शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

अल्पसंख्यक दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में कार्यक्रम का आयोजन


संवाददाता

नई दिल्ली। अल्पसंख्यक दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के सभागार में कार्यक्रम आयोजित हुआ जिसमें अल्पसंख्यक समुदाय के शिक्षित, सामाजिक लोग उपस्थित हुए। इस अवसर पर आयोग के सौजन्य से छः अल्पसंख्यक समुदाय के गणमान्य व्यक्ति डा. माईकल वी विलियम्स, डा. मो. तौहीद आलम, प्रोफेसर हरबंस सिंह, आचार्य येषी फुंत्सोक, इंदू जैन और मरज़बान नरीमन ज़रीवाला इन सभी व्यक्तियों को अपने समुदाय का नेतृत्व करने के लिए वक्ता के तौर पर कार्यक्रम मे आमंत्रित किया गया। 

आयोग की सचिव अल्का उपाध्याय ने सभी वक्ताओं को फूलों का गुल्दस्ता, शाॅल और मोमेन्टो देकर स्वागत किया। इन सभी वक्ताओं ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अपने अपने समुदाय के बुनियादी समस्याओं से आयोग को अवगत कराते हुए सचिव से मांग की आयोग में चेयरमेंन ओर सदस्यों को शीघ्र ही मनोनीत कराने के लिए अल्पसंख्यक कार्यमंत्री के संज्ञान में लाया जाए ताकि समस्याओं का समाधान हो इसके अलावा उपस्थित लोंगों ने अपने अपने विचार व्यक्त किये जमात ए इस्लामी हिन्द के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डा. सलीम इंजीनियर ने कहा देश में इस समय अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहे हैं असमाजिक तत्वों पर आयोग के सौजन्य से कानून द्वारा कड़ी कानूनी कार्यवाही कराई जाए। विशेष समुदाय लव जिहाद, लेंड जिहाद, सिविल सर्विस जिहाद इस प्रकार की समस्याओं का शिकार मुस्लिम समुदाय को बनाया जा रहा है जिस पर आयोग संज्ञान ले और सरकार तक यह समस्या पहुंचाए। आर.आई. खान ने कहा देश मे एस.आई.आर का कार्य चल रहा है जिससे अल्पसंख्यक समुदाय भय में है इसके लिए आयोग की ओर से दस्तावेज़ी एडवायज़री जारी की जाए जिससे अल्पसंख्यक समुदाय एस. आई.आर. के लिए जागरूक हो। ईसाई, जैन, सिख इन सभी समुदाय के लोगों ने भी अपने विचार व्यक्त किये। 

डा. आमिर सलमान, एडवोकेट सद्दाम मुजीब ने कहा आयोग के द्वारा फेक्ट फाईंडिंग कमेटी का गठन किया जाए। कोई भी घटना होने पर आयोग को जमीनी स्तर की रिपोर्ट दी जाए। अंत में आयोग की सचिव अल्का उपाध्याय ने संबोधित करते हुए सभी लोगों को अल्पसंख्यक दिवस की शुभकामनाएं देते हुए कहा आयोग में अल्पसंख्यकों की आवाज़ उठाई जाती है और उनको न्याय दिलाने के लिए आयोग निरंतर कार्य कर रहा हैं श्क्षिा, स्किल, वित्तीय सहायता, सशक्तिकरण के लिए आयोग अपनी सेवाएं दे रहा है। कार्यक्रम में आने वाले सभी लोगों का सचिव ने धन्यवाद किया। इस अवसर पर उपस्थित लोग जो इस प्रकार हैंः डा. एस.एम.कामरान, एडवोकेट सनोबर अली कुरेशी, तारिक प्रवेज़, मुजाहिद खान, शाहिद रंगरेज़, हशकील हैदर, अनीस फातिमा, फराहदीबा हरविंदर सिंह, बलविंदर सिंह, संगीता जैन आदि।

बुधवार, 17 दिसंबर 2025

ऑन लाइन क्लासेज बच्चों के स्वास्थ से खिलवाड़

बसंत कुमार

दिल्ली में खतरनाक प्रदूषण के कारण राजधानी के सभी स्कूलों के कक्षा 5 तक के बच्चों के स्कूल बंद कर के ऑन लाइन क्लासेज लेने के लिए सरकार ने फैसला लिया है और बोर्ड क्लासेज के लिए स्कूल खुले हैं। इस मिली जूली स्थिति से बच्चो के अभिव्यक्ति परेशान है, वे चाहते है कि प्रदूषण रोकने के लिए सरकार कोई वैकल्पिक व्यवस्था करे और बच्चे स्कूल जाए क्योंकि ऑन लाइन क्लासेज से बच्चों का स्क्रीन टाइम बढ़ता है और इससे बच्चों के स्वास्थ पर बुरा प्रभाव पड़ता है, वैसे भी मोबाइल या कंप्यूटर की लत ने बच्चों के स्वास्थ को लेकर एक बड़ा चैलेंज खड़ा हो गया है, मोबाइल के लत के कारण बच्चे अनेक बीमारियों का शिकार हो रहे है। बच्चों द्वारा अत्यधिक मोबाइल के इस्तेमाल को लेकर एक रिपोर्ट आई है जो अत्यंत चिंता जनक है। इस सर्वे के अनुसार 81% माता पिता यह मानते है कि डिनर के समय जो बच्चे फोन बंद कर देते है वो पेरेंट्स के साथ ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं। विवो इंडिया की स्विच ऑफ स्टडी में यह बात निकल कर सामने आई है। सर्वे में पाया गया है कि 72% माता पिता और 30% बच्चे खाना खाते समय फोन देखना बातचीत में सबसे बड़ी रुकावट है, जहां बच्चे अपने मनोरंजन के लिए फोन से चिपके रहते हैं वहीं माता पिट्स बार बार स्टेटस या मैसेज चेक करने के लिया मोबाइल से चिपके रहते हैं और इससे उनके आपस मे बातचीत का सिल सिला टूटता है।

ऑन लाइन क्लासेज के साथ साथ, छोटी वीडियो, इंस्ट्राग्राम रील, यू ट्यूब शर्ट्स बच्चों के जीवन में इतनी गहराई से शामिल हो चुके है कि वे अब पढ़ाई या समय बिताने का साधन नहीं बल्कि बच्चों की सोच, आदतों और व्यवहार को बदल रहे है। जब बच्चे किताब पढ़ने, होम वर्क करने या किसी और काम पर ध्यान लगाने की कोशिश करते हैं तो उनका मन जल्द ही भटकने लगता हैं। लगातार स्क्रीन देखने से बच्चों में सिर्फ शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक सेहत पर भी असर पड़ता है हाल के अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि जो बच्चे या किशोर लंबे समय तक स्क्रीन पर आंख लगाए रहते हैं तो उनमें एंजायटी बेचैनी अकेलापन जैसी समस्याएं आती हैं। नींद खराब होने नींद खराब होने से यह परेशानी और बढ़ जाती है और जब बच्चा ठीक से सो नहीं पता तो उसकी मन भारी रहता है और वह वर्चुअल ऑटिज्म का शिकार हो रहे हैं।

एक रिपोर्ट के अनुसार ऑटिज्म की बीमारी के मरीजों की संख्या दिन व दिन बढ़ती जा रही है पूरी दुनिया में इसको लेकर कई शोध किए गए हैं जिससे यह साफ हो गया है कि चार पांच साल के बच्चों में वर्चुअल ऑटिज्म का खतरा काफी बढ़ गया है। मोबाइल टीवी और कंप्यूटर जैसे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स का अत्यधिक प्रयोग से बोलने की बोलने को की बीमारी हो रही है ,आप उन्हें बुलाते रहते हैं पर वे आपकी बात का जवाब ही नहीं देते आजकल की मॉडर्न लाइफ का सबसे ज्यादा खामियाजा बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। 1 साल के बच्चे भी फोन, टैब और टीवी के बिना खाना नहीं खाते हैं और उन्हें खाना खिलाने के लिए बच्चों में मोबाइल का इस्तेमाल बहुत अधिक हो रहा है रिसर्च के अनुसार ज्यादा स्क्रीन टाइम से बच्चों के न्यूरोलॉजिकल डेवलपमेंट और सोशल डेवलपमेंट पर काफी विपरीत असर पड़ता है इससे बच्चों में न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर का भी खतरा रहता है रिसर्च में यह भी पाया गया है कि जो लोग फोन और टैब ज्यादा देखते हैं उनकी फिजिकल एक्टिविटी कम होती है उनमें गंभीर ईको कार्डियो ग्राफी बीमारी हो जाती है और भी शारीरिक रूप से कम एक्टिव हो जाते हैं।

जो बच्चे शारीरिक रूप से कम एक्टिव होते हैं उनमें कम उम्र में ही मोटापा और टाइप टू डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है ,साथ ही साथ आजकल के बच्चे और युवा फोन के कारण समाज से करते जा रहे हैं ,ऐसे में स्कूल द्वारा ऑनलाइन क्लासेस शुरू करने उनकी परेशानी और बढ़ सकती है क्योंकि बच्चे ही नहीं आज के युवा भी इस बीमारी से जूझ रहे हैं। आजकल युवाओं में वर्क फ्रॉम होम का फैशन बढ़ गया है जिसका परिणाम यह है कि यह कार्यालय जाने के बजाय घर से ही सारा काम कंप्यूटर पर बैठे कर रहे हैं और ऑनलाइन से अपनी जिम्मेदारियां निपटाना चाहते हैं इसी कारण से युवाओं में हाइपरटेंशन दिल की बीमारी और अन्य बीमारियां हो रही हैं पहले लोगो को घर से ऑफिस जाने और आफिस से घर आने में यात्रा करनी पड़ती थी जिससे उनकी शारीरिक एक्टिविटी हो जाती थी पर नई कलर ने सब कुछ समाप्त कर दिया है इसलिए हमें अपने पुराने पैटर्न पर वापस जाना होगा।

सरकारी कार्यालयों में एफिशियंसी लाने के लिए मोबाइल और वाट्सअप मैसेज पर अत्यधिक निर्भरता हो गई है,लोगों को व्हाट्सएप पर तुरंत मैसेज दे दिए जाते हैं कि कब कहां जाना है, इसके बिना किसी पूर्व योजना केये सब किया जाना उनमें डर का माहौल विकसित करता है,विशेष करके सरकारी विद्यालय के शिक्षकों को सुबह-सुबह मैसेज आ जाता है कि आज स्कूल जाना है या फिर या अन्य ड्यूटी पर जाना है इसके कारण अधिकांश टीचर पढ़ने के बजाय अन्य चीजों पर और डाटा इनफॉरमेशन भरने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं और वह स्वयं भी ब्लड प्रेशर हाइपरटेंशन का शिकार हो रहे हैं क्योंकि वह अत्यधिक व्यस्तता के कारण स्कूल के बच्चों पर पूरा ध्यान नहीं दे पा रहे हैं और बच्चे भी मानसिक दबाव झेल रहे हैं इसलिए व्हाट्सएप पर मैसेज भेज रहे भेजनेतया वीडियो कॉल द्वारा उनकी लोकेशन जानने जैसी चीजों को समाप्त किया जाना चाहिए,जब हमारे कर्मचारी या हमारे बच्चे मानसिक रूप से स्वस्थ ही नहीं रहेंगे तो फिर इस तकनीक से एफिशिएंसी लाने का प्रयास सफल नहीं होगा बल्कि इसका उल्टा प्रभाव पड़ेगा।

अत्यधिक मोबाइल के इस्तेमाल से आपस के रिश्तों में दूरी आ रही है कभी-कभी यह देखा जाता है कि घर के चार-पांच मेंबर एक जगह बैठे हुए हैं पर कोई किसी से बात नहीं कर रहा है और सब लोग अपने मोबाइल में व्यस्त हैं और मोबाइल की इस लत के कारण आज पति-पत्नी के रिश्तों में भी दूरियां बढ़ रही है और भारत में भी अमेरिका व अन्य देशों में न्यायालय में तलाक के मुकदमे अधिक मात्रा में आ रहे हैं पहले जब कोई विवाद होता था तो पति-पत्नी आपस में बैठकर या अपने बुजुर्गों के साथ बैठकर विवाद को सुलझा लेते थे लेकिन आज तो वे मोबाइल में इतना व्यस्त है की पति पत्नी आपस में कभी बात ही नहीं करते शायद उनके लिए पति-पत्नी के बीच सुंदर पल बिताने से अधिक मोबाइल पर मैसेज, फेस बुक पर शॉर्ट वीडियो देखना ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है इसलिए मोबाइल पर अत्यधिक निर्भरता के कारण हमारा सामाजिक ताना-बाना समाप्त होता जा रहा है क्योंकि घर में कौन आए कौन जाए इस पर युवा पीढ़ी का ध्यान नहीं रह गया है और अब तो युवाओं के साथ-साथ बुजुर्ग भी इस लड़का शिकार होना है इसलिए मोबाइल का इस्तेमाल जब तक जरूरी ना हो तब तक अवॉइड किया जाना चाहिए। यह सच है की सूचना के आदान-प्रदान के लिए एक बहुत बढ़िया साधन हो गया है लेकिन इसने घर और मन की शांति को भंग कर दिया है।

यह सही है कि मोबाइल के आने से कई चीजें बहुत आसान हो गई है और तुरंत संपर्क का यह सुलभ साधन हो गया है पर बच्चों की ऑन लाइन क्लासेज और सरकारी कार्यालयों, विद्यालयों में हर समय उपयोग के कारण यह बच्चों और शिक्षकों के शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य को बहुत बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है और कोई भी वस्तु हमारे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डालते हो उससे दूरी बनाना जरूरी है, अब हमें इस समस्या के विषय में सोचना आवश्यक हो गया है और इसलिए ऑन लाइन और डिजिटल संसाधनों का उपयोग तभी करे जब आवश्यक हो, क्योंकि बच्चों का स्वास्थ हमारे प्राथमिकता होने चाहिए।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

सोमवार, 15 दिसंबर 2025

भारत की विकास गाथा: चमकते आंकड़ों और जमीनी हकीकत का द्वंद्व

डॉ. प्रदीप कुमार केशरी

भारत की सकल घरेलू उत्पाद या जीडीपी वृद्धि की कहानी को अक्सर एक सीधी रेखा में ऊपर जाती हुई सफलता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन, यदि हम आंकड़ों की बाजीगरी से परे जाकर देखें, तो यह कहानी जितनी उपलब्धियों की है, उतनी ही चूके हुए अवसरों, नीतिगत और रणनीतिगत भूलों की भी है। दुनिया की चौथी या पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का गौरव अपनी जगह है, लेकिन प्रति व्यक्ति आय, आर्थिक सुरक्षा और रोजगार की स्थिति उस गौरव पर प्रश्नचिह्न लगाती है। आइए, भारत की आर्थिक यात्रा का एक निर्मम और निष्पक्ष विश्लेषण करें।

1. नियंत्रण का अतिरेक और समाजवादी आर्थिक विकास दर (1950–1980) - आजादी के बाद समाजवाद का जो मॉडल चुना गया, उसकी मंशा कुछ भी हो, लेकिन तरीका आत्मघाती साबित हुआ। सरकार ने यह मान लिया कि वह सुई से लेकर हवाई जहाज तक सब कुछ बना सकती है। सार्वजनिक क्षेत्र  को 'मंदिर' कहा गया, लेकिन वे अक्षमता के स्मारक बन गए। 'लाइसेंस-परमिट राज' ने भारतीय उद्यमशीलता का गला घोंट दिया। टाटा-बिड़ला जैसे समूहों को भी उत्पादन बढ़ाने के लिए दिल्ली के बाबूओं के चक्कर काटने पड़ते थे। नतीजा यह हुआ कि तीन दशकों तक हम 3.5% की औसत जीडीपी वृद्धि के समाजवादी आर्थिक विकास की दर  में कैद होकर रह गए। दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देश, जो तब हमारे साथ थे, इसी दौर में हमसे आगे निकल गए।

2. कर्ज की बैसाखियों पर दौड़ (1980–1991) - 1980 का दशक 'नकली विकास' का दशक था। सरकारों ने उदारीकरण का नाटक तो किया, लेकिन बिना बुनियादी सुधारों के। जीडीपी 5.5% तक पहुंची, लेकिन यह उत्पादकता बढ़ने से नहीं, बल्कि सरकारी खर्च और विदेशी कर्ज बढ़ने से हुआ। यह 'बिना अपनी चादर देखे पैर फैलाने' वाला दौर था जिसमें राजकोषीय अनुशासनहीनता चरम पर थी। इस अदूरदर्शिता की कीमत 1991 के घोर भुगतान संतुलन संकट के रूप में चुकानी पड़ी, जब देश को अपना सोना विदेश में गिरवी रखना पड़ा

3. उदारीकरण: एक मजबूरी, न कि नीतिगत स्वेच्छा (1991–2002) - 1991 के सुधार किसी दूरदर्शी सोच का परिणाम नहीं, बल्कि आईएमएफ (IMF) की शर्तों और मजबूरी की उपज थे। परिणाम स्वरूप अर्थव्यवस्था के दरवाजे खुले, किन्तु विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) और कृषि क्षेत्र की उपेक्षा ने भारत को “आयात निर्भर” और "रोजगार-विहीन विकास"  के रास्ते पर धकेल दिया, जिसका दंश हम आज भी झेल रहे हैं। संयोगवश आईटी (IT) सेक्टर का उदय हुआ और पढ़े लिखे मध्यम वर्ग का सपना आंशिक रूप से साकार होने लगा। भारत ने  ‘औद्योगीकरण’ के चरण को लांघकर सीधे ‘सेवा क्षेत्र’ में छलांग लगा दी। चीन ने ‘फैक्ट्री’ लगाई और हमने सेवा क्षेत्र के ‘बैक ऑफिस’।

4. कृत्रिम उछाल और क्रोनी कैपिटलिज्म (2003–2008) - इसे भारत का 'स्वर्ण काल' कहा जाता है, जब विकास दर 9% को छू रही थी। लेकिन इसकी नींव कमजोर थी। वैश्विक तरलता (Global Liquidity) में वृद्धि के कारण पैसा बरस रहा था। इसी दौर में बैंकों ने बड़े पैमाने पर कॉरपोरेट्स को कर्ज बांटे। नियामकीय ढिलाई, उच्च स्तर के प्रशासन और बैंकों में भ्रष्टाचार ने 'क्रोनी कैपिटलिज्म' को बढ़ावा दिया। आज भी बैंकिंग सेक्टर जिस एनपीए (NPA) संकट से उबरने की कोशिश कर रहा है, उसके बीज इसी 'तेज विकास' के दौर में बोए गए थे।

5. नीतिगत पंगुता और खोया हुआ दशक (2009–2013) - वैश्विक मंदी के बाद भारत ने दिशा खो दी। भ्रष्टाचार और घोटालों के विरुद्ध आंदोलनों ने निर्णय क्षमता को लकवा मार दिया। मंदी से बचने के लिए दिया गया 'स्टिमुलस पैकेज' महंगाई बनकर लौटा। इस 'पॉलिसी पैरालिसिस' या नीतिगत पंगुता की वजह से  बुनियादी ढांचे की परियोजनाएं ठप पड़ गईं और निवेशक भारत से मुंह मोड़ने लगे। बैंकों में एनपीए सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया। यह वह दौर था जब भारत अपनी क्षमता से बहुत नीचे प्रदर्शन कर रहा था और आम आदमी में  निराशा छाई हुई थी।

स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत के आर्थिक विकास की कहानी (2014-2025) - 2014 में नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—धीमी पड़ चुकी अर्थव्यवस्था, बैंकों के बढ़ते  एनपीए, कमजोर निवेश और नीति–विश्वास की कमी। शुरुआती वर्षों में ध्यान शासन सुधार और संस्थागत ढाँचे को मज़बूत करने पर रहा। जनधन–आधार–मोबाइल (जाम) त्रिमूर्ति के माध्यम से करोड़ों गरीब लोगों को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा गया। इससे न केवल वित्तीय समावेशन बढ़ा, बल्कि कल्याणकारी योजनाओं में पारदर्शिता आई। डिजिटल शासन का यही आधार आगे चलकर भारत की आर्थिक और रणनीतिक क्षमता का एक अहम स्तंभ बना।

इसी दौर में “स्वदेशी” और ‘मेक इन इंडिया’ को आर्थिक नीति के केंद्र में रखा गया। इसका संदेश साफ़ था—भारत केवल आयात पर निर्भर उपभोक्ता बाज़ार नहीं, बल्कि उत्पादन और तकनीक का केंद्र बने। हालाँकि शुरुआती वर्षों में इसके ठोस नतीजे सीमित रहे, लेकिन हाल के वर्षों में रक्षा उत्पादन, रेलवे, इलेक्ट्रॉनिक्स और कुछ इंजीनियरिंग क्षेत्रों में घरेलू निर्माण और निर्यात को बढ़ावा मिला।

2016–17 में लागू दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता” (आईबीसी) और वस्तुओं और सेवाओं पर अप्रत्यक्ष कर, जीएसटी, ने अर्थव्यवस्था की संरचना बदलने की कोशिश की। आईबीसी ने बैंकिंग प्रणाली की सफ़ाई की राह खोली, जबकि जीएसटी का उद्देश्य अपरोक्ष कर प्रणाली में सुधार कर पूरे देश को एक साझा बाज़ार में बदलना था। लेकिन इस संक्रमण काल में छोटे उद्योगों और व्यापारियों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। यहीं यह सवाल भी उठा कि क्या भारत का स्वदेशी छोटे और लघु व्यापार और उद्योग का क्षेत्र इतने बड़े सुधार के झटकों को सहने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार था। बाद के वर्षों में जीएसटी को सरल और कम करना और छोटे और लघु व्यापार और उद्योग को कई तरह की छूट और राहत प्रदान करना सरकार की मजबूरी बन गई।

इसी बीच वैश्विक स्तर पर एक बड़ा बदलाव आया। 2018–19 के आसपास और उसके बाद 2025 में आक्रामक रूप से अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने देश में आयात कम करने के लिए टैरिफ बढ़ाने और संरक्षणवादी व्यापार नीति अपनाई। स्टील, एल्युमिनियम, कपड़ा, खाद्यान्न, फार्मास्युटिकल और अन्य उत्पादों पर लगाए गए अत्यधिक टैरिफ ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था को अस्थिर कर दिया है। भारत से होने वाले कुछ वस्तुओं के निर्यातों पर शुल्क बढ़े, कुछ व्यापारिक रियायतें भी समाप्त हुईं हैं और यह स्पष्ट हो गया कि वैश्वीकरण का पुराना ढाँचा बदल रहा है।

ट्रंप टैरिफ ने भारत के सामने एक रणनीतिक प्रश्न खड़ा किया—क्या केवल आयात-निर्यात–आधारित वैश्विक एकीकरण पर भरोसा किया जाए, या घरेलू बाज़ार और स्वदेशी उत्पादन को मज़बूत किया जाए? इस पृष्ठभूमि में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की बहस को नया तर्क मिला। भारत ने समझा कि वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ राजनीतिक फैसलों से भी प्रभावित हो सकती हैं, इसलिए घरेलू क्षमता का निर्माण अनिवार्य है।

इस सोच को 2020 के कोविड–19 महामारी मजबूत कर ही चुका था। 2020-22 के मध्य वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ टूटीं, आयात बाधित हुआ और प्रवासी मज़दूर संकट सामने आया। इसी दौर में ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ को स्पष्ट नीति–रूप दिया गया। सरकार ने यह दोहराया कि आत्मनिर्भरता का अर्थ आत्मकेंद्रित होना नहीं, बल्कि घरेलू ताकत के साथ वैश्विक प्रतिस्पर्धा में उतरना है।  छोटे लघु और मझोले व्यापार और उद्योगों को ऋण गारंटी, स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा और रणनीतिक क्षेत्रों जैसे रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स, आदि में आयात–निर्भरता घटाने पर ज़ोर दिया गया।

इस सोच का व्यावहारिक रूप उत्पादन–आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं में दिखा। इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन, फार्मा, सोलर मॉड्यूल और रक्षा उत्पादन जैसे क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण बढ़ा। कुछ क्षेत्रों में भारत आयातक से निर्यातक बनने की दिशा में बढ़ा। वैश्विक कंपनियों ने चीन–केंद्रित आपूर्ति शृंखलाओं के विकल्प के रूप में भारत को देखना शुरू किया—यह भी ट्रंप टैरिफ और वैश्विक व्यापार तनावों का अप्रत्यक्ष परिणाम था।

2022 के बाद भारत ने विकास रणनीति को पूंजीगत व्यय, अवसंरचना और स्वदेशी उद्योगों से जोड़ा। सड़क, रेलवे और लॉजिस्टिक्स में बड़े निवेश ने घरेलू उद्योगों को माँग दी। डिजिटल अर्थव्यवस्था और सेवा निर्यात ने भारत को वैश्विक मंच पर मज़बूत किया, जबकि स्वदेशी स्टार्ट–अप और तकनीकी नवाचार ने आत्मनिर्भरता की धारणा को ठोस आधार दिया।

आज, 2025 के आसपास, भारत 6.5–7 प्रतिशत की वृद्धि दर के साथ विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। लेकिन चुनौतियाँ स्पष्ट हैं—रोज़गार सृजन अपेक्षा से कम है, छोटे उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता अभी सीमित है और पर्यावरणीय दबाव बढ़ रहे हैं। साथ ही, वैश्विक व्यापार अभी भी अनिश्चित है; ट्रंप टैरिफ जैसी नीतियाँ याद दिलाती हैं कि अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था केवल बाज़ार नहीं, राजनीति से भी संचालित होती है।

निष्कर्ष - 2014 के बाद का दशक भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए केवल विकास दर का अध्याय नहीं रहा, बल्कि यह स्वदेशी सोच, आत्मनिर्भरता के प्रयास, वैश्विक झटकों और बदलते अंतरराष्ट्रीय व्यापार वातावरण के बीच संतुलन साधने के प्रयास की कहानी भी है। इस कालखंड में भारत ने जहाँ अपने भीतर की कमजोरियों को सुधारने की कोशिश की, वहीं बाहर से आने वाले दबावों—खासतौर पर अमेरिका की संरक्षणवादी नीतियों और ट्रंप टैरिफ जैसे फैसलों—का भी सामना कर रहा है।

आगे की राह में आत्मनिर्भर भारत की सफलता इसी पर निर्भर करेगी कि वह तेज़ विकास, स्वदेशी उत्पादन और वैश्विक एकीकरण—तीनों के बीच कैसे संतुलन साधता है। भारत की जीडीपी का आंकड़ा अब केवल एक संख्या नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। यदि यह वृद्धि रोजगार पैदा नहीं करती, असमानता कम नहीं करती और गरीब की थाली में भोजन नहीं लाती, तो यह केवल कागजी होगी। भारत को अब ‘सुधारों’ से आगे बढ़कर ‘समावेश’  की ओर देखना होगा, अन्यथा जनसांख्यिकीय लाभांश  को ‘जनसांख्यिकीय आपदा’ बनने में देर नहीं लगेगी। जब रोज़गार, तकनीक और आर्थिक सुरक्षा आम नागरिक के जीवन में दिखने लगेगा तभी भारत सच्चे अर्थों में आर्थिक रूप से विकसित और आत्मविश्वास से भरा हुआ देश कहलाएगा।

(लेखक आर्टशास्त्री हैं और आई डी बी आई बैंक के ट्रेनिंग सेंटर के प्राचार्य रहे है। सेवानिवृत्ति के बाद वह स्वतंत्र रूप से शोध और लेखन का कार्य करते हैं)


गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

बहुविवाह और इस्लाम

 अफ़ीफ़ अहसन

असम की विधानसभा ने एक ऐसा कानून पारित किया है जो कथित तौर पर वैवाहिक ज़िम्मेदारी को मज़बूत करने और महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए डिज़ाइन किया गया है। सरकार इसे भारत में बहुविवाह (एक से अधिक विवाह) के ख़िलाफ़ सबसे सख़्त क़ानूनी ढाँचों में से एक बता रही है।

असम बहुविवाह निषेध विधेयक, 2025 का मूल उद्देश्य पहली शादी को कानूनी तौर पर समाप्त किए बिना दूसरी शादी करने को सजा योग्य अपराध घोषित करना है। यह कानून विभिन्न उल्लंघनों के लिए कड़ी सज़ाएँ लागू करता है। यह बहुविवाह के अपराध को संज्ञेय (Cognisable) (बिना वारंट गिरफ्तारी की अनुमति) और गैर-जमानती (Non-bailable) (जहाँ ज़मानत हक़ के तौर पर सुनिश्चित नहीं है) के रूप में वर्गीकृत करता है।

इस कानून में जो व्यक्ति नई शादी करने के लिए अपनी पिछली शादी को छिपाते हैं, उन्हें 10 साल तक की कैद हो सकती है। इस कानून में पहली शादी को भंग किए बिना अवैध दूसरी शादी करने पर 7 साल तक की कैद की सज़ा है। और जो भी व्यक्ति बार-बार यह अपराध करता पाया गया, उसे कानून के तहत निर्धारित सज़ा से दुगुनी सज़ा मिलेगी। इस शादी को करने में मदद देने वाले धार्मिक पुजारियों या मौलवियों को जो ऐसी शादियाँ कराते हैं, 1.5 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। इसके साथ ही साथ जो व्यक्ति जानबूझकर ऐसी शादियों के बारे में अधिकारियों से जानकारी छिपाते या इसमें देरी करते हैं, उन्हें 2 साल तक की कैद और 1 लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है। इसके अलावा, यह कानून नागरिक अयोग्यताएँ भी लगाता है। इस कानून के तहत दोषी ठहराया जाने वाला व्यक्ति राज्य से वित्तीय सहायता प्राप्त सार्वजनिक रोज़गार के लिए पात्र नहीं होगा और उसे असम में कोई भी चुनाव लड़ने से रोक दिया जाएगा।

भारत में बहुविवाह की राष्ट्रीय दर लगभग 1.4 प्रतिशत है, जिसमें विभिन्न धार्मिक और अलग-अलग समुदायों में अंतर पाया जाता है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 के आँकड़ों के अनुसार, ईसाइयों में यह दर मुसलमानों से अधिक 2.1 प्रतिशत है, इसके बाद मुसलमानों में 1.9 प्रतिशत और हिंदुओं में 1.3 प्रतिशत है। यह दर अनुसूचित जनजातियों में सबसे अधिक है। कुल दर समय के साथ कम हो रही है, जो 2005-06 में 1.9 प्रतिशत थी और 2019-21 में कम होकर 1.4 प्रतिशत हो गई है।

हालाँकि इस कानून को यूनिफॉर्म सिविल कोड की ओर एक कदम माना जा रहा है, मगर यह कानून राज्य की पूरी आबादी पर समान रूप से लागू नहीं होता है। इस कानून में जनजातियों को इससे स्पष्ट रूप से छूट दी गई है। असम के अंदर विशिष्ट जनजातीय समूह। छठे शेड्यूल के तहत राज्य के अंदर संवैधानिक रूप से स्व-शासित क्षेत्र इन प्रावधानों से मुक्त हैं। भारत में बहुविवाह के आँकड़े बताते हैं कि आदिवासियों में यह सबसे ज़्यादा 2.4 प्रतिशत है।

असम और उत्तराखंड में की जाने वाली कानून के निर्माण को इन राज्यों के अंदर मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के अपवाद को खत्म करने की कोशिश के तौर पर दिखाने की कोशिश की जा रही है। मगर कांग्रेस के इसकी मुख़ालफ़त से हट जाने के बाद इस बात में कोई वज़न नहीं रह गया है और कांग्रेस के ऐसा करने को अपने महिला वोट बैंक को बचाने की एक कोशिश के तोर पर देखा जा रहा है।

इस बिल को शुरूआत में विपक्षी पार्टियों के विरोध का सामना करना पड़ा जिनमें कांग्रेस, एआईयूडीएफ, सीपीआई (एम) और राइजोर दल शामिल थे। इन पार्टियों ने शुरू में मांग की कि बिल को आगे की जाँच के लिए सेलेक्ट कमेटी के पास भेजा जाए और कई संशोधन पेश किए। मगर मुख्यमंत्री से आश्वासन मिलने के बाद कांग्रेस और राइजोर दल ने संशोधनों के अपने दावे वापस ले लिए। मगर एआईयूडीएफ और सीपीआई (एम) ने दावे वापस लेने से इनकार कर दिया और अपनी मौजूदा शक्ल में बिल का विरोध जारी रखा।

बहुविवाह को अवैध घोषित करने वाला अगला राज्य गुजरात हो सकता है। राज्य सरकार ने फरवरी में एक समान नागरिक संहिता (UCC) की ज़रूरत की समीक्षा करने और UCC का मसौदा तैयार करने के लिए एक समिति गठित की थी। समिति की अगुआई जस्टिस रंजना देसाई कर रही हैं, जिन्होंने उत्तराखंड में भी इसी तरह के एक पैनल की अगुआई की थी जिसने वहाँ UCC का मसौदा तैयार किया था। 2015 में, गुजरात हाई कोर्ट ने मुसलमानों में बहुविवाह के ख़ात्मे की बात की थी। एक आदेश में, जस्टिस जे बी पारदीवाला, जो इस वक़्त सुप्रीम कोर्ट के जज हैं, ने इस प्रथा को संविधान के ख़िलाफ़ और "पित्तंत्रात्‍मक तौर पर निरंकुश" बताया था।

देशभर में मुस्लिम अधिकार संगठन बहुविवाह को सज़ा योग्य अपराध बनाने की माँग कर रहे हैं। मुंबई मैं तीन सौ से अधिक नागरिकों, जिनमें महिलाओं के अधिकारों के कार्यकर्ता, फ़िल्मकार, नाटककार, सामाजिक सुधारक, कलाकार, शिक्षाविद् और अन्य शामिल हैं, ने मुस्लिम बहुविवाह (polygamy) पर क़ानूनी प्रतिबंध की माँग करने वाली एक याचिका का समर्थन किया है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन के एक अध्ययन का हवाला दिया, जिसमें यह पाया गया कि मुस्लिम बहुविवाह की शिकार 80 प्रतिशत से ज़्यादा महिलाएँ चाहती हैं कि मुस्लिम पुरुषों के लिए बहुविवाह को एक फ़ौजदारी अपराध घोषित किया जाए। हालाँकि भारतीय न्याय संहिता बहुविवाह को अपराध घोषित करती है, लेकिन भारतीय मुस्लिम पुरुषों को व्यक्तिगत कानूनों के तहत इससे छूट मिली हुई है।

इस्लाम और बहूपति (एक से ज़्यादा पति) को इस्लाम पूरी तरह से प्रतिबंधित करता है, जैसा कि हिमाचल प्रदेश की कुछ जनजातियों में प्रचलित है, लेकिन बहुविवाह (एक से ज़्यादा पत्नियाँ) को आम तौर पर इस्लाम से जोड़ा जाता है। इस्लाम धर्म को बदनाम करने की कोशिश में, कुछ तत्व यह प्रचार करने की कोशिश करते हैं कि इस्लाम पुरुषों के लिए कई पत्नियों को अनिवार्य बनाता है, जो एक स्पष्ट झूठ है। दूसरे ग़लती से दावा करते हैं कि मुस्लिम पुरुषों को कई महिलाओं से शादी करने के लिए प्रोत्साहित किया गया हैजो कि इस्लाम की सतही व्याख्या पर आधारित है।

हालाँकि इस्लाम पुरुषों को चार महिलाओं तक शादी करने की अनुमति देता है, जो कुछ शर्तों के अधीन है जैसे कि पत्नियों के बीच पूर्ण समानता सुनिश्चित करना, लेकिन यह उन्हें ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित नहीं करता। दरअसल, इस्लाम के मूलभूत ग्रंथों क़ुरान और सहीह हदीसका अध्ययन दर्शाता है कि इस्लाम वास्तव में पुरुषों को एक ही समय में एक से अधिक महिलाओं से शादी करने से हतोत्साहित करता है।

क़ुरान के अवतरण के समय मानव इतिहास के अधिकांश हिस्सों में प्रचलित सामाजिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ होता कि बहुविवाह को पूरी तरह से त्याग दिया जाता। इसलिए, इस्लाम ने बहुविवाह को अवैध घोषित नहीं किया, बल्कि इस पर चार की सीमा लगाई और यह कहते हुए कि "एक ही बेहतर है अगर तुम्हें लगे कि तुम इंसाफ़ न कर सकोगे" वक़्त गुज़रने के साथ-साथ इसको व्यवस्थित करने और इसकी हतोत्साहित करने की कोशिश की, जिससे मुसलमानों को नए सामाजिक ढाँचों के अनुरूप ढलने का लचीलापन प्रदान किया गया, जबकि वे शरीयत की सीमाओं में भी रहे। क़ुरान मजीद में अल्लाह का फ़रमान है:

और अगर तुम्हें ख़ौफ़ है कि तुम इन्साफ़ ना कर सकोगे यतीमों के बारे में, तो औरतों में से जो तुम्हें पसंद हों तो निकाह करो, दो, तीन और चार, पस अगर तुम्हें ख़ौफ़ हो कि तुम अदल ना करसकोगे तो सिर्फ एक,...'' सूरह अन-निसा (4:3)

बहुविवाह अब ज़्यादातर समाजों में सामान्य नहीं रहा। सामाजिक व्यवस्था और कल्याणकारी प्रणालियों में बदलाव की वजह से विधवा और तलाक़शुदा महिलाएँ अब ज़िंदा रहने के लिए दूसरे पुरुषों पर निर्भर रहने के लिए मजबूर नहीं हैं। लंबी दूरी का सफ़र पहले के मुकाबले बहुत शांतिपूर्ण और तेज़ है। प्राचीन काल में युद्ध पुरुषों के बीच लड़े जाते थे जिनमें काफ़ी संख्या में औरतें विधवा और बच्चे यतीम हो जाते थे, मगर आज युद्ध कायरता से लड़े जाते हैं जिनमें हवाई हमले और ड्रोन हमले शामिल होते हैं जो अंधाधुंध मर्दों, औरतों और बच्चों को एकसमान निशाना बनाते हैं।

आज ज़्यादातर मुस्लिम देशों में बहुविवाह बहुत दुर्लभ है। प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार, अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान और मिस्र में एक प्रतिशत से भी कम मुस्लिम पुरुष एक से ज़्यादा जीवनसाथी के साथ रहते हैंये सब ऐसे देश हैं जहाँ कम से कम मुसलमानों के लिए यह प्रथा कानूनी है। ये देश करोड़ों मुसलमानों का घर हैं, जिनकी संस्कृतियाँ और भाषाएँ विविध हैं। हक़ीक़त यह है कि ऐसे समाजों में बहुविवाह सामान्य के क़रीब भी नहीं है, यह शरीयत के संदर्भ में इसकी हतोत्साहन की नापसंदगी की तरफ़ इशारा करती है।

बहुविवाह और इस्लाम

 अफ़ीफ़ अहसन

असम की विधानसभा ने एक ऐसा कानून पारित किया है जो कथित तौर पर वैवाहिक ज़िम्मेदारी को मज़बूत करने और महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए डिज़ाइन किया गया है। सरकार इसे भारत में बहुविवाह (एक से अधिक विवाह) के ख़िलाफ़ सबसे सख़्त क़ानूनी ढाँचों में से एक बता रही है।

असम बहुविवाह निषेध विधेयक, 2025 का मूल उद्देश्य पहली शादी को कानूनी तौर पर समाप्त किए बिना दूसरी शादी करने को सजा योग्य अपराध घोषित करना है। यह कानून विभिन्न उल्लंघनों के लिए कड़ी सज़ाएँ लागू करता है। यह बहुविवाह के अपराध को संज्ञेय (Cognisable) (बिना वारंट गिरफ्तारी की अनुमति) और गैर-जमानती (Non-bailable) (जहाँ ज़मानत हक़ के तौर पर सुनिश्चित नहीं है) के रूप में वर्गीकृत करता है।

इस कानून में जो व्यक्ति नई शादी करने के लिए अपनी पिछली शादी को छिपाते हैं, उन्हें 10 साल तक की कैद हो सकती है। इस कानून में पहली शादी को भंग किए बिना अवैध दूसरी शादी करने पर 7 साल तक की कैद की सज़ा है। और जो भी व्यक्ति बार-बार यह अपराध करता पाया गया, उसे कानून के तहत निर्धारित सज़ा से दुगुनी सज़ा मिलेगी। इस शादी को करने में मदद देने वाले धार्मिक पुजारियों या मौलवियों को जो ऐसी शादियाँ कराते हैं, 1.5 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। इसके साथ ही साथ जो व्यक्ति जानबूझकर ऐसी शादियों के बारे में अधिकारियों से जानकारी छिपाते या इसमें देरी करते हैं, उन्हें 2 साल तक की कैद और 1 लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है। इसके अलावा, यह कानून नागरिक अयोग्यताएँ भी लगाता है। इस कानून के तहत दोषी ठहराया जाने वाला व्यक्ति राज्य से वित्तीय सहायता प्राप्त सार्वजनिक रोज़गार के लिए पात्र नहीं होगा और उसे असम में कोई भी चुनाव लड़ने से रोक दिया जाएगा।

भारत में बहुविवाह की राष्ट्रीय दर लगभग 1.4 प्रतिशत है, जिसमें विभिन्न धार्मिक और अलग-अलग समुदायों में अंतर पाया जाता है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 के आँकड़ों के अनुसार, ईसाइयों में यह दर मुसलमानों से अधिक 2.1 प्रतिशत है, इसके बाद मुसलमानों में 1.9 प्रतिशत और हिंदुओं में 1.3 प्रतिशत है। यह दर अनुसूचित जनजातियों में सबसे अधिक है। कुल दर समय के साथ कम हो रही है, जो 2005-06 में 1.9 प्रतिशत थी और 2019-21 में कम होकर 1.4 प्रतिशत हो गई है।

हालाँकि इस कानून को यूनिफॉर्म सिविल कोड की ओर एक कदम माना जा रहा है, मगर यह कानून राज्य की पूरी आबादी पर समान रूप से लागू नहीं होता है। इस कानून में जनजातियों को इससे स्पष्ट रूप से छूट दी गई है। असम के अंदर विशिष्ट जनजातीय समूह। छठे शेड्यूल के तहत राज्य के अंदर संवैधानिक रूप से स्व-शासित क्षेत्र इन प्रावधानों से मुक्त हैं। भारत में बहुविवाह के आँकड़े बताते हैं कि आदिवासियों में यह सबसे ज़्यादा 2.4 प्रतिशत है।

असम और उत्तराखंड में की जाने वाली कानून के निर्माण को इन राज्यों के अंदर मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के अपवाद को खत्म करने की कोशिश के तौर पर दिखाने की कोशिश की जा रही है। मगर कांग्रेस के इसकी मुख़ालफ़त से हट जाने के बाद इस बात में कोई वज़न नहीं रह गया है और कांग्रेस के ऐसा करने को अपने महिला वोट बैंक को बचाने की एक कोशिश के तोर पर देखा जा रहा है।

इस बिल को शुरूआत में विपक्षी पार्टियों के विरोध का सामना करना पड़ा जिनमें कांग्रेस, एआईयूडीएफ, सीपीआई (एम) और राइजोर दल शामिल थे। इन पार्टियों ने शुरू में मांग की कि बिल को आगे की जाँच के लिए सेलेक्ट कमेटी के पास भेजा जाए और कई संशोधन पेश किए। मगर मुख्यमंत्री से आश्वासन मिलने के बाद कांग्रेस और राइजोर दल ने संशोधनों के अपने दावे वापस ले लिए। मगर एआईयूडीएफ और सीपीआई (एम) ने दावे वापस लेने से इनकार कर दिया और अपनी मौजूदा शक्ल में बिल का विरोध जारी रखा।

बहुविवाह को अवैध घोषित करने वाला अगला राज्य गुजरात हो सकता है। राज्य सरकार ने फरवरी में एक समान नागरिक संहिता (UCC) की ज़रूरत की समीक्षा करने और UCC का मसौदा तैयार करने के लिए एक समिति गठित की थी। समिति की अगुआई जस्टिस रंजना देसाई कर रही हैं, जिन्होंने उत्तराखंड में भी इसी तरह के एक पैनल की अगुआई की थी जिसने वहाँ UCC का मसौदा तैयार किया था। 2015 में, गुजरात हाई कोर्ट ने मुसलमानों में बहुविवाह के ख़ात्मे की बात की थी। एक आदेश में, जस्टिस जे बी पारदीवाला, जो इस वक़्त सुप्रीम कोर्ट के जज हैं, ने इस प्रथा को संविधान के ख़िलाफ़ और "पित्तंत्रात्‍मक तौर पर निरंकुश" बताया था।

देशभर में मुस्लिम अधिकार संगठन बहुविवाह को सज़ा योग्य अपराध बनाने की माँग कर रहे हैं। मुंबई मैं तीन सौ से अधिक नागरिकों, जिनमें महिलाओं के अधिकारों के कार्यकर्ता, फ़िल्मकार, नाटककार, सामाजिक सुधारक, कलाकार, शिक्षाविद् और अन्य शामिल हैं, ने मुस्लिम बहुविवाह (polygamy) पर क़ानूनी प्रतिबंध की माँग करने वाली एक याचिका का समर्थन किया है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन के एक अध्ययन का हवाला दिया, जिसमें यह पाया गया कि मुस्लिम बहुविवाह की शिकार 80 प्रतिशत से ज़्यादा महिलाएँ चाहती हैं कि मुस्लिम पुरुषों के लिए बहुविवाह को एक फ़ौजदारी अपराध घोषित किया जाए। हालाँकि भारतीय न्याय संहिता बहुविवाह को अपराध घोषित करती है, लेकिन भारतीय मुस्लिम पुरुषों को व्यक्तिगत कानूनों के तहत इससे छूट मिली हुई है।

इस्लाम और बहूपति (एक से ज़्यादा पति) को इस्लाम पूरी तरह से प्रतिबंधित करता है, जैसा कि हिमाचल प्रदेश की कुछ जनजातियों में प्रचलित है, लेकिन बहुविवाह (एक से ज़्यादा पत्नियाँ) को आम तौर पर इस्लाम से जोड़ा जाता है। इस्लाम धर्म को बदनाम करने की कोशिश में, कुछ तत्व यह प्रचार करने की कोशिश करते हैं कि इस्लाम पुरुषों के लिए कई पत्नियों को अनिवार्य बनाता है, जो एक स्पष्ट झूठ है। दूसरे ग़लती से दावा करते हैं कि मुस्लिम पुरुषों को कई महिलाओं से शादी करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है जो कि इस्लाम की सतही व्याख्या पर आधारित है।

हालाँकि इस्लाम पुरुषों को चार महिलाओं तक शादी करने की अनुमति देता है, जो कुछ शर्तों के अधीन है जैसे कि पत्नियों के बीच पूर्ण समानता सुनिश्चित करना, लेकिन यह उन्हें ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित नहीं करता। दरअसल, इस्लाम के मूलभूत ग्रंथों क़ुरान और सहीह हदीस का अध्ययन दर्शाता है कि इस्लाम वास्तव में पुरुषों को एक ही समय में एक से अधिक महिलाओं से शादी करने से हतोत्साहित करता है।

क़ुरान के अवतरण के समय मानव इतिहास के अधिकांश हिस्सों में प्रचलित सामाजिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ होता कि बहुविवाह को पूरी तरह से त्याग दिया जाता। इसलिए, इस्लाम ने बहुविवाह को अवैध घोषित नहीं किया, बल्कि इस पर चार की सीमा लगाई और यह कहते हुए कि "एक ही बेहतर है अगर तुम्हें लगे कि तुम इंसाफ़ न कर सकोगे" वक़्त गुज़रने के साथ-साथ इसको व्यवस्थित करने और इसकी हतोत्साहित करने की कोशिश की, जिससे मुसलमानों को नए सामाजिक ढाँचों के अनुरूप ढलने का लचीलापन प्रदान किया गया, जबकि वे शरीयत की सीमाओं में भी रहे। क़ुरान मजीद में अल्लाह का फ़रमान है:

और अगर तुम्हें ख़ौफ़ है कि तुम इन्साफ़ ना कर सकोगे यतीमों के बारे में, तो औरतों में से जो तुम्हें पसंद हों तो निकाह करो, दो, तीन और चार, पर अगर तुम्हें ख़ौफ़ हो कि तुम अदल ना कर सकोगे तो सिर्फ एक,...'' सूरह अन-निसा (4:3)

बहुविवाह अब ज़्यादातर समाजों में सामान्य नहीं रहा। सामाजिक व्यवस्था और कल्याणकारी प्रणालियों में बदलाव की वजह से विधवा और तलाक़शुदा महिलाएँ अब ज़िंदा रहने के लिए दूसरे पुरुषों पर निर्भर रहने के लिए मजबूर नहीं हैं। लंबी दूरी का सफ़र पहले के मुकाबले बहुत शांतिपूर्ण और तेज़ है। प्राचीन काल में युद्ध पुरुषों के बीच लड़े जाते थे जिनमें काफ़ी संख्या में औरतें विधवा और बच्चे यतीम हो जाते थे, मगर आज युद्ध कायरता से लड़े जाते हैं जिनमें हवाई हमले और ड्रोन हमले शामिल होते हैं जो अंधाधुंध मर्दों, औरतों और बच्चों को एकसमान निशाना बनाते हैं।

आज ज़्यादातर मुस्लिम देशों में बहुविवाह बहुत दुर्लभ है। प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार, अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान और मिस्र में एक प्रतिशत से भी कम मुस्लिम पुरुष एक से ज़्यादा जीवनसाथी के साथ रहते हैं। ये सब ऐसे देश हैं जहाँ कम से कम मुसलमानों के लिए यह प्रथा कानूनी है। ये देश करोड़ों मुसलमानों का घर हैं, जिनकी संस्कृतियाँ और भाषाएँ विविध हैं। हक़ीक़त यह है कि ऐसे समाजों में बहुविवाह सामान्य के क़रीब भी नहीं है, यह शरीयत के संदर्भ में इसकी हतोत्साहन की नापसंदगी की तरफ़ इशारा करती है।

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