गुरुवार, 22 जनवरी 2026

गले की फांस बन रहे हैं दलितों आदिवासियों की सुरक्षा हेतु बनाए गए कानून

बसंत कुमार

भारत सरकार ने देश के दलित और आदिवासियों की सुरक्षा के लिए एससी/एसटी एक्ट के अलावा कुछ कानून बनाए थे जिसमें दलित आदिवासियों की शोषण के विरुद्ध उनकी सुरक्षा की जा सके परंतु देखने में यह आया है कि यह कानून जो उनकी सुरक्षा के लिए बने थे वह उनके गले की फांस बनते जा रहे हैं मसलन 1970 के दशक के दौरान एक कानून बनाया गया था कि कोई भी सवर्ण किसी दलित आदिवासी की जमीन ना लिखवा सके और इसके लिए यह प्रावधान किया गया कि यदि कोई किसी दलित या आदिवासी की जमीन जायदाद लिखवाता है तो उसके लिए जिलाधिकारी की अनुमति होनी चाहिए परंतु आज आर्थिक सुधार के युग में लोग खेती से भाग रहे हैं और उद्यमिता के क्षेत्र में काम करना चाहते हैं परंतु कोई भी दलित/आदिवासी जिलाधिकारी की परमिशन न मिलने के कारण अपनी पुश्तैनी जमीन को बेचकर कोई उद्योग धंधा नहीं शुरू कर सकता क्योंकि यह प्रक्रिया इतनी जटिल है कि कोई भी सवर्ण उसकी जमीन नहीं खरीदना चाहता और खरीदया भी है तो उसे बाजार के हिसाब से वाजिब भी नहीं मिलते इसलिए अब समय आ गया है कि दलितों के लिए की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून पर पुनः विचार किया जाए।

मेरे एक जानने वाले लखनऊ में रहते थे किसी नामी गिरामी कंपनी में काम कर रहे थे सब कुछ ठीक चल रहा था उन्होंने एलडीए से एक फ्लैट भी खरीद लिया था परंतु दुर्भाग्य से उनका एक्सीडेंट हो गया और वो काम करने लायक नहीं रह गए और नतीजा यह हुआ जिस कंपनी में काम करते थे उन्हें निकाल दिया गया और वह बेरोजगार हो गए क्योंकि एक्सीडेंट में उनका एक पैर टूट गया था तो अपने इलाज के लिए वह अपने फ्लैट को बेचना चाहते थे पर क्योंकि वह अनुसूचित जाति के थे इसलिए उनको जमीन या फ्लैट को बेचने के लिए उन्हें जिलाधिकारी की परमिशन मिलनी जरूरी थी और इसी जटिल प्रक्रिया से बचने के लिए उन्हें कोई खरीदार नहीं मिल रहा था और जो लोग खरीदने को तैयार भी थे उसका वाजिब दाम नहीं दे रहे थे परिणाम यह हुआ की वे परमिशन केलिए कोर्ट के चक्कर लगाते लगाते स्वर्ग को प्यार हो गए, कहने का मतलब यह है की जो उनकी मेहनत की कमाई से बनाई गई थी। वह भी उनके मुसीबत में काम नहीं प्रॉपर्टी अगर सक्षम प्राधिकारी के परमिशन की अड़चन नहीं आती तो उन्हें अपनी जमीन का पूरा लाभ मिल जाता और वह अपना इलाज करा सकते थे पर ऐसा नहीं हुआ क्योंकि जो कानून उनकी सुरक्षा के लिए बनाया गया था वही कानून उनके गले की पास बन गया।

1970 के दशक में मैं अपने जनपद जौनपुर के प्रसिद्ध कॉलेज टीडी कॉलेज का छात्र था वहां पर अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों की फीस एक आने हुआ करती थी और सामान्य श्रेणी के बच्चों की फीस सवा छह रुपए हुआ करती थी लेकिन जो दलित या आदिवासी छात्र क्लास टीचर को एक आने थी देने आया करते थे उसे क्लास टीचर के द्वारा व्यंग वाणी सुनने को मिलते थे। कई बार क्लास टीचर कहते थे कि भाई पूरे क्लास की इकट्ठी दे दिया करो यह कभी कहते कि साल भर की इकट्ठी दे दिया करो। अब उस समय के 13-14 वर्ष के दलित छात्रों के मन में क्या गुजरती थी वह स्वर्ण अध्यापक नहीं समझ सकते थे। मुझे इस बात की हैरानी होती थी कि जब इन छात्रों के लिए स्कॉलरशिप और गरीब सवर्ण छात्रों के लिए विद्यालय मैनेजमेंट की ओर से पुअर फंड जैसी स्कीमें लागू थी, तो यह एक आने फीस का फंडा क्यों रखा गया था इससे दलित व आदिवासी वर्ग के छात्रों में इंफेरियारिटी कंपलेक्स के साथ-साथ उन्हें अपमानित भी होना पड़ता था। मुझे कक्षा 11 का एक किस्सा याद है हम लोग विज्ञान के छात्र थे और विज्ञान केमिस्ट्री के शिक्षक क्लास में आए और सभी बच्चे उनके सम्मान में खड़े हो गए पर एक दलित छात्रा जिसका ध्यान कहीं और था वह अपनी सीट से खड़ा नहीं हुआ तो अध्यापक महोदय ने यह कहकर उसे अपमानित किया की सवा छ रुपए फीस देने वाले सीट से खड़े हो सकते हैं तो तुम एक आने फीस देने वाली इतना भी नहीं कर सकते। कोई भी यह समझ सकता है कि एक पढ़े लिखे सवर्ण शिक्षक द्वारा किसी दलित छात्र का इस तरह से अपमान करना उसके मन में कितनी पीड़ा देता होगा।

यहां तक की देश की संसद और राज्यों की विधानसभा में जब कोई सांसद या विधायक जो सुरक्षित क्षेत्र से जीत कर आता है और सदन में बोलने के लिए खड़ा होता है तो उसके नाम के आगे उसे क्षेत्र का नाम और सुरक्षित लिख दिया जाता है जबकि सामान्य सीट से आए हुए विधायक या सांसदों के सामने इस प्रकार का जाति बोधक शब्द नहीं लिखा जाता तो क्या सांसद और विधानसभा में भी दलित और आदिवासियों का एक अलग समूह बनाए जाने की मंशा है कायदे से विविधता में अनेकता वाले भारत में यह प्रक्रिया बंद होनी चाहिए क्योंकि ऐसे सांसद जो सुरक्षित क्षेत्र से जीत कर आए हैं वह सब प्लीज दलित आदिवासियों का प्रतिदिन नहीं करते मैं अपने पूरे क्षेत्र की जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं इसलिए किसी भी सुरक्षित सीट से आए सांसद या विधायक के सामने के नाम के आगे उसका क्षेत्र सुरक्षित लिखना की प्रणाली बंद की जानी चाहिए। यह तो कुछ ऐसा ही है जब 18वीं सदी में पुणे में पेशवा के राज में दलितों को अपनी पहचान के लिए कमर में झाड़ू बांध कर चलना पड़ता था जैसे देश के सबसे सफल और सुलझे हुए राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द जी को सदैव भारत गणराज्य के राष्ट्रपति की बजाय दलित राष्ट्रपति कहा गया।

सन 1989 में एससी/एसटी एक्ट (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन जाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989) एक ऐसा कानून आया जो एससी/एसटी लोगों के खिलाफ होने वाले भेदभाव और अत्याचारों को रोकने के लिए बनाया गया ताकि उन्हें सामाजिक सुरक्षा और न्याय मिल सके और उन्हें अपमानित और प्रताड़ित ना किया जा सके। यह कानून विशेष न्यायालय के माध्यम से ऐसे मामलों की सुनवाई करता है और पीड़ितों को राहत व पुनर्वास प्रदान करता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता के उन्मूलन) के तहत एससी/एसटी समुदायों पर होने वाले अपराधों को रोकने और उनके मालिक मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए या कानून संसद द्वारा बनाया गया क्योंकि आईपीसी और अन्य कानून इस घृणित अपराधों के से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं थे।

यद्यपि यह अधिनियम दलितों और आदिवासियों को उत्पीड़न और शोषण से बचाने के लिए लाया गया था, पर क्या यह अपने उद्देश्य में सफल हुआ है या एक विचारणीय प्रश्न है। होता यह है कि जो गरीब या आदिवासी वास्तव में पीड़ित होता है और उसके साथ अमानवीय उत्पीड़न की घटना होती है वह सवर्णों के दबाव और भय से पुलिस में जाकर इसकी रिपोर्ट लिखने का साहस नहीं कर सकता, क्योंकि इस देश की पुलिस और प्रशासन दबंग और पैसे वालों की सुनती हैं इसके विपरीत इस अधिनियम का उपयोग सवर्णों की आपस की लड़ाई में अपने यहां नौकरी करने वाले दलित और आदिवासियों को एक दूसरे के विरोध में उपयोग करते देखा गया है, यहां तक की कुछ जमीदार अपने यहां कुछ दलित आदिवासियों को सिर्फ इसलिए नौकरी पर रखते हैं की वह अपने प्रतिद्वंद्वी सजातिय लोगो के विरुद्ध इन दलित और आदिवासियों का उपयोग कर सके। इसलिए जो दलित आदिवासी वास्तव में पीड़ित हैं और उन्हें इस अधिनियम की आवश्यकता है उन्हें उनकी सुरक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए पर जो लोग इस अधिनियम का दुरुपयोग करते हुए पाए जाते हैं उन पर कड़ी से कड़ी दंडात्मक कार्यवाही की जानी चाहिए जिससे यह अधिनियम जिस उद्देश्य के लिए बना था उसका निष्पक्ष रूप से पालन किया जा सके।

आज की परिस्थितियों में वंचितों और आदिवासियों को जहां एक तरफ सुरक्षा प्रदान करना व न्याय दिलाना है, साथ ही साथ उन्हें समाज की मुख्य धारा में लाना है इसलिए सरकार को चाहिए कि जो कानूनी प्रावधान उन्हें मुख्य समाज से अलग करते है या उन पर दलित आदिवासी होने का ठप्पा लगाते है उन्हें समाप्त करके वैकल्पिक उपायों पर विचार किया जाए तभी एक समरस भारत का निर्माण किया जा सकेगा।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

गृह मंत्रालय नए कानूनों पर झांकी "दण्ड से न्याय की ओर"

संवाददाता

नई दिल्ली। गृह मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत यह झांकी वर्ष 2023 में अधिनियमित एवं लागू किए गए तीन परिवर्तनकारी आपराधिक न्याय कानूनों-भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम-कोप्रदर्शित करती है, जो 1 जुलाई 2024 से लागू हुए। यह झांकी "दण्ड से न्याय की ओर" के सिद्धांत से प्रेरित होकर भारत की न्याय व्यवस्था में आए एक महत्वपूर्ण परिवर्तन को रेखांकित करती है।

झांकी का अग्र भागमें नए संसद भवन के ऊपर स्थापित तीन नई कानून पुस्तकों को दर्शाया गया है, जो भारत के संवैधानिक सिद्धांतों और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक हैं।

झांकी के मध्य भाग मेंवैज्ञानिक जांच पद्धतियों और डिजिटल साक्ष्यों के उपयोग के माध्यम से प्रक्रियात्मक परिवर्तन को प्रदर्शित किया गया है। इसमें एक फॉरेंसिक विशेषज्ञ को अपराध स्थल की जांच करते हुए तथा एक पुलिस अधिकारी को ई-साक्ष्य ऐप के माध्यम से डिजिटल रूप से साक्ष्य एकत्र करते हुए दर्शाया गया है। LED डिस्प्ले पैनल नए कानूनों में निहित प्रौद्योगिकी के बढ़ते उपयोग को दर्शाता है, जिसमें ई-साक्ष्य के माध्यम से डिजिटल साक्ष्य संग्रह, नाफिस (NAFIS) द्वारा डिजिटल फिंगरप्रिंट विश्लेषण तथा न्याय श्रुति के माध्यम से वर्चुअल सुनवाई जैसे आपराधिक न्याय प्रणाली के विभिन्न पहलू शामिल हैं। मोबाइल फॉरेंसिक वैन अपराध स्थल तक त्वरित पहुंच और फॉरेंसिक साक्ष्य संग्रह की गतिशीलता का प्रतीक है। ये सभी तत्व आधुनिक तकनीक के व्यापक उपयोग द्वारा सटीकता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने वाले नए कानूनों के सार को प्रदर्शित करते हैं।

झांकी के पीछे के भाग में एक महिला अधिकारी को एकीकृत नियंत्रण कक्ष प्रणाली संचालित करते हुए दर्शाया गया है, जो समयबद्ध न्याय, त्वरित प्रतिक्रिया, पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण तथा सीसीटीवी कैमरों जैसे डिजिटल उपकरणों के प्रभावी उपयोग को प्रदर्शित करता है। झांकी का पिछला हिस्सा विभिन्न भाषाओं में पुस्तकों से सुसज्जित है, जो नए कानूनों की सभी नागरिकों तक पहुंच और उनमें निहित सामूहिक राष्ट्रीय भावना को दर्शाता है। झांकी के भूमि तत्व प्रशिक्षित पुलिस अधिकारियों, फॉरेंसिक विशेषज्ञों, विशेष कमांडो इकाइयों में अधिक महिला अधिकारियों और बीट पेट्रोलिंग के माध्यम से जनता-केंद्रित कानूनों के प्रति सामूहिक संकल्प को प्रदर्शित करते हैं, जो समावेशिता, पेशेवर दक्षता, समर्पण और जन-केंद्रित दृष्टिकोण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।

शनिवार, 17 जनवरी 2026

अवैध कब्जा हटाने व दंगा आरोपियों को जमानत न मिलने पर ऐसा रवैया चिंताजनक

अवधेश कुमार

राजधानी दिल्ली का तुर्कमान गेट पूरे देश में चर्चा का विषय है। पाकिस्तान द्वारा इस पर दिए गए वक्तव्य को आधार बनाएं तो कह सकते हैं इसकी चर्चा सीमा पार भी चला गया है। चर्चा अगर सकारात्मक और उचित हो तो चिंता का कोई कारण नहीं। किंतु यहां तो एक ओर दिल्ली नगरपालिका परिषद द्वारा अवैध निर्माण को गिराने और उसकी सुरक्षा के लिए दिल्ली पुलिस तथा सामने विरोध और पत्थरबाजों से टकराव। अगर इसके दो दिन पहले वापस लौटें तो फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका को उच्चतम न्यायालय द्वारा खारिज किया जाना सबसे ज्यादा चर्चा और बवंडर का विषय था। इन दोनों घटनाओं को एक साथ मिलकर देखिए तो कुछ समानताएं दिखेंगीं तथा निष्कर्ष चिंताजनक आएंगे। दोनों मामलों में न्यायपालिका विद्यमान है। जमानत खारिज करने और उनके साथ पांच अन्य आरोपियों को जमानत देने का आदेश हमारे शीर्ष न्यायपालिका का है तो अवैध निर्माण खाली करने का आदेश दिल्ली उच्च न्यायालय का । इसके विरुद्ध दायर याचिकाओं को न्यायालय ने तत्काल सुनवाई के योग्य नहीं माना तथा आगे की तिथि निर्धारित कर दी। बावजूद जिस तरह से इसका विरोध हुआ, हो रहा है और जैसी प्रतिक्रियाएं आ रहीं हैं उनको कैसे देखा जाए?

ध्यान रखिए, उमर खालिद और सर्जिल इमाम की जमानत याचिका छठी बार खारिज हुई है। दो बार ट्रायल न्यायालय में ,दो बार दिल्ली उच्च न्यायालय में और दूसरी बार उच्चतम न्यायालय ने। उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि एक वर्ष तक अब आरोपी किसी भी न्यायालय में जमानत याचिका नहीं डाल सकते हैं। क्या हम मानते हैं कि उच्चतम न्यायालय बिना ठोस तथ्यों और सबूतों को देखे हुए ऐसा आदेश दे देगा ? उसने जिन पांच लोगों को जमानत दी उनके साथ भी 12 कठोर शर्तें लगाई है। उसमें स्पष्ट लिखा है अगर इन शर्तों का उल्लंघन हुआ तो निचला न्यायालय उनकी जमानत रद्द कर सकता है। इससे समझा जा सकता है कि न्यायालय के सामने किस तरह की सच्चाइयां प्रस्तुत हुईं हैं। ऐसा तो है नहीं कि इन दोनों के लिए मुकदमा लड़ने वाले वहां नहीं थे। सच यह है कि दिल्ली पुलिस की ओर से तो केवल सरकारी वकील थे , जबकि दूसरी तरफ प्रमुख नामी वकीलों की फौज थी। यही हाल दिल्ली तुर्कमान गेट इलाके के मुकदमों का भी था। फैज़ ए इलाही मस्जिद, जिसे लेकर दुष्प्रचार किया गया उसे वक्फ की संपत्ति कहा गया है। कहा जाता है कि उस मस्जिद का निर्माण औरंगजेब के ही काल में हुआ था। शाही जामा मस्जिद जहां मुगल शासक परिवार से लेकर समाज के उच्च वर्गीय मुसलमानों के लिए थी वहीं सामान्य मुसलमानों के लिए फैज ए इलाही मस्जिद बनाई गई।

हम इसमें नहीं जाना चाहते कि सच क्या है। मुख्य बात है कि मस्जिद के आसपास चारों तरफ ताकत और संख्या बल की बदौलत सरकारी जमीनों पर कब्जे कर व्यावसायिक स्थल खड़े किए गए उनको हटाया जाना आवश्यक था। आम दिल्ली में रामलीला मैदान से दरियागंज की ओर के रास्ते में मुड़ेंगे तो सामने हज मंजिल दिखाई देगा। उसी के पीछे यानी बाएं से आगे बढ़िये तो पूरा तुर्कमान गेट का इलाका है। उसी रास्ते में फैज ए इलाही मस्जिद से लेकर जमा मस्जिद के बीच अनेक मस्जिदें हैं । हर कुछ दूरी पर आपको मस्जिदें दिखेगी। कभी किसी सरकारी विभाग ने उन मस्जिदों को तोड़ने की कोशिश तक नहीं की। फैज ए इलाही मस्जिद के इर्द-गिर्द बारात घर, डायग्नोस्टिक सेंटर , पुस्तकालय,  दूकानें सब बना लिए गए। रामलीला मैदान की जमीन कब्जाई गई। खाली करने की कोशिश करने वालों की हमेशा शामत आ जाती थी। उस रास्ते पर दिन में चलना तक मुश्किल हो चुका था।  स्थानीय लोगों की मांग खाली करने की थी। दिल्ली नगर पालिका परिषद में वर्षों से अनेक पत्र और आवेदन इसके लिए आते रहे हैं। थाने में वहां आपराधिक गतिविधियों की शिकायतें आम बात हैं। अब आप सोचिए क्या अवैध जमीन पर, भले वह मस्जिद से लगी हुई हो ,बारात घर, क्लीनिक या डायग्नोस्टिक सेंटर , व्यावसायिक लाइब्रेरी, दुकानें बनाना इस्लामी कृत्य है? क्या उसे तोड़ना इस्लाम या मुसलमान के विरुद्ध माना जाएगा? जिस मस्जिद को खरोंच तक नहीं आया उसको आधार बनाकर जिन लोगों ने पुलिस से टकराव की पहले से तैयारी की उनके बारे में क्या कहा जाए? भले यह विषय यहां नहीं है किंतु क्या किसी मजहब, पंथ का स्थल अगर सरकारी जमीन पर हो तब भी क्या उसे स्पर्श नहीं किया जाएगा?

कुछ लोगों का तर्क है कि कार्रवाई रात में क्यों की गई? उस क्षेत्र में दिन में कार्रवाई करने का मतलब चारों तरफ के ट्रैफिक को रोक देना होता और इसके परिणाम भयानक हो सकते थे। सामान्य स्थिति में वहां बुलडोजर, डिम्पल, गाड़ियां जा ही नहीं सकती थी। सोचिए, अगर रात में कार्रवाई के बाद इतनी पत्थरबाजी हुई तो दिन में कैसी तस्वीर होती? उमर खालिद, सर्जिल इमाम की जमानत न मिलने को भी इस्लाम और मुस्लिम मुद्दा बनाया गया तो तुर्कमान गेट के अवैध कब्जे को मुक्त करने के अभियान को भी। आप बहुत बड़े वर्ग की देशभर की प्रतिक्रियाएं देख लीजिए। टीवी चैनलों के डिबेट, समाचार पत्रों , सोशल मीडिया में आये वक्तव्यों पर नजर डाल दीजिए तथा जिस तरह के वीडियो सामने आए हैं वो देश के वर्तमान और भविष्य को लेकर किसी को भी भयभीत करने वाले हैं। तुर्कमान गेट मामले में बाजाब्ता यूट्यूब चैनलों पर फिल्मों के दृश्य की तरह लोगों को अल जिहाद , अल जिहाद गाने के साथ संघर्ष के लिए उत्तेजित किया गया। कुछ लोगों की गिरफ्तारियां हुई हैं। इतनी भीड़ में पत्थर किन-किन ने चलाई सबकी पहचान असंभव है। उमर खालिद सर्जिल इमाम के रिहा होने पर अगर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह के कब्र खोदने के नारे लग रहे हैं, भारत की संस्कृति और सभ्यता के प्रतीक भगवा ध्वज तक की कब्र खोदने के नारों से पता चलता है कि समाज के अंदर किस तरह झूठ के आधार पर जहर और बारूद पैदा किया जा चुका है। दुर्भाग्य से राजनीतिक नेताओं में भाजपा विरोधियों ने भी अपराध को अपराध , अवैध कब्जे को अवैध कब्जा कहने की जगह इनको राजनीतिक मुद्दा बनाया है।

इसका लाभ पाकिस्तान जैसा देश उठाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि पाकिस्तान ने स्वयं अपने यहां अल्पसंख्यक हिंदुओं, सिखों, ईसाइयों का समूल नाश किया है‌। मुस्लिम समुदाय के बहुत बड़े वर्ग में यह भावना घर करा दी गई है कि नरेंद्र मोदी सरकार मुस्लिम विरोधी है,  यह भारत में मुसलमानों को नष्ट करना चाहते हैं, मस्जिदें , मदरसे , दरगाह इस्लामी रीति-  रिवाज सब उनके निशाने पर हैं। एक वर्ग में यह भाव भी पैदा किया जा रहा है कि न्यायालय तक पर मोदी सरकार का नियंत्रण है और उनके मन के अनुसार मुसलमान और विरोधियों के विरुद्ध वो फैसला दे रहे हैं। उच्चतम न्यायालय ने जमानत रद्द करते हुए या तुर्कमान गेट के अवैध कब्जे पर न्यायालय ने जैसी टिप्पणियां की है वास्तव में चिंता उनसे होनी चाहिए। न्यायालय की दृष्टि में उमर खालिद , सर्जिल इमाम जैसे लोग नागरिकता संशोधन कानून या नेशनल नागरिकता रजिस्टर के विरुद्ध लोगों को भड़काने, हिंसा की योजना बनाने, उनके लिए सामग्रियां जुटाने आदि में सम्मिलित दिखते हैं। इस तरह सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा ,गैर कानूनी कमाई करना उसके आधार पर दादागिरी और धौंसपट्टी जैसी भूमिका अपराधियों की ही मानी जाएगी। उत्तर प्रदेश के संभल जिले में ऐसा लगता है कि पूरा शहर और जिले का बहुत बड़ा भाग ही कब्जा लिया गया। मौलिक, उनसे जुड़े स्थल, तालाब, कुयें कब्जाए गए या ध्वस्त कर , जमींदोज कर उन पर र्निर्माण कर दिए गए। इनके विरुद्ध कार्रवाई और खाली कराने के आदेश या दंगे के आरोपियों की जमानत रद्द करना मुसलमान या इस्लाम की रक्षा लड़ाई कैसे हो सकती है? इस प्रश्न का उत्तर आप अवश्य तलाशिये क्योंकि यह भारत के अखंड राष्ट्र के रूप में बने रहने का प्रश्न भी है।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली-  110092 , मोबाइल - 98110 27208


गुरुवार, 15 जनवरी 2026

हिंदू धर्म में ही नहीं दलितों में भी है ऊंच-नीच का भाव

बसंत कुमार

कुछ दिन पूर्व एक दलित समाज के आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा ने एक कार्यक्रम में यह कह दिया कि जाति पर आधारित आरक्षण तब जारी रहना चाहिए जब तक मेरे बेट से शादी के लिए एक ब्राह्मण पुत्री तैयार नहीं होती उनके इस बयान की आलोचना भी हुई और होनी भी चाहिए क्योंकि शादी-विवाह दो आत्माओं का मिलन है और न कि जातीय समझौदा, बल्कि इस बयान ने एक और विवाद को जन्म दे दिया कि क्या सिर्फ हिंदुओं में ही ऊंच नीच का भेद भाव है या दलित समाज में भी ऊंच-नीच का भेदभाव होता है, कुछ विद्वान यह कहते हैं कि ये जातियां सिर्फ आरक्षण के लिए एक है अन्यथा इनमें आपस मे जाति पात भेद भाव बहुत अधिक है।

वर्ष 2014 में उत्तर प्रदेश की मछली शहर सुरक्षित सीट से भारतीय जनता पार्टी ने रामचरित्र निषाद को प्रत्याशी बनाया और मोदी लहर में जीत कर वे सांसद बन गए पर ऊंची महत्वकांक्षा के अनुरूप मोदी सरकार में मंत्री नहीं बन पाए। उन्हें कई बार यह कहते सुना गया कि मंत्री पद के लिए मैं ओबीसी से दलित (अछूत) बना पर कोई फायदा नहीं हुआ! रामचरित्र निषाद की ओबीसी से दलित बनने की टिश यह दर्शाती है कि हिंदू धर्म के चतुर्वर्ण में आने वाली शूद्र जातियों में भी ऊंच नीच का भाव छिपा हुआ है। दरअसल निषाद, मल्लाह केवट आदि जातियां दिल्ली में तो अनुसूचित जाति वर्ग में वर्गीकृत हैं पर अन्य राज्यों में इन्हें ओबीसी में माना जाता है और इसी कानूनी स्थिति का फायदा उठाते हुए रामचरित्र निषाद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट से सांसद बनने में सफल हो गए पर प्रश्न यह उठता है कि जब आप दलितों के लिए आरक्षित सीट से सांसद बनने में सफल हो गए पर दलितो के लिए सवर्णों जैसा पूर्वाग्रह क्यों? मजे की बात यह है कि निषाद मल्लाह व अन्य जातियां वर्षों से अनुसूचित जातियों में शामिल होने की मांग कर रही है पर वे स्वयं चमार व वाल्मीकिआदि जातियों को छूने से परहेज करते हैं फिर इसके लिए सवर्ण समाज को ही दोस्त क्यों दिया जाए।

उत्तर प्रदेश और बिहार में एक जाति मुसहर है जो जाति पदानुक्रम में सबसे नीचे आते हैं और उनका काम लोगों की शादियों में दोना और पत्तल बनाकर देना होता है और उनकी महिलाएं जब दोना पत्तल लेकर किसी सवर्ण के यहां जाती हैं तो एक कोने में बैठकर इस बात का इंतजार करती रहती हैं की बारात में आए मेहमानों का खाना समाप्त हो और उनके पत्तलों में बचे खुचे भोजन को इकट्ठा कर के अपने घर ले जाए पर यही मुसहर जब किसी चमार या वाल्मीकि के यहां पत्तल लेकर जाता है तो वह पका हुआ भजन खाने के बजाय सिद्धा मांगता है, सिद्धा का मतलब है कि कच्चा आटा दाल और आलू जिसे वह अपने घर पर बनाकर खा सके, कहने का तात्पर्य है कि मुसहर कितनी भी बुरी हालत में हो वह चमार के यहां खाना नहीं खाएगा। बड़े आश्चर्य की बात है सवर्णों के साथ रोटी बेटी का संबंध की बात करने वाले दलित समाज के लोग आपस में रोटी बेटी के रिश्ते की बात तो छोड़िए उनके साथ बैठकर खाना भी नहीं खाते।

देश को स्कैवेंजर फ्री बनाने वाले टॉयलेट मां के नाम से मशहूर पद्म भूषण दो बिंदेश्वर पाठक ने दलितों के बीच आपसी जातिवादी मतभेद का बड़ा मजेदार किस्सा सुनाया। बिंदेश्वर पाठक के पिताजी का स्वर्गवास हो गया और उनकी 13वीं में गांव के सभी वर्ग के लोगों को आमंत्रित किया गया। समस्या तब आई जब उनके गांव के दुसाध (पासवान) व चमार जाति के लोग एक साथ पंगत में बैठकर खाना खाने को तैयार नहीं हुए, तब डॉक्टर पाठक ने उनके लिए अलग-अलग पंगत में बैठा कर खाना खिलाया। भारत को आजाद हुए लगभग 8 दशक होने वाले हैं परंतु दलित समाज की दो डोमिनेंट जातियां चमार और बाल्मीकि में कभी भी एकता नहीं हुई, जातियों के आम नागरिक ही नहीं इन जातियों के बड़े-बड़े नेता भी एक-दूसरे का समर्थन नहीं करते, यही कारण है कि बिहार के राजनीति में दुसाधों के नेता चिराग पासवान और मुसहरों का प्रतिनिधित्व करने वाले जीतन राम मांझी कभी भी एक-दूसरे का समर्थन नहीं करते और दोनों ही पार्टियां राजनीतिक नेतृत्व करने के बजाय 15% सवर्ण नेतृत्व के आगे-पीछे घूमने को मजबूर हैं और इनकी राजनीति नीतीश कुमार और लालू प्रसाद को के रहमो-करम पर टिकी हुई है। सन 1980 के दशक में कांशीराम का नेतृत्व दलित समाज के लिए चमत्कारिक घटना थी फिर भी बहुजन समाज पार्टी सिर्फ चमार मतदाताओं को गोल बंद कर सकी। पासी समाज खटीक समाज एवं वाल्मीकि समाज बसपा के साथ नहीं जुड़े या तो ये समाजवादी पार्टी के साथ रहे या भारतीय जनता पार्टी के साथ रहे। क्योंकि इन वर्गों को किसी एक दलित जाति का मजबूत होना मंजूर नहीं है।

दलितों में आपस में जातिवाद पाया जाता है जो मुख्य रूप से आंतरिक, सामाजिक पदानुक्रम वर्चस्व की लड़ाई आर्थिक असमानता और क्षेत्रीय उप- जातिय पहचान के कारण होता है। जहां खुद दलित समूह अन्य पर हावी होने की कोशिश करते हैं जिससे आपसी भेदभाव और संघर्ष पैदा होता है जैसे उत्तर प्रदेश में पासी खटीक धोबी आज आरक्षण के लाभ के लिए बेशक अपने आप को अनुसूचित जाति या दलित कहते हैं पर यह सामाजिक रूप में चमार बाल्मीकियों के साथ कभी भी किसी प्रकार का हिस्सा नहीं रखना चाहती रोटी बेटी की बात तो दूर यहां तक कि एक दूसरे के यहां खाना भी नहीं खाते। एक रिपोर्ट के अनुसार बिहार में चमारो और मुसहरों पर सबसे अधिक अत्याचार की घटनाएं दुसाध पासवान समाज के द्वारा की जाती हैं क्योंकि दोनों ही जातियां एससी/एसटी एक्ट की परिधि में आती है इसलिए एससी एसटी एक्ट में मुकदमा दर्ज नहीं होता। लेकिन दलितों में जातिगत भेदभाव के कुछ कारण है जो निम्नलिखित हैं-

इन दलित जातियों के व्यवसाय अलग-अलग थे जैसे सूअर पालना, मैला ढोना, मरे पशुओं को ढोना या जच्चा बच्चा करना, इस कारणसे इनको अलग-अलग जातियों में रखा गया पर जब पूना पैक्ट के पश्चात यह सभी जातियां आरक्षण के लिए अनुसूचित जाति में सम्मिलित हो गई, पर उनके जातियां अहंकार अलग-अलग रहे इस कारण ये जातियां अनुसूचित जाति के रूप में बेशक एक हो पर जाति के रूप में बिल्कुल अलग-अलग है।

इस समय उच्च दलित वर्ग व निम्न दलित वर्ग के बीच में भेदभाव का जो सिलसिला चल निकला है वह इस समाज के लिए बहुत घातक होगा पहले दलित उच्च वर्ण यानि स्वर्ण समाज के शोषण से परेशान था पर अब दलितों के निम्न वर्ग का शोषण दलितों के उच्च वर्ग के लोग कर रहे हैं, यह निम्न श्रेणी के दलितों के लिए दोहरी समस्या बन गई है क्योंकि उनको दलितों के उच्च वर्ग के साथ-साथ सवर्ण उच्च वर्गों का शोषण झेलना पड़ रहा है दलितों के बीच आपस में भेदभाव का मुख्य कारण उनके आंतरिक जातिगत संरचना, अशिक्षा और गरीबी तथाप्रतिस्पर्धा है, जहां ऐतिहासिक भेदभाव और सामाजिक पदानुक्रम के कारण उप समूहों के बीच संसाधनों और सम्मान के लिए संघर्ष होता है जिससे सामूहिक पहचान के बजाय छोटे-छोटे समूह बनते हैं और वह एक दूसरे को अपने से हीन मानते हैं दलित जातियों में आपस में ऊंच-नीच और छुआछूत का भाव मुख्य रूप से ऐतिहासिक भेदभाव सामाजिक आर्थिक असमानता और वर्चस्व की मानसिकता के कारण होता है जब दलितों की उपजातियां द्वारा खुद को उच्च और दूसरे को निम्न मानने की प्रवृत्ति बनी रहती है तो बाहर की उच्च जातियों से मिली हीन भावना और भेदभाव स्वाभाविक है इसकेकारण सामाजिक भेद भाव और मानसिक दबाव बढ़ता है।

अतः यदि हिंदू समाज को जाति-पात व ऊंच-नीच के भाव से दूर रखना है तो हमे दो क्षेत्रों में एक साथ काम करना होगा एक ओर सवर्ण समाज को हिंदू दलित समाज के लोगो को ऊंच नीच का भाव त्याग कर अपनाना होगा वहीं दलित समाज को जातीय पदानुक्रम में अपने से नीचे के लोगो को अपनाना होगा।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

देवेंद्र तिवारी

वर्ष 2026 की शुरुआत वैश्विक और भारतीय अर्थव्यवस्था दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखी जा रही है। यह समय न तो पूरी तरह संकट का है और न ही पूरी तरह उत्साह का। बल्कि यह एक ऐसा दौर है जहाँ समझदारी, धैर्य और सही निर्णय लेने की क्षमता सबसे अधिक मायने रखती है।

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने महामारी, युद्ध, महँगाई और ब्याज दरों में तेज़ उतार-चढ़ाव जैसे कई झटके झेले हैं। इन सबके बीच अब वैश्विक अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे संतुलन की ओर बढ़ रही है, लेकिन अनिश्चितता अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

🌍 वैश्विक आर्थिक स्थिति: सतर्कता का समय - आज वैश्विक अर्थव्यवस्था धीमी लेकिन नियंत्रित गति से आगे बढ़ रही है। अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित देशों में आर्थिक वृद्धि सीमित बनी हुई है। वहाँ की केंद्रीय बैंकिंग नीतियाँ अभी भी महँगाई को लेकर सतर्क हैं।

ऊर्जा और खाद्य पदार्थों की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण महँगाई पूरी तरह नियंत्रण में नहीं आ पाई है। इसके अलावा, भू-राजनीतिक तनाव और व्यापारिक प्रतिबंधों ने वैश्विक व्यापार को प्रभावित किया है।

इसका सीधा असर यह हुआ है कि अंतरराष्ट्रीय निवेशक अब आक्रामक जोखिम लेने के बजाय पूँजी की सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहे हैं। यानी आज का वैश्विक माहौल “जोखिम से बचाव” का है, न कि “जोखिम उठाने” का।

🇮🇳 भारतीय अर्थव्यवस्था: स्थिरता और आत्मविश्वास की मिसाल - जहाँ कई देश आर्थिक दबाव में हैं, वहीं भारत एक मजबूत और संतुलित अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहा है। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका घरेलू बाज़ार और युवा जनसंख्या है।

वित्त वर्ष 2025–26 में भारत की GDP वृद्धि दर 7% से अधिक रहने का अनुमान है। घरेलू खपत, इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश और सर्विस सेक्टर इस वृद्धि के प्रमुख आधार हैं। 

“मेक इन इंडिया”, “डिजिटल इंडिया” और PLI जैसी सरकारी योजनाओं ने न केवल निवेश का माहौल सुधारा है, बल्कि भारत को दीर्घकालिक विकास की दिशा में भी अग्रसर किया है।

💰 महँगाई और मौद्रिक नीति: संतुलन का उदाहरण - भारतीय रिज़र्व बैंक ने बीते वर्षों में एक संतुलित और जिम्मेदार नीति अपनाई है। महँगाई को नियंत्रित रखने के साथ-साथ आर्थिक विकास को भी गति दी गई है। 

ब्याज दरों में स्थिरता से व्यवसायों को योजना बनाने में मदद मिली है और आम उपभोक्ताओं को भी राहत मिली है। यह स्थिरता निवेशकों के लिए भी एक सकारात्मक संकेत है।

📊 शेयर बाज़ार और निवेश का परिदृश्य

📈 इक्विटी मार्केट - भारतीय शेयर बाज़ार में समय-समय पर उतार-चढ़ाव बना हुआ है, लेकिन इसका दीर्घकालिक दृष्टिकोण मजबूत है।

बैंकिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, IT, डिफेंस, रिन्यूएबल एनर्जी और कैपिटल गुड्स जैसे सेक्टर निवेशकों को आकर्षित कर रहे हैं। IPO मार्केट में आई सक्रियता यह दर्शाती है कि कॉरपोरेट सेक्टर को भारत की आर्थिक दिशा पर भरोसा है। समझदार निवेशकों के लिए गिरावट डर का कारण नहीं, बल्कि अवसर होती है।

🪙 सुरक्षित निवेश विकल्प - अनिश्चित वैश्विक माहौल में सोना और चाँदी जैसे पारंपरिक निवेश फिर से महत्वपूर्ण बन गए हैं। डेट फंड, बॉन्ड और फिक्स्ड इनकम प्रोडक्ट्स उन निवेशकों के लिए उपयोगी हैं जो स्थिरता और मानसिक शांति को प्राथमिकता देते हैं।

⚠️ आने वाली चुनौतियाँ - वैश्विक मंदी का असर भारत के निर्यात पर पड़ सकता है। कच्चे तेल की कीमतें भारत के लिए बड़ा जोखिम बनी हुई हैं। भू-राजनीतिक तनाव से बाज़ारों में अचानक अस्थिरता आ सकती है। इन चुनौतियों से डरने के बजाय इनके लिए तैयार रहना ज़रूरी है।

💡 निवेशकों के लिए सही रणनीति - आज के समय में निवेश का मतलब केवल रिटर्न कमाना नहीं, बल्कि जोखिम को समझदारी से संभालना है। डायवर्सिफिकेशन अनिवार्य है। लॉन्ग-टर्म सोच अपनाएँ। SIP और अनुशासित निवेश को प्राथमिकता दें। अफवाहों के बजाय फंडामेंटल्स पर भरोसा करें। बीमा और वित्तीय सुरक्षा को नज़रअंदाज़ न करें। 

🧭 निष्कर्ष - वर्तमान वित्तीय परिदृश्य हमें यह सिखाता है कि अवसर और जोखिम हमेशा साथ चलते हैं। भारत आज एक ऐसी स्थिति में है जहाँ सही निर्णय और धैर्य से वित्तीय रूप से सशक्त भविष्य बनाया जा सकता है। समझदारी से लिया गया आज का निर्णय आने वाले वर्षों की नींव बनता है।

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