गुरुवार, 5 मार्च 2015

कश्मीर सरकार और विवाद

अवधेश कुमार

जम्मू कश्मीर में भाजपा पीडीपी सरकार बनने के बाद मुफ्ती मोहम्मद के अलगाववादियों, आतंकवादियों एवं पाकिस्तान के समर्थन में स्पष्ट दिखने वाले बयानों को लेकर संसद से बाहर तक जो आक्रोश है उसे अनुचित मानने का कोई कारण नहीं है। इस तरह अगर सरकार मेे शामिल लोग संसद हमले में अपराध सिद्ध अफजल गुरु की फांसी को गलत ठहरायेंगे तो उसकी प्रतिक्रिया देश के अन्य भागों एवं राजनीतिक प्रतिष्ठान में होनी ही है। तत्काल ऐसा लगता है जैसे भाजपा कश्मीर पर अब तक अपने आक्रामक राष्ट्रवादी धारा के विपरीत राष्ट्रविरोधी तत्वों के साथ गठबंधन करके सत्ता में आ गई है और उसके पास अपने ही समर्थन से बनाए गए मुख्यमंत्री के बयानों का कोई तार्किक उत्तर नहीं है। हमला केवल विपक्ष की ओर से ही नहीं है, स्वयं भाजपा के अंदर भी असहजता महसूस की जा रही है, कार्यकर्ताओं के अंदर क्षोभ और आक्रोश है। सभी पार्टियां उसे कठघरे में खड़ा कर रहीं है। अगर इतना भी आक्रोश नहीं हो तो लगेगा इस देश में अब अपने राष्ट्रीय मुद्दों के प्रति भी प्रखरता लुप्त हो रही है। लेकिन केवल इस पहलू के आधार पर जम्मू कश्मीर की वर्तमान सरकार तथा उसके औचित्य अनौचित्य का मूल्यांकन करना एकपक्षीय होगा।

जम्मू कश्मीर हमारे लिए ऐसा मुद्दा है जिसका समाधान आज तक कोई सरकार नहीं कर सकी। पर यह भी ध्यान रखें कि वहां की किसी सरकार की हिम्मत भी नही कि वह वहां केन्द्र के विरुद्ध जाकर नीतिगत बदलाव की मनमानी कर सके। इस बात के प्रति हमें निश्चिंत रहना चाहिए। हमें यह स्पष्ट समझना होगा कि कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपरिहार्य है और भारत के हित में। कश्मीर राष्ट्रपति शासन में ज्यादा दिन न रहे और निर्वाचितों की सरकार बने इसका संदेश अलग जाता है। राष्ट्रपति शासन से वहां भी विरोधियों को असंतोष बढ़ाने तथा दुनिया भर में दुष्प्रचार करने का अवसर मिलता है। इसलिए कश्मीर में हर हाल में निर्वाचित सरकार बनना ही चाहिए था। इसलिए मैं और मेरी तरह सोचने वाले लोगों ने भाजपा पीडीपी सरकार के भविष्य पर संदेश व्यक्त करते हुए, मुफ्ती मोहम्मद सईद तथा पीडीपी की अलगाववादियों, आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति का भाव जानते हुए भी सरकार बनने का समर्थन किया है। किंतु सरकार बनने का समर्थन करने यह अर्थ नहीं कि सईद व पीडीपी के मंत्रियों विधायकों के बोल का किसी सूरत में समर्थन किया जा सकता है। 

पर सईद जो बोल रहे हैं वह आपत्तिजनक ही नहीं तथ्यात्मक रुप से गलत है। आखिर कश्मीर चुनाव को बाधित करने के लिए पाकिस्तान, उसकी आईएसआई और आतंकवादियों ने पूरी कोशिश की। हमले किए, हमारे जवान और निर्दोष मारे गए। तीन-तीन दिनों तक सेना को आतंकवादियों से मोर्चाबंदी करनी पड़ी। सईद यदि कह रहे हैं कि आतंकवादियों, अलगाववादियों तथा पाकिस्तान ने बैलेट के महत्व को समझा और पहले की तरह बाधा नहीं पहुंचाया तथा चुनाव शांतिपूर्ण सम्पन्न हो सके तो यह उन सारे शहीदों का अपमान है जिनने चुनाव के लिए जान दे दी। उनके शव पर पत्थर फेंकने जैसा है। इसकी निंदा होनी चाहिए। हालांकि हंगामें के बाद उनने अपना स्पष्टीकरण दिया है जिसमेें चार बातें कहीं हैं। 1 मैंने पाकिस्तान और हुर्रियत के बारे में मैंने कहा कि कश्मीर के उबरने और लोकतंत्र के काम करने के साथ इसमें विश्वास को उन्होंने (पाकिस्तान और हुर्रियत ने) मान्यता दी। उन्होंने इस बात को समझा कि मतदाता पर्ची लोगों की नियति है, न कि गोली या ग्रेनेड। 2. और यह मतदाता पर्ची हमे भारत के संविधान ने दी है। जम्मू कश्मीर की आवाम की इसमें (अधिकार में) कहीं अधिक आस्था है। उन लोगों (सीमा पार के लोग और हुर्रियत) ने दखलंदाजी नहीं की, जैसा कि पहले (चुनावों में) हुआ करता था। 3. मैंने जो कुछ कहा उसके सिर्फ एक ही हिस्से पर जोर दिया गया जबकि सकारात्मक चीजों को नजरअंदाज कर दिया गया। वे लोग तिल का ताड़ बनाना चाहते हैं। 4 भारत के संविधान में कश्मीर ने जो संवैधानिक अधिकार पाया है और लोकतांत्रिक संस्थानों ने जो मजबूती पाई है, यह मतदाता पर्ची के चलते है, जिसे उन्होंने मान्यता दी। उन्होंने हर चीज आजमाई। उन्होंने (सीमा पार की ताकतों) लोकतंत्र की संस्था को मान्यता दी।

उनके स्पष्टीकरण में भारत के संविधान की स्वीकृति तो है, पर मूल रुप में वे अपने बयान पर कायम है जो हर हाल में आपत्तिजनक है। इसे अगर कोई भारत विरोधी बयान कह रहा है उसे भी गलत नहीं ठहराया जा सकता है। लेकिन क्या सईद से ऐसे बयान की अपेक्षा हमें नहीं थी? क्या अफजल गुरु की फंासी का गलत ठहराना या उसका शव मांगना अप्रत्याशित है? इन दोनों प्रश्नों को उत्तर है, नहीं, कतई नहीं। भाजपा और मोदी का भय दिखाकर जिस तरह उनने वोट पाया है और अब उसके साथ सरकार बना रहे हैं तो फिर वे अपने समर्थकों को कैसे मना पाएंगे? इसलिए वे और उनकी पार्टी कुछ ऐसा अतिवादी बयान देंगे। इसी तरह अफजल के फांसी दिये जाने के बाद कश्मीर घाटी में जैसा विरोध हुआ, वहां की विधानसभा में जिस तरह का क्षोभ प्रकट किया गया उस दृश्य को याद कीजिए। ऐसा वहां पहले से हो रहा है। पूर्व विधानसभा में बराबर मामला उठता रहा है। यह वहां चुनाव का भी मुद्दा था। पीडीपी के नेताओं ने घाटी मेें यह मामला उठाया था। यह देश विरोधी कृत्य है, पर कश्मीर में ऐसा होता रहा है यह हम न भलें। वे ऐसा आगे भी करेंगे और हमेें उसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 

सईद की विधारधारा वैसे भी कश्मीर के सभी मुख्य राजनीतिक दलों में सबसे ज्यादा अलगाववादी समर्थन की रही है। वे केन्द्र में गृहमंत्री तक रहे, उनकी बेटी सांसद तक रहीं हैं, पर इससे उनके प्रकट स्वर में कोई अंतर नहीं आया। कांग्रेस के साथ सरकार बनाने के बाद भी वो इस तरह के बयान देते थे जिसका भाजपा इसी तरह आक्रामकता से विरोध करती थी जैसी आज दूसरी पार्टियां कर रहीं हैं। उनके बयानों से तंग आकर कांग्रेस की ओर से अंतिम तीन साल के लिए मुख्यमंत्री बने गुलाम नबी आजाद ने उनसे नाता तोड़ देने में ही भलाई समझी। हालांकि भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री के पद पर बैठा व्यक्ति इस तरह का बयान दे तो इसे गले उतारना किसी के लिए भी कठिन होगा। पर हमें विरोध करते हुए भी इस सरकार को भंग कर देने या भाजपा द्वारा तुरत सरकार से बाहर आ जाने की अतिवादी मांग से तत्काल बचना चाहिए। यह मानना गलत होगा कि वे ऐसा कुछ कर पाने की स्थिति में हैं, जो केन्द्र की कश्मीर नीति के विरुद्ध है। हां, यह संभव है कि उनके बयानों से अलगाववादी तत्वों की थोड़ी हौंसला अफजाई हो।

हम यहां एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू नजरअंदाज कर रहे हैं। यह वहां की पहली सरकार है जिसमें जम्मू और लद्याख का वास्तविक प्रभावी प्रतिनिधित्व हुआ है। यह पहली सरकार है जिसमें हिन्दू और मुसलमान बराबरी के स्तर पर शामिल हैं। यह पहली सरकार है जिसमें संसाधनों के वितरण, विकास की नीतियों या अन्य मामलों में जम्मू और लद्याख को पहले की तरह नजरअंदाज करना कठिन होगा। संसाधनों के समान वितरण की संभावना वाली सरकार है। तो इसके ऐसे कई सकारात्मक पहलू भी हैं। 

हां, मूल बात केन्द्र के रवैये का है। यानी केन्द्र उनके साथ गठबंधन से परे सरकार के स्तर पर कैसा व्यवहार करती है। भाजपा एक सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया को जिस ढंग से हैण्डल करनी चाहिए नहीं कर पाई है। सईद जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलने आये थे तो वे उनसे केवल हाथ मिलाना चाहते थे। प्रधानमंत्री ने उनको ऐसे गले लगाया मानो कोई एकदम दिली मित्र मिल रहे हों। कोई भी महसूस कर सकता था कि सईद गले मिलते वक्त हिचकिचा रहे थे। सच कहा जाए तो यह एक मजबूरी की सरकार थी और उसे उसी रुप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए था। कठोर मोलभाव करते हुए मुफ्ती को उनकी सीमायें बतलाई जानी चाहिए थी। कांग्रेस ने 2002 में समझौता किया तो 3-3 साल के मुख्यमंत्री पद के लिए। भाजपा के पास 24 अपना तथा एक निर्दलीय का समर्थन है। पीडीपी के पास 28 विधायक हैं। तो सीटों में इतना अंतर नहीं है। इनको इसके लिए दबाव बनाना चाहिए था। साथ ही कुछ महत्वपूर्ण मंत्रालय की भी मांग करनी चाहिए थी। गृह, वित्त और कानून तीनों मंत्रालय पीडीपी के पास है। ये वे नहीं कर सके। पर सेना को मिले विशेष अधिकार हटाने पर केन्द्र ने उनको ना कह दिया है। इसी तरह उनकी कई मांगे थीं जो सामान्य न्यूनतम कार्यक्रम में शामिल नहीं हैं। पाकिस्तान से बातचीत इस समय सही है गलत है इस पर दो राय हो सकती है, पर यह केन्द्र की नीति में शामिल है। मुफ्ती के कहने से होगा, यह सोचना बेमानी है। वे श्रेय लेने के लिए बयान देंगे। इसे सुनते और विरोध करते हुए कामना करनी चाहिए कि सरकार कश्मीर की जनता की भलाई के लिए काम करे। उनका विश्वास भारतीय लोकतंत्र में और मजबूत हो।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208


शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

खेल में ऐसा उन्माद और जुनून

अवधेश कुमार
खेल खेल हैं। इसे खेल की तरह ही लिया जाए तो यह न केवल खिलाड़ी बल्कि उस देखने वालों के अंदर भी स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित करेगा, परिश्रम और पुरुषार्थ के लिए प्रेरित करेगा। लेकिन खेल हमारे दौर में न जाने क्या हो गया है। भारत पाकिस्तान क्रिकेट मैच के बाद के कुछ दृश्य जो हमारे सामने आये हैं डरावने हैं। इस प्रकार का उन्माद कि ऑस्ट्रेलिया तक के एक क्लब में दोनों देशों के लोग एकदम दो गैग की तरह एक दूसरे से मारपीट करते नजर आए। ऐसा लग रहा था जैसे ये खून के प्यासे हों। ये सब पढ़े लिखे और संपन्न परिवारों के लोग हैं। उनमें कुछ घायल भी हो गए। पता नहीं आगे क्या होगा? भारत के कई शहरों में लोग इस तरह पटाखे फोड़ते और नारे लागाते सड़कों पर उधम मचाते निकले कि कुछ जगह हिंसा हो गई। न जाने कितनी खबरें हमारे पास नहीं आई हांेगी, छोटी मोटीं घटनायें हुई भी होंगी और कुछ टाली भी गई होंगी। तो इसे क्या कहेंगे? इसे किसी तरह संतुलित समाज का व्यवहार तो नहीं कहा जा सकता है।
 आम तौर पर शांत दिखने वाले, अपने आप तक सीमित रहने वाले, कार्यालय से घर तक को ही दुनिया बना लेने वालों के व्यवहार में भी मैच के दौरान और उसके बाद अचानक अजीब बदलाव आते आपने देखा होगा। ऐसे व्यवहार कर रहे थे मानो एक मैच के विजय से सनातन दुश्मन को पददलित करने का सुख मिलने वाला है और उसमें हमारी भी हिस्सेदारी है। इस प्रकार का सामूहिक असंतुलन समाज में पैदा होना दरअसल उन्माद और जुनून ही है। इसे हम राष्ट्वाद नहीं कह सकते। प्रश्न है कि इस तरह का जुनून आखिर क्यों पैदा होता है और इसे उत्तेजित करने वाले कौन होते हैं? पाकिस्तान के कराची से एक लाइव तस्वीर टीवी पर दिखाई जा रही है जिसमें लोग गुस्से में अपना टीवी फोड़ते नजर आ रहे है। खबर में कहा जा रहा है कि ऐसा करने वालों के अनुसार न रहेगा टीवी न देखेंगे मैच। पता नहीं इस खबर में कितनी सच्चाई है। आखिर तात्कालिक गुस्से में टीवी फोड़ने वाले चैनलों को पहले से क्यों बुलाकर रखेंगे? या उसकी फिल्म क्यों बनाएंगे? इसलिए वह दृश्य स्वाभविक से ज्यादा कृत्रिम लगता है। ज्यादा संभावना तो इसी बात की है कि वहां इस दृश्य का निर्माण किया गया होगाा। लेकिन यह सच है कि पाकिस्तान में भी इस हार से गुस्से का गुब्बार फूटा और कई जगह लोग खिालड़ियों के खिलाफ अपशब्दों का प्रयोग करते देखे गए। हालांकि उनकी यही खिलाफत तब नहीं होती जब पाकिस्तान किसी दूसरे देश से हारता है।
यही बात हम पर भी लागू होती है। हमारी टीम जब दुनिया की किसी दूसरी टीम से जीतती है तो हमारे अंदर अपने दुश्मन को रौंदने जैसा उन्मादपूर्ण सुख का बोध नही होता। यह अजीब व्यवहार है। कितने लोग अपना भारी खर्च करके पटाखे खरीदते हैं जुलूस निकालते, निकलवाते हैं......पार्टियां करते हैं, पबों में क्लबों में डांस....फिर सड़कों पर हंगामा....... न जाने क्या क्या होता है? कभी हमने शांति से बैठकर यह सोचा है कि  इन सबसे हम माहौल कितने जुनून और उन्माद का बना रहे हैं और इसके परिणाम क्या आयेंगे? पाकिस्तान और भारत के बीच रिश्ते वैसे ही आतंकवाद, कश्मीर में हिंसा और सीमा पार से गोलीबारी की भेंट चढ़ता रहा है। पाकिस्तान अपनी जड़विहीन राष्ट्रीयता की कंुठा तथा स्वयं को भारत के बराबरी दिखलाने की विकृत नीतियों के कारण हमेशा तनाव पैदा करता रहा है। हर मानवतावादी युद्ध का विरोधी होगा,  लेकिन इन मामलों में भी यदि आतंकवादी मारे जाएं, या सीमा पर हमारे सुरक्षा बल पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की साजिशों को अपनी वीरता से ध्वस्त कर दें, पाकिस्तान को झुका दे ंतो जश्न और जुनून समझ में आता है। उसमें यदि आपका राष्ट्रवाद तुष्ट होता है तो फिर भी एक हद तक उसे स्वीकार किया जा सकता है, लेकिन क्रिकेट या हौकी या ऐसे किसी खेल में विजय से व्यावहारिक धरातल पर कोई अंतर नहीं आने वाला।
साफ है कि हमारे देश का बड़ा वर्ग सच और झूठ के युद्ध में अंतर नहीं कर पाता, सच्चे और झूठे विजय के बीच अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पता। एक सामान्य से 100 ओवर के मैच पर, जिससे वास्तविक जीवन या धरातल पर किसी मामले में कोई अंतर नहीं आ सकता, राष्ट्रभक्ति के नाम पर ऐसा उन्माद डरावना है। यह शत प्रतिशत विवेकहीनता है। राष्ट्रवाद या राष्ट्रभक्ति इतनी संकुचित अवधारणा नहीं हो सकती। गांधी जी ने तो कहा कि हमारा राष्ट्रवाद यदि दूसरे के राष्ट्वाद से टकराव का कारण बन जाये, या हमारा राष्ट्रवाद किसी तरह दूसरे का विरोधी हो जाए उसे डराने लगे तो यह राष्ट्रवाद नहीं हो सकता। गांधी जी अकेले ऐसे कहने वाले नहीं थे। आप स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविन्द, सुभाषचन्द्र बोस.....जिनका अंग्रेजों के समय राष्ट्रीयता का भाव पैदा करने मे महान योगदान था, सबने यही बात कही है। उनके शब्द और वाक्य अलग हैं, पर भाव यही है।  पाकिस्तान एक असंतुलित देश है। उसका व्यवहार असंतुलित हो सकता है। भारत के लोगों का आचरण तो परिपक्व होना चाहिए। हमंें तो अपने मनीषियों की सोच के अनुसार व्यवहार करना चाहिए।
टीम की जीत पर खुश होने में कोई समस्या नहीं। आप खुशी मना लीजिए, लेकिन उसकी सीमा होगी। खुशियां अंधराष्ट्रवादी जुनून में बदल जाएं तो इसका चरित्र दूसरा हो जाता है और फिर ऐसी खुशियां न जाने कितनों के लिए मातम में बादल जातीं हैं। अगर ऐसा नहीं हो रहा और इसकी जगह उन्माद और जुनून पैदा होता है तो इसके पीछे अगर कुछ शक्तियां, कुछ माध्यम हैं तो उनकी भी पहचान करने की आवश्यकता है। प्रश्न यह भी है कि क्या हम राष्ट्रीयता के असली मायनों से विमुख हो चुके है या हो रहे है? या हमारे अपने अंदर का सामूहिक अवसाद, कुंठायें, विफलताओं से पैदा हुआ क्षोभ... आदि ऐेसे समय दूसरे रुप मंें प्रस्फुटित हो जातीं हैं? हम माने या न मानें यह सकारात्मक राष्ट्रीय चेतना के धूमिल पड़ने का प्रमाण है। आखिर हम यह क्यों नहीं सोचते कि खेल भावना जैसा शब्द और विचार काफी विचार करने के बाद प्रयोग मंे लाया गया। इसका अर्थ क्या है? चाहे हम जीतें या हारें, एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के रुप में इसे लें ताकि सबके अंदर सकारात्मक चेतना का विकास हो। खेल प्रतिस्पर्धाओं की कल्पना ही देशांे को निकट लाने, उनके बीच भाईचारा, सहकार विकसित करने के लिए की गई थी। अगर ये प्रतिस्पर्धायें इसके विपरीत भाव पैदा कर रहीं हैं तो फिर ऐसे आयोजन पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाएगा। ऐसा होता है तो हमें रुककर ऐसे आयोजनों पर ही पुनर्विचार करना पड़ेगा।
 अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

इसके गहरे आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिणाम होंगे

अवधेश कुमार
तो अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की सरकार न काम करना आरंभ कर दिया। इतने बड़े जानदेश के बाद यह केवल औपचारिकता थी। कोई भी राजनीतिक परिवर्तन या चुनाव परिणाम केवल सदन के अंकगणित तक सीमित नहीं रहता। उसका अवश्यंभावी राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिणाम होता है। खासकर जब ऐसी पार्टी सत्ता में आई हो जो कि सम्पूर्ण नागरिक सेवाओं, प्रशानिक दुर्बलताओं, व्यापारिक गतिविधियों, कर प्रणाली के साथ शिक्षा एवं स्वास्थ्य के आधारभूत ढांचे में आमूल परिवर्तन की घोषणा कर रही हो। मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि हमें अहंकार नहीं करना है और दिल्ली को बेहतर दिल्ली बनाना है। उनके शब्द थे कि आज कांग्रेस की दुर्दशा इसलिए हुई, क्याेंकि वह अहंकार का शिकार हो गई थी और भाजपा भी अहंकार का शिकार थी, इसलिए उसकी ऐसी हालत हुई। तो इसमें भविष्य के लिए राजनीतिक और आर्थिक संदेश दोनों छिपे है। हालांकि उनके दूसरे नेताओं ने भारत की सम्पूर्ण राजनीति में क्रांति लाने की बात तक की, पर केजरीवाल पिछली बार की तुलना में ज्यादा संतुलित हैं। पिछली बार जीतने के बाद उनकी भाषा में जितना क्रोध और अहं था, विरोधी पार्टियों के लिए जो हिकारत भाव था, वह इस बार नहीं दिखा है। इस नाते इसको एक परिपक्व व्यवहार कहा जा सकता है। देखना होगा यह परिपक्व व्यवहार कब तक कायम रहता है।
भाजपा की ऐसी बुरी पराजय क्यांें हुई, आआपा की ऐसी ऐतिहासिक जीत किन कारणों से हुई और कांग्रेस का पूर्णतया सफाया हो जाने के पीछे कौन से कारक हाबी थे.....आदि पर हम कई प्रकार के मत व्यक्त कर सकते हैं। कुछ कारण हमारे सामने साफ हैं और उन पर चर्चा करना अप्रासंगिक नहीं है। लेकिन हम यहां यहीं तक अपनी बात सीमित रखेंगे कि दिल्ली के लोगों ने किरण बेदी और अजय माकन के चेहरे से केजरीवाल का चेहरा ज्यादा विश्वसनीय माना एवं उनके वायदों से ज्यादा आकर्षित हुए, अन्यथा ऐसा एकपक्षीय बहुमत नहीं आता। भाजपा एवं कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के दोनों उम्मीदवार की पराजय सामान्य परिणाम नहीं है। तो इस असामान्य परिणाम के आगे क्या परिणाम होंगे जरा उन पर विचार करें। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो कई वक्तव्य हमारे सामने आ गए है। एक है, कोलकाता की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का जिन्होंने कहा कि यह अहंकार की पराजय है और उन्होंने आगे आआपा और अन्य पार्टियों के साथ मिलकर भाजपा विरोधी मोर्चा की बात कही। दूसरा वक्तव्य बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का है। उन्होंने भी कहा कि इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ेगा एवं हवाबाजी की पराजय आरंभ हो गई है।
हम नीतीश के इस वक्तव्य से सहमत नहीं हो सकते कि यहां से भाजपा की पराजय की शुरुआत हो गई है और नरेन्द्र मोदी की सरकार केवल हवाबाजी कर रही है। न ही हम ममता के विश्लेषण से सहमत हो सकते हैं। लेकिन अब विरोधी पार्टियां, जो किसी तरह मोदी की एक पराजय देखना चाहती थी ताकि भाजपा का नैतिक बल कमजोर हो एवं उनको यह कहने का मौका मिले कि देखो मोदी की हवा निकल गई, झूठ का खेल सामने आ गया और अब हम उनको पराजित कर सकते हैं। यानी अपने समर्थकों एवं कार्यकर्ताओं में यह विश्वास पैदा करना कि मोदी अपराजेय नहीं हैं, हम एकजुट होकर लड़े तो उनको हरा सकते हैं। इसका प्रचार जोर-शोर से होगा। दिल्ली में सारी भाजपा विरोधी पार्टियों ने, भले उनका जितना मत रहा हो, आआपा को विजय दिलाने के लिए काम करने का आह्वान किया था। इससे सामान्य निष्कर्ष यह निकलता है कि दिल्ली की तरह दूसरे राज्यों में भी शायद ऐसा प्रयोग हो सकता है। पर बिहार में नीतीश एवं लालू गठजोड़ के अलावा ऐसा कोई गठजोड़ बनता नहीं दिखता। आआपा को समर्थन देने वाली वामपंथी पार्टियों एवं ममता के बीच गठजोड़ कैसे संभव है? इसी तरह मायावती एवं मुलायम सिंह के बीच हाथ मिलाने की अभी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। बावजूद इसके विरोधी दलों का पक्ष थोड़ा मजबूत होगा और भाजपा बचाव की मुद्रा में रहेगी। उसका आक्रामक तेवर नीचे आयेगा। आआपा अन्य दलों के साथ उनके राज्यों में गठजोड़ करेगी और उसका असर होगा यह कहना अभी कठिन है। इसलिए इसके लिए हमें प्रतीक्षा करनी होगी। साथ ही भाजपा विरोधी पार्टियों में कांग्रेस भी शामिल है, उसका स्थान इसमें कहीं होगा या नहीं यह भी साफ नहीं है। आआपा तो उसके साथ नहीं जा सकती है। तो दिल्ली चुनाव परिणाम से निकले संदेशों की चाहे अलग-अलग पार्टियां अपने तरीके से व्याख्या करें, वे तत्काल जितने उत्साहित हो जाएं, इसकी कोई ठोस निश्चित रुपाकार की कल्पना अभी नहीं की जा सकती।
लेकिन इसके व्यापक आर्थिक परिणामों से इन्कार नहीं किया जा सकता। उदाहरण के लिए आआपा ने पिछली सरकार के दौरान ही खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश न करने का निर्णय लिया था। हालांकि संप्रग सरकार में भाजपा भी इसकी विरोधी थी, किंतु नरेन्द्र मोदी जिस अर्थनीति पर चल रहे हैं उसमें विदेशी निवेश का व्यापक महत्व है। पता नहीं वे क्या चाहते हैं, पर अगर इस तरह केजरीवाल ने अन्य कुछ क्षेत्रों में विदेशी निवेश को रोकने का कदम उठाया तो इसकी आर्थिक प्रतिध्वनि काफी गहरी होगी। दूसरा उदाहरण व्यापार पर लगने वाले वैट का है। अपने 70 सूत्री घोषणा पत्र में आआपा ने कहा है कि वह दिल्ली में वैट घटायेगी ताकि यहां के सामान ज्यादा बिकंे और आर्थिक गतिविधियां तेज हो। साफ है कि वे ऐसा करेंगे तो इसका प्रभाव दिल्ली के खजाने पर पड़ेगा एवं इससे दूसरे राज्य भी प्रभावित होंगे। अगर बिक्री अपेक्षानुरुप नहीं बढ़ी और खजाने में धन नहीं आया तो फिर कठिनाई पैदा हो सकती है। हालांकि जीएसटी पर सभी राज्य समझौते के करीब हैं.....पर केजरीवाल क्या करेंगे कहना कठिन है। ये दो उदाहरण तो नीतियों के हैं जो संभवतः केन्द्र सरकार एवं कई राज्य सरकारों की नीतियों से अलग जाते हैं।
नीतियों से परे आआपा ने 70 सूत्री घोषणा पत्र में जो वायदे किए हैं जिसमें लोगों के सिर से खर्च का बोझ घटाने एवं कोई कर या शुल्क न लगाना शमिल हैं और जो इसकी विजय का सर्वप्रमुख कारण है, उसके खर्च के आकलन से सिर चकरा सकता है। कुछ पर नजर दौड़ाइए-  बिजली बिल आधे किए जाएंगे, दिल्ली का अपना पॉवर स्टेशन बनेगा, प्रति माह हर घर के लिए 20 किलोलीटर (20,000 लीटर) तक मुफ्त पानी, पानी की दरों में सालाना 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी के प्रावधान का अंत, सभी घरों तक पानी का पाईप भी बिछाना, 2 लाख सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण, 500 नए स्कूलों का निर्माण, हर स्कूल में लड़कियों के लिए शौचालय, कंप्यूटर और उच्च गति के इंटरनेट कनेक्टिविटी की सुविधा हर स्कूल में, 17 हजार नए शिक्षकों की भर्ती, 20 नए डिग्री कॉलेज, 900 नए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) और अस्पतालों में 30,000 अतिरिक्त बेड की सुविधा देना, हर 1000 लोगों के लिए पांच बेड के अंतरराष्ट्रीय मानदंड को भी सुनिश्चित करना, सभी के लिए सस्ती और उच्च गुणवत्ता वाली दवाएं, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च में वृद्धि, दिल्ली की हर सड़क हर गली में सौ फीसदी रोशनी की व्यवस्था करेगी, डीटीसी बसों, बस स्टैंडों पर और भीड़-भाड़ वाले जगहों में सीसीटीवी कैमरे लगाना, 47 नई फास्ट ट्रैक कोर्ट, सारी झुग्गी बस्तियों का पांच वर्ष में पक्कीकरण, 15,000 होमगार्ड जवानों की मदद से महिला सुरक्षा दल या महिलाओं सुरक्षा बल का गठन,  महिला की सुरक्षा के लिए सार्वजनिक परिवहनों में 5000 मार्शलों की नियुक्ति, मुफ्त वाई फाई सुविधा, दिल्ली में व्यापार और खुदरा हब, पांच साल में आठ लाख नई नौकरियां,  ठेके के सभी पद नियमित किए जाने, स्वायत्त निकायों में 55,000 रिक्तियों को तत्काल आधार पर भरना, 4000 डॉक्टरों और 15,000 नर्सों और सहयोगी स्टाफ को स्थायी किया जाना........।
सूची और बड़ी है। कल्पना करिए कि केजरीवाल की सरकार अगर इनको साकार करने के लिए आगे बढ़ेगी तो इसका आर्थिक व वित्तीय प्रभाव क्या होगा? भारत सरकार का बजट 17 लाख करोड़ रुपया से थोड़ा ज्यादा है। इन घोषणाओं पर खर्च इससे कई गुणा ज्यादा हो जाता है। दिल्ली सरकार का बजट अभी तक 40 हजार करोड़ के आसपास रहा है। वायदा किया है तो वे इसे साकार करने की हर हाल में कोशिश करेंगे। देखना होगा केजरीवाल कैसे इनको साकार करते हैं। पर ऐसा होता है इसके व्यापक सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक एवं राजनीतिक परिणामों से इन्कार नहीं किया जा सकता है।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208


शनिवार, 31 जनवरी 2015

किरण बनाम अरविन्द में फिर टूटती राजनीति की मर्यादायें

अवधेश कुमार
दिल्ली चुनाव की गर्मी में किरण बेदी बनाम केजरीवाल वाकयुद्ध ने राजनीति की जुगुप्सा को फिर से उभारा है। अरविन्द एवं किरण दोनों एनजीओ चलाने के कारण कई मामलांें पर लंबे समय से साथ रहे हैं। अन्ना अनशन अभियान के मुख्य प्रबंधकार भले केजरीवाल थे, पर किरण भी उसकी एक प्रमुख स्तंभ थीं। इनके बीच मतभेद हुए यह भी हमारे सामने साफ था। किंतु अन्ना हजारे भी अरविन्द केजरीवाल से अलग हुए और उनके खिलाफ खुलकर बोले। अरविन्द के अनेक पुराने साथी अन्ना के साथ रहे। उनमें किरण बेदी भी थीं। जब लोकसभा में पिछले वर्ष लोकपाल कानून पारित हुआ तो अन्ना के साथ किरण बेदी ने भी उसका स्वागत किया। किरण अन्ना के गांव में उनके अनशन के साथ थीं। अन्य कई लोग भी वहां थे। तो उनका मतभेद स्पष्ट था। बावजूद इसके उनके बीच एक दूसरे के प्रति सार्वजनिक शब्द प्रयोग में शिष्टता बनी हुई थी। दिल्ली विधानसभा चुनाव में किरण बेदी के भाजपा मेें शामिल होने तथा मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनते ही वो शिष्टता तो उड़न छू हुई ही, इस प्रकार के आरोपों-प्रत्यारोंपों का दौर चल पड़ा है जिसमें ऐसा लगता है दोनों पक्ष कोई सीमा मानने को तैयार नहीं है।
 यही हमारी राजनीति का दुर्भाग्य है। आम आदमी पार्टी राजानीति में एक मानक स्थापित करने के दावे से आई थी। पर चुनाव की राजनीति ने उसके सारे दावों की कलई खोल दी है। अरविन्द सहित पूरी पार्टी किरण पर यह आरोप लगाते हुए टूट पड़ी है कि वो तो पहले से ही भाजपा के प्रति नरम रुख रखतीं थीं। वो अन्ना अभियान के समय से ही भाजपा पर हमला करने से बचतीं थीं। इसके पहले कुमार विश्वास और आशीष खेतान जैसे आप के नेता किरण को अन्ना अभियान में भाजपा का मोल यानी भेदिया करार दे चुके हैं। हालांकि अरविन्द की ही पूर्व साथी शाजिया इल्मी ने, जो कि आप में भी उनके साथ थीं, यह कह दिया है कि किरण नहीं अरविन्द ही भाजपा के प्रति नरम रुख रखते थे। ध्यान रखिए शाजिया विधानसभा एवं लोकसभा चुनाव दोनों आप की टिकट पर लड़ीं। चुनाव के काफी समय बाद उन्होंने पार्टी में एक चौकड़ी के हाबी होने का आरोप लगाकर सभी पदों से त्यागपत्र दे दिया था। अब वो कह रहीं हैं कि अन्ना अभियान में तो कजरीवाल ही केवल कांग्रेस पर हमला करते थे। पार्टी बनाने के बाद उनने भाजपा को निशाना बनाया।
जो स्थिति बन रही है उसमंे पता नहीं और क्या-क्या सामने आ जाएगा। अरविन्द के जो पुराने साथी भाजपा में आ गए हैं उनके पास ऐसे कई तथ्य हैं जो अरविन्द एवं उनके साथियों को नागवार गुजरता है। वे अब केजरीवाल को ही साजिश के तौर पर पेश कर रहे हैं। ये भी उनको अवसरवादी कह रहे हैं। तो आप की नजर में किरण अवसरवादी, वो सब अवसरवादी जो भाजपा में चले गए, और भाजपा की नजर में अरविन्द और उनके साथी अवसरवादी। अगर हम आप जनता के तौर पर इसे देखें तो हमें दो अवसरवादी चेहरों में से किसी एक को चुनना है। एक तीसरा विकल्प कांग्रेस के अजय माकन हैं, पर लगता ही नहीं कि वो कहीं दौर में हैं। हम किसे अवसरवादी मानें। किरण बेदी कह रहीं है कि अगर मैं भाजपा के प्रति पक्षपाती थी तो मुझे मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाने की पेशकश क्यों की? यह सवाल भी वाजिब है। आखिर जब इनको लगता था कि किरण आंदोलन में भाजपा की भेदिया थीं, जासूस थीं, उसकी समर्थक थीं तो फिर उस समय उनके खिलाफ आरोप लगाकर बाहर करने की मांग क्यों नहीं की? यह बात अन्ना हजारे के संज्ञान में था कि नहीं? अगर उनके संज्ञान ंमें था तो वो अरविन्द एवं उनके आज के साथियों को छोड़ गए, पर किरण बेदी उनके साथ बनी रहीं।
केजरीवाल कह रहे हैं कि  किरन बेदी के साथ मेरे मतभेद की शुरुआत नितिन गडकरी के कारण हुई। वह तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष के खिलाफ बोलने के लिए तैयार नहीं थीं। अरविन्द के कथन को मान लें तो किरण के साथ उनकी टेलफोन पर बातचीत भी बंद हो चुकीं थीं। उनका कहना है कि दो साल पहले कोयला ब्लॉक आवंटन के खिलाफ आंदोलन के बाद बेदी ने मेरा फोन उठाना बंद कर दिया था। वह मेरे मेसेज का जवाब भी नहीं देती थीं। उन्होंने कहा था कि हमें नितिन गडकरी के घर का घेराव नहीं करना चाहिए था। लेकिन हमने ऐसा किया और इसके बाद वह खुलकर हमारे खिलाफ हो गईं। इतने भर से फोन पर बातचीत बंद हो जाए यह स्वीकार करने का कोई कारण नहीं है। आखिर अरविन्द एवं मनीष का फोन तो अन्ना हजारे ने भी उठाना बंद कर दिया था।
बहरहाल, इसका अर्थ निकालना लोगों पर छोड़ देना चाहिए। किरण बेदी इस देश में आंदोलनकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की बड़ी संख्या हैं जिनके लिए कभी आदर्श नहीं रहीं। एक नौकरशाह से एनजीओ चलाने, बड़े संस्थानों में लैक्चरर देने और झुग्गी झोपड़ी में विद्यालय चलाने के अलावा कुछ एलिट वर्ग के बीच उनका जलवा रहा है। यह तो कोई साधारण समझ वाला भी देख सकता था कि अन्ना अभियान कोई एक राजनीति विचारधारा वालों का अभियान नहीं था। उसमें अलग-अलग विचारधाराओं और संगठनों की भागीदारी थी। भाजपा और संघ परिवार उसमें सर्वप्रमुख थी। रामलीला मैदान के अनशन के पीछे का पूरा प्रबंधन संघ परिवार के हाथों ही दिख रहा था। यह बात अरविन्द जानते थे। उनके साथी भी जानते थे। उनके सामने सब कुछ था। आखिर बारिस से भींगे हुए रामलीला मैदान को किनकी ताकत से 24 घंटे के अंदर मंच से लेकर आयोजन लायक बना दिया गया? भाजपा ने जितना संभव था उस अभियान को ताकत दी। सच कहा जाए तो भाजपा को उम्मीद थी कि यह आंदोलन कांग्रेस सरकार के खिलाफ है और इसमें साथ देने से उसकी ताकत बढ़ेगी, ये सब उसका साथ देंगे। हुआ इसके विपरीत। अरविन्द ने जब पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया तब भाजपा उनके खिलाफ खुलकर आई। पार्टी बनाने से अनेक लोग असहमत थे और वो उनके साथ नहीं आए। उसमें किरण बेदी भी थीं।
जब इस तरह आरोप-प्रत्यारोप लगाये जायेंगे तो ऐसी-ऐसी बातें सामने आएंगी जो इनकी राजनीति से वितृष्णा पैदा करेंगी। इसमें यह भी उम्मीद थी कि एक आरोप यह लगायेंगे आपने अपने एनजीओ में कितना फंड विदेशों से लाया, कितने गलत खर्च किए, कहां का पैसा कहां लगाया तो दूसरा इसके प्रत्युत्तर में उनको आईना दिखायेंगे। लेकिन अपने एनजीओ, उसके फंड और कार्यों पर कोई प्रश्न नहीं उठा रहा है। इस मामले पर दोनों पक्ष एक दूसरे की असलियत जानते हैं, इसलिए उस पर खामोश हैं। पर जो हो रहा है वही कम नहीं है। अब देखिए,  एक खुलासा यह हुआ है कि  5 अप्रैल 2011 से जंतर मंतर पर अन्ना अनशन अभियान की शुरुआत हुई और 4 अप्रैल को अरविन्द सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की बैठक में शामिल थीं। उसके बाद अन्ना अभियान के बीच भी वो उन बैठकों में तीन बार गए थे। आपको कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार चोर लगती थी, कांग्रेस भ्रष्टाचार की जननी लगती थी तो फिर उन बैठकों का बहिष्कार क्यों नहीं किया? वैसे भी सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली सलाहकार परिषद इन एनजीओवालों से ही भरा हुआ था जिसने ऐसी-ऐसी योजनायें बनवाईं जिनसे देश का भी अहित हुआ और कांग्रेस का क्या हुआ यह बताने की आवश्यकता नहीं।
लेकिन इस तरह कई भेद खुलेंगे। अन्ना अभियान के लोगों का संघ नेताओं से बातचीत, भाजपा नेताओं से बातचीत, उनके पीछे के प्रबंधन मंे संघ कार्यकर्ताओं का लगना.......आदि सच पहले से उपलब्ध हैं। ऐसी बातें हैं जिनसे दोनांे पक्षों के लिए समस्यायें पैदा हो जाएंगी। आप नेताओं को समझना चाहिए कि आज भी उनकी पार्टी में ऐसे नेता हैं जो भाजपा और संघ की पृष्ठभूमि से हैं। पिछली बार जिसे विधानसभा का अध्यक्ष बनाया गया वो कौन थे और आज कहां हैं। नितीन गडकरी के घर पर प्रदर्शन का विरोध करने से कोई भाजपा समर्थक नहीं हो जाता है। स्वयं अरविन्द ने गडकरी पर जो आरोप लगाए उनका क्या हुआ? वे तो स्वयं गडकरी के घर गए थे अपने साथियों के साथ और मामले पर समझौता कर लिया। सच यह है कि दोनों पक्षों के अनेक ऐसे अधखुले पहलू हैं जिनसे सबके चेहरे नंगे हो सकते हैं। इसलिए सलाह यही होगी कि जिनके घर स्वयं शीशे को हों वो दूसरों पर पत्थर नहीं मारा करते।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208


गुरुवार, 22 जनवरी 2015

भारत पर श्रीलंका चुनाव में राजपक्षे को हराने के लिए काम करने का आरोप

अवधेश कुमार

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दक्षिण एशिया को आपसी विश्वास और साझेदारी के व्यावहारिक क्षेत्र में बदलने की पहल कर रहे हैं, पर कुछ शक्तियां पहले के अनुसार ही अपने राजनीतिक हितों के लिए इस पर आघात पहुंचाने की कोशिश कर रहीं हैं। इस बार ऐसी कोशिशों की गंध हमारे पड़ोसी श्रीलंका से आई है। वहां यह अफवाह फैलाई जा रही है कि पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे की हार के लिए भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ ने कोशिश की थी। यानी यदि रॉ हराने में नहीं लगता तो राजपक्षे तीसरी बार सत्ता में आ जाते। 8 जनवरी को श्रीलंका में हुए मतदान में तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे चुनाव हार गए थे और उनके ही पूर्व सहयोगी तथा विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार मैत्रीपाल श्रीसेना ने विजय पाई। हालांकि यह आरोप राजपक्षे या उनके भाइयों ने नहीं लगाया है, लेकिन वहां यह बात तेजी से फैल रही है और मीडिया इसे उठा रहा है। वहां के अखबार इसे उठा रहे हैं। एक अखबार लिख रहा है कि रॉ का वह अधिकारी विपक्षी नेताओं से संपर्क में था। सामचार पत्रों में रॉ के प्रमुख तक के रानिल विक्रमसिंघे एवं पूर्व राष्ट्रपति चन्द्रिका कुमारतुंगे से संपर्क में होने की बात लिख दी है।

इस मामले में आगे बढ़ें उसके पहले यह जान लेना आवश्यक है कि श्रीलंका में भारतीय उच्चायोग के साथ पक्ष एवं विपक्ष के नेता लगातार संपर्क में रहे हैं, आते जाते हैं। तमिलों की संख्या वहां काफी है, उनका भारत के तमिलनाडु में सीधा रिश्ता है। श्रीलंका के विकास में भारत का धन लगता है। इस समय तो राजपक्षे द्वारा लिट्टे को नेस्तनाबूद करने के बाद तमिल क्षेत्रों में हुए विनाश में भारत पुनर्वास अभियान में मुख्य भूमिका निभा रहा है। तमिल नेता वहां आते हैं और अपनी शिकायते करते हैं। यानी वहां उच्चायोग की सक्रियता एक आम स्थिति है। भारत की नीति किसी भी पड़ोसी देश की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप करने की नहीं है, पर नेपाल, भूटान, श्रीलंका जैसे देशों में स्थिति अपने आप थोड़ी भिन्न होती है। यह एक स्वाभाविक स्थिति है। स्वयं राजपक्षे के काल में भी यही स्थिति थी। उनके मंत्री, अधिकारी भारतीय उच्चायोग से लगातार संपर्क में रहते थे। तमिल समस्या को लेकर हमारे नेता व अधिकारी उनसे बातचीत करते रहते थे। इससे भारत के लिए अलग करना संभव न था, न है। यह होगा। इसका असर अगर वहां के चुनाव पर पड़ता है तो इसे किसी प्रकार की साजिश नहीं कहा जा सकता। सिंहलियों से किसी प्रकार का मतभेद रखे बिना तमिल हितों के लिए खड़ा होना भारत का दायित्व है। इसका यह अर्थ नहीं कि भारत के अधिकारी वहां किसी को जीताने और हराने के खेल में पड़ जाएं।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अकबरुद्दीन ने इस आरोप का खंडन कर दिया है। स्वयं महेन्द्रा राजपक्षे ने कहा है कि उन्हें इस बारे में जानकारी नहीं। अगर जानकारी होगी तभी वे कुछ बोलेंगे। वहां अफवाह इतना गहरा है कि हाल में श्रीलंका के कोलंबों स्थित दूतावास में तैनात एक अधिकारी के तबादले के बारे में कहा जा रहा है कि वह दरअसल, रॉ का अधिकारी था तथा चुनाव में उसकी भूमिका का खुलासा होने के बाद उसे निर्वासित कर दिया गया है।  हालांकि विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कह दिया है कि तबादले होते रहते हैं। चूंकि उस अधिकारी का तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा हो गया था, इसलिए उनका तबादला किया गया है। हमारे लिए यही कथन सच है। जो यह आरोप लगा रहे हैं उनने अपना जो स्रोत बताया है उसका कोई अर्थ नहीं है। अगर रॉ की भूमिका थी तो यह बात राजपक्षे की पार्टी कह सकती थी।
यह बात ठीक है कि लिट्टे के खिलाफ नृशंस सैन्य कार्रवाई के कारण भारत में राजपक्षे के खिलाफ वातावरण था। खासकर तमिलों के बीच। वे भारत के साथ अच्छे संबंधों की बात करते रहे और भारत के सुझावों की अनदेखी भी। वे बार-बार कहते थे कि वी. प्रभाकरन को पकड़कर भारत को सौंप देंगे। ध्यान रखिए प्रभाकरन पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या का मुख्य अभियुक्त था। हालांकि उनके सेनाओं ने निर्दयता से प्रभाकरन एवं उसके पुत्र आदि की हत्या कर दी। बाद में उन्हांेने भारत का विश्वास जीतने की कोशिश की, पर कुल मिलाकर यह साफ था कि भारत को दक्षिण एशिया का स्वाभाविक नेता कहते हुए भी वे विकल्प के लिए चीन के करीब जाते रहे। 2010 में चीन श्रीलंका का सबसे बड़ा वित्तीय साझेदार हो गया। इस समय वह हर साल 61 अरब रुपये से ज्यादा की सैन्य सामग्रियां श्रीलंका को आपूर्ति करता है। श्रीलंका की वायु सैनिक क्षमता के उत्थान में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। वह श्रीलंका मेरीटाइम परियोजना में काम करने लगा है जिससे चीनी कंपनियां आसानी से श्रीलंका पहुंच सकेंगी। यह सब राजपक्षे के शासनकाल में ही हुआ। यह हमारे लिए चिंता का कारण है। श्रीलंका के अंदर भारत विरोधियों का इसे समर्थन था। उनके हारने के बाद ऐसा लग रहा है कि भारत की भूमिका वहां अब पहले के अनुसार ज्यादा होगी।   
हालांकि स्वयं श्रीलंका के एक बड़े वर्ग में भी चीन से ज्यादा निकटता को अच्छा नहीं माना। उनकी इस नीति का खुलेआम विरोध भी हुआ। जब पिछले वर्ष राजपक्षे ने दो चीनी पनडुब्बियों को अपने तट पर रुकने दिया तो केवल भारत ही नहीं दुनिया की महत्वपूर्ण शक्तियों के भी कान खड़े हुए। अमेरिका े भी इससे सशंकित हुआ और भारत के लिए तो यह आघात जैसा था। चीन हिन्द महासागर में अपनी सैन्य ताकत बढ़ाना चाहता है, इसलिए वह लगतार सक्रिय है। भारत के लिए चिंता का कारण वहां केवल चीनी पनडुब्बियों का रुकना नहीं था। राजपक्षे ने इस घटना के बारे में भारत को पहले से सूचित तक करने की औपचारिकता पूरी नहीं की, जबकि श्रीलंका की भारत के साथ इस संबंध में स्पष्ट संधि है। तो भारत उनको कैसे अनुकूल मान लेता। परंतु इन सबके आधार पर यह आरोप लगाना कि भारत ने अपनी विदेश खुफिया एजेंसी के माध्यम से राजपक्षे को हराने की साजिश की नासमझी से अधिक कुछ नहीं है। राजपक्षे मोदी के साथ बेहतर संबंध की कोशिश कर रहे थे और मोदी ने भी उनको अनुकूल प्रत्युत्तर दिया था।
इस प्रकार के दुष्प्रचार के कुछ स्पष्ट संकेत हैं। यह संभावना बलवती हो रही है कि नए राष्ट्रपति श्रीसेना का भारत के प्रति विशेष लगाव हो सकता है। राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने अपने पहले विदेश दौरे के लिए भारत का ही चयन किया है। यह एक महत्वपूर्ण संकेत है और इससे लगता है कि भारत श्रीलंका संबंधों पर एक साथ कई प्रकार की जो काई जम गई थी, वो सब धीरे-धीरे हटेगी। हालांकि जो भारत विरोधी इस प्रकार की खबरें उड़ा सकते हैं, वे आगे भी कुछ दुष्प्रचार करेंगे। यह इसका एक महत्वपूर्ण संकेत है। इस अफवाह का अर्थ ही है कि भारत को बदनाम करो ताकि जनता का एक वर्ग उसके खिलाफ हो। हो सकता है इसके पीछे चीनी लौबी का भी हाथ हो। आखिर भारत ने भी तो श्रीलंका, मालदीव, नेपाल, भूटान में चीन की पैठ के बाद उसके क्षेत्रों में अपने संबंध प्रगाढ़ करने आरंभ किए। दक्षिण चीन सागर में तेल गैस खोज का ठेका लेकर चीन को भारत ने संकेत भी दिया। किंतु भारत के लिए यह विचराणीय है कि इन चारों देशों में ऐसे तत्व हैं जो भारत की भूमिका को हमेशा संदेहों के घेरे में लाते हैं, इसके विरुद्ध वातावरण बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं, पर वे चीन के विरुद्ध ऐसा नहीं करते। वर्तमान आरोप प्रसंग का निष्कर्ष यही है कि श्रीलंका में इसी प्रकार भारत विरोधी वातावरण बनाने की कोशिश तेज होगी। वे ये भी नहीं चाहेंगे कि भारत तमिलों के मामले में वहां किसी प्रकार का हस्तक्षेप करे।  
इसका सामना हम कैसे करेंगे इसकी रणनीति विदेश मंत्रालय को अभी से बनानी होगी। कारण, भारत श्रीलंका के आंतरिक मामले से अपने को अलग नहीं रख सकता। अगर तमिलों की समस्या नहीं सुलझीं, उनको अपने क्षेत्रों में जितनी वाजिब स्वायत्तता चाहिए नहीं मिली, उनका उचित पुनर्वसन नहीं हुआ, उनको सिंहलियों के समान सभी अधिकार व्यवहार में नहीं मिले तो वहां अशांति कायम होगी और इससे भारत प्रभावित होगा। यह मानने में कोई समस्या नहीं है कि भारत के खिलाफ प्रचार करने वालों में तमिलों से विद्वेष रखने वाले सिंहली समुदाय के कुंठित समूह शामिल होंगे।
अवधेश कुमार, ई: 30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर: 01122483408, 09811027208

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