रविवार, 23 नवंबर 2025

विवाह पंचमी: मर्यादा, समर्पण और संस्कारों की अमर प्रेरणा

 आचार्य राघवेन्द्र प्रसाद तिवारी

भारतीय संस्कृति सिखाती है कि नित्य कर्म यदि चेतना, श्रद्धा और कर्तव्य भावना के साथ किये जाए, तो वह संस्कार बन जाते हैं। सोलह संस्कारों के साथ ही हम जीवन के प्रत्येक कर्म यथा स्नान, भोजन, शयन, जागरण, कृषि कार्य का आरंभ एवं समापन आदि को भी संस्कार ही मानते हैं। इन कार्यों को पूजा-अर्चना एवं श्रद्धा के साथ करते हैं। यही जीवन दृष्टि हमारी संस्कृति को अतिविशिष्ट बनाती है। संस्कार का अर्थ है- शुद्धिकरण, परिष्कार, सुधार, सभ्य या पवित्र बनाने की क्रिया, अर्थात् अच्छे कर्मों द्वारा मन, वचन एवं शरीर का परिष्कार करना। इसी वजह से संस्कार शब्द का प्रयोग चरित्र, आचरण और जीवन की पवित्रता के संदर्भ में भी किया जाता है।

इसी श्रृंखला में हमारी संस्कृति में विवाह पंचमी का सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है। यह पावन पर्व भगवान श्रीराम और माता सीता के दिव्य विवाह की स्मृति में प्रत्येक वर्ष मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष यह तिथि 25 नवम्बर को है। यह पर्व केवल एक ऐतिहासिक घटना का स्मरण ही नहीं, अपितु धर्म, प्रेम और मर्यादा के शाश्वत मूल्यों के समन्वय का उत्सव है।

अयोध्या और जनकपुर की संयुक्त आस्था - इस दिन भक्तगण व्रत-उपवास रखते हैं, घरों और मंदिरों में मंडप सजाए जाते हैं। कलश स्थापना, दीप प्रज्वलन, भजन-संध्या और रामायण पाठ  का आयोजन होता है। विवाहित दंपती इस दिन अपने मंगलमय दांपत्य जीवन के लिए विशेष रूप से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। 

यह पर्व भारत और नेपाल के मध्य सांस्कृतिक एकता और सांझी आस्था का भी प्रतीक है। जनकपुर (अब नेपाल में), जिसे माता सीता की जन्मभूमि माना जाता है, में इस पावन अवसर पर विशालविवाह पंचमी मेला’ का आयोजन होता है। वहाँ राम जानकी मंदिर  में श्रीराम और सीता का प्रतीकात्मक विवाह संस्कार सम्पन्न कराया जाता है। वहीं अयोध्या में कनक भवन  और अन्य मंदिरों में भक्तगण विशेष पूजन-अर्चना करते हैं और सीयावर रामचंद्र जी की जय”  के उद्घोष से सम्पूर्ण नगरी गुंजायमान हो उठती है। दीपों की ज्योति से नगर प्रकाशित हो जाता है। तब विवाह पंचमी हमें यह स्मरण कराती है कि प्रेम, आध्यात्म और मर्यादा ही जीवन का सच्चा आधार हैं।

आदर्श दांपत्य जीवन की प्रेरणा - विवाह पंचमी हमें दाम्पत्य जीवन के उस स्वरूप की याद दिलाती है, जिसमें प्रेम के साथ मर्यादा, त्याग, और परस्पर सम्मान निहित है। वर्तमान समय में, जब वैवाहिक जीवन में अस्थिरता और स्वार्थ की प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं साथ ही वैवाहिक जीवन की पवित्रता पर प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं, इस परिस्थिति में श्रीराम और सीता का आदर्श यह सिखाता है कि सच्चा दाम्पत्य जीवन परस्पर सहयोग, विश्वास, कर्तव्य एवं त्याग पर आधारित होता है, न कि भौतिक आकर्षण पर। कुल-परिवार एवं समाज का हित व्यक्तिगत हित से ऊपर होता है। ‘मैं’ आधारित सोच एवं स्वयं की सुख-सुविधा नहीं अपितु ‘हम’ की भावना एवं सामाजिक धारणाओं का सम्मान ही वैवाहिक जीवन की धुरी होती है। यह सन्देश देती है कि वैवाहिक जीवन मात्र भौतिक संबंध नहीं, अपितु दो आत्माओं का आध्यात्मिक मिलन है, जो धर्म और कर्तव्य से जुड़ा होता है। माता सीता का भगवान राम के साथ वनवास जाने, दर-दर विचरण करने एवं उनके इशारे पर अयोध्या छोड़ने का निर्णय इन्हीं भावनाओं के ज्वलंत उदाहरण हैं।

वाल्मीकि रामायण के साथ-साथ पुराणों में विशेषकर पद्म पुराण तथा विभिन्न कथा-साहित्य में श्रीराम-सीता विवाह का उल्लेख मिलता है। पद्म पुराण के "पातालखण्ड" में सीता-राम विवाह प्रसंग को धार्मिक, सांस्कृतिक और लोकमर्यादा का आदर्श बताया गया है। इसमें सीता स्वयंवर, शिव धनुष को भंग करना और विवाह की पद्धति को अत्यंत दिव्य और प्रेरक कहकर, संपूर्ण समाज के लिए मर्यादा एवं संस्कारों की प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत किया गया है।​ यह प्रसंग इस बात की पुष्टि करता है कि विवाह पंचमी अकेले प्रेम या युगल-मिलन का पर्व नहीं, अपितु मर्यादा, समर्पण और सत्कार्यों की परंपरा का अमर प्रतीक है, जिसमें कर्तव्य, अनुशासन एवं संस्कारों का सर्वोच्चतम स्थान है। यह पर्व हमें पुराणकालीन धार्मिक आदर्शों से जोड़ते हुए समाज को संस्कारशील बनाता है।

संस्कृति का संरक्षण एवं नारी सामान का वैश्विक सन्देश - आधुनिक युग में जब पश्चिमी प्रभावों के कारण सनातनी परंपराएँ क्षीण होती जा रही हैं, यह पर्व हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का अवसर देता है। विवाह पंचमी भारतीय समाज में संस्कार, धर्म और कर्तव्य की भावना को सुदृढ़ करने का माध्यम बनती है। माता सीता के जीवन से समाज यह सीखता है कि नारी शक्ति, धैर्य, और गरिमा की प्रतीक है। आज जब विश्वभर में महिला सशक्तीकरण की चर्चा होती है, तब माता सीता के वैवाहिक जीवन के आदर्श हमें यह बताते हैं कि ढाढस, सौम्यता एवं साहस का अद्भुत संगम नारी के व्यक्तित्व में ही फूलता-फलता है।

सामाजिक एकता और आध्यात्मिक ऊर्जा का स्त्रोत - विवाह पंचमी का पर्व सामूहिक उत्सव का प्रतीक है। मंदिरों में भजन-कीर्तन, रामायण पाठ और शोभायात्राएँ लोगों के बीच सामाजिक सौहार्द और धार्मिक आस्था का वातावरण निर्मित करती हैं। यह पर्व परिवार और समाज में सम्मान, समर्पण और संतुलन के मूल्यों को सुदृढ़ करता है। आज के बदलते सामाजिक परिवेश में यह पर्व हमें संस्कारों, निष्ठा और मर्यादा में निहित अनंत आध्यात्मिक ऊर्जा का स्मरण कराता है।

आदिकवि वाल्मीकि रचित रामायण के बालकाण्ड में सीता द्वारा श्रीराम का दाहिना हाथ अपने बाएं हाथ में लेने की क्रिया का पाणिग्रहण संस्कार के रूप में वर्णन है, जो विवाह में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह संस्कार केवल एक सामाजिक रीति नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और मानसिक समर्पण का प्रतीक है। इस संस्कार के माध्यम से वर और वधू एक-दूसरे के जीवन में पूर्ण समर्थन और साथ चलने का संकल्प लेते हैं। पाणिग्रहण का अर्थ है हाथ का ग्रहण, जो मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाता है। यह क्रिया वर वधू के बीच विश्वास, प्रेम, और जिम्मेदारी की नींव रखती है, जो उनके वैवाहिक जीवन को सुदृढ़ और स्थायी बनाती है। पाणिग्रहण संस्कार से दोनों एक-दूसरे के पूरक बनते हैं, जीवन की खुशियों और कठिनाइयों में संयुक्त रूप से आगे बढ़ने का एक-दूसरे को वचन देते हैं।

निष्कर्ष - विवाह पंचमी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी त्रेता युग में थी। यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में सच्चा सुख, मर्यादा, प्रेम, निष्ठा और कर्तव्यपालन में निहित है। श्रीराम और सीता के आदर्श जीवन से प्रेरणा लेकर हम अपने परिवार और समाज को संस्कारवान बना सकते हैं। वर्तमान सन्दर्भ में देखे तो टूटते हुए परिवारों को बचा सकते हैं। भगवान श्रीराम और माता सीता के आदर्श विवाह का यह पर्व आज के बदलते सामाजिक परिवेश में भारतीय संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों को पुनर्जीवित करने का संदेश देता है। यही इसकी वास्तविक सीख एवं  शाश्वत महत्त्व है। महाकवि तुलसीदस ने ठीक ही कहा है, सिय राम मय सब जग जानी।

(लेखक के विचार व्यक्तिगत हैं। लेखक पंजाब केन्द्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा के कुलपति हैं।)

दिव्याग सशक्तिकरण एवं जागरूकता अभियान

संवाददाता

नई दिल्ली। आज दिनाक 23-11-2005 को विकलांग कल्याण सह शोध समिति (रजि.) मदनगीर, नई दिल्ली-110042 द्वारा आयोजित दिव्याम सशक्तिकरण एवं जागरूकता अभियान नाटी गाईना बारात घर नई दिल्ली-110074 में हुई जिसमें क्षेत्र के कई दिव्यांगजन ने अभियान में भाग लिए। जिसमें दिव्या जनी के रोजगार शिक्षा स्वास्थ शिक्षा पर बल दिया गया। सरकारी प्रयास एवं योजनाएं सन्तोष का विषय है कि सरकार एवं विभिन्न स्वयंसेवी संगतन दिव्यांग जनों के सशक्तिकरण के लिए लगातार प्रयासरत है। दिव्यांग अधिकार अधिनियम-2016 में 21 प्रकार के दिव्यांगताओं की मान्यता दी है और उनके अधिकारों को कानूनी रूप दिया है। सरकारी नौकरी और शिक्षण सस्थानों में आरक्षण सुगम मारत अभियान के अंतर्गत भवनों एवं परिवहन प्रणालियों को सुगम बनाना एवं सहायक अम एव उपक्रम प्रदान करना वे सभी कदम मील के पत्थर है। दिव्याग जनों के UDID Card के बारे में भी जानकारी दी।

सस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री बौनु साहु जी जो 75% दिव्याग है. ने ऐसे जागरूकता एब सशक्तिकरण योजनाओं और अधिकारों को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। यहाँ मिलने वाली जानकारी एवं मार्गदर्शन से कई  विकलांग नातियों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तनसाहुजी ने कहा कि यह एक सकिने सरकार और गैरसरकारीसम निर्माण करे दिव्याजदरता के पात्र हज अपनी क्षमताओं को पूरा धारा में गरिमापूर्ण जीवन जी सके और दिव्यांगों के लिए दिव्याक समूहका निर्माण एवं कौशल प्रशिक्षण पर विस्तृत जानकारीका सशक्तिकरण केवल उनकी नहीं बल्कि सम्पूर्ण देश और समाज को सशक्तिकर है। वे एक बार फिर उपस्थित सभी दिव्यामजनों एवं सहयोगियों को धन्यवाद देता है। सस्था के कानूनी सलाहकार श्री रमेश कुमार (कोली) ने भी दिव्यान अधिकार अधिनियम पर विस्तृत जानकारी दिये और श्री रमेश कुमार (कोली) जी ने महात्मा गांधी का रूप धारण करके उपस्थित सभी व्यक्तियों को सम्बोधन किया तथा ऐसे आयोजनों का अनवृत रूप से करने का निश्चय किया। शिविर में सरथा सदस्य श्री विजय कुमार दिव्यांग 90%, श्री सुखविन्दर सिंह तथा माटी गाईन्स क्षेत्र के दिव्याज जन में मुख्य रूप से सुश्री सीताजी श्री नन्दलाल जी. श्री किशोरीलाल जी. श्री बलवीर सिंह, श्री बीडो जी. राजेंवाई जी, शीला जी ने अपने अपने विचार व्यक्त किए।

शनिवार, 22 नवंबर 2025

देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती पैदा करता पाकिस्तान का परोक्ष युद्ध

कर्नल शिवदान सिंह

जब कोई देश अपने दुश्मन देश सेआमने-सामने के युद्ध में नहीं जीत पता है तो वह फिर परोक्ष युद्ध का सहारा लेता है जैसे कि पाकिस्तान भारत के विरुद्ध कर रहा है क्योंकि भारत से1947 से लेकर अब तक वह चार युद्ध हार चुका है इसलिए अब उसने परोक्ष युद्ध का सहारा लेने का निर्णय लिया है। यह युद्ध सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता है बल्कि देश के आंतरिक हिस्सों में आंतरिक सुरक्षा पर हमले के रूप में लड़ा जाता है। देश की सामाजिक, आर्थिक और कानून व्यवस्था आंतरिक सुरक्षा के मुख्य हिस्से होते हैं। इसलिए पाकिस्तान 80 के दशक से ही हमारे देश के विभिन्न राज्यों जैसे पहले पंजाब मेंऔर बाद में कश्मीर राज्य में धार्मिक कट्टरपंथी सोच का प्रचार करके वहां परआतंकवाद को बढ़ावा दिया किया है। इन राज्यों में सांप्रदायिक तनाव के द्वारा वह पूरे देश में सांप्रदायिक तनाव पैदा करके कानून व्यवस्था को बर्बाद करना चाह रहा था। इसी क्रम में अभी दिल्ली में ऐतिहासिक लाल किले पर धमाके के पीछे यही मुख्य कारण था। इस धमाके के पीछे के रहस्य की परते खुलने पर पता लग रहा है कि आतंकियों का इरादा दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर और इसी प्रकार के देश के 37 प्रसिद्ध स्थान पर विस्फोट करकेसांप्रदायिक तनाव पैदा करके दंगे करवाना था। जिससे विश्व को दिखाया जा सके की भारत में कितनी अशांति है और इससे उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को गिराया जा सके। परंतु हमारे देश की सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी चौकसी एवं कर्तव्य निष्ठा से इनके इरादों को नाकाम कर दिया।

80 के दशक में रूसी सेना के द्वारा अफगानिस्तान में कब्जे के बाद अमेरिका ने इसे दक्षिण एशिया में अपने लिए चुनौती माना। इसके बाद अमेरिका ने रूसी सेना को वहां से हटाने के लिए पाकिस्तान को अपना मोहरा बनाते हुए उसकेमदरसो में पढ़ने वाले जवानों को तालिबान बनाकर अफगानिस्तान मेंछापा मार युद्ध के लिए भेजना शुरू कर दिया। इसके लिए अमेरिका की सी आइ ए ने पाकिस्तान की आइ ईस आइ को इस प्रकार केऑपरेशन के लिए प्रशिक्षित किया। अमेरिका के इस ऑपरेशन मेंअफगानिस्तान के लोग भी शामिल थे। जिन्हें अफगानिस्तान में रूसी सेना केहर ठिकाने की पूरी जानकारी थी। इस प्रकार के छापामार युद्ध के आगे रुसी सेना ज्यादा देर टिक नहीं पाई और वह वापस चली गई। इसके बाद अमेरिका ने पाकिस्तान की पीठ थपथपाई और उसे इसी प्रकार चीन के विरुद्ध भी इस्तेमाल किया। इसके लिए अमेरिका ने पाकिस्तान को बहुत सी आर्थिक सहायता दी। इस प्रकार आतंकवादको कमाई का जरिया बनाते हुए पाकिस्तान ने इसको राष्ट्रीय नीति के रूप में अपना लिया। इस कारण तरह - तरह के आतंकी संगठन जैसे लश्कर ए तोयबा जैसे मोहम्मद इत्यादि वहां पर बन गए। जिन्हें वहां पर खुलेआम अपनी गतिविधि चलाने की पुरी छूट मिल गई। इसलिए पाकिस्तान के जिन नौजवानों को देश की आर्थिक प्रगति में सहयोग करना चाहिए था वह आतंकी बन गए। इस करण पाकिस्तान ना तो औद्योगिक क्षेत्र मेंकोई प्रगति की और ना ही पाकिस्तान में विदेशी निवेश आया इस कारण आज पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का यह हाल है।

किसी भी देश में देश विरोधी आतंकी गतिविधि चलाने के लिए पहले वहां पर ऐसे कारण तैयार किए जाते हैं जिनके द्वारा वहां की जनता को दिगभ्रमित किया जा सकेऔर इसके द्वारा वहां के कुछ तत्वों को देश विरोधी गतिविधियों में लगाया जा सके। इसके लिए उसने सर्वप्रथम पाकिस्तान से सीमा लगने वाले पंजाब को अपना निशाना बनाया। पंजाब में सिखों में असंतोष फैलाने के लिए उसने उन्हें अलग खालिस्तान बनाने के लिए प्रेरित करने के लिएअपने रेडियो तथा टेलीविजन द्वारा इसका दुष्प्रचार करना शुरू कर दिया। उसने पंजाब के सिखों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि भारत में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। इसलिए उन्हें अपना अलग देश खालिस्तान बनाना चाहिए। इस सोच को आगे बढ़ाने के लिए उसने पहले कुछ सफेद पोश लोगों को इसके प्रचार के लिए तैयार किया जिनमे संत जरनेलसिंह भिंडर वाले का नाम प्रमुख है  जिन्होंने वहां के कुछ नौजवानों को पंजाब में खालिस्तान के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलवाने के लिए अपने आतंकवादियों के द्वारा हिंसा करवानी शुरू की। इसमें इनका मुख्य निशाना हिंदू आबादी होती थी। इन आतंकियों को ट्रेनिंग देने के लिए उसने पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्र में इनके ट्रेनिंग कैंप स्थापित किये। आखिर मेंपंजाब की राष्ट्रवादी जनता के सहयोग से पाकिस्तान के इस नापाक इरादे को भारत ने कुचल दिया तथा पंजाब दोबारा देश का प्रगतिशील प्रदेश बन गया। इसके बाद पाकिस्तान की आइ एस आइ ने यही हरकत 90 के दशक में कश्मीर में शुरू की और वहां परदुष्प्रचार करना शुरू किया कि भारत में मुसलमानों का भविष्य सुरक्षित नहीं है इसलिए कश्मीर को आजादी चाहिए। इसके लिए उसने वहां के नौजवानों को आतंकवादी बनाने के लिए उनकी सोच को कट्टरवादी बनाने के लिए मुस्लिम कट्टरपन को बढ़ावा वहां के कुछ मौलवियों से दिलवाना शुरू किया तथा वहां के कुछ नौजवानों को पाक अधिकृत कश्मीर में ले जाकर उन्हें आतंकवाद की ट्रेनिंग देकर अपने देश के आतंकियों के साथ कश्मीर में भेजकर उनसे हिंदुओं पर आतंकवादी हमले करवाए। 

इसके फलस्वरूप वहां के तीन लाख कश्मीरी पंडितों को कश्मीर से विस्थापन पलायन करना पड़ा। इस सबके लिएआतंकवाद को बढ़ावा देने वाले ओवर ग्राउंड काम करने वाले स्थानीय एजेंट को को वहां पर लागू धारा 370 से मदद मिल रही थी। इसके कारण कश्मीर की जनता अपने आप को काफी प्रताड़ित महसूस कर रही थी। इसको देखते हुए भारत सरकार ने कश्मीर में अपनी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करते हुए वहां पर लागू धारा 370 को हटाकर वहां पर भारत का संविधान लागू किया जिससे आतंकवाद को समर्थन देने वालेतत्वों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जा सके। इस प्रकार कश्मीर में पंजाब की तरह आतंकवाद को खत्म किया गया। आज जम्मू कश्मीर राज्य विकास के मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ रहा है।देश विरोधीआतंकवाद को देश के अंदर चलाने के लिए तीन तत्व मुख्य भूमिका निभाते हैं। पहले धार्मिक कट्टरपन कोबढ़ावा देने वाले तत्व तथा आतंकवाद के साथ सहानुभूति रखने वाले ,दूसरे उनके लिए धन एकत्रित करने वाले तथा इन आतंकी तत्वों के रहन-सहन का इंतजाम करने वाले तथा कट्टरपन की सोच को बढ़ाने वाले जिन्हें ओवर ग्राउंड वर्कर या सफेद पोश भी कहा जाता है। इस प्रकार इन तीनों तत्वों के सहयोग से आतंकी तैयार होते हैं जो देश में हिंसा फैलाने के लिए बेगुनाह लोगों पर हमले तथा सार्वजनिक स्थानों जैसे लाल किला इत्यादि पर हमला करके देश में आप शिक्षा असुरक्षा कथा सांप्रदायिक तनाव की भावना पैदा करते हैं। इससे देश की देश की आंतरिक सुरक्षा नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है। परंतु अक्सर वोट बैंक की राजनीति के कारण राज्य सरकारे देशद्रोही तत्वों और उनके द्वारा फैलाई जा रहे हैं दुष्प्रचार की अनदेखी करती हैं जिसके कारणदेश में अस्थिरता फैलती है जैसा की उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक दंगों के रूप में देखने में आया था।

उपरोक्त को देखते हुए देश की आंतरिक सुरक्षा के प्रति देश के हर नागरिक को भी उतना ही जागरूक रहना चाहिए जितना की सुरक्षा एजेंसी रहती है। फरीदाबाद की यूनिवर्सिटी में पिछले काफी दिनों से उसके अध्यक्ष की मंजूरी और उसके डॉक्टर उमर जैसे देश विरोधी तत्व अपनी गतिविधियां चला रहे थे। परंतु लाल किले के धमाके तक किसी भी सुरक्षा एजेंसी कोइस यूनिवर्सिटी के अंदरचल रही इन देश विरोधी गतिविधियों के बारे में कोई सूचना नहीं मिली। इसको देखते हुए सामरिक दृष्टि से इन जमीन की सतह के ऊपर सफेद पोश देशद्रोहियों और इन गतिविधियों के लिए धन देने वालों केविरुद्ध भी आतंकियों जैसी कार्रवाई करते हुए उन्हें कानून के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए। जहां से इन्हें कड़ी सजा दिलवानी चाहिए। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर जिसमें एनआईए, आईबी और राज्यों की एटीएस के प्रतिनिधियों के साथ एक कमेटी स्थापित की जानी चाहिए जिससे पूरे देश में इस प्रकार की राष्ट्र विरोधी गतिविधियों पर शीघ्रता से कार्रवाई की जा सके। इसके साथ ही कट्टरपंथी दुष्प्रचार को रोकने के लिए संप्रदाय विशेष के उदारवादी लोगों तथा उनके समाजसेवी और शिक्षा विदों का सहयोग लिया जाना चाहिए जो अपने समाज की सोच को धार्मिक कट्टरपन और देश विरोधी सोच से बदलकर इसे राष्ट्रवादी बना सकें। इसके बाद जिस प्रकार सरकार ने छत्तीसगढ़ में समर्पण किये नक्सली और माओवादियों का पुनर्वास किया हैऔर उन्हें देश की सकारात्मक गतिविधियों में लगाया है उसी प्रकार मुस्लिम समाज के उन युवाओं का पुनर्वास किया जाना चाहिए जो कट्टरपन से दिग्ग्रहित होकर देश विरोधी गतिविधियों मेंलग गए हैं।

जिस प्रकार भारतीय सेना का हर सैनिक सीमाओं की सुरक्षा में तैनात रहता है। उसी प्रकार देश के हर नागरिक को देश की आंतरिक सुरक्षा में तैनात रहना चाहिएम।और जहां भी किसी देश विरोधी गतिविधि की शंका हो उसकी सूचना फौरन सुरक्षा एजेंसी को दी जानी चाहिए जिससे वह समय पर कार्रवाई करके इन तत्वों को समाप्त कर सकें।

 

शुक्रवार, 21 नवंबर 2025

अपराध के अनुपात से ज़्यादा सजा अनुचित और अनैतिक

बसंत कुमार

प्रायः हम सुनते रहते हैं कि जस्टिस डिलेयड इस जस्टिस डिनाइड, पर जब एक व्यक्ति को मात्र 100 रूपये की रिश्वत के आरोप में लगातार 39 वर्षों तक यातनाएं झेलनी पड़े और 39 वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद 84 वर्ष की आयु में न्याय मिले तो प्रश्न यह उठता है कि क्या अब हमारी न्यायिक प्रणाली पर विचार किया जाना चाहिए। अभी एक मामले में एक सरकारी कर्मचारी को 1986 में 100 रुपए की रिश्वत के आरोप में गिरफ्तार किया गया। एक साल की सजा हुई, 15 साल निलंबित रहे फिर नौकरी से बर्खास्त कर दिए गए। समाज में रिश्वतखोर की जिल्लत झेली, दवा के अभाव में पत्नी की मृत्यु हो गई। परिवार बिखर गया और अब बाइज्जत बरी हो गए तो क्या कोई भी न्यायालय उनके 39 वर्ष लौटा पाएगा। इस परिप्रेक्ष्य में हमारे न्यायालयों की कार्य प्रणाली पर चर्चा करना जरूरी हो जाता है।

अविभाजित मध्य प्रदेश के स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन में लिपिक के रूप में काम करने वाले जागेश्वर प्रसाद अवधिया को 1986 में मात्र 100 रु. रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था, अब उन्हें 39 वर्ष की कानूनी लड़ाई के बाद बाइज्जत बरी कर दिया गया। 84 वर्ष की आयु में न्यायालय से मिली इस राहत पर जागेश्वर प्रसाद अवधिया कहते हैं कि अब मेरे लिए इस फैसले का कोई महत्व नहीं रह गया है। इस केस के कारण मुझे जेल हुई, नौकरी चली गई समाज ने मेरा बहिष्कार कर दिया। बच्चों की पढ़ाई छूट गई। बच्चों की शादी नहीं कर पाया। इलाज के अभाव में मेरी पत्नी की मौत हो गई। अब बस मैं अकेला बचा हूं। क्या इस फैसले के बाद कोई मेरे बीते हुए दिन लौटा सकता है। जब मैं चिल्ला चिल्लाकर कहता था कि मैं बेकसूर हूं मुझे साजिश के तहत फंसाया गया है पर कोई विश्वास नहीं करता था।

जागेश्वर के 52 वर्षीय बेटे नीरज ने बताया कि उस वक्त मेरी उम्र 13 वर्ष थी हमें यह पता नहीं था कि रिश्वत क्या होती है लेकिन लोग मुझे कहते थे कि रिश्वतखोर का बेटा है। बच्चे चिढ़ाते थे और स्कूल में कोई बच्चा हमसे कोई दोस्ती नहीं करना चाहता था। मोहल्ले में हमारे लिए लोगों के दरवाजे बंद हो गए और रिश्तेदारों ने संपर्क बंद कर दिया था। हमें दुख है कि जब पिताजी गिरफ्तार हुए मैं 13 वर्ष का था पर पिताजी की लड़ाई में हमारा सारा बचपन अदालत की सीढ़ियों में छूट गया।

1986 में जागेश्वर की गिरफ्तारी के दो वर्ष बाद 1988 में अदालत में चार्ज शीट दाखिल होते ही उसे नौकरी से निलंबित कर दिया गया और वे दशकों तक निलंबित रहे और 50% गुजारा भत्ता से उनका गुजारा मुश्किल हो गया था। इलाज के अभाव में उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई। एक-एक करके उसके चारों बच्चों की पढ़ाई छूट गई। 16 वर्ष के ट्रायल के बाद वर्ष 2004 में ट्रायल कोर्ट ने उन्हें दोषी करार कर दिया। परिणाम यह हुआ कि ट्रायल कोर्ट के फैसले के विरुद्ध उनकी अपील पर फैसला आने से पहले ही उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया और सरकारी मकान खाली कराने के साथ-साथ सरकारी चिकित्सा सुविधाएं भी बंद कर दी गईं।

यह मामला सिर्फ जगेश्वर का ही नहीं है यह हाल छोटे-मोटे आरोपों में पकड़े गए सभी निम्न कोटि के कर्मचारियों का है। जागेश्वर प्रसाद की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है अपितु यह हमारी न्याय व्यवस्था के उस चेहरे को उजागर करती है जो न्याय की देरी को अन्याय मानता है, किसी की जवानी अदालत में गुजर जाती है और जब फैसला आता है तब तक उसका सब कुछ समाप्त हो चुका होता है। अदालतों में ट्रायल 20 वर्ष और अपीलीय न्यायालय में अगले 20 वर्ष लग जाते हैं तो व्यक्ति के जीवन के कितने वर्ष बचते हैं यह विचारणीय प्रश्न है। कुछ वर्ष पूर्व एक खबर छपी थी कि उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में लखन पासी नाम के व्यक्ति को एक मामले में 48 साल जेल में रहने के बाद 104 वर्ष की आयु में न्यायालय द्वारा बाइज्जत बरी किया गया। इस प्रकार के निर्णय भारत के कछुए की चाल चलने वाले न्यायिक प्रणाली की कहानी कहते हैं।

देश में हर समय चुनाव होते रहते हैं और चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दल तरह-तरह की लुभावनी घोषणाएं करते हैं कि हम सत्ता में आए तो ये करेंगे। कोई लाडली बहना के नाम पर पैसे बांटता है पर कोई अपनी लाडली बहना की उस तकलीफ की ओर ध्यान नहीं देता जहां उनके शौहर, बेटे बिना कसूर के जेलों में सड़ रहे हैं या वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं और महिलाएं ही घर और बच्चों की शिक्षा का बोझ उठा रही हैं। कोई भी राजनीतिक दल इन असहाय गरीबों विषय में कभी आवाज नहीं उठाता। वास्तविकता यह है कि भारत में न्याय पाना तो बड़े धनाढ्य लोगों का ही एकाधिकार रह गया है। अगर किसी गरीब या छोटे व्यक्ति ने अज्ञानतावश या मजबूरी में कोई छोटा-मोटा अपराध कर लिया तो उसकी पूरी उम्र जेल की सलाखों या फिर अदालतों का चक्कर लगाते-लगाते कट जाएगी। पर बड़े लोगों के लिए तो यह कहावत चरितार्थ होती है जहां पैसे के लिए अपराध करो और पकड़े जाओ तो पैसे देकर छूट जाओ। उनके लिए अपराध करना और बेल मिलना मानो रोज की दिनचर्या है पर जब एक गरीब से अपराध हो जाए तो उसका ये जन्म इसी को निपटाने में निकल जायेगा।

सरकार ने सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट बनाया और सरकारी कर्मचारियों द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार की जांच के लिए सीबीआई जैसी जांच एजेंसी बनाई, पर दुर्भाग्य से दोनों को अस्तित्व में लाने का मकसद पूरा नहीं हुआ। प्रिवेंशन ऑफ करप्शन की जद में छोटे-मोटे कर्मचारी व अधिकारी आते हैं क्योंकि बड़े अधिकारी तो पैसे के बल पर बड़े से बड़ा वकील करके या फिर जजों से सेटिंग करके छूट जाते हैं, जहां भ्रष्टाचार में आरोपित छोटे कर्मचारी न्याय की आस में तीस-तीस साल तक कोर्ट के चक्कर लगाते-लगाते भगवान को प्यारे हो जाते हैं। वहीं बड़े आरोपियों के सीनियर वकील मेंशन करके घंटों में उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय में केस लिस्ट करवा लेते हैं। सबको याद होगा कि फिल्म अभिनेता सलमान खान को ब्लैक बक मामले में हाईकोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद मात्र कुछ घंटे में सर्वोच्च न्यायालय में बेल मिल गई थी, जहां तक सीबीआई की बात है तो उसे सर्वोच्च न्यायालय के एक जज ने पैरट इन ए केज कह दिया था। सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह ने सीबीआई की जांच के बारे में अपनी किताब में लिखा था कि सीबीआई की जांच में सिर्फ छोटी मछली आती है जब इसमें किसी बड़ी मछली के पकड़े जाने का अंदेशा होता है तो जांच की दिशा दूसरी तरफ मोड़ दी जाती है।

रायपुर के जागेश्वर प्रसाद का मामला यह बताता है कि 100 रुपए की रिश्वत के आरोप में उनका गिरफ्तार होना और उनको साल दो साल की सजा होना तो ठीक है पर उसका 15 साल तक सस्पेंड रहना फिर नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाना और वर्षों तक रिश्वतखोर के विशेषण के साथ समाज के सामने जिल्लत उठाना कहां तक सही है। अब समय आ गया है कि सरकार और सर्वोच्च न्यायालय किसी भी आरोप में पकड़े गए आरोपी के विरूद्ध न्यायिक प्रक्रिया उन धाराओं जिससे उस पर मुकदमा चल रहा है में निर्धारित सजा की अवधि में पूरी न हो तो उसे बरी कर देना चाहिए और ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद उसको अपीलीय न्यायालय द्वारा मामला निपटाए जाने तक उसे सरकारी आवास और स्वास्थ सुविधाओं से वंचित नहीं किया जाना चाहिए, नहीं तो भुखमरी से बचने के लिए उनके बच्चे अपराध की दुनिया में जाएंगे और यह स्थिति भयावह होगी।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

मंगलवार, 18 नवंबर 2025

मानवता के रक्षक श्री गुरु तेग बहादुर साहिब की शहीदी एवं आध्यात्मिक दर्शन

आचार्य राघवेंद्र पी. तिवारी

सिखों के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) भारतीय इतिहास के उथल-पुथल वाले कालखंड में अवतरित हुए। औरंगज़ेब के दमनकारी शासनकाल में धार्मिक असहिष्णुता और जबरन धर्मांतरण ने भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को खतरे में डाल दिया था। जहाँ मुग़ल साम्राज्य में हिंदुओं का धर्मांतरण व्यापक पैमाने पर हो रहा था, वहीं कश्मीर का मुग़ल गवर्नर अपने बादशाह का कृपापात्र बनने हेतु, धर्मांतरण की नीति को बड़े उत्साह से लागू कर रहा था। परिणामस्वरूप कश्मीरी पंडितों पर भीषण अत्याचार हुए। उनके मंदिर तोड़े गए। उन्हें इस्लाम स्वीकारने पर विवश किया गया। कश्मीरी पंडितों ने आनंदपुर साहिब में गुरु साहिब से भेंटकर अपने धर्म एवं आस्था की रक्षा हेतु प्रार्थना की।

असाधारण साहस, करुणा और अंतःकरण की स्वतंत्रता के सार्वभौमिक समर्थक गुरु साहिब ने कश्मीरी पंडितों के धार्मिक स्वतन्त्रता की रक्षा करने का निर्णय लिया। उन्होंने पंडितों को आश्वासन दिया कि वे दिल्ली जाकर मुगल सम्राट से चर्चा करेंगे। साथ ही पंडितों से कहा कि वे अपने गवर्नर को सूचित करें कि यदि गुरु जी अपना धर्म परिवर्तित कर इस्लाम अपना लेते हैं, तो हम भी इस्लाम धर्म अपना लेंगे, लेकिन यदि वे इसका विरोध करते हैं, तो हमें धार्मिक रूप से स्वतंत्र रखा जाए।

गुरु साहिब के बढ़ते प्रभाव और जनसमर्थन को देखकर मुगल शासन घबरा उठा। दिल्ली यात्रा के दौरान मुगल शासक ने गुरु साहिब एवं उनके अनुयायियों को गिरफ्तार कर लिया। उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति को तोड़ने हेतु उन्हें और उनके अनुयायियों को रास्ते भर यातनाएँ दी एवं अपमानित किया। परन्तु गुरु साहिब ने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। काजी द्वारा झूठे मुकदमें के दौरान उन्हें धर्म परिवर्तन का प्रस्ताव दिया गया, जिसे गुरूजी ने दृढतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। उनके आँखों के समक्ष उनके तीन अनुयायियों, भाई मती दास जी, भाई सती दास जी और भाई दयाला जी को निर्ममतापूर्वक मार दिया गया, फिर भी गुरू साहिब शांतचित्त होकर नाम-स्मरण में लीन रहे।

24 नवंबर, 1675 को दिल्ली के चांदनी चौक में स्वयं उपस्थित होकर गुरु साहिब ने धार्मिक स्वतन्त्रता के अधिकार की रक्षा हेतु अपनी शहीदी दी। दृढ़ संकल्प एवं अटूट साहस के माध्यम से उन्होंने भारत की संप्रभुता की रक्षा की और धर्म के शाश्वत आदर्शों को कायम रखा। उनकी इस शहीदी ने भावी पीढ़ियों को भय और व्यक्तिगत सुरक्षा के बजाय विवेक, साहस और नैतिक कर्तव्य को बनाए रखने हेतु प्रेरित कर रही हैं। गुरु साहिब का जीवन इस आदर्श का प्रमाण है कि सच्ची वीरता अस्त्र-शस्त्र, सत्ता या क्रूरता में नहीं, अपितु आत्मविश्वास, बलिदान, नैतिक साहस, न्याय हेतु निडरता से खड़े होने में भी निहित है। इस सर्वोच्च बलिदान हेतु उन्हें ‘हिंद दी चादर’ अर्थात भारत की ढाल की उपाधि से विभूषित किया गया। युद्धकला में निपुण होने के बावजूद, गुरु साहिब का स्वभाव अत्यंत गंभीर, विचारशील, एवं आध्यात्मिकता की ओर उन्मुख था। उनका साहस एवं वीरता केवल सांसारिक रक्षा के लिए नहीं बल्कि वैराग्य, ध्यान और धर्म के प्रति निष्ठाजनित नैतिक साहस के उच्चतम आदर्श के रूप में भी थी।

गुरु साहिब की शहादत मनुष्य के स्वतंत्र रूप से जीने के सार्वभौमिक अधिकार हेतु दिया गया सर्वोच्च बलिदान है। यह सिखाता है कि दूसरों के स्वतंत्रता की रक्षा करना आध्यात्मिक कर्तव्य का सर्वोच्च रूप है। अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध प्रतिरोध इस बात का भी प्रमाण था कि धर्म-पालन का विषय साम्राज्यों के अधिकार से परे है। गुरु साहिब ने बलिदान के माध्यम से उद्घोष किया था कि स्वतंत्रता, समानता और मानवीय गरिमा, मन की पवित्रता में अंतर्निहित हैं। उन्होंने जाति, पंथ, लोभ अथवा धन के आधार पर सभी प्रकार के भेदभाव को अस्वीकार किया और संदेश दिया कि ईश्वरीय प्रकाश सभी में विद्यमान है। उनकी शहादत मानवाधिकारों के वैश्विक इतिहास में मील का पत्थर बनकर भावी पीढ़ी को न्याय और स्वतंत्रता के समर्थन हेतु प्रेरित करती रहेगी।

गुरु साहिब आस्था के नैतिक मूल्यों को पुनर्परिभाषित करने हेतु सिख इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उन्होंने सिख धर्म को न्याय, मानवीय गरिमा एवं अंतःकरण की स्वतंत्रता हेतु प्रतिबद्धता के रूप में स्थापित किया। उनके बलिदान ने सामूहिक रूप से सिख धर्म के दायरे को  क्षेत्रीय धार्मिक समुदाय से सार्वभौमिक नैतिक धर्म के रूप में स्थापित किया। उन्होंने गुरु अर्जन देव जी की शहादत को सिख धर्म के सार्वभौमिक अंतरात्मा के जीवंत उदाहरण तथा रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया, जिससे धार्मिक आस्था की रक्षा को नैतिक साहस एवं मानवाधिकारों के प्रतिमान के रूप में पहचान मिली।

गुरु साहिब के आध्यात्मिक योगदान उनके भजनों में परिलक्षित होते हैं। उदाहरणार्थ, वे कहते हैं, “किसी से डरो मत, किसी को भयभीत मत करो; इस प्रकार तुम ज्ञान प्राप्त करोगे” (गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1427), जहाँ वे आध्यात्मिक अनुशासन और नैतिक साहस के समन्वय को स्पष्ट करते हैं, संत-सिपाही (संत-सैनिक) आदर्श की रूपरेखा स्थापित करते हैं, और सभी के कल्याण (सरबत दा भला) के लिए कार्य करते हैं। उनकी विरासत व्यापक मानवतावादी चिंतन को आलोकित करती है। उनका जीवन यह प्रमाणित करता है कि सच्चा धर्म सभी सांप्रदायिक सीमाओं से परे है। उनके जीवन का संदेश सरल किन्तु शाश्वत है: “दूसरों की स्वतंत्रता की रक्षा उसी प्रकार करो जैसे तुम अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करते हो; इसी में ईश्वर का सच्चा मार्ग निहित है।”  साथ ही उनके सबद सांसारिक आसक्तियों की अनित्यता पर ज़ोर देते हैं और मानव को अहंकार, लोभ तथा क्षणिक सुखों से ऊपर उठने का आह्वान करते है। इन भजनों से सीख मिलती है कि हर परिस्थिती में समभाव बनाए रखना ही सच्ची आध्यात्मिकता है। गुरु जी की आध्यात्मिक दृष्टि विवेकपूर्ण एवं व्यावहारिक है, जो गहन सिमरन (ध्यान) एवं समर्पण (सेवा) के संयोजन पर आधारित है, जिससे स्पष्ट होता है कि ईश्वर भक्ति का सार मानवता के प्रति करुणा एवं सेवा में ही निहित है।

गुरु साहिब ने सिख धर्म को आध्यात्मिकता से आलोकित किया जो ध्यान, नैतिक सामर्थ्य तथा सार्वभौमिक करुणा पर आधारित है। उनके अनुसार  सच्ची आध्यात्मिकता किसी कर्मकांड, संन्यास में नहीं, बल्कि निडरता, विनम्रता और सांसारिक चुनौतियों के मध्य ईश्वर के स्मरण में निहित है। उन्होंने सिख धर्म को एक सार्वभौमिक दर्शन के रूप में स्थापित किया, जो आंतरिक जागृति, नैतिकता एवं मानवता की सेवा पर केंद्रित है। उन्होंने सीख दी कि आध्यात्मिक बोध और नैतिक साहस सत्य के दो अविभाज्य आयाम हैं।

गुरु साहिब का जीवन और बलिदान न केवल सिख इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है, अपितु समूची मानवता के लिए शाश्वत सीख भी हैं। उनकी सीख सद्भाव और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की है। ये ऐसे जीवन मूल्य है जो अशांत एवं संघर्षग्रस्त विश्व में अत्यंत प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा कि सच्चा सुख भौतिक संपत्ति अथवा क्षणिक सुखों में नहीं, बल्कि सत्य, नि:स्वार्थता और मानव सेवा में निहित है। उनका जीवन प्रेरणा देता है कि कैसे सभी प्राणियों के प्रति गहरी करुणा रखते हुए भी धर्म पर दृढ़ रहा जा सकता है। यह संदेश संस्कृतियों की सीमाओं से परे मानव समाज को हमेशा प्रेरित करता रहेगा। गुरु साहिब का जीवन हमें विपत्ति में वीरता, शक्ति में करुणा और सेवा में निस्वार्थता की सीख देता है। उनकी विरासत लोगों को स्वतंत्रता, समानता, न्याय और सर्वजन हिताय, बहुजन सुखाय के आदर्शों के लिए जीने हेतु प्रेरणा देती है। उनका साहस और बलिदान मानव समाज का अमर प्रेरणा स्त्रोत रहेगा।  हमेशा स्मरण कराएगा कि वास्तविक शक्ति सत्य और धर्म की रक्षा में निहित है। यह न्याय और करुणा का सार्वभौमिक संदेश है, जो कालातीत है।

(लेखक कुलपतिपंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालयबठिंडा हैं और यह इनके व्यक्तिगत विचार हैं।)

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