गुरुवार, 23 अप्रैल 2026
जब कॉमन सिविल कोड आवश्यक है तो यूनिफार्म आपराधिक प्रक्रिया क्यों नहीं?
सोमवार, 20 अप्रैल 2026
सपा की ’पीडीए’ राजनीति और सियासी यथार्थ
महिला आरक्षण की फिर वही परिणति क्यों
लगभग 12 वर्षों के शासनकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के लिए यह पहला अवसर है जब कोई विधेयक पारित होने से लोकसभा में वंचित रह गया। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने घोषणा किया कि विधेयक के पक्ष में 298 तथा विरोध में 230 मत पड़े। हालांकि सदन के बहुमत में विधायक के पक्ष में वोट डाला किंतु संविधान संशोधन विधेयक होने के कारण दो तिहाई बहुमत यानी चाहिए था और इसलिए यह पारित नहीं हो सका। यानी कुल 528 लोकसभा सदस्य उपस्थित थे तो 352 सदस्यों का समर्थन चाहिए था वैसे उपस्थिति से 34 ज्यादा सांसदों ने सरकार के पक्ष में वोट डाला। अगर सामान्य विधेयक होता तो पारित हो गया होता। 1996 से महिलाओं को लोकसभा और राज्य की विधानसभा में आरक्षण देने का मामला लटका हुआ है और विरोधी किसी न किसी बहाने इसमें अड़चन डालते आ रहे हैं। किसी का तर्क कुछ भी हो निष्कर्ष यही है वही प्रक्रिया फिर दोहराई गई है। अब इसमें गुणात्मक अंतर यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने सितंबर 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम से 33% महिलाओं के आरक्षण का कानून संसद द्वारा पारित करवा लिया है। इसलिए उसको लागू तो होना है। किंतु अब विधेयक के गिर जाने से 2029 लोकसभा चुनाव में यह लागू नहीं हो सकता। इसके लिए हमें 2034 की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।
दरअसल, 2023 के अधिनियम में यह प्रावधान था कि अगली जनगणना और फिर परिसीमन हो जाने के बाद इसे लागू किया जाएगा। तब अनुमान यह था कि जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया 2029 तक पूरी हो चुकी होगी इसलिए इसे लागू करने में समस्या नहीं होगी। चूंकि यह पूरी नहीं हुई तो नरेंद्र मोदी सरकार ने इसे संविधान संशोधन के जरिए तत्काल लागू करने का रास्ता चुना। पूरे प्रकरण का कठोर सच यह है कि इन तीनों विधेयकों में ऐसा कुछ नहीं था जिसको आशंका की दृष्टि से देखा जाए और जिसका इस सीमा तक विरोध हो कि काले झंडे और काले बिल्ले तक पार्टियां व सांसद लगा लें। इनमें संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 लोकसभा की सीटों की अधिकतम संख्या को बढ़ाकर 850 करने का प्रावधान करता था जिनमें राज्यों के लिए 815 और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटें थीं। दूसरा,परिसीमन विधेयक, 2026 नई जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण के लिए परिसीमन आयोग के गठन का प्रावधान करता था। और तीसरा,केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी जैसे केंद्र शासित प्रदेशों में महिला आरक्षण लागू करने के लिए था। विपक्ष का मुख्य विरोध पहले विधेयक से था। वस्तुत: संसद का विशेष सत्र आरंभ होने के पहले ही विपक्ष ने अविश्वसनीय रूप से विरोधी रख अपनाकर अपने संसदीय व्यवहार का संकेत दे दिया था। विपक्ष के सभी नेताओं ने, जिनमें महिला सांसद भी शामिल हैं नारी शक्ति वंदन अधिनियम संशोधन संबंधी विधेयकों का जैसा विरोध किया उसमें साफ हो गया कि इनका पारित होना संभव नहीं है। भाजपा के मंत्रियों ने विपक्ष के नेताओं से बात करनी शुरू की। स्वयं प्रधानमंत्री ने दो पोस्ट से अपील की। इसके पहले वे अपने भाषण में अपील कर चुके थे कि श्रेय आप लोग ले लीजिए लेकिन महिला आरक्षण में बाधा मत बनिए। उन्होंने यहां तक कहा कि मैं इसके लिए तैयार हूं कि कल आप सबकी तस्वीर समाचार पत्रों में छपवाकर श्रेय दूंगा। लेकिन विपक्ष पहले से मन बनकर बैठा था। उन्होंने अपनी अपील में लिखा कि अपने घर में मां-बहन- बेटी -पत्नी सबको देखिए और उनके अधिकार के लिए विचार कर मतदान करिए।
निष्पक्ष होकर विवेक, तथ्य और तर्क के साथ विचार करनेवालों का निष्कर्ष है कि पूरा विरोध एकपक्षीय अतिवाद से ग्रस्त रहा। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने तो इसे देश विरोधी और देश को बांटने वाला विधायक तक करार दिया। उन्होंने कहा कि ये देश का भूगोल बदलना चाहते हैं जो हम कभी नहीं होने देंगे। इससे अधिक अतिवादी वक्तव्य और कुछ नहीं हो सकता। उनका भाषण भाजपा के वरिष्ठ सांसदों को भी इतना आपत्तिजनक लगा कि राजनाथ सिंह जैसे नेताओं को लोकसभा अध्यक्ष से अपील करनी पड़ी कि इन्हें रिकॉर्ड से हटाया जाए। राहुल गांधी के भाषण के एक बड़े अंश को असंसदीय करार देकर हटा दिया गया। सदन में विपक्ष के नेता के भाषण के अंशों को असंसदीय श्रेणी में ला दिया जाए इससे दुखद स्थिति कुछ नहीं हो सकती। अगर इरादा विधेयक पर बहस कर इसमें उचित संशोधन करना हो तो आपके भाषण में उससे संबंधित सुझाव होते हैं। सरकार की राजनीतिक आलोचना में समस्या नहीं है। किंतु पूरी बहस सामान्य आलोचना ही नहीं विधेयक के विषय वस्तु से भी काफी दूर चला गया था। प्रश्न उठाया जा रहा था कि आखिर 850 सीटों का आपका आधार क्या है? इसी तरह के दक्षिण के राज्यों को इसमें नजरअंदाज किया जा रहा ? बजट सत्र में गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष के नेताओं से बातचीत शुरू की तो बताया होगा कि हर राज्य की 50% लोकसभा एवं विधानसभा की सीटें बढ़ाने का फार्मूला तय हुआ है। सोचा गया कि आज परिसीमन हो तो लोकसभा एवं विधानसभाओं की कितनी सीटें बढ़ सकतीं हैं। गृह मंत्री ने स्पष्ट किया कि अगर उत्तर प्रदेश की सीट 80 से 120 हो रही है तो तमिलनाडु की 39 से 59। इसी तरह अन्य राज्यों के भी विवरण दिए गए। हंगामा इस पर भी था कि 2011 की जनगणना को आधार क्यों बनाया गया? गृह मंत्री का उत्तर था कि 2011 की जनगणना का आधार बनाते तो तमिलनाडु की सुट केवल 49 होती। यही सच है।
यहां दो बातें समझने की है। एक, वर्तमान 543 सीटों में 33% आरक्षण क्यों नहीं दिया गया? 2023 में जब विधेयक पारित हुआ तभी उसमें जनगणना और परिसीमन का प्रावधान था। विपक्ष ने विरोध नहीं किया? 1996 से उसके विरोध के पीछे सबसे बड़ा कारण यही था कि आपसी बातचीत में नेता बोलते थे कि 543 में से 33% महिलाओं को मिल गया तो अनेक पुरुष नेताओं को घर बैठ जाना पड़ेगा और राजनीति का नाश हो जाएगा। पिछड़ों के आरक्षण आदि का बहाना बनाया गया। तो पुराने अनुभवों का ध्यान रखते हुए मोदी सरकार ने रास्ता निकाला कि 543 सीटें जस की तस रहें और बढ़ी 272 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होश सहमति हुई तभी 2023 में कानून बन सका। आज यह तर्क देने वाले अपनी सरकारों में इसके लिए तैयार नहीं थे। 1996 में विरोध करने वाले उस संयुक्त मोर्चा सरकार के साथी थे तो 2008 से 2010 तक विरोध करने वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के साथी। इनमें समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और कुछ समय तक जनता दल यूनाइटेड अग्रणी रहे। दूसरे दलों के सांसद भी साथ देते रहे।
अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 1998 और 1999 में महिला आरक्षण विधेयक चलाया किंतु आम सभमति नहीं बन सकी। 2010 में राज्यसभा में भाजपा के समर्थन से विधेयक पारित हुआ किंतु उनके साथी दलों ने विरोध किया और लोकसभा में पारित करना मुश्किल था। इस पृष्ठभूमि को जानने वाले यह प्रश्न नहीं उठाएंगे। दूसरे, हर 10 वर्ष पर संविधान लोकसभा एवं विधानसभा क्षेत्रों के जनसंख्या के आधार पर परिसीमन का प्रावधान करता है। 1971 तक नियमित होता रहा। 1976 में आपातकाल के समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सरकार ने 42वां संशोधन कर 2001 तक लोकसभा एवं विधानसभाओं की सीटें न बढ़ाने का प्रावधान कर दिया। इस कारण 1981 और 91 में परिसीमन आयोग का गठन नहीं हुआ। 1976 में लगभग 57.5 करोड़ आबादी थी और आज 140 करोड़ से ऊपर। क्या उस आधार पर आज लोकसभा या विधानसभाओं की सीटें होनी चाहिए? 2001 में वाजपेयी सरकार ने भी परिसीमन आयोग तो बनाया लेकिन केवल क्षेत्र का समायोजन हुआ संख्या नहीं बढ़ाई। हर सरकार इस विषय को स्पर्श करने से घबराती रही, क्योंकि दक्षिणी राज्यों की आबादी उत्तर के अनुपात में कम होने के कारण उनको सीटें कम मिलती और विरोध होता।
मोदी सरकार ने उसी का रास्ता निकाला। थोड़े शब्दों में कहें तो अगर दल वाकई महिला आरक्षण के पक्ष में होते तो विरोध जताते हुए कुछ संशोधन डालकर पारित कर देते। सीटों की संख्या की लिखित गारंटी के प्रश्न पर गृह मंत्री ने कहा कि आप विधेयक पारित करते हैं तो हम नया संशोधन सीटों की संख्या डालकर पेश करने को तैयार हैं। वास्तव में यह कहीं पे निशाना कहीं पे निगाहें वाली बात थी। कांग्रेस और कुछ विपक्षी दलों को दिखाना था कि हम संसद में नरेंद्र मोदी सरकार को पराजित कर सकते हैं। किसी नेता ने महिलाओं को आरक्षण न मिलने पर अफसोस प्रकट नहीं किया। श इसे लोकतंत्र की विजय बताते हुए नए दौर की शुरुआत बताया जा रहा है। प्रियंका वाड्रा ने इसे ऐतिहासिक दिन जताया। थोड़े शब्दों में कहें तो महिलाओं के आरक्षण पर विरोधियों का जो रुख हमने 1996 से देखा लगभग वही अलग रूपों में फिर संसद में था और इसी की परिणति विधेयक के गिरने के रूप में सामने आई।
अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 110092, मोबाइल-9811027208
शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026
नीतीश कुमार युग की उपलब्धियां
शनिवार, 11 अप्रैल 2026
आंबेडकर जयंती पर विशेष : बाबा साहब डॉ आंबेडकर आधुनिक भारत के निर्माण के पथ प्रदर्शक
14 अप्रैल 2026 को देशभर में भारत रत्न बाबा साहब डॉ आंबेडकर जी की 136वीं जयंती पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाई जा रही है। बाबा साहब भारत की सांसदी इतिहास के इकलौते महापुरुष हैं जिनके 125 में जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के द्वारा वर्ष 2015 में संसद का विशेष अधिवेशन आयोजित किया गया था और इस अधिवेशन में प्रधानमंत्री सहित अनेक वरिष्ठ नेताओं ने देश के निर्माण में बाबा साहब के योगदान की चर्चा की थी। बाबा साहब के विषय में बोलते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संरक्षण चालक श्री मोहन भागवत जी ने कहा था कि जब हम विश्व के प्रमुख अर्थशास्त्रियों की बात करते हैं तो उसे सूची में डॉ अंबेडकर को प्रमुखता से पाते हैं,जब हम प्रमुख कानून विद की बात करते हैं तो डॉक्टर अंबेडकर का नाम सामने आता है,जब हम देश के संविधान निर्माण की बात करते हैं तोड्राफ्टिंग कमिटी के चेयरमैन के रूप में डॉक्टर अंबेडकर की भूमिका प्रमुख रूप से नजर आती है। जब हम देश के वंचित समाज के उत्थान की बात करते हैं तो बाबा साहब आंबेडकर, ज्योतिबा फुले, पेरियार, साहू जी महाराज आदि समाज सुधारको की श्रेणी में पाए जाते हैं।
मात्र 23 वर्ष की उम्र में डॉक्टर अंबेडकर ने कोलंबिया विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की और उसके पश्चात लंदन स्कूल आफ इकोनॉमिक्स से डॉक्टर ऑफ साइंस (डी एस सी) की उपाधि प्राप्त की। जिस उपाधि को प्राप्त करने में लोगों को 8 वर्ष का समय लग जाता है डॉक्टर अंबेडकर ने उसे उपाधि को मध्य ढाई वर्ष के परिश्रम से प्राप्त प्राप्त कर लिया था। उनकी शोध "प्रॉब्लम आप रूपी" ने भारत में रिजर्व बैंक आफ इंडिया और फाइनेंस कमिशन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया! उनकी आर्थिक शोधों और विचारों से प्रेरणा लेकर देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने गरीबों और वंचितों को समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए स्टार्टअप, स्टैंड अप इंडिया,मेक इन इंडिया, जनधन योजना आत्म निर्भर भारत जैसी योजनाओं को मूर्ति रूप दियाऔर आज भारत विश्व की पांचवी अर्थ व्यवस्था के रूप में स्थापित हो चुका है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में शीघ्र ही भारत विश्व की आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्थापित कर लेगा।
बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने ब्रिटिश काल में राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस के दौरान डिप्रेस्ड क्लास के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की अपनी मांग मां वाली वे चाहते तो वंचित वर्ग के समुदाय के लिए एक अलग देश की मांग कर सकते थे पर वह दिल से पक्के राष्ट्रवादी थे और गांधी जी के साथ 1932 में पुणे पैक समझौते के माध्यम से वंचित समुदाय के लिए प्रशासन में भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु आरक्षण का प्रावधान करवाया जिसके परिणाम स्वरूप वंचित समाज आज समाज के मुख्य धारा में सम्मिलित हो रहा है और संविधान निर्माण के समय उन्होंने आर्टिकल 3 40 को संविधान में सम्मिलित करवाया जो पिछले वर्गों की स्थित की जांच के लिए आयोग गठित करने का प्रावधान करता है उन्होंने वर्ष 1928 में साइमन कमीशन के सामने पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की वकालत की थी और मंडल आयोग की सिफारिश के लिए एक मजबूत आधार दिया था इसलिए कोई क्या नहीं कर सकता की बाबा साहब अंबेडकर मात्र दलितों के नेता थे बल्कि उन्होंने अति पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के आरक्षण के लिए भी मजबूत आधार दिया।
बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर की प्रतिभा का सम्मान करते हुए ब्रिटिश इंडिया काल में वायसराय काउंसिल के श्रम सदस्य (श्रम मंत्री) के रूप में उन्हें नियुक्त किया गया। वह इस पद पर 1946 42 से लेकर 1946 तक रहे और श्रमिकों का सुधार के लिए अनेक प्रावधान किया श्रमिकों कार्य की अवधि 12 घंटे से हटाकर 8 घंटे करवाई और काम करने वाली महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश (मैटरनिटी लीव) का प्रावधान किया! देश की जल नीति के लिए 1942 में सेंट्रल वोल्टेज वॉटरवेज इरीगेशन और नेवीगेशन आयोग के चेयरमैन के रूप में सूखा मुक्त भारत की नींव रखी। नदियों को आपस में जोड़ने के उनके सुझाव का मध्य प्रदेश की केन और बेतवा नदी के को जोड़ने की परियोजना का वर्ष 2025 में उद्घाटन करके माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डॉ आंबेडकर के सपनों को मूर्ति रूप देने का प्रयास किया।
देश के कानून मंत्री के रूप में डॉक्टर अंबेडकर ने 1931 में हिंदू कोड बिल पेश किया जिसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए पैतृक संपत्ति में उनका उत्तराधिकार था। पर जब कुछ रूढ़िवादी लोगों के कारण लोकसभा में यह प्रस्ताव पारित न हो सका तो उन्होंने कानून मंत्री के पद से त्यागपत्र दे दिया। भारत के इतिहास में डॉक्टर अंबेडकर इकलौते महापुरुष थे जिन्होंने महिलाओं के अधिकार के लिए अपना पद त्याग कर दिया दूसरे शब्दों में महिलाओं के अधिकार के लिए और उनकी शिक्षा के लिए ज्योति बा फुले और साबित्री बाई फूले के मिशन को आगे बढ़ाने का काम किया।
आज हमारा देश संप्रदायवाद की समस्या से जूझ रहा है देश में SIR की आलोचना हो रही हैऔर विपक्षी दलों ने इसको चुनावी मुद्दा बना दिया है जब कि मोदी सरकार अवैध घुसपैठ से देश को मुक्त करना चाहती हैं,पर 1940 की दशक मेंबाबा साहब की पुस्तक "पाकिस्तान एंड पार्टीशन आफ इंडिया" में लिखित बाबा साहब अंबेडकर की बात मान ली गई होती कि देश का धार्मिक आधार विभाजन न होयदि यह विभाजन अवश्यंभावी ही है तो तो दोनों देशों में जनसंख्या का संपूर्ण स्थानांतरण अर्थात सारे हिंदू भारत में और सारे मुसलमान पाकिस्तान में चले गए होतेऔर यह हो जाता तो आज देश इस गंभीर स्थिति से नहीं गुजर रहा होता। इसके लिए देश के विभाजन की सूरत में जनसंख्या के स्थानांतरण के लिय एक विस्तृत योजना बना ली थी पर प नेहरूऔर जिन्ना ने इस पर अमल नहीं किया और 1947में दोनों ओर से भीषण नर संहार हुआ लेकिन विभाजन के पश्चातभी जो मुसलमान याअल्पसंख्यक भारत में रह गए उनके जीवनकी सुरक्षा और अधिकारों के संरक्षण के लिए बाबा साहब ने संविधान में प्रावधान किए। जिसके कारण भारत को अपना देश मानने वाले मुसलमान व अल्प संख्यक सम्मान के साथ रह रहे हैं।
संविधान में विवादित अनुच्छेद 370 के पक्ष में बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर नहीं थे संविधान निर्माता के रूप में कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए पंडित नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को डॉक्टर अंबेडकर के पास भेजो पर उनके डॉक्टर अंबेडकर ने शेख अब्दुल्ला को यह कह कर मना कर दिया कि आप चाहते हैं कि कश्मीर की रक्षा और देश की जनता की कल्याण का जिम्मा भारत उठाए और उन्हें विशेष राज्य का दर्जा दिया जाए परंतु नेहरू जी ने डॉ आंबेडकर की असहमति को नजर अंदाज करते हुए इस विवादित अनुच्छेद को संविधान में जुड़वाया परंतु वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और देश के गृहमंत्री अमित शाह के दृढ़ संकल्प के कारण यह विवादित अनुच्छेद संविधान से हटाया गया और आज कश्मीर देश का हिस्सा बना हुआ है और आज कश्मीर की क्रिकेट टीम रणजी ट्रॉफी चैंपियन है और कश्मीर के अनेक युवा सिविल सर्विस जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा में सफल होकर देश की मुख्य धारा में शामिल हो रहे है।
बाबा साहब के महानता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी 125वीं जयंती परवर्ष 2015में आयोजित संसद के विदेश विशेष अधिवेशन में बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि जब विपक्ष सरकार को घेरने के लिए कोई बात कहना चाहती है तो वह डॉक्टर अंबेडकर को कोट (उद्धरित)करती है और सरकार भी अपने समर्थन में कोई बात कहना चाहती है तो वह भी डॉ आंबेडकर की कहिए लिखी बातों को कोट करती है यानि डॉ आंबेडकर पक्ष विपक्ष दोनों को स्वीकार्य हैं और यही डॉ आंबेडकर की महानता और विद्वता का परिचायक है।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)
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