गुरुवार, 22 जनवरी 2026

गले की फांस बन रहे हैं दलितों आदिवासियों की सुरक्षा हेतु बनाए गए कानून

बसंत कुमार

भारत सरकार ने देश के दलित और आदिवासियों की सुरक्षा के लिए एससी/एसटी एक्ट के अलावा कुछ कानून बनाए थे जिसमें दलित आदिवासियों की शोषण के विरुद्ध उनकी सुरक्षा की जा सके परंतु देखने में यह आया है कि यह कानून जो उनकी सुरक्षा के लिए बने थे वह उनके गले की फांस बनते जा रहे हैं मसलन 1970 के दशक के दौरान एक कानून बनाया गया था कि कोई भी सवर्ण किसी दलित आदिवासी की जमीन ना लिखवा सके और इसके लिए यह प्रावधान किया गया कि यदि कोई किसी दलित या आदिवासी की जमीन जायदाद लिखवाता है तो उसके लिए जिलाधिकारी की अनुमति होनी चाहिए परंतु आज आर्थिक सुधार के युग में लोग खेती से भाग रहे हैं और उद्यमिता के क्षेत्र में काम करना चाहते हैं परंतु कोई भी दलित/आदिवासी जिलाधिकारी की परमिशन न मिलने के कारण अपनी पुश्तैनी जमीन को बेचकर कोई उद्योग धंधा नहीं शुरू कर सकता क्योंकि यह प्रक्रिया इतनी जटिल है कि कोई भी सवर्ण उसकी जमीन नहीं खरीदना चाहता और खरीदया भी है तो उसे बाजार के हिसाब से वाजिब भी नहीं मिलते इसलिए अब समय आ गया है कि दलितों के लिए की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून पर पुनः विचार किया जाए।

मेरे एक जानने वाले लखनऊ में रहते थे किसी नामी गिरामी कंपनी में काम कर रहे थे सब कुछ ठीक चल रहा था उन्होंने एलडीए से एक फ्लैट भी खरीद लिया था परंतु दुर्भाग्य से उनका एक्सीडेंट हो गया और वो काम करने लायक नहीं रह गए और नतीजा यह हुआ जिस कंपनी में काम करते थे उन्हें निकाल दिया गया और वह बेरोजगार हो गए क्योंकि एक्सीडेंट में उनका एक पैर टूट गया था तो अपने इलाज के लिए वह अपने फ्लैट को बेचना चाहते थे पर क्योंकि वह अनुसूचित जाति के थे इसलिए उनको जमीन या फ्लैट को बेचने के लिए उन्हें जिलाधिकारी की परमिशन मिलनी जरूरी थी और इसी जटिल प्रक्रिया से बचने के लिए उन्हें कोई खरीदार नहीं मिल रहा था और जो लोग खरीदने को तैयार भी थे उसका वाजिब दाम नहीं दे रहे थे परिणाम यह हुआ की वे परमिशन केलिए कोर्ट के चक्कर लगाते लगाते स्वर्ग को प्यार हो गए, कहने का मतलब यह है की जो उनकी मेहनत की कमाई से बनाई गई थी। वह भी उनके मुसीबत में काम नहीं प्रॉपर्टी अगर सक्षम प्राधिकारी के परमिशन की अड़चन नहीं आती तो उन्हें अपनी जमीन का पूरा लाभ मिल जाता और वह अपना इलाज करा सकते थे पर ऐसा नहीं हुआ क्योंकि जो कानून उनकी सुरक्षा के लिए बनाया गया था वही कानून उनके गले की पास बन गया।

1970 के दशक में मैं अपने जनपद जौनपुर के प्रसिद्ध कॉलेज टीडी कॉलेज का छात्र था वहां पर अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों की फीस एक आने हुआ करती थी और सामान्य श्रेणी के बच्चों की फीस सवा छह रुपए हुआ करती थी लेकिन जो दलित या आदिवासी छात्र क्लास टीचर को एक आने थी देने आया करते थे उसे क्लास टीचर के द्वारा व्यंग वाणी सुनने को मिलते थे। कई बार क्लास टीचर कहते थे कि भाई पूरे क्लास की इकट्ठी दे दिया करो यह कभी कहते कि साल भर की इकट्ठी दे दिया करो। अब उस समय के 13-14 वर्ष के दलित छात्रों के मन में क्या गुजरती थी वह स्वर्ण अध्यापक नहीं समझ सकते थे। मुझे इस बात की हैरानी होती थी कि जब इन छात्रों के लिए स्कॉलरशिप और गरीब सवर्ण छात्रों के लिए विद्यालय मैनेजमेंट की ओर से पुअर फंड जैसी स्कीमें लागू थी, तो यह एक आने फीस का फंडा क्यों रखा गया था इससे दलित व आदिवासी वर्ग के छात्रों में इंफेरियारिटी कंपलेक्स के साथ-साथ उन्हें अपमानित भी होना पड़ता था। मुझे कक्षा 11 का एक किस्सा याद है हम लोग विज्ञान के छात्र थे और विज्ञान केमिस्ट्री के शिक्षक क्लास में आए और सभी बच्चे उनके सम्मान में खड़े हो गए पर एक दलित छात्रा जिसका ध्यान कहीं और था वह अपनी सीट से खड़ा नहीं हुआ तो अध्यापक महोदय ने यह कहकर उसे अपमानित किया की सवा छ रुपए फीस देने वाले सीट से खड़े हो सकते हैं तो तुम एक आने फीस देने वाली इतना भी नहीं कर सकते। कोई भी यह समझ सकता है कि एक पढ़े लिखे सवर्ण शिक्षक द्वारा किसी दलित छात्र का इस तरह से अपमान करना उसके मन में कितनी पीड़ा देता होगा।

यहां तक की देश की संसद और राज्यों की विधानसभा में जब कोई सांसद या विधायक जो सुरक्षित क्षेत्र से जीत कर आता है और सदन में बोलने के लिए खड़ा होता है तो उसके नाम के आगे उसे क्षेत्र का नाम और सुरक्षित लिख दिया जाता है जबकि सामान्य सीट से आए हुए विधायक या सांसदों के सामने इस प्रकार का जाति बोधक शब्द नहीं लिखा जाता तो क्या सांसद और विधानसभा में भी दलित और आदिवासियों का एक अलग समूह बनाए जाने की मंशा है कायदे से विविधता में अनेकता वाले भारत में यह प्रक्रिया बंद होनी चाहिए क्योंकि ऐसे सांसद जो सुरक्षित क्षेत्र से जीत कर आए हैं वह सब प्लीज दलित आदिवासियों का प्रतिदिन नहीं करते मैं अपने पूरे क्षेत्र की जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं इसलिए किसी भी सुरक्षित सीट से आए सांसद या विधायक के सामने के नाम के आगे उसका क्षेत्र सुरक्षित लिखना की प्रणाली बंद की जानी चाहिए। यह तो कुछ ऐसा ही है जब 18वीं सदी में पुणे में पेशवा के राज में दलितों को अपनी पहचान के लिए कमर में झाड़ू बांध कर चलना पड़ता था जैसे देश के सबसे सफल और सुलझे हुए राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द जी को सदैव भारत गणराज्य के राष्ट्रपति की बजाय दलित राष्ट्रपति कहा गया।

सन 1989 में एससी/एसटी एक्ट (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन जाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989) एक ऐसा कानून आया जो एससी/एसटी लोगों के खिलाफ होने वाले भेदभाव और अत्याचारों को रोकने के लिए बनाया गया ताकि उन्हें सामाजिक सुरक्षा और न्याय मिल सके और उन्हें अपमानित और प्रताड़ित ना किया जा सके। यह कानून विशेष न्यायालय के माध्यम से ऐसे मामलों की सुनवाई करता है और पीड़ितों को राहत व पुनर्वास प्रदान करता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता के उन्मूलन) के तहत एससी/एसटी समुदायों पर होने वाले अपराधों को रोकने और उनके मालिक मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए या कानून संसद द्वारा बनाया गया क्योंकि आईपीसी और अन्य कानून इस घृणित अपराधों के से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं थे।

यद्यपि यह अधिनियम दलितों और आदिवासियों को उत्पीड़न और शोषण से बचाने के लिए लाया गया था, पर क्या यह अपने उद्देश्य में सफल हुआ है या एक विचारणीय प्रश्न है। होता यह है कि जो गरीब या आदिवासी वास्तव में पीड़ित होता है और उसके साथ अमानवीय उत्पीड़न की घटना होती है वह सवर्णों के दबाव और भय से पुलिस में जाकर इसकी रिपोर्ट लिखने का साहस नहीं कर सकता, क्योंकि इस देश की पुलिस और प्रशासन दबंग और पैसे वालों की सुनती हैं इसके विपरीत इस अधिनियम का उपयोग सवर्णों की आपस की लड़ाई में अपने यहां नौकरी करने वाले दलित और आदिवासियों को एक दूसरे के विरोध में उपयोग करते देखा गया है, यहां तक की कुछ जमीदार अपने यहां कुछ दलित आदिवासियों को सिर्फ इसलिए नौकरी पर रखते हैं की वह अपने प्रतिद्वंद्वी सजातिय लोगो के विरुद्ध इन दलित और आदिवासियों का उपयोग कर सके। इसलिए जो दलित आदिवासी वास्तव में पीड़ित हैं और उन्हें इस अधिनियम की आवश्यकता है उन्हें उनकी सुरक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए पर जो लोग इस अधिनियम का दुरुपयोग करते हुए पाए जाते हैं उन पर कड़ी से कड़ी दंडात्मक कार्यवाही की जानी चाहिए जिससे यह अधिनियम जिस उद्देश्य के लिए बना था उसका निष्पक्ष रूप से पालन किया जा सके।

आज की परिस्थितियों में वंचितों और आदिवासियों को जहां एक तरफ सुरक्षा प्रदान करना व न्याय दिलाना है, साथ ही साथ उन्हें समाज की मुख्य धारा में लाना है इसलिए सरकार को चाहिए कि जो कानूनी प्रावधान उन्हें मुख्य समाज से अलग करते है या उन पर दलित आदिवासी होने का ठप्पा लगाते है उन्हें समाप्त करके वैकल्पिक उपायों पर विचार किया जाए तभी एक समरस भारत का निर्माण किया जा सकेगा।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

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