गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

जब कॉमन सिविल कोड आवश्यक है तो यूनिफार्म आपराधिक प्रक्रिया क्यों नहीं?

बसंत कुमार

आपके सरकारी आवास में बेहिसाब नोटो के बंडल मिलने के आरोप से घिरे जस्टिस वर्मा ने अपना त्याग पत्रभेजा दिया और उसके कारण संसद में उनके खिलाफ चल रही महाभियोग की प्रक्रिया बंद हो गई। इसके कारण न तो उनके खिलाफ अपराधिक कार्यवाही नहीं हो पाएगी और उनका त्याग पत्र स्वीकार होने के पश्चात उन्हें सेवा से संबंधित सभी लाभ मिल जाएंगे और जीवन पर्यन्त पेंशन भी मिलती रहेगी। अब प्रश्न यह उठता है कि जस्टिस वर्मा की जगह कोई साधारण कर्मचारी होता तो विजिलेंस प्रोसिडिंग या क्रिमिनल प्रोसिडिंग शुरू होने से पहले अपना त्याग पत्र देता और उनका त्याग पत्र स्वीकार करके उसे सारे सरकारी सेवा के लाभ लेने दिए जाते। जब इस देश में सर्वोच्च न्यायालय समेत अनेक प्लेटफार्म से कॉमन सिविल कोड की बात होती हैं तो फिर ऐसी न्यायिक प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई जाती जहां उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और आम जनसेवक के विरूद्ध एक ही तरह की प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं होती।
यह पहला अवसर नहीं है कि उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीश के खिलाफ भ्रष्टाचार में लिप्त होने के कारण महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई हो पर आरोपी न्यायाधीश को अपने पद से त्यागपत्र देकर उसे सेवा से संबंधित सभी लाभ प्राप्त करने का अवसर प्रदान कर दिया गया हो। 1990के दशक में जस्टिस रामा स्वामी के विरुद्ध संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया पर संसद के उत्तर भारत और दक्षिण भारत के आधार पर बंट जाने के कारण महाभियोग प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया और जस्टिस रामास्वामी को त्याग पत्र देने का अवसर मिल गया और उन्हें सारे सेवा के लाभ मिल गए। ठीक उसी प्रकार वर्ष 2010के दशक में जस्टिस मुखर्जी के विरुद्ध संसद में महाभियोग की प्रक्रिया पूरी न हो सकी और उन्हें सरकारी सीवा से त्याग पत्र देने का अवसर मिल गया क्या इस तरह से लाभ आम कर्मचारी को मिल सकता है।
भारत सरकार द्वारा सरकारी कर्मचारियों के मामले में भ्रष्टाचार के मामलों के निपटान के लिए लागू सी सी एस (सी सी ए) रूल्स के अनुसार कोई भी सरकारी कर्मचारी यदि भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ्तार कर लिया जाता है और उसे 48घंटे से अधिक जेल में रहता है तो उसे सरकारी सेवा से निलम्बित समझा जाए है पर दो वर्ष पूर्व दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भ्रष्टाचार के आरोपी मे गिरफ्तार किए गए तो वे कई माह तक तिहाड़ जेल से ही दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में काम करते रहे और सरकार चलाते रहे आखिर न्यायाधीशों और मुख्यमंत्री के पद पर बैठे लोगों के लिऐ आपराधिक प्रक्रिया अलग अलग क्यों है, जब आम कर्मचारी इस आशंका से कि वह जांच को प्रभावित कर सकता है, आपराधिक प्रक्रिया शुरू होते ही निलम्बित कर दिया जाता है पर उच्च पदों पर बैठें न्यायाधीश और मंत्री मुख्यमंत्री अपने पदों पर विराजमान रहते हैं। यू पी ए 1सरकार के समय जब चारा घोटाले में अपना नाम आने के बावजूद लालू प्रसाद यादव उनके मंत्रिमंडल में बने हुए थे तो उनका बचाव करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने कहा था कि जब तक कोई न्यायालय द्वारा दोषी सबित नहीं ठहराया जाता तो उसे निर्दोष ही माना जाएगा तो फिर आम कर्मचारी ट्रायल कोर्ट में केस के निपटान से पहले 20-2 0साल तक निलम्बित क्यों रखे जाते हैं।
मैने भारत सरकार में अपनी सेवा के दौरान कम से कम बीस मामलों में देखा है कि छोटे मोटे अपराधों में अपना नाम आने पर अपना त्यागपत्र दे देते है और स्टीरियोटाइप ढंग से उनका त्यागपत्र स्वीकार करने के बजाय उनको सस्पेंड करके सी बी आई या अन्य जांच एजेंसियों को भेज देते हैं और ये एजेंसियां छोटे मोटे अपराधों में कनविक्शन के लिय ट्रायल कोर्ट में भेज देते है जब कि इन मामलों को विभागीय कार्यवाही के द्वारा बर्खास्तगी, पद अवनति या अन्य उपयुक्त सजा दी जा सकती है। पर ट्रायल कोर्ट में भेजने के बाद ट्रायल बीस वर्ष तक चलता है और तब तक उस कर्मचारी को सस्पेंड रखा जाता है और उसे गुजारा भत्ता के रूप में 50%से लेकर 75%, तक वेतन देना पड़ता है और जो कर्मचारी बीस पच्चीस वर्ष की आयु में इन चक्करों में फंस जाता है वह 75से 80वर्ष की आयु में ही छूट पाते हैं, पर न्यायाधीशों की स्थिति अलग है जो त्यागपत्र देकर अपनी नई जिंदगी शुरू कर सकते हैं।
जस्टिस वर्मा ने अपने खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया पूरी होने से पहले अपना त्यागपत्रसीधे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेज दिया और इस इस्तीफे से उन पर चल रही महाभियोग की प्रक्रिया बीच में ही रुक गई, मानो संसद यह इंतजार कर रही थी कि जस्टिस वर्मा का इस्तीफा आए और हम महाभियोग की कार्यवाही रोक दे, ऐसी दरियादिली आम कर्मचारियों के साथ नहीं दिखाई जाती कि 100-200 रु की रिश्वत के आरोप में घिरा व्यक्ति इस्तीफा दे और उसके खिलाफ सी बी आई या पुलिस की कार्यवाही रोक दे उसे तो अंजाम तक पहुंचाना होता है यहां पर गौर करने वाले बात है कि जस्टिस वर्मा के आवास से 15करोड़ से अधिक के नोट मिले या जले, पर कोई एफ आई आर नहीं हुई। इससे पहले वर्ष 2011में कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ फंड की हेराफेरी का आरोप लगा, जांच में दोषी पाए जाने के बाद राज्यसभा में उन्हें हटाने का प्रस्ताव पारित हो गया लेकिन लोकसभा में वोटिंग से पहले उन्होंनेइस्तीफा दे दिया। इसी तरह सिक्किम हाईकोर्ट के जस्टिस दिनाकरन पर वर्ष 2011में ही कदाचार के आरोप लगे संसद द्वारा उनके खिलाफ जांच समिति बनाई गई पर जांच समिति की कार्यवाही शुरू होने से पहले उन्होंने जांच समिति की प्रक्रिया पर अविश्वास जताते हुए अपने पद से त्यागपत्र दे दिया।
इस प्रकार भ्रष्टाचार कदाचार के आरोपों से घिरे जजों का इस्तीफा दे देने से महाभियोग की प्रक्रिया रद्द हो जाती है और कोई ऐसा नियम नहीं है कि महाभियोग से पहले इस्तीफा देने वाले जज के रिटायरमेन्ट बेनिफिट्स पेंशन आदि रोक दिए जाए। इसीलिए भ्रष्टाचार और कदाचार के लिप्त पाए जाने के बाद भी ये सुविधाएं मिलती रहती है जो इज्जत के साथ अपनी सेवा पूरी करने वाले जज को मिलती रहती है। पर एक आम कर्मचारी यदि अपने खिलाफ कार्रवाई पूरी होने से पूर्व त्याग पत्र दे दे तो क्या उस पर हो रही कार्यवाही रुक जाएगी या उसे जेल की सलाखों के पीछे जाना ही पड़ेगा।
स्वतंत्र भारत में विगत 7दशक में कई पार्टियां सत्ता में आई और सत्ता से बाहर हुई और इनकी नीति के हिसाब से सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों में बड़ा बदलाव हुआ गांधी आंबेडकर और नेहरू जैसे लोगों को बड़ी श्रद्धा से पूजा जाता था पर आज कल कोई भीछूट भैया इनको गाली देने लगताहै, पर एक चीज नहीं बदली वो है लोगों का देश की न्यायपालिका के प्रति अटूट विश्वास, पर यदि भ्रष्टाचार और कदाचार में लिप्त न्यायाधीशों को तकनीकी आधार पर इनके कृत्यों की सजा पाने से बचाया जायेगा औरआम जनता छोटे छोटे अपराधों के लिय 30-4 0साल तक न्यायालयों के चक्कर लगाएगी तो लोगों का न्याय पालिका से विश्वास उठ जाएगा।

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