गुरुवार, 12 मार्च 2026

खाड़ी युद्ध में के कारण देश में गैस की किल्लत आखिर क्यों?

बसंत कुमार

खाड़ी में ईरान व इजरायल के बीच चल रही युद्ध से देश में एलपीजी किल्लत से आमलोगों की मुश्किलें बढ़ गई है कई जगह गैस सिलेंडर की सप्लाई प्रभावित होने के कारण लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ रहा है। कमर्शियल सिलेंडर की सप्लाई कम होने से होटल और रेस्टोरेंट के बंद होने का खतरा बढ़ गया है रसोई का बजट भी बिगड़ रहा है और उपभोक्ताओं में नाराजगी बहुत ज्यादा बढ़ गई है। यद्यपि भारत सरकार के पेट्रोलियम मिनिस्टर हरदीप पुरी ने यह दावा किया है कि युद्ध की स्थिति के बावजूद घरेलू इस्तेमाल के लिए सीएनजी और पीएनजी की शत प्रतिशत आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं पर वास्तविकता यह है कि गैस किल्लत के कारण चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है एक तरफ ररेस्तरां के मालिक यह कह रहे हैं कि अगर जल्द ही स्थिति नहीं संभली तो कामकाज बंद हो जाएंगे और वे लोग जिनके घरों में शादियां हैं वह गैस सिलेंडर की कमी के कारण चिंता में बैठे हुए हैं। ऐसा क्या है कि हमने अपनी अर्थव्यवस्था को इस तरह बना दिया की खादी के युद्ध के कारण हमारी अपनी दिनचर्या नष्ट होती जा रही है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सर संघ संचालक पूज्य गुरु गोलवलकर ने बहुत पहले ही स्वावलंबन आत्म पूर्ति के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा था कि हमें स्वयं के संसाधनों पर निर्भर करना चाहिए यानी अगर किसी वस्तु की कमी है तो हमें निर्यात से कमाई हुई विदेशी मुद्रा से उसे आयात करें। इसका तात्पर्य है कि हमें अपने संसाधनों पर निर्भर रहना चाहिए। आत्म पूर्ति की अवस्था में अपने देश में पर्याप्त मात्रा में उत्पादन में किसी प्रकार की कमी ना हो। आज हम पाते हैं कि खाद्य उत्पादन में भारत आत्मनिर्भरता से हटकर फिर से आयात पर निर्भर हो गया है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं कृषि भूमि रसायन और विदेशी बीजों के प्रयोग से कम उत्पादक एवं बंजर हो गई है। गुरु जी ने उसमें चेतावनी दी थी कि हम अपनी आर्थिक नीति को खाद्य पदार्थों के उत्पादन के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए व आत्मनिर्भरता क्यों बढ़ाने के लिए जैविक खेती वन ऊर्जा और सरकार प्रयास के रूप में पर्यावरण के उनको माध्यम से करनी चाहिए। पर आज

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रवादी विचारधारा वाली पार्टी की सरकार है पर हम खाड़ी के युद्ध के कारण बेबस लग रहे हैं आखिर इसके क्या कारण है।

आर्थिक सुधार युग के दौर से पूर्व तक तक हम लोग शादी विवाह या रेस्टोरेंट के संचालन में प्राकृतिक संसाधनोंवीजैसे लकड़ी कोयलेऔर गाय के गोबर से बने उपलेका प्रयोग करते थे, घर में जब भी शादी होती थी तो अपने उत्पादित पेड़ों से कटाई करके लकड़ी से काम कर लिया जाता था इस तरह से रेस्टोरेंट में कोयल के उपयोग से सारे पकवान बनाए जाते थे परंतु आर्थिक सुधार के प्रारंभ होने के बाद हमने इन प्राकृतिक संसाधनों को बंद करके बाहर से आयात गैस के ऊपर पूर्णतया निर्भर करना शुरू कर दिया है यहां तक की खाने का सामान गाड़ियां आज सभी आयातित गैस की पर ही चल रही है और जब खाड़ी में युद्ध हुआ तो हमारी दिनचर्या ही पूरी तरह से अस्त व्यस्त हो गई है लोगों को चिंता सताए जा रही है कि अगर यह युद्ध ज्यादा चला तो हमारे शादी विवाह जैसे आयोजन कैसे होंगे या खाना कैसे बनेगा।

अपने जीवन में खेती बाड़ी से लेकर जीवन की दिनचर्या में अत्यधिक निर्भरता की खतरे को हमारे विचारों ने पहले ही जान लिया था और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री राष्ट्र वादी विचारक डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी अपनी पुस्तक हिंदुत्व व राष्ट्रीय पुनरुत्थान में लिखते हैं" आर्थिक सुधार युग के पूर्व तक लोग गाय और बैलों से अपनी आर्थिक गतिविधिया चला रहे थे क्योंकि आधुनिकता की मजबूरियों के बावजूद ट्रैक्टर हमारे छोटे जोते के लिए उपयुक्त नहीं है। अमेरिका में प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपलब्ध भूमि 24 एकड़ के आसपास है जो भारत में मात्र 0.70 एकड़ है। ट्रैक्टर डीजल की खपत के साथ साथ प्रदूषण बढ़ाता है। इसीलिए अल्बर्ट आइंस्टाइन ने सर सी वी रमन को एक पत्र के माध्यम से कहा"भारत के लोगो को बताये कि अगर वे जीवित रहना चाहते हैं और दुनियां को जीवित रहने का मार्ग दिखाना चाहते हैं तो ट्रैक्टर को भूल जाए तथा अपनी प्राचीन परंपरा को अपनाए एवं जुताई बैलों से करे "। परंतु अल्बर्ट आइंस्टीन है इस चेतावनी के बावजूद भी भारतअपनी पारंपरिक जीवन शैली को छोड़कर पश्चिम से आयातित जीवनशैली को अपना रहा है और अपने जीवन की गतिविधियों को 90% खाड़ी देशों से आयातित तेल के लिए के ऊपर निर्भर कर दिया है यहां तक की अब हम 500 मी. की दूरी तय करने के लिए पैदल चलने के बजाय मोटरसाइकिल या कार का इस्तेमाल करते हैं जो डीजल या पेट्रोल से चलती है, ऐसे में खाड़ी युद्ध के कारण ईरान के रास्ते भारत में तेल न पहुंचना भारत के आर्थिक गतिविधियों को ठप कर सकता है।

देश में करीब 19.01 करोड़ स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस की प्रतिदिन खपत है और इसका 50% आयातित होता है और गुंजा का की खाड़ी से जहाज का आवागमन लगभग बंद हो जाने के कारण खाड़ी देशों से करीब 6 करोड़ स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस सप्लाई बाधित हुई है और इस स्थिति से निपटने के लिए भारत सरकार को विशेष मीटिंग बुलानी पड़ी और प्रधानमंत्री ने सभी संबंधित मंत्रालयों और विभागों को निपटने के लिए अलर्ट रहने के लिए कहा। देश के कई हिस्सों मेंकमर्शियल और घरेलू सामान के लिए एलपीजी सिलेंडर की सप्लाई में हो रही दिक्कत की शिकायत के बीच सरकार ने तय किया है कि नेचुरल गैस के उपयोग केलिए म एलजी उत्पादन सीएनजी और पीएनजी को सभी अन्य सेक्टरों पर तरह ही दी जाएगी इन क्षेत्रों की 100% डिमांड पूरी करने का प्रयास किया जाएगा तथा सरकार ने गैजेट नोटिफिकेशन के माध्यम से नेचुरल गैस के इस्तेमाल के लिए प्राथमिकता वाले चार क्षेत्र तय किए है -पहली प्राथमिकता के क्षेत्र में घरेलू पीएनजी सप्लाई, ट्रांसपोर्ट के लिए सीएनजी एलजी उत्पादन की और पाइपलाइन कंप्रेस्ड फ्यूल और अन्य जरूरी पाइपलाइन को रखा गया है

इसके बावजूद भी देश के अंदर उपभोक्ताओं में गहरी चिंता व्याप्त है और सभी डरे हुए है कि यदि खाड़ी युद्ध लंबा चला तो हमारे उद्योग धंधे दैनिक जीवन चर्या बुरी तरह से प्रभावित हो जाएगी इसलिए सरकार को आयातित तेल पर अत्यधिक निर्भरता को दूर करने के लिए कोई न कोई वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ेगी जिससे भविष्य में इस तरह की स्थितियों से निपटा जा सके।

पश्चिम एशिया जंग और इससे तेल की कीमत में भारत की अर्थव्यवस्था में प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञ के मुताबिक कच्चे तेल की कीमत में 10 % की उछाल से भारत की जीडीपी ग्रोथ में 20 से 25 बीसी एस की गिरावट आ सकती है। भारत अपनी जरूर का 89% कच्चा तेल आयात करता है और हाल ही में कच्चे तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल पहुंच चुकी है जो विगत 4 साल के उच्चतम स्तर पर है। हॉर्मुज की

खाड़ी से जहाज की आवा जाही बंद होने के कारण ग्लोबल सप्लाई में 20 से 25 बी पी एस की गिरावट आई है। ईरान और अमेरिका की लंबी लड़ाई से भारत की मुश्किलें और बढ़ सकती है क्योंकि भारत में आयात होने वाला कच्चा तेल हॉर्मुज की खाड़ी से आता है, और कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से देसी महंगाई और भी बढ़ सकता है यदि कच्चा तेल लंबे समय तक 90 डॉलर के आसपास भी रहता है तो महंगाई पांच तक बढ़ सकती है लेकिन वर्तमान स्थिति में तो कच्चा तेल 120 प्रति बैरल के हिसाब से चल रहा है जो चिंता का विषय है और ऐसी स्थिति में भारत का चालू खाते का घाटा और भी बढ़ सकता है जो हमारी अर्थव्यवस्था के लिए उचित नहीं है।

विगत कुछ वर्षों से खाड़ी देशों ईरान इराक और अमेरिका इजरायल के संबंधों में लगातार तनाव की स्थिति बनी रहती है और जिसका असर तेल की कीमतों में पड़ता है जो हमारी अर्थव्यवस्था को बुरी तरह से प्रभावित करता है इस कारण हमें अपने पारंपरिक ऊर्जा संसाधनों के विकास पर भी जोर देना चाहिए जिससे अधिक तेल पर हमारी निर्भरता और न बढ़े।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

मंगलवार, 10 मार्च 2026

खुश रहना है तो हर बात को दिल पर न लें

डॉ. राजेश के पिलानिया

आज विश्व-भर में तनाव, अकेलापन और असंतोष हमें चारों ओर से घेर रहे हैं। तनाव, अकेलापन और असंतोष इक्कीसवीं सदी के जीवन की प्रमुख चुनौतियाँ हैं। डिजिटल तकनीकों, त्वरित मीडिया और सोशल मीडिया की उपस्थिति ने इन चुनौतियों को और अधिक जटिल बना दिया है।

तनाव, चिंता, अवसाद, अकेलेपन और असंतोष के अनेक कारणों में से एक बड़ा कारण है बातों को व्यक्तिगत रूप से लेना। हर बात को अपने ऊपर लेना बहुत अधिक तनाव, चिंता और क्रोध पैदा करता है। इसके अनेक दुष्प्रभाव हो सकते हैं, जैसे नींद में बाधा, अवसाद, अकेलापन और लंबे समय तक रहने वाली उदासी।

खुशी पर पिछले पंद्रह वर्षों के शोध के दौरान लेखक ने ऐसे अनेक लोगों से मुलाकात की है जो हर बात को व्यक्तिगत रूप से लेते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इनमें से कई लोग इस बात से भी अवगत नहीं होते कि उनमें यह समस्या है और यही आदत उनके जीवन में तनाव, क्रोध, चिंता, अवसाद, अकेलापन और असंतोष को बढ़ा रही है।

यह जीवन जीने का सही तरीका नहीं है। जीवन जीने का एक बेहतर तरीका यह है कि हर बात को व्यक्तिगत रूप से लिया जाए। यह कहना आसान है, लेकिन करना आसान नहीं। तो इसे कैसे अपनाया जाए? इसे सरल और व्यवहारिक बनाए रखने के लिए नीचे दिए गए तरीकों का पालन किया जा सकता है। इसके दो व्यापक परिदृश्य हो सकते हैं।

परिदृश्य एक: यह आपके बारे में नहीं है। - अक्सर ऐसा ही होता है। कई बार लोग कोई टिप्पणी करते हैं, प्रतिक्रिया देते हैं या किसी विशेष ढंग से व्यवहार करते हैं, और इसका कारण आप नहीं होते, बल्कि वे स्वयं होते हैं या वह पद और भूमिका होती है जो आप निभा रहे होते हैं। व्यक्ति जिस पद पर होता है और जिस भूमिका में होता है, उसके आधार पर वह कुछ निर्णय लेता है और उसी के अनुसार दूसरे लोग प्रतिक्रिया देते हैं। यह व्यक्ति के बारे में नहीं होता, बल्कि उसके पद और भूमिका के बारे में होता है।

व्यक्ति की भूमिका और पद के अनुसार लोग प्रतिक्रिया देते हैं। उनकी प्रतिक्रियाएँ व्यक्ति पर व्यक्तिगत रूप से नहीं, बल्कि उस पद या भूमिका पर होती हैं। उसी पद या भूमिका के आधार पर व्यक्ति कुछ व्यवहार करता है, कुछ निर्णय लेता है या टिप्पणियाँ करता है। यह आपके बारे में नहीं होता, बल्कि आपके पद या भूमिका के कारण होता है।

इस स्पष्टता के साथ व्यक्ति स्थिति को बेहतर ढंग से समझ सकता है और स्वयं को उससे थोड़ी दूरी पर रख सकता है। वह यह समझ पाता है कि यह मामला व्यक्तिगत नहीं है और इसलिए वह इसे व्यक्तिगत रूप से नहीं लेता। वह स्थिति को अधिक वस्तुनिष्ठ रूप से, दूरी बनाकर देख पाता है।

परिदृश्य दो: यह आपके बारे में है। - कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है कि आप पर व्यक्तिगत रूप से निशाना साधा जाए, कि आपके पद या भूमिका के कारण। तब भी हर बात को अपने ऊपर लेना आवश्यक नहीं है। ऐसे समय में व्यक्ति को अपने उद्देश्य और अपने काम पर ध्यान केंद्रित रखना चाहिए। यदि आपने अपना काम ईमानदारी और निष्ठा से किया है, तो अपनी बात को यथासंभव स्पष्ट रूप से समझा देना चाहिए। इसके बाद जो कुछ आपके नियंत्रण में नहीं है, उसके बारे में चिंता करना छोड़ देना चाहिए। कोई आपके बारे में क्या सोचता है या क्या कहता है, उसे वैसा ही रहने दें।

इस प्रकार सोचने, ध्यान और श्वास-प्रश्वास की अभ्यासों में जुड़ने से व्यक्ति हर बात को व्यक्तिगत रूप से लेने की आदत विकसित कर सकता है। ऐसा करके, बातों को व्यक्तिगत रूप से लेने से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है या उनसे बचा जा सकता है। इक्कीसवीं सदी की जीवन-चुनौतियों के बीच भी, हर बात को व्यक्तिगत रूप से लेना संभव है और खुशहाल जीवन के लिए बेहतर आदतें विकसित की जा सकती हैं।

(लेखक  मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टिट्यूट, गुरुग्राम में प्रोफेसर हैं। वे लोकप्रिय रूप से “भारत के हैप्पीनेस प्रोफेसर” के रूप में जाने जाते हैं और उनका नवीनतम कार्य “द इंडियन प्रैक्टिस ऑफ हैप्पीनेस: सेंटेनेरियन्स से मिले रहस्य” है।)

ग्रंथ केवल मार्गदर्शन करते हैं

विजय लक्ष्मी शर्मा

किसी भी ग्रंथ को पढ़ लेने मात्र से आत्मज्ञान की प्राप्ति नहीं होती और आत्मज्ञान के बिना मुक्ति भी संभव नहीं है। ग्रंथ केवल मार्गदर्शन करते हैं; चलना तो साधक को स्वयं ही पड़ता है। इसके लिए साधना आवश्यक है।

चित्त की वृत्तियों का पूर्णतः निरोध ही योग है। अपनी इन्द्रियों को वश में कर चेतना का आत्मा से संयुक्त होना ही योग का विज्ञान है।

मनुष्य का चित्त वासनाओं का घर है। अनेक जन्मों के संस्कार उसमें विद्यमान रहते हैं और उनकी तरंगें निरंतर उठती रहती हैं। आत्मा इन सबसे परे है। जिस प्रकार जब तक तालाब के जल में हलचल बनी रहती है, तब तक चन्द्रमा का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई नहीं देता; उसी प्रकार मन में वासनाओं की हलचल रहने पर आत्मबोध नहीं हो सकता।

समस्त सृष्टि का विस्तार तीन गुणों— सत्त्व, रज और तम —के आधार पर है। यह प्रकृति इन्हीं तीन गुणों से युक्त है। आत्मा इन सबका केवल साक्षी है, इसलिए उसे दृष्टा कहा जाता है। तीनों गुणों की मात्रा में भिन्नता होने से प्राकृतिक तत्त्वों में विविधता दिखाई देती है।

चित्त को स्थिर करने के लिए जो बार-बार प्रयत्न किया जाता है, वही अभ्यास कहलाता है। मन अत्यंत चंचल है; वह एक क्षण भी शांत नहीं रहता, क्योंकि उसमें निरंतर विचारों का प्रवाह चलता रहता है। यह प्रवाह निद्रा में भी बना रहता है, तभी मनुष्य स्वप्न देखता है।

मन अनेक दिशाओं में भागता है। उसे स्थिर करने के लिए अनेक शास्त्रों में विभिन्न साधन बताए गए हैं, जैसे— ध्यान, भजन, कीर्तन, मंत्र-जाप, अपने इष्टदेव या परमात्मा का स्मरण तथा गुरु द्वारा प्रदत्त मंत्र का जप आदि। इन उपायों के माध्यम से मन धीरे-धीरे किसी एक केंद्र पर स्थिर होने लगता है।

इससे मन की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। किंतु वह कुछ समय शांत रहने के बाद पुनः दुगुने वेग से भोगों की ओर भागने लगता है। जिस प्रकार उपवास के समय मन में बार-बार भोजन की इच्छा उत्पन्न होती है और ध्यान बार-बार भोजन की ओर जाता है, उसी प्रकार ध्यान में बैठने पर विचार और भी तीव्रता से आने लगते हैं। उन्हें रोकने के लिए निरंतर प्रयास करना पड़ता है— यही अभ्यास है। इसमें दीर्घ समय लग सकता है, इसलिए धैर्य आवश्यक है।

प्राणायाम से भी चित्त की स्थिरता प्राप्त होती है। संसार के कार्यों के लिए गति आवश्यक है, परंतु परमात्मा स्वयं स्थिर है। वह सर्वत्र विद्यमान है और अचल है। जिस क्षण मन और शरीर की समस्त क्रियाएँ शांत हो जाती हैं, उसी क्षण आत्मज्ञान की अनुभूति होती है।

अतः परमात्मा की प्राप्ति के लिए बाह्य रूप से कुछ करने की अपेक्षा न करने का अभ्यास करना आवश्यक है। हमारा मन निरंतर कुछ-न-कुछ करता रहता है; अभ्यास के द्वारा उसे निष्क्रियता की ओर ले जाना होता है। उसे स्थिर और शांत करना आवश्यक है, ताकि उसकी समस्त हलचल समाप्त हो जाए। आत्मज्ञान का यही एक मार्ग है।

यह शरीर एक ऐसे घर के समान है जिसके भीतर परमात्मा का निवास है और बाहर संसार स्थित है। मनुष्य का मन इस घर के द्वार पर खड़ा होकर संसार को देखता रहता है। यदि उसमें संसार के प्रति वैराग्य उत्पन्न हो जाए, तो उसे अपने ही भीतर परमात्मा की झांकी प्राप्त होती है और वह आत्मानंद का अनुभव करता है। यही योग है।

घरेलू न्यूज़प्रिंट में कैपेसिटी के दावे और क्वालिटी में कमी

नई दिल्ली। द इंडियन न्यूज़पेपर सोसाइटी (INS) की ओर से, श्री विवेक गुप्ता, प्रेसिडेंट-INS ने देश में घरेलू न्यूज़प्रिंट की मौजूदा स्थिति पर गंभीर चिंता जताई है।

डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड (DPIIT) ने अपनी 2024-25 की रिपोर्ट में बताया है कि घरेलू न्यूज़प्रिंट इंडस्ट्री का दावा है कि उसके पास 123 न्यूज़प्रिंट मिलें हैं, जिनकी इंस्टॉल्ड कैपेसिटी लगभग 2.2 मिलियन टन सालाना है। हालांकि, असल प्रोडक्शन के आंकड़ों से पता चलता है कि कैपेसिटी का इस्तेमाल इन दावों से काफी कम है, जिससे न्यूज़प्रिंट की देश में काफी उपलब्धता के दावों को चुनौती मिलती है। क्वांटिटी के अलावा, प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री के लिए क्वालिटी भी एक बड़ी चिंता बनी हुई है।

ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS), दिसंबर 2022 में पब्लिश हुए न्यूज़प्रिंट स्पेसिफिकेशन (सेकंड रिविजन) के तहत, फिजिकल, ऑप्टिकल, मैकेनिकल और सरफेस पैरामीटर के आधार पर न्यूज़प्रिंट को ग्रेड 1 और ग्रेड 2 में बांटता है।  हालांकि दोनों ग्रेड BIS के हिसाब से हैं, फिर भी वे ऑपरेशन के हिसाब से एक जैसे नहीं हैं।

ग्रेड 1, ज़्यादातर इम्पोर्टेड न्यूज़प्रिंट के बराबर है, एक बेहतर क्वालिटी बेंचमार्क दिखाता है और मोटे तौर पर इंटरनेशनल स्टैंडर्ड के हिसाब से है। इसकी खासियतों में ज़्यादा ब्राइटनेस (जिससे टेक्स्ट ज़्यादा शार्प और इमेज साफ़ बनती है), बेहतर सरफेस स्मूदनेस (एक जैसी इंक ले के लिए ज़रूरी), ज़्यादा टेंसाइल और टियर स्ट्रेंथ (हाई-स्पीड प्रिंटिंग प्रेस पर स्टेबिलिटी पक्का करना), और कंट्रोल्ड पोरोसिटी (इंक स्प्रेड और शो-थ्रू कम करना) शामिल हैं। ये खूबियां ग्रेड 1 न्यूज़प्रिंट को मॉडर्न हाई-स्पीड न्यूज़पेपर प्रिंटिंग ऑपरेशन के साथ ज़्यादा कम्पैटिबल बनाती हैं।

ग्रेड 2 न्यूज़प्रिंट मोटे तौर पर देश में बने न्यूज़प्रिंट जैसा ही है। टेक्निकली मिनिमम BIS थ्रेशहोल्ड के हिसाब से होने के बावजूद, इसमें ऑपरेशन की कुछ बड़ी कमियां हैं, जिनमें कम और एक जैसी ब्राइटनेस लेवल, खराब सरफेस स्मूदनेस (जिससे इंक फेदरिंग और डॉट गेन होता है), कम मैकेनिकल स्ट्रेंथ (जिससे बार-बार वेब टूटता है) और इर्रेगुलर पोरोसिटी (जिससे इंक की ज़्यादा खपत होती है और प्रिंट में एक जैसा नहीं दिखता) शामिल हैं।  इसलिए, ग्रेड 2 न्यूज़प्रिंट से कागज़ और स्याही की ज़्यादा बर्बादी होती है, बार-बार काम रुकने से प्रेस की स्पीड धीमी हो जाती है, जिससे डिलीवरी शेड्यूल में देरी होती है। इसलिए, यह मॉडर्न हाई-स्पीड प्रिंटिंग प्रेस की ज़रूरतों को भरोसेमंद तरीके से पूरा नहीं करता है।

बीआईएस मानकों की समीक्षा से यह भी पता चलता है कि ग्रेड 2 मानक प्रदर्शन-आधारित होने के बजाय न्यूनतम सीमा-उन्मुख बना हुआ है। दूसरे शब्दों में, यह मानक इस प्रश्न का उत्तर देता है कि "क्या कागज बुनियादी स्तर पर स्वीकार्य है?" लेकिन यह नहीं कि "क्या कागज आधुनिक समाचार पत्र मुद्रण कार्यों के लिए उपयुक्त है?"

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री श्री पीयूष गोयल जी ने कहा है कि "हमारे मानक वैश्विक मानकों से कम नहीं होने चाहिए और यदि वे उनसे नीचे हैं तो उन्हें उन्नत किया जाना चाहिए"। हाल ही में उन्होंने आगे कहा कि "वैश्विक मानकों का सामंजस्य स्थापित करने से न केवल उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ती है बल्कि मुक्त व्यापार, खुले बाजारों को भी बढ़ावा मिलता है और इस तरह की पहल से खुले बाजारों का विस्तार होगा और व्यवसायों के लिए समान अवसर उपलब्ध होंगे"।

ये बयान प्रिंट मीडिया उद्योग की उन चिंताओं की पुष्टि करते हैं, जो अब तक इस बात को लेकर बनी हुई हैं कि घरेलू समाचारपत्र की मौजूदा गुणवत्ता और मानक, कुल मिलाकर, भारतीय प्रकाशकों की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करते हैं।

भारतीय प्रकाशकों के सामने केवल उत्पादन क्षमता की समस्या नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य और प्रिंटिंग प्रेस के अनुकूल गुणवत्ता वाले समाचार पत्र की उपलब्धता की भी समस्या है। जब तक घरेलू उत्पादन क्षमता को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप उन्नत नहीं किया जाता, तब तक भारत में गुणवत्तापूर्ण, कुशल और समय पर समाचार पत्र उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए समाचार पत्र का आयात अनिवार्य रहेगा।

शनिवार, 7 मार्च 2026

खामेनेई का अंत और इस्लामी क्रांति

अवधेश कुमार 

अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले में ईरान के सर्वोच्च मजहबी नेता अयातुल्लाह अल खामेनेई का मारा जाना 21वीं सदी की ऐसी बड़ी घटना है जिसका प्रभाव कई रूपों में संपूर्ण विश्व पर पड़ेगा। इस्लामी शासन होने के कारण वे व्यावहारिक रूप से ईरान के सर्वोच्च नेता थे। राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की भूमिका खामेनेई की नीतियों के क्रियान्वयन की रही है।अयातुल्लाह होने के कारण उन्हें विश्व भर के शिया मुसलमान अपने शीर्ष मजहबी नेता के रूप में देखते थे। पाकिस्तान ,ईरान ,भारत सहित कई देशों में शिया मुसलमानों का विरोध सामने है। किंतु यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि ईरान के एक भी पड़ोसी देश ने ईरान का पक्ष नहीं लिया है। हालांकि पिछले वर्ष खामेनेई ने संपूर्ण विश्व के मुसलमानों की एकता का आह्वान किया था। ईरान और उसके बाहर उनके समर्थकों की कल्पना में कभी उनके इस तरह की मौत की बात नहीं आई होगी। हालांकि पिछले वर्ष जून में पहले इजरायल और बाद में अमेरिका के हमले के समय अटकलें लगी थी कि शायद वे देश छोड़कर चले गए। ऐसा हुआ नहीं।

इस घटना की संपूर्ण परिणतियों का स्पष्ट पूर्वावलोकन अभी कठिन है। इतना स्पष्ट कहा जा सकता है कि ईरान में 1979 से इस्लामी क्रांति का एक दौर तत्काल समाप्त हो गया है।

ऐसा नहीं है कि इस्लामी क्रांति के बाद हुए परिवर्तनों, स्थापित ढांचें, विचारधारायें समाप्त हो गईं हैं पर कम से कम उस रूप में आने वाले लंबे समय तक मुक्त और स्वतंत्र शिया इस्लामी शासन नहीं हो सकता। यह कथन सामान्य क्रांतियों के संदर्भ में है कि क्रांति के शिशु ही क्रांति को खा जाते हैं। ईरान के इस्लामी क्रांति के बारे में भी तत्काल यह निष्कर्ष सही दिखता है। सामान्यतः आम इस्लामी देशों से थोड़ा उदार और खुले जीवन जीने वाले ईरान में 1979 के इस्लामी क्रांति और अयातुल्लाह के सर्वोच्च नेता के रूप में स्थापना संपूर्ण विश्व की दृष्टि से एक नई घटना थी। इसमें केवल ईरान नहीं संपूर्ण अरब और कुछ मायनो में इससे बाहर भी गैर इस्लामी या इस्लाम विरोधी शासनों के अंत और इसके विस्तार का विचार प्रबल था। यहूदी देश इजरायल को इस्लाम का दुश्मन घोषित करते हुए ईरान राष्ट्र का लक्ष्य धरती से उसका नामोनिशान मिटाना हो गया। अमेरिका और उसके नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों को शैतान कहा गया। यह व्यावहारिक तौर पर विश्व में एक इस्लामी विद्रोह की सत्ता का स्वरूप था। सच कहें तो इसी अतिवादी भाव के व्यवहार ने ईरान को उस अवस्था में पहुंचा दिया जहां उसका शांत, स्थिर, सशक्त और सुरक्षित रहना असंभव था। जब आप किसी एक देश के धरती पर नहीं रहने के अधिकार की घोषणा करेंगे और उसके अनुसार देश का व्यवहार होगा, बाहर अलग-अलग हिंसक समूह पैदा कर उसकी मदद करेंगे तो इसकी प्रतिक्रिया आपको झेलनी पड़ेगी। आखिर कोई देश ऐसे शासन को कायम रहने देने के पक्ष में क्यों होगा जो उसके अंत को अपना लक्ष्य बनाकर काम कर रहा हो?

इस्लामी क्रांति के साथ 1979 में अमेरिकी दूतावास पर हमले और उसके बाद की तस्वीरें आज भी सिहरन पैदा करती हैं। अमेरिकी कर्मचारियों के हाथ बांध कर बाहर लाया गया, वे बंधक बनाये गये। तब से हर अमेरिकी राष्ट्रपति की कामना होती थी ईरान से इस्लामी शासन का अंत हो। तत्कालीन ईरानी शासक राजा शाह पहलवी को अपने परिवार और समर्थकों के साथ अमेरिका में शरण लेनी पड़ी। आज उनके पुत्र रेजा शाह पहलवी और  परिवार अमेरिका में ही है। पिछले लगभग 3 महीने से ईरान के अंदर विरोध प्रदर्शनों में हमने देखा कि लोग उनकी तस्वीरें लिए वापस आओ के नारे लगा रहे थे। ये लोग अमेरिका से भी हस्तक्षेप की भी मांग कर रहे थे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने विरोधियों का समर्थन किया,  ईरान को चेतावनी दी पर तत्काल सीधा हस्तक्षेप नहीं किया। कुछ वक्तव्यों और घटनाओं से लग रहा था कि डोनाल्ड ट्रंप इस बार परिणामकारी सैन्य हस्तक्षेप करने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने खामेनेई शासन को चेतावनी दी, न्यूक्लियर कार्यक्रमों को समाप्त करने की शर्तें रखी, ओमान में बातचीत भी आरंभ की किंतु सब रणनीति के तहत था। उसके साथ-ईरान के आसपास अब्राहम लिंकन जैसा सबसे बड़ा नौसैनिक बेरा और अन्य तैयारी होती रही।

दरअसल, 7 अक्टूबर ,2023 को हमास द्वारा उत्सव मना रहे निर्दोष निरपराध यहूदियों पर हमला कर लगभग 1200 लोगों का सरेआम कत्लेआम और बंधक बना लेने की घटना ने पश्चिम एशिया खासकर ईरान इजरायल ,ईरान अमेरिका संबंधों को ऐसे मोड़ पर ला दिया जिसे अयातुल्लाह सहित उनके परिवार के अनेक सदस्यों ,प्रमुख कमांडरों और रक्षा मंत्री आदि की मृत्यु की पृष्ठभूमि माना जा सकता है। गाजा में हमास , लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हुती अयातुल्लाह के ईरान के ही गैर राज्यीय आतंकवादी समूह हैं। उस घटना ने विश्व के हर विवेकशील व्यक्ति और संतुलित राष्ट्रों को अंदर से हिला दिया। हालांकि यहूदियों के विरुद्ध इस्लामी मजहबी भाव को देखते हुए मुस्लिम देशों में आम भाव ऐसा नहीं था किंतु ईरान की तरह भूमिका दूसरे की नहीं थी।

इजरायल और अमेरिका का ऑपरेशन तभी से आगे बढ़ने लगा। लेबनान में हिजबुल्लाह  तथा गाजा में हमास को पूरी तरह समाप्त करने के लक्ष्य से इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू ने कार्रवाई आरंभ की। हिजबुल्लाह प्रमुख नजीबुल्लाह और उसके ज्यादातर शीर्ष साथियों की मृत्यु ,उसके केंद्र काफी हद तक नष्ट होने आदि के साथ उसकी शक्ति इतनी क्षीण हो गई कि पहले की तरह संघर्ष नहीं कर सकते थे। गाजा में भी संघर्ष जारी रहा और अपने लोगों को सुरक्षित लाने की विवशता रहते हुए भी इजरायल ने हमास के ढांचे को जितना संभव था अंत करने की कोशिश की। डोनाल्ड ट्रंप के शासन में आने के बाद कुछ समय के लिए लगा कि शायद इजरायल की उनको लेकर अपेक्षाएं गलत साबित हो सकतीं हैं। लेकिन 22 जून 2025 को अमेरिका के शक्तिशाली जीबी 57ए/ बी मैसिव ऑर्डिनेंस पेनिट्रेट या एमोपी  जिसे बंकर बस्टर बम भी कहा जाता है, के हमलों में ईरान के तीन महत्वपूर्ण फोर्डो, नतांज और इस्फाहान न्यूक्लियर ठिकानों को नष्ट किया। वस्तुत: अमेरिका और इजराइल क्रमबद्ध तरीके से यहां तक पहुंचे हैं। ईरान पर पिछले एक दशक से ज्यादा के प्रतिबंधों ने उसके तेल व्यापार को लगभग समाप्त कर दिया और आर्थिक संकट बढ़ता गया। डोनाल्ड ट्रंप ने उन प्रतिबंधों को सख्ती से लागू करने के उपाय किए और उनके तेवर ऐसे थे जिसका असर हुआ। इस बीच ईरान रिवॉल्यूशनरी कोर्प्स गार्ड से लेकर प्रमुख रक्षा वैज्ञानिकों आदि की हत्यायें होती रहीं । इजरायल ने भी बीच-बीच में हमले किये। हालांकि पिछले वर्ष ईरान के मिसाइल हमले से इजरायल को भारी तबाही का सामना करना पड़ा। उसके बाद ज्यादा सशक्त तैयारी का अहसास हुआ और वही किया गया।

आयतुल्लाह के मारे जाने के कुछ घंटे पहले जब डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा किया कि ईरान के बहादुर लोगों से मेरा अनुरोध है कि आप अपने घरों में रहें ,चारों तरफ हमारे बम गिर रहे हैं और इस शासन से मुक्त कर आपको हम ईरान सौंप देंगे तब भी शायद बहुत बड़ी संख्या में लोगों को विश्वास नहीं हुआ होगा कि वे जो बोल रहे हैं वही करने की तैयारी से इस बार ईरान में हस्ताक्षेप हुआ है। देख लीजिए ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीश में ज्यादातर मुस्लिम देश ही है। कहा तो यह भी जा रहा है कि सऊदी अरब के प्रधानमंत्री और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिका और इजरायल का पूरा साथ दिया है। ईरान जिस तरह सऊदी अरब, बहरीन, ओमान, कुवैत ,क़तर आदि सभी स्थानों के अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने के नाम पर हमले कर रहा है उसके लगता है कि हर देश उसके विरुद्ध थे। वैसे 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान का सबसे पहला और लंबा युद्ध इराक के साथ हुआ जो स्वयं शिया बहुल देश है।

अभी भविष्य की स्पष्ट तस्वीर नहीं प्रस्तुत की जा सकती। ईरान के बचे-खुचे कमांडर अपनी शक्ति से संघर्ष करेंगे,  दुनिया भर के शिया अतिवादी समूह अपने स्तर से हिंसा और विरोध करेंगे, लेकिन ईरान के शासन का लंबे समय तक समूचे देश पर नियंत्रण रहना कठिन होगा। ईरान पर कब्जा कर किसी को सत्ता पर बिठाना अमेरिका के लिए कठिन है। बड़ी संख्या में ईरानी भी किसी बाहरी हस्तक्षेप वाले शासन को स्वीकार नहीं करेंगे। खामेनेई की मृत्यु के बाद तत्काल उनके प्रति सहानुभूति भी पैदा हुई है जो‌ लोगों की प्रतिक्रियाओ में दिख रही है।‌ ईरान में तुर्क, कुर्द, अज़रबैजानी  अलग-अलग स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका हौसला बढ़ा है। वहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मांग करने वाला समूह भी बहुत बड़ी संख्या में है। इसलिए ईरान के एक निश्चित दिशा में पहुंचने के पहले वहां घटनाएं अनेक मोड़ लेंगी और हमें प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। इस्लामी शासन का ऐसा हस्र पूरी दुनिया के इस्लामवादियों के लिए सबक होना चाहिए। जो भी हो 1979 इस्लामी क्रांति के सिद्धांत वाली ऐसी शासन व्यवस्था वहां कायम नहीं रह सकती, जिसका संपूर्ण देश पर प्रभावी नियंत्रण हो।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208

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