बिल्कुल गलत और खतरनाक भी है कि पुलिस केरल भवन के अंदर क्यों गई। कल राजधानी दिल्ली स्थित किसी प्रदेश के भवन के अंदर कोई जघन्य अपराध हो जाए तो उसकी छानबीन दिल्ली पुलिस करेगी या फिर उस राज्य की पुलिस आएगी? यह शत प्रतिशत दिल्ली पुलिस के क्षेत्राधिकार का मामला है। इसे बिल्कुल गलत मोड़ दिया गया है। यह खतरनाक इसलिए है कि कल अगर किसी भवन में हत्या हो रही होगी या कोई और बड़ा अपराध हो रहा होगा तो फोन आने पर भी दिल्ली पुलिस वहां प्रवेश करने से पहले 100 बार सोचेगी। अगर दिल्ली पुलिस नहीं जाएगी, समय पर नहीं पहुंचेगी तो यही तथाकथित मानवाधिकार के लिए छाती पीटने वाले उसके खिलाफ खड़े हो जाएंगे। मान लीजिए दिल्ली पुलिस केरल भवन में बीफ की सूचना की अनदेखी कर देती, नहीं जाती तथा वहां कुछ अवांछित घटित हो जाता तो?

अब यहां यह प्रश्न उठता है कि आखिर दिल्ली पुलिस ने विष्णु गुप्ता को क्यों गिरफ्तार किया? क्या वह अपराधी है? क्या उसने केरल भवन में कानून हाथ में लिया? वहां कोई तोड़फोड़ की? किसी के साथ मारपीट की? क्या केरल भवन के किसी कर्मचारी ने उसके या उसके संगठन के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई? जब ऐसा हुआ ही नही ंतो फिर इस गिरफ्तारी का औचित्य और कानूनी आधार क्या है? जिस तरह से दिल्ली पुलिस के वहां जाने का विरोध अनौचित्यपूर्ण और बेवजह का बावेला है, जिस तरह उसके लिए नरेन्द्र मोदी सरकार पर आरोप लगाना हास्यास्पद है उसी तरह यह गिरफ्तारी भी समझ से परे है। दिल्ली पुलिस कह रही है कि उसने गोमांस का गलत प्रचार किया, पुलिस को गुमराह किया इसलिए गिरफ्तार किया गया है। हिन्दू सेना सही है गलत है, वह क्या करती है, उसके नेताओं-कार्यकर्ताओं की समाज में कैसी भूमिका है इस पर बहस हो सकती है लेकिन जब तक किसी के खिलाफ शिकायत नहीं हो तो केवल इस आधार पर कि उसने पुलिस बुला लिया उसे गिरफ्तार करना भी मानवाधिकार का उल्लंघन है। कई बार पुलिस को किसी अपराध की या अपराध होने की आशंका की सूचना मिलती है, पुलिस जाती है और वहां कुछ नहीं होता तो क्या वह अपनी खीझ मिटाने के लिए किसी को गिरफ्तार कर लेगी? आखिर क्यों केरला भवन की कैंटिन में बीफ मलयालम में लिखा था जबकि शेष सामग्रियां अंग्रेजी में? बीफ का अर्थ गाय और उसके वंशज का मांस भी होता है और भैंस के मांस के लिए भी यही शब्द उपयोग किया जाता है। अगर कोई बीफ का अर्थ गाय या बैल का मांस समझ गया तो क्या उसे आप सजा दे देंगे? वहां कोष्टक में भैंस का मांस तो लिखा नहीं था। अब लिखा गया है।

पुलिस का यह रवैया इसलिए खतरनाक है क्योंकि इसके बाद यदि गाय या बैल के मारे जाने की सूचना होगी वह भी डर से कोई पुलिस तक पहुंचाने से हिचकेगा। दिल्ली में किसी प्रकार के गोवंश की हत्या प्रतिबंधित है। वैसे नीति-निर्देशक सिद्धांत के अनुसार राज्यों को और नागरिक दायित्व प्रावधान के अनुसार नागरिकों को दूधारु पशुओं को हत्या से बचाने के लिए काम करने को कहा गया है। मादा भैंस दुधारु पशु में आती है। फिर भी यहां भैंस की हत्या और उसके मांस खाने पर प्रतिबंध नहीं है, इसलिए कानूनी तौर पर उसे रोका नहीं जा सकता है। लेकिन सामाजिक तौर पर अहिंसक और नैतिक मान्यताओं से उसे हतोत्साहित करना हम सब का दायित्व है। खाने के निजी अधिकार की आवाज में यह महत्वपूर्ण पहलू ओझल हो रहा है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल कहते हैं कि कोई अपने घर में क्या खाएगा यह भी प्रधानमंत्री मोदी तय करेंगे। इस पंक्ति का हम आप क्या अर्थ लगाएं? राजनीतिक तौर पर आप मोदी सरकार का विरोध करिए, समर्थन करिए यह आपका अधिकार है, लेकिन अनर्गल बातें एक मुख्यमंत्री बोले यह किस अधिकार के तहत आता है?

आवश्यकता पड़ने पर घर में भी छानबीन होती है और आगे भी होगी। अगर गोहत्या कहीं प्रतिबंधित है और कोई घर में कहीं से लाकर गोमांस खा रहा है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। इस आधार पर कार्रवाई से वह छूट नहीं पा सकता कि अपने घर में क्या खा रहे हैं यह हमारा अधिकार है। कोई अपने घर में बलात्कार करे तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी की नहीं? क्या उसका यह तर्क मान्य होगा कि मैं अपने घर में कुछ करुं यह मेरा अधिकार है? नहीं न। कानून कहीं भी टूटे वह घर के अंदर हो या बाहर उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होगी। इसलिए इस प्रकार का तर्क गैर वाजिब एवं भविष्य के लिए खतरनाक संकेत वाला है। कुल मिलाकर देखा जाए तो केरल भवन की एक सामान्य घटना को इतना बड़ा बना दिया गया मानो कुछ ऐसा बड़ा घटित हो गया जो कभी न हुआ न आगे होगा। यह हमारे राजनीति के पतन का नमूना है। दुर्भाग्यवश पुलिस भी इसके दबाव में आकर जहां कार्रवाई की आवश्यकता नहीं थी वहां कार्रवाई कर रही है। यह उचित नहीं है।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

उच्चतम न्यायालय के फैसले पर प्रश्न

 

अवधेश कुमार

उच्च्तम न्यायालय द्वारा संविधान के 99 वें संशोधन करके बनाए गए न्यायिक नियुक्ति आयोग या एनजेएसी कानून को रद्द करने के बाद सरकार और अनेक विधिवेत्ताओं की ओर से आई प्रतिक्रियाओं का निष्कर्ष यही है कि इससे संसद के कानून बनाने के सार्वभौमिक दायित्व पर आघात पहुंचा है। सामान्यतः न्यायपालिका के फैसले के विपरीत प्रतिक्रिया देने का चरित्र हमारी राजनीति की नहीं है। दूसरे, ज्यादातर विरोधी दलों ने भी सरकार की आलोचना करने में कोताही बरती है। अगर कोई दूसरा मामला होता और सरकार का कोई कानून इस प्रकार असंवैधानिक करार दिया गया होता तो विपक्षी पाटियों का तेवर कैसा होता इसकी कल्पना करिए। इससे पता चलता है कि उच्चतम न्यायालय के इस फैसले से ज्यादातर राजनीतिक दल एवं विधिवेत्ताओं का बड़ा वर्ग असंतुष्ट एवं नाखुश है। चूंकि उच्च्तम न्यायालय के पांच न्यायाधीश की पीठ यानी संविधान पीठ ने यह फैसला दिया है, इसलिए आगे पुनर्विचार याचिका में इसमें संशोधन की संभावना न के बराबर है। हालांकि पांच में से एक न्यायाधीश ने संसद के कानून को संविधानसम्मत भी माना है। बहरहाल, इस  फैसले के बाद न्यायाधीशों की न्यायाधीशों द्वारा नियुक्ति वाली दो दशक पुरानी कोलेजियम प्रणाली बरकरार हो गई है। यह सामान्य स्थिति नहीं है।

संसदीय लोकतंत्र में संसद को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। संविधान संशोधन करने या कानून बनाने, खत्म करने का अधिकार उसका है। उच्चतम न्यायालय उसकी समीक्षा कर सकता है। संसद द्वारा पारित कानून को रद्द करने का निर्णय संसद बनाम न्यायापालिका के टकराव की ओर जाता है। ध्यान रखिए इस 99 वें संशोधन को संसद के दोनों सदनों के साथ 20 राज्यों ने पारित किया था और इसे सभी राजनैतिक दलों का समर्थन था। इससे इसके पीछे की राजनीतिक औश्र संवैधानिक ताकत का अहसास हो जाता है। हालांकि कुल 1030 पन्नों के फैसले को पढ़ने और समझने में समय लगेगा। लेकिन इसकी कुछ बातें सामने आ गईं हैं। मसलन, 1. एनजेएसी न्यायपालिका की स्वायत्ता में ही नहीं शक्तियों के विभाजन में भी दखल देती है। 2. न्यायिक आजादी  संविधान का बुनियादी ढांचा है, जिसमें सरकार हस्तक्षेप नहीं कर सकती, इसलिए इसे रद्द किया जाता है। 3. एनजेएसी से न सिर्फ मुख्य न्यायाधीश की सर्वाेच्चता कम हो रही थी बल्कि राष्ट्रपति की भूमिका भी कमतर हो रही थी। 4. न्यायाधीशों  के मामले में राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की सलाह पर काम नहीं करते बल्कि स्वतंत्र रूप से निर्णय लेते हैं। हालांकि पीठ ने माना कि कोलेजियम प्रणाली में कुछ खामियां है ओर इसमें सुधार के लिए वह याचिकाकर्ताओं और सरकार से मदद चाहती है। इस पर सुनवाई के लिए पीठ ने 3 नवंबर की तारीख तय की है। पीठ ने न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी 1993 और 1998 के फैसले को समीक्षा के लिए बड़ी पीठ के पास भेजने की केंद्र सरकार की अपील भी खारिज कर दी। इन फैसलों के आधार पर ही कोलेजियम शुरू किया गया था। कोलेजियम में उच्च्तम न्यायालय के पांच वरिष्ठ न्यायाधीश होते हैं जो नियुक्ति, प्रोन्नति तथा स्थानांतरण के लिए उम्मीदवारों की सिफारिश करते हैं। इन सिफारिशों को सरकार मानने के लिए बाध्य होती है और नियुक्ति का आदेश जारी करती है।

आगे बढ़ने से पहले जरा पीठ के न्यायाधीशों की टिप्पणियों पर एक नजर दौड़ा लें। न्यायमूर्ति जगदीश सिंह खेहर-मैं स्वतंत्र रूप से इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि अनुच्छेद 124ए (1) की धारा सी असंवैधानिक है क्योंकि कानून और न्याय के प्रभारी कैबिनेट मंत्री को एनजेएसी को पदेन सदस्य शामिल किया गया है। मेरी राय में धारा सी न्यायिक स्वायत्तता ही नहीं शक्तियों के विभाजन में भी दखल देती है। न्यायमूर्ति मदन लोकुर-99वें संविधान संशोधन तथा एनजेएसी ने सेकेंड और थर्ड जजेज केसों में दी गई सुविचारित प्रक्रिया को पलट दिया है तथा मुख्य न्यायाधीश की संवैधानिक शक्ति को छीन लिया है और उसे शोषण के एनजेएसी की प्लेट में रख दिया है। संसद के लोकप्रिय कानून असंवैधानिक हो सकते हैं और संवैधानिक कानून अलोकप्रिय हो सकते हैं। न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ- इसमें कोई शक नहीं है पूरी गलती कोलेजियम की नहीं है। अयोग्य नियुक्तियों को रोकने में सरकार की सक्रिय चुप्पी ही मुख्य समस्या है। दूसरे और तीसरे जज केसों ने ऐसी नियुक्तियों को रोकने के लिए सरकार के हाथ में प्रभावी औजार दिया था लेकिन सरकार ने इस औजार को कभी प्रभावी तरीके से इस्तेमाल नहीं किया। कोलेजियम में सुधार की जरूरत है और इसे खुलापन तथा पारदिर्शता भी चाहिए। यह प्रणाली लाइलाज नहीं हुई है इसका इलाज संभव है। जस्टिस एके गोयल- कानून मंत्री और दो गैर न्यायाधीश सदस्यों को मुख्य न्यायाधीश के समकक्ष रख दिया गया है। स्पष्ट रूप से उनकी मुख्य न्यायाधीश के साथ तुलना नहीं की जा सकती। कानून मंत्री और दो अन्य सदस्यों के हाथ में सुप्रीम कोर्ट जज, जो कोलेजियम का सदस्य है, के खिलाफ वीटो शक्ति न्यायिक आजादी में दखल बन सकती है।

इनके तर्कों में कितना तीखापन एवं संसद के प्रति कितना गुस्सा है इसका अंदाजा इन वाक्यों से लगा लीजिए। हालांकि इनके परे पीठ मंे एक न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे चेल्मेश्वर भी थे, जिन्होंने लिखा है,‘मेरी राय में संविधान संशोधन में कोई खामी नहीं है लेकिन बहुमत की राय के कारण मुझे एनजेएसी की संवैधानिकता का परीक्षण करने का कोई उद्देश्य नजर नहीं आता। लेकिन चूंकि चार न्यायाधीशांें की राय एक है इसलिए फैसला बहुमत से हो गया है। सच यह है कि कोेलेजियम प्रणाली की कई खामिया उजागर होने के बाद यह व्यवस्था की गई थी। इस आयोग में छह सदस्य होते, जिसके अध्यक्ष देश के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई)ही होते। इसके अलावा उच्चतम न्यायालय के दो वरिष्ठ न्यायाधीश, कानून मंत्री और समाज की दो प्रमुख जानी-मानी हस्तियां होती। हस्तियों के चयन में भी प्रधानमंत्री और लोकसभा में दूसरे सबसे बड़े नेता के साथ मुख्य न्यायाधीश की भूमिका थी।  इनके संयोजन का दायित्व न्याय सचिव को करना था। इससे जरा कोलेजियम प्रणाली की तुलना करिए। इसमें मुख्य न्यायाधीश सहित उच्चतम न्यायालय के पांच वरिष्ठ न्यायाधीश होते हैं जो नियुक्ति, स्थानांतरण और प्रोन्नति पर फैसला लेकर सरकार को भेजते हैं। पूरी प्रक्रिया में सरकार की कोई भूमिका नहीं होती। कोलेजियम 1993 और 1998 के सेकेंड और थर्ड जजेज फैसलों के आधार पर बनाए गया था।

दुनिया की ओर भी नजर दौड़ा लें तो अमेरिका में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है एवं सीनेट इसकी अनुमति देती है। जापान में मुख्य न्यायाधीश की नियुक्त कैबिनेट द्वारा मनोनित होने के बाद राजा करते हैं। अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति कैबिनेट करती है। ब्रिटेन में न्यायापालिका के उच्च पदों यानी जजेस ऑफ द हाउस ऑफ लौर्ड्स की सभी नियुक्तियां  संबंधित मंत्री की सलाह पर कार्यकारी राजा करते हैं। प्रधानमंत्री इनमें से लॉ लौर्डस, द लॉर्ड्स जस्टिस ऑफ अपील, द लॉर्ड्स चीफ जस्टिस, द मास्टर ऑफ द रोल्स एंड द प्रेसिडेंट ऑफ द फैमिली डिविजन  को प्रधानमंत्री मनोनीत करते हैं। ऑस्ट्रेलिया में उच्च न्यायालय और अन्य न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्तियां गवर्नर जनरल इन काउंसिल द्वारा की जाती है। कहने का तात्पर्य यह कि दुनिया के ज्यादातर लोकतांत्रिक देशों में न्यायाधीशों की नियुक्तियों में कार्यकारिणी की भूमिका है तो फिर भारत में इस पर ऐतराज क्यों?

साफ है कि जितनी पारदर्शिता और नियुक्ति में सदस्यों का संतुलन न्यायिक नियुक्ति आयोग में था उतना कोलेजियम में नहीं है। सच यह है कि संविधान में भी नियुक्ति के लिए कोलेजियम का कहीं जिक्र नहीं है। उच्चतम न्यायालय को कानून बनाने का अधिकार नहीं, लेकिन कोलेजियम में उसने ऐसा कर दिया और यह 22 वर्ष से चल रहा है। संसद अपनी संप्रभुता के लिए खड़ी होती है तो यहां टकराव सुनिश्चित है, नहीं खड़ी होती है तो इससे उसके संविधान संशोधन एवं कानून बनाने की शक्ति पर प्रश्न खड़ा होता है। अगर उच्चतम न्यायालय पूरे कानून को ही असंवैधानिक कह रहा है तो इसका मतलब है कि संसद ने असंवैधानिक काम किया है। संसद इसे कैसे स्वीकार कर सकती है। इसलिए संसद इस पर चुप नहीं रहेगी। लेकिन रास्ता आसान नहीं है।

इसका सबसे बड़ा खामियाजा उच्चतम न्यायालय में रिक्तियों पर पड़ेगा। 2 करोड़ से ज्यादा मुकदमे लंबित पड़े हैं। करीब 398 न्यायाधीशों के पद खाली हैं। अगर टकराव कायम रहा तो नियुक्तियां नहीं होंगी। संसद के पास एक विकल्प फिर से विधेयक लाकर कानून बनाने का है, लेकिन इसकी लंबी प्रक्रिया है। केन्द्र से राज्य विधायिकाओं में इसे पारित कराना होगा। वैसे 1950 के दशक में न्यायपालिका का नेहरु सरकार से टकराव हुआ था। जमींदारी उन्मूलन, भूमि सुधार आदि के कानून को उच्चतम न्यायालय ने रद्द कर दिया था। उसके बाद नेहरु जीे ने कहा था कि न्यायपालिका ने न्याय का अपहरण कर लिया है। दोबारा इन कानूनों को पारित करके इसे 9 वीं अनुसूचि में डाल दिया गया। इसमें डालने के बाद यह पूरी तरह रक्षित हो जाता है। वर्तमान सरकार भी चाहती तो इसे 9 वीं अनूसूचि में डाल सकती थी। इसके बाद सबसे बड़ा प्रश्न है कि न्यायिक सुधार का क्या होगा? यह उस सुधार का ही एक अंग था। मूल प्रश्न देश के सामने यह था कि न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता लाने का। कोलेजियम में पारदर्शिता की गुंजाइश नहीं है। अगर न्यायालय स्वयं इसमें सुधार की जरुरत मानता है तो फिर यह सही नहीं है। इसमें दोष है। कहा जा सकता है कि कोलेजिमय के तहत एक अपारदर्शी प्रणाली में नियुक्तियां होती रहेंगी जहां सभी हितधारकों की आवाज नहीं होगी। कॉलेजियम प्रणाली में बदलाव होगा या नहीं यह भी न्यायालय के विवेक पर निर्भर करता है। यह समझ से परे है कि दो जानकार लोगों को आयोग में शामिल किए जाने पर उच्चतम न्यायालय का आपत्ति क्यों है? आखिर उनके चयन में भी तो मुख्य न्यायाधीश की भूमिका थी। पीठ ने कहा कि नियुक्ति में आम लोगों को शामिल करने से काम नहीं बनेगा। हालांकि आयोग का विरोध कुछ विधिवेत्ताओं ने भी किया था। इनमें सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन ही शामिल है किंतु इनकी संख्या कम थी।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015

इस अतिवाद से देश में क्षोभ पैदा हो रहा है

 

अवधेश कुमार

देश में फिर एक बार ऐसी स्थिति बनाई जा रही है मानो सांप्रदायिकता में समाज उबल रहा है और कुछ सेक्यूलर देवदूत उसको बचाने के लिए अपनी बलि चढ़ाने तक को तैयार हैं। क्या वाकई ऐसी स्थिति है? जिस तरह कुछ स्वनामधन्य महानुभावों ने अपना पुरस्कार लौटाना आरंभ किया है उससे तो ऐसा ही लगता है। अलग-अलग हुई जघन्य अपराधों की घटनाओं को एक साथ जोड़कर ऐसी स्थिति बनाई जा रही है मानो इस देश में जो सेक्यूलर हैं उनकी खैर नहीं, जो अल्पसंख्यक हैं उनकी खैर नहीं..... एक विचारधारा के लोग जो चाहेंगे वही होगा...और वे हाथों में फरसा लेकर निकल पड़े हैं कि जो हमारे विरोध में होगा उसको काट देंगे। इन बनाए गए माहौल से परे जरा अपने आसपास नजर दौड़ाइए और देखिए कि क्या वाकई ऐसा ही है? जोे उत्तर आएगा वही सच्ची स्थिति का द्योतक होगा। सच यही है कि ऐसा कोई वातावरण देश में नहीं है।

दादरी बिसहारा मामले की एक जघन्य घटना हमारे सामने है और सारी प्रतिक्रियाएं उस पर आ रहीं हैं। जरा एक और घटना को याद करिए। पिछले  10 सितंबर को बरेली के फरीदपुर थाने के दारोगा मनोज मिश्र को पशु तस्करों ने गोली मार दी। उस दारोगा का दोष इतना था कि वह तस्करी के लिए यानी काटने के लिए ले जा रहे पशुओं से भरे ट्रक को पकड़ने के लिए घात लगाए हुए था। जब ट्रक पकड़ में आ गए तो उनने गोली मारी और मनोज मिश्र की मृत्यु हो गई। क्या उसकी जान की कीमत नहीं थी? आज जो लोग छाती पीट रहे हैं इनमें से किसी की आवाज उस घटना पर सुनाई दी? बिसहारा में तो इखलाक के परिवार को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने पास बुलाया, उनसे बात की, 45 लाख रुपया का मुआवजा दिया तथा घटना की जांच चल रही है। हालांकि पुलिस दबाव के कारण कुछ ऐसे लोगों को गिरफ्तार कर रही है जो शायद दोषी नहीं हैं जिनके विरुद्ध वहां प्रदर्शन भी हो रहा है। लेकिन दारोगा की मृत्यु पर तो मुख्यमंत्री का भी बयान नहीं आया। इन दो घटनाओं पर ऐसे दो प्रकार के व्यवहार को हम क्या कहेंगे? बिसहाड़ा की घटना घोर निदंनीय है, उसके असली दोषियों को पकड़कर कानून में जो सख्त सजा हो वो मिलनी चाहिए, लेकिन उसी गांव में और मुसलमान रहते हैं उनके साथ तो कुछ नहीं हुआ। अगर किसी संगठन की दंगा की साजिश होती तो नजारा दूसरा होता। स्वयं उत्तर प्रदेश सरकार ने गृहमंत्रालय को जो रिपोर्ट भेजी है उसमें कहा है कि अभी तक इस घटना का कारण पता नहीं चला है और जांच चल रही है। जिस सरकार की पुलिस जांच कर रही है उसको घटना का कारण ही पता नहीं और देश में घटना के दोषियों की पहचान करके कुछ झंडाबरदार लोगों ने अपने स्तर पर फैसला भी कर लिया।

आजम खान जैसे नेता, जिनके पास मुस्लिम सांप्रदायिकता के अलावा कोई अस्त्र ही नहीं वो संयुक्त राष्ट्र संघ जाने का ऐलान करते हैं। उसके विरुद्ध इस देश में कोई प्रतिक्रिया नहीं होती कि आखिर एक अपराध के मामले पर आप देश विरोधी हरकत क्यों कर रहे हैं? कल्पना करिए दारोगा मनोज मिश्र की हत्या पर किसी हिन्दू नेता ने ऐसा किया होता तो आज क्या स्थिति होती? वह जेल में होता। आजम खान उस सरकार में मंत्री हैं जिस पर ऐसी कार्रवाई रोकने का दायित्व है। कानून व्यवस्था की जिम्मेवारी उ. प. सरकार की है। अगर उ. प्र. सरकार की जांच मंे किसी संगठन की साजिश नजर आती है वह सामने लाए और फिर कार्रवाई करे। किसी ने उसका हाथ रोका नहीं है। कर्नाटक में कलबुर्गी की हत्या राज्य सरकार की विफलता है। उसकी जांच भी चल रही है। महाराष्ट्र में दो बहुचर्चित हत्याएं कांग्रेस के शासनकाल मेें हुईं और वहां की पुुलिस इसका पता तक नहीं लगा सकी कि आखिर कैसे हत्या हुई और कौन दोषी थे। उनमें से एक पनसारे की हत्या के लिए वर्तमान महाराष्ट्र सरकार के तहत सनातन संस्था के एक व्यक्ति की गिरफ्तारी हुई है। अगर पक्षपात का मामला होता तो उसे आराम से रफा दफा किया जा सकता था। कांग्रेस सरकार के रहते किसी ने सरकारी पुरस्कार नहीं लौटाया।

अब कह रहे हैं कि सनातन संस्था पर प्रतिबंध लगा दो। सनातन संस्था पर पिछले 7-8 सालों से महाराष्ट्र सरकार की खुफिया विभाग और पुलिस की नजर रही है। अगर उनको उसकी गतिविधियां संदिग्ध लगीं तो प्रतिबंधित क्यों नहीं किया? तब तो कांग्रेस-राकांपा की सरकार थी। आज सेक्यूलरवादी तोप के गोले दागने वालों में से कितने लोगों ने ऐसा ही रवैया पहले अख्तियार किया था? संगठन कोई भी हो उसका अगर एक व्यक्ति अपराध में पकड़ में आता है तो उससे पूरे संगठन को दोषी नहीं माना जा सकता। गुजरात दंगे में भाजपा, विहिप के नेताओं के पकड़े जाने की चर्चा होती है लेकिन उसमें कांग्रेस के लोग भी पकड़े गए हैं और उनको सजा हुई है। तो क्या कांग्रेस पार्टी को ही दंगाई मान लिया जाए? ऐसा नहीं हो सकता। आखिर दादरी बिसहारा, महाराष्ट्र, कर्नाटक की घटना पर क्या होना चाहिए? उत्तर एकदम सरल है। राज्य सरकारें निष्पक्षता से जांच करे और जो दोषी हो चाहे वह व्यक्ति हो या समूह उस पर कानूनी कार्रवाई करे। यह राज्य सरकारों का मामला है। केन्द्र की भूमिका तब आएगी जब राज्य सरकारें अपना काम नहीं करेंगी। अगर केन्द्र हस्क्षेप करे तो तथाकथित संघवाद पर हमला हो जाएगा। अगर विरोध करना है तो कर्नाटक सरकार का किया जाना चाहिए, उत्तर प्रदेश सरकार का किया जाना चाहिए जहां ऐसी घटनाएं हुईं हैं।

भारत की अजीब स्थिति है। यहां मुद्दों पर तो संघर्ष करने या विरोध जताने के समय ऐसे लोग पता नहीं कहां रहते हैं, लेकिन जो मुद्दा नहीं होना चाहिए उसे मुद्दा बनाकर और सेक्यूलर कहलाने के लिए ये इस तरह प्रतीकात्मक विरोध करते हैं या बयान देते हैं जिनमें इनका अपना कुुछ जाता नहीं। उल्टे इससे वातावरण विषाक्त होता है, समाज में तनाव बढ़ता है। अब इनकी राग है कि भारत को हिन्दू राष्ट्र या हिन्दू राज्य बनाने की साजिश चल रही है। कहां चल रही है? इस देश के करोड़ों लोगों को ऐसा नहीं लगता लेकिन कुछ सूक्ष्मदर्शी तत्व हैं जिनको यह नजर आ जाता है। सच यह है कि केन्द्र सरकार की ओर से किसी स्तर पर ऐसा कदम नहीं उठाया गया है जिससे वाकई देश को हिन्दू राज में बदलने का संदेह भी पैदा हो। कुछ लोगों की समस्या है। भाजपा या संघ परिवार के विचारों से मतभेद में समस्या नहीं है। एक जागरुक समाज मंे विचारधारा के आधार पर सहमति-असहमति, समर्थन-विरोध होता है और होना चाहिए। इससे संतुलन भी बना रहता है तथा अतिवाद की ओर जाने का खतरा कम होता है। किंतु यह व्यवहार तो स्वयं में अतिवाद है। हिन्दू राज स्थापित करने का आरोप लगाकर देश को बदनाम करना है। इस देश में आधी से ज्यादा राज्य सरकारें दूसरी पार्टियों की हैं। हमारे यहां संविधान की मूल अवधारणा में परिवर्तन संभव ही नहीं। कुछ होगा तो न्यायपालिका है। क्या ये सब ऐसा कुछ होगा तो मूकदर्शक बने रहेंगे? भारत देश हिन्दू मुसलमानों के साथ सभी छोटे पंथों-संप्रदायों का है और रहेगा। किंतु यह नहीं हो सकता कि एक संप्रदाय को कुछ हो गया तो वह बड़ा मुद्दा बन जाए और दूसरे संप्रदाय के साथ हो तो उसे सामान्य मान लिया जाए।

सच यह है कि ऐसे रवैये से आम आदमी के अंदर क्षोभ पैदा होता है और वो विद्रोह में प्रतिक्रियाएं व्यक्त करता है। ऐसे लोगों के अतिवादी रवैये के विरुद्व ही पहले गुजरात की जनता नरेन्द्र मोदी को निर्वाचित करती रही और फिर इनके तमाम प्रचारों के बावजूद देश के बहुमत ने उन्हें प्रधानमंत्री बना दिया। दिक्कत यह है कि कुछ लोग अभी भी यह दिल से स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि वाकई नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हो गए। उनका कोई इलाज नहीं है। लेकिन वो जो कुछ कर रहे हैं उससे संाप्रदायिक शांति की जगह तनाव बढ़ेगा, दोनों के बीच दूरिया घटने की बजाय बढ़ेगी, खाई पटने की जगह चौड़ी होगी। इसलिए समाज के असली खलनायक ये ही हैं। पुरस्कर लौटाने वालों में कुछ ऐसे लोग है,ं जो उन पुरस्कारों के हकदार थे लेकिन ऐसे भी हैं जिनको केवल सरकार की कृपा से पुरस्कार का प्रसाद मिल गया। वे लौटा भी दे ंतो उससे क्या फर्क पड़ता है। उनको समस्या है तो वो देश भी छोड़कर चले जाएं कोई समस्या नहीं आने वाली। इस देश से मुसलमानों को कोई बाहर नहीं कर सकता, उनको दोयम दर्जे का नागरिक कोई नहीं बना सकता इसकी पूरी गारंटी है और देश उस दिशा में न पहले जा रहा था न आज जा रहा है। यह सब कुछ लोगों की मानसिक समस्या है जो एक विचार और संगठन से घृणा की फासीवादी प्रवृत्ति से निकलती है। हां, जहां अतिवाद पैदा हो रहा है उस पर अंकुश की आवश्यकता है और राज्य सरकारें उस दिशा में सख्ती बनाए रखे। बस, इससे ज्यादा कुछ करने की आवश्यता भी नहीं है।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

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